भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” – 3

– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

अबले जवन पढ़नी ओकरा आगे …)

सब लोग के पहिला गिलास खतम होखे पर आइल. सबकर नजर जुगेसर के भरल गिलास पर पड़ल. एक साथे सभे बोल उठल – ‘पहिला खतम कइल जाव. फेर इच्छा होई त लेब.’

जुगेसर कइसहूं सांस बंद कर के पी गइलन. विनोदजी सबका में एक-एक पैग डाल दिहलन. जुगेसर में आधा के करीब डललन. पानी दे के सभे पीए शुरू कर दीहल. तबले चपरासी एगो थाली में भूनल मछली ले आइल. एके थरिया में सब कोई खाए लागल. डॉ.ठाकुर से रहल ना गइल. कहलन – ‘हुजूर ऐसे चुपचाप माहौल में शराब शौक फरमाने का कोई मतलब बनता है क्या?’
विनोद जी कहलन – ‘सत्यकाम जी से शुरू होखे.’
– ‘ना ना भाई, हम ठहरनी अनपढ़ आदमी. एतना विद्वान लोग का बीच हमार बोलल शोभा नइखे देत. डॉ.साहब कुछ सुनावल जाव.’

अपना के अनपढ़ बताके ऊ आदमी अपना महानता के परिचय एक लाइन में दे दिहलन. डॉ. साहेब त कहे खातिर छटपटाते रहस. कहे लगलन – ‘देखिए जनाब. ऐसे माहौल में वैष्णवी बातें तो भातीं नहीं. अर्ज किया है – ‘जो के! जो मदरसे में बिगड़े हुए हैं मुल्ला/ उनको मयखाने में ले आओ, संवर जाएंगे.’
‘वाह- वाह’ क आवाज सबका साथ जुगेसरो का मुंह से अनायासे निकल गइल. उनका आवाज के असलियत, सबकर ध्यान खींच लिहलस. सत्यकाम जी के आवाज आइल – ‘महफिल के हुक्म होखे त बंदा एगो शेर कहित.’
-‘इरशाद.’ डॉ. ठाकुर सबका पहिले कह भइलन – ‘उम्मीदे हूर ने सब कुछ सिखा रखा है वाजिद को/ ए हजरत देखने में सीधे हैं, साधे हैं, भोले-भाले हैं’
विनोद जी मुस्कुरा के कहलन – ‘अरे भाई, अब त कुछ सुना ही दीहल जाव. जुगेसर त घबड़ा गइलन. बाकिर उहो सब छोड़े वाला ना रहस. – ‘देखल जाव. हमरा त कवनो शेर याद नइखे. आप सब कहतानी त गालिब के एगो विख्यात शेर सुनाव तानी. सबके उत्साह जइसे बढ़ गइल – ‘इरशाद! इरशाद!!’
जुगेसर का कहे कएक सेकेंड लागल – ‘ इश्क पर जोर नहीं, है ए ऐसी आतिश गालिब. जो लगाए न लगे और बुझाए ना बुझे.’
– ‘अरे उस्ताद कब लगाए वो आग?’ डॉ. ठाकुर चहकलन.
विनोद जी रोक ना पवलन – ‘अब इहे त जाने के बा. के आग लगवले बा. हमार भाई ना ऊ कन्या?’
जुगेसर त घबड़ा गइलन. बड़ी मुश्किल से कह पवलन – ‘का जे कह तानी?’
– ‘शरमा मत योगश्वर. बड़ा भाग्यवान के प्रेम करे के मौका मिलेला. लेकिन भुला मत – जइसे ऊ आग अपने आप लागेला लेकिन ओकर खबर बड़ी जल्दी फइलेला.’
सत्यकाम जी कहलन – ‘लागता, कवनो विशेष बात की ओर इशारा करऽतानी पाण्डेय जी. त प्रसादो सर कलाकार लागऽतानी.’
– ‘ई का कलाकार होइहन. ऊ त दोसरे पक्ष के पहल होई.’
डॉ.ठाकुर का लागल विनोद जी पर नशा चढ़ रहल बा. ऊ बात सम्हारे के कोशिश कइलन – ‘देखल जाय. हम यहां किसी के बारे में व्यक्तिगत बात को न उठाएं.’
विनोद जी के सुर बदलल जात रहे – ‘तुम चुप रहो तो. तुम क्या जानोगे पटना यूनिवर्सिटी के बारे में.’
डॉ.ठाकुर कुछ कहस कि सत्यकाम जी जोर से डंटलन – ‘फिर आप लोग बकवास करने लगे. मैं वाकई परेशान हूं. सोचा था काम की बात होगी और आप लोग हैं कि?’
फेर सत्यकाम जी सबकर गिलास भरे लगलन. एगो थाली में चिकेन तंदूरी आ गइल.
– ‘चखल जाव, खास देसी मुर्गी ह.’ माहौल फेरु बदल गइल.
पाण्डेय जी ही कहलन – ‘खाली मुर्गिए बा ना अउरो कुछ सत्यकाम जी?’
– ‘आज त नइखे. लेकिन कहीं सब त जोगाड़ कइल जाव. आज काल त गांव के सब लडक़ी मैट्रिक पास होत-होत बेचैन हो जा तारी स.’
– ‘ना-ना भाई. ई लडक़ी वडक़ी के चक्कर एकदम ना. हां, कवनो बियहल-उहवल होखे त सोचल जा सकेला.’
– ‘एगो त आप के पासे बा.’
– ‘माने?’
– ‘काहे हमरा से मुंह से कहवावे चाहत हईं. रउरा जइसे मालूम नइखे.’
विनोद जी भौंह मुचकवलन – ‘ना ना सच कह तानी.’
सत्यकाम जी ना रोक पवलन – ‘उहे, अंग्रेजी वाला बोस के जनानी. ससुर खुद त पचास के बा. ऊ बिया छोकड़ी. कवनो बचकचो नइखे. छटपट करऽतिया.’
– ‘अच्छा. त चक्कर चलल कि ना?’
– ‘बस चलावहीं के सोचत हईं. आप सबके थोड़ा मदद चाहीं.’
डॉ.ठाकुर ना रोक पवलन – ‘ कइसन मदद?’
– ‘ओइसन कुछ ना सर. हम एगो रवीन्द्र जयंती के प्रोग्राम आर्गनाइज कर तानी. आप खाली उनके चीफ गेस्ट बनावे के ब्यवस्था कर दीं. बंगाली के बश में लेवे खातिर रवीन्द्रनाथ से बड़हन तोप कवनो नइखे.’
डॉ.ठाकुर कहलन – ‘बस आप समझिए कल काम हो गया.’
सत्यकाम जी कहलन – ‘देखीं लोग. अपना राज्य में सब कुछ बा. टैलेंट, मेहनत लेकिन कल्चर में हमनी बड़ा पीछे बानी. एकरे कारण आज बंगाली हमनी के हेय समझत बाडऩ. हमार इच्छा बा कि आप सबके मदद से हम एगो छोट संस्था शुरू करीं. जवना के बैनर में कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम कइल जाव.’
विनोद जी बड़ी देर से चुप रहस. कहलन – ‘त मिसेस बोस से शुरू होखे ऊ महोत्सव.’

