जमीनी हक़ीकत से बेख़बर बा भोजपुरी सिनेमा

– सुधीर सिंह उजाला

भोजपुरी फिल्म के उद्गम बिहार आ उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक भूमि से भइल बा. त अचरज ना होखे के चाहीं कि एकर बुनियाद बरकार राखे के जिम्मेदारीओ एही लोग का कान्ह पर टिकल बा. बाकिर पिछला दस साल से अपना कामयाबी पर इतरात भोजपुरी सिनेमा का लगे बस तीने गो नायक बाड़ें रविकिशन, मनोज तिवारी आ दिनेश लाल ‘निरहुआ’. हाल के दिन में जब मनोज तिवारी आ रवि किशन कमजोर पड़ल बाड़ें त पवन सिंह आ खेसारीओ लाल के चरचा भलहीं जोर पकड़े लागल बा बाकिर भोजपुरी सिनेमा के संगे धुरंधर कुणाल सिंह क बाद मौजूदा समय में जवन तीन नाम याद आवेला तवन रवि, मनोज अउर निरहुए के होला. रविकिशन के छोड़ दीं त लगभग सगरी नायक लोकगायक के रूप में लोकप्रियता बटोरला का बाद भोजपुरी सिनेमा के सितारन में शुमार भइलें. दोसरा ओर भोजपुरी सिनेमा में नायिका लोगन के कतार बहुते लमहर बा, रानी चटर्जी, पाखी हेगड़े से लेकर मोनालिसा अउर आइटम डांसर संभावना अउर सीमा सिंह ले. लेकिन एहमें से शायद केहु के ऊ बेंवत नइखे जे कैटरीना, करीना अउर ऐश्वर्या क तरह देखे वालन के सिनेमा घर ले खींच सके. ई लोग फिलिमन में एही ला होले कि ग्लैमर होखल जरूरी होला. ना त एह लोग के मार्केट वैल्यू इचिकिओ भर नइखे. ई बात भोजपुरी के नायको समुझेलें आ ओह लोगन पर मार्केट वैल्यू के बुखार सवार होके लागल बा तबहिए त भोजपुरी सिनेमा के बजट के आधा माने कि 50 लाख तक मांगे में एह लोग के संकोच ना होखे. पिछला दिने जब एगो नामचीन भोजपुरी अभिनेता से 50 लाख मँगला के लेके सवाल उठावल गइल त ऊ छूटते कहलन, रजनीकांत त एक फिल्म के 50 करोड़ लेबेलें, हम त ओह हिसाब से कुछऊ ना माँगीले. आखिरकार उहो त रिजनले सिनेमा से आवेलें. हम त चाहीलें कि हमनिओ के फिलिम ओह ऊँचाई ले चहुँपे.

अब के ना मर मिटी एह सीधाई पर. भोजपुरी सिनेमा के बेहतर भविष्य के चाहत सराहे लायक बा, लेकिन चाहत के बुनियाद जमीनी ना होखे त बस हँसा सकेले अउर कुछ ना कर सके. रजनीकांत के लेके इहो सवाल जेहन में चमकेला कि शुरूआतीए दौर में उनुका के 80 करोड़ परोसल गइल कि इंडस्ट्री के बुलंदी पर चहुँपवला का बाद 80 करोड़ मिलल. सवाल जतने अझूराइल बा जवाब ओतने सीधा बा, काहे कि शोहरत के सरपट में भोजपुरी के चंद नामचीन अभिनेता भूला जालें कि उनुकर इंडस्ट्री कवना लायक बा आ ओकर बेहतरी आ माकूल तरक्की ला ऊ कवन कोशिश कइले बाड़न? वास्तव में यदि भोजपुरी सिनेमा जगत के बीतल दस साल पर गौर करीं त पाएब कि पारिश्रमिक के बढ़ोतरी के अलावा इंडस्ट्री के बेहतरी ला कवनो अभिनेता निजी स्वार्थ से ऊपर उठके कवनो सार्थक पहल शायदे कइले होखे. जबकि भोजपुरी के जमीनी हकीकत से बेखबर भोजपुरी सिनेमा के चेहरा अउरी बिगाड़े के कोशिश बदस्तूर जारी बा. दावा क साथ ई कहल बेमतलब ना होई कि तीनों सितारा में से शायदे केहु अपना निर्माता, निर्देशक भा पटकथा लेखक से मिल के सार्थक दखल देबे खातिर कवनो गंभीर बइठकी भा राय विचार कइले होई. अतने ना, शायदे केहु अपना फिलिमन के तकनीकी गलतियन के सकरले होखी, भा अपना फिलिमन के सफलता भा असफलता के कारण जाने के कोशिश कइले होखी. कहल जा सकेला कि अभिनेतने से अतना उम्मीद काहें? उ एहसे कि जब फिल्म के बजट के आधा रउरे चाहीं त पूरा फिलिम के जवाबदेहीओ सकारे के पड़ी. तब शायद एगो नया अध्याय के नींव पड़ सकी बाकिर अइसन भावना के भनको से अभिनेता अपना के फरके राखे में आपन भलाई समुझेलें.

