बतकुच्चन – ५७


जमाना खराब हो गइल बा. कब केकरा कवन बाति बाउर लाग जाई आ ऊ रउरा के कूटे लागी कहल ना जा सके. विदूषक, बतबनवा, लबार, कामेडियन आ कार्टूनिस्टन के पिटाए के अनेसा हमेशा बनल रहेला. हमार मुंह टेढ़ काहे बनवले, चल हम तोर मुँह टेढ़ कर देत बानी. एहसे हमहू सोचत बानी कि बहुत सम्हरिए के रहल जाव. पानी में रहे के बा त मगर से बैर निभावल बुद्धिमानी के काम ना कहल जाई. दुनिया में आधा से अधिका संकट निमनकन का चलते आवेला जे अपना के अतना निमन बुझेलें कि उनुका दोसर लोग हमेशा बाउर लागेला. घर वाली तनी फूहड़ रहे त जिनिगी बड़ी आराम से कट जाला. अब अन्ना ईमानदार ना रहीतन त कतना शांति रहीत अपना देश में, सोचीं. सभे मस्ती से अपना काम में लागल रहीत आ कुछ ले दे के आपन काम निकालत रहीत. ले दे के काम त अबहियो निकालले जात बा बाकिर तनी लुका छिपा के. पहिले जस खुला खेल फर्रुखाबादी नइखे होखत. करिया झंडा देखावे वाला करिखा पोते वाला पहिलहू पिटात रहले अबहियो पिटात बाड़े. बाकिर कुछ लोग के आदत हो जाला कि पिटात रहीहें बाकिर आपन आदत ना छोड़ीहें काहे कि उनुकर कुछ कमिटमेंट होला जवना से ऊ मुकर ना सकसु. खैर ई सब चरचा त लागले रही. अब देखीं ना दिल्ली में कांग्रेस जीतल आ भाजपा हार गइल बाकिर लोग बा जे कि माने के तइयारे नइखे. कहत बा लोग कि कांग्रेस हार गइल जब कि ओकरा पिछला चुनाव से बेसी सीट मिलल बा आ भाजपा के पिछला चुनाव से कम. अब रउरे बताईं कि भाजपा हारल कि कांग्रेस? ई सवाल कुछ वइसने हो गइल जइसे कि केहू पूछ देव कि बताईं निहुरल, ओलरल आ पलरल में का अंतर बा. अरे तीनो त टेढ़े भइल होला. आगे ओर टेढ़ होखीं त निहुरल, अगल बगल टेढ़ होखीं त ओलरल आ पाछा का तरफ टेढ़ होखीं त पलरल. निहुरे वाला के कवनो सहारा के जरुरत ना पड़े. बाकिर ओलरल भा पलरल के कवनो सहारा खोजेला कबो कबो जवना पर ऊ ओलर भा पलर सको. नेता आ प्रवक्ता लोग त हमेशा निहुरत ओलरत पलरत रहेला काहें कि ओह लोग के अपना बाति के घुमा फिरा के सही साबित करे होखेला. फटला में पेवन लगावत रहे के होला जेहसे कि बाति उघार मत होखो. अंगरेजी में ओह लोग के स्पिन मास्टर कहल जाला बाकिर हमनी के देसी बोली में रफूमास्टर. प्रवक्ता लोग बहुते बढ़िया रफूमास्टर होलें. रिजल्ट आवे का पहिले ले दावा करत रहीहें कि जीत पकिया बा. हारे लगीहें तबहियों फेंकत रहीहें कि तनी दम धरीं, आखिरी नतीजा आवे दीं. देखब ई सगरी बढ़त बदलि जाए वाला बा ! ना बदलल त सोचे लगीहें कि आखिर कहाँ गलती हो गइल. अरबा त सही रहल कुनबा कइसे डूब गइल ? जबकि एह चुनाव में कांग्रेस के हार के असली दोषी के केहू नाम नइखे लेत. ठीक चुनाव का दिने अमूल अपना दूध के दाम बढ़ा के लोग के महँगाई के दरद ताजा कर दिहलसि आ अमूल के चाय पी के लोग महँगाई का खिलाफ वोट दे आइल. ना सोचल कि वोट त सफाई करेवालन के होत बा. अब इहे देख लीं ना कि अपना बतकुच्चन का फेर में हम केने से केने निकल अइनी. अब चले दीं. भूल चूक माफ करब.

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