भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” – 5

– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

अबले जवन पढ़नी ओकरा आगे …)


घर का फोन में एसटीडी रहे. पूजा नम्बर मिलावे लगली. दूनो बच्चा दूर पलंग पर बैठ के शून्य में निहारे लगले. विपत्ति महसूस करेके क्षमता बच्चन में बड़कन से अधिके होला. बहुते कोशिश के बादो अर्चना के फोन ना लागल. तब ऊ अभिषेक के फोन मिलावे लगली. दूसरे कोशिश में घंटी बाजे लागल उनका मोबाइल के. हलो के आवाज सुनके हड़बड़ाइ के बोलली – ‘हम पूजा हईं पटना से.’
ओने से आवाज आइल – ‘का हाल बा पूजा जी?’
– ‘हाल ठीक नइखे. प्रोफेसर साहेब अस्पताल में भर्ती बानी. समझ में नइखे आवत का करीं.’ एके सांस में पूजा कह भइली.
– ‘प्लीज, एहतरे घबड़ाईं मत. धीरज धरीं. बताईं त उहां के का भइल बा, आ कब से अस्पताल में बानी.’
– ‘समस्तीएपुर में पेट में दर्द होत रहे. हम उहां के लेके पटना आ गइनी. आवत-आवत रात हो गइल. सारा रात उहां का बेचैन रनी हं. आज अस्पताल ले गइनी हं. भाग्य से डॉ.तिवारी मिल गइले ह. ऊ अपना अन्डर में भर्ती कर लेले बाडऩ. हम घरे आ के फोन कर तानी.’
– ‘कवनो टेस्ट वगैरह भइल ह?’
– ‘टेस्ट त बहुत लिखले बाडऩ. खूनो निकाल ले गइल ह सब. यूएसजी करे कहत रले ह.’
– ‘पेटो फूलल बा.’ पुछलन अभिषेक.
– ‘हँ.’
अभिषेक के हूं सुनाइल. फिर कहलन – ‘ठीक बा. अब फोन रखीं. हम डॉ.तिवारी से बात कर तानी. रउरा कब जायब अस्पताल?’
– ‘सँझिया छह बजे.’
– ‘डॉक्टर साहेब से मिल के आएब.’ कह के लाइन काट दिहलन अभिषेक.
शाम के पूजा अस्पताल जाये खातिर तइयार भइली त बचवो तइयार हो गइलन स. फिर ठीक भइल कि माईओ चलिहन. अस्पताल पहुंच के देखल सब जुगेश्वर खाट पर बइठल बाडऩ. सोनी-मोनी के देख के उनका चेहरा पर मुस्कान आ गइल. हाथ बढ़वलन ओकनी का तरफ. दूनो चढ़ के बिछावन पर बइठ गइली स. सामने टूल पर मां बइठली. पूजा खड़े रहस. मां ही पुछली – ‘कइसन लागता?’
– ‘थोड़ा आराम बा. दूगो सुई दिहले ह.’
पूजा पुछली – ‘खून टेस्ट के रिपोर्ट आइल बा?’
– ‘अरे एतना जल्दी रिपोर्ट थोड़े आई. आज त खून निकलबे कइल ह सब. काल्ह सुबह बतावत रल खाली पेट यूएसजी होई. सारा रिपोर्ट अइले पर असली इलाज शुरू होई.’
पूजा सर पर हाथ रखली. कहली – ‘ना बुखार त नइखे बुझात.’
जुगेसर कहले – ‘बुखार खातिर कैलपोल देले रले ह.’ पूजा असली बात ज्यादा देर ना दबा पवली – ‘हम अभिषेक से बात कइनी ह.’
– ‘ओसब के डिस्टर्ब करे के का जरूरत रल. अरे हम ठीक बानी.’
मां बात कटली – ‘अरे बेटा, आप के त ठीक देखही के पड़ी. लेकिन उहो त डॉक्टर बा. कुछ अच्छे नु बताई.’
मां का बोलला से पूजा के हिम्मत मिलल. ऊ कहली – ‘डॉ.तिवारी त अभिषेके क चलते आपके जानत बाडऩ न. अभिषेक कहलन हं ऊ उनसे बात करिहन.’
तभी नर्स आके कहलस – ‘प्रसाद जी के फेमिली के कौन हैं? डॉ.तिवारी से मिल के जाइएगा.’
