भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” – 5

– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

अबले जवन पढ़नी ओकरा आगे …)


घर का फोन में एसटीडी रहे. पूजा नम्बर मिलावे लगली. दूनो बच्चा दूर पलंग पर बैठ के शून्य में निहारे लगले. विपत्ति महसूस करेके क्षमता बच्चन में बड़कन से अधिके होला. बहुते कोशिश के बादो अर्चना के फोन ना लागल. तब ऊ अभिषेक के फोन मिलावे लगली. दूसरे कोशिश में घंटी बाजे लागल उनका मोबाइल के. हलो के आवाज सुनके हड़बड़ाइ के बोलली – ‘हम पूजा हईं पटना से.’
ओने से आवाज आइल – ‘का हाल बा पूजा जी?’
– ‘हाल ठीक नइखे. प्रोफेसर साहेब अस्पताल में भर्ती बानी. समझ में नइखे आवत का करीं.’ एके सांस में पूजा कह भइली.
– ‘प्लीज, एहतरे घबड़ाईं मत. धीरज धरीं. बताईं त उहां के का भइल बा, आ कब से अस्पताल में बानी.’
– ‘समस्तीएपुर में पेट में दर्द होत रहे. हम उहां के लेके पटना आ गइनी. आवत-आवत रात हो गइल. सारा रात उहां का बेचैन रनी हं. आज अस्पताल ले गइनी हं. भाग्य से डॉ.तिवारी मिल गइले ह. ऊ अपना अन्डर में भर्ती कर लेले बाडऩ. हम घरे आ के फोन कर तानी.’
– ‘कवनो टेस्ट वगैरह भइल ह?’
– ‘टेस्ट त बहुत लिखले बाडऩ. खूनो निकाल ले गइल ह सब. यूएसजी करे कहत रले ह.’
– ‘पेटो फूलल बा.’ पुछलन अभिषेक.
– ‘हँ.’
अभिषेक के हूं सुनाइल. फिर कहलन – ‘ठीक बा. अब फोन रखीं. हम डॉ.तिवारी से बात कर तानी. रउरा कब जायब अस्पताल?’
– ‘सँझिया छह बजे.’
– ‘डॉक्टर साहेब से मिल के आएब.’ कह के लाइन काट दिहलन अभिषेक.
शाम के पूजा अस्पताल जाये खातिर तइयार भइली त बचवो तइयार हो गइलन स. फिर ठीक भइल कि माईओ चलिहन. अस्पताल पहुंच के देखल सब जुगेश्वर खाट पर बइठल बाडऩ. सोनी-मोनी के देख के उनका चेहरा पर मुस्कान आ गइल. हाथ बढ़वलन ओकनी का तरफ. दूनो चढ़ के बिछावन पर बइठ गइली स. सामने टूल पर मां बइठली. पूजा खड़े रहस. मां ही पुछली – ‘कइसन लागता?’
– ‘थोड़ा आराम बा. दूगो सुई दिहले ह.’
पूजा पुछली – ‘खून टेस्ट के रिपोर्ट आइल बा?’
– ‘अरे एतना जल्दी रिपोर्ट थोड़े आई. आज त खून निकलबे कइल ह सब. काल्ह सुबह बतावत रल खाली पेट यूएसजी होई. सारा रिपोर्ट अइले पर असली इलाज शुरू होई.’
पूजा सर पर हाथ रखली. कहली – ‘ना बुखार त नइखे बुझात.’
जुगेसर कहले – ‘बुखार खातिर कैलपोल देले रले ह.’ पूजा असली बात ज्यादा देर ना दबा पवली – ‘हम अभिषेक से बात कइनी ह.’
– ‘ओसब के डिस्टर्ब करे के का जरूरत रल. अरे हम ठीक बानी.’
मां बात कटली – ‘अरे बेटा, आप के त ठीक देखही के पड़ी. लेकिन उहो त डॉक्टर बा. कुछ अच्छे नु बताई.’
मां का बोलला से पूजा के हिम्मत मिलल. ऊ कहली – ‘डॉ.तिवारी त अभिषेके क चलते आपके जानत बाडऩ न. अभिषेक कहलन हं ऊ उनसे बात करिहन.’
तभी नर्स आके कहलस – ‘प्रसाद जी के फेमिली के कौन हैं? डॉ.तिवारी से मिल के जाइएगा.’
– ‘कहां है डॉ.साहब?’
– ‘साढ़े सात बजे आयेंगे.’ नर्स बताके आगे बढ़ गइल.
सात बजे का करीब में सोनी-मोनी के लेके मां चल गइली. पूजा अकेले रह गइली. जुगेसर के बइठल ना जात रहे. लेट गइले. पूजा उनका सर पर हाथ फिरावे लगली.
डॉ.तिवारी ठीक साढ़े सात बजे पहुंच गइलन. पूजा खड़ा होके प्रणाम कइली. जुगेसरो बइठे के कोशिश करे लगलन. लेकिन डॉक्टर उनके लेटल रहे के कहलन. पेट पर हाथ से दबा-दबा के देखलन. एक बार पुछलन – ‘कइसन महसूस होता?’
– ‘थोड़ा ठीक बा.’ जुगेसर कहलन.
– ‘काल्ह सुबह कुछ खाएब मत. एगो टेस्ट होई.’
पूजा के इशारा से बुला के डॉक्टर के कमरा के तरफ जाये लगलन.
कुर्सी पर बैठ के पूजा के सामने बैठे के इशारा कइलन. कहे लगलन – ‘डॉ.अभिषेक फोन कइले रले ह. देखीं प्रोफेसर साहेब के अवस्था का बारे में अभी कुछ कहल ना जा सकेला. काल्ह यूएसजी का बादे पता चली. यदि एसाइटिस फ्लूड मिली त फिर ओकर अलग से टेस्ट करावे के पड़ी. खैर घबड़ाए के कवनो बात नइखे. आजकल अइसन बहुत केस आ रहल बा.’
पूजा का कहस. बड़ा कोशिश कर के बोल पवली – ‘हम का समझतानी. आपे क हाथ में बा. जइसन अच्छा समझीं कइल जाव.’
– ‘हाथ में त केवल ऊपर वाला का बा. हमनी का त बस उनके इच्छा अनुसार आपन-आपन काम करतानी स.’
न जाने काहें पूजा के मन खराब हो गइल. ऊ उठ के हाथ जोड़ली आ बाहर जाये खातिर मुड़ली. जुगेसर का पास जाए के पहिले कइएक सेकेंड खड़ा हो के मन मजबूत कइली.

25 तारीख के क्रिसमस रहे लेकिन पूजा खातिर सब कुछ अस्पताल हो गइल रहे. डॉ.तिवारीओ रहस. टेक्नीशियन के कुछ बतवले. एगो शीशी में उनका पेट से निकलल पानी रख के टेस्ट खातिर भेज देहल गइल. अस्पताल का रास्ता में एगो दुकान पर केक बिकात रहे. लाइटो-साइट सजावल रहे. एगो केक खरीदली पूजा. शाम के मुलाकात का समय दूनो बेटे के लेके केक का साथ अस्पताल पहुंचली. जुगेसर बच्चन खातिर उठ के बइठले. दूनों एक साथ कहली स – ‘हैप्पी क्रिसमस पापा.’
– ‘सेम टू यू माई ब्वाय.’ जुगेसर जवाब देके दूनो के अपना दूनो बांह में पकडऩ. पूजा खड़ा होके मुस्कुरात रहली. फिर केक काटके एक दूसरा के मुंह में खिलावल. सभे जइसे भुला गइल कि अस्पताल में बा लोग. ऊ त नर्स आके कहलख कि समय खतम हो गइल मुलाकात के, तब जाके पूजा जुगेसर के हाल-चाल पुछली.
एक-एक दिन करके 28 दिसम्बर हो गइल. आज ई रिपोर्ट त काल्ह ऊ टेस्ट. भाग-दौड़ में पूजा के त दिनो के खयाल ना रहे. सुबह नहा के कंघी करत रहली कि फोन के घंटी बाजल. ऊ भाग के फोन उठवली. ओने अर्चना रहस.
– ‘का हाल बा पूजा.’
– ‘तहरा आज टाइम मिलल ह?’ बिना कुछ सोचले पूजा उलाहना दिहली.
– ‘अभिषेक से त रोज हाल चाल मालुम होते बा.’
– ‘तबे हमरा से का पूछ तारू?’ पूजा के आवाज आउर कठोर हो गइल.
– ‘ना हम फोन कइनी ह कि अभिषेक काल्ह पटना जइहन.’
अभिषेक आव तारे सुन के पूजा के सारा अभिमान टूट गइल. ऊ कहली – ‘सांच? धन्यवाद दीदी. बहुत-बहुत धन्यवाद.’
ओह दिन अस्पताल जा के जुगेसरो के बतवली. उनको बड़ा अच्छा लागल. के बा ओ लोग के. संबंधी बोल के अभिषेके आ अर्चने त बा. यदि अभिषेक आवतारे त जरूर कुछ अच्छे होई सोच के दूनो जाना के मन हल्का हो गइल.

दिल्ली से पटना आवे वाला प्लेन शाम चार बजे पटना पहुंचे आ आध घंटा बाद फेर दिल्ली लवट जाव. 29 तारीख के ऊ फ्लाइट करीब 45 मिनट लेट से पहुंचल. डॉ.अभिषेक के लेबे खातिर डॉ.तिवारी आपन गाड़ी भेजले रहस. एयरपोर्ट से सीधा अस्पताल पहुंचलन. दूनो डॉक्टर अब तक के सारा रिपोर्ट देखल लोग. शंका के कवनो गुंजाइश ना रहे कि पाचन नली में मैलिगनेंसी बा. अब निर्णय ई लेबे के रहे कि कवन स्टेज के बा आ आपरेशन कइल जा सकऽता कि ना.
डॉ.अभिषेक पुछलन – ‘आपके अस्पताल में अंकोलोजी के बैकअप कइसन बा?’
डॉ.तिवारी कहलन – ‘अहिरिन अपना दही के खट्टा ना कहे.’
डॉ.अभिषेक मुस्कुरा दिहलन – ‘लेकिन ई त घर के बात बा. उनका के दिल्ली ले जाइल जा सकऽता का?’
– ‘बहुते कमजोर हो गइल बाडऩ. साथ में हमरा लागऽता मैलिगनेंसी फइल रहल बा.’
– ‘अइसन करीं ना काल्ह सुबह एगो अंकोलाजिस्ट के बुला लीं. एक बार सारा कुछ देख के निर्णय लेहल जाव. तब ना होई त दिल्ली ले जाइब.’
डॉ.तिवारी संगे-संगे फोन मिलावे लगले.
शाम के अस्पताले में पूजा, मां आ सोनी मोनी से डॉ.अभिषेक के मुलाकात हो गइल. ओ लोग के आग्रह देख के अभिषेक डॉ.तिवारी किहां ना जाके ससुराल गइलन.

30 दिसम्बर
सुबह आठ बजे कांफ्रेंस रूम में चार डॉक्टर बइठल रहस. डॉ.तिवारी, डॉ.अभिषेक के अलावा अंकोलोजिस्ट डॉ.श्रीवास्तव आ सर्जन डॉ.श्रीवास्तव आ डॉ.सुहेल. एक-एक करके सब लोग रिपोर्ट देखल आ अपना-अपना नोट पैड पर नोट लेत गइल.
डॉ.श्रीवास्तव शुरू कइलन – ‘ई केस काफी कंप्लीकेटेड हो चुकल बा. मैलिगनेंसी इज नाट कंफाइंड दू ए स्पाट आर टू गिवन एरिया.’
डॉ.सुहेल बोललन – ‘लेकिन एक्स-रे/एमआरआई का रिपोर्ट बता रहा है कांसेंट्रेशन पैनक्रियाज में है. ह्वाई शुड वी नाट गो फार इट्स रिमूवल फस्र्ट देन केमो केन बी ट्राइड.’
डॉ.श्रीवास्तव के उनकर बात कुछ ज्यादा अच्छा ना लागल. कहलस – ‘बस इहे त आप सब के समस्या बा. देखत भइल कि काटे खातिर तइयार. अरे भाई ई कवनो आर्डिनरी ट्यूमर थोड़े बा. आ सबसे बड़ समस्या बा पेशेंट के शारीरिक हालत. ब्लड रिपोर्ट देखल जाव – पेशेंट में कतना कम बा. एह हालत में त आपरेशन सोचले ना जा सके. एट बेस्ट एगो केमो देके देखल जा सकता. यदि पेशेंट के रेस्पांस अच्छा रहल त आपरेशन के सोचल जा सकऽता.’
डॉ.अभिषेक एक बेर फेर से सारा रिपोर्ट देखे लगलन. करीब 10 मिनट बाद ऊ सर उठाके डॉ.तिवारी के ओर देखलन. फिर कहे लगलन – ‘सारा कुछ देख के हम डॉ.श्रीवास्तव से सहमत बानी. काहें कि पेशेंट के हालत अइसन नइखे कि उनका के कहीं ले जाइल जाव भा आपरेशन कइल जाव.’
फेर डॉ.तिवारी के ओर मुड़ के कहलन – ‘केमो खातिर कइसन व्यवस्था बा आपके यहां?’
– ‘अरे भाई, बिहार के प्रीमियर मेडिकल कालेज ह. का डॉ.श्रीवास्तव?’
– ‘बिल्कुल-बिल्कुल.’
ठीक भइल दोसरा दिन यानी 31 दिसम्बर के पहला केमो दीहल जाई. डॉ.अभिषेक के 30 के ही लवटे के रहे लेकिन पूजा के देख के ऊ ठीक कइले 2 दिन बाद जाए के. लेकिन ई शर्त पर कि ऊ डॉ.तिवारी के साथ रहिहन.’

31 तारीख 1999 दिन शुक्रवार
केमो चलत रहे जुगेसर के. पास के मस्जिद से जुमा के नमाज के आवाज आवत रहे. डॉ.अभिषेक आ डॉ.श्रीवास्तव पास में खड़ा रहे लोग. आधा बोतल पानी अन्दर जा चुकल रहे. हठात् जुगेसर का हिचकी आइल. दूनो डॉक्टर एक साथ उनका ओर झुकल लोग. सांस के गति में परिवर्तन लक्ष्य कइल सब. दूनो जाना एक दूसरा के देखलस. केमो रोक देहल लोग. ईसीजी ग्राफ की ओर देखल लोग. करीब-करीब ठीक रहे. जुगेसर धीरे से कुछ कहलन. जूनियर डॉक्टर नर्स से पैन लगावे के कहलन. डॉ.श्रीवास्तव बाहर आके फोन कइलन, आईसीयू में जगह बनावे के. दिन के तीन बजे जुगेसर के आईसीयू में ले गइल गइल. ई सारा प्रक्रिया में पूजा बाहर बइठल रहस. उनका समझे के बाकी ना रहल कि खबर अच्छा नइखे. लम्बा सांस लेके कहली – ‘का भगवान?’
आईसीयू में जाके डॉक्टर अभिषेक खड़ा भइलन. जुगेसर के सांस लेबे के कठिनाई होत रहे. आईसीयू के डॉक्टर आक्सीजन मास्क चढ़वलस नाक पर. थोड़ा देर बाद सांस सामान्य हो गइल. तबहीं डॉ. तिवारीओ आ गइलन. दूनो डॉक्टर बात करके पेट से पानी निकाले के ठीक कइल लोग. पानी निकलला के बाद जुगेसर काफी हल्का महसूस करे लगले.
शाम के सिर्फ पूजा जा पवली आईसीयू में. जुगेसर बढिय़ा से बात कइलन. बतवलन सब आज रात के यदि ठीक रही त काल्ह आईसीयू से निकाल दीहल जाई. पूजा लवट गइली. घर में कोई कोई से कुछ ना पूछे. समय से लड़े के क्षमता केकर बा. जइसे घर लौटत पथिक तूफान में फंसल होखे वइसने हालत रहे. सबका तूफान रुके के इन्तजार रहे.
रात ना बीतल. रात एक बजे अस्पताल से फोन आइल. पेशेंट के हालत ठीक नइखे. आवे के कहल सब. पूजा मां के जगवली. बच्चा ना जाग जा सँ सोच के धीरे से निकल गइली. रास्ता का मोड़ पर एगो रिक्सा रहे. रिक्सा वाला रिक्से पर सूतल रहे. – ‘ओ भैया, ओ भैया’ कहके पुकरली. रिक्सा मिलला से सांस में सांस आइल. चारों ओर सूनसान रास्ता. बीच-बीच में गली के कुत्ता भौं-भौं करस. लेकिन अस्पताल के अंदर दोसरे दृश्य रहे. पूजा के कबहीं रात में अस्पताल जाए के ना पड़ल रहे. लोग भरल रहे. कुछ लोग फर्शे पर सूतल रहे. ऊ पूछताछ कार्यालय में पहुंचली. सामने कएक गो आदमी रहे. भला घर के औरत समझ के रास्ता दे दिहलस. ऊ खिडक़ी से पुछली – ‘आईसीयू…’ पूरा ना कहे के पड़ल. खिडक़ी वाला आदमी कहलस – ‘आईसीयू बेड नम्बर 13, युगेश्वर प्रसाद एक्सपायर्ड एट 12 आवर्स.’
पूजा के सामने सब अंधकार हो गइल. ऊ धम्म से बइठ गइली. ओहिजा.
—-
जुगांतर
14 जनवरी 2000
कहल जाला सूर्य उत्तरायण होलन. गंगा के घाटन पर पुण्यार्थी स्नान खातिर भीड़ लगवले रहस. अर्चनो आ गइल रहस. विपत्ति के समय सब अहं लोप हो जाला. पटने में काम-क्रिया निपटावल दूनो बहिन मिल के लेकिन ई संसार चक्र त रुकी ना. पूजा अपना ओर से कुछ कहे के तइयार ना रहस. अर्चना के खोद-खोद के कहला पर कहली – ‘मां से ही पूछ ल. ऊ यदि तहरा साथ रहे खातिर तइयार हो जास त हमरा कवनो तकलीफ नइखे.’
आखिर मां के केकरा भरोसे छोड़बो करे लोग? बहुत मनौती के बाद मां तइयार भइली दिल्ली जाए के. किरायेदार के हवाले घर कर दीहल गइल. खाली ऊपर वाला कमरा छोड़ के.
दिल्ली के फ्लाइट शाम के रहे. पूजा सोनी-मोनी के साथ समस्तीपुर के बस पकड़ली. सामान त कुछ रहल ना. बिदाई के समय मां के फफा-फफा के रोवलो पूजा के आंख ना भिंजा पवलस.
डॉ. अभिषेक के हाथ जोड़ के बिदा कइली. अर्चना के आवाज आइल – ‘फोन करत रहिह.’
समस्तीपुर पहुंच के घर के ताला खोलली. अबहीं दिन रहे. पड़ोस के झा जी के परिवार दौड़ के आइल. लागल ओ लोग का पता चल गइल रहे. बच्चा से कह के पानी मंगवली मिसेज झा. फिर कहली – ‘हम चाय लेके आव तानी.’
पूजा के ना ऊ जइसे सुनबे ना कइली. जब तक पूजा घर के दरवाजा खिडक़ी खोलली ऊ चाय आ प्लेट में बिस्कुट लेके आ गइली. उनकर बच्चा सोनी से थोड़ही बड़ा रहे. तीनों बच्चा एक जगह हो गइलन स. मिसेज झा एने-ओने के बात करे लगली. अइसन गमगीन माहौल के हल्का करे के गजब के क्षमता होला औरतन में. अंत में मिसेज झा पूजा के मनावे में सफल हो गइली जे रात के खाना ऊ दे जइहन.
उनका गइला के बाद पूजा घर सइहारे लगली. झाड़ू देबे लगली. एही क्रम में कएक गो चिट्ठी दिखल. ओमें एगो पोस्टकार्ड रहे. ओके पढ़े लगली –
’23-12-99
भाई जुगेसर
आशा कर तानी तू सपरिवार ठीक बाड़. हमहु ईश्वर के कृपा से ठीक बानी. बेटा के फार्म भरा गइल. देखऽ कइसन रिजल्ट होता. हम तहरा से रिजल्ट भइला पर मिलब. तहार मदद लागी.
बिशेष बात तहरा बाबूजी के बारे में बा. चाची का गइला का बाद ऊ बिल्कुल अकेले बाड़े. गांव के हाल-चाल का कहीं. रात के खाना त हम दे आइले. दिन में सतुआ खाके रह जालन. शरीरो कमजोर बा. ऊ हमरो इहां से खाना लेबे नइखन चाहत. मानसिको रूप से कष्ट होत रही न. एह बात पर कुछ सोचऽ. जे भी होखे तू खून बाड़ऽ.
इति.
-जगमोहन.’