रात में जुगेसर का लागत रहे जइसे खाट से ऊ हवा में उठ जा तारन. फेर लागल हवा में पवरे लगलन. दूर से एगो बदली दीखल. जइसे-जइसे ऊ नजदीक आवे लागल ओकरा से एगो आकृति बने लागल. खुलल केश, उठल वक्ष, कमर के नीचे चौड़ा नितम्ब. पास अइला पर दूनो खड़ा हो गइल. ओकर बांह इनका कंधा पर. एक दूसरे से लिपट गइल दूनो आकृति. नीचे शून्य. हवा में झूले लागल दूनो शरीर. अपना सीना पर दबाव महसूस कइलन जुगेसर. फिर दबाव नीचे की ओर उतरे लागल. पूजा के मुखाकृति बुझात रहे.

हठात् नींन टूट गइल. कुछ देर लागल ई महसूस करे में कि ऊ बिछावन पर बाडऩ. बड़ा जोर लघुशंका महसूस भइल. ऊ भाग के बाथरूम में घुसलन.

दोसरे दिन एगो बड़ा सा चिट्ठी मिलल जुगेसर का. खोलला पर उनकर आंख फइलल रह गइल.
‘आदरणीय
सादर प्रणाम!

आप त हमरा के भूलिए गइनी. एक बार त विश्वास डगमगा गइल रल. खुद के दोष दीहल छोडक़े का कर सकत रनी ह. आप के गइला के बाद समय से हमार ना भइल. हमार हालत हमहीं समझ सकत रनी ह. केहू से कुछ कहियो ना सकत रहीं. गंगा नहाए गइल रहनी मां के साथे. गंगा जी पाट देखनी. हाथ जोर के मन ही मन प्रार्थना कइनी – मां तहरे शेष आशा बा. यदि हमार पाप अतने अक्षम्य बा त हमरा के बुला ल. लागल केहू कह ता – ना पूजा, तू कवनो पाप नइखे कइले. हिम्मत रख. सोचनी – ठीक बा, एक महीना देख ले तानी. एक महीना ना लागल. रात में सपना दीखल. एगो साधू बाबा हमरा के इशारा कई के बुलावत बाडऩ. डरत-डरत नजदीक जात बानी. बाबा जी हाथ उठाके आशीर्वाद देत बाडऩ. कुछ कहतो बाडऩ. हमार नींद खुल गइल. सारा शरीर से पसीना छूट गइल रहे. नीचे भीजल-भीजल अस बुझाइल. एक बेर फेर से आंख मूंद के लेट गइनी.

हमार का होइत इ त हम ठीक करिए लेले रनी लेकिन आप के चरित्र पर कलंक लागी त एकरे चिन्ता हमरा के खइले जात रहे. दोष त हमरे रहे. हम संभाल ना पवनी अपना के. आप जइसन देवता के अपवित्र कर देहनीं. एक दिन पापा-मम्मी के बात करत सुननी. दीदी के पइसा के मांग आइल रहे. पापा नाराज रहस. कहत रहस – इ लडक़ी हमनी के कहीं के ना छोड़ी. चाल-ढाल सब साहेबी हो गइल बा. भूला गइल बा कि कवना घर के हईं. मम्मी कहलस – हम त शुरूए से कह तानी. ओकर ढंग ठीक नइखे बुझात. एक दिन बात-बात में पूछले रहीं – युगेश्वर त प्रोफेसर हो गइले. कहे त शादी ब्याह खातिर एक बेर पूछल जाव. अइसन मुंह बनाके. कहलस – ऊ गोबर गणेश से हम बियाह करब. बस मम्मी, बस.

पापा कहलन – मन में त हमरो बा. युगेश्वर जइसन सुयोग लडिक़ा आज का दिन में मिलल कठिन बा. देखीह बहुत ऊपर जाई ऊ.
मम्मी जवन कहली ओके सुन के हमार त मन आकाश में उड़े लागल. ऊ कहली – आरे अर्चना के छोड़ीं. हमरा त लागऽता, यदि आप पूजा के बात चलाईं त ऊ राजी हो जइहन.
पापा – पूजा के बीएससी के परीक्षा एही साल बा. हम ओकरे बाद बात चलाइब.
मम्मी – तब तक उनकर कहीं आउर जगह शादी तय हो जाई तब?
ई खबर देबे खातिर हम पागल भइल रनी ह. अब ई नाव के पतवार पकड़े ला तइयार हो जाईं.
अपना स्वास्थ्य के ध्यान रखब. चिट्ठी के जवाब मत लिखब. न जाने केकरा हाथ में पड़ जाई. हमरा कुछ नींक नइखे लागत.’

चिट्ठी पढ़ के जल्दी से पाकेट में छुपा लिहलन. अबहीं एगो क्लास रहे. छोड़लो संभव नइखे. ऑनर्स के क्लास रहे. क्लास में ‘बेंजीन’ पढ़ावे के रहे. एक बार शुरू हो गइल त विषय में डूब गइले. बेंजीन रिंग के बिशेषता बतावे में मगन हो गइलन ऊ. बेंजीन मोलेकुल के सिंगल का डबल का वैलेंड बांड बदलत रहेला जवना से नाइट्रेट, आक्सीजन आ हाइड्रोजन का साथ कार्बन के बांडिंग सहजता से होला आ अलग-अलग प्रभावो होला. सबसे मजेदार बात बा कि बेंजीन अणु में दवा के भंडार तैयार करेके क्षमता बा. बेंजीन के इंपीरिकल फार्मूला ह सी6एच6. एकरा रिंग बनावट के कहल जाला पोलीअन सेचुरेटेड बांडिंग. बेंजीन के साधारण उत्पाद ह फेनॉल, टाउलीन आ एनीलीन. नेप्थलीन आ एंट्रासीलीन एकर एरोमेटिक हाईड्रोजनकार्बन ह. एकर सीएच आयन के नाइट्रोजन से हटा के पायराडीन बनेला. जदि दूगो सीएच हटावल जाव त पायरीडाजीन, पायरीमीडीन आ पयराजीन जइसन उपयोगी रसायन बन सकता.

जुगेसर क्लास पूरा कर के डेरा अइलन. दरवाजा खोल के पाकेट से चिट्ठी निकललन. कपड़ा पहिनले बिछावन पर लेट के पढ़े लगलन. एक-एक शब्द. पहिले त जइसे बिच्छी काट गइल. लेकिन धीरे-धीरे आंख मुंदा गइल. लागल कि पूजा सर पर हाथ फेर रहल बाड़ी.

अतवार के दस बजे चार लोग उनके पास पहुंचल. परिचय दीहल – ‘सब छपरा से आइल बा. स्वजातीय. इंदौर में आपन कारोबार बा. भगवान क कृपा से सब कुछ बा. एके गो लडक़ी बा. इंटर पास कइले बा, अंग्रेजी मीडियम से. सुंदर बा.’ कहके सज्जन एगो लिफाफा निकाल के जुगेसर के सामने रखलन – ‘आप फोटो रखल जाव. यदि पसंद आवे भा कवनो बात करे के होए त हमरा घर के ई फोन नम्बर बा रिंग कर दीहल जाई.’

