गज़ल


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 5वी प्रस्तुति )

– ‍शशि प्रेमदेव

गाँधी जी के बानर, बनि गइले पर नीक कहाइबि हम।
साँच बात कहि के ए दादा, माथा ना फोरवाइबि हम।

मन के कहना मान लेबि तऽ कबहूँ ना पछताइबि हम।
बेसी चतुर बनबि तऽ बीच बजरिया फेनु ठगाइबि हम।

हीरा भइला में सइ गो, खतरा बा चोर-लुटेरन से।
बाकिर पाथर बनि जाइबि तऽ देवता-नियर पुजाइबि हम।

रऊवें एगो अबर-दुब्बर रहलीं हाँ टोला-भर में
अब रऊवों परदेसी भइलीं, केकरा से अझुराइबि हम।

ऐब कई गो बा हमरा में, जनि एतना तारीफ करीं
चान बना देइबि तऽ केहुए के हाथे ना आइबि हम।

पंडित-मुल्ला के बहकवले अब ना सहकबि, ए भई !
मन्दिर-मस्जिद के पाछा ना, अपना के बिलवाइबि हम।

कइले रहलीं कवन पाप जे, तोहरा-लेखा मीत मिलल।
राम बिसर जइहें, कइसे तोहरा के ‘शशी’ भुलाइबि हम।


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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