पूजा दू तीन बार पढ़ली जइसे याद करत होखस. सोनी-मोनी मिसेज झा के साथे चल गइल रह स. पूजा के आंख बंद हो गइल. पहिले त महसूस करे के कोशिश कइली कि युगेश्वर जी नइखन. जवना पुरुष के ऊ आपन सब कुछ सौंप देले रहस ऊ पुरुष आज साथे नइखे सोच के उनका अन्दर एगो गजब के आत्मविश्वास भरे लागल. ऊ आज जे बाड़ी केवल ओही पुरुष के छाया बाड़ी. उनकर परिचय बैकुण्ठ प्रसाद के बेटी के रूप में नइखे – मिसेज युगेश्वर प्रसाद बा. दू-दू बेटी के परिचयो उनके से बा. – ‘ना.’ उनका मुंह से निकलल, जइसे कवनो पक्का निश्चय पर पहुंच गइल होखस.
26 जनवरी 2000 बुधवार रहे. प्रधान शिक्षक से पहिलहीं अनुमति ले लेले रहस. सुबह 5 बजे गाड़ी आ के हार्न बजवलस. ऊ तइयारे रहस. सोनीए के जगावे में थोड़ झंझट भइल. दूगो कंबल ले लिहली. गाड़ी चल पड़ल.
मुजफ्फरपुर बाईपास से निकले का बेरा पूरब में सूरज के ललछाँह दिखल. ड्राइवर गाड़ी रोक के कहलस – ‘मैडम चाय पी लेहल जाव. उनको चाय के जरूरत महसूस होत रहे. गाड़ी से निकलत निकलत बाहर के ठंडा के अंदाज मिलल. चारों ओर खेत आ बघार रहे. सोनी त चिरई जइसे चहके लागल – ‘दादा जी के गांव आ गइल मम्मी?’
– ‘ना बेटा, अबहीं देर बा.’ पूजा धीरे से बतवली.
गाड़ी फेर चले लागल. बाँए थर्मल पावर स्टेशन रहे. ऊंचा चिमनी से काला धुआं निकलत रहे. एगो कस्बा मिलल. साइन बोर्ड पढ़ के सोनी ही बतवलस – मेंहसी ह. चकियां से बायें मुड़ल गाड़ी. केसरी में थोड़ा रुक के ड्राइवर पुछलस – ‘तुरकौली केने से जाई?’
करीब नौ बजे पूजा बतवली – ‘अब आवता दादा जी के गांव. बरगद के पेड़ आ पास में पोखरा देख के पूजा का बुझा गइल कि हमनी पहुंच गइली. ऊ आंचल खींच के सर पर रख लिहली. ड्राइवर के कहली – ‘गांव में घुस के जगमोहन जी के घर पूछ के खड़ा करब.’
गांव का शुरुए में उनकर घर रहे. गाड़ी खड़ा होत देख के ऊ खुदे उहां आ गइले. गाड़ी के अन्दर झांक के कहले – ‘जुगेसर के परिवार हईं.’
पूजा खाली सर हिलवली.
– ‘उतरीं एक बार.’ जगमोहन का स्वर में आदेश रहे.
पूजा सोनी-मोनी के उतार के गाड़ी से उतरली. चारों ओर धूप फइलल रहे. पास वाला खेत में सरसों के खेत रहे. पीला-पीला फूल से दिगमिगात.
– ‘ई कवन फूल ह मां?’ सोनी पुछलस.
– ‘सरसों, बेटा.’ पूजा बतवली.
जगमोहन के बेटा आके पैर छुवलस.
पूजा जगमोहन से कहली – ‘आपके त सब मालुम चलिए गइल बा. हम बाबूजी के ले जाए आइल बानी.’
जगमोहन का एक त विश्वास ना भइल. कहलन – ‘पूरा सोच समझ के कह तानी नू?’
– ‘हां.’
– ‘बहुत अच्छा. त चलल जाव.’ कहत-कहत जगमोहन उठ गइलन. खड़ा होके बेटा से कहलन – ‘बाबू, माई से कह जल्दी-जल्दी कुछ बना के रखस. ए सब खातिर. हमनी का आव तानी.’
गाड़ी ले जाए के जरूरत ना रहे. आगे-आगे जगमोहन पीछे-पीछे दूनो लड़किन का साथ पूजा चले लागल लोग. बीच-बीच में आंचल खींच के सर पर रख लेहली ऊ. रास्ता में सब घर के औरत झांक-झांक के देखत रहस. एक-आध आवाजो कान में पड़ल पूजा का – ‘जुगेसर के जनाना ह. मास्टर ह. तबहीं त एतना हिम्मती बिया. ना त आदमी मरला पर अइसन के कर सकी.’
शिवदत्त जी बाहरे चौकी पर बइठल रहस. पूजा आगे बढ़ के पैर छुअली. ऊ कुछ कहे ना सकले. आंख से आंसू बहे लागल. अइसन कि रुके के नाम ना लेब. ऊ पास से गमछा उठा के मुंह पर रख के सिसके लगलन. थोड़ा देर बाद जगमोहन बोललन – ‘ए चाचा. तू एह तर करब त सब के का होई. देख त दू-दू गो नतीनी खड़ा बाड़ी स.’
पास से दू-एगो आउर लोग आ गइल. सभे शिवदत्त जी के चुप करावे लागल.
जगमोहन कहलन – ‘ई तहरा के ले जाए आइल बाड़ी. तू जल्दी तइयार हो जा.’
– ‘हमरा का तइयार होखे के बा?’ कहत-कहत ऊ उठलन. फेरु पूजा के ओर देख के कहलन – ‘तू आवऽ हमरा साथे.’
आवाज साफ ना रहे लेकिन पूजा के समझे में कवनो दिक्कत ना भइल. आगे-आगे ऊ घर में घुसलन. अंदर घर में एगो खटिया पर बिछावन रहे. ऊ ओकरा नीचे बइठ के एगो बक्सा बाहर खिंचलन. कमर में बंधल चाभी से खोललन. बक्सा के एक-एक गो सामान निकाले लगलन. तीन गो धोती रहे. दू गो कुर्ता रहे. नीचे से एगो मैल झोला निकललन. ओकरा अंदर में एगो डिब्बा रहे. डिब्बा खोले में खास मिहनत करे के पड़ल. ओमे से एक-एक गो सामान निकाल के खटिया पर रखे लगलन.
चांदी के हंसुली, कड़ा आ करमबंद. सोना के एगो नथिया आ कनफूल. पूजा के ओर देख के कहलन – ‘ई तहरे बा. कइसे ले चलब देखीं.’
पूजा कहली – ‘रउरा उठीं, हम सइहारत बानी.’
ऊ उठ के खड़ा भइलन. पूजा बक्सा उठा के खटिया पर रखली. पुछली – ‘कवन कुर्ता पहिनब?’
– ‘कवनो दे द एगो.’
एगो कुर्ता धोती दिहली उनका के. फेर जवन सामान जइसे रहे बक्सा में रख के बंद कइली. कहली – ‘ताला लगा दीं.’
शिवदत्त जी ताला बंद कर के स्वेटरे पर कुर्ता पहिन लिहलन. पैर में जूता डाल लिहलन. सब घरन में जंजीर लगा के बाहर दरवाजा पर ताला लगा दिहलन. अकेले रहला पर आदमी बड़ा अनुशासित हो जाला. बाहर निकल के जगमोहन के कहलन – ‘चलऽ.’ जगमोहन बक्सा ले लिहलन. अपना घर पहुंचे के कहलन -‘चाचा बइठ. एलोग के कुछ खिआ दीं.’
उनकर बेटा पूजा आ दूनो लडि़कियन के लेके घर के अंदर चल गइल. एगो थाली में पूरी आ भुजिया ले अइली उनकर औरत. साथ में तीन गो कटोरा में दही. एगो थाली शिवदत्त जी खातिरो आइल.
चले के तइयार हो गइल. शिवदत्त जी आगे बइठलन. पूजा आ बच्चा पीछे. जगमोहन के हाथ जोड़ के पूजा कहली – ‘दोस्त नइखन बोल के भुलाएब मत. आ बाबू के रिजल्ट भइला पर एकरा के हमरा पास भेज देब.’
गांव का बाहर मंदिर के पास गाड़ी रोके के इशारा कइलन शिवदत्त जी. खुद उतर के पूजा से कहलन – ‘मैया के सामने माथा टेक ल.’
पूजा उतर के मंदिर में घुसली. शिवदत्त हाथ जोड़ले बाहर खड़ा रहस. पूजा का निकल के अइला के बाद ऊ गाड़ी के पास अइले. दूनो आंख झर-झर बहत रहे. गाड़ी चले लागल. पूजा का जुगेसर का साथ पहिला बार आइल याद पड़ल. लवटे के बेरा कइसे ऊ आपन आंसू ना रोक पावत रहस. आज उनका आंख में आंसू ना रहे.

(समाप्त)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

आवऽ लवटि चलीं जा – (2)

Dr.Ashok Dvivedi

– डा॰अशोक द्विवेदी

अबले जवन पढ़नी तवना से आगा
गाड़ी में मोटरी-गठरी लेले पनवा, बीरा का बगल में बइठल रहे. ओकरा भीतर एगो नया सँसार के सपना कुनमुनात रहे. बीरा ओ सपना से अलग कुछ दूसरे सोचत रहलन. उनका दिमाग में गाँव-जवार के उपहास आ अपमान घुमरियात रहे. ऊ सोचत रहलन…….. चउधुर के ए बेरा ना त सबेरे जरूर मालूम हो जाई. अब त गाँव में उनकर मुँह देखावल दुसवार हो जाई. गवना करावे आइल पनवा के ससुर एको पद ना छोड़िहें चउधुर के. लोग कवन-कवन बोल ना बोली.

“का सोचऽतारऽ?” पनवा उनका के टोकलस. बीरा चिहुँकलन, बाकिर उनका मन के व्याकुलता कम ना भइल. “किछउ ना…” बीरा आपन आँख बन क के कपार सीट से टेका लिहलन. पनवा उनका देहि पर ओलरि गइल. मादक-स्पर्श के गुदगुदी में बीरा के कूल्हि चिन्ता-फिकिर गायब होखे लागल.

गुदगुदी जब रुकल त भविष्य के उदवेग लेसि दिहलस. बीरा फेर आँख खोलि के छत के घुइरे लगलन. उनका अपना ओह संघतिया पर पूरा भरोसा रहे जवन आसाम रहे. ओही का अलम पर ऊ ओइजा पयान बन्हले रहलन. ओकर पता उनका पाकिट में चिंगुराइल परल रहे. पनवा साइत उंघाइ गइल. बीरा एक हाली ओकरा अचरजकारी मोक आ निश्छल सुघराई के निहरलन. ओकर मुँह लरुवा गइल रहे. बीरा का मन में प्यार उमड़ल आ लमहर सांस बनि के निकल गइल….. “बेचारी थाकि गइल बिया”. ऊ सोचलन, आ ओकरा ओलरल देहि के अपना कान्ही प सम्हार लिहलन.

आसाम कवनो नियरा थोरे रहे. रात से सबेर भइल आ सबेर से रात. एह बीचे भविष्य का ओह अनिश्चित अन्हार में बीरा के एक मात्र अलम उनका संघतिया के “पता” उनका साथे रहे. पनवा खातिर जेवन कुछ रहे, पहिलहीं से बीरा पर निछावर रहे. एह परदेश यात्रा में छुइ मुई बनल, मोटरी लेले उनका पाछा-पाछा चले त ढेर लोगन के नजरि बिछिल जाव. गँवई सुघराई आ सादगी में सँवरल देहिं पर आँखि गड़कि जा स. बाकिर बीरा के सुगठित सरीरि देखि के केहू के हिम्मत ना परे. एगो स्टेशन पर दुइ गो सिपाही बीरा के धइलन सऽ, बाकिर पनवा के निधड़क जवाब उन्हनी के चिरुकी हिला दिहलस. “तहन लोग के सरम-हया नइखे का। मरद-मेहरारू नइखे चिन्हात?” पनवा के तिक्खर बोली सुनते उन्हनी के रोब खतम हो गइल. बीरा पनवा का एह तेज रुप से खुदे अकबका गइल रहलन.

एक तोर त गाड़ी बदले के हड़बड़ी में गार्ड के डिब्बा भेंटा गइल. चढ़े के त बीरा चढ़ि गइलन बाकिर अधेड़ गार्ड खोदिया-खोदिया के बीरा का बारे में पूछे लागल. रहि-रहि के ओकर नजर पनवा पर गड़कि जाव. पनवा गुरमुसि के रहि जाव. ओकरा बड़ा बाउर लागे. गार्ड के तरक से जब बीरा गड़बड़ाए लगलन र पनवा का बोलहिं के परि गइल, “घर के इस्थिति ठिक ना रहल हा गाट साहेब! ओही से घर छोड़ै के परल हा. भागि के भरोस पर हमनी का मरद-मेहरारु देस छोड़ि दिहनी जा, अब आगे भगवान जानसु.” गार्ड खरखाहि देखा के चुपा गइल बाकिर ओकरा मन में खुदुर-बुदुर होखत रहे. ऊ हंसि के कहलस – “ई मरद हउवन! बड़ा सिधवा बाड़न बेचारू! परदेश में एंतरे गड़बड़इहन त काम ना चली.” पनवा ओकर व्यँग के समझलस, बाकिर बीरा का ओरि आँखि तरेरि के जइसे उनका मुरखाई पर आँखिए-आँखी धिरवलसि आ फेरू मुस्कियाइ के हूँ कहि के चुपा गइल.

आसाम पहुँचला पर कवनो परेशानी ना भइल. उहवां बीरा के हिरऊ सँघतिया रहलन रमेसर काका के लड़िका, कौलेसर. खूब आव-भगत कइलन उनकर. बीरा के मुंहे, उनुकर कहानी सुनि के चिन्ता त भइल उनका, बाकिर ढाढस देत कहलन, “अब तूँ हमरा किहां चलिए अइलऽ त निश्चिन्त होके रहऽ. इहवां केहू कुछ ना बिगारी तहार. हम बड़ले नु बानी.”

बीरा पनवा के संगे कौलेसरे किहां रहे लगलन. दू चार दिन क त सवाल रहे ना कि पनवा कौलेसर का कोठारी में गुजर कर लीत. कौलेसर का चलि गइला पर ऊ एक दिन बीरा के टोकलस, “तहरा नीक-जबून कुछ ना बुझाला. एकहीं कोठारी में आखिर अतना अदिमिन के गुजर कइसे होई? दीन सुखरग बा त तू कौलेसर का संगे बहरा सूति जा तारऽ! बरखा-बूनी अइला पर का होई? रात त एही में भेड़ियाधसान होई न! एहूं तरे इहां ढेर दिन रहल नीक नइखेऽ!” बीरा मोट बुद्धि त रहले ना. फट से बूझि गइलन. पनवा सांच कहतिया.

रात खान, खाइ-पी के जब कौलेसर सूते चललन त बीरा कहलन, “ओंतरे त हमनी का एके बानी जा ए कौलेसर, बाकिर एगो कोठारी में क दिन गूजर कइल जाई? तहरो त फजिहते न होता. बरखा-बूनी अइला पर अवरु परेशानी हो जाई. कहीं एगो कोठारी देखि के दिउवा देतऽ त बड़ा नीक होइत.” कौलेसर त पहिलहीं से फिकिरमन्द रहलन बाकिर संघतिया पर जाहिर ना कइल चाहत रहलन. पनवा के रहला से, उनका खाए पिए के त आराम रहे बाकिर सांच ई रहे कि ओह हालत में ढेर दिन चललो मुसकिल रहे. तब्बो उ अहथिरे कहे सुरु कइलन, “ए संगी! परदेश में केहूँ तरे गुजर बसर करे के चाहीं, फेरु अबहीं त तूँ कहीं नोकरी नइखऽ करत. कोठारी के किराया लागी. पहिले नोकरी त मिले द. कोठरियो के इन्तजाम हो जाई. हम तहरा खातिर एक दू जगह बतियवले बानी. कहीं नोकरी धरा जाए द.”

अबहीं कुछ दिन बीतल होई. कौलेसर का सिफारिस से बीरा के एगो सेठ किहां दरबानी मिल गइल. साथे साथ कोठरिया के इंतजाम हो गइल. बीरा पनवा के लेके अपना सेठ किहां चलि अइलन. सेठ उनका के अपना हाता के एगो कोठरी देइ दिहलस. तनखाह तय भइल पाँच सौ पचास रुपया. मोका पर उहे ढेर रहे. बीरा का संगें-संगे पनवा खुश रहे.

बाकिर ज्यों-ज्यों दिन बीते लागल, ओह रुपया के पोल खुले लागल. सुबिधान भोजनो मोहाल रहे दूनो परानी के. कबो चाउर रहे त दाल ना, कबो रोटी रहे त तरकारी ना. जाड़ के दिन रहे. बीरा सेठ के पुरान कम्मर पर दिन काटत रहलन. पनवा से बरदास ना भइल त बीरा से कहलस, “एगो नाया कम्मर काहें नइखऽ कीनि लेत। ए फटहा कम्मर से क दिन काम चली? जाड़ो बढ़े लागल.” बीरा ओकर पीर समझलन बाकिर पइसा के महमार देख के महंटिया गइलन.

दू चार दिन बाद पनवा फेरु पाछ धइलस. कुछ समझे बूझे लऽ ना का। आखिर कमरवा कहिया किनबऽ? हमहूं त हइ फटही लुग्गा साटि के रात काटऽतानी.” बीरा फिकिर में परि गइलन. पनवा जानत रहे कि कम्मर काहें नइखे आवत। ऊ मोटरी खोलि के ओमे से अपना पछुवा निकललस आ बीरा के हाथे ध दिहलस. बीरा भौँचक! भकुवा के ओकर मुंह ताके लगलन. पनवा झिरिकलस, “भकुवा मत. जिनगी रही त अइसन अइसन कतने पछुवा आई जाई. देहिंया ले कीमती इहे बा? एकरा के बेंचि के एगो कम्मर कीनि लऽ!” ना नुकुर करत आखिर बीरा के मानहीं के परल.

बीरा कौलेसर किहाँ गइलन त ऊ ना भेंटइलन ना. लचार होके अकेलहीं बजारे चलि दिहलन. पूछत-पाछत एगो सोनार का दोकानी बइठलन. सोनार चलता-पूर्जा रहबे करेलन स. बीरा के निछट गँवार आ सीधा साधा चेहरा से, अनुभवी सोनार का बूझत देरी ना लागल कि आसामी बुद्धू बा. पांच सौ बीस रुपया के पछुवा पर कतरनी चलावत-चलावत ऊ दाम दूइ सौ कइलस त बीरा के झूझूंवावन बरल. उ कहलन, “हमार पछुवा द ए भाई, हम दुसरा जगह बेचब”. आसामी फूटल देखि के सोनार लासा फूसी लगावे शुरु कइलस, “रउवा सोझिया आदिमी बानी. दोसर केहू हमरा ले ढेर दाम थोरे दे दी. हमरा बात पर बिसवास करी. विश्वास पर दुनिया टिकलि बा. ओंतरे राउर मरजी”. बीरा के मन आग-पाछ होत रहे. सोनार बुझि गइल कि ओकर बात सटीक बइठलि बीया. ऊ कुछ रुपिया अवरु अधिका बढ़ाई के रुपिया गीन दिहलस. बीरा तीन सौ सत्तर रुपिया लेके उठि गइलन.

कम्मर किनला का बाद बीरा के लगे एक सौ तीस रुपिया बांचल. उ पचास रुपिया में पनवा खातिर एगो लुग्गा किनलन आ घर के राह धइलन. लवटत खा उनुका मन परल कि कई दिन से बे तियने-तरकारी के कटऽता. ऊ खाली आलू आ पियाज लिहलन. किरिन बूड़त-बूड़त जब घरे अइलन त पनवा लुग्गा किनला खातिर उनका के खूभ झंपिलवलस. ओंतरे ओकरा भीतर बीरा खातिर सनेह लहरियात रहे. सोचत रहे कि बीरा ओकर केतना खेयाल राखऽ ताड़न. बीरा बाँचल रुपिया पनवा के देत कहलन, “ल! अब सब्बुर हो गइल नऽ!”

ओघरी सेठ कहीं बाहर गइल रहे. बीरा संझिए से गेट पर बइठल रहलन. भाला देवाल पर ओठँघावल रहे. एगो त माघ के टुसार, ऊपर से सन् सन् हवा चले त बुझाव कि देंहि अंगरि जाई. पनवा उनका के कहत थाकि गउवे बाकि ऊ कम्मर नंहिए ले अउवन. उनका अब जाड़ लागत रहुवे. गांव रहित त पतई पुअरा फूंकि के आग ताप लेतन. ईहां कउड़ के सुनगावो। कउड़ का मन परते उनका दिमाग में हाता का आरी-आरी फेंकाइल लकड़ी इयाद परुवी सन. उ उठि के अन्हारे टोइ-टोइ लकड़ी बटोरे लगुवन. लकड़ी बटोरउवे त आगि के फिकिर भउवे. टाइम बारह से कुछ उपर होत रहुवे. सोचुवन आगी सुनगा लेब त तापत-तूपत सबेर हो जाई बाकि आगि आवो त कहाँ से? उ कोठारी का ओर चलि देहुवन.

कोठारी के कंवाड़ी बन रहुवे. बीरा धीड़े धीरे जंजीर खड़कउवन त भितरी से पनवा के बोली सुनउवे, “के हऽ?” बीरा ओकरा आवाज के कंपकंपी महसूस करत धिरही से सन्तोष दिहुवन, “हम हईं हो, बीरा!” बोली सुनतहीं कहीं कि कवाड़ी फटाक से खुलि गउवे. पनवा चिहाइले कुछ पुछहीं के रहुवे, तले बीरा पूछि दिहुवन, “अभिन जागले रहलू हा?” पनवा उदास मुसकान में बोलुवे, “नीन त रोजे तूँ लेके चलि जालऽ. अकेल जीउ घबड़ाइल करेला. कइसे कइसे रात कटेले, एकर मरम हमार हिरदया जानऽता!”

बीरा ओकर तड़प महसूस करुवन. पनवा का सटला से उनका भितरी कुछ सुनुगे लगुवे. देहीं के जामल खून पनवा के कंपकंपी देखि के दउरे लगुवे. ऊ पनवा के अँकवारी में भरत कहुवन, “नोकरिए अइसन बा ए पान. हम का करीं? हमरा कवनो सवख थोरहीँ बा कि तहरा से अलगा रहि के रात काटी.”

बीरा के बोली मोटर का पी-पी में दबा गउवे. उ पनवा के छोड़ि देहुवन आ भाला उठावत गेट का ओरि दउरुवन.पनवा सन्न. ओकर गरमात खून धीरे-धीरे फेरू जामे लगुवे. मुँह से खाली अतने निकलुवे, “धिरिक जिनिगी बा हमार! संगे सुतलो-बईठल आ बोललो-बतियावल मोहाल हो गइल बा.”

सेठ के रोबिआइल बोली सुनि के जब बीरा गेट खोलुवन त सेठ गड़िए में से डाँटि के पुछुवे, “घर में सोया था क्या रे? इतनी देर से हार्न दे रहे हैं और तुझे सुनाई नहीँ रहा है?” बीरा सकपका गउवन, फेरु सँभारि के कहुवन, “हुजूर जाड़ लागत रहल हा. कउड़ सुनगावे खातिर आगी लियावे चलि गइनी हाँ.” “ऐसे ही गायब हो जाएगा तो दरबानी क्या करेगा? अच्छा सबेरे तुमसे पुछेंगे!” आ सेठ के गाड़ी हुर्र से आगा निकली गउवे. बीरा गेट बन करत खान सोचुवन, “अधम जिनिगी बा हमरो. छन भर हटि का गइनी, साला पहाड़ टूटि परल. अब सबेरे का जाने का होई?”

पनवा देरी होत देखि के बहरा निकलि आइल रहुवे. सेठ के डपटल सुनि के ओकरा बूझत देर ना लगुवे कि सेठ काहें अतना नराज बा? ऊ धीरे-धीरे गेट का ओर बढ़ि गउवे, बीरा स्टूल पर बइठि के मूड़ी गोतले रहुवन. फिकिरे उनुकर माथा फाटत रहुवे. पनवा उनका कान्ही हाथ धरुवे त ऊ चिहा के ऊठि गउवन. पनवा धिरहीं से पूछुवे, “का ह हो? सेठ काहें गरमात रहलन हा?” बीरा चिहुँकि के ओकर मुँह ताके लगुवन. उनका कुछ ना सुझुवे त अतने कहुवन, “तूँ का चलि अइलू हा? जेवन होई तेवन आगहीं आई. अन्हेरिहे सोचि-सोचि के मुवला से का फायदा? तू जा! सूतऽ!” पनवा चुपचाप खड़ा रहे. बीरा फेरु स्टूल पर बइठि गउवन.

पनवा गोड़ का अगूँठा से माटी निखोरत पुछुवे,”तनी हमहूँ त जानि कि का भइल हा?”
“तोहरा ए पचरा में परला से का फायदा? आरे आगि लिआवे खातिर उहाँ से हटि गउवीं आ एने सेठवा आ गइल हा. ऊ बूझलस हा कि हम सूतल रहनी हां. बस गरमा गइल ह.” बीरा चुपा गउवन.
पनवा उनका कपार पर हाथ फेरे लगुवे. सहानुभूति का छुअन से बीरा के ढाढस मिलुवे बाकिर ऊ पनवा के काँपत देखुवन त प्यार से झिरुकुवन, – “जा ना, जाड़ लागी. ढेर फिकिर कइला के काम नइखे. अइसन गलती नइखीं कइले कि सेठ डामिल-फाँसी चढ़ा दीहें.” पनवा तब्बो उहाँ से ना हटल, त बीरा उठि के ओके दहिना अंखवारी में भरले कोठरी का ओर चल दिहलन..

सबेरे होखते सेठ का बइठका में बीरा के बोलाहट भइल. उहे पूछ ताछ, ऊहे जवाब. बाकि बीरा ए बेरा ना सकपकउवन. ऊ साफ साफ साँच कहि दिहुवन. सेठ पर ओह सफाई के कवनो असर ना भउवे. उ आपन दू टूक फैसला सुना दिहुवे. बीरा के ई उम्मेद ना रहुवे कि सेठ अतना कठोर होई. उ गिड़गिड़उवन बाकि सेठ टस से मस ना भउवे. “एक हप्ता के टाइम बा! तूँ जल्दी से जल्दी आपन बेवस्था क के ईहां से चल्ता बनऽ. तोहार हिसाब परसो मुनीब क दीही”. ऊ भारी मन लेले अपना कोठारी का ओरी चल दिहुवन.

बीरा के अलम टूटल त सँघतिया कौलेसर किहां सरन लिहलन, फेरु जवन फिकिर कपारे चढ़ि के, भीतर का काँवर पिरीत के असमय झांवर क देले रहे ऊ मोका पावते अवरु चाँड़ हो गइल. सबेरे के निकलल डगडग मारल फिरसु बीरा. बाकिर नोकरी मिले त कवना सोर्स कवना विश्वास पर? बहुत कहला सुनला पर कौलेसर के मालिक साहब उनका के आपन दरबान बनावे पर राजी हो गइल. नोकरी पर जात खानी कौलेसर समझवलन, “सँघतिया, दुनिया देखावटी इमानदारी आ देखावती करतब खोजेले. एक जगो त भुगत चुकल बाड़ऽ, सोच समुझि के ठेकान से रहिह.” बीरा संघतिया के सीखि खूँटा गठिया लिहलन आ नवका सेठ के दरबार धइलन.

