बतकुच्चन – ६४


सुने में आवऽता कि मानसून के बरखा केरल का किनार पर चहुँप गइल बा. अबकी क मानसून करीब सात दिन देरी से आइल बा. आ एह बीच आसमान से बरसत आग के धाह तनी मनी कम भइल बा. बादर बरसे भा ना छाइओ के छाँह कर देला. मानसून के देर से अइला पर मन इहे कहलसि कि “बजलऽ हो शंख बाकिर बाबा जी के पदा के”. सोचे लगनी कि शंख त केहु बजा सकेला आ बहुते लोग पूजा करत घरी बजइबो करेला त फेर बबे जी के नाम काहे लिहल गइल? का एह चलते कि शंख बजावे के काम अधिकतर बबेजी लोग करेला. शंख पूजो मे बाजेला आ पुरनका जमाना में लड़ाइओ में बाजत रहुवे. महाभारत के पाञ्चजन्य आजुओ बाजऽता. अलगा बाति बा कि ऊ शंख ध्वनि ना होके संघ ध्वनि रह गइल बा. संघ के मुखपत्र क नाम ह पाञ्चजन्य. आजादी का लड़ाई घरी कहल जात रहे कि जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो. अखबार के ताकत आजुओ बहुते बा काहे कि हमनी के सुभाव बन गइल बा कि छपल पर भरोसा बेसी होला, बकल पर कम. सोचत होखब सभे कि मानसून आ अखबार के एह भोजपुरी बतकुच्चन से का संबंध? मतलब बा आ पूरा बा. भोजपुरी क जतना आस अबकी का मानसून पर लागल बा ओतना आस शायदे कबो लागल रहे. अबकी ओकरा भरोसा बा कि सरकार संविधान का अठवीं अनुसूची में भोजपुरी क शामिल कर ली. राजनीति मे संख्या के महत्व बहुते होला आ भोजपुरियन के संख्या कवनो दल के राजनीतिक ताकत ला ललचावे लायक बा. “गाछे कटहर ओठे तेल” भा “पोखरा में मछरी नौ नौ कुटीआ बखरा” लागे लागल बा. बहुते लोग के बरीसन के मेहनत अब सफल होखे वाला बा आ बहुते लोग अब एकर मेवा खाए खातिर इंसुलिन के सूई लिहल शुरू कर दिहले बा. बाकिर एह पर केहू के धेयान नइखे जात कि भोजपुरी के मान्यता कवना भोजपुरी के मिली. आरा, छपरा, बलिया वाला के कि बनारस, गाजीपुर वाला के? भोजपुरी क मानक स्वरूप का होखे क चाहीं? सतरहवीं शताब्दी में अंगरेजीओ एही सवाल से जूझत रहुवे बाकिर छपाई क आविष्कार का बाद अंगेरजी में किताब, पत्र पत्रिका अखबार छपे लगली सँ आ तेजी से अंगरेजी के एगो मानक स्वरूप उभर आइल. हालांकि एकरा बावजूद आजुओ अमेरिकन अंगरेजी आ ब्रिटिश अंगरेजी के भेद मौजूद बा आ दुनु के एगो अलगे अलग मानक स्वरूप बन गइल बा. लिपि भोजपुरी क लगे कवनो आपन नइखे त अंगरेजीओ के लिपि उधारे वाला ह रोमन. ओही तरह नागरी लिपिओ देश के कई भाषा के लिपि बन चुकल बिया. भोजपुरी के मानक स्वरूप कुछ आसानी से बनल रहीत अगर भोजपुरी के कवनो आपन अखबार रहीत त. अखबार होखीत त ढेरे लोग ओह काम में लागल रहीत आ अखबार चाहे मनचाहे आपन शैली बनावे ला मजबूर हो जाइत. जवन भोजपुरी के मानक स्वरूप ले आवे में मदद करीत. पत्रिका त भोजपुरी में बहुते प्रकाशित होखेलीं सँ बाकिर कवनो पत्रिका के दायरा अतना बड़हन नइखे कि ऊ सगरी भोजपुरी इलाका में चहुंपत होखे, पूरा दुनिया के के कहो, एगो राज्यो के हर भोजपुरी इलाका में पसार वाली कवनो पत्रिका नइखे. भोजपुरी के कर्णधारन के एहू दिसाईं सोचे क चाहीं, आजु के बतकुच्चन एही ला रहल. सोचीं कि अगर कवनो भोजपुरी क अखबार रहीत त ओकरा में पिछला दिने कइसन हेडलाइन आइल रहीत, “अंटू का अंटा में आंटी का फंडा से अतना माल आइल कि अँटले अँटात ना रहे”. कइसन अलंकार रहीत एहमें? लोग भुला जाइत कि सकूल के सटुडेंट सटेसन के सटूल पर सटेंड हो के सपीच देत रहे.

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