बहुते सलीका से बातचीत करत रहलन ऊ आदमी. ऊ सज्जन फेर कहलन – ‘देखल जाव कइसन संयोग बा. रऊरा गांव के मास्टर साहब हमरा मामा के तरफ से सम्बंध में बाडऩ. बाकी आपके कवनो इच्छा होय त खुल के कहल जाव. हम अपना लडक़ी खातिर सब कुछ करे खातिर तइयार बानी.’
जुगेसर खाली इहे कह के बिदा कइलन कि समय पर सूचित करब. अबहीं का बताईं.
उन कर इ बात ऊ सज्जन के सारा सलीका हटा दीहल. ऊ बिफर पड़लन – ‘ए बाबू कब होई तहार समय? इस मत सोचीह कि देस में तू हीं प्रोफेसर भइल बाड़. आपन खानदानो ध्यान में राख के निर्णय लीह. ना त सारा जिन्दगी पछतइब.’

बड़ा देर तक सोचत रहलन. एह बार बाबूजी पर क्रोध त आइल बाकिर फिर शांत हो गइलन. एने अबही नौकरीओ के डगमग अवस्था बा. दरभंगा विश्वविद्यालय के नोटिफिकेशन आ गइल बा. इन कर कालेज ओही में जाई. हो सकऽता अंगीभूत कालेज के दर्जा पा जाव. लेकिन संग में एगो आउर चर्चा सुनाता. लेक्चचर के नियुक्ति यूजीसी के माध्यम से होखे के बात चलता. पीएच.डी. कइल जरूरी लागऽता. अइसे त समस्तीपुर कालेज में केमिस्ट्री के लाइब्रेरी अच्छा बा, समयो बा जुगेसर का हाथ में, लेकिन गाइड कहां से मिली. निश्चय कइलन एक बेर पटना जा के चटर्जी सर से बात करे ला.

समय के आपन गति होला. केहू के अच्छा बुरा के खयाल करके ऊ ना चले. अबोध आदमी अपना समझ से ठीके समय पर गाड़ी में सवार होला. सफल भइला पर अपना पौरुष के बात करेला आ असफलता के कारन समय के बतावेला. त एह बार जुगेसर के समय अच्छा रहे. चटर्जी सर बड़ा प्रसन्न रहस. गर्मजोशी से मिललन. कहलन – ‘यस माई ब्वाय, हाऊ आर यू?’
– ‘फाइन, थैंक्यू सर.’
लेकिन आपन बात गला तक आइल; मुंह में ना. चटर्जी के अनुभवी आंख ताड़ गइल. कहलन – ‘यू नो, जब स्वामी विवेकानंद शिकागो में भाषण देने खड़ा हुआ तो अइसा ही उसका आवाज रुक गया था. फिर जानते हो क्या किया स्वामी जी?’
जुगेसर के चुप देख ऊ बोले लगलन – ‘अपना गुरु रामकृष्ण देव को सरन (स्मरण) किया. फिर तो लगातार शुरू हुआ उसका भाषण. सारा दुनिया जानता है विवेकानंद को.’
– ‘सर, आप ही तो हैं मेरे रामकृष्ण देव जी.’ जुगेसर के जुबान पर ई लाइन आइल समय के ही प्रभाव रहे. आ इहे लाइन उनकर पीएच.डी. के रास्ता खोल दिहलस.