नवका सेठ बड़ा रंगीन तबियत वाला रहे. साहखरच आ फितरती. बड़े बड़े साहब सुबा ओकरा किहां जुटसु. अंगरेजी शराब के बोतल खुले आ किसिम किसिम के भोजन तइयार होखे. बीरा भड़कलन बाकि संघतिया के सीखि मन परि गइल. सेठ का सहर में कई गो माकन रहे. अदमियो जन के कमी ना रहे ओकरा. चाह के दू गो बगान ओकरा पास रहे आ चाह तइयार करे वाली फैक्ट्री. ओहि किहां बीरा काम करे लगलन.

सुरु-सुरु में सेठ के रंग-रोआब से बीरा भले कुछ भबतल होखसु, बाकि अब उनका एकर रपट परि गइल रहे. रोज खाइ-पी के संझिए खान अपना ड्यूटी पर हाजिर हो जासु. दिन का ड्यूटी पर दूसर दरबान रहे. बीरा के ड्यूटी सांझिए लागि जाव. ई बात दोसर रहे कि एइजा तनखाह अधिका मिले.

अपना चुस्ती आ फुर्ती से, बीरा के सेठ के विश्वासपात्र बने में देरी ना लागल. सेठ बाहर जाव त उनका उपर पूरा जिम्मेवारी डालि जाव. नतीजा ई भइल कि बीरा के कबो कबो दिनवो के मोका ना लागे कि कोठारी में जासु. कतने बेर ऊ आवे जाए वाला लोगन के मेहमाननवाजी आ सवाल के जवाब देत-देत अउँजा जासु. कबो-कबो उनके बख्शीश में पचीस पचास रुपयो भेंटा जाव. सेठ के दाई उनके पछिला-पछाड़ी बइठा के खिया पिया देस.

उनकर एह डयूटी से पनवा बहुत खुझे. अकेले ओकर मन ना लागे. बइठल-बइठल बीरा के बाट जोहल करे आ उनका बारे में सोचते सोचत ओकर मन रोवाइन हो जाव. परदेश में बीरा के छोड़ि के ओकर दूसर के रहे आपन? उदासी जब चँपलसि त ओकर रौनक उतरि गइल. नेह का संगे-संगे देंहि झँवाए लागल. उ बइठल बइठल सोचे…” हे गंगा माई! इ कइसन परिच्छा ले ताड़ू? गाँवे रहली त गांव-घर, कुल-परिवार आ समाज के भय से कुहुंकली आ जब एके लग्गे रहे के मोका आइल त बतियावहूं के मोका नइखे भेंटात.”

एक दिन, दुपहरिया में, जब बीरा अपना कोठरी का आगा परल बेंच पर ओठँघल सूति गइल रहलन, कौलेसर आ गइलन. पनवा दुआरी पर बइठल का जाने कवना सोच में डूबल रहे. कौलेसर का खँखरला पर जब ओकर नजर उठल त जइसे आँखी में खुशी के फुलझड़ी छूटे लागल. हड़बड़ाइ के उठल आ कोठारी में से एगो स्टूल लिया के बहरा ध दिहलस. कौलेसर बीरा के झँझोरि के जगा चुकल रहलन. बीरा का बगल में बईठत कहलन, “गाँवे गइल रहनीं हाँ. पूरा आठ-दस दिन रहि के आवत बानी!”

– “बाबू जी ठीक-ठाक बाड़न नऽ!”, कटोरी में मिसिरी आ लोटा के पानी स्टूल प धरत, पनवाँ अकुताइल पुछलस.
– “ठीके बाड़न, आरे एघरी तोहरा काका आ भतीजा लोग उनका के देखत-भालत बा. ऊहे लोग खेत-बधार से लेले गोरु-बछरु कुल्ही सँभरले बा.”
– “जवन सँभरले बा लोग, तवन भगवाने जानत होइहें. कइसन बाड़न बाबू? ढेर दुबराइल बाड़न?” पनवाँ के गला भरि आइल.
– “कहत न बानी कि ठीक बाड़न”. कौलेसर पनवाँ के ढारस देबे खातिर अपना बात पर पूरा जोर देत कहलन.
– “आ हमरा भइया-भउजी से भेंट ना भइल हा? ऊ लोग जानत बा कि हमनी का एइजा बानी जा.” बीरा जइसे कूल्हि समाचार एक्के बेर जान लिहल चाहत रहलन.
– “ठीके-ठाक बा लोग, तहन लोग के गाँव छोड़ देला से नाराज आ दुखी बूझाइल लोग. तोहार भइया जरुरे कुछ परेशान लउकलन. तोहन लोग के खिस्सा सुनाइ के बतावे लगुवन कि केंतरे उनका दुआर पर कई दिन ले बलुआ के लोग उपदरो कइले रहे. ई त अच्छा रहे कि उनका तोहन लोग के पता-ठेकाना मालूम ना रहे, ना त जेंतरे ऊ बतावत रहुवन, चउधरी गाँव-जवार के लोगन का सँगे एइजा चलि आइल रहतन.”

बीरा के मुँह लटकि गइल रहे. मूड़ी नीचे कइले फिकिर में डूबे उतराए लगलन.
– “पहिले पानी पी लेबे दऽ इहाँ के, त फेर जवन बुझाय पूछिहऽ.”, पनवाँ बोलल.
कौलेसर जब पानी पी चुकलन त मूड़ी लटकवले बीरा के बल देत कहलन, “लोगन के त काम बा कहल-सुनल. तोहन लोगन के आपन रस्ता अपने तय करे के बा. हँ हम अपना बाबू जी के जरुर बतउवीं कि तोहन लोग एइजा बाड़ऽ जा आ ठीकठाक बाड़ऽ जा.”
– “का? तब त जुलुमे बा!” बीरा के बेचैनी अउरी बढ़ि गइल.
– ” अरे मरदे, आखिर कबले केहू ना जानी? कबले भगोड़ा बन के रहबऽ एक न एक दिन त सब जनबे करी! आ हमार बाबू जी बहुत धीर गम्हीर आ समझदार आदमी हउवन. उनके असलियत के मरम खूब नीक से बूझाला!”
– “जनला का बाद हमहन का बारे में कुछ कहतो रहुवन?” पनवाँ निखोरत पुछलस.
– “हँ, इहे कि तोहन लोग कवनो पाप नइखऽ जा कइले. एक दोसरा के चाहल आ निबाहल कवनो पाप ना हऽ. अगर पनवाँ के बाबूजी दुनियाँ के परवाह ना क के तोहन लोग के बियाहे क देले रहतन त ई नौबते काहें आइत? तोहनो लोग के भलाई भइल रहित आ ऊहो आज ठीक ठाक रहितन. इनकर काका आ पितिआउत भाई लोग के जरुर घाटा होइत.”
– “अब त फायदा होत बा नऽ! हवेखते बा लोग. पहिलहूँ ऊ लोग इहे चाहत रहे कि कइसे हमार बिदाई होखे आ कइसे बाबू का खेत पर ओह लोगन के कब्जा होखे.” पनवाँ अपना मन के उदबेग खोलि दिहलस.
– “अउर सब घर पलिवार मजे में बा लोग नऽ?”, बीरा पुछलन.
– “हँ भाई सभे मजे में बा. हमार पूरा घर-पलिवार तोहन लोग का सँगे बा. साँच के आँच का? बाबू कहत रहुवन कि धीरे धीरे सबका एक दिन तोहन लोग के कबूलहीं के पड़ी.”

कई महीना से गांव-घर से उखड़ल, लांछित-अपमानित पनवाँ का हिरदया के कुछ शांति मिलल. परदेस में अकेल रहत रहत उदासी ओढ़े-बिछावे के लकम धरा गइल रहे. अपना अँगना-दुआर आ सिवान में चहकत-उड़त रहे वाली चिरई इहाँ पिजड़ा का भीतर छटपटाइ के रहि जाव. अइसन ना रहे कि ओके गाँव घर के इयाद ना आवे, बाकि इयाद आइए के का होइत?

कौलेसर घंटा भर रहलन. बहुत बतकही भइल. बहुत बादर छँटलन स. जात जात ऊ बीरा से कहलन, “गाँव मे लवटे आ रहे खातिर अपना के कूल्हि बिरोध, अपमान, तिरसकार, आ लड़ाई खातिर तइयार करे के परी. तोहके आजु से ई गँठियाइ लेबे के चाहीं.” बीरा के उनका एह उछाह भरल सीख से बहुत अलम, बहुत बल भेंटाइल.

सूरुज के ललाई धीरे-धीरे बदरन का धमाचौकड़ी में ओरात रहे. साँझ के धुंध धीरे धीरे जमीन पर उतरे शुरु क देले रहे. बीरा आपन खाकी कोट पहिन चुकल रहलन. पनवा चउकी पर थरिया धरत बोलल, “आराम से कुछ खा-पी के तब जइतऽ! दिन पर दिन शहरी बाबू भइल जात बाड़ऽ!” बीरा हँसि दिहलन, “भूखि रही तब न केहू खाई! पता ना एइजा हमरा के का हो गइल बा?”
“दूध-दही कुछऊ रहित त खाइल होइत. खाली रोटी आ आलू के तरकारी खात खात मन अँउजाइ गइल बा. एइजा गाँव लेखा लेहना पताई आ फरुहा कुदार त करे के नइखे. आदमी जब जाँगर चलावेला त भुखियो चाँप के लागेले.” मुंह में हाली हाली कवर डालत बीरा सफाई दिहलन.
पनवा समझत रहे. असल बात त इ रहे कि सँझिए इनकर ड्यूटि चालू हो जाले. गेट पर ना रहसु आ कवनो बात हो जाव त नोकरियो जाई. तनी बेरा गिरा के इतमीनान से खइतन त एक दू रोटी बेसी खइतन, दूध दही कहाँ से आवे? दिन के ड्यूटी देबे वाला दरवान सँझही, माली का संगे संगे भागि जाला. जात जात बोलत जाई, “तनी देखिहऽ बीरा… हमरा बजारे जाए के बा.” फुकवना इ कबो ना सोचे कि बीरो के पलिवार बा, इनहूँ के बजार हाट जाए के परेला. इनकर बजार त दुपहरिए में होला. अतना दिन में कब्बो जो इनका संगे बजार घूमे के मोका मिलल होखे. पनवा उनकर हाली हाली कवर उठावत देखत रहे आ मने मन खीझत रहे.

थरिया टारत बीरा उठि गइलन. अँचइ के लवटलन त गमछी से ताबरतोर मुँह हाथ पोंछलन आ कोना में खड़ा कइल भाला उठा के बहरिया गइलन.

“आवऽ लवटि चलीं जा” लघु उपन्यास के पहिला हिस्सा १९७९ में भोजपुरी पत्रिका “पाती” में “सनेहिया भइल झाँवर” शीर्षक से छपल रहे आ एकर दुसरका हिस्सा “समकालीन भोजपुरी साहित्य” के जून १९९७ के कथा विशेषांक में ” पनवाँ आ गइल” शीर्षक से छपल. हालांकि ई देहात के बे पढ़ल-लिखल पनवाँ आ बीरा के प्रेमकथा ह, बाकिर एम्में गाँव से शहर के पलायन आ फेरु ओसे मोहभंग के साथे-साथ वापसी आ अन्तःसंघर्ष के चित्रण बा.

ई लघु उपन्यास बाद में अँजोरिया में धारावाहिक रुप से प्रकाशित भइल रहे. अब ओही उपन्यास के अँजोरिया के एह नयका संस्करण पर प्रकाशित कइल जात बा. कोशिश बा कि पुरनका संस्करण से सम्हारे जोत रचनन के एह खंड में ले आवल जाव जेहसे कि पाठकन के खोजे पढ़े में सुविधा होखे.

उपन्यासकार डा॰ अशोक द्विवेदी के नाम भोजपुरी साहित्य में जानल मानल आ मशहूर बा. अँजोरिया के सौभाग्य बा कि डा॰ द्विवेदी के रचना नियमित रूप से मिलत रहेला प्रकाशन खातिर आ हर बेर ओकरा के प्रकाशित कर के मन खुश होला. डा॰ अशोक द्विवेदी का बारे में भोजपुरी साहित्य के एगो पुरहर स्तंभ पाण्डेय कपिल के कहना बा कि, “गीत, गजल, नई कविता, निबंध, कहानी, लघुकथा, आलोचना आ संपादन का क्षेत्र में डा॰ अशोक द्विवेदी के जे अनमोल अवदान भोजपुरी के मिलत रहल बा ओकरा से भोजपुरी के ठोस आ वास्तविक समृद्धि सुलभ भइल बा…… उनुकर कहानी परम्परागत भोजपुरी कहानियन के इतिवृत, आदर्श आ औपचारिक विवरण से आमतौर पर मुक्त बा. यथार्थ जिनिगी के नीमन‍-बाउर अनुभवन से उपजल कहानी जहाँ एक ओर भाषा के संपूर्ण संस्कृति संस्कार से लैस बा, उहें एकनी में देश आ काल का मोताबिक उभरल चरित्र तीखा आ क्रिटिकल भइला का साथे बड़ा सहज ढंग से उभरल बाड़ें स.”


टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
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भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” – 4

– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

अबले जवन पढ़नी ओकरा आगे …)


मुजफ्फरपुर इमलीचट्टी होके ऊ यूनिवर्सिटी पहुंचलन. उहां केमिस्ट्री विभाग में गइलन. विभागाध्यक्ष के कमरा बंद रहे. ऊ अर्दली से पुछलन – ‘डॉ.शाही ?’
अर्दली एगो कागज पर उनकर नाम आ आवे के कारण लिखवा के अन्दर गइल. आके कहलस – ‘सर, रउरा से साढ़े बारह बजे मिलब. हां, एकदम 12.30, माने 12.30 समझनी न?’
जुगेसर एने ओने घूमे लगलन. अहसहूं एह यूनिवर्सिटी में उनका जान-पहचान के खास केहू ना रहे. साढ़े बारह के कुछ पहिलहीं आ गइलन डॉ. शाही के कमरा के सामने. अर्दली बाहरे बइठल रहे. ठीक 12.30 बजे घंटी बाजल. ऊ जुगेसर की ओर देख के मुस्कुरात भीतर गइल. जुगेसर माथा झटक के तैयार हो गइलन.
कमरा के अन्दर घुस के जुगेसर के माथा चकरा गइल. कहां प्रोफेसर चटर्जी के पटना वाला कमरा आ कहां ई. फर्श पर कालीन बिछल रहे. डॉ.शाही के टेबुल तक पहुंचे खातिर उनका चले के पड़ल. एगो बड़ा टेबुल का सामने ऊ बइठल रहस घूमेवाला कुर्सी पर. कमरा के चारों ओर आलमारी में किताब करीना से सजल रहे. डॉ.शाही के सामने पहुंच के जुगेसर कांपत आवाज में कहलन – ‘गुड मार्निंग सर.’
-‘गुड मार्निंग. प्लीज टेक योर सीट.’
डॉ.शाही के आवाजो अलग लागत रहे. प्रो.चटर्जी के दीहल लिफाफा जुगेसर हाथे में रखले रहस. उनका ओर बढ़ा दिहले. टेबुल का दराज से कैंची निकललन डॉ.शाही. सावधानी से लिफाफा के किनारा काट के चिट्ठी निकललन. पढ़ के जुगेसर की ओर देख के कहलन – ‘हैव यू ब्राट द सिनॉप्सिस?’
-‘यस सर.’ कहके जुगेसर आपन बैग खोललन. ओमे से आपन सिनॉप्सिस निकाल के उनका सामने रख दिहलन.
डॉ.शाही ध्यान से पढ़े लगलन. करीब 10 मिनट लागल उनका पढ़े में. एह बीच जुगेसर के दिल के धडक़न बढ़ गइल. आखिर डॉ.शाही सर उठा के बोललन – ‘सो यू आर गोइंग फॉर सिन्थेसिस ऑफ इनआर्गेनिक साल्ट विथ बेंजीन रिंग. गुड! वैरी गुड!! इज इट गोइंग टू हैव एनी मेडिसीनल वैल्यू?’
– ‘दैट इज द फाइलन क्वेस्टर सर.’
– ‘व्हाट इज योर फीड़ बैक?’
– ‘कॉलेज लाइब्रेरी सर.’
– ‘हूं…’
– ‘बट आय डोंट थिंक समस्तीपुर कॉलेज हैज एनी लाइब्रेरी टू वर्थ.’
जुगेसर जवाब ढूंढे लगलन. थोड़ा देर सोच के डॉ.शाही कहलन – ‘योर नेम वुड बी रजिस्टर्ड एंड यूनिवर्सिटी विल पे द बिल फॉर दीज 2 मैगजींस.’
ऊ अपना टेबुल से दू गो पत्रिका जुगेसर के देत-देत कहलन – ‘सेंड द ऑर्डर ऑन बिहाफ ऑफ योर डिपार्टमेंट ऑफ समस्तीपुर कॉलेज. आय शैल सेंड द आफिशियल ऑर्डर. ओ.के..’
जुगेसर का बुझा गइल अब उठे के चाहीं. ऊ खड़ा भइलन. डॉ.शाही खड़ा हो के हाथ बढ़वलन जवना के आशा जुगेसर ना कइले रहस. उनका आपन हाथ बढ़ावे में थोड़ा समय लागल. डॉ.शाही के आवाज उनका कान में जइसे दूर से आवत रहे – ‘आय एम रियली प्लीज्ड विथ योर स्टाइल ऑफ सबमिसन. यू हैव ओरिजनलिटी. मे गॉड ब्लेस यू.’

दस साल बाद

भारत के सामाजिक परिवर्तन त नइखे मालूम, बिहार के सामाजिक गणित में बहुत बड़ा परिवर्तन हो गइल. भारतीय राजनीति में विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रताप से बिहार के सत्ता एगो खास वर्ग का हाथे आ गइल. जवन आंदोलन के शुरुआत कांग्रेस के ब्यक्तिवाद-परिवारवाद का खिलाफ भइल रहे ओकर खात्मा एगो नया व्यक्तिवादी परिवार का हाथ में चल गइल. बिहार में एकर नंगा रूप दीखल. पुरान सत्ता केन्द्र ताश के महल जइसन ढह गइल. ‘भूरा बाल साफ करो’ नारा देबे वाला ‘माई’ के गोहरा के गद्दी के खानदानी शासन में बदल दिहलस. अराजकता के आलम शिक्षा व्यवस्था के तहस नहस कर दिहलस. हालांकि कहेवाला कहेला कि पहिलहीं कवन अच्छा रहे. एहू बात में कम दम ना रहे. जातिवाद पर फलल-फूलल कॉलेज आ यूनिवर्सिटी के ढांचा एतना कमजोर रहे कि नया तूफान सब कुछ तोड़ मरोड़ के रख दिहलस.
मिथिला विश्वविद्यालय में केमिस्ट्री के हेड डॉ.विनोद पांडेय कइसहूं नार्थ ईस्ट यूनिवर्सिटी में घुस गइलन. बीच में उनकर खबर मिले पीयल बढ़ गइल बा. जवना से बड़ा आश्चर्य भइल. ऊ का दू पीयल बंद कर देले रहस आ ज्योतिष शास्त्र उनकर प्रिय विषय हो गइल रहे. उनकर लिखल एगो लेखो छपल रहे विख्यात ‘नेचर’ पत्रिका में.

ज्योतिष शास्त्र के विज्ञान सम्मत ना शुद्ध विज्ञान साबित करे के चहले रहस. ऊ लेख पढ़ के जुगेसर एगो चिट्ठीओ लिखले रहस लेकिन कवनो जवाब ना आइल. ना जाने उनका पास पहुंचलो रहे कि ना. मिथिला यूनिवर्सिटी में उनकर जगह डॉ. ठाकुर ले लिहलन. डॉ.ठाकुर के नाक त पहिलहीं बड़ रहे. सुने में आइल तत्कालीन शिक्षा मंत्री से बड़ी नजदीकी हो गइल रहे. शिक्षा मंत्री जी का समस्तीपुर कालेज में कवनो रुचि ना रहे. बेशक रविन्द्र भवन में रुचि दिखावत रहस. बतावे वाला त बहुत कुछ बतवले रहे. सत्यकाम जी के खोज खबर लेले रहस. पता चलल ऊ आपन कारोबार समस्तीपुर का, बिहारे से समेट के कवनो दोसरा प्रांत में चल गइल रहस. रविन्द्र भवन के साथ बनल ब्यवसायिक परिसर बेच के अच्छा खासा कमाई भइल रहे उनके. हँ, मिसेज बोस मंत्री जी से मिले जरूर गइल रहस. उनका चल गइला पर अपना पीए के बोला के कहलस – ‘हुजूर छोड़ी ना इ समस्तीपुर आ दरभंगा के कहानी. पटना में त एक से एक कार्यक्रम हो रहल बा.’
– ‘इहे राज सुख ह रे बोकवा. नेताजी एगो पार्टी आफिस दिल्ली में खोलऽताडऩ. पिछला बार स्टाफ के इंटरव्यू लेबे खातिर हमरो के भेजले रहस. ऊ रहे..का नाम ह ओकर? अरे पंजीबी आईएएस बा जवन. दिल्ली पहुंचत-पहुंचत ससुर रंग दिखावे लागल. हम साफ कह दिहनी – देखऽ भाई हमरा रहत तहरा उहे करे के पड़ी जे हम चाहब. प्रजातंत्र में जनप्रतिनिधिए सब कुछ होला. तब जाके होश आइल.’
– ‘कुछ सेवा पानी कइलस कि ना?’
– ‘कहां रे! ऊ त हमार एगो पुरान संघतिया भेटा गइल. शिव नारायण सिंहवा. कस्टम में नोकरी करऽता दिल्ली में. उहे एक दिन ले गइल रहे एगो नाच वाला जगह. का नाम रहे स्टार-वोस्टार. तबीयत खुश हो गइल मां कसम. आ इहां ई बंगालिन हमरा के समुझावत रहल नृत्य केतना तरह के होला?’
– ‘का का भइल सर ऊ ब्लू स्टार में?’
– ‘मत पूछा सिंहवा के देखत भइल कि ओकर मालिक हमनी के एगो अलग-जगह में बइठा के शराब ले आइल भूजल मुर्गा के साथ. ओने स्टेज पर एक से एक लडक़ी आके नाचे लगली. एक से बढ़ के एक. तीन घंटा के प्रोग्राम. जइसन म्यूजिक ओइसने लाइट के चकमक.’
– ‘आउर कुछ, सर.’
– ‘बस अब खतम. तुम आगे का कार्यक्रम देखो.’
मंत्री जी के हिन्दी में बोलला के मतलब पीए का अच्छी तरह मालूम रहे.

