बतकुच्चन ‍ – ७१


सास दुखे अलगा भइनी ननद पड़ली बखरा. समय का साथे बहुत कुछ बदल जाला आ कुछ ना बदले. पहिले परिवार में संयुक्त परिवार होखत रहवे जवन टूट के एकल परिवार होत गइल आ अब हालत अतना खराब बा कि दू बेकत के परिवारो में खटपट होखत रहत बा. पहिले बड़का परिवारन में खटपट होखला पर केहु दुसे त कह दिहल जाव कि जेकरा नोहे ना रही से बखोरी का. भले मन ही मन कहल जात होखे कि आपन धियवा नीमन रहीत त बिरान पारीत गारी? बात सही बा. अगर आदमी में, परिवार में आपन दोस ना होखे त दोसर केहू कवन अछरंग लगा पाई, कवन बात ला गारी दी? संयुक्त परिवार त टूटत गइल बाकिर राजनीति में उलटा हो गइल. एक पार्टी के सरकार के जमाना बीतल त गठबन्हन के जमाना आ गइल. पहिले मरद मेहरारू में गठबन्हन होत रहुवे अब तरह तरह के पार्टियन में होखत बा. जे वर पक्ष जइसन बा से ओकरा बाद दूहे लागत बा सरकारी धन के. गाय भईंस के दूध दूहे से पहिले त पेन्हावल जरूरी होत रहे सरकार के दुहला खातिर पेन्हवलो के जरूरत ना पड़े. काहें कि सरकार त हमेशा पेन्हाइले रहेले ! बाकिर आजु त हम ओह दुख के चरचा करे चलल बानी जवन अलग बिलग भइला का बादो झेले के पड़ेला. काहें कि हालात कतनो बदल जाव हालात उहे रह जाला घुमा फिरा के. दीदी से जान बचावे खातिर दादा के हाथ थामल गइल बाकिर अब दादा अपना दादागिरी पर उतरल चाहत बाड़ें. आ एह बीच जे बीच बचाव करे में माहिर रहल ओह दादा के त धरनी पर राख दिहल गइल. ऊ दुरे से देखीहें कुछ कह ना पइहें. पता ना आपसीओ मुलाकात में कह सकेलें कि ना . काहे कि शायद ओह पद पर होखे वाला हर भेंट मुलाकात के, बातचीत के ब्योरा राखल जाला. बाकिर ना त दुख सास से रहल ना दुख ननदिआ से होखे वाला बा. असल दुख त अपना सुभाव का चलते बा जे ठीक नइखे रहि गइल. जे एह कमी के देखावल चाहत बा ओकरा के सीधे दुश्मन मान लिहल जात बा आ ओकरा के कवनो तरीका से नीचा देखावे के कोशिश में लाग जात बा लोग. मानत बानी कि अंगुरी देखावे वाला का अपने तरफ तीन गो अगुरी घुमल रहेला बस तर्जनी सामने वाला के देखावल जाला. एह तर्जनी देखवला के मकसद होला सामने वाला के बरजल, बरजे के, मना करे के जवन होखत बा से ठीक नइखे होखत बतावे के. बाकिर तर्जनी के एह तर्ज से बहुते लोग नाराज हो जालें. उनुकर शिकायत होला कि आपन फूला नइखे लउकत हमार माढ़ा देखावत बाड़! आ एह बतकुच्चन में कुछ अइसनो बरुआ बाड़ें जे बिना हवा के पीपल डोले बिना बात के बरुआ बोले वाला अंदाज में कुछ ना कूछ बोलत रहेलें भले उनुकर अपने लोग उनुका के बेर बेर बरजले होखस. कहे वाला त इहो कहेलें कि आन्हर कुकुर बतासे भूंके. जब नजर नइखे आवत त पतियो सरसरइला पर इहे लागत होखी बेचारा के केहू आवत बा आ ओकरा के धिरावल, सचेत कइल जरूरी बा. एहसे कुकुर भूंके त समुझीं कि कवनो अनचिन्हार भा बाकल आदमी आवत बा. सावधान रहला में कवनो हरजा ना होखे. बाकिर भूंके आ फेंकर में फरक होला. कुकुर के फेंकरल बहुते खराब मानल जाला काहे कि ऊ कवनो अपशकुन के अनेसा बतावेला. एह बीच बाकल के बोकला छोड़ावे के मन हो गइल. बाकल मतलब कि पागल जइसन, पागल ना. आ बोकला कवनो चीझु के छिलका के कहल जाला. एही से कूछ लोग खीसी कहियो देला कि हमरा से अझूरा जनि ना त तोहार बोकला छोड़ा देब. आ जब केहु अइसे धमकावेला त हम ओकरा से अझूराईं ना. धीरे से घसक जाई लें. काहे कि हमार मानना ह कि बुड़बक बूझावे से मरद.

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