– ‘कहां है डॉ.साहब?’
– ‘साढ़े सात बजे आयेंगे.’ नर्स बताके आगे बढ़ गइल.
सात बजे का करीब में सोनी-मोनी के लेके मां चल गइली. पूजा अकेले रह गइली. जुगेसर के बइठल ना जात रहे. लेट गइले. पूजा उनका सर पर हाथ फिरावे लगली.
डॉ.तिवारी ठीक साढ़े सात बजे पहुंच गइलन. पूजा खड़ा होके प्रणाम कइली. जुगेसरो बइठे के कोशिश करे लगलन. लेकिन डॉक्टर उनके लेटल रहे के कहलन. पेट पर हाथ से दबा-दबा के देखलन. एक बार पुछलन – ‘कइसन महसूस होता?’
– ‘थोड़ा ठीक बा.’ जुगेसर कहलन.
– ‘काल्ह सुबह कुछ खाएब मत. एगो टेस्ट होई.’
पूजा के इशारा से बुला के डॉक्टर के कमरा के तरफ जाये लगलन.
कुर्सी पर बैठ के पूजा के सामने बैठे के इशारा कइलन. कहे लगलन – ‘डॉ.अभिषेक फोन कइले रले ह. देखीं प्रोफेसर साहेब के अवस्था का बारे में अभी कुछ कहल ना जा सकेला. काल्ह यूएसजी का बादे पता चली. यदि एसाइटिस फ्लूड मिली त फिर ओकर अलग से टेस्ट करावे के पड़ी. खैर घबड़ाए के कवनो बात नइखे. आजकल अइसन बहुत केस आ रहल बा.’
पूजा का कहस. बड़ा कोशिश कर के बोल पवली – ‘हम का समझतानी. आपे क हाथ में बा. जइसन अच्छा समझीं कइल जाव.’
– ‘हाथ में त केवल ऊपर वाला का बा. हमनी का त बस उनके इच्छा अनुसार आपन-आपन काम करतानी स.’
न जाने काहें पूजा के मन खराब हो गइल. ऊ उठ के हाथ जोड़ली आ बाहर जाये खातिर मुड़ली. जुगेसर का पास जाए के पहिले कइएक सेकेंड खड़ा हो के मन मजबूत कइली.

25 तारीख के क्रिसमस रहे लेकिन पूजा खातिर सब कुछ अस्पताल हो गइल रहे. डॉ.तिवारीओ रहस. टेक्नीशियन के कुछ बतवले. एगो शीशी में उनका पेट से निकलल पानी रख के टेस्ट खातिर भेज देहल गइल. अस्पताल का रास्ता में एगो दुकान पर केक बिकात रहे. लाइटो-साइट सजावल रहे. एगो केक खरीदली पूजा. शाम के मुलाकात का समय दूनो बेटे के लेके केक का साथ अस्पताल पहुंचली. जुगेसर बच्चन खातिर उठ के बइठले. दूनों एक साथ कहली स – ‘हैप्पी क्रिसमस पापा.’
– ‘सेम टू यू माई ब्वाय.’ जुगेसर जवाब देके दूनो के अपना दूनो बांह में पकडऩ. पूजा खड़ा होके मुस्कुरात रहली. फिर केक काटके एक दूसरा के मुंह में खिलावल. सभे जइसे भुला गइल कि अस्पताल में बा लोग. ऊ त नर्स आके कहलख कि समय खतम हो गइल मुलाकात के, तब जाके पूजा जुगेसर के हाल-चाल पुछली.
एक-एक दिन करके 28 दिसम्बर हो गइल. आज ई रिपोर्ट त काल्ह ऊ टेस्ट. भाग-दौड़ में पूजा के त दिनो के खयाल ना रहे. सुबह नहा के कंघी करत रहली कि फोन के घंटी बाजल. ऊ भाग के फोन उठवली. ओने अर्चना रहस.
– ‘का हाल बा पूजा.’
– ‘तहरा आज टाइम मिलल ह?’ बिना कुछ सोचले पूजा उलाहना दिहली.
– ‘अभिषेक से त रोज हाल चाल मालुम होते बा.’
– ‘तबे हमरा से का पूछ तारू?’ पूजा के आवाज आउर कठोर हो गइल.
– ‘ना हम फोन कइनी ह कि अभिषेक काल्ह पटना जइहन.’