परिवर्तन के एह दौर में जुगेसर के का हासिल भइल, एकर निर्णय पाठक वर्ग करी. हम त सिर्फ कहानी लिखऽतानी. उनको ओह समय के बाकी आशा रहे त परिवर्तन से. जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के सपोर्ट में उहो कएक दिन धरना पर बइठल रहस. कालेज का वादविवाद प्रतियोगिता में उनका सेकेंड प्राइजो मिलल रहे. हालांकि उनका विश्वास रहे फर्स्ट होखेवाला के श्रीवास्तव पदवी के योगदान रहे.
ई सबका साथ होला. जीत के कारण पुरुषार्थ आ हार के कारण उनकर जोगाड़ नजर आवेला. परिवर्तन के ई समय कुछ हद तक मेला के भगदड़ जइसन हो गइल रहे. जइसे मेला में हाथी सनक गइल रहे. सभे भागत रहे. केहूके चप्पल छुटल त केहू के सामान. हां, केहू का दोसरो के सामान हाथे लाग गइल. बाकिर जुगेसर के भाग्य अइसन कहां रहे. उनका त अपने मिलल बडक़ा बात रहे.
त उनकर भुला गइल पीएच.डी.. ऊ जब-जब आपन थीसिस के प्रोग्रेस डॉ.शाही के दिखावस, डॉ.शाही आनंद से उछले लागस.
– ‘ब्रेभो. यू विल मेक हिस्ट्री!’
एक-एक लाइन, एक-एक शब्द डॉ. शाही पढ़स. उनके बतावस – ‘लुक, प्रापर वर्ड का यूज बहुत वाइटल है.’
बाकिर, परिवर्तन के झंझावात में डॉ.शाही के अस्तित्वे खत्म हो गइल. उनका अलग दीखे के गुण बहुत शत्रु बना दिहलस. एक दिन खबर आइल कालेज के कुछ छात्र डॉ.शाही के जान से मार दिहलन. कहे वाला त कहेला उनके विषय के कवनो प्रोफेसर के हाथ रहे. बाकिर जुगेसर अपना नुकसान के पूरा ना कर सकलन. ता उम्र जुगेसर घर बंधलन पूजा का साथे. कुछ अइसन परिस्थिति पैदा हो गइल कि पूजा के शादीओ नान इवेंट बन के रह गइल. ऊ एक्सर्टनल एक्जामिनर बन के पटना गइल रहस. सब कुछ सामान्ये रहे. हठात् रात में फोन आइल अर्चना के. ऊ बतवलस कि आपन शादी कवनो हरिजन लडिक़ा से कर लेले बाड़ी. ई खबर बैकुण्ठ जी पर बड़ा भारी पड़ल. तबीयत त अइसहूं खराबे रहत रहे. दवा खाए से ज्यादा खानपान के संयम पर ध्यान रहे उनकर. डॉक्टर के बार-बार कहला के बादो प्रेशर के दवा नियम से ना खास. ओहदिन जुगेसर का अइला के कारण पुरी तलाइल रहे घर में. खाना तनिका बेसिए हो गइल रहे. सुबह-सुबह जब जुगेसर जगलन त बैकुण्ठ जी के हालत खराब हो गइल रहे. ऊ भाग के रिक्सा ले अइलन. बैकुण्ठ जी के कइसहूं बैठा के मेडिकल कॉलेज ले गइलन. शाम के चार बजत-बजत बैकुण्ठ जी संसार त्याग दिहलन.

बांसघाट पहुंच के समस्या भइल आग के दी? अर्चना के खबर देबे खातिर पूजा के मां मना कर दिहली. अंत में जुगेसरे किरिया उठवलन. ओही समय उनका पता चलल कि बैकुण्ठ जी ए ना मुहल्लो के लोग उनका के बैकुण्ठ के दामाद समझत रहे. बिपत्ति जइसे आवेला ओहसहीं चलिओ जाला. सोचला पर लागेला कइसे वहन करी आदमी ओइसन समय. लेकिन जेकरा पर गुजरेला ओकरा के सोचे के समय ना देव. ठीक ओहसहीं जइसे ऑपरेशन थियेटर में बेहोश रोगी के दशा होला. रोगी के शरीर पर काट पीट होला लेकिन ओकर अनुभव ओकरा ना होला. ओसहीं जइसे तइसे हालत सामान्य होखे लागल जुगेसर का वास्तविकता से मुकाबला होखे लागल. कालेज के काम रुटीन जइसन लागे. क्लास लेबे खातिर पढ़हुँ के मन ना करे. कभी महसूसो करस थोड़ा नजर घुमा लेले रहतन त अच्छा होइत. शायद अपना काम से बेइमानी करतारन ई सोच के मन बड़ा दु:खी होखे. समस्तीपुर जवना स्कूल में पहिले पढ़ावे गइल रहस ओकरा सेक्रेटरी से कभीए कभार मुलाकात होखे. एक दिन कॉलेज से निकल के रिक्सा वाला के कहलन – ‘मूलचन्द स्कूल चलऽ.’
स्कूल में घुसत-घुसत अपना पुरान इयादन में डूब गइलन. सीधा प्रधानाध्यापक के कमरा का ओर बढ़े लगलन. इहे ऊ जगह रहे जहां ऊ अपना जिनिगी के दुसरका अध्याय शुरू कइले रहस. चपरासी के ‘प्रणाम सर’ के आवाज से ऊ वर्तमान में लवटलन – ‘कइसन बाड़?’ मुंह से अपने आप निकल गइल.
– ‘रउरा सब के आशीर्वाद बा सर.’
– ‘हेडमास्टर साहब बानी का?’
– ‘जी हां. आज त जैनो साहब आइल बाडऩ.’
जैन जी के नाम सुनके जुगेसर के कान खड़ा हो गइल.
– ‘का बात बा हो? कवनो मिटिंग ओटिंग बा का?’
– ‘ना अइसे त कवनो मिटिंग नइखे. सुनाता स्कूल सब सरकार ले ली. हो सकऽता एकरे बारे में बात होखे.’
जुगेसर का तत्काल ध्यान आइल, हँ, अइसन बात चलत त बा.
हेडमास्टर साहब के कमरा में घुसे का पहिले एक बार पुछलन – ‘अन्दर आ सकऽतानी सर?’
– ‘अरे जुगेसर जी, आइये-आइये.’ हेडमास्टर साहब के साथ-साथ जैन साहबो के आवाज आइल. प्रणामापाती का बाद सभे एक दूसरा के हाल-चाल पूछल. फेर कालेज के हाल-चाल शुरू हो गइल. जुगेसर स्वभावे से अपना विषय से फालतू ज्यादा जानकारी ना राखस. तबहु जैन साहब से बात करे में बड़ा सहज महसूस होखे.
स्कूलन के सरकारीकरण के बात चलल. एह बात से सब कोई राजी रहे कि सरकारी भइला के बाद पढ़ाई-लिखाई उठ जाई. हेडमास्टर साहब कहे के कोशिश करत रहस जे मास्टर लोग का ज्यादा तनख्वाह मिली त काम ज्यादा करी लोग.
उनका मन के बात समझे में जुगेसर का समय ना लागल. सीधा-सीधा पइसा आ सरकारी नौकरी के लालच रहे. ओकरा आगे शिक्षक पेशा के पवित्रता के महत्व गौण हो गइल रहे. जैन जी के पिता जी आपन जमीन देके ई स्कूल बनवले रहस 1944 में. चारों ओर कांग्रेस आ स्वराज के लहर रहे. दूर-दूर से जेही नेता आवस उनकर देखे सुने के दायित्व मूलचंद जैने पर रहे. शहर में सब कारोबार का जद में उनके परिवार रहे. आजादी के बादो ठीके-ठाक चलत रहे. मूलचंद जी के ई दूसरा बेटा रहस. पहिलका के मृत्यु चेचक से हो गइल. एही से जैन के सारा सामाजिक दायित्व सुन्दरेलाल जी पर रहे. उनका खातिर ई स्कूल खानदान के प्रतिष्ठा रहे. शहर में आन-बान के निशानी रहे. बहुत देर तक बातचीत का बाद सुन्दरलाल जी से ब्यक्तिगत प्रश्न पूछ हेडमास्टर साहब अनुमति लेके लघुशंका करे बाहर गइलन. तबहीं सुन्दरलाल जी जुगेसर से सवाल कइलन – ‘प्रसाद जी, एगो सीधा सवाल पूछऽतानी. आशा करऽतानी रउरो सीधा जवाब देहब.’
– ‘पूछल जाव.’
– ‘पटना में जेकरा इहां आप रहत रहीं, उनका लडक़ी से रउरा शादी कर तानी त.’
सवाल सुन के एक बार त जुगेसर के माथा चकरा गइल. कुछ सेकेंड बाद मुंह खोललन – ‘करेके ईच्छा त बा. समय के इन्तजार करऽतानी.’
– ‘बड़ अच्छा लागल आपन जबाब सुन के. अब एगो बात जल्दी बतावल जाव..ऊ लडक़ी कहां तक पढ़ल बा?’
– ‘बीएससी कर के बीएड कर रहल बाड़ी.’
– ‘शादी के बाद ऊ त रउरे पास रही ना?’
– ‘बिल्कुल. एमें का शक बा?’
सुन्दर लाल जी, हेडमास्टर साहब का सामने से एगो कागज उठवलन. ओके जुगेसर के देके कहलन – ‘ओकर नाम ठीक से लिखीं त.’
जुगेसर बिना कुछ सोचले कागज के पन्ना पर लिखे लगलन – ‘पूजा प्रसाद पिता श्री बैकुण्ठ प्रसाद, पटना यूनिवर्सिटी.’
हेडमास्टर साहब के आवत देख के ऊ कागज ले लिहलन. अब बात राजनीति पर आ गइल. अंत में सुन्दरलाल जी कहलन – ‘हेडमास्टर साहब. आज स्कूल का बाद मास्टर जी लोग के नियुक्ति वाला फाइल लेके आ जायब.’
जुगेसरो बिदा लिहलन.

असली बात पता चले में बहुत दिन लागल. अइसे दूसरे दिन सुबह-सुबह उनका घरे हेडमास्टर साहब आइल रहस. जुगेसर से एने ओने के बात करके अंत में असली बात पर अइलन. अपना दामाद के स्कूल में रखवावे खातिर जैन जी के पीछे लागल बाडऩ. स्कूलन के सरकारी होखे में अब तनिको देर नइखे. मंत्री जी कह दिहले बाडऩ. खैर बहुत घुमा फिरा के अंत में बतवलन कि पूजा के स्कूल में रखे के आदेश देले बाडऩ. आ इहे बतावे ऊ सबेरे सबेरे आइल बड़ुअन. ई खबर सुन के जुगेसर हंसस कि रोवस समझ ना पवलन. खाली इहे पूछलन – ‘कब से?’
मास्टरजी कहलन – ‘हो सके त आजुए से.’
कुछ सोच के जुगेसर कहलन – ‘आज त ना लेकिन हम एतवार के पटना जाके पूजा के ला सकीला.’
– ‘सुन्दर-सुन्दर. सोमवार से हम उनका के क्लास दे दे तानी.’
कह के जाए खातिर उठलन हेडमास्टर साहब. थोड़ा सहम के कहलन – ‘देखल जाई सर. जैन जी से मिलला पर थोड़ा हमरा दामाद के बारे में कहब.’
– ‘निश्चिंत रहीं सर. राउर काम जरूर होई.’ न जाने जुगेसर के मुंह से ई बात कइसे निकल गइल.
पटना जाए के पहिले ऊ सुन्दर लाल जी से मिलल मुनासिब समझलन. सुन्दरलाल जी दुकाने पर रहस. उनका के देख के अन्दर आफिस में गइलन. आफिस के दीवाल पर दू गो मर्द आ दूगो औरत के तैलचित्र रंगल रहे. ओकरे ओर ईशारा कर के सुन्दरलाल जी कहलन – ‘हमार दादा-दादी आ बाबूजी माँ के तस्वीर ह. ओही लोग का आशीर्वाद से त इ संसार पार होखे के ह.’ तब तक नौकर दू गो प्लेट में दू गिलास पानी ले आइल. जुगेसर का ओर पानी बढ़ा के सुन्दरलाल जी कहलन – ‘का लिहल जाई सर?’
– ‘ना-ना, कुछ ना.’
– ‘ई कइसे होई. चाय कि ठंडा.’
जुगेसर हिचकत-हिचकत कहलन – ‘चलीं चाय मंगावल जाव.’
नौकर चल गइल.
सुन्दरेलाल बात बढ़वलन – ‘देखीं ऊ हेडमास्टर से हम परेशान बानी. उनकर दामादो के हम देखले हईं, बिल्कुल पैदल समझीं. तबहिओ हम ओके राख लेब.’
अब स्कूल पर हमार त कवनो कंट्रोल रहे के नइखे. एही से सोचत रनी ह. कम से कम चार-पांच गो बढिय़ा शिक्षक हो जाइत त कुछ दिन त स्कूल के नाम इज्जत बचल रहित. अब मुश्किल बा कि सबकर एप्रोच आ रहल बा. सुनले हईं पइसो रुपिया देबे खातिर तैयार बा लोग. सबका बैकडेट में पे रोल पर होखे के चाहीं. ईश्वर के कृपा से हमरा रोटी के अभाव नइखे. आप पूजा के ले आइल जाव. हम समझतानी बिना शादी कइले अपना पास रखल ठीक ना होई. हम उहो सोचले हईं. अपना घर में ऊपर एगो कमरा बा. ओह में रह सकेली जब तक आपके शादी नइखे होत.
जैन जी के इहां से निकल के जुगेसर सोच ना पावत रहस कि ई सपना ह कि वास्तव में होता. खैर छ: महीना बाद दूनो जाना के ब्याह हो गइल. बारात पटना गइल समस्तीएपुर से. गांव से केवल जगमोहन आइल रहस. प्रोफेसर कालोनी के ओही घर में जुगेसर आ पूजा नया संसार शुरू कइलस लोग.

पूजे के कहला पर जुगेसर उनका के आपन गांव देखावे खातिर तईयार भइलन. एगो गाड़ी ठीक भइल. सुबह पांच बजे निकल गइल लोग. मुजफ्फरपुर बाइपास से निकल के एगो ढाबा पर नास्ता कइल लोग. दही-चूड़ा. पूजा खातिर ई सब कुछ नया रहे. पटना में जनम भइल रहे. ओहीजे बड़ भइल रहली. रास्ता का दूनो ओर लहलहात खेत देख के उनकर मन खुशी से पागल हो गइल रहे. लीची के छोट-छोट गाछन के बगीचा जनाय कि काट के सजावल गइल बा. बीच-बीच में पानी के जमाव. जुगेसर बतावत रहस ई सब जगह सालो भर पानी रहेला. बरसात में त कहे लायक ना रहे. दूर-दूर तक गांव ना लउके. बीच-बीच में छोट-छोट बाजार मिले. करीब बारह बजे जुगेसर बतवले अब उनकर गांव आवे वाला बा. उनका मुंह पर तनाव साफ लउकत रहे. पूजो मुँह पोंछ के आंचर ठीक कर लिहली. जुगेसर उनका ओरी देखके कहलन – ‘अबहीं आधा घंटा आउर लागी. घबड़ा मत.’
गाड़ी बड़ रास्ता छोड़ के कच्ची में घुसल. कुछ दूर तक ईंट बिछल रहे. फेर त एकदम कच्ची. ड्राइवर बुदबुदाए लागल. मुश्किल त तब भइल जब सामने के बैलगाड़ी के बैल गाड़ी के हार्न सुनके भडक़ गइलन स. ओकनी के फेर से रास्ता पर ले जावे में गाड़ीवान का 10-15 मिनट लागल. पूजा गाड़ी से उतर के हाथ-गोड़ ठीक करे लगली. तबही दोसरा ओर से एगो बडक़ा सांप दिखल. ऊ – ‘माई रे’ कहके चिल्ला पड़ली. जुगेसर हंसे लगलन. ससुराल में आके पहिलहीं सांप दीखल कहेला लोग बड़ा शुभ होला. लेकिन पूजा के हाथ गोड़ अबहींओ कांपत रहे.

गाड़ी आगे बढ़ल. गांव का बीच से जब गाड़ी निकलल त पीछे-पीछे लडिक़ा दउड़े लागऽसन. एक बार पूजा का सुनाइल – ‘ए कनिया जा ता.’
ऊ कनिये त रहस. सामने एगो गांव देख के जुगेसर कहलन – ‘आवऽता तहार ससुराल.’
गांव में घुसे का पहिले एगो मंदिर रहे. गाड़ी रोक के जुगेसर आ पूजा दूनो जाना उतरल लोग. मंदिर पर ऊ कब आइल रहस याद ना रहे लेकिन ई उनका लडिक़ाई वाला मंदिर ना रहे. बदल गइल रहे. सुन्दर अस गुबंद रहे. अबही पूरा तरह पक्का ना भइल रहे लेकिन सुन्दर लागत रहे. दूनो जाना मंदिर के अंदर गइल लोग तब तक लडिक़न के झुण्ड जमा हो गइल. ओमे एगो थोड़ा चालाक किस्म के रहे. ऊ पुछलस – ‘कहां जाए के बा?’
जुगेसर कहलन – ‘एही गांव में?’
ऊ फेर सवाल कइलस – ‘केकरा इहां?’
जुगेसर ओकरा सवाल के का जवाब देस, ठीक ना समझ पवलन. का बतावस केकरा इहां जाये के बा? उल्टे ओकरे से पुछलन – ‘तू केकर बेटा हव?’
– ‘हम श्री जगमोहन प्रसाद के लडिक़ा हईं.’ जगमोहन के नाम सुन के जुगेसर के मन पर एगो अलग प्रसन्नता फैल गइल. कहलन – ‘त बबुआ, जा के अपना बाबूजी से बतावऽ जुगेसर चाचा आइल बाडऩ.’
ऊ लडिक़ा एकदम से दौड़ के भागल. सगरी गांव में बात फइल गइल – ‘जुगेसर चाचा आइल बाडऩ.’
उनका अपना घर ले गाड़ी जाए के जगह ना रहे. रास्ता पर गाड़ी खड़ा कर के ऊ उतरलन. पूजा के कहलन घूंघट उठा लेबे के. ऊ लोग आगे बढ़लन कि लडिक़ा-लडिक़ी के झुण्ड ऊ लोग के पीछे-पीछे चले लागल. कवनो का पता ना रहे का करऽता. आ सब के लागे जइसे कवनो नया चीज बा. दुआर पर पहुंचत भइल कि चाची निकल के अइली. जुगेसर का इशारा कइला पर पूजा का उनका पैर छुअला पर आपन पैर झटक दिहली. कइसहूं अस्पष्ट आवाज में कहली – ‘काहे अइल ह एजा? हम त तहरा से संतोष कइ लेहले बानी.’
फेर घर छोड़ के चल दिहली. जुगेसर के त ठकुआ मार दिहलसि. ऊ खड़ा रहस तबले जगमोहन आ गइले. साथ में उनकर बेटो रहे. आवते कहलन – ‘का हो, खबर क दिहले रहत आवे के.’
– ‘हठात हो गइल प्रोग्राम.’
– ‘बाबूजी कहां गइलहन.’
– ‘रहले ह दुआरे पर. हमरा के देख के न जाने केने चल गइलन.’
– ‘तहार नाम सुने के तइयार नइखन.’
जगमोहन ‘चाची-चाची’ आवाज दिहलन.
चाची अइली त कहलन – ‘का खिआव तारू बेटा पतोह के?’
– ‘अरे का खिआइब. इ त बिजुली जइसन परगट भइल बा लोग. पतोह कहतारी आजुए लौट जाये के.’
– ‘अच्छा हमरा घरे दही बा. मंगा दे तानी. बाकी तइयार करऽ.’ कहके जगमोहन बेटा के दही ले आवे खातिर भेजलन. जुगेसर से एने ओने के बात करे लगलन. मंदिर का बारे में पुछलन जे के खर्च करऽता. उनका के पॉकेट से एक हजार रुपया निकाल के दे के कहलन – ‘हमरा ओर से मंदिर में लगवा दीहऽ. तबही चाची एगो कटोरा में दही लेके अइली. चम्मच देबे के सवाले ना रहे. जुगेसर हाथ से दही खाये लगलन. हाथ धोके चाची से कहलन – ‘चाची पतोह कइसन लागल हिय?’
– ‘परी बा परी.’ ऊ कहली – ‘लेकिन इहां आके रही थोड़े.’
– ‘रही ना लेकिन आवत जात त रही.’ तबही बाबूजी के उहे भिनभिनाइल आवाज आइल – ‘कवनो जरूरत नइखे इहां आवे के. हमरा इज्जत के टांगे में आउर का बाकी रहल जे तू आ गइलऽ ह. चलऽ जल्दी निकल जा.’
जुगेसर देखलन केवाड़ी का पीछे पूजा खड़ा रहस. पत्नी का सामने पति के बेइज्जती सहल पत्नी खातिर बड़ा कठिन होला. ऊ अपना के संभाल ना पवलन – ‘ठीक बा. हम चल जात बानी. एह जिन्दगी में कबहीं ना आइब एजा.’ कह के – ‘चलऽ पूजा’ आवाज देके चल पड़लन. साथे-साथे जगमोहन. केहू कुछ ना बोलल. आ के सीधे गाड़ी में बइठलन. जगमोहन पूजा के देखे चल गइलन.

चाची पूजा के खोंइछा में दू मुट्ठी चावल देले रहस. ओके संभालत जब ऊ घर से निकलली त बाबूजी पर नजर पड़ल. उनकर आंख डबडबाइल रहे. पूजा के प्रणाम के जवाब में उ मुंह फिरा लिहलन.

तीन साल के अन्तर में दू गो लडिक़ी हो गइल जुगेसर का. नाम रखले रहस आकृति आ सुकृति. आकृति स्कूलो जाए लागल. आकृति के जनम पटना ननिहाले में भइल रहे. सुकृति के समय नानी समस्तीपुर आ गइल रहस. तबहीं से ऊ इंहे रहस. उनको उमिर भइल जात रहे. पटना वाला घर किराया पर लगा दिहले रहे लोग. दूनो लडिक़ियन का पीछे कब समय निकल जाव पते ना चले.
जुगेसरो आपन थीसिस पूरा करे खातिर कोशिश करे लगलन. मुश्किल तब होखे जब कहीं जास. पिछला पंद्रह साल में जइसे भाषे बदल गइल समाज के. बहुते अटपटा लागे. उनका मुंह पर त कोई ना कहे लेकिन अन्य पुरुष के रूप में सब जगे सेटिंग-जुगाड़ के बात सुनाव.
छोट-बड़ सब का खातिर दलाल हो गइल रहस. आ उहो के कवना लेबल के बा कहल मुश्किल रहे. कॉलेज के नया चपरासी जब एक दिन उनका से कहलस – ‘सर लागता रउरा नाम का आगा डॉक्टर ना लिखाई.’ ओह दिन उनका से रात में खाइल ना गइल. इहे सामाजिक उत्थान ह शायद. एह से त ऊहे जमाना ठीक रहे जब एगो अनपढ़ पंडित सत्यनारायण के कथा हिन्दी में बांच के दक्षिणा ले जास. आ ऊ दक्षिणो का – ‘यथा इच्छा!’
सत्यनारायण भगवान के खयाल अइला से लडिक़ाई के बहुत बात याद आ गइल हठात्. गांव में केहू का कुछ होखे कथा रखाव. राम दुलार पंडित आवस कथा बांचे. प्रसाद बने-खीरा, ककड़ी, शकरकंद, अमरूद काट के दउरी-दउरा में रखा जाव. पंडित जी के प्रत्येक शंख के आवाज गिनी सं बाहर बइठ के. जब सातवां बार शंख बाजे त होखे आरती. आरती के एगो लाइन अबहीं ले याद रहे जुगेसर का – ‘जो राजाराम जी की आरती गावे. बैठ बैकुण्ठ परम फल पावे.’
उहे फलन के दू चार गो टुकड़ा प्रसाद खातिर गांव भर के बच्चा बूढ़ा सभे घंटन बइठे. सामाजिक क्रांति का बाद न जाने गांव में पूजा होखतो बा कि ना. इ सोच के जुगेसर का आंख से आंसू के कएगो बूंद टपक गइल.
खरचो ना जाने कहां से बढ़ल जात रहे. दू-दू आदमी के महीना घर में आवत रहे. पूजा कब से कहत रहस एगो स्कूटर खरीदे के. जुगेसर अगिला महीना अगिला महीना कह के टरले जास. आखिर एक दिन बैंक के पासबुक देखली पूजा – ‘देखीं सत्रह हजार बा. अब त खरीदा सकऽता स्कूटर.’
जुगेसर का मन स्कूटर खरीदे के ना रहे. एगो अलग किस्म के झमेला मने होखे. का बढिय़ां त रिक्सा से चल जाला लोग जहां मन होला. पूजा के मन दोसरा ओर हटावे खातिर कलहन – ‘हमरा त बुझाता कि पहिले एगो घर बनावल जाव.’
‘घर’ अइसन बिषय होला जवना खातिर कवनो नारी कुछुओ करे खातिर तइयार रहेली. अब त एगो नया विषय मिल गइल ओ लोग का. जान पहचान का लोग से जमीन के खबर लेबे लागल लोग.