साँच त ई बा कि भोजपुरी सिनेमा के शुरूआती दौर याद करीं त फिल्मकार नासिर हुसैन, विश्वनाथ शाहाबादी भा फेर कुंदन कुमार के नाम याद आवेला, कवनो नायक नायिका के नाम याद ना आवे. लेकिन भोजपुरी सिनेमा के मौजूदा माने कि तिसरका दौर में शायदे कवनो फिल्मकार के नाम उनुका फिलिमन के नाम का साथे याद आवे, याद पड़ी त बस नायकन के नाम. फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ संगे मनोज तिवारी, ‘निरहुआ रिक्शावाला’ संगे दिनेश लाल ‘निरहुआ’ त ‘मार देब गोली केबू ना बोली’ संगे रविकिशन. जाहिर बा कि जब भोजपुरी सिनेमा के पूरा बाज़ारे नायकन का अंगुरी पर नाचत होखो त एकरा अच्छाई-बुराईओ से एह लोगन के बरी ना कइल जा सके. हमार निजी मानना बा कि रविकिशन अउर मनोज तिवारी के भोजपुरी लोकप्रियता के माथ पर चहुँपा दिहलस जहवाँ उ ढेर दिन ले बिना कवनो प्रतिस्पर्धा के टिकलो रहलें. अतने ना भोजपुरी खातिर प्रतीको बन गइलें, जहां ई लोग भोजपुरी में एगो ‘पिपली लाइव’ भा ‘लगान’ के सपना देख सकत रहे लेकिन अइसन हो ना सकल काहे कि एह लोगन के अपना बादशाहत के पड़ल रहे, ना कि भोजपुरी इंडस्ट्री के बेहतरी के. एकरे अलावा सबले बड़ मुश्किल ई रहल कि एह विसंगतियन का चलते भोजपुरी सिनेमा के एगो क्षेत्रीय सिनेमा के तरह के जमीनो ना मिल सकल, जवना का पीछे भोजपुरी सिनेमा के दशा आ दिशा के प्रतीक बन चुकल रविकिशन आ मनोज तिवारी जइसन अभिनेता अपना अंतर्मुखी प्रयास से एकर बेड़ा गर्क करे पर आमादा रहलें. नतीजा भइल कि असमिया, मलयालम, बंगाली, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी सिनेमा का तरह भोजपुरी सिनेमा के विकास अपना जमीन पर भइबे ना कइल. ना त एकर केन्द्र दोसरा क्षेत्रीय फिलिमन का तरह उनुका राज्य भा व्यावसायिक जगहा पर खुल पावल. अघर अइसन भइल रहीत त सिनेमा भोजपुरी ला पटना आ गोरखपुर सबले खास केन्द्र होखीत. भोजपुरी सिनेमा एगो आजाद आसमान में बढ़ला का बजाय हिन्दी के हिमालय के छाँहे में अपना के सुरक्षित पवलसि. हालांकि शुरूआत तकनीशियनन से भइल, आ बाद में एहिजा के फिल्मकारो मुम्बई में आशियाना तलाश लिहलें. कलाकार त हमेशा का तरह मुम्बई के रूख करत गइलें आ बसत गइलें आ भोजपुरी सिनेमा अपना जमीन से बेदखल हो के हिन्दी सिनेमा के दहलीज पर जा पहुंचल. नतीजा भइल तथाकथित लोकप्रियता के दस बरीस गुजरला का बादो भोजपुरी सिनेमा के कवनो आपन आजाद पहचान ना बन सकल. बेसक कद त बढ़ल लेकिन एक हद ले दोसरा का दायरा में समेटा के. सिनेमा भोजपुरी के पहिलका स्वर्ण जयंती फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माण के केन्द्र पटना चुनल दूरदर्शिता साबित करत बा लेकिन तबहियों भोजपुरी के अगुआई करे वाला अभिनेता हमेशा अपना जमीनी हकीकत से मुंह चोरावे में लागल बाड़ें. अचरज नइखे कि मुम्बईए में बढ़ल मराठी सिनेमा से सिखला का बजाय भोजपुरी सिनेमा हिन्दी के भोंड़ा नकल कर के तोस पावत रहल. एतने ना हिन्दी से संपर्क भोजपुरीओ सिनेमा के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय होखे के गलत फहमी दे दिहलसि. आजु भोजपुरी सिनेमा के बात होले त लोग सीधे मॉरीशस, सूरीनाम से शुरूआत करेला. बाक्स ऑफिस के बात आवेला त हिन्दी सिनेमा का तरह इहो पंजाब, महाराष्ट्र, बंगाल, गुजरात के सर्किल के चरचा करेलें. कुल मिलाके जबो भोजपुरी सिनेमा के बाजार के चरचा होले त भरम फइलावल जाले कि एकर