दू गो छोटहन कहानी


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 14वी प्रस्तुति)

– राजगुप्त

(एक) पान खइनी, गुटका-गुटकी

ट्रेन अपना रफ्तार से दउड़त रहे. गर्मी के दिन ऊपर से बहुते भीड़ि रहे. सज्जी पसिन्जर गर्मी से बेहाल रहले. एही बीचे एगो चना बेचत अदिमी भीड़ि
के चीरत आइल. पेट पर खाँची लटकवले रहल. उहो पुरहर पसेनियाइल रहे. ”चना भई चना, गरम-गरम चना, जायकेदार- मसलदार केतना चटकार बा, खा के बताईं. मजा ना आई त पइसा वापस हो जाई. सेन्हा नून मरिचा पियाज संगे खाईं. लीं तनि चीखीं. चीखि के आनो के बताईं.“ चना वाला एक सुर से सभके जनावत, चेतावत रहे.

ताश खेलत एगो लड़िका के चना वाला के बोली भारी बुझाइल त डपटि के कहलसि, काहे कान खाताडे़ रे ? आगा बढ़ि जो, एइजा तोर दाल ना गली. एइजा सभे अपना अपना मुँह में पान-खैनी, गुटका गुटकी दबवले बा.“

(दू) समय
एक दिन एगो आदमी बगइचा में आम के फेड़ा पर झटहा चलावत रहे. झटहा चलावत-चलावत ओकर पँखुरा बत्थे लागल. बाँहि पटा गइल बेचारा के. बाकिर पतई के सिवा फर हाथे ना लागल. एही बीचे एगो चतुर-चल्हाँक आदमी आपरूपी परगट हो गइल. थाकल मादल आदमी के दशा देखि के बोलल, ”हे मरदे आदमी ! एकइसवी सदी में काहे कालीदास बन ताड़ऽ ? ई सीजन ना ह. मोजर लगबे ना कइल त टिकोरा के आस जनि करऽ.“


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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