अभिषेक आव तारे सुन के पूजा के सारा अभिमान टूट गइल. ऊ कहली – ‘सांच? धन्यवाद दीदी. बहुत-बहुत धन्यवाद.’
ओह दिन अस्पताल जा के जुगेसरो के बतवली. उनको बड़ा अच्छा लागल. के बा ओ लोग के. संबंधी बोल के अभिषेके आ अर्चने त बा. यदि अभिषेक आवतारे त जरूर कुछ अच्छे होई सोच के दूनो जाना के मन हल्का हो गइल.

दिल्ली से पटना आवे वाला प्लेन शाम चार बजे पटना पहुंचे आ आध घंटा बाद फेर दिल्ली लवट जाव. 29 तारीख के ऊ फ्लाइट करीब 45 मिनट लेट से पहुंचल. डॉ.अभिषेक के लेबे खातिर डॉ.तिवारी आपन गाड़ी भेजले रहस. एयरपोर्ट से सीधा अस्पताल पहुंचलन. दूनो डॉक्टर अब तक के सारा रिपोर्ट देखल लोग. शंका के कवनो गुंजाइश ना रहे कि पाचन नली में मैलिगनेंसी बा. अब निर्णय ई लेबे के रहे कि कवन स्टेज के बा आ आपरेशन कइल जा सकऽता कि ना.
डॉ.अभिषेक पुछलन – ‘आपके अस्पताल में अंकोलोजी के बैकअप कइसन बा?’
डॉ.तिवारी कहलन – ‘अहिरिन अपना दही के खट्टा ना कहे.’
डॉ.अभिषेक मुस्कुरा दिहलन – ‘लेकिन ई त घर के बात बा. उनका के दिल्ली ले जाइल जा सकऽता का?’
– ‘बहुते कमजोर हो गइल बाडऩ. साथ में हमरा लागऽता मैलिगनेंसी फइल रहल बा.’
– ‘अइसन करीं ना काल्ह सुबह एगो अंकोलाजिस्ट के बुला लीं. एक बार सारा कुछ देख के निर्णय लेहल जाव. तब ना होई त दिल्ली ले जाइब.’
डॉ.तिवारी संगे-संगे फोन मिलावे लगले.
शाम के अस्पताले में पूजा, मां आ सोनी मोनी से डॉ.अभिषेक के मुलाकात हो गइल. ओ लोग के आग्रह देख के अभिषेक डॉ.तिवारी किहां ना जाके ससुराल गइलन.

30 दिसम्बर
सुबह आठ बजे कांफ्रेंस रूम में चार डॉक्टर बइठल रहस. डॉ.तिवारी, डॉ.अभिषेक के अलावा अंकोलोजिस्ट डॉ.श्रीवास्तव आ सर्जन डॉ.श्रीवास्तव आ डॉ.सुहेल. एक-एक करके सब लोग रिपोर्ट देखल आ अपना-अपना नोट पैड पर नोट लेत गइल.
डॉ.श्रीवास्तव शुरू कइलन – ‘ई केस काफी कंप्लीकेटेड हो चुकल बा. मैलिगनेंसी इज नाट कंफाइंड दू ए स्पाट आर टू गिवन एरिया.’
डॉ.सुहेल बोललन – ‘लेकिन एक्स-रे/एमआरआई का रिपोर्ट बता रहा है कांसेंट्रेशन पैनक्रियाज में है. ह्वाई शुड वी नाट गो फार इट्स रिमूवल फस्र्ट देन केमो केन बी ट्राइड.’
डॉ.श्रीवास्तव के उनकर बात कुछ ज्यादा अच्छा ना लागल. कहलस – ‘बस इहे त आप सब के समस्या बा. देखत भइल कि काटे खातिर तइयार. अरे भाई ई कवनो आर्डिनरी ट्यूमर थोड़े बा. आ सबसे बड़ समस्या बा पेशेंट के शारीरिक हालत. ब्लड रिपोर्ट देखल जाव – पेशेंट में कतना कम बा. एह हालत में त आपरेशन सोचले ना जा सके. एट बेस्ट एगो केमो देके देखल जा सकता. यदि पेशेंट के रेस्पांस अच्छा रहल त आपरेशन के सोचल जा सकऽता.’