औरत में एगो विशेष गुण होला. मां बने के अनुभव ओकरा खातिर बड़ा महत्वपूर्ण होला. पूजा के जब डॉक्टर मुस्कुरा के बतवलस त उनका खुशी के ठिकाना ना रहे. आपन बोल के त अम्मा छोड़ के कोई ना रहे. सबसे पहिले उनके फोन लगवली. ई सुन के अम्मा के खुशी के ठिकाना ना रहल. सैकड़ों किस्म के सावधानी बता दिहली एक सांस में. उन कर उमंग देख के जुगेसर से ना रहल गइल. पूछलन – ‘बड़ा खुश बाडू़ का बात बा?’
– ‘बताईं.’ होठ निकाल के आंख चमकावत पूजा कहली.
‘हमके ना बतवला से का बताइब.’
पूजा उमंग में उनकर नाक पकड़ के कहली – ‘अरे हमार बुद्ध स्वामी जी, रउरा पापा बने वाला बानी.’
– ‘साचहूं.’ कहके जुगेसर उछल पड़लन. जिन्दगी के तीसरा चक्र के सूचना हो गइल. अब घर बनावे वाला विषय के साथ-साथ आवे वाला मेहमानो के चर्चा चले लागल.
पांचवां महीना से केहू के कहे के ना पड़े. पूजा के देख के कवनो अनाडिय़ो बता सकत रहे. अइसने स्थिति मातृत्व के महान बनावेला. पूजा ओइसन शरीर लेके सब काम करस.
नउवां महीना में अम्मा के बुला लीहल लोग. बैकुण्ठ जी के गुजरला के बाद ऊ आउर मजबूत दीखत रहस. अइसहूं अकेले भइला पर आदमी में बाचे के इच्छा शक्ति बढ़ जाला. जुगेसर त बहुत दिन उनके देखले रहस लेकिन अबकी बार अम्मा एगो दोसरे महिला दीखस. पूजा के हमेशा डांटत रहस. बीच-बीच में दामादो के ना बकसस. उनका मन के खिलाफ पूजा के अस्पताल में भरती कइल गइल. नाम के अस्पताल रहे. असल में डॉ.विमला के घर ही अस्पताल बनल रहे प्रसव खातिर. अम्मा एगो बात पर अड़ल रहस आपरेशन कर के बच्चा ना होई. पूजो मानसिक रूप से तइयार रहस. ई मानसिक प्रस्तुतिए असली होला. अपना समय से बच्चा भइल. अम्मा का अच्छा ना लागल, लडिक़ी रहे. उनका बड़ी आशा रहे लडिक़ा के लेकिन जुगेसर प्रसन्न रहस. उनका कवनो बहिन ना रहे. उहे नाम रखलन सोनी. बच्चा देख के ना लागे केकरा अइसन बा. जे देखे आवे अपना तरह से कहे – ‘बाप जइसन बा. बड़ी भाग्यशाली होई.’
भाग्यशाली साबितो हो गइल. घर बने के काम ओही साल शुरू हो गइल. आगे वाला दू साल कइसे बीतल पता ना चलल. दूनो जाना के काम रुटीन जइसन चलत गइल. ‘ना ऊधो के देना ना माधो के लेना.’

स्कूल सरकारी हो गइला से एके गो फायदा भइल, महीना बढ़ गइल. जुगेसर आ पूजा दूनो जाना के मुट्ठी बंधल रहे. कवनो फालतू खरचा ना करे लोग. समस्तीपुर जइसन छोट जगह में फालतू खरच करे के कुछ रहलो ना रहे. उनका इहां केहू आवहु जाए वाला त ना रहे. बड़ा जोर होखे त छुट्टी में कबो पटना चल जाव लोग.
नया घर बसावल कठिन त होला बाकिर एमें आनंदो कम ना मिले. जहां एगो कुछ दीखे ले आवे खातिर पूजा उनका पीछे पड़ जास. उनकर हजार बहानो पूजा के रोक ना पावे. एहीतरे धीरे-धीरे घर भरे लागल. सोनीओ चले फिरे लागल. ओकर बोली सुने खातिर जुगेसर के मन कालेज में बिल्कुल ना लागे. अइसहूं अब कालेज रुटीन हो गइल रहे. उहे क्लास, उहे बिषय दोहरावे के रहे.

आदमी कतनो व्यस्त रहे पिछला याद साथ ना छोड़े. जुगेसरो के गांव पीछा ना छोड़त रहे. ओह दिन छुट्टी रहे. जाड़ा के दिन. खा के रजाई में घुसलन त नींद आ गइल. सपना में बुझाइल अबहीं सात क्लास में पढ़े जात बाडऩ. मिडिल स्कूल जाए में खेताखेती जाए के पड़े. रास्ता अइसहूं ना रहे. ओह दिन कवनो साथीओ ना रह सन. दूनो ओर माथ भर आईल अरहर के खेत रहे. ओकरा बीच के पगडण्डी पकड़ जात रहस अपना मने. हठात सामने से चार गो लोग कान्ह पर मुर्दा लिहले सामने पड़ गइल. तेज-तेज डेग से ऊ आदमी बढ़त आवत रहस. पीछे आवे वाला लोगो साथे रहे. जुगेसर हड़बड़ा के पास के खेत में अंदर चल गइलन. उनका सामने से ऊ लोग निकल गइल. उनकर पैर कांपे लागल. बड़ी देर तक जाए वाला लोग के दिशा में देखत रहलन. खड़ा होखे में असुविधा बुझात रहे. दम घूंटे लागल जइसे. नींद टुटला के बादो जुगेसर डेराइल रहस. कइएक मिनट लागल वर्तमान में लौटे में. पेट में मरोड़ बुझाइल. धीरे-धीरे सारा ध्यान पेट पर आ गइल. हँ, पेट गड़गड़ करत रहे.

मृत्यु के समाचार ठीक पहुंच जाला. कलकत्तावाला चाचा के मरला के खबर मिलला पर जुगेसर के मन विचलित हो गइल. जवना घर गांव में जनमल रहस ऊ ओजा के आदर्श रहस चाचा. लडिक़ाई में उनका अइला पर घर में उत्सव जइसन माहौल हो जाव. चाचा जुगेसर के लेके बाजार का दिन करीब कोसभर के गांव जास. ओजा से मछली ठीक से लेके आवस. जुगेसर मने-मने ठीक कइले रहस भविष्य में उहो चाचा जइसन धोती-कुर्ता पहिनिहन. चाचा के एके गो बेटा रहस रवीन्दर. उनका साथ जुगेसर खेलस. रवीन्दर के कपड़ा त रहले रहे हाथ गोड़ो मुलायम दिखे. जबकि जुगेसर के हाथ पैर सूखल सूखल दीखे. लेकिन जब तक दूनो जाना बच्चा रहस कवनो भेदभाव ना रहे. दूनो के एक साथ देख के चाचा आ बाबूजी लोग बड़ा प्रसन्न होखे. सब गड़बड़ हो गइल जब रवीन्दर का मैट्रिक में सेकेंड डिवीजन मिलल. चाचा अपना मुंह से कहलन – ‘अरे बिहार के फर्स्ट डिवीजन बंगाल के थर्ड डिवीजन के बराबर होला. लेकिन तभी से चाचा के प्यार जुगेसर आ घर के प्रति कमे लागल रहे.
शादी-ब्याह वाला मामला के बाद त पूरा तरह सम्बंध विच्छेदे हो गइल रहे. जुगेसर के मन भइल एही बहाने सम्बंध जोड़े के. पूजा से अपना मन के बात कहलन. पूजा संगे-संगे तैयार हो गइली. अब ई सम्बंध बनावे खातिर रहे कि कलकत्ता घूमे खातिर, ना कि दूनो खातिर कहल मुश्किल बा. चाचा रहत रहस बासद्रोनी. टालीगंज से गडिय़ा वाला रास्ता में. सातू बाबू मोड़ से उतर के पैदल जाए के पड़े. एगो नाला पड़े जवना के पार करे खातिर लाइन लागल रहे सब समय. जुगेसर आइल रहस एक बार जब उनकर पटना एडमीशन भइल रहे. माथा छिलवा के रवींदर बइठल रहस. बड़ा खुश भइलन जुगेसर के देख के. दूनो जाना गला मिलके बड़ी देर तक रुंधल गला से रोवल लोग. सोनी के गोदी में उठवलन त ऊ रोवे लागल.
बहुत बात भइल, आ जवना बात से समस्या रहल ऊ रवीन्दर ना उठवलन. ई गांव त रहे ना. श्राद्ध का नाम पर बाबूघाट गंगा के किनारे जाके कामक्रिया कर आइल रहस रवीन्दर. ओकरा दोसरा दिन आस-पास के परिवार के खियावल गइल. करीब पचास आदमी होइहन सब मिला के.
बात-बात में आपन पेट वाला तकलीफ कहलन जुगेसर. रवीन्दर सलाह दिहलन होमियोपैथिक दवा खाए के. एक दिन उहे जुगेसर के लेके धर्मतल्ला अइलन. डॉ.कांजीलाल नाम रहे डॉक्टर के. बडक़ा लाइन रहे. जुगेसर के नम्बर आइल त रवीन्दरो साथे गइलन. डॉ.कांजीलाल जोर से चिलइलन – ‘दूटो केनो?’
रवीन्दर कहलन -‘ए आमार भाई. बिहारे थाके. बांग्ला जाने ना बोले साथे एस छि.’
डॉक्टर के सुर एकदम बदल गइल – ‘हाम हिन्दी बोलने सकता है. तुमी एबार बाहिरे जाव.’
रवीन्दर का निकल गइला का बाद जुगेसर से करीब आधा घंटा सवाल करत रह गइलन डॉक्टर. अइसन-अइसन सवाल केहू से पूछल जा सकेला जुगेसर सपनों में ना सोचले रहस.

डॉक्टर का जब बुझाइल जे सामने वाला रोगी प्रोफेसर ह त अंग्रेजी बोले के कोशिश करे में आउर अपना तरह से हिन्दी ब्यवहार करे लगलन. जुगेसर का जे समझ में आइल ओकर माने रहे – ‘एह बेमारी के डॉक्टरी भाषा में इरिटेबल बॉउल सिंड्रोम (आईबीएस) कहल जाला. एकर उत्पत्ति ग्लायडीन नामक रसायन के कारण होला. ई रसायन गेहूं से शरीर में आवेला. ई पाचन तंत्र के प्रतिरोध क्षमता के प्रभावित करेला. जवना से पेट के गड़बड़ी पैदा होला.’
डॉक्टर एक महीना के दवाई दिहलन आ बतवलन कि हरेक महीना ऊ आपन हाल-चाल आ दवा के पइसा भेजत रहिहन. डॉक्टर आपन सलाह आ दवा भेज दीहन. छ: महीना बाद ऊ आके एक बार फिर जांच करवा जइहन. हां, खाए में रोटी ना खाइले अच्छा होई, डॉक्टर सलाह दिहलन.

देखत-देखत सोनी चार साल के हो गइलस. समस्तीपुर के सबसे नामी अंग्रेजी स्कूली में केजी में ओकर नाम लिखावल लोग. स्कूल के रिक्सा ले जाव आ ले आवे. एही समय हाई स्कूल के शिक्षक लोग के जिला से बाहर बदली होखे के खबर आइल. जाने वाला कहत रहे – ‘ई खाली बहाना बा. सब रुपया खाए के धंधा ह सरकार के.’ आ ऊहे भइल. हरेक शिक्षक के पास कोई ना कोई पहुंच गइल. खरचा कइला पर बदली पासे में होई. अपना जिला के बार्डरो पर हो सक ता आ कहीं दूर-दराज जगहो हो सकऽता. जतना गूड़ डलबऽ ओतने मीठ होई.’
जुगेसर के मति-गति पूजा का अच्छा तरह मालूम रहे. ठीके सोचली कि उनके बिना बतलवलही काम करवाइब. पति के ना बता के ऊ पहिला बार कवनो काम करे गइल रहस. एक बार त मन कचोटलस लेकिन चारों ओर जइसे मार-काट मचल रहे देख के निश्चय कइली – कोशिश करेके.
जिला कार्यालय में पहुंचे के देखली मारे मास्टर के रमरमा रहे. ऊ कइसहूं अफसर का कमरा में घुसली. सामने कुर्सी पर बइठल सज्जन का मुंह में पान भरल रहे. कइसहूं कहलन – ‘कहल जाव.’
– ‘हम पूजा प्रसाद हईं. समस्तीपुर जैन स्कूल में साइंस टीचर. ट्रांसफर खातिर आपसे रिक्वेस्ट करे आइल बानी. एगो बच्चा बा आ घर में कोई बा ना.’
– ‘आप प्रोफेसर योगेश्वर प्रसाद के घरवाली हईं ना.’
– ‘हां, हां.’ पूजा का बुझाइल काम बने वाला बा. पुछली – ‘चिन्ही ले का उनके?’
– ‘बिल्कुल चिन्हीला. लेकिन देखल जाव. हमरा ई कुर्सी पर रहे खातिर मंत्री जी के टार्गेट पूरा करे के बा. हम मजबूर बानी. आप यदि कम से कम दस हजार के ब्यवस्था करीं त कुछ करे के कोशिश करब.’
– ‘ठीक बा, हम काल्ह फेर आइब. धन्यवाद.’
कह के ऊ उठ गइली. तबहीं उनकर आवाज सुन के मुड़ली. ऊ हाथ जोड़ के कहत रहस – ‘आ देखीं ई बात प्रोफेसर साहब के मत बताइब. कम से कम एक आदमी के त अपना आदर्श में जीये के अधिकार मिले के चाहीं.’
पूजा ई बात के ठीक-ठीक अर्थ ना समझ पवली. खैर दूसरा दिन ऊ बैंक से दस हजार रुपया लेके उहां सीधा पहुंचली, ऊ अधिकारी एगो कागज पर आंख गड़वले रहस. एक बार तकलन. पूजा बैग से रुपया के गड्डी निकाल के दिहली. ऊ ड्रावर में रख के कहलन – ‘आपके सेवा पंजी में होम डिस्ट्रिक्ट पटना लिखल बा. साथ में आप पिछड़ा वर्ग के बानी. ई बात के मद्देनजर आपके समस्तीपुर में ही राखल जाई.’
पूजा का मुंह से निकलल – ‘धन्यवाद.’

बदली त रुक गइल लेकिन एगो नया समस्या आ गइल. पता चलल कि पैर फेरू भारी हो गइल बा. एक बार त ठीक कइली खराब करेके. जुगेसर से कहली त ऊ खिसिया गइले. ठीक भइल ई ले आइल जाव लेकिन एगो शर्त पर कि बच्चा भइला के साथे-साथे ऑपरेशन करवा लीहल जाई. चाहे लडक़ा हो या लडक़ी.

सन 1999

केन्द्र में सरकार बदल गइल रहे लेकिन बिहार में ना. केन्द्र सरकार में बिहार के हिस्सेदारी अच्छा खासा रहे. आजादी के बाद पहिला बार बिहार में कुछ परिवर्तन के आशा दीखे लागल. लेकिन, बिहार के शासक दल के जड़ता सब प्रयास पर पानी फेर देव. जुगेसर अब एगो ना दूगो लडक़ी के बाप रहस. बडक़ी सोनी त अब पांचवीं में पहुंच गइल रहे. छोटकी मोनीओ (मोनिका) केजी पास होके एक में पढ़े लागल रहे. जुगेसर का त ना लेकिन पूजा का आंख पर चश्मा चढ़ गइल रहे.
जुगेसर अइसे त ठीके रहस लेकिन बीच-बीच में पेट के शिकायत से परेशान हो जास. कलकत्ता वाला होम्योपैथी दवा करीब साल भर चलल लेकिन ओकरा से कवनो अन्तर ना बुझाव. बंद कर दिहलन. पेट में बीमारी के सबसे बड़ा समस्या होला शरीर के कमजोरी. जुगेसर त खाए पी॓ए में संयमी रहले रहस, पेट के असुविधा भइला से ज्यादा से ज्यादा बरावे लागस. एकरा कारण जरूरी प्रोटीन आ ऊर्जा के कमी साफ दीखे लागल रहे. शरीर कमजोर भइला के साथ-साथ पढ़हु लिखे में मन ना लागे. बीच में कएक गो डॉक्टर बदललन. दवा बदलला पर कुछ दिन ठीक रहे आ फिर पहिलहीं वाला हालत हो जाव.
पूजा के मां आके रहस. बीच-बीच में सब लोग पटना जाव. गर्मी के छुट्टी में सभे पटना गइल रहे. मेडिकल कालेज में कवनो सेमिनार रहे. हठात एक दिन अर्चना अपना पति के साथ हाजिर हो गइली.
अर्चना से मुलाकात करीब बारह साल पर होत रहे पूजा का. अपनापन के अहसास आंधी के तरह होला जवना में सब शिकवा गिला उड़ जाला. करीब दू मिनट तक दूनो बहिन एक दूसरा से लिपट के सिसकत रहस. मां आके खड़ा रहली उनका पर नजर पड़ल त अर्चना उनका के पकड़ लिहली. औरत में न जाने अइसन का होला कि आपन दुख सुख दूनो के बयान रोइए के करेली.

—-

अर्चना अपना पति से परिचय करवली. जात त केहू के चेहरा पर लिखल ना रहे. अइसहुं डॉ.अभिषेक के देख के केहू कम से कम हरिजन त नहिए कह सके. ऊ मां के पैर छुअलन. जुगेसर से हाथ मिलवलन. सोनी-मोनी पैर छुए लगली स त दूनो के गोदी में बइठा लिहलन अभिषेक.
पता चलल डॉ.अभिषेक गैस्ट्रेलॉजी में एम.डी. कइले बाडऩ. उनकर पिता जी बुलंदशहर में कहीं सरकारी नौकरी करत रहस. अब रिटायर होके गांवे में रहेलन. जुगेसर के मन में कहीं ना कहीं महसूस भइल – ‘हां बेटा, रिजर्वेशन के बल पर डॉक्टरी में एडमीशन भइल होई.’
पूजा चाय बना ले अइली. अभिषेक के कहला पर सभे एक साथे बइठ के चाय पीए लागल लोग. बात-बात में जुगेसर के पेट के शिकायत वाला बात निकल गइल. अइसहूं डॉक्टर देख के बीमारी ही याद पड़ेला.
सुनत-सुनत अभिषेक गंभीर हो गइलन. अंत में कहलन – ‘आप एक बार दिल्ली चलतीं त डिटेल्स एक्जामिन हो जाइत.’
जुगेसर कहलन – ‘अरे पेट के बीमारी में अइसन का हो सकऽता. सब त ठीके ठाक बा.’
अभिषेक कहे लगलन – ‘देखीं. एगो डॉक्टर के हैसियत से बिना टेस्ट के कुछ कहल ठीक नइखे तबो एतना कह सकऽतानी कि पेट अवाइड करे वाला अंग नइखे. एकर महत्व कवनो तरह से हार्ट भा किडनी से कम नइखे. आ एकरा के हम सब निगलेक्ट करी ला. सब से दुर्भाग्यपूर्ण बा कि अधिकांश लोग पेट के सिंक का तरह उपयोग करेला.’
थोड़ा दम लेके फिर कहलन – ‘हमरा समझ से एक बार टेस्ट करावल जरूरी बा. अइसे अंदाज से दवा दीहल ठीक नइखे.’
जुगेसर बात बदले खातिर कहलन – ‘हम करतानी प्रोग्राम दिल्ली आवे के.’
अर्चना बड़ी देर से चुप रहली. कहली – ‘ई नु भइल बात. देखीं अब रउरा हमार ‘सर’ नइखीं, बहनोई बानी.’
सब लोग मुस्कुरा पड़ल.
अर्चना आ अभिषेक रुकल ना. रात में डिनर रहे होटले में. सुबहे में फ्लाइट रहे. आपन आपन पता आ टेलीफोन नम्बर देहल लोग. रात में करीब दस बजे फेर फोन आइल अभिषेक के. बतवलन पटना मेडिकल कालेज के डॉ. कृष्ण गोपाल तिवारी से एक बार मिले के.
पूजा ना मनली. जोर कर के जुगेसर के डॉ.के.जी, तिवारी के पास ले गइली. करीब बीस मिनट तक डॉ.तिवारी उनका के देखत रहलन. अपना जूनियर डॉक्टर के कुछ टेस्ट के निर्देश देके उनका के दू दिन बाद आवे के कहलन.
ओह दिन सबसे पहिले जुगेसर के खुद गैस्ट्रोस्कोपी कइलन डॉ.तिवारी. खून के रिपोर्ट देख के कुछ दवा लिखलन आ बतवलन तीन महीना तक ई दवा खाये के बा. जुगेसर पुछलन – ‘डॉ. साहब, कुछ सिरियस बा का?’
– ‘देखीं हम डॉक्टर हईं. बहुत कुछ कहल हमरा खातिर उचित नइखे. फिर भी आप के सावधानी रखल जरूरी बा. तीन महीना दवा चलला के बादे कहल जा सकेला कि का हो सकऽता.’
दवा के दुकान पर डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन ठीक से पढ़लन जुगेसर. लिखल रहे केयर आफ आईबीएस प्रोबेबल कोक्स एब्डोमन (आंत में टीबी क बीमारी के अनेसा). उनका याद पड़ल. डॉ. कांजीलालो कहले रहस इरिटेबल बॉउल सिंड्रोम. प्रोबेबल कोक्स एब्डोमन पर ध्यान ना गइल उनकर.

जून का अंत में समस्तीपुर लवटल लोग. मां ना अइली. कहीं ना कहीं उनका पटना वाला घर से लगाव रहे. कभी-कभी कहबो करस – ‘शादी कर के एही जा ले आइल रहनी तोहार बाबूजी. हमार इच्छा बा एहिजे से घाटे जाईं.’ नारी मन के थाह लगावलो मुश्किल बा. समस्तीपुर अइला पर फिर से रोजनामचा शुरू हो गइल. एक बार फिर से जुगेसर पढ़ल लिखल शुरू कइलन. नेचर पत्रिका में एगो आर्टिकल छपल रहे – ‘सिंथसीज आफ एस हेट्रोसाइकल्स.’ उनका रिसर्च के इहे विषय रहे. पिछला दस साल में एह पर कतना रिसर्च हो चुकल बा सोच के उनका आश्चर्य भइल.
एक बार फेर से अपना अतीत में खो गइलन ऊ. अतीत के भूलल कठिन ना असंभव बा. अतीत ऊ लटाई क तरह बा जवना के पतंग से सम्बंध विच्छेद डोरा टूटले पर हो सकेला. शायद एही से ‘जीवन डोर’ कहाला.
बाहर बरखा होत रहे. न जाने कब नींद आ गइल जुगेसर का. बहुरा रहे. चारों ओर पानी भरल रहे. अपना उम्र के चार-पाच गो लडिक़न का साथ जुगेसर पोखरा में नहाये गइल रहस. रास्ता में पंडित जी का खेत में तिल लागल रहे. लडिकियन के देखा देखी सब लडिक़ो तिल के पत्ता नोंच ले अइलन स. तिल के पत्ता सर के बाल में लगवला पर फेनाव. आज के सैम्पू जइसन. आकर्षण के केन्द्र लडि़किये रहस हालांकि कवनो लडिक़ा के साहस ना रहे ओकनी के कुछ कहे के. बस ओकनी के दूर से देखले आनंद से सराबोर करे लडिक़न के.

