संत तुलसीदास जी

– इं॰ राजेश्वर सिंह

महीना के जवने तिथि के जनमि के, सवा सौ साल से अधिक जियले के बाद, ओही तिथि के आपन देहि तजि के दुनिया से सदा-सदा खातिर चलि जाये वाले विरले लोगन में से तुलसीदास जी एक हउअन. तुलसीदास जी कऽ जनम उत्तरप्रदेश में जिला बॉंदा के गॉंव राजापुर में सम्वत् 1554 के सावन अँजोरिया सतमी, माने कि शुक्ल पक्ष के सप्तमी तिथि, के भइल रहल. उनके बाउ कऽ नाम आत्माराम दूवे अउर माई कऽ नाम हुलसी रहल. कहल जाला की ऊ माई के पेटे में बारह महीना रहले के बाद दुनिया में आइल रहलन जब कि आमतौर से लइका नव-दस महीना बादे माई के पेट से बाहर दुनिया में आ जालन. सगरो लइके जनमते रोवे सुरु कइ देलन लेकिन तुलसीदास जी पइदा होते ‘राम़’ बोल पड़लन. एतने नाही उनके मुहें में बत्तीसो दॉंत रहल अउर कद काठी पॉंच बरिस के लइका नियर रहल. उनके देखते सगरो देखबइया घबरा गइलन. अचरज देखि के सव केहू बाउर भइले के अंदेसा से भरि गइल. उनकर महतारी तीन दिन बादे दसमी के दिन अपने दाई चुनिया के हाथ उनके सौंप के ओहके ससुरारी भेज दिहली अउर अगिले दिन दुनिया छोड़ के स्वर्ग कऽ राहि धइलीं. चुनिया बहुते लाड-पियार से लइका के पलली-पोसली लेकिन पॉंच बरिस कऽ उमर होत-होत उहो दुनिया छोड़ दिहली. लइका अब अनाथ हो गइल.

स्वामी नरहर्यानन्द जी कऽ नजर एह लइका पऽ पड़ल. ऊ एहकर नाम ’रामबोला’ रखि के अपने साथे अयोध्या जी लेके चलि गइलन अउर पाले-पोसे लगलन. स्वामी जी इनके पढाईओ-लिखाई कऽ व्यवस्था कइ दिहलन. तेज बुद्वि कऽ भइले के कारन जल्दिये तमाम विद्या कऽ जानकार हो गइलन. काशी में जाइके बेद-शास्त्रो कऽ भरपूर पढाइ कइ लिहलन. पढाई पूरा कइले के बाद स्वामी जी कऽ आज्ञा लेइके अपने गॉंव राजापुर लवटि पड़लन लेकिन गॉंव में घर-दुआर अउर परिवार कऽ नास हो गइल देखि के दुखी भइलन. गॉंव में अपने परिवार जन कऽ यादगार कायम रखि के रहे लगलन अउर गॉंव बासिन के ’राम-कथा’ सुनावे लगलन. सम्बत् 1583 में रत्नावली नाम के एक सुन्दर-सुशील लइकनी से बिआह हो गइल. रत्नावली बड़ी विद्वान रहली. दूनो जनी सुख से गांव में रहे लगलन. एक बार रत्नावली कऽ भाई उनके अपने साथे माइके लिया के चलि गइलन. रामबोला से वियोग सहि ना गइल. ऊ पीछे लागल ससुरारी चलि गइलन. रत्नावली के उनकर एतना लगाव नींक नाही लागल. ऊ उनके धिक्कारत कहि पड़ली –
अस्थि चर्ममय देह मम, तामे ऐसी प्रीति.
तैसी सो श्री राम मह होत न तब भव भीति..
यानी की हाड़-मास कऽ हमरे देही से जइसन लगाव आप कइले बाड़ी तइसही जे श्री राम जी के पांव से लगवतीं तऽ कल्यान हो जात. एह संसार के भय से छुटकारा मिल जात, मतलब मोक्ष हो जात.

रत्नावली कऽ ई बचन सुनते रामबोला कऽ आंखि खुलि गइल. बोली कऽ एतना असर भइल की ऊ तुरते प्रयाग चलि पड़लन अउर साधुवेष धारन कइ लिहलन. राम भक्ति में आपन पुरहर धियान लगा दिहलन. तीरथ-ब्रत, धियान अउर पूजा-पाठ में लगल रहले से काक भुशुण्डिजी अउर हनुमान जी कऽ दर्शन पवलन. हनुमान जी कऽ आदेश ’रामचरित मानस’ लिखे कऽ पवलन जवने से संत तुलसी दास के नाम से इनकर प्रसिद्धि भइल.

सम्वत् 1631 के रामनवमी के दिन से ऊ ’रामचरित मानस’ कऽ लिखाइ सुरु कइलन, 2 बरिस 7 माह 26 दिन बाद सम्वत् 1633 के माघ अँजोरिया पक्ष में रामविवाह के दिन पूरन कइलन. रामचरितमानस एक अइसन किताब हउए जवना के सगरो हिन्दू बड़े चाव से अपने घरे रखेलन अउर बॉंचेलन. तुलसीदास जी रामचरितमानस के बालकाण्ड में खुदे लिखले बाड़न –
सम्वत् सोलह सौ इकतीसा, करऊँ कथा हिरपद धरि सीसा..