बंगाली टोला में एगो खाली मैदान रहे. जानवर आ लडिक़ा खेलऽ स. कबही समस्तीपुर नगरपालिका ओकरा कोना में एगो सार्वजनिक लाइब्रेरी बनवले रहे. आज का दिन में पुस्तकालय त ना रहे, हां, एगो आकृति जरूर रहे जवना का पास से गुजरला पर दम बंद हो जाव.
कइक दिन से ऊ मैदान में चहल-पहल होखे लागल. चारों ओर रस्सी के पांचिल बन गइल. बाहर से जानवर आदि के ढुकल रुक गइल. एगो बड़हन शामियाना लागे लागल. बुझाते ना रहे इहां कवनो दिन मैदान रहे. हां एगो कोना में सुलभ शौचालयो बने लागल.
मार्च के मनोरम समय रहे. समस्तीपुर नगरपालिका मैदान में रवीन्द्र महोत्सव के खबर अखबार में निकलल. शिक्षा मंत्री उद्घाटन करे आवे के रहलन. सर्किट हाउस में शिक्षा मंत्री शहर के शिक्षक समुदाय का साथ भेंट मुलाकात करत रहस. उनका पास सत्यकाम जी के देख के लागत रहे मंत्रीए जी उनकर मातहत होखस.
विनोद पांडेय का साथ जुगेसरो पहुंचलन. विनोद जी के देखा-देखी जुगेसरो मंत्री जी के गोड़ छुवलन. मंत्री जी कहलन – ‘बइठल जाव विनोद जी. का खबर बा.’
विनोद जी कहलन – ‘आप सब के आशीर्वाद बा.’
– ‘कइसन चलऽता राउर पीएच.डी. वाला काम?’
– ‘समस्तीपुर में रह के थोड़ मुश्किल त बा लेकिन हमार थिसिस करीब-करीब तइयार बा.’
– ‘त भेजीं ओकरा पास. रउरे पीएच.डी. खातिर रसायन विज्ञान अबहीं दरभंगा में रोकल बा. कम से कम प्रकाशित हो जाई त पीछे कवनो समस्या खड़ा ना होई.’
– ‘हम एही महीना में भेज देब.’
– ‘अरे जल्दी करीं. आ ई के ह?’ जुगेसर का ओर इशारा कइलन मंत्री जी.
– ‘इहां का प्रोफेसर युगेश्वर प्रसाद. एही साल हमनी का विभाग में ज्वाइन कइले हईं.’
– ‘अरे, हं-हं. पिछला साल पटना विश्वविद्यालय के फर्स्ट ब्वाय. सुन्दर, अति सुन्दर. त विनोद जी, इनकर थोड़ा मदद लीं आपन काम में. का योगेश्वर बाबू, कवनो असुविधा नइखे न!’
– ‘सर, इ त आपके महानता बा. विनोद जी सब तरह से हमार सीनियर बानीं आ हमार अभिभावको. उहां खातिर कुछ कइल त हमार भाग्य बा.’
– ‘वाह! वाह! विज्ञान के विद्यार्थी का मुंह से अइसन साहित्यिक बात सुन के मन प्रसन्न हो गइल. ठीक बा, तहरा सभे सभा स्थल पर आव.’
दूनो जाना फेर से पैर छू के निकले लागल लोग.
गेट का पास जुगेसर जी त टकरात-टकरात बचलन. तांत का साड़ी में सजल एगो औरत घुसत रहे. विनोद जी बतवलन इहे मिसेज बोस हईं. नाम ह सुनयना बोस. जुगेसर का मुंह से निकल पड़ल – ‘बिल्कुल सुनयने बाड़ी.’
विनोद जी के चेहरा पर कुटिल मुस्कान फैल गइल. कहलन – ‘सुनयने ना, बहुत कुछ बाड़ी. सत्यकाम जी का नजर पर अइसन थोड़े चढ़ल बाड़ी.’
बाहर कइक लोग के गार्ड समझावत रहे मंत्री जी आराम करऽतानी. कार्यक्रमें में मुलाकात हो सकेला. सत्यकाम जी बाहर आके मुलाकाती जगह में बइठ गइलन. अकेले रहस. आंख मुंदले रहस आदतन. अन्दर कमरा से आवे वाला आवाज कबो-कबो तेज हो जाव आ कबो-कबो रोगइला जइसन हो जाव. सत्यकाम जी का चेहरा पर कवनो परिवर्तन ना लखात रहे. करीब घंटा भर बाद स्नान घर से पानी गिरे के आवाज आवे लागल. ऊ आंख खोलके घड़ी देखलन. एक घंटा हो गइल रहे. अबहीं जिला मजिस्ट्रेट के आवे के समय हो गइल रहे. खड़ा भइलन. कमरा के दरवाजा पर हल्का दस्तक दिहलन. आवाज आइल – ‘के?’
सत्यकाम जी कहलन – ‘जल्दी मालिक, डी.एम. पहुंचे वाला बा.’
फेर गेट पर केहू ना रहे. गार्ड खैनी मलत रहे. ओकरा के डांट लगवलन – ‘कब अकिल होई तहरा सब का? मंत्री जी अन्दर बाडऩ. अबहीं डी.एम. साहेब आवत बाडऩ आ तू आराम से बइठल बाड़.’
गार्ड फटाफट खड़ा हो गइल. टोपी ठीक करे लागल. सत्यकाम जी बार-बार घड़ी देखे लगलन.
करीब 10 मिनट लागल डी.एम. का आवे में. गाड़ी के घुसे के जगह देके अन्दर खड़ा भइलन. डी.एम. के प्रणाम कइलन. डी.एम. पुछलन – ‘मंत्री जी का करत बानी?’
सत्यकाम जी – ‘आराम करत रनी हं. हमहूं इन्तजारे कर तानी.’
– ‘आप के भी इन्तजार करे के पड़ऽता?’
– ‘मंत्री महोदय समये इहे देले रनी हं. हमहूं पांच मिनट पहिले पहुंचनी हं. चलल जाव.’
डी.एम. का चेहरा पर तनाव साफ झलकत रहे. तनाव त सत्यकामो जी का रहे बाकिर चेहरा पर कवनो भाव ना रहे. हॉल में आइल सभे. आमने-सामने सोफा पर मंत्री जी आ सुनयना बइठल रहे लोग.
डी.एम. का साथ सत्यकामो जी मंत्री जी के प्रणाम कइलन. डी.एम. के ओर देख के मंत्री जी सत्यकाम जी से पुछलन – ‘सत्यकाम जी, देखीं रउरा में दस मिनट देर हो गइल बा. सुनयना जी ठीक समय से आ गइनी हं.’
– ‘माफ कइल जाव, सर. हम आवे का समय एक चक्कर सभास्थल पर लगवले अइनी हं.’
– ‘ठीक बा. अब काम के बात कइल जाव. सुनयना जी बतावल जाव अपना प्रोजेक्ट का बारे में.’
साड़ी के पल्लू संभाल के सुनयना कहे लगली – ‘सर, हमार शिक्षा-दीक्षा शान्ति निकेतन में भइल बा. आप सब त विश्व कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर के जानते होखब. एह विश्वविद्यालय के स्थापना उहें का कइले रहीं. हमरा संगीत आ नृत्य दूनो में मास्टर डिग्री बा. सत्यकाम जी का अनुरोध पर हम समस्तीपुर में एगो सांस्कृतिक केन्द्र शुरू करे के चाह तानी. एकरा माध्यम से हम एह शहर में एगो सांस्कृतिक क्रांति लावे के चाहतानी. हमरा ई सोच के केतना आनन्द होता कि अइसन काम के शुरूआत मंत्री जे हाथ से होता.’
मंत्री जी बड़ा देर ले चुप रहस, कहे लगलन – ‘हमार आशीर्वाद सब समय अइसन सुकाम पर बा. सुनयना जी जइसन महान कलाकार से मिल के हमरा विश्वास हो गइल बा कि बिहार सांस्कृतिक क्षितिजो पर आपन जगहा खूब जल्दी हासिल कर ली.’
डी.एम. के मन बड़ा देर से कुलबुलात रहे. उनका समझे के बाकी ना रहे कि इ सब भूमिका बा. असली मुद्दा ना. तबहीं मंत्री जी कहे लगलन – ‘हां, डी.एम. साहेब. रउरा का कर सकऽतानीं एह विषय पर.’
– ‘हम त सर, अपने के हुकुम के इन्तजार कर तानी.’
एतना दिन से नौकरी कर के डी.एम. अच्छी तरह से जानत रहस का कहे के चाहीं.
– ‘त सुनल जाव. ई जवन मैदान बा बंगाली टोला में न, शहर में गंदगी फइलावल छोड़ के एकर दोसर कवनो उपयोग नइखे. इहां एगो सांस्कृतिक भवन के निरमान आराम से हो सकऽता. सुनयना जी जइसन सुसंस्कृत व्यक्तित्व बा ए शहर में. उनकर सदुपयोग कइले बुद्धिमत्ता बा.’ एकबारगी चुप हो गइलन मंत्री जी.
अब डी.एम.के उत्तर देबे के समय रहे. कहलन – ‘सर, फंड के समस्या.’
– ‘हम आप के इहे प्रश्न के आशा कइले रनी हं. एकरा के हम पहिलहीं सोच लेले बानी. एक एकड़ काफी बा केन्द्र खातिर. यदि एक एकड़ सरकार लीज दे देव ए शर्त पर कि केन्द्र के भविष्य में रखरखाव उ व्यक्ति या कम्पनी करी त फंड के बहुत बड़ा समस्या मिट जाई. बाकी भवन निर्माण सरकारे क तरफ से सकेला. हमरा मंत्रालय के हाथ में अबहीं करीब 10-15 लाख रुपया एह मद में बा.’

डी.एम. का समझ में आवे लागल रहे असली खेला कहां बा. पढ़े के बेरा भारतीय संविधान में सरकार के कल्याणकारी स्वरूप के बारे में बहुत अच्छा अध्ययन रहे उनकर. शंका समाधान के रोक ना पवलन – ‘सर, एगो समस्या आई. मैदान भले गंदा होखे, शहर में इहे त जगह बा लडिक़न का खेले कूदे वास्ते. फेर एकरा के लेके राजनीतिओ हो सकऽता.’
मंत्री जी बिफर गइलन – ‘राजनीति में त आपन माथा मत लगावल जाव डी.एम. साहेब. सरकारी खर्चा पर मजा लूट-लूट के दिमागो मोटा हो गइल बा राउर. कतना जमीन बा मैदान के पता बा. त सुनल जाव – उहां करीब 7 एकड़ जमीन बा. एक एकड़ केन्द्र के आ एक एकड़ लीज देला के बाद कतना बांची? कुल पांच एकड़. पांच एकड़ के नगरपालिका शिशु उद्यान बना सकऽता. सुलभ शौचालय त बनिए चुकल बा.’
डी.एम. का अब पता चलल कार्यक्रम का पहिले सुलभ शौचालय बनावे खातिर मंत्री जी का दफ्तर से दबाव डालल गइल रहे. सुनयना आश्चर्य में रहस कि कइसे एगो आदमी डी.एम. जइसन उच्च पदस्थ अधिकारी के डांट सकऽता. उहे आदमी के घंटा भर पहिले के आचरण उनकर विस्मय आउर बढ़ावत रहे.
सत्यकाम जी बिल्कुल चुप रहस. डी.एम. के चुप देख के मंत्री जी कहत-कहत खड़ा हो गइलन – ‘आ देखल जाव. हमरा ठीक सात दिन बाद पटना में ई प्रोजेक्ट के पूरा रिपोर्ट चाहीं. आपके सत्यकाम जी मदद करब. हम आज रात के ही मुख्यमंत्री जी के बता देहब. आपन रिपोर्ट सुनयना जी के हाथ से भेजवा देहल जाई. हां, सुनयना जी के एगो गाड़ी के व्यवस्था कर देहल जाई.’
ऊ सुनयना जी का ओर देख के कहलन – ‘त चलल जाव प्रोग्राम में.’