डॉ.अभिषेक एक बेर फेर से सारा रिपोर्ट देखे लगलन. करीब 10 मिनट बाद ऊ सर उठाके डॉ.तिवारी के ओर देखलन. फिर कहे लगलन – ‘सारा कुछ देख के हम डॉ.श्रीवास्तव से सहमत बानी. काहें कि पेशेंट के हालत अइसन नइखे कि उनका के कहीं ले जाइल जाव भा आपरेशन कइल जाव.’
फेर डॉ.तिवारी के ओर मुड़ के कहलन – ‘केमो खातिर कइसन व्यवस्था बा आपके यहां?’
– ‘अरे भाई, बिहार के प्रीमियर मेडिकल कालेज ह. का डॉ.श्रीवास्तव?’
– ‘बिल्कुल-बिल्कुल.’
ठीक भइल दोसरा दिन यानी 31 दिसम्बर के पहला केमो दीहल जाई. डॉ.अभिषेक के 30 के ही लवटे के रहे लेकिन पूजा के देख के ऊ ठीक कइले 2 दिन बाद जाए के. लेकिन ई शर्त पर कि ऊ डॉ.तिवारी के साथ रहिहन.’

31 तारीख 1999 दिन शुक्रवार
केमो चलत रहे जुगेसर के. पास के मस्जिद से जुमा के नमाज के आवाज आवत रहे. डॉ.अभिषेक आ डॉ.श्रीवास्तव पास में खड़ा रहे लोग. आधा बोतल पानी अन्दर जा चुकल रहे. हठात् जुगेसर का हिचकी आइल. दूनो डॉक्टर एक साथ उनका ओर झुकल लोग. सांस के गति में परिवर्तन लक्ष्य कइल सब. दूनो जाना एक दूसरा के देखलस. केमो रोक देहल लोग. ईसीजी ग्राफ की ओर देखल लोग. करीब-करीब ठीक रहे. जुगेसर धीरे से कुछ कहलन. जूनियर डॉक्टर नर्स से पैन लगावे के कहलन. डॉ.श्रीवास्तव बाहर आके फोन कइलन, आईसीयू में जगह बनावे के. दिन के तीन बजे जुगेसर के आईसीयू में ले गइल गइल. ई सारा प्रक्रिया में पूजा बाहर बइठल रहस. उनका समझे के बाकी ना रहल कि खबर अच्छा नइखे. लम्बा सांस लेके कहली – ‘का भगवान?’
आईसीयू में जाके डॉक्टर अभिषेक खड़ा भइलन. जुगेसर के सांस लेबे के कठिनाई होत रहे. आईसीयू के डॉक्टर आक्सीजन मास्क चढ़वलस नाक पर. थोड़ा देर बाद सांस सामान्य हो गइल. तबहीं डॉ. तिवारीओ आ गइलन. दूनो डॉक्टर बात करके पेट से पानी निकाले के ठीक कइल लोग. पानी निकलला के बाद जुगेसर काफी हल्का महसूस करे लगले.
शाम के सिर्फ पूजा जा पवली आईसीयू में. जुगेसर बढिय़ा से बात कइलन. बतवलन सब आज रात के यदि ठीक रही त काल्ह आईसीयू से निकाल दीहल जाई. पूजा लवट गइली. घर में कोई कोई से कुछ ना पूछे. समय से लड़े के क्षमता केकर बा. जइसे घर लौटत पथिक तूफान में फंसल होखे वइसने हालत रहे. सबका तूफान रुके के इन्तजार रहे.
रात ना बीतल. रात एक बजे अस्पताल से फोन आइल. पेशेंट के हालत ठीक नइखे. आवे के कहल सब. पूजा मां के जगवली. बच्चा ना जाग जा सँ सोच के धीरे से निकल गइली. रास्ता का मोड़ पर एगो रिक्सा रहे. रिक्सा वाला रिक्से पर सूतल रहे. – ‘ओ भैया, ओ भैया’ कहके पुकरली. रिक्सा मिलला से सांस में सांस आइल. चारों ओर सूनसान रास्ता. बीच-बीच में गली के कुत्ता भौं-भौं करस. लेकिन अस्पताल के अंदर दोसरे दृश्य रहे. पूजा के कबहीं रात में अस्पताल जाए के ना पड़ल रहे. लोग भरल रहे. कुछ लोग फर्शे पर सूतल रहे. ऊ पूछताछ कार्यालय में पहुंचली. सामने कएक गो आदमी रहे. भला घर के औरत समझ के रास्ता दे दिहलस. ऊ खिडक़ी से पुछली – ‘आईसीयू…’ पूरा ना कहे के पड़ल. खिडक़ी वाला आदमी कहलस – ‘आईसीयू बेड नम्बर 13, युगेश्वर प्रसाद एक्सपायर्ड एट 12 आवर्स.’