जुगेसर का जइसे साफ-साफ दीखे लागल सब लड़कियन के चेहरा – बमनटोली के लडक़ी, हजाम के एगो लडक़ी, बढ़ईटोला के दूगो. एही तरे परिचय देब सब लड़िकियन क बारे में. नाम त शायदे केहू जाने. उनका चेहरा पर एगो शान्त मुस्कान फैलल रहे. तबहीं पूजा चाय लेके अइली. उनका कान्ह पर हाथ रखके हिलावत कहली – ‘का भइल, सूत गइनी का? चाय लेके आइल बानी.’
ऊ अचकचा के उठलन. फिर कहे लगलन – ‘देख ना नींद आ गइल रल. सपना देखे लागल रहनी ह.’
– ‘कवनो लडक़ी के सपना रहल ह का?’ पूजा हंसी कइली. बरसात के मौसम रहे. आ एमें त सबकर मन रससिक्त हो जाला. जुगेसर के जइसे चोरी पकड़ा गइल. कहलन – ‘अरे हमरा जिन्दगी में पूजा रानी छोड़ के दोसर लडक़ी कहां मिलल.’ पूजो पास का कुर्सी पर बैठ गइली. जुगेसर का दिमाग से अबहीं ले गांव गइल ना रहे. कहलन – ‘देखऽ ना बरसात में गांव याद आ जाला. लडिक़ाई के 16-17 साल के उमिर भुलाव ना.’
– ‘कवनो खबर मिलल बा का?’
– ‘कहां मिलऽता. सुनाता कि गांवन में फोन लागी. तब कहीं बातचीत कइल जा सकऽता लेकिन का होई? के बा जे हमनी के खबर ली.’
– ‘काहें रउरो त क सकीले. आउर ना त जगमोहन भैया के चिट्ठी लिख के हाल-चाल ले ही सकीले.’
तबहीं फोन के घंटी बाजल. पूजा का उठावे के पहिलहीं सोनी उठा लेले रहे. ऊ चिल्लाइल – ‘मम्मी नानी का फोन है.’
पूजा जाके फोन लिहली.
विश्वविद्यालय से खबर आइल यू.जी.सी, दरभंगा में वार्षिक विज्ञान सम्मेलन करावे वाला बा. चूंकि समस्तीपुर कॉलेज विश्वविद्यालय के अंगीभूत कॉलेज रहे. एकर हिस्सेदारी आवश्यक रहे. विभाग प्रमुख डॉ.ठाकुर बड़ी ब्यस्त दीखत रहस. जुगेसर अपना स्वभाव के कारण कुछ जाने के कोशिश ना करस. एक दिन डॉ.ठाकुर उनका के बुलवलन. जुगेसर का समझ में ना आवत रहे आखिर डॉ.ठाकुर चेहरा पर मुस्कुराहट लाके कहलन – ‘अरे प्रसाद जी. जानते हैं चीफ गेस्ट कौन हैं विज्ञान सम्मेलन के?’
– ‘नहीं, मुझे कैसे पता चलेगा.’
– ‘वही आपके बड़े भाई साहब पाण्डेय जी.’
डॉ.ठाकुर के आवाज में ब्यंग्य के पुट रहे. जुगेसर त जइसे खुशी के मारे उछल पड़लन – ‘विनोद भैया.
– ‘हां, हां. तभी तो आपके नाम यूनिवर्सिटी हेड ने अलग से निमंत्रण भेजा है.’
कहत-कहत एगो लिफाफा जुगेसर क ओर बढ़ा दिहलन डॉ.ठाकुर. उत्साह में जुगेसर लिफाफा खोल के कार्ड निकललन. लिखल रहे – ‘अखिल भारतीय विज्ञान सम्मेलन 1999 में एलएन मिथिला विश्वविद्यालय आपकी उपस्थिति की कामना करता है. कार्यक्रम 17-10-1999, 11.30 पूर्वाह्न
उद्घाटन डॉ.विनोद पाण्डेय डीएस (एमआईटीयूएसए) के कर कमलों द्वारा.
नीचे अलग-अलग सेमिनार में हिस्सा लेबे वाला विद्वान लोग के नाम रहे. अन्त में लिखल रहे – ‘कृपया समय से पधार कर एंट्री पास एकत्र करें.’
बरीसन बाद जुगेसर एतना खुशी अनुभव कइले. हर दिन हिसाब करस कब 17 अक्टूबर आई.
अपना समय से 17 अक्टूबर आ गइल. जुगेसर आपन सबसे प्रिय ड्रेस में दसे बजे विश्वविद्यालय परिसर में पहुंच गइलन गेटे पर निमंत्रण पत्र देखा के इंट्री पास लेके अंदर घुसलन. अबहीं इक्के दुक्का लोग आइल रहे. कोशिश करिओ के आपन कौतुहल ना दबा पवलन. एगो आदमी से साहस कर के पुछलन डॉ.पाण्डेय आ गइल बाडऩ का? ऊ आदमी आपन जानकारी फटाफट बतवलस – ‘हँ, हँ, वीसी के कमरा में बइठल हंवन.’
जुगेसर के मन ना मानल. सोचलन कोशिश करे में का असुबिधा बा. वीसी के क्वार्टर क ओर गइलन. उहां गेट पर अर्दली से एगो कागज पर आपन नाम लिख के कहलन भाई एक बार डॉ.पाण्डेय के हाथ में दे आवऽ. अर्दली उनका के दू एक बार देख के भीतर गइल. जल्दिए निकल के आइल आ उनके हाथ देके कमरा के अंदर जाए के कहलस. कमरा के अन्दर 3-4 आदमी बइठल रहे. एकरा पहिले कि जुगेसर विनोद पाण्डेय के पहचान पवतन, ऊ खुद उठ के जुगेसर के अंकवारी में भर लिहलन.
– ‘अरे ई का हालत बना लिहले बाड़ऽ योगेश्वर?’ उनकर पहिलका सवाल रहे.
– ‘बस अइसहीं.’ अतने बोल सकलन जुगेसर.

साल २०११

विनोद जी धोती कुर्ता वाला आदमी के तरफ मुखातिब होके कहलन – ‘देखिये, सत्यकाम जी. इमानदारी की यही इज्जत है आपके यहां.’
अब कहीं जाके सत्यकाम जी के पहचान पवलन जुगेसर. बाल बिल्कुल सफेद हो गइल रहे. लेकिन चेहरा आउर खिलल-खिलल लागत रहे.
विनोद जी बाकी लोग से उनकर परिचय करवलन. अंत में कहलन-‘जानतानी सभे. इहे बंदा ह जेकरा कारण हम आज एजा बानी. एगो समय रहे कि हम जिन्दगी से पूरा तरह ऊब गइल रहनी. इहे आदमी आपन विषय हमरा के देके आगे बढ़वलस.’
कहत कहत उनकर आंख डबडबा गइल. चश्मा उतार के रुमाल से आंख पोंछलन. जुगेसर के गला भर आइल.
थोड़ देर बाद विनोद जी एक-एक करके सबकर हाल पूछे लगलन. बैकुण्ठ जी के परिवार से लेके जुगेसर के परिवार तक. जुगेसर जब सोनी मोनी के बार में बतवलन त विनोद जी अपना बैग से दूगो पेन निकाल के उनके देके कहलन – ‘हमरा दूनो भतिजियन के दीहऽ.’
भरत मिलाप के दृश्य ना जाने कब तक चलत रहित यदि वीसी समय के सूचना ना दीतन.
विनोद जी ओह दिने लौट गइलन आ जुगेसरो.

—-

जुगेसर के खुशी ज्यादा देर नसीब ना रहे. घरे आ के बइठले रहस कि सोनी एगो चिट्ठी ला के दिहलस. पोस्टकार्ड रहे. खोले के झंझट ना रहे.
प्रणामापाती के बाद लिखल रहे – ‘तहरा चाची के मृत्यु हो गइल 11 तारीख के. बाबूएजी आग दिहले बाडऩ. 24-25 के काम होई. हम तहरा के आवे के त नहियें कह सकीले. तबहियो हमरा लागल ह कि तहरा के बता दीं.
चिट्ठी पढक़े जुगेसर के दिमाग एकबारगी जइसे खाली हो गइल. आपन लाचारी व्यक्त करे के कवनो उपाय आदमी के नइखे मिलल सिवाय भीतरे-भीतर कुहूके के.

सर्दी आ गइल रहे. स्कूल कालेज बंद होखे वाला रहे लेकिन पूजा के पास कुछ लडक़ी ट्यूशन ल स. एही से कहीं बाहर जाये के प्रोग्राम ना बनत रहे. दूनो बच्ची रोज कहऽ स जुगेसर के – ‘कम से कम पटना ही चलिए न पापा.’
ऊ हँ-हाँ कह के टकसावत रहस. कइएक दिन से पेट फूल जात रहे. जेलुसिल खाइओ के आराम ना मिले. बार-बार बाथरूम जास लेकिन कवनो फायदा ना होखे. भरसक चाहस ना पूजा के बतावे के. लेकिन पत्नी से कहां तक छुपा पावस. आखिर पूजे कहली – ‘चलीं एक बार फेर से पटना देखावल जाव.’

23 दिसम्बर रहे. घर बंद करके पूरा परिवार रवाना भइल पटना खातिर. रिक्सा पर बइठ के जुगेसर एकबार निहरलन घर का ओर. ना जाने कइसे उनका लडिक़ाई में पंडित जी के कहल वाक्य याद पड़ गइल – ‘बीयफे के दक्खिन करे पयाना, फिर नहीं समझो ताके आना.’
आज बीयफही रहे. उनका कइसन विचित्र अनुभव होत रहे.
पटना पहुंचत-पहुंचत रात हो गइल. पेट त फूलले रहे बुखारो लागत रहे. दोसरा दिन सुबह-सुबह मेडिकल कालेज में ले गइली पूजा उनके. इमरजेंसी वाला डॉक्टर तीन चार गो दवा देके टरकावत रहे तबहीं दूर से आवत डॉ.तिवारी दीख गइलन.
पूजा दौड़ के उनका पास गइली आ एकदम से उनका के धरे लिहली. एके सांस में का-का कह भइली उनको पता ना रहे. डॉ.अभिषेक के नाम सुनके डॉ.तिवारी का जइसे कुछ याद पड़ल. ऊ कहले – ‘कहां बा पेशेंट?’
– ‘इमरजेंसी में.’
डॉ.तिवारी इमरजेंसी के ओर मुड़ले.
जुगेसर के भर्ती क लिहले डॉ.तिवारी. साथ-साथ जूनियर डॉक्टर के कुछ टेस्ट करावे के बता के निकल गइले. एक बार भर्ती हो गइल त पूजा घरे गइली. पापा के साथे ना देख के बच्चा पूछे लगलन स. पूजा के आंख से टप-टप आंसू टपके लागल.
मां के अइला पर त पूजा के आंख से जैसे नदी के धार बहे लागल. रोवला से कुछ शांति मिलल त मां कहली – ‘एक बेर अर्चना के फोन कर ना. उहो त डॉक्टर बीया.’


(बाकी फेर अगिला कड़ी में)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” – 3

– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

अबले जवन पढ़नी ओकरा आगे …)

सब लोग के पहिला गिलास खतम होखे पर आइल. सबकर नजर जुगेसर के भरल गिलास पर पड़ल. एक साथे सभे बोल उठल – ‘पहिला खतम कइल जाव. फेर इच्छा होई त लेब.’

जुगेसर कइसहूं सांस बंद कर के पी गइलन. विनोदजी सबका में एक-एक पैग डाल दिहलन. जुगेसर में आधा के करीब डललन. पानी दे के सभे पीए शुरू कर दीहल. तबले चपरासी एगो थाली में भूनल मछली ले आइल. एके थरिया में सब कोई खाए लागल. डॉ.ठाकुर से रहल ना गइल. कहलन – ‘हुजूर ऐसे चुपचाप माहौल में शराब शौक फरमाने का कोई मतलब बनता है क्या?’
विनोद जी कहलन – ‘सत्यकाम जी से शुरू होखे.’
– ‘ना ना भाई, हम ठहरनी अनपढ़ आदमी. एतना विद्वान लोग का बीच हमार बोलल शोभा नइखे देत. डॉ.साहब कुछ सुनावल जाव.’

अपना के अनपढ़ बताके ऊ आदमी अपना महानता के परिचय एक लाइन में दे दिहलन. डॉ. साहेब त कहे खातिर छटपटाते रहस. कहे लगलन – ‘देखिए जनाब. ऐसे माहौल में वैष्णवी बातें तो भातीं नहीं. अर्ज किया है – ‘जो के! जो मदरसे में बिगड़े हुए हैं मुल्ला/ उनको मयखाने में ले आओ, संवर जाएंगे.’
‘वाह- वाह’ क आवाज सबका साथ जुगेसरो का मुंह से अनायासे निकल गइल. उनका आवाज के असलियत, सबकर ध्यान खींच लिहलस. सत्यकाम जी के आवाज आइल – ‘महफिल के हुक्म होखे त बंदा एगो शेर कहित.’
-‘इरशाद.’ डॉ. ठाकुर सबका पहिले कह भइलन – ‘उम्मीदे हूर ने सब कुछ सिखा रखा है वाजिद को/ ए हजरत देखने में सीधे हैं, साधे हैं, भोले-भाले हैं’
विनोद जी मुस्कुरा के कहलन – ‘अरे भाई, अब त कुछ सुना ही दीहल जाव. जुगेसर त घबड़ा गइलन. बाकिर उहो सब छोड़े वाला ना रहस. – ‘देखल जाव. हमरा त कवनो शेर याद नइखे. आप सब कहतानी त गालिब के एगो विख्यात शेर सुनाव तानी. सबके उत्साह जइसे बढ़ गइल – ‘इरशाद! इरशाद!!’
जुगेसर का कहे कएक सेकेंड लागल – ‘ इश्क पर जोर नहीं, है ए ऐसी आतिश गालिब. जो लगाए न लगे और बुझाए ना बुझे.’
– ‘अरे उस्ताद कब लगाए वो आग?’ डॉ. ठाकुर चहकलन.
विनोद जी रोक ना पवलन – ‘अब इहे त जाने के बा. के आग लगवले बा. हमार भाई ना ऊ कन्या?’
जुगेसर त घबड़ा गइलन. बड़ी मुश्किल से कह पवलन – ‘का जे कह तानी?’
– ‘शरमा मत योगश्वर. बड़ा भाग्यवान के प्रेम करे के मौका मिलेला. लेकिन भुला मत – जइसे ऊ आग अपने आप लागेला लेकिन ओकर खबर बड़ी जल्दी फइलेला.’
सत्यकाम जी कहलन – ‘लागता, कवनो विशेष बात की ओर इशारा करऽतानी पाण्डेय जी. त प्रसादो सर कलाकार लागऽतानी.’
– ‘ई का कलाकार होइहन. ऊ त दोसरे पक्ष के पहल होई.’
डॉ.ठाकुर का लागल विनोद जी पर नशा चढ़ रहल बा. ऊ बात सम्हारे के कोशिश कइलन – ‘देखल जाय. हम यहां किसी के बारे में व्यक्तिगत बात को न उठाएं.’
विनोद जी के सुर बदलल जात रहे – ‘तुम चुप रहो तो. तुम क्या जानोगे पटना यूनिवर्सिटी के बारे में.’
डॉ.ठाकुर कुछ कहस कि सत्यकाम जी जोर से डंटलन – ‘फिर आप लोग बकवास करने लगे. मैं वाकई परेशान हूं. सोचा था काम की बात होगी और आप लोग हैं कि?’
फेर सत्यकाम जी सबकर गिलास भरे लगलन. एगो थाली में चिकेन तंदूरी आ गइल.
– ‘चखल जाव, खास देसी मुर्गी ह.’ माहौल फेरु बदल गइल.
पाण्डेय जी ही कहलन – ‘खाली मुर्गिए बा ना अउरो कुछ सत्यकाम जी?’
– ‘आज त नइखे. लेकिन कहीं सब त जोगाड़ कइल जाव. आज काल त गांव के सब लडक़ी मैट्रिक पास होत-होत बेचैन हो जा तारी स.’
– ‘ना-ना भाई. ई लडक़ी वडक़ी के चक्कर एकदम ना. हां, कवनो बियहल-उहवल होखे त सोचल जा सकेला.’
– ‘एगो त आप के पासे बा.’
– ‘माने?’
– ‘काहे हमरा से मुंह से कहवावे चाहत हईं. रउरा जइसे मालूम नइखे.’
विनोद जी भौंह मुचकवलन – ‘ना ना सच कह तानी.’
सत्यकाम जी ना रोक पवलन – ‘उहे, अंग्रेजी वाला बोस के जनानी. ससुर खुद त पचास के बा. ऊ बिया छोकड़ी. कवनो बचकचो नइखे. छटपट करऽतिया.’
– ‘अच्छा. त चक्कर चलल कि ना?’
– ‘बस चलावहीं के सोचत हईं. आप सबके थोड़ा मदद चाहीं.’
डॉ.ठाकुर ना रोक पवलन – ‘ कइसन मदद?’
– ‘ओइसन कुछ ना सर. हम एगो रवीन्द्र जयंती के प्रोग्राम आर्गनाइज कर तानी. आप खाली उनके चीफ गेस्ट बनावे के ब्यवस्था कर दीं. बंगाली के बश में लेवे खातिर रवीन्द्रनाथ से बड़हन तोप कवनो नइखे.’
डॉ.ठाकुर कहलन – ‘बस आप समझिए कल काम हो गया.’
सत्यकाम जी कहलन – ‘देखीं लोग. अपना राज्य में सब कुछ बा. टैलेंट, मेहनत लेकिन कल्चर में हमनी बड़ा पीछे बानी. एकरे कारण आज बंगाली हमनी के हेय समझत बाडऩ. हमार इच्छा बा कि आप सबके मदद से हम एगो छोट संस्था शुरू करीं. जवना के बैनर में कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम कइल जाव.’
विनोद जी बड़ी देर से चुप रहस. कहलन – ‘त मिसेस बोस से शुरू होखे ऊ महोत्सव.’

रात में जुगेसर का लागत रहे जइसे खाट से ऊ हवा में उठ जा तारन. फेर लागल हवा में पवरे लगलन. दूर से एगो बदली दीखल. जइसे-जइसे ऊ नजदीक आवे लागल ओकरा से एगो आकृति बने लागल. खुलल केश, उठल वक्ष, कमर के नीचे चौड़ा नितम्ब. पास अइला पर दूनो खड़ा हो गइल. ओकर बांह इनका कंधा पर. एक दूसरे से लिपट गइल दूनो आकृति. नीचे शून्य. हवा में झूले लागल दूनो शरीर. अपना सीना पर दबाव महसूस कइलन जुगेसर. फिर दबाव नीचे की ओर उतरे लागल. पूजा के मुखाकृति बुझात रहे.

हठात् नींन टूट गइल. कुछ देर लागल ई महसूस करे में कि ऊ बिछावन पर बाडऩ. बड़ा जोर लघुशंका महसूस भइल. ऊ भाग के बाथरूम में घुसलन.

दोसरे दिन एगो बड़ा सा चिट्ठी मिलल जुगेसर का. खोलला पर उनकर आंख फइलल रह गइल.
‘आदरणीय
सादर प्रणाम!

आप त हमरा के भूलिए गइनी. एक बार त विश्वास डगमगा गइल रल. खुद के दोष दीहल छोडक़े का कर सकत रनी ह. आप के गइला के बाद समय से हमार ना भइल. हमार हालत हमहीं समझ सकत रनी ह. केहू से कुछ कहियो ना सकत रहीं. गंगा नहाए गइल रहनी मां के साथे. गंगा जी पाट देखनी. हाथ जोर के मन ही मन प्रार्थना कइनी – मां तहरे शेष आशा बा. यदि हमार पाप अतने अक्षम्य बा त हमरा के बुला ल. लागल केहू कह ता – ना पूजा, तू कवनो पाप नइखे कइले. हिम्मत रख. सोचनी – ठीक बा, एक महीना देख ले तानी. एक महीना ना लागल. रात में सपना दीखल. एगो साधू बाबा हमरा के इशारा कई के बुलावत बाडऩ. डरत-डरत नजदीक जात बानी. बाबा जी हाथ उठाके आशीर्वाद देत बाडऩ. कुछ कहतो बाडऩ. हमार नींद खुल गइल. सारा शरीर से पसीना छूट गइल रहे. नीचे भीजल-भीजल अस बुझाइल. एक बेर फेर से आंख मूंद के लेट गइनी.

हमार का होइत इ त हम ठीक करिए लेले रनी लेकिन आप के चरित्र पर कलंक लागी त एकरे चिन्ता हमरा के खइले जात रहे. दोष त हमरे रहे. हम संभाल ना पवनी अपना के. आप जइसन देवता के अपवित्र कर देहनीं. एक दिन पापा-मम्मी के बात करत सुननी. दीदी के पइसा के मांग आइल रहे. पापा नाराज रहस. कहत रहस – इ लडक़ी हमनी के कहीं के ना छोड़ी. चाल-ढाल सब साहेबी हो गइल बा. भूला गइल बा कि कवना घर के हईं. मम्मी कहलस – हम त शुरूए से कह तानी. ओकर ढंग ठीक नइखे बुझात. एक दिन बात-बात में पूछले रहीं – युगेश्वर त प्रोफेसर हो गइले. कहे त शादी ब्याह खातिर एक बेर पूछल जाव. अइसन मुंह बनाके. कहलस – ऊ गोबर गणेश से हम बियाह करब. बस मम्मी, बस.

पापा कहलन – मन में त हमरो बा. युगेश्वर जइसन सुयोग लडिक़ा आज का दिन में मिलल कठिन बा. देखीह बहुत ऊपर जाई ऊ.
मम्मी जवन कहली ओके सुन के हमार त मन आकाश में उड़े लागल. ऊ कहली – आरे अर्चना के छोड़ीं. हमरा त लागऽता, यदि आप पूजा के बात चलाईं त ऊ राजी हो जइहन.
पापा – पूजा के बीएससी के परीक्षा एही साल बा. हम ओकरे बाद बात चलाइब.
मम्मी – तब तक उनकर कहीं आउर जगह शादी तय हो जाई तब?
ई खबर देबे खातिर हम पागल भइल रनी ह. अब ई नाव के पतवार पकड़े ला तइयार हो जाईं.
अपना स्वास्थ्य के ध्यान रखब. चिट्ठी के जवाब मत लिखब. न जाने केकरा हाथ में पड़ जाई. हमरा कुछ नींक नइखे लागत.’

चिट्ठी पढ़ के जल्दी से पाकेट में छुपा लिहलन. अबहीं एगो क्लास रहे. छोड़लो संभव नइखे. ऑनर्स के क्लास रहे. क्लास में ‘बेंजीन’ पढ़ावे के रहे. एक बार शुरू हो गइल त विषय में डूब गइले. बेंजीन रिंग के बिशेषता बतावे में मगन हो गइलन ऊ. बेंजीन मोलेकुल के सिंगल का डबल का वैलेंड बांड बदलत रहेला जवना से नाइट्रेट, आक्सीजन आ हाइड्रोजन का साथ कार्बन के बांडिंग सहजता से होला आ अलग-अलग प्रभावो होला. सबसे मजेदार बात बा कि बेंजीन अणु में दवा के भंडार तैयार करेके क्षमता बा. बेंजीन के इंपीरिकल फार्मूला ह सी6एच6. एकरा रिंग बनावट के कहल जाला पोलीअन सेचुरेटेड बांडिंग. बेंजीन के साधारण उत्पाद ह फेनॉल, टाउलीन आ एनीलीन. नेप्थलीन आ एंट्रासीलीन एकर एरोमेटिक हाईड्रोजनकार्बन ह. एकर सीएच आयन के नाइट्रोजन से हटा के पायराडीन बनेला. जदि दूगो सीएच हटावल जाव त पायरीडाजीन, पायरीमीडीन आ पयराजीन जइसन उपयोगी रसायन बन सकता.