बाजार हिन्दी सिनेमा के बराबर भलहीं मत होखे, होखल जरूर चाहीं. भोजपुरी विश्लेषक भलहीं आपन मंशा थोपे ला बेसिरपैर वाला गलतफ़हमी के हवा देसु, निश्चित तौर पर एहसे भोजपुरी सिनेमा के हमेशा नुकसाने चहुँपवले बा. परिणाम ई भइल कि अइसन हालात में भोजपुरी सिनेमा के कनो अपना बाजार के सही आंकलन ना मिल सकल. मॉरीशस आ सूरीनाम से कमाई करके पता ना कतना फिलिम लवटली सँ, एकर समुन्दर पार बिजनेस के कवन रिकार्ड कम से कम अबहीं ले त सार्वजनिक नइखे भइल. लुधियाना, सूरत आ मुम्बईओ में भोजपुरी सिनेमा कतना कमाई कर पावेले, लोग के मालूम बा. भोजपुरी सिनेमा के कवनो तयशुदा बाजार बा त ऊ बा बिहार आ उत्तर प्रदेश के लगभग 200 से 300 बी ग्रेड सिनेमा घर. जहां टिकट के दर अबहियों 10 से 50 के बीच बा. ई सीधा गणित के मामला बा कि यदि सगरीओ शो हाउसफुल हो जाव एगो भोजपुरी सिनेमा कतना कमाई कर पाई? लेकिन भोजपुरी सिनेमा से जुड़ल लोग सीधे तौर पर हिसाब किताब भा कहीं त आंकड़ा सकारे ला कतई तइयार नइखन. जतना सिनेमाघर पूरा बिहार में ओतना त अकेले चेन्नई शहर में बा. हिन्दी फिल्म यदि मल्टीप्लेक्स में तीन दिन चल जाव त मुनाफा में आ जाले, लागत त ऊ रिलीज होखे से पहिलही ऑडियो, वीडियो, सेटेलाइट समेत अनेके तरह के राइट्स से निकाल लेले. बगैर शोध आ सर्वे के सगरी आंकड़ा भोजपुरी के पक्ष में बा तबहियों एकरा ला आपके कवन राइट्स मिलेला जे हवा में कटल पतंग के तरह उड़ावे में मशगुल होत रहीलें. ई सब कुछ भोजपुरीए सिनेमा के पाला में काहे आवेला? साउथ के फिलिम 100 करोड़ के बन सकेले त भोजपुरी के बीसो करोड़ में त बने. जबकि भोजपुरी सिनेमा के सालाना कारोबारे 100 करोड़ तक चहुँप पावेला भलही निर्माण पर सवा सौ करोड़ खर्च होखे लागल बा. यदि भोजपुरी सिनेमा के अधिकतम वापसी दूइयो करोड़ के मानल जाव त कवन फिल्मकार 8 करोड़ ले निर्माण पर खरच सकेला? यदि ऊ हिम्मत करिओ लिहलसि त दुबारा वापसी के नाम ना ली. 40 से 50 लाख भोजपुरी नायक के चाहीं त तो बाकी के तकनीकी खरचा ला भा ओह फिलिम के बेहतर बनावे ले सलाह जोखिम भरल हो जाला. अचरज ना होखे कि हिन्दी सिनेमा के धुरंधर निर्माता सुभाष घई, सरोज खान, दिलीप कुमार जइसन हस्तीओ भोजपुरी सिनेमा के बहत गंगा में हाथ धोवे अइलन त बाकिर कबो मुड़ के ना देखलें. शायद उहो भोजपुरी के आंकड़ा के मकड़ जाल में अझूरा गइलें. अभय सिन्हा, संजय सिन्हा, डा.सुनील कुमार, आलोक कुमार समेत कुछेक भोजपुरी के मंजल प्रोड्यूसर बाड़ें जे भोजपुरी के मायने मतलब आ हद से वाकिफ़ होखला से टिकल बाड़ें. भोजपुरी दर्शक एकल पसंद के आदी हो चुकल बाड़ें. बीतल बीस भा पचास बरीसन में चुने के कवनो सुविधा सिनेमा के भोजपुरी परदा पर ना मिलल. हमेशा से बस एके तरीका से, कमोबेस एके माहौल वाली, एके जइसन कथानक, विषयवस्तु के इर्द-गिर्द भोजपुरी फिलिम बनत रहेले जवना से दर्शकन का नजरिओ पर कवनो खास फरक ना पड़ल. भोजपुरी सिनेमा भोजपुरी ला बने का बजाय खाली बाजार ला बनावल जाले. नतीजा बा कि दर्शकन पर भा बड़हन पैमाना पर आपन पकड़ बनावे में नाकाम साबित होखत बिया. साउथो के फिलिम में अश्लीलता के बाढ़ बा त अदूर गोपालाकृष्णनो बाड़ें, बांग्ला में बाजार ला फिलिम बा त गौतमो घोष बाड़न. मराठी में फुहड़ हास्य के भरमार बा त श्वासो बा. भोजपुरी में अइसन काहे नइखे होखत? शायद एहले कि दोसरा क्षेत्रीय सिनेमन का तरह लगाव नइखे लउकत.