पूजा के सामने सब अंधकार हो गइल. ऊ धम्म से बइठ गइली. ओहिजा.
—-
जुगांतर
14 जनवरी 2000
कहल जाला सूर्य उत्तरायण होलन. गंगा के घाटन पर पुण्यार्थी स्नान खातिर भीड़ लगवले रहस. अर्चनो आ गइल रहस. विपत्ति के समय सब अहं लोप हो जाला. पटने में काम-क्रिया निपटावल दूनो बहिन मिल के लेकिन ई संसार चक्र त रुकी ना. पूजा अपना ओर से कुछ कहे के तइयार ना रहस. अर्चना के खोद-खोद के कहला पर कहली – ‘मां से ही पूछ ल. ऊ यदि तहरा साथ रहे खातिर तइयार हो जास त हमरा कवनो तकलीफ नइखे.’
आखिर मां के केकरा भरोसे छोड़बो करे लोग? बहुत मनौती के बाद मां तइयार भइली दिल्ली जाए के. किरायेदार के हवाले घर कर दीहल गइल. खाली ऊपर वाला कमरा छोड़ के.
दिल्ली के फ्लाइट शाम के रहे. पूजा सोनी-मोनी के साथ समस्तीपुर के बस पकड़ली. सामान त कुछ रहल ना. बिदाई के समय मां के फफा-फफा के रोवलो पूजा के आंख ना भिंजा पवलस.
डॉ. अभिषेक के हाथ जोड़ के बिदा कइली. अर्चना के आवाज आइल – ‘फोन करत रहिह.’
समस्तीपुर पहुंच के घर के ताला खोलली. अबहीं दिन रहे. पड़ोस के झा जी के परिवार दौड़ के आइल. लागल ओ लोग का पता चल गइल रहे. बच्चा से कह के पानी मंगवली मिसेज झा. फिर कहली – ‘हम चाय लेके आव तानी.’
पूजा के ना ऊ जइसे सुनबे ना कइली. जब तक पूजा घर के दरवाजा खिडक़ी खोलली ऊ चाय आ प्लेट में बिस्कुट लेके आ गइली. उनकर बच्चा सोनी से थोड़ही बड़ा रहे. तीनों बच्चा एक जगह हो गइलन स. मिसेज झा एने-ओने के बात करे लगली. अइसन गमगीन माहौल के हल्का करे के गजब के क्षमता होला औरतन में. अंत में मिसेज झा पूजा के मनावे में सफल हो गइली जे रात के खाना ऊ दे जइहन.
उनका गइला के बाद पूजा घर सइहारे लगली. झाड़ू देबे लगली. एही क्रम में कएक गो चिट्ठी दिखल. ओमें एगो पोस्टकार्ड रहे. ओके पढ़े लगली –
’23-12-99
भाई जुगेसर
आशा कर तानी तू सपरिवार ठीक बाड़. हमहु ईश्वर के कृपा से ठीक बानी. बेटा के फार्म भरा गइल. देखऽ कइसन रिजल्ट होता. हम तहरा से रिजल्ट भइला पर मिलब. तहार मदद लागी.
बिशेष बात तहरा बाबूजी के बारे में बा. चाची का गइला का बाद ऊ बिल्कुल अकेले बाड़े. गांव के हाल-चाल का कहीं. रात के खाना त हम दे आइले. दिन में सतुआ खाके रह जालन. शरीरो कमजोर बा. ऊ हमरो इहां से खाना लेबे नइखन चाहत. मानसिको रूप से कष्ट होत रही न. एह बात पर कुछ सोचऽ. जे भी होखे तू खून बाड़ऽ.
इति.
-जगमोहन.’