जुगेसर क्लास पूरा कर के डेरा अइलन. दरवाजा खोल के पाकेट से चिट्ठी निकललन. कपड़ा पहिनले बिछावन पर लेट के पढ़े लगलन. एक-एक शब्द. पहिले त जइसे बिच्छी काट गइल. लेकिन धीरे-धीरे आंख मुंदा गइल. लागल कि पूजा सर पर हाथ फेर रहल बाड़ी.

अतवार के दस बजे चार लोग उनके पास पहुंचल. परिचय दीहल – ‘सब छपरा से आइल बा. स्वजातीय. इंदौर में आपन कारोबार बा. भगवान क कृपा से सब कुछ बा. एके गो लडक़ी बा. इंटर पास कइले बा, अंग्रेजी मीडियम से. सुंदर बा.’ कहके सज्जन एगो लिफाफा निकाल के जुगेसर के सामने रखलन – ‘आप फोटो रखल जाव. यदि पसंद आवे भा कवनो बात करे के होए त हमरा घर के ई फोन नम्बर बा रिंग कर दीहल जाई.’

बहुते सलीका से बातचीत करत रहलन ऊ आदमी. ऊ सज्जन फेर कहलन – ‘देखल जाव कइसन संयोग बा. रऊरा गांव के मास्टर साहब हमरा मामा के तरफ से सम्बंध में बाडऩ. बाकी आपके कवनो इच्छा होय त खुल के कहल जाव. हम अपना लडक़ी खातिर सब कुछ करे खातिर तइयार बानी.’
जुगेसर खाली इहे कह के बिदा कइलन कि समय पर सूचित करब. अबहीं का बताईं.
उन कर इ बात ऊ सज्जन के सारा सलीका हटा दीहल. ऊ बिफर पड़लन – ‘ए बाबू कब होई तहार समय? इस मत सोचीह कि देस में तू हीं प्रोफेसर भइल बाड़. आपन खानदानो ध्यान में राख के निर्णय लीह. ना त सारा जिन्दगी पछतइब.’

बड़ा देर तक सोचत रहलन. एह बार बाबूजी पर क्रोध त आइल बाकिर फिर शांत हो गइलन. एने अबही नौकरीओ के डगमग अवस्था बा. दरभंगा विश्वविद्यालय के नोटिफिकेशन आ गइल बा. इन कर कालेज ओही में जाई. हो सकऽता अंगीभूत कालेज के दर्जा पा जाव. लेकिन संग में एगो आउर चर्चा सुनाता. लेक्चचर के नियुक्ति यूजीसी के माध्यम से होखे के बात चलता. पीएच.डी. कइल जरूरी लागऽता. अइसे त समस्तीपुर कालेज में केमिस्ट्री के लाइब्रेरी अच्छा बा, समयो बा जुगेसर का हाथ में, लेकिन गाइड कहां से मिली. निश्चय कइलन एक बेर पटना जा के चटर्जी सर से बात करे ला.

समय के आपन गति होला. केहू के अच्छा बुरा के खयाल करके ऊ ना चले. अबोध आदमी अपना समझ से ठीके समय पर गाड़ी में सवार होला. सफल भइला पर अपना पौरुष के बात करेला आ असफलता के कारन समय के बतावेला. त एह बार जुगेसर के समय अच्छा रहे. चटर्जी सर बड़ा प्रसन्न रहस. गर्मजोशी से मिललन. कहलन – ‘यस माई ब्वाय, हाऊ आर यू?’
– ‘फाइन, थैंक्यू सर.’
लेकिन आपन बात गला तक आइल; मुंह में ना. चटर्जी के अनुभवी आंख ताड़ गइल. कहलन – ‘यू नो, जब स्वामी विवेकानंद शिकागो में भाषण देने खड़ा हुआ तो अइसा ही उसका आवाज रुक गया था. फिर जानते हो क्या किया स्वामी जी?’
जुगेसर के चुप देख ऊ बोले लगलन – ‘अपना गुरु रामकृष्ण देव को सरन (स्मरण) किया. फिर तो लगातार शुरू हुआ उसका भाषण. सारा दुनिया जानता है विवेकानंद को.’
– ‘सर, आप ही तो हैं मेरे रामकृष्ण देव जी.’ जुगेसर के जुबान पर ई लाइन आइल समय के ही प्रभाव रहे. आ इहे लाइन उनकर पीएच.डी. के रास्ता खोल दिहलस.

बंगाली टोला में एगो खाली मैदान रहे. जानवर आ लडिक़ा खेलऽ स. कबही समस्तीपुर नगरपालिका ओकरा कोना में एगो सार्वजनिक लाइब्रेरी बनवले रहे. आज का दिन में पुस्तकालय त ना रहे, हां, एगो आकृति जरूर रहे जवना का पास से गुजरला पर दम बंद हो जाव.
कइक दिन से ऊ मैदान में चहल-पहल होखे लागल. चारों ओर रस्सी के पांचिल बन गइल. बाहर से जानवर आदि के ढुकल रुक गइल. एगो बड़हन शामियाना लागे लागल. बुझाते ना रहे इहां कवनो दिन मैदान रहे. हां एगो कोना में सुलभ शौचालयो बने लागल.
मार्च के मनोरम समय रहे. समस्तीपुर नगरपालिका मैदान में रवीन्द्र महोत्सव के खबर अखबार में निकलल. शिक्षा मंत्री उद्घाटन करे आवे के रहलन. सर्किट हाउस में शिक्षा मंत्री शहर के शिक्षक समुदाय का साथ भेंट मुलाकात करत रहस. उनका पास सत्यकाम जी के देख के लागत रहे मंत्रीए जी उनकर मातहत होखस.
विनोद पांडेय का साथ जुगेसरो पहुंचलन. विनोद जी के देखा-देखी जुगेसरो मंत्री जी के गोड़ छुवलन. मंत्री जी कहलन – ‘बइठल जाव विनोद जी. का खबर बा.’
विनोद जी कहलन – ‘आप सब के आशीर्वाद बा.’
– ‘कइसन चलऽता राउर पीएच.डी. वाला काम?’
– ‘समस्तीपुर में रह के थोड़ मुश्किल त बा लेकिन हमार थिसिस करीब-करीब तइयार बा.’
– ‘त भेजीं ओकरा पास. रउरे पीएच.डी. खातिर रसायन विज्ञान अबहीं दरभंगा में रोकल बा. कम से कम प्रकाशित हो जाई त पीछे कवनो समस्या खड़ा ना होई.’
– ‘हम एही महीना में भेज देब.’
– ‘अरे जल्दी करीं. आ ई के ह?’ जुगेसर का ओर इशारा कइलन मंत्री जी.
– ‘इहां का प्रोफेसर युगेश्वर प्रसाद. एही साल हमनी का विभाग में ज्वाइन कइले हईं.’
– ‘अरे, हं-हं. पिछला साल पटना विश्वविद्यालय के फर्स्ट ब्वाय. सुन्दर, अति सुन्दर. त विनोद जी, इनकर थोड़ा मदद लीं आपन काम में. का योगेश्वर बाबू, कवनो असुविधा नइखे न!’
– ‘सर, इ त आपके महानता बा. विनोद जी सब तरह से हमार सीनियर बानीं आ हमार अभिभावको. उहां खातिर कुछ कइल त हमार भाग्य बा.’
– ‘वाह! वाह! विज्ञान के विद्यार्थी का मुंह से अइसन साहित्यिक बात सुन के मन प्रसन्न हो गइल. ठीक बा, तहरा सभे सभा स्थल पर आव.’
दूनो जाना फेर से पैर छू के निकले लागल लोग.
गेट का पास जुगेसर जी त टकरात-टकरात बचलन. तांत का साड़ी में सजल एगो औरत घुसत रहे. विनोद जी बतवलन इहे मिसेज बोस हईं. नाम ह सुनयना बोस. जुगेसर का मुंह से निकल पड़ल – ‘बिल्कुल सुनयने बाड़ी.’
विनोद जी के चेहरा पर कुटिल मुस्कान फैल गइल. कहलन – ‘सुनयने ना, बहुत कुछ बाड़ी. सत्यकाम जी का नजर पर अइसन थोड़े चढ़ल बाड़ी.’
बाहर कइक लोग के गार्ड समझावत रहे मंत्री जी आराम करऽतानी. कार्यक्रमें में मुलाकात हो सकेला. सत्यकाम जी बाहर आके मुलाकाती जगह में बइठ गइलन. अकेले रहस. आंख मुंदले रहस आदतन. अन्दर कमरा से आवे वाला आवाज कबो-कबो तेज हो जाव आ कबो-कबो रोगइला जइसन हो जाव. सत्यकाम जी का चेहरा पर कवनो परिवर्तन ना लखात रहे. करीब घंटा भर बाद स्नान घर से पानी गिरे के आवाज आवे लागल. ऊ आंख खोलके घड़ी देखलन. एक घंटा हो गइल रहे. अबहीं जिला मजिस्ट्रेट के आवे के समय हो गइल रहे. खड़ा भइलन. कमरा के दरवाजा पर हल्का दस्तक दिहलन. आवाज आइल – ‘के?’
सत्यकाम जी कहलन – ‘जल्दी मालिक, डी.एम. पहुंचे वाला बा.’
फेर गेट पर केहू ना रहे. गार्ड खैनी मलत रहे. ओकरा के डांट लगवलन – ‘कब अकिल होई तहरा सब का? मंत्री जी अन्दर बाडऩ. अबहीं डी.एम. साहेब आवत बाडऩ आ तू आराम से बइठल बाड़.’
गार्ड फटाफट खड़ा हो गइल. टोपी ठीक करे लागल. सत्यकाम जी बार-बार घड़ी देखे लगलन.
करीब 10 मिनट लागल डी.एम. का आवे में. गाड़ी के घुसे के जगह देके अन्दर खड़ा भइलन. डी.एम. के प्रणाम कइलन. डी.एम. पुछलन – ‘मंत्री जी का करत बानी?’
सत्यकाम जी – ‘आराम करत रनी हं. हमहूं इन्तजारे कर तानी.’
– ‘आप के भी इन्तजार करे के पड़ऽता?’
– ‘मंत्री महोदय समये इहे देले रनी हं. हमहूं पांच मिनट पहिले पहुंचनी हं. चलल जाव.’
डी.एम. का चेहरा पर तनाव साफ झलकत रहे. तनाव त सत्यकामो जी का रहे बाकिर चेहरा पर कवनो भाव ना रहे. हॉल में आइल सभे. आमने-सामने सोफा पर मंत्री जी आ सुनयना बइठल रहे लोग.
डी.एम. का साथ सत्यकामो जी मंत्री जी के प्रणाम कइलन. डी.एम. के ओर देख के मंत्री जी सत्यकाम जी से पुछलन – ‘सत्यकाम जी, देखीं रउरा में दस मिनट देर हो गइल बा. सुनयना जी ठीक समय से आ गइनी हं.’
– ‘माफ कइल जाव, सर. हम आवे का समय एक चक्कर सभास्थल पर लगवले अइनी हं.’
– ‘ठीक बा. अब काम के बात कइल जाव. सुनयना जी बतावल जाव अपना प्रोजेक्ट का बारे में.’
साड़ी के पल्लू संभाल के सुनयना कहे लगली – ‘सर, हमार शिक्षा-दीक्षा शान्ति निकेतन में भइल बा. आप सब त विश्व कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर के जानते होखब. एह विश्वविद्यालय के स्थापना उहें का कइले रहीं. हमरा संगीत आ नृत्य दूनो में मास्टर डिग्री बा. सत्यकाम जी का अनुरोध पर हम समस्तीपुर में एगो सांस्कृतिक केन्द्र शुरू करे के चाह तानी. एकरा माध्यम से हम एह शहर में एगो सांस्कृतिक क्रांति लावे के चाहतानी. हमरा ई सोच के केतना आनन्द होता कि अइसन काम के शुरूआत मंत्री जे हाथ से होता.’
मंत्री जी बड़ा देर ले चुप रहस, कहे लगलन – ‘हमार आशीर्वाद सब समय अइसन सुकाम पर बा. सुनयना जी जइसन महान कलाकार से मिल के हमरा विश्वास हो गइल बा कि बिहार सांस्कृतिक क्षितिजो पर आपन जगहा खूब जल्दी हासिल कर ली.’
डी.एम. के मन बड़ा देर से कुलबुलात रहे. उनका समझे के बाकी ना रहे कि इ सब भूमिका बा. असली मुद्दा ना. तबहीं मंत्री जी कहे लगलन – ‘हां, डी.एम. साहेब. रउरा का कर सकऽतानीं एह विषय पर.’
– ‘हम त सर, अपने के हुकुम के इन्तजार कर तानी.’
एतना दिन से नौकरी कर के डी.एम. अच्छी तरह से जानत रहस का कहे के चाहीं.
– ‘त सुनल जाव. ई जवन मैदान बा बंगाली टोला में न, शहर में गंदगी फइलावल छोड़ के एकर दोसर कवनो उपयोग नइखे. इहां एगो सांस्कृतिक भवन के निरमान आराम से हो सकऽता. सुनयना जी जइसन सुसंस्कृत व्यक्तित्व बा ए शहर में. उनकर सदुपयोग कइले बुद्धिमत्ता बा.’ एकबारगी चुप हो गइलन मंत्री जी.
अब डी.एम.के उत्तर देबे के समय रहे. कहलन – ‘सर, फंड के समस्या.’
– ‘हम आप के इहे प्रश्न के आशा कइले रनी हं. एकरा के हम पहिलहीं सोच लेले बानी. एक एकड़ काफी बा केन्द्र खातिर. यदि एक एकड़ सरकार लीज दे देव ए शर्त पर कि केन्द्र के भविष्य में रखरखाव उ व्यक्ति या कम्पनी करी त फंड के बहुत बड़ा समस्या मिट जाई. बाकी भवन निर्माण सरकारे क तरफ से सकेला. हमरा मंत्रालय के हाथ में अबहीं करीब 10-15 लाख रुपया एह मद में बा.’

डी.एम. का समझ में आवे लागल रहे असली खेला कहां बा. पढ़े के बेरा भारतीय संविधान में सरकार के कल्याणकारी स्वरूप के बारे में बहुत अच्छा अध्ययन रहे उनकर. शंका समाधान के रोक ना पवलन – ‘सर, एगो समस्या आई. मैदान भले गंदा होखे, शहर में इहे त जगह बा लडिक़न का खेले कूदे वास्ते. फेर एकरा के लेके राजनीतिओ हो सकऽता.’
मंत्री जी बिफर गइलन – ‘राजनीति में त आपन माथा मत लगावल जाव डी.एम. साहेब. सरकारी खर्चा पर मजा लूट-लूट के दिमागो मोटा हो गइल बा राउर. कतना जमीन बा मैदान के पता बा. त सुनल जाव – उहां करीब 7 एकड़ जमीन बा. एक एकड़ केन्द्र के आ एक एकड़ लीज देला के बाद कतना बांची? कुल पांच एकड़. पांच एकड़ के नगरपालिका शिशु उद्यान बना सकऽता. सुलभ शौचालय त बनिए चुकल बा.’
डी.एम. का अब पता चलल कार्यक्रम का पहिले सुलभ शौचालय बनावे खातिर मंत्री जी का दफ्तर से दबाव डालल गइल रहे. सुनयना आश्चर्य में रहस कि कइसे एगो आदमी डी.एम. जइसन उच्च पदस्थ अधिकारी के डांट सकऽता. उहे आदमी के घंटा भर पहिले के आचरण उनकर विस्मय आउर बढ़ावत रहे.
सत्यकाम जी बिल्कुल चुप रहस. डी.एम. के चुप देख के मंत्री जी कहत-कहत खड़ा हो गइलन – ‘आ देखल जाव. हमरा ठीक सात दिन बाद पटना में ई प्रोजेक्ट के पूरा रिपोर्ट चाहीं. आपके सत्यकाम जी मदद करब. हम आज रात के ही मुख्यमंत्री जी के बता देहब. आपन रिपोर्ट सुनयना जी के हाथ से भेजवा देहल जाई. हां, सुनयना जी के एगो गाड़ी के व्यवस्था कर देहल जाई.’
ऊ सुनयना जी का ओर देख के कहलन – ‘त चलल जाव प्रोग्राम में.’

प्रोफेसर चटर्जी से मिले पटना आइल रहस जुगेसर. मन में तरह-तरह के विचार उठत रहे, जइसे परीक्षा देबे के समय होला. अपना काम के छोट अवधि में ऊ आउर कन्फ्यूज हो गइल रहस. पीएच.डी.खातिर बात कइल ही मुख्य उद्देश्य रहे. एक बार दरवाजा ठेल के मुंह दिखवलन. प्रो.चटर्जी उनके के देख के कहलन – ‘जस्ट फाइव मिनट.’
ऊ बहरा टहले लगलन. तबहीं ओने से बैकुण्ठ जी दीख गइलन. जहां बाघ के डर होला ओही जे सांझ होला. अबकी बार ऊ सोचले रहस उनका इहां ना जाएके. मन में चोर जे समाइल रहे लेकिन सामने पड़ गइला पर का करस. पैर छुअलन.
– ‘खुश रहीं युगेश्वर जी. कब अइनी हं?’
– ‘अबही पहुंचिए रहल बानी.’
– ‘त शाम में ठहरब न?’
– ‘ना, आज ठहरे के त कवनो विचार नइखे. खाली प्रोफेसर साहेब से मिले आइल बानी.’
– ‘अइसे कइसे होई.’
– ‘नाहीं. हमरा जल्दिए आवे के बा. तब हो सकेला दू तीन दिन रुकहूं के पड़े.’
तभी अन्दर वाला आदमी बाहर आइल. जुगेसर की ओर देख के बोललस – ‘जाइल जाव, बोलवनी हं.’
बैकुण्ठ जी कहलन – ‘एक बार विभाग की ओर जरूर आइब.’
– ‘ठीक बा.’ कह के जुगेसर अन्दर ढुकलन.
प्रो.चटर्जी खड़ा होके हाथ बढ़वलन. ओकरा पहिलहीं जुगेसर पैर छुए खातिर आगे झुक गइल रहस.
– ‘सिट डाउन प्लीज.’ कह के प्रोफेसर टेबुल से चुरुट निकलन. लाइटर से जला के एगो टान दिहलन. धुआं निकालत कहे लगलन – ‘यस, युगेश्वर. बोलो कैसा लग रहा है एसाइनमेंट.’
– ‘गुड, फाइन सर. लेकिन ओइसन छोट जगह में रिसर्च के ज्यादा कुछ स्कोप नइखे.’
– ‘लुक यंग मैन. आई अप्रीशिएट योर कंसर्न, बट रिसर्च को तुम रियलिटी से मत जोड़ो. एट लिस्ट तुम्हारा इस स्टेज पर एक पीएच.डी. का डिग्री का जोरूरत है. फिर यू विल बी हैविंग रीयल ओपनिंग. मोस्ट आफ दि इंडियन यूनिवर्सिटीज आर सिम्पली एटेंडिंग पीएच.डी. फार बोगस सब्जेक्ट. दीज आर आलरेडी वर्क्ड इन डेवलप्ड कंट्रीज. यू नो इवन इन चाइना ए लाट आफ रिसर्च इज गोइंग आन इन आर्गेनिक केमिस्ट्री.’
प्रोफेसर चटर्जी के थोड़ा रुकत देख जुगेसर थोड़ा साहस कइले – ‘तबहीं त सर, हमार दिली इच्छा बा आप हमरा के गाइड करीं.’
– ‘नहीं. वह पॉसिबल नहीं है. मैं तुम्हारे बिहार यूनिवर्सिटी वाले को एक लेटर लिख देता हूं. एक नहीं मैं तुमको दो सब्जेक्ट का जिस्ट दे रहा हूं. तुम किसी एक पर सिनाप्सिस लिख कर उसका पास जावो. वह तुमको इनरोल कर लेगा. तुम रीयल रिसर्च का चक्कर में नहीं पड़ो. अभी लाइब्रेरी यूज करो. जितना हो सके अपना कॉलेज में इस जर्नल को लाने का बंदोबस्त करो.’

टेबुल पर पड़ल एक पत्रिका के जगेसर के हाथ में देके प्रोफेसर घंटी बजवलन. चपरासी से स्टेनो के बुलावे खातिर कह के टेबुल के दराज से एगो फाइल कवर निकललन. ओके खोल के कुछ छपल कागज निकललन. फिर फाइल कवर बंद करके ड्रावर में रख दिहलन.
कागज पर नजर डाल के फिर शुरू हो गइलन – ‘देखो. एक सब्जेक्ट है इनआर्गनिक इंश्योरेंस लाइक मैगनेसियम एलिमिनेट और मैगनेसियम आक्साइड को 1, 2 डिक्लोरोएथिन से रिएक्ट कराने का. इसमें बेंजीन रिंग को नाइट्रोजन से रिप्लेस करा के सी2 एच8 एन2 लाया जा सकता है. फिर दो एमाइन्स वाले केमिकल को लाने के केमिस्ट्री को फार्मुलेट करने का उपाय ढूंढना है. दो एमाइन्स वाले केमिकल जल्दी से दो हेट्रोसाइकिल तैयार कर सकते हैं.
कएक गो पन्ना जुगेसर के दिहलन प्रोफेसर. सर उठा के देखलन स्टेनो आ गइल बा. ओकरा के ‘बोसो’ कह के फिर बुझल चुरुट धरावे लगलन. चुरुट के कश लेके बोले लगलन –

‘माई डीयर,
आय एम सेंडिंग दिस यंग ब्वाय टू यू. यू नो आय हार्डली रेकोमेंड एनी वन. बट वुड नॉट रिस्ट्रेन मायसेल्फ फ्रॉम डूइंग सम फेवर टू डीजविर्ग चैप लाइक हिम. ही विल समिट यू द सिनॉप्सिस ह्विच अप हैव गॉन थ्रू. यू विल नॉट बी इम्ब्रास्ड आय विलीव.
विथ रिगार्ड्स
योर्स
एटा आमार पैडे करे खामे करे आनबे.’
स्टेनो बोला – ‘एखुनी दादा?’
– ‘तबे?’ बड़ा खिन्न होके प्रोफेसर बोललन – ‘जाव, करे आनो.’
कुछ सेकेंड लागल. ध्यान फेर पुराना जगह पर आवे में. बाकी कागज पर ध्यान देके प्रोफेसर चटर्जी फिर शुरू कइलन – ‘दूसरा सब्जेक्ट भी हेटेरोसाइकल्स की केमिस्ट्री पर है. इट इज अबाउट साइक्लिजेशन आफ एन-….’ लागल इहां तक आवत-आवत प्रोफेसर थाक गइलन.
जुगेसर आपन ज्ञान व्यक्त करे खातिर बेचैनी महसूस करत रहस. सहमल-सहमल कहे लगलन-‘सर, 1, 2, 3, 4-थायडीआजॉल-2 सल्फोनामाइड, 5-(फेनीसल्फोनाइल) अमीनो के सिंथसीज के बारे में एगो लेख हमरा नजर पर पड़ल रल.’
प्रोफेसर के आंख फैल गइल. ऊ कहलन – ‘तूमि पारबे. तुमि पारबे. यू केन डू दिस माय ब्वाय, लेकिन एक बात ध्यान रखो तुमको आभी डिग्री लेना है. रिसर्च नहीं. ए बूढ़ा बहुत ठोकर खाके ऐसा सलाह तुमको देता है.’
आपन बात खतम करके प्रोफेसर उहो कागज जुगेसर के सउँप दिहलन.
तब तक स्टेनओ चिट्ठी लेके आ गइल रहे. ऊ पढक़े दस्तखत कइलन. फिर ओकरा के लिफाफा में भर के जुगेसर के दिहलन. जुगेसर का लागल अब चले के चाहीं. उठलन. प्रोफेसरो खड़ा हो गइलन. जुगेसर उनकर पैर छुए में आपन के धन्य महसूस करे लगलन.
उहां से निकल के सीधा कैंटीन में गइलन. चाय पीए के बड़ी इच्छा होत रहे.