प्रोफेसर चटर्जी से मिले पटना आइल रहस जुगेसर. मन में तरह-तरह के विचार उठत रहे, जइसे परीक्षा देबे के समय होला. अपना काम के छोट अवधि में ऊ आउर कन्फ्यूज हो गइल रहस. पीएच.डी.खातिर बात कइल ही मुख्य उद्देश्य रहे. एक बार दरवाजा ठेल के मुंह दिखवलन. प्रो.चटर्जी उनके के देख के कहलन – ‘जस्ट फाइव मिनट.’
ऊ बहरा टहले लगलन. तबहीं ओने से बैकुण्ठ जी दीख गइलन. जहां बाघ के डर होला ओही जे सांझ होला. अबकी बार ऊ सोचले रहस उनका इहां ना जाएके. मन में चोर जे समाइल रहे लेकिन सामने पड़ गइला पर का करस. पैर छुअलन.
– ‘खुश रहीं युगेश्वर जी. कब अइनी हं?’
– ‘अबही पहुंचिए रहल बानी.’
– ‘त शाम में ठहरब न?’
– ‘ना, आज ठहरे के त कवनो विचार नइखे. खाली प्रोफेसर साहेब से मिले आइल बानी.’
– ‘अइसे कइसे होई.’
– ‘नाहीं. हमरा जल्दिए आवे के बा. तब हो सकेला दू तीन दिन रुकहूं के पड़े.’
तभी अन्दर वाला आदमी बाहर आइल. जुगेसर की ओर देख के बोललस – ‘जाइल जाव, बोलवनी हं.’
बैकुण्ठ जी कहलन – ‘एक बार विभाग की ओर जरूर आइब.’
– ‘ठीक बा.’ कह के जुगेसर अन्दर ढुकलन.
प्रो.चटर्जी खड़ा होके हाथ बढ़वलन. ओकरा पहिलहीं जुगेसर पैर छुए खातिर आगे झुक गइल रहस.
– ‘सिट डाउन प्लीज.’ कह के प्रोफेसर टेबुल से चुरुट निकलन. लाइटर से जला के एगो टान दिहलन. धुआं निकालत कहे लगलन – ‘यस, युगेश्वर. बोलो कैसा लग रहा है एसाइनमेंट.’
– ‘गुड, फाइन सर. लेकिन ओइसन छोट जगह में रिसर्च के ज्यादा कुछ स्कोप नइखे.’
– ‘लुक यंग मैन. आई अप्रीशिएट योर कंसर्न, बट रिसर्च को तुम रियलिटी से मत जोड़ो. एट लिस्ट तुम्हारा इस स्टेज पर एक पीएच.डी. का डिग्री का जोरूरत है. फिर यू विल बी हैविंग रीयल ओपनिंग. मोस्ट आफ दि इंडियन यूनिवर्सिटीज आर सिम्पली एटेंडिंग पीएच.डी. फार बोगस सब्जेक्ट. दीज आर आलरेडी वर्क्ड इन डेवलप्ड कंट्रीज. यू नो इवन इन चाइना ए लाट आफ रिसर्च इज गोइंग आन इन आर्गेनिक केमिस्ट्री.’
प्रोफेसर चटर्जी के थोड़ा रुकत देख जुगेसर थोड़ा साहस कइले – ‘तबहीं त सर, हमार दिली इच्छा बा आप हमरा के गाइड करीं.’
– ‘नहीं. वह पॉसिबल नहीं है. मैं तुम्हारे बिहार यूनिवर्सिटी वाले को एक लेटर लिख देता हूं. एक नहीं मैं तुमको दो सब्जेक्ट का जिस्ट दे रहा हूं. तुम किसी एक पर सिनाप्सिस लिख कर उसका पास जावो. वह तुमको इनरोल कर लेगा. तुम रीयल रिसर्च का चक्कर में नहीं पड़ो. अभी लाइब्रेरी यूज करो. जितना हो सके अपना कॉलेज में इस जर्नल को लाने का बंदोबस्त करो.’

टेबुल पर पड़ल एक पत्रिका के जगेसर के हाथ में देके प्रोफेसर घंटी बजवलन. चपरासी से स्टेनो के बुलावे खातिर कह के टेबुल के दराज से एगो फाइल कवर निकललन. ओके खोल के कुछ छपल कागज निकललन. फिर फाइल कवर बंद करके ड्रावर में रख दिहलन.
कागज पर नजर डाल के फिर शुरू हो गइलन – ‘देखो. एक सब्जेक्ट है इनआर्गनिक इंश्योरेंस लाइक मैगनेसियम एलिमिनेट और मैगनेसियम आक्साइड को 1, 2 डिक्लोरोएथिन से रिएक्ट कराने का. इसमें बेंजीन रिंग को नाइट्रोजन से रिप्लेस करा के सी2 एच8 एन2 लाया जा सकता है. फिर दो एमाइन्स वाले केमिकल को लाने के केमिस्ट्री को फार्मुलेट करने का उपाय ढूंढना है. दो एमाइन्स वाले केमिकल जल्दी से दो हेट्रोसाइकिल तैयार कर सकते हैं.
कएक गो पन्ना जुगेसर के दिहलन प्रोफेसर. सर उठा के देखलन स्टेनो आ गइल बा. ओकरा के ‘बोसो’ कह के फिर बुझल चुरुट धरावे लगलन. चुरुट के कश लेके बोले लगलन –

‘माई डीयर,
आय एम सेंडिंग दिस यंग ब्वाय टू यू. यू नो आय हार्डली रेकोमेंड एनी वन. बट वुड नॉट रिस्ट्रेन मायसेल्फ फ्रॉम डूइंग सम फेवर टू डीजविर्ग चैप लाइक हिम. ही विल समिट यू द सिनॉप्सिस ह्विच अप हैव गॉन थ्रू. यू विल नॉट बी इम्ब्रास्ड आय विलीव.
विथ रिगार्ड्स
योर्स
एटा आमार पैडे करे खामे करे आनबे.’
स्टेनो बोला – ‘एखुनी दादा?’
– ‘तबे?’ बड़ा खिन्न होके प्रोफेसर बोललन – ‘जाव, करे आनो.’
कुछ सेकेंड लागल. ध्यान फेर पुराना जगह पर आवे में. बाकी कागज पर ध्यान देके प्रोफेसर चटर्जी फिर शुरू कइलन – ‘दूसरा सब्जेक्ट भी हेटेरोसाइकल्स की केमिस्ट्री पर है. इट इज अबाउट साइक्लिजेशन आफ एन-….’ लागल इहां तक आवत-आवत प्रोफेसर थाक गइलन.
जुगेसर आपन ज्ञान व्यक्त करे खातिर बेचैनी महसूस करत रहस. सहमल-सहमल कहे लगलन-‘सर, 1, 2, 3, 4-थायडीआजॉल-2 सल्फोनामाइड, 5-(फेनीसल्फोनाइल) अमीनो के सिंथसीज के बारे में एगो लेख हमरा नजर पर पड़ल रल.’
प्रोफेसर के आंख फैल गइल. ऊ कहलन – ‘तूमि पारबे. तुमि पारबे. यू केन डू दिस माय ब्वाय, लेकिन एक बात ध्यान रखो तुमको आभी डिग्री लेना है. रिसर्च नहीं. ए बूढ़ा बहुत ठोकर खाके ऐसा सलाह तुमको देता है.’
आपन बात खतम करके प्रोफेसर उहो कागज जुगेसर के सउँप दिहलन.
तब तक स्टेनओ चिट्ठी लेके आ गइल रहे. ऊ पढक़े दस्तखत कइलन. फिर ओकरा के लिफाफा में भर के जुगेसर के दिहलन. जुगेसर का लागल अब चले के चाहीं. उठलन. प्रोफेसरो खड़ा हो गइलन. जुगेसर उनकर पैर छुए में आपन के धन्य महसूस करे लगलन.
उहां से निकल के सीधा कैंटीन में गइलन. चाय पीए के बड़ी इच्छा होत रहे.

