जे हंसे ना ऊ..?

– जयंती पांडेय

ई त केहु विज्ञानीए बता सकेला कि तीनूं तिरलोक में आदमी के अलावा कवन प्राणी हंसेला. लेकिन ई त तय बा कि गदहा बिल्कुल ना हंसेला. बाबा लस्टमानंद के बात सुनि के राममचेला कहलें, ऊ जे गदहा कभी-कभी हंसत अइसन लागेला तवन? बाबा कहले दरअसल आदमी के लगे रहि के ऊ नकल करे के कोसिस करेला. गदहवन के मूल भाव गंभीर दार्शनिक चिंतन के होला. एकदम पुरनका युग से अब ले आदमी आ गदहा के साथ एह मनोभावन के अदला-बदली हो गइल. इहे वजह ह कि इहां के बुद्धिजीवी कव बेर हिंदी पट्टी के धोबीघाट पर हंसत लउकेले.

एकरा के हल्का भाव मत लीं, काहे कि आजु काल जे बड़हन बुद्धिजीवी होला ऊ हंसेला ना. एकदम सीरियस रहेला. हर पेशेवर बुद्धिजीवी के एह मामला पर गंभीर विचार जरूर करे के चाहीं. सोचे लायक बाति बा कि गदहा जे हंसत जइसन लागेला, ऊ एगो भ्रम ह, चाहे गंभीरता के ओढ़ना ओढ़े वाला विद्वान लोग स्वाभाविक हंसी भुला बइठेला.

प्रकृति के ई अजबे घटना ह, कि हिंदी पट्टी के अनेक धोबी घाट शोध करेके ठोस जमीन मुहैया करावेला. हिंदी छोड़ि के दुनिया के कवनो भाषा में ई कहावत नईखे कि धोबी के कुत्ता ना घर के ना घाट के, चाहे भुलइला गदहा अस पीटे के कवनो मोहाविरा नइखे. नारी, दलित, उत्तर आधुनिकता, भाषा के क्रियोलीकरण जइसन विमर्शन के कठिन भूमि पर बइठल आ हरदम दांत पीसत लोगन के कतार के सबसे खराब असर ई गदहवन पर पड़ल बा, जे ई गर्मी में आपन बोझा पटकि के धूरा में लोटातारे सन. बुझाता कि ओकनियों का हंसऽतारे सन. जबकि प्राणिशास्त्र के नियम के अनुसार ऊ हंसत नइखन सन, सिर्फ आपन हगुआहट मेटावऽतारें सन, काहे कि ओकनी के पीठ पर घोड़न अइसन खरहरा ना होला.

चूंकि मनुष्य नामक प्राणी ई मानेला कि ऊ आपन नियंता स्वयं ह, एही से ना चाहे कि केहु ओकरा के गुदगुदावे, चाहे कांखि में अंगुरी क के चाहे कहीं आउर अंगुरी क के. भले ऊ दोसरा के अंगुरिया देऊ, जेकरा ऊ वैचारिक झुरझुरी कहेला. जइसे गदहा हंस ना सकेला, असहीं कुकुर खाली रो सके ले सन. रोअला के रुदन कहल त बड़का बुद्धिजीवियन के काम ह. हामा सुमा अइसन मामूली आदमी ना कहि सकेला. असहीं शब्द हिंदी के अखबारन में सम्मानपूर्वक छपला खातिर जरूरी होला. कठिन शब्दावली के बिना केहुओ गंभीर चिंतन ना कर सके. हिंदी के विमर्श के दाल में उर्दू के छौंक से लेखक के ज्ञान की परिधि बढ़ जाला अउर ओकर धर्मनिरपेक्षतो प्रमाणित हो जाला, जेकरा से कौमी वगैरह ईनाम मिले के चांस बढ़े लागेला.

बंगाल के महान फिल्मकार सत्यजित राय लइकन खातिर एगो कहानी लिखले रहन – हंसने वाला कुत्ता, ओही में लिखल बा कि गदहवन के तरह कुतवो ना हंस सके ले सन.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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