भोजपुरी कवि रामजियावन दास बावला के निधन

काल्हु पहली मई २०१२ के दुपहरिया नब्बे साल के बाबा रामजियावन दास बावला के लमहर बेमारी का बाद निधन हो गइल.

चकिया चंदौली के भीखमपुर गाँव मे एगो किसान रामदेव विश्वकर्मा का घरे माता सुदेश्वरी देवी के पहली जून १९२२ के जनमल पुत्र राम जियावन के पढ़ाई लिखाई में मन ना लागत रहे आ ऊ चउथा क्लास से आगा ना पढ़ पवलें आ भगवत भजने में मन लगा लिहलें. अपना बड़का बाबूजी रामस्वरूप विश्वकर्मा के संगति में ऊ रामायणिक बन गइले आ रामायण पाठ करे लगले.

भोजपुरी में कविता रचे आ गावे वाला रामजियावन कब अपना दोस्तन से मिलल नाम “बावला” अपना लिहले कहल ना जा सके. बाकिर बनारस के घाट पर नहाए गइल रामजियावन दास से एगो साधु पूछलसि कि कहवाँ से आइल बाड़े बावला ? आ उनुकर दोस्त तबहिए से उनुका के बावला कहे लगले.

रामजियावन दास के रामायण प्रेम का चलते आ राम से जुड़ल कविताई का चलते भोजपुरी के तुलसीदास कहल जाए लागल रहुवे. अपना अंतिम समय ले रामजियावन दास बावला अपना माटी, संस्कार आ भाषा से जुड़ल रहलें.

अपना वाचिक परंपरा का चलते बावला के अधिकतर रचना गाँव जवार के लोकगीतन में समात चलि गइल आ ऊ प्रकाशन आ प्रचार से दूरे रहलें. बाद में स्व॰ विद्यानिवास मिश्रा जी के प्रयास से बावला के गीतन के एगो संकलन “गीतलोक” प्रकाशित भइल रहे.

बावला के एगो गीत के मुखड़ा “कहवाँ से आवेलऽ कवना ठईयाँ जइबऽ बबुआ बोलत ना, के हो देहलसि तोहके बनवास बबुआ बोलत ना” रउरो सुनले होखब.

बावला के रचना के कुछ अउर बानगी एहिजा देखीं.

तोरि के पाताल के आकाश में उछाल देब
ढाल देब पानी-पानी पूरा एक दान में।
बाहु बल बिधि क बिधान हेर फेर देब
का करी अकाल जान डाल देब जान में।
धानी रंग धरती क रंग नाहीं उतरी त
उतरी कब उतरी सोनहुला सिवान में।
रूठ जाय अदरा औ बदरा भी रूठ जाय
भदरा न लगइ देब खेत खलिहान में ।।

भा फेर गाँव गिराँव के चरचा देखीं.

पग पग धरती सिवनवा क नापइ देहियाँ क सुधि नाहीं फटहा झिंगोला ।
तपनी थिथोर होय सँझवा के दर दर बुढ़ऊ क कहनी सोहाय भर टोला।
उँखिया क रस कोल्हुवड़वा बोलावइ गुड़वा सोन्हाय त उमगि जाय चोला।
गँवई क गाँव जहाँ दिन भर चाँव माँव धूरिया लपेट के फिरैलैं बम भोला।।

एह भोजपुरी प्रेमी के अँजोरिया के श्रद्धांजलि.

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