कैंटीन में समोसा आ चाय लेके बइठले. अबहीं समोसा खतम क के चाय शुरूए कइले रहस तबहीं सामने जे दिखल चाय के गरमाहट भुला गइलन. जल्दी से घूंट निगले का चक्कर में जीभ जर गइल. इ का? जेकर सामना करे का डर से ऊ पटना ना रुके के ठीक कइले हवन उहे सामने. कुछ बोले के चहलन लेकिन आवाज ना निकलल. अच्छे भइल साथ में बैकुण्ठो जी रहस. उहे कहलन – ‘घरे फोन कइनी हं. रउरा आइल बानी बतावे खातिर. पूजा कालेज जाए के तैयारी करत रल, कहलस ह आपसे मिलते निकल जाई. इहंवें चल आइल ह. इहां चटर्जी सर के चपरासी बतवलस ह आप इहां बानीं.’
तबले जुगेसर बहुत हद तक संभल गइल रहस. धीरे-धीरे कहे लगलन – ‘ना-ना अच्छा कइनी हं. देखीं ना हमार काम त हो गइल. अब हम निकलबे करब. कॉलेज अकाज कइल बड़ी खराब लागेला. आखिर त नौकरी ही बा.’
बैकुण्ठ जी – ‘ई त अच्छा बात ह. अपना काम के प्रति निष्ठा ही आदमी के आगे बढ़ावेला. हमनी के आप से एगो दोसरा तरह के सम्बंध राखीले. एही से थोड़ा खराब लागलो स्वाभाविक बा कि आ के बिना मिलले चल जात बानीं.’
– ‘ई कबहीं मत सोचब. हमरा आप सब के प्रति असीम श्रद्धा बा. कवनो गलत मत समझब. थोड़िको समय रहला पर हम जरूर आपके पास रुकतीं.
बात पर बात निकल जात रहे. दूनो जाना के तनिको खयाल ना रहे कि उहां एगो तीसरो बा. आखिर ऊब के पूजा कहली – ‘अच्छा पापा हम निकलऽतानी.’
बैकुण्ठ जी कुछ आउर कहे जात रहस लेकिन पूजा के बात से लागल कि ऊ फालतू समय नष्ट करऽतारन. कहलन – ‘अरे देखल जाव ना. पूजा आइल रल आपसे मिले आ हम अपने बक-बक में आपके अझुरवले रह गइनी’ फेर पूजा का ओर घूम के कहलन – ‘ना होखे त जुगेसर जी का साथ गांधी मैदान ले चल जा. ओहिजा से उहां का स्टैंड चल जाइब आ तू कॉलेज. रास्ते में पूछ लीह जवन पूछे के बा. तहार समयो बर्बाद ना होई आ इहों के रात ना होई समस्तीपुर जाए में.’

