अभागा

– इं॰ राजेश्वर सिंह

जब केहू के कवनो मसला समझ में ना आवेला त अपने से अधिक ज्ञानी मनई से शंका समाधान करे चलि जाला अउर समस्या के बारे में पूछि-ताछि के जानकारी कइ लेला. लक्ष्मण जइसन मनइ के अभागा लोगन के पहिचान कइले में शंका भइल त ऊ बड़े भाई राम से पूछि पड़लन कि अभागा कइसन लोगन के समुझे के चाही. राम समुझावे खातिर कहलन कि – ’’कुटिल, कठोर, कुबुद्धि अभागा.’’ माने कि जवने मनई बिना बुद्धि के भइले क साथे-साथ चालाक अउर कठोर होला ऊ अपने खातिर बाउर समय के खुदही नेवता दे देला.

एक जगही ढेर क मेंढ़क झुंड में रहलन. एगो मेंढ़क अपने के जियादे चालाक समुझत रहल. ऊ सगरो झुंड़ वालन के परेशान करे खातिर एगो जुगत सोचलसि. अपने सोच के चलते एक सांप के लगे जाइके कहलस कि एक जगही ढेर मेंढ़क बाड़न, चलऽ देखाईं. सांप के ले जाके देखवलसि. सांप एक-एक कइके सगरी मेढ़कन के घोंट लिहलसि. आखिर में ऊ चालाक मेंढ़क क बारी आइल त सांप ओही के घोंटे चलल. ऊ मेंढ़कवा से कहे लागल की ए भाई हम त तुहार मदद कइलीं अउर ढेर जानी के खाये के मौका दिहलीं, हमके त छोड़ि द. संपवा कहलस की तू त हमार खयका हउअ तुहके काहें नाहीं घोटब? ई कहिके उनहूं के घोंट गइल.

एहसे ई साबित होता कि चालाक मेंढ़क अपने कुटिलता के चलते बिरादरी वालन खातिर बाउर दिन ले आइल. एही से कहल ह कि भगवान प्रारब्ध के अलावा केहू के अभागा ना बनवलन. मनई अपने पहिले क संचय कइल कर्म फल भोग के अलावा सुख-दुख जवन अउर पावेला ऊ खुदे रचले ह. रावण जइसन सुख-संपति वाला केहू नाही रहल. उ सोने के नगरी में रहत रहलन. लेकिन ज्ञानी भइलहू प अपने कठोरता अउर कुबुद्धि क चलते सगरी खानदान क नाश करा दिहलन. एही मतिन दुर्योधनो अपने कुटिलता, कुबुद्धि अउर कठोरता का चलते अपने खानदान आ सेना क नाश करवलन. सच बात ह कि अइसन मनई विवेक क प्रयोग ना करेलन. विवेकहीन हो जालन. जब मनई विवेक इस्तेमाल करेला त बिगड़े वाला खेलो सहज ढंग से बन जाला.


इं॰ राजेश्वर सिंह,
मूल निवास – गोपालपुर, गोला, गोरखपुर.
हाल फिलहाल – पटना में बिहार सरकार के वरिष्ठ लोक स्वास्थ्य अभियन्त्रण सलाहकार
उत्तर प्रदेश जल निगम से अधीक्षण अभियंता के पद से साल २०१० में सेवानिवृत
हिंदी में अनेके किताब प्रकाशित, भोजपुरी में “जिनगी क दूब हरियाइल”, आ “कल्यान क जुगति” प्रकाशित. अनेके साहित्यिक आ सांस्कृतिक संस्था से सम्मानित आ संबद्ध.
संपर्क फोन – 09798083163, 09415208520

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