बतकुच्चन ‍ – ७३


गोल के बात का निकलल पिछला बेर कि माथा गोल हो गइल. मन में तरह तरह के सोच आपन आपन गोलबन्दी करे लागल. एह में गोलियात तीन गो शब्द सामने आइल गोल, गोला आ गोली. गोल कवनो समूह के कहल जाला. ई गोल खिलाड़ियन के होखे, होरिहारन के होखे, कवनो बाबा के होखे बा राजनीतिक विचार के होखे. एह गोल आ अंगरेजी के गोल में बहुते फरक होला. अंगरेजी के गोल लक्ष्य के कहल जाला ऊ लक्ष्य फुटबाल भा हॉकी जइसन खेल के होखे भा जिनिगी के मकसद. बिना गोल के जिनिगी सफल ना होखे. बाकिर हमार गोल त बा भोजपुरी शब्दन पर बतकुच्चन करे के से ओहिजे लवटल जाव. गोल गोला गोली में गोली बन्दूक भा पिस्तौल से निकलेले. गोली अउरियो तरह के होले. लइकन के खेले वाला गोली खातिर टई शब्द बेसी प्रचलित बा, डाक्टर के दिहल गोली ला टैबलेट. अब ई मत कहीं कि टैबलेट त अंगरेजी के ह ओकरा के भोजपुरी में काहे लिहल जाव त जानत चलीं कि अंगरेजी आजु अंगरेजी एह ले बिया कि ओकरा हर भाषा के शब्द पचावे के ताकत बा. दुनिया भर के भाषा से लिहल शब्दन के उ अपना में समवले जाले. पिछला साल नाहियो त दू हजार शब्द दोसरा भाषा से अंगरेजी में आक्सफोर्ड डिक्शनरी शामिल कर लिहलसि जवना में करीब दू सौ शब्द हिन्दुस्तानी बाड़ी सँ. एहसे रेलगाड़ी के लौहपंथगामिनी कहला के ना त कवनो जरूरत बा ना कहे के चाहीं. बहुते शब्द भोजपुरी में पहिले से चलन में बाड़ी सँ आ हर दिन कुछ ना कुछ नया आवते जात बा. मोबाइल हर पाकिट में आइल त हर भाषो में घुस गइल. टेलीफोन के त दूरभाष बन गइल बाकिर मोबाइल के जेबी दूरभाष कहल बेजरूरत होखी. फेर बात एने ओने बहक गइल. लवटल जाव गोल गोला गोली पर. गोली त अबके थोड़ देर पहिले छूटल ह से चलीं अब गोला के बात कर लिहल जाव. गोला लाल साँढ़ो के कहल जाला बाकिर सबसे बेसी चलन में ई शब्द बाजार खास कर के थोक बाजार खातिर इस्तेमाल होला. सड़क किनारे के छोटहन बाजार चट्टी कहल जाला त बड़हन बाजार गोला. अब ई गोला कइसे बनल से त हम ना जानीं बाकिर पटना के गोलघर से एकर कवनो संबंध ना होखे के चाहीं. हालांकि पटना के गोलघर गोदामे खातिर बनल रहे आ शायद अबहियों गोदामे का तरह इस्तेमाल होला. बाकिर गोला सामान के समूह कम दूकानन के समूह बेसी होला. बाजार में दूकान होखे कवनो जरूरी नइखे बाकिर गोला में दूकान होखल जरूरी होला. राहे बाजार लागल हाट के गोला ना कहल जाव. जवना जगहा कई एक दूकान हो जा सँ तहवाँ के गोला कहल जात रहे. अब बड़की शहरन में ई मॉल हो गइल से अलग बात बा. गोला बेमारियो खातिर कहल जाला जब पेट में कवनो गोल बेमारी बन जाव आ बढ़े लागे त कहल जाला कि पेट में गोला हो गइल. ई गोला तोप के गोला से कम खतरनाक ना होखऽ सँ. जब फाटी त बहुते कुछ नुकसान करा जाई. अइसने गोला कबो कबो पित्त का थैली भा किडनी में बने लागेला बाकिर ऊ छोट होला से ओकरा के पथरी, पत्थर जस, कहल जाला कि पेट में पथरी हो गइल बा. एह गोला गोला गोली के चक्कर में हो सकेला कि रउरा शहर के गोलम्बर याद आवत होखे काहे कि अधिकतर शहर में कवनो ना कवनो मशहूर गोलम्बर जरूर होला. बाकिर गोलावट भा गोलवट रउरा धेयान में ना आवत होखी. एक त ई बहुते बदनाम शब्द ह आ जे एकरा गोल में आइओ जाला उहो ना सकारे भा ना जनावल चाहे कि ऊ गोलावट का फेर में पड़ गइल बा. जब दू आदमी के बिआह एक दोसरा के बहिन से हो जाला त कहल जाला कि ई गोलावट भा गोलवटिआ बिआह ह. बाकिर सामाजिक नजरिया से गोलवट बिआह खराब मानल जाला एहसे एकर बेसी चरचा ना होखे. अब बतकुच्चन के गोल में ई घेरा के सामने आ गइल त का कइल जाव. खैर, खून, खाँसी, खुशी, बैर, प्रीत, मधुपान / रहिमन दाबे ना दबे जाने सकल जहान.