जुगेसर जी उनके प्रणाम कर के चले लगलन. पीछे-पीछे पूजा. गेट से निकल के पूजा पीठ पर हाथ रखली. ऊ त छनक गइलन. पूजा कहली – ‘का जी अबहिए से छुपावे लगनी. आगे का करब?’
– ‘ना अइसन नइखे. सच बताईं त हमरा साहस ना भइल त तहरा मम्मी पापा के सामने जाए के.’
– ‘ई समझिए के त हम आ पहुंचनी हं.’
– ‘थैंक्यू पूजा, थैंक्स.’
तबहीं एगो रिक्सा सामने खड़ा हो गइल. दूनो जने बैठ गइल लोग. रिक्सा वाला पुछलस – ‘केने?’ त जुगेसरे कहलन ‘गांधी मैदान.’ रिक्सा पर जब दूनो के बदन स्पर्श भइल. जवना बात से जुगेसर के कलेजा कांपत रहे उ जइसे कबो घटले ना रहे.
पूजा के व्यवहार से उनका एके बात बुझात रहे नारी मन के थाह लगावल असंभव बा. पूजा पुछलस – ‘कहां ले चलऽतानी?’
– ‘माने? तहरा कालेज नइखे जाए के का?’
जुगेसर पूजा का चेहरा का ओर नजर फिरवलन. ओकरे चेहरा के मुस्कान आ आंखन के चाहत में शायद जवाब मिल गइल उनका. ऊ रिक्सा वाला के पीठ थपथपा के कहलन – ‘भैया, फ्रेजर रोड चलो.’
अब चिहुंके के बारी पूजा के रहे – ‘हमके सिनेमा दिखावे के मन बा का?’
जुगेसर घड़ी देखलन दू बज गइल रहे. सिनेमा के टाइम त बा.
– ‘चलऽ तीन बजे वाला शो देखल जाव.’
– ‘आपके पहुंचे में देर होई.’
– ‘देर होई. लेकिन हम अपना पूजा खातिर एतना बलिदान त देइए सकऽतानी.’
– ‘बाह-बाह मेरे मजनूं.’ पूजा आपन हाथ उनका पीठ पर रख दिहली. कहली – ‘चिन्ता मत करीं. बलिदान देबे के मौका सामने बा. अबहीं त कुछ साहस इकट्ठा करीं पापा के सामना करे के.’
– ‘चलऽ अबहिए कह देत बानी.’
– ‘ओकरो समय अबहीं नइखे. समय पर हम बताइब.’
– ‘पक्का त.’ जुगेसर हाथ बढ़वलन. हाथ पर पूजा हाथ रख के जवाब दिहली. दूनो हाथ सटल रह गइल. आ बातचीत बंद हो गइल.
फ्रेजर रोड में एगो रेस्टोरेंट रहे ‘बॉबी’.
बॉबी फिल्म के सफलता से प्रेरणा लेके नाम दिहल रहे. अन्दर में जगहो रहल आ साथ में फेमिली केबिन बनल रहे. पैसा ज्यादा ल स. बनल त कॉलेज स्टूडेंट का क्रेज रहे उहां जाए के लेकिन ओह समय गर्लफ्रेंड त एतना सहज रहे ना. दोस्तन का साथ जाए में पाकेटो का ओर खयाल करे के पड़े. एक बार स्कालरशिप के बकाया मिलल रहे. चार गो क्लासफेलो का साथ जुगेसर गइल रहस. बाकिर त उनका पटना में कवनो जगह ना मालुम रहे जहां पूजा के ले जास.
गेट पर रिक्सा से उतरल लोग. यूनिर्फाम पहिरल दरबान अदब से गेट खोललस. अन्दर जात-जात बेयरा कहलस – ‘सर अंदर केबिन खाली है.’
उहे ले जाके एगो केबिन में बइठे के कहलस. दूनो जाना आमने-सामने बइठल लोग. आपन-आपन बैग पास के कुर्सी पर रख दीहल लोग. फिर बेयरा आइल मीनू लेके. जुगेसर पूजा का ओर बढ़ा के कहलन – ‘आर्डर द.’
पूजा कहली – ‘रउरा बताईं. हम त खा के आइल बानी.’
जुगेसर का बेयरा के उपस्थिति अच्छा ना लागत रहे. ऊ मेनू रख के ओकरे से पुछलन – ‘तू हीं बताव भाई का खिला सकऽतार?’
– ‘तंदूरी परौठा, चिकेन कसा, चिकेन तंदूरी, मटन कबाब, मटन कोर्मा..’
ओकरा के रोक के जुगेसर कहलन – ‘वेजीटेरियन बताव भैया.’
बेयरा ओही सुर में कहे लागल – ‘पनीर दो पियाजा, कड़ाही पनीर, पनीर कोर्मा, पनीर बटर मसाला, मटर पनीर, पालक पनीर, मिक्स्ड वेजिटेबुल…’
जुगेसर कहे जात रहल कि पूजा टोकलस – ‘रउरा एक ही बोलब. हम खा ना सकब.’
जुगेसर कहलन – ‘हां भाई! एक पनीर बटर मसाला, दो तंदूरी परौठा और एक मिक्स्ड वेजीटेबल.’
बेयरा कहलस – ‘आ मैडम के सर कुछ ड्रिंक वगैरह.’
– ‘अच्छा पहिले साहब के त लाव.’
बेयरा का चल गइला का बाद जुगेसर कहलन – ‘इ कइसे होई पूजा. हम अकेले खाइब. कुछ त बताव.’
– ‘हम रउरे में से ले लेब.’
– ‘पक्का त.’
– ‘हँ पक्का.’
– ‘त फेर हमरा पास आके बइठ.’
– ‘ना, इहां ना.’
– ‘इहां कोई थोड़े बा.’
– ‘ऊ बार-बार आव ता.’
तबहीं बेयरा फेर आ गइल. पुछलस – ‘खाना लागऽता. तब तक सर दो गो कोल्ड ड्रिंक दे जाईं?’
– ‘दे जा.’ जुगेसर के कहत भइल कि ऊ गइल आ तुरंत दू गो बोतल ले आइल. आमने-सामने ना रख के दूनो बोतल पूजा का सामनही रखलस. निकले का बेरा पर्दा बढिय़ां से खींच दिहलस.
पूजा आपन पर्स कुर्सी से उठा के टेबुल का किनारा पर रख के खुद ओह कुर्सी पर चल गइली. जुगेसर का दिमाग पर बोझ ना डाले के परल समझे में. उठके ओने बईठ गइलन कि पूजा कहली – ‘का भइल? बैठीं ना ओनिए.’
– ‘कइसे बैठीं जानू? तहरा के देख के बइठल जा सकेला का.’
दूनो कुर्सी के बीच कुछ ज्यादा दूरी ना रहे. पूजा बोतल के पाइप उनके मुंह से सटा दिहली आ खुद दूसरा पर रखली. एक घूंट पीके मुंह उठवली. तभी जुगेसर के बांह उनका के चारों ओर से जकड़ लिहलस. उनकर हाथ अपने आप ऊपर उठ गइल. जुगेसर के कंधा के चारों ओर फैल गइल. आज जुगेसर का सीना पर कुछ अधिके भार महसूस भइल. कोल्ड ड्रिंक से भीगल होठ एक दूसरा के गीलापन सोखे लागल लेकिन एही क्रम में ज्यादा गीला हो गइल. बाहर ट्रे के खटखटाहट से दूनो जाना कोल्ड ड्रिंक पीए लागल लोग हड़बड़ी में. लेकिन साइड बदले के समय ना मिलल आ जरूरीओ ना बुझाइल.
रेडियो पर आवाज आइल ‘अब सुनिए आरजू फिल्म में लता का गाया हुआ गाना जिसके लिए फरमाइश भेजी है रायबरेली से मो.शमीम, मो.इस्माइल, शोभा, धर्मेन्द्र झुमरी तलैया से कपिल केसरी, दिनेश केसरी, रामपुर से रमेश ओझा. गाना आवे लागल – बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है.’

चार बजे बस छूटल हार्डिंग पार्क से. बस के हाजीपुर पहुंचत-पहुंचत जुगेसर का पेट में एकबार मरोड़ महसूस भइल. घड़ी देखलन अबहीं करीब दो घंटा आउर लागी समस्तीपुर पहुंचे में. मुजफ्फरपुर पहुंचत-पहुंचत उनका आउर असुविधा बुझाए लागल. कंडक्टर से पुछहीं के पड़ल – ‘गाड़ी कहीं रुकी का?’
ऊ बड़ा ही रुखल जवाब दिहलस. मुजफ्फरपुर से समस्तीपुर का ओर मुड़ के अबहीं करीब 10 किलोमीटर गइल होई गाड़ी कि एगो आवाज भइल गाड़ी का नीचे से. ड्राइवर बस रोकलस. देखसुन के कहलस – ‘अबहीं आऊर 5 किलोमीटर गइला पर बदलल जाई.’
जुगेसर का सांस में सांस आइल. आखिर राम-राम करके ओजा पहुंचल बस. सब लोग का जइसे उतरल जरूरी रहे. बहुत देर से रोक के रखले रहे लोग. जुगेसर उतर के एने ओने देखे लगलन. होटल के एगो नौकर से पूछलन – ‘बाथरूम कहां बा?’
ऊ बाहर खेत दिखा दिहलस.
फेर पुछलन – ‘पानी?’
ऊ मुंह खोललस – ‘पहिला बार आए हैं का? ऊ का सब बोतल पड़ल है.’
जुगेसर पानी के हौज के पास से बीयर के एगो बोतल उठवलन. जल्दी-जल्दी होटल का पीछे गइलन. उनके बस के दूगो जनानी सवारी बइठल दिखल. अबहीं उनका शर्माए के समय ना रहे. ऊ ज्यादा दूर जाए वाला हालत में ना रहस. बैठ गइलन. सांस में सांस आइल. धीरे-धीरे सोचे के शक्ति जइसे वापस आवे लागल. अब तक ध्यानो ना रहे कि केतना बहुमूल्य सामान उनका बैग में बा. उनकर डेग जल्दी-जल्दी उठे लागल. पानी के हौज के पास साबुन के एगो गलल टुकड़ा रहे. ओसे हाथ धोके बस में बइठलन. बैग खोल के झट से देखलन. ना सब कुछ ठीक बा. संतोष के सांस फेंकलन.
समस्तीपुर पहुंच के बड़ा भूख लागल रहे लेकिन मन धिन-धिन कइले रहे. डेरा पहुंच के हाथ मुंह धोवलन. एक बार सोचलन जाके बाहर खा आवे के लेकिन हिम्मत ना भइल. फीता वाला स्टोव जला के खिचड़ी बइठा दिहलन. ओही में दू गो आलू डाल दिहलन.