तुलसीदास जी हनुमान जी कऽ दर्शन कइसे पवलन एहकर कहनी एह मतिन सुने के मिलेला –
तुलसीदास जी रोजाना शौच खातिर गंगापार जायें. लवटानी में लोटा में बचल पानी एक पेड़े के जड़ में गिरावत आगे बढि जायं. पानी पवले से पेड़ के हरिआई में कमी ना आवे. ओह पेड़ पऽ एगो प्रेत कऽ बास रहे. प्रेत पानी गिरवले के क्रिया से तुलसीदास जी से प्रसन्न होई के उनके समने प्रकट भइल अउर कहलस कि ’हम तुहसे खुश हईँ तूँ जवन वर चाहऽ तवन हमसे मांग. तुलसीदास जी कहलन की हमके रामजी कऽ दर्शन करा द. प्रेत कहलस की हम ई तऽ ना करा पाइब लेकिन एक उपाय हऽ. हनुमान जी दर्शन करा सकेलन. तुलसीदास जी कहलन की हनुमानजी कइसे मिलिहे? प्रेत बोलल – मन्दिर में रोज साँझे राम कथा होले ओहिजे हनुमान जी नियम से कोढी कऽ भेष बना के आवेलन. कथा सुरु भइले के सबसे पहिले आवेलन अउर समाप्त भइले पऽ सबसे बाद में जालन. ओहीजे जाइके उनही से प्रार्थना करऽ. उहे रामजी कऽ दर्शन करा सकेलन. तुलसीदास जी कथा वाले जगही पऽ पंहुचि के हनुमान जी के गोडे़ पऽ गिर पड़लन अउर दर्शन करावे खातिर प्रार्थना करे लगलन. हनुमान जी कहलन कि चित्रकूट जा. उहवें भगवान श्री रामजी कऽ दर्शन होई. तुलसीदास जी चित्रकूट जा पहुंचलन. जंगल में दुइगो राजकुमार के एक हिरन क पीछा करत देखलन. देखत-देखत राजकुमार आंखि से ओझल हो गइलन. ओहमें से एक सांवर रहलन अउर दूसर गोरहर. आंख से ओझल होते हनुमान जी प्रकट होइ के तुलसीदास जी के बतवलन की दूनो राजकुमारे राम-लक्ष्मण रहलन. तुलसीदास जी बहुत पछिताए लगलन. हनुमान जी धीरज धरवलन अउर कहलन कि पछिता जिन. एकबार फिर दर्शन होई. ओह समय हम इशारा कई के बता देब. सम्वत् 1607 के मौनी अमावस्या के दिन तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पऽ बइठि के चन्दन घिसत रहलन. ओही समय लइका के रुप में भगवान श्री रामचन्द्र जी अइलन अउर चन्दन मांगि के लगावे लगलन. ठीक ओही समय ब्राह्यण कऽ रुप धई के हनुमान जी आइ गइलन अउर गावे लगलन-
चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर.
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रधुबीर..

ई सुनते तुलसीदास जी पहिचान लिहलन अउर भगवान कऽ चरन पकड़ि लिहलन.
नित्य भगवान श्री रामचन्द्र जी कऽ भक्ति में लगल रहले से उनके अन्दर पारलौकिक शक्ति कऽ बढोत्तरी होत रहे. अनेक किताबन कऽ रचना कइलन जवना में रामचरितमानस, कवितावली, दोहावली, गीतावली, विनय पत्रिका, कवित्त रामायण, वरवै रामायण, रामलला नहछू, रामाज्ञा, कृष्णगीतावली, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, राम सतसइ, रामनाममणि, रामशलाका, हनुमान चालिसा, हनुमान बाहुक, संकट मोचन, बैराग्य संदीपनी, कोश मन्जूषा, आदि बहुते चर्चित हउअन. एह काव्यन कऽ रचना कइ के तुलसीदास जी मनइन कऽ बहुते उपकार कइले हउअन जवना से हम सब केहू उनकर ऋणी हईं. सबकर भलाइ करत-करत ऊ एह दुनिया से 126 बरिस के उम्र में सावन अंजोरिया सप्तमी के हमेशा हमेशा खातिर विदा ले लिहलन.

संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर.
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यों शरीर..


इं॰ राजेश्वर सिंह,
मूल निवास – गोपालपुर, गोला, गोरखपुर.
हाल फिलहाल – पटना में बिहार सरकार के वरिष्ठ लोक स्वास्थ्य अभियन्त्रण सलाहकार
उत्तर प्रदेश जल निगम से अधीक्षण अभियंता के पद से साल २०१० में सेवानिवृत
हिंदी में अनेके किताब प्रकाशित, भोजपुरी में “जिनगी क दूब हरियाइल”, आ “कल्यान क जुगति” प्रकाशित. अनेके साहित्यिक आ सांस्कृतिक संस्था से सम्मानित आ संबद्ध.
संपर्क फोन – 09798083163, 09415208520

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