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4 thoughts on “बतकुच्चन ‍ – ७३

  1. पिछिलका बेर लिखइबे ना कइल टिप्पनी। आज देखऽतानी लिख के।

    हमनी किहाँ डक्टर के दिहल गोली के गोटीओ कहल जाला। टैबलेट सब्द ना टबलेट कहल जाला। मदाम से मैडम अंगरेजी हो गइल। सब्द के रूप भासा के अनुसार हो जाला, चाहे ऊ कवनो भासा के होखे।

    • चंदन जी,

      अगर कबो कवनो कारण से टिप्पणी ब्लॉक होखत होखे त रउरा, भा सगरी पाठक,anjoria@outlook.com पर ईमेल भेज सकीलें. तय मानीं कि अपना पाठकन के ईमेल के हमरा तरफ से कवनो दोसर इस्तेमाल ना होखे.

      टिप्पणी ला धन्यवाद.
      ओम

  2. बहुते सुन्नर बचकुच्चन बा। पहिला सांस (साँस) में पूरा पढ़ि गइनी हँ…फेर दूसरा बेर आराम से पढ़त एकर मनन कइनी हँ।।
    एगो बात गोला के एगो अउर मतलब होला…गोलिआवल वस्तु..जइसे ऊन के गोला..भाँगि के गोला..त छोट रहे त गोली अउर बड़ रहे त गोला।
    बाजारी वाला गोला..जवन गोलघर गोरखपुर (पटना आदि) में भी बा..इहाँ हमरी खेयाल से जवन रउआँ गोल के पहिला सेंस बतवनी हँ…जइसे आजकल जुनाव आवते नेता लोग आपन-आपन गोल बाँधल सुरु क देता लोग अउर जनता भी बिना समझले-बुझले गोलियात जलि जातिया…उहे अरथ बा। यानि दुकानन के गोल (समूह) की संदर्भ में गोला चले लागल।।
    कई बेर एइसन होला की लोग अपनी सरलता खातिर अउर भाषा भी अपनी प्रवाहता खातिर कुछ सब्दन के लुप्त क देले चाहें कवनो सब्द ही गोलियात जाला…जइसे लइका के केंद्रीय अरथ ह…कम उमर के आदमी..पर जब लोग अपनी लइका के भी लइका (बेटा) कहे लागल त एकरी अरथ में विस्तार होखे लागल…खैर सब्दन के माया त अपरम्पार बा…हम अब खुदे उलझि गइल बानी की का कहल चाहत रहनी हँ अउर का कह रहल बानी।
    चंदनजी, हो सकेला की डक्टर की गोली के गोटी कहल जात होखो, हमरी इहाँ गोली (दवा के बटी, टबलेट) के गोटी ना कहल जाला, हँ…लोग-लइका माटी-ईँटा, पत्थर आदि की गोटी से कइगो खेल खेलेला। इ गोटी गोट से बनल बा। जइसे भारत से भारतीय बनल फेर ओमें ईय प्रत्यय लगा के भारतीयता बनि गइल।
    खैर ओपीजी के बतकूच्चन सुनले से कान ना पाकेला…ए से त भोजपुरिया मिठास की साथे ग्यानवर्धन होला।। जवनेगाँ कवनो पट्टीदार अपनी पट्टीदार की घर में होत रहल बतकुच्चन के कान दे के सुनेला ओहींगा..हमहुँ अँजोरिया की बतकुच्चन पर बारीकी से कान देनी।
    लिखत रहीं।। सादर।।

    • क्षमा करबि सब…हम खुदे गोलिया गइल बानी..कइ जगे वर्तनी के अशुद्धि हो गइल बा…एही के कहल जाला जल्दी के काम शैतान के होला…जब हम ए बतकुच्चन के आराम से दु बेर पढ़ि सकेनी त टिप्पनियो लिखत में तनि धीरज रखले रहतीं…अगुताइल ना रहतीं, जल्दिआइल ना रहती त सायद एतना अशुद्धि ना भइल रहित। भारत में ईय प्रत्यय लागि के भारतीय अउर ओमे ता प्रत्यय लागि के भारतीयता।। खैर चलिं.जवन होला अच्छे होला….अउर जात-जात हम आवे वाला चुनाव खातिर आपन मंसा जाहिर करतानी…अउर रउआँ से बिनती, प्रार्थना…अनुरोध ना..आग्रह ना…मतलब प्रार्थना, बिनती…रउरी ऊपर बा..ध्यान देईं चाहें ना-
      राम राम..काका, काकी, भइया, भउजी, ईया, नानी अउर सब भारत के परानी,

      बुरबकई मति करS, तनि तू हूँ हुँसियार बनS,
      पढ़ाइए-लिखाइए ले मति रहS, देसवो पर गुमान करS, पहिले मुगल, फेरु अंगरेज, आजु लूटि रहल बाने सन रंगरेज,
      हम इ नइखीं कहत की तूँ अपने घर-परिवार, समाज, देश से घात करS,
      हम त इ कह रहल बानि की ए रंगरेजन के जियल काल करS, फेरू से माई भारती के आजाद करS,
      देशभक्ति, समृद्धि, गौरव के तिरंगा फहरावS, हमार कहल मानS, ए बेरी मोदी के प्रधानमंत्री बनावS।।
      जय हिंद।।

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