बिछावन पर सगरी थकावटो नींद ना ले आ सकल. प्रोफेसर चटर्जी का साथ के बातचीत त मुहूर्ते में ओरा गइल लेकिन पूजा के साथ बितावल समय सेकेंडो का भाग में याद आवे लागल. ऊ रिक्सा प बइठल, पूजा के पीठ पर हाथ रखल, होटल में ऊ आलिंगन, छाती पर के दबाव शरीर पर अबहियों महसूस करे लगलन. हाथ से छुवे के कोशिश कइलन. धीरे-धीरे हाथ एने ओने जाए लागल.
नींद कब आइल उनका पता त दोसरा दिन लागल जब विनोद जी के आवाज पर उनका नींद खुलल.
विनोद जी सुबह में बहुते तरोताजा दीखत रहस. जुगेसर के चाय पीए खातिर अपना घर में बुलवलन. चाय पीयत-पीयत पटना के हाल चाल पर बातचीत होखे लागल. धीरे-धीरे दूनो जाना के बीच रिसर्च का विषय पर चर्चा केन्द्रित हो गइल. विनोद जी खुद बतवलन कि उनके रिसर्च के विषय आर्गेनिक केमिस्ट्री ही बा. ऊ अपना थिसिस का बारे में बतावे लगलन. कहलन – ‘युगेश्वर जी, का करीं. कांसंट्रेट नइखी कर पावत.’
– ‘काहे सर!’ आश्चर्य व्यक्त कइलन जुगेसर. – ‘माने ईश्वर के कृपा से सब कुछ त बा आप के पास.’
– ‘कुछ नइखे युगेश्वर जी, कुछ नइखे. जवन दीखऽता ऊहे हमरा जीवन के नरक बना दिहले बा. लेकिन छोड़ल जाव ऊ बात. हमरा राउर मदद के थोड़ा जरूरत बा.’
– ‘बतावल जाव सर. हमरा से जेतना संभव होई, कवनो कोताही ना करब.’
– ‘पहिले त ई सर वाला चक्कर छोड़ द. हमरा के भइया कहल आपुन बुझाला.’
– ‘सॉरी सर… भैया. फिर ई गलती ना होई. रउरा जइसन बड़ भाई पा के के धन्य ना होई. बताईं का करे के बा?’
– ‘हमार थिसिस तू एक बार देख, आ ओकरा के पूरा करे में हमरा के सहयोग करऽ.’
जुगेसर चुपचाप निहारत रह गइलन विनोद जी के ओर. थोड़ा देर रुक के विनोद जी कहलन – ‘देख भाई. कवनो जबर्दस्ती नइखे. यदि थोड़िको हिचकिचाहट महसूस होत होखे त बता दीह. हम तनिको बुरा ना मानब.’
– ‘ना बात ई नइखे भैया. हमरा पर रऊरा जवन दायित्व देबे के तैयार बानी ओकरा लायक हम अपना के नइखी समझत. अबहीं हमार ज्ञाने का बा जे रउरा लिखला पर लिखे के हिम्मत करब.’
– ‘देखऽ बात मत घुमावऽ. हम तोहार ज्ञान आ आपन कमजोरी बढिय़ा से जानत हईं. यदि तू चहबऽ त हमार पीएच.डी. हो जाई ना त सारा जिन्दगी एगो दारूबाज लेक्चरार होके हम रह जाइब.’
कहत-कहत विनोद जी के आंख डबडबा गइल. जुगेसर समय के नाजुक हालत भांप के चुप हो गइलन. कहलन – ‘कहां बा राउर फाइल. दीं हम कोशिश कर तानी.’
– ‘पहिले तू मुजफ्फरपुर जाके आपन नाम रजिस्ट्रर्ड करा आवऽ थिसिस तइयार करे खातिर. फेर हमार काम.’
– ‘जइसन अच्छा समझीं भैया.’
– ‘बस तू भैया कहल… एही से हमरा आत्मा के शांति मिल गइल.’

करीब एक सप्ताह लागल जुगेसर का अपना सब्जेक्ट के सिनाप्सिस बनावे में. एह काम में विनोदो जी भरपूर मदद कइलन. करीब 8 बजे स्टेशन अइलन जुगेसर मुजफ्फरपुर जाए खातिर. टिकट कटा के प्लेटफार्म पर आ गइलन. प्लेटफार्म पर चारों ओर लोग पर लोग रहे. हावड़ा से आवे वाली मिथिला एक्सप्रेस के सूचना भइल रहे.
ट्रेन अइले के देर रहे. आपन गठरी मोटरी लेके पैसेंजर जेने पावल ढूके लागल. सब्जी के टोकरी तक घुसावे लगले सब. कवनो उपाय ना देख के ऊ थ्री टीयर डब्बा में चढ़लन. ओह में बहुते लोग चढ़ गइल. गेटे से भीतर के तरफ जा के चुपचाप खड़ा हो गइलन जुगेसर. सामने सीट पर एगो बंगाली दम्पति रहे. अपना में घिसिर-पिटिर बतिआवत रहे सब. भाषा ना समझ में अइला के बावजूद ओकनी के बातचीत के विषय समझे में समय ना लागल. बीच-बीच में हिन्दुस्तानी, असभ्य जइसन शब्द उपयोग करत रहस दूनो. अगिला स्टेशन पर आउर जनता भर गइल. एगो बुर्जुग आदमी ऊ बंगाली दम्पति से कहलन – ‘थोड़ा बैठने दीजिए.’
औरत के मुंह से तपाक से निकलल – ‘कैनो? ए जनरल कमरा है क्या?’
– ‘आप लोग दो ही तो बैठे हैं, इसलिए कह रहा हूं.’
अब ऊ पुरुष शुरू भइलन – ‘हां, दू आदमी हैं तो क्या करोगे? खड़ा होके नहीं जाने सकता. एक तो रिजर्व बोगी में उठा है फिर बैठना मांगता है. बाप का राज पाया है.’
– ‘देखिए, जबान पर काबू रखिए. आपका सीट है, नहीं बैठने दीजिएगा कोई बात नहीं लेकिन गलत लब्ज इस्तेमाल नहीं कीजिए.’
– ‘क्या कर लोगे? बोलो.’ कहत-कहत ऊ बंगाली युवक खड़ा हो गइल. डब्बा में जेतना सारा लोग रहे सब चुप हो गइल. जुगेसर के खून खौले लागल. उनकर मुंह लाल हो गइल. आ ऊ जे बोले लगलन कबही सोचलहूं ना रहस. लगातार अंग्रेजी में ऊ युवके के अइसन सुनवलन कि ओकर सब अकड़ गायब हो गइल. बाकीओ लोग के साहस आ गइल. दू गो बिहारी पैसेंजर जे सामने रहे ऊ कहे लागल – ‘अरे बाप रे. ई दूनो से हमनी रात से परेशान बानी. पहिले त ई सारा रात गुटर-गुटर कइलऽ हं सब. आ सबेरही से बिहारी हिन्दुस्तानी कह-कह के गाली देत ह ऊ अपनिहे में. अब तक बाकीओ जनता सजग हो गइल.
बुझाइल ऊ दूनो मरद-मेहरारू के पिटाई-सिटाई हो जाई. आखिर में बूढ़ा सज्जन से माफी मंगवा के जुगेसर सबका के शांत कइलन.


(बाकी फेर अगिला कड़ी में)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

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