पूजा दू तीन बार पढ़ली जइसे याद करत होखस. सोनी-मोनी मिसेज झा के साथे चल गइल रह स. पूजा के आंख बंद हो गइल. पहिले त महसूस करे के कोशिश कइली कि युगेश्वर जी नइखन. जवना पुरुष के ऊ आपन सब कुछ सौंप देले रहस ऊ पुरुष आज साथे नइखे सोच के उनका अन्दर एगो गजब के आत्मविश्वास भरे लागल. ऊ आज जे बाड़ी केवल ओही पुरुष के छाया बाड़ी. उनकर परिचय बैकुण्ठ प्रसाद के बेटी के रूप में नइखे – मिसेज युगेश्वर प्रसाद बा. दू-दू बेटी के परिचयो उनके से बा. – ‘ना.’ उनका मुंह से निकलल, जइसे कवनो पक्का निश्चय पर पहुंच गइल होखस.
26 जनवरी 2000 बुधवार रहे. प्रधान शिक्षक से पहिलहीं अनुमति ले लेले रहस. सुबह 5 बजे गाड़ी आ के हार्न बजवलस. ऊ तइयारे रहस. सोनीए के जगावे में थोड़ झंझट भइल. दूगो कंबल ले लिहली. गाड़ी चल पड़ल.
मुजफ्फरपुर बाईपास से निकले का बेरा पूरब में सूरज के ललछाँह दिखल. ड्राइवर गाड़ी रोक के कहलस – ‘मैडम चाय पी लेहल जाव. उनको चाय के जरूरत महसूस होत रहे. गाड़ी से निकलत निकलत बाहर के ठंडा के अंदाज मिलल. चारों ओर खेत आ बघार रहे. सोनी त चिरई जइसे चहके लागल – ‘दादा जी के गांव आ गइल मम्मी?’
– ‘ना बेटा, अबहीं देर बा.’ पूजा धीरे से बतवली.
गाड़ी फेर चले लागल. बाँए थर्मल पावर स्टेशन रहे. ऊंचा चिमनी से काला धुआं निकलत रहे. एगो कस्बा मिलल. साइन बोर्ड पढ़ के सोनी ही बतवलस – मेंहसी ह. चकियां से बायें मुड़ल गाड़ी. केसरी में थोड़ा रुक के ड्राइवर पुछलस – ‘तुरकौली केने से जाई?’
करीब नौ बजे पूजा बतवली – ‘अब आवता दादा जी के गांव. बरगद के पेड़ आ पास में पोखरा देख के पूजा का बुझा गइल कि हमनी पहुंच गइली. ऊ आंचल खींच के सर पर रख लिहली. ड्राइवर के कहली – ‘गांव में घुस के जगमोहन जी के घर पूछ के खड़ा करब.’
गांव का शुरुए में उनकर घर रहे. गाड़ी खड़ा होत देख के ऊ खुदे उहां आ गइले. गाड़ी के अन्दर झांक के कहले – ‘जुगेसर के परिवार हईं.’
पूजा खाली सर हिलवली.
– ‘उतरीं एक बार.’ जगमोहन का स्वर में आदेश रहे.
पूजा सोनी-मोनी के उतार के गाड़ी से उतरली. चारों ओर धूप फइलल रहे. पास वाला खेत में सरसों के खेत रहे. पीला-पीला फूल से दिगमिगात.
– ‘ई कवन फूल ह मां?’ सोनी पुछलस.
– ‘सरसों, बेटा.’ पूजा बतवली.
जगमोहन के बेटा आके पैर छुवलस.
पूजा जगमोहन से कहली – ‘आपके त सब मालुम चलिए गइल बा. हम बाबूजी के ले जाए आइल बानी.’
जगमोहन का एक त विश्वास ना भइल. कहलन – ‘पूरा सोच समझ के कह तानी नू?’
– ‘हां.’
– ‘बहुत अच्छा. त चलल जाव.’ कहत-कहत जगमोहन उठ गइलन. खड़ा होके बेटा से कहलन – ‘बाबू, माई से कह जल्दी-जल्दी कुछ बना के रखस. ए सब खातिर. हमनी का आव तानी.’
गाड़ी ले जाए के जरूरत ना रहे. आगे-आगे जगमोहन पीछे-पीछे दूनो लड़किन का साथ पूजा चले लागल लोग. बीच-बीच में आंचल खींच के सर पर रख लेहली ऊ. रास्ता में सब घर के औरत झांक-झांक के देखत रहस. एक-आध आवाजो कान में पड़ल पूजा का – ‘जुगेसर के जनाना ह. मास्टर ह. तबहीं त एतना हिम्मती बिया. ना त आदमी मरला पर अइसन के कर सकी.’