इहे सही समय बा. बड़हन बजट आ हवाई बाजार के भरम का भ्रम छोड़ के छोट बजट में नया प्रयोगधर्मी भोजपुरी सिनेमा के नया शुरूआत कर सकेलें. बाकिर तब बजट के बड़हन हिस्सा नायक के हवाले कइला का बदले शोध, परिकल्पना, कैमरा, संपादन आ कहानी पर करे के पड़ी. लाइट्स आ संगीत के इस्तमालो सीखे के पड़ी. तब जाके ‘पिपली लाइव’ आ ‘वेलडन अब्बा’ के परिकल्पना भोजपुरी सिनेमा के सोंच बन सकेला. भोजपुरी सिनेमा के मुम्बई में न्याय नइखे मिले वाला. ओकरा हिन्दी भा दोसरा क्षेत्रीय फिलिमन से चोरावल विषयवस्तु से नकलचीए के दर्जा हासिल हो पाई. एकरा ला मुम्बई के मोह छोड़ पटना भा गोरखपुर का ओर चले के पड़ी. तब जाके भोजपुरी के हक़ खातिर सही पहल हो पाई. संगहीसंगे नया आ सही प्रतिभा के तलाशो पूरा होखी आ कुछ गिनल चुनल भोजपुरी के सितारन का चमको पर हिन्दी सिनेमा जइसन प्रभाव लउके लागी आ तब भोजपुरी सिनेमा के सितारा सही मायने में चमक उठी.



सुधीर सिंह उजाला मैजिक टीवी के एजीएम रह चुकल बानी. ओहसे पहिले साल २००७ से २०११ का बीच फिल्म निर्माण से जुड़ल रहनी. ओहसे पहिले ईटीवी, अमर उजाला दैनिक अखबार, दैनिक जागरण वगैरह से जुड़ल रहनी. हिंदी अंगरेजी आ भोजपुरी के जानकार सुधीर सिंह वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से वनस्पतिशास्त्र में एमएससी कइले बानी.
आजुकाल्हु बनारस से प्रकाशित दैनिक अखबार फास्ट न्यूज इंडिया के चीफ एडीटर बानी.

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