शिवदत्त जी बाहरे चौकी पर बइठल रहस. पूजा आगे बढ़ के पैर छुअली. ऊ कुछ कहे ना सकले. आंख से आंसू बहे लागल. अइसन कि रुके के नाम ना लेब. ऊ पास से गमछा उठा के मुंह पर रख के सिसके लगलन. थोड़ा देर बाद जगमोहन बोललन – ‘ए चाचा. तू एह तर करब त सब के का होई. देख त दू-दू गो नतीनी खड़ा बाड़ी स.’
पास से दू-एगो आउर लोग आ गइल. सभे शिवदत्त जी के चुप करावे लागल.
जगमोहन कहलन – ‘ई तहरा के ले जाए आइल बाड़ी. तू जल्दी तइयार हो जा.’
– ‘हमरा का तइयार होखे के बा?’ कहत-कहत ऊ उठलन. फेरु पूजा के ओर देख के कहलन – ‘तू आवऽ हमरा साथे.’
आवाज साफ ना रहे लेकिन पूजा के समझे में कवनो दिक्कत ना भइल. आगे-आगे ऊ घर में घुसलन. अंदर घर में एगो खटिया पर बिछावन रहे. ऊ ओकरा नीचे बइठ के एगो बक्सा बाहर खिंचलन. कमर में बंधल चाभी से खोललन. बक्सा के एक-एक गो सामान निकाले लगलन. तीन गो धोती रहे. दू गो कुर्ता रहे. नीचे से एगो मैल झोला निकललन. ओकरा अंदर में एगो डिब्बा रहे. डिब्बा खोले में खास मिहनत करे के पड़ल. ओमे से एक-एक गो सामान निकाल के खटिया पर रखे लगलन.
चांदी के हंसुली, कड़ा आ करमबंद. सोना के एगो नथिया आ कनफूल. पूजा के ओर देख के कहलन – ‘ई तहरे बा. कइसे ले चलब देखीं.’
पूजा कहली – ‘रउरा उठीं, हम सइहारत बानी.’
ऊ उठ के खड़ा भइलन. पूजा बक्सा उठा के खटिया पर रखली. पुछली – ‘कवन कुर्ता पहिनब?’
– ‘कवनो दे द एगो.’
एगो कुर्ता धोती दिहली उनका के. फेर जवन सामान जइसे रहे बक्सा में रख के बंद कइली. कहली – ‘ताला लगा दीं.’
शिवदत्त जी ताला बंद कर के स्वेटरे पर कुर्ता पहिन लिहलन. पैर में जूता डाल लिहलन. सब घरन में जंजीर लगा के बाहर दरवाजा पर ताला लगा दिहलन. अकेले रहला पर आदमी बड़ा अनुशासित हो जाला. बाहर निकल के जगमोहन के कहलन – ‘चलऽ.’ जगमोहन बक्सा ले लिहलन. अपना घर पहुंचे के कहलन -‘चाचा बइठ. एलोग के कुछ खिआ दीं.’
उनकर बेटा पूजा आ दूनो लडि़कियन के लेके घर के अंदर चल गइल. एगो थाली में पूरी आ भुजिया ले अइली उनकर औरत. साथ में तीन गो कटोरा में दही. एगो थाली शिवदत्त जी खातिरो आइल.
चले के तइयार हो गइल. शिवदत्त जी आगे बइठलन. पूजा आ बच्चा पीछे. जगमोहन के हाथ जोड़ के पूजा कहली – ‘दोस्त नइखन बोल के भुलाएब मत. आ बाबू के रिजल्ट भइला पर एकरा के हमरा पास भेज देब.’
गांव का बाहर मंदिर के पास गाड़ी रोके के इशारा कइलन शिवदत्त जी. खुद उतर के पूजा से कहलन – ‘मैया के सामने माथा टेक ल.’
पूजा उतर के मंदिर में घुसली. शिवदत्त हाथ जोड़ले बाहर खड़ा रहस. पूजा का निकल के अइला के बाद ऊ गाड़ी के पास अइले. दूनो आंख झर-झर बहत रहे. गाड़ी चले लागल. पूजा का जुगेसर का साथ पहिला बार आइल याद पड़ल. लवटे के बेरा कइसे ऊ आपन आंसू ना रोक पावत रहस. आज उनका आंख में आंसू ना रहे.

(समाप्त)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

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