कैंटीन में समोसा आ चाय लेके बइठले. अबहीं समोसा खतम क के चाय शुरूए कइले रहस तबहीं सामने जे दिखल चाय के गरमाहट भुला गइलन. जल्दी से घूंट निगले का चक्कर में जीभ जर गइल. इ का? जेकर सामना करे का डर से ऊ पटना ना रुके के ठीक कइले हवन उहे सामने. कुछ बोले के चहलन लेकिन आवाज ना निकलल. अच्छे भइल साथ में बैकुण्ठो जी रहस. उहे कहलन – ‘घरे फोन कइनी हं. रउरा आइल बानी बतावे खातिर. पूजा कालेज जाए के तैयारी करत रल, कहलस ह आपसे मिलते निकल जाई. इहंवें चल आइल ह. इहां चटर्जी सर के चपरासी बतवलस ह आप इहां बानीं.’
तबले जुगेसर बहुत हद तक संभल गइल रहस. धीरे-धीरे कहे लगलन – ‘ना-ना अच्छा कइनी हं. देखीं ना हमार काम त हो गइल. अब हम निकलबे करब. कॉलेज अकाज कइल बड़ी खराब लागेला. आखिर त नौकरी ही बा.’
बैकुण्ठ जी – ‘ई त अच्छा बात ह. अपना काम के प्रति निष्ठा ही आदमी के आगे बढ़ावेला. हमनी के आप से एगो दोसरा तरह के सम्बंध राखीले. एही से थोड़ा खराब लागलो स्वाभाविक बा कि आ के बिना मिलले चल जात बानीं.’
– ‘ई कबहीं मत सोचब. हमरा आप सब के प्रति असीम श्रद्धा बा. कवनो गलत मत समझब. थोड़िको समय रहला पर हम जरूर आपके पास रुकतीं.
बात पर बात निकल जात रहे. दूनो जाना के तनिको खयाल ना रहे कि उहां एगो तीसरो बा. आखिर ऊब के पूजा कहली – ‘अच्छा पापा हम निकलऽतानी.’
बैकुण्ठ जी कुछ आउर कहे जात रहस लेकिन पूजा के बात से लागल कि ऊ फालतू समय नष्ट करऽतारन. कहलन – ‘अरे देखल जाव ना. पूजा आइल रल आपसे मिले आ हम अपने बक-बक में आपके अझुरवले रह गइनी’ फेर पूजा का ओर घूम के कहलन – ‘ना होखे त जुगेसर जी का साथ गांधी मैदान ले चल जा. ओहिजा से उहां का स्टैंड चल जाइब आ तू कॉलेज. रास्ते में पूछ लीह जवन पूछे के बा. तहार समयो बर्बाद ना होई आ इहों के रात ना होई समस्तीपुर जाए में.’

जुगेसर जी उनके प्रणाम कर के चले लगलन. पीछे-पीछे पूजा. गेट से निकल के पूजा पीठ पर हाथ रखली. ऊ त छनक गइलन. पूजा कहली – ‘का जी अबहिए से छुपावे लगनी. आगे का करब?’
– ‘ना अइसन नइखे. सच बताईं त हमरा साहस ना भइल त तहरा मम्मी पापा के सामने जाए के.’
– ‘ई समझिए के त हम आ पहुंचनी हं.’
– ‘थैंक्यू पूजा, थैंक्स.’
तबहीं एगो रिक्सा सामने खड़ा हो गइल. दूनो जने बैठ गइल लोग. रिक्सा वाला पुछलस – ‘केने?’ त जुगेसरे कहलन ‘गांधी मैदान.’ रिक्सा पर जब दूनो के बदन स्पर्श भइल. जवना बात से जुगेसर के कलेजा कांपत रहे उ जइसे कबो घटले ना रहे.
पूजा के व्यवहार से उनका एके बात बुझात रहे नारी मन के थाह लगावल असंभव बा. पूजा पुछलस – ‘कहां ले चलऽतानी?’
– ‘माने? तहरा कालेज नइखे जाए के का?’
जुगेसर पूजा का चेहरा का ओर नजर फिरवलन. ओकरे चेहरा के मुस्कान आ आंखन के चाहत में शायद जवाब मिल गइल उनका. ऊ रिक्सा वाला के पीठ थपथपा के कहलन – ‘भैया, फ्रेजर रोड चलो.’
अब चिहुंके के बारी पूजा के रहे – ‘हमके सिनेमा दिखावे के मन बा का?’
जुगेसर घड़ी देखलन दू बज गइल रहे. सिनेमा के टाइम त बा.
– ‘चलऽ तीन बजे वाला शो देखल जाव.’
– ‘आपके पहुंचे में देर होई.’
– ‘देर होई. लेकिन हम अपना पूजा खातिर एतना बलिदान त देइए सकऽतानी.’
– ‘बाह-बाह मेरे मजनूं.’ पूजा आपन हाथ उनका पीठ पर रख दिहली. कहली – ‘चिन्ता मत करीं. बलिदान देबे के मौका सामने बा. अबहीं त कुछ साहस इकट्ठा करीं पापा के सामना करे के.’
– ‘चलऽ अबहिए कह देत बानी.’
– ‘ओकरो समय अबहीं नइखे. समय पर हम बताइब.’
– ‘पक्का त.’ जुगेसर हाथ बढ़वलन. हाथ पर पूजा हाथ रख के जवाब दिहली. दूनो हाथ सटल रह गइल. आ बातचीत बंद हो गइल.
फ्रेजर रोड में एगो रेस्टोरेंट रहे ‘बॉबी’.
बॉबी फिल्म के सफलता से प्रेरणा लेके नाम दिहल रहे. अन्दर में जगहो रहल आ साथ में फेमिली केबिन बनल रहे. पैसा ज्यादा ल स. बनल त कॉलेज स्टूडेंट का क्रेज रहे उहां जाए के लेकिन ओह समय गर्लफ्रेंड त एतना सहज रहे ना. दोस्तन का साथ जाए में पाकेटो का ओर खयाल करे के पड़े. एक बार स्कालरशिप के बकाया मिलल रहे. चार गो क्लासफेलो का साथ जुगेसर गइल रहस. बाकिर त उनका पटना में कवनो जगह ना मालुम रहे जहां पूजा के ले जास.
गेट पर रिक्सा से उतरल लोग. यूनिर्फाम पहिरल दरबान अदब से गेट खोललस. अन्दर जात-जात बेयरा कहलस – ‘सर अंदर केबिन खाली है.’
उहे ले जाके एगो केबिन में बइठे के कहलस. दूनो जाना आमने-सामने बइठल लोग. आपन-आपन बैग पास के कुर्सी पर रख दीहल लोग. फिर बेयरा आइल मीनू लेके. जुगेसर पूजा का ओर बढ़ा के कहलन – ‘आर्डर द.’
पूजा कहली – ‘रउरा बताईं. हम त खा के आइल बानी.’
जुगेसर का बेयरा के उपस्थिति अच्छा ना लागत रहे. ऊ मेनू रख के ओकरे से पुछलन – ‘तू हीं बताव भाई का खिला सकऽतार?’
– ‘तंदूरी परौठा, चिकेन कसा, चिकेन तंदूरी, मटन कबाब, मटन कोर्मा..’
ओकरा के रोक के जुगेसर कहलन – ‘वेजीटेरियन बताव भैया.’
बेयरा ओही सुर में कहे लागल – ‘पनीर दो पियाजा, कड़ाही पनीर, पनीर कोर्मा, पनीर बटर मसाला, मटर पनीर, पालक पनीर, मिक्स्ड वेजिटेबुल…’
जुगेसर कहे जात रहल कि पूजा टोकलस – ‘रउरा एक ही बोलब. हम खा ना सकब.’
जुगेसर कहलन – ‘हां भाई! एक पनीर बटर मसाला, दो तंदूरी परौठा और एक मिक्स्ड वेजीटेबल.’
बेयरा कहलस – ‘आ मैडम के सर कुछ ड्रिंक वगैरह.’
– ‘अच्छा पहिले साहब के त लाव.’
बेयरा का चल गइला का बाद जुगेसर कहलन – ‘इ कइसे होई पूजा. हम अकेले खाइब. कुछ त बताव.’
– ‘हम रउरे में से ले लेब.’
– ‘पक्का त.’
– ‘हँ पक्का.’
– ‘त फेर हमरा पास आके बइठ.’
– ‘ना, इहां ना.’
– ‘इहां कोई थोड़े बा.’
– ‘ऊ बार-बार आव ता.’
तबहीं बेयरा फेर आ गइल. पुछलस – ‘खाना लागऽता. तब तक सर दो गो कोल्ड ड्रिंक दे जाईं?’
– ‘दे जा.’ जुगेसर के कहत भइल कि ऊ गइल आ तुरंत दू गो बोतल ले आइल. आमने-सामने ना रख के दूनो बोतल पूजा का सामनही रखलस. निकले का बेरा पर्दा बढिय़ां से खींच दिहलस.
पूजा आपन पर्स कुर्सी से उठा के टेबुल का किनारा पर रख के खुद ओह कुर्सी पर चल गइली. जुगेसर का दिमाग पर बोझ ना डाले के परल समझे में. उठके ओने बईठ गइलन कि पूजा कहली – ‘का भइल? बैठीं ना ओनिए.’
– ‘कइसे बैठीं जानू? तहरा के देख के बइठल जा सकेला का.’
दूनो कुर्सी के बीच कुछ ज्यादा दूरी ना रहे. पूजा बोतल के पाइप उनके मुंह से सटा दिहली आ खुद दूसरा पर रखली. एक घूंट पीके मुंह उठवली. तभी जुगेसर के बांह उनका के चारों ओर से जकड़ लिहलस. उनकर हाथ अपने आप ऊपर उठ गइल. जुगेसर के कंधा के चारों ओर फैल गइल. आज जुगेसर का सीना पर कुछ अधिके भार महसूस भइल. कोल्ड ड्रिंक से भीगल होठ एक दूसरा के गीलापन सोखे लागल लेकिन एही क्रम में ज्यादा गीला हो गइल. बाहर ट्रे के खटखटाहट से दूनो जाना कोल्ड ड्रिंक पीए लागल लोग हड़बड़ी में. लेकिन साइड बदले के समय ना मिलल आ जरूरीओ ना बुझाइल.
रेडियो पर आवाज आइल ‘अब सुनिए आरजू फिल्म में लता का गाया हुआ गाना जिसके लिए फरमाइश भेजी है रायबरेली से मो.शमीम, मो.इस्माइल, शोभा, धर्मेन्द्र झुमरी तलैया से कपिल केसरी, दिनेश केसरी, रामपुर से रमेश ओझा. गाना आवे लागल – बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है.’

चार बजे बस छूटल हार्डिंग पार्क से. बस के हाजीपुर पहुंचत-पहुंचत जुगेसर का पेट में एकबार मरोड़ महसूस भइल. घड़ी देखलन अबहीं करीब दो घंटा आउर लागी समस्तीपुर पहुंचे में. मुजफ्फरपुर पहुंचत-पहुंचत उनका आउर असुविधा बुझाए लागल. कंडक्टर से पुछहीं के पड़ल – ‘गाड़ी कहीं रुकी का?’
ऊ बड़ा ही रुखल जवाब दिहलस. मुजफ्फरपुर से समस्तीपुर का ओर मुड़ के अबहीं करीब 10 किलोमीटर गइल होई गाड़ी कि एगो आवाज भइल गाड़ी का नीचे से. ड्राइवर बस रोकलस. देखसुन के कहलस – ‘अबहीं आऊर 5 किलोमीटर गइला पर बदलल जाई.’
जुगेसर का सांस में सांस आइल. आखिर राम-राम करके ओजा पहुंचल बस. सब लोग का जइसे उतरल जरूरी रहे. बहुत देर से रोक के रखले रहे लोग. जुगेसर उतर के एने ओने देखे लगलन. होटल के एगो नौकर से पूछलन – ‘बाथरूम कहां बा?’
ऊ बाहर खेत दिखा दिहलस.
फेर पुछलन – ‘पानी?’
ऊ मुंह खोललस – ‘पहिला बार आए हैं का? ऊ का सब बोतल पड़ल है.’
जुगेसर पानी के हौज के पास से बीयर के एगो बोतल उठवलन. जल्दी-जल्दी होटल का पीछे गइलन. उनके बस के दूगो जनानी सवारी बइठल दिखल. अबहीं उनका शर्माए के समय ना रहे. ऊ ज्यादा दूर जाए वाला हालत में ना रहस. बैठ गइलन. सांस में सांस आइल. धीरे-धीरे सोचे के शक्ति जइसे वापस आवे लागल. अब तक ध्यानो ना रहे कि केतना बहुमूल्य सामान उनका बैग में बा. उनकर डेग जल्दी-जल्दी उठे लागल. पानी के हौज के पास साबुन के एगो गलल टुकड़ा रहे. ओसे हाथ धोके बस में बइठलन. बैग खोल के झट से देखलन. ना सब कुछ ठीक बा. संतोष के सांस फेंकलन.
समस्तीपुर पहुंच के बड़ा भूख लागल रहे लेकिन मन धिन-धिन कइले रहे. डेरा पहुंच के हाथ मुंह धोवलन. एक बार सोचलन जाके बाहर खा आवे के लेकिन हिम्मत ना भइल. फीता वाला स्टोव जला के खिचड़ी बइठा दिहलन. ओही में दू गो आलू डाल दिहलन.

बिछावन पर सगरी थकावटो नींद ना ले आ सकल. प्रोफेसर चटर्जी का साथ के बातचीत त मुहूर्ते में ओरा गइल लेकिन पूजा के साथ बितावल समय सेकेंडो का भाग में याद आवे लागल. ऊ रिक्सा प बइठल, पूजा के पीठ पर हाथ रखल, होटल में ऊ आलिंगन, छाती पर के दबाव शरीर पर अबहियों महसूस करे लगलन. हाथ से छुवे के कोशिश कइलन. धीरे-धीरे हाथ एने ओने जाए लागल.
नींद कब आइल उनका पता त दोसरा दिन लागल जब विनोद जी के आवाज पर उनका नींद खुलल.
विनोद जी सुबह में बहुते तरोताजा दीखत रहस. जुगेसर के चाय पीए खातिर अपना घर में बुलवलन. चाय पीयत-पीयत पटना के हाल चाल पर बातचीत होखे लागल. धीरे-धीरे दूनो जाना के बीच रिसर्च का विषय पर चर्चा केन्द्रित हो गइल. विनोद जी खुद बतवलन कि उनके रिसर्च के विषय आर्गेनिक केमिस्ट्री ही बा. ऊ अपना थिसिस का बारे में बतावे लगलन. कहलन – ‘युगेश्वर जी, का करीं. कांसंट्रेट नइखी कर पावत.’
– ‘काहे सर!’ आश्चर्य व्यक्त कइलन जुगेसर. – ‘माने ईश्वर के कृपा से सब कुछ त बा आप के पास.’
– ‘कुछ नइखे युगेश्वर जी, कुछ नइखे. जवन दीखऽता ऊहे हमरा जीवन के नरक बना दिहले बा. लेकिन छोड़ल जाव ऊ बात. हमरा राउर मदद के थोड़ा जरूरत बा.’
– ‘बतावल जाव सर. हमरा से जेतना संभव होई, कवनो कोताही ना करब.’
– ‘पहिले त ई सर वाला चक्कर छोड़ द. हमरा के भइया कहल आपुन बुझाला.’
– ‘सॉरी सर… भैया. फिर ई गलती ना होई. रउरा जइसन बड़ भाई पा के के धन्य ना होई. बताईं का करे के बा?’
– ‘हमार थिसिस तू एक बार देख, आ ओकरा के पूरा करे में हमरा के सहयोग करऽ.’
जुगेसर चुपचाप निहारत रह गइलन विनोद जी के ओर. थोड़ा देर रुक के विनोद जी कहलन – ‘देख भाई. कवनो जबर्दस्ती नइखे. यदि थोड़िको हिचकिचाहट महसूस होत होखे त बता दीह. हम तनिको बुरा ना मानब.’
– ‘ना बात ई नइखे भैया. हमरा पर रऊरा जवन दायित्व देबे के तैयार बानी ओकरा लायक हम अपना के नइखी समझत. अबहीं हमार ज्ञाने का बा जे रउरा लिखला पर लिखे के हिम्मत करब.’
– ‘देखऽ बात मत घुमावऽ. हम तोहार ज्ञान आ आपन कमजोरी बढिय़ा से जानत हईं. यदि तू चहबऽ त हमार पीएच.डी. हो जाई ना त सारा जिन्दगी एगो दारूबाज लेक्चरार होके हम रह जाइब.’
कहत-कहत विनोद जी के आंख डबडबा गइल. जुगेसर समय के नाजुक हालत भांप के चुप हो गइलन. कहलन – ‘कहां बा राउर फाइल. दीं हम कोशिश कर तानी.’
– ‘पहिले तू मुजफ्फरपुर जाके आपन नाम रजिस्ट्रर्ड करा आवऽ थिसिस तइयार करे खातिर. फेर हमार काम.’
– ‘जइसन अच्छा समझीं भैया.’
– ‘बस तू भैया कहल… एही से हमरा आत्मा के शांति मिल गइल.’

करीब एक सप्ताह लागल जुगेसर का अपना सब्जेक्ट के सिनाप्सिस बनावे में. एह काम में विनोदो जी भरपूर मदद कइलन. करीब 8 बजे स्टेशन अइलन जुगेसर मुजफ्फरपुर जाए खातिर. टिकट कटा के प्लेटफार्म पर आ गइलन. प्लेटफार्म पर चारों ओर लोग पर लोग रहे. हावड़ा से आवे वाली मिथिला एक्सप्रेस के सूचना भइल रहे.
ट्रेन अइले के देर रहे. आपन गठरी मोटरी लेके पैसेंजर जेने पावल ढूके लागल. सब्जी के टोकरी तक घुसावे लगले सब. कवनो उपाय ना देख के ऊ थ्री टीयर डब्बा में चढ़लन. ओह में बहुते लोग चढ़ गइल. गेटे से भीतर के तरफ जा के चुपचाप खड़ा हो गइलन जुगेसर. सामने सीट पर एगो बंगाली दम्पति रहे. अपना में घिसिर-पिटिर बतिआवत रहे सब. भाषा ना समझ में अइला के बावजूद ओकनी के बातचीत के विषय समझे में समय ना लागल. बीच-बीच में हिन्दुस्तानी, असभ्य जइसन शब्द उपयोग करत रहस दूनो. अगिला स्टेशन पर आउर जनता भर गइल. एगो बुर्जुग आदमी ऊ बंगाली दम्पति से कहलन – ‘थोड़ा बैठने दीजिए.’
औरत के मुंह से तपाक से निकलल – ‘कैनो? ए जनरल कमरा है क्या?’
– ‘आप लोग दो ही तो बैठे हैं, इसलिए कह रहा हूं.’
अब ऊ पुरुष शुरू भइलन – ‘हां, दू आदमी हैं तो क्या करोगे? खड़ा होके नहीं जाने सकता. एक तो रिजर्व बोगी में उठा है फिर बैठना मांगता है. बाप का राज पाया है.’
– ‘देखिए, जबान पर काबू रखिए. आपका सीट है, नहीं बैठने दीजिएगा कोई बात नहीं लेकिन गलत लब्ज इस्तेमाल नहीं कीजिए.’
– ‘क्या कर लोगे? बोलो.’ कहत-कहत ऊ बंगाली युवक खड़ा हो गइल. डब्बा में जेतना सारा लोग रहे सब चुप हो गइल. जुगेसर के खून खौले लागल. उनकर मुंह लाल हो गइल. आ ऊ जे बोले लगलन कबही सोचलहूं ना रहस. लगातार अंग्रेजी में ऊ युवके के अइसन सुनवलन कि ओकर सब अकड़ गायब हो गइल. बाकीओ लोग के साहस आ गइल. दू गो बिहारी पैसेंजर जे सामने रहे ऊ कहे लागल – ‘अरे बाप रे. ई दूनो से हमनी रात से परेशान बानी. पहिले त ई सारा रात गुटर-गुटर कइलऽ हं सब. आ सबेरही से बिहारी हिन्दुस्तानी कह-कह के गाली देत ह ऊ अपनिहे में. अब तक बाकीओ जनता सजग हो गइल.
बुझाइल ऊ दूनो मरद-मेहरारू के पिटाई-सिटाई हो जाई. आखिर में बूढ़ा सज्जन से माफी मंगवा के जुगेसर सबका के शांत कइलन.


(बाकी फेर अगिला कड़ी में)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” – 2

– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

अबले जवन पढ़नी ओकरा आगे …)


-‘अरे योगेश्वर, कहां घुम तार?’ ऊ कहलन.
-‘सर प्रणाम. हम समस्तीपुर जैन स्कूल में ज्वाइन कइले बानी. महीना भर भइल. रउरा कब से हईं इहां?’
-‘हम त रिजल्ट का बादे लाग गइनी इहां. बिहार के त पालटिक्स समझते बाड़. हम देखनी चांस काहे मिस करे के. लाग गइनी.’ – ‘कइसन भइल बा तोहार परीक्षा?’
-‘हमरा तरफ से ठीक ही बा. बाकिर रउरा सबके आशीर्वाद. ‘
-‘पटना यूनिवर्सिटी में हमरा आशीर्वाद से कुछ नइखे होखे वाला. हम त सम्पर्को ना राखीं. चल तू आ गइल त खबर लगाइले.’ बात पर बात निकलत गइल. कब सांझ हो गइल पता ना चलल. बात-बात पर जुगेसर के जे बुझाइल ओकर सार इहे रहे कि पांडेय जी के मुजफ्फरपुर के कवनो महान ब्यक्ति के लडक़ी से शादी कइला के दहेज में उनका ई लेक्चरारशिप मिलल बा. इहो खबर लागल कि बड़ी जल्दी दरभंगा विश्वविद्यालय बने वाला बा, आ बिनय पांडेय के कुछ विशेष दायित्व मिले वाला बा. जुगेसर का रामसुन्दर प्रसाद के बात याद आ गइल. उनका चेहरा पर एक बार मुस्कान फैल गइल.
जिन्दगी रुटीन भइल जात रहे कि एगो चिट्ठी एक बार फिर जुगेसर के ध्यान पटना खींच ले गइल. अंतर्देशीय पत्र पर पूजा के चिट्ठी रहे –

‘आदरणीय सर,
प्रणाम.

आप त हमनी के भुला गइनी लेकिन हम आप के हमेशा याद कर तानी. हमार रिजल्ट निकलल बा. मेडिकल हमरा बस के बात नइखे. पार्ट वन के परीक्षो कुछ ठीक नइखे भइल. न जाने भगवान के का मर्जी बा. अइसहूं भगवान हमरा के त ना बुद्धि दिहले बाडऩ ना सूरत. अच्छा नइखे लागत. दीदी आइल रल, बिल्कुल बदल गइल बड़ुवे, ड्रेस त ड्रेस, भाषो बहुते बदल गइल बा.

एक दिन हम आपके बात चलवनी त अइसे मुंह बिचकवली कि हमरा खराब लागल. मम्मीओ के अच्छा ना लागल ह दीदी के ब्यवहार. हम आपके चिट्ठी लिखे के त कह ना सकीं. हमार भूल त्रुटि माफ करब आ आपन खयाल राखब.

आपके,
पूजा’

चिट्ठी एक बेर फेर पढ़लन जुगेसर. पटना के जिन्दगी में पढ़ाई का अलावे बैकुण्ठ जी के परिवारे उनका खातिर महत्वपूर्ण रहे. पूजा के चिट्ठी पाके एक बार उनका ऊ सारा समय याद आवे लागल. बिछावन पर सूतल-सूतल पूजा के हर छोट-मोट बात उनका सामने घूमे लागल. कतना अंतर बा अर्चना आ पूजा में.

छुट्टी के दिन रहे. विनय जी से मिले खातिर उनका घर पहुंच गइलन जुगेसर.
-‘आव-आव योगेश्वर.’ बड़ा गर्मजोशी से स्वागत कइलन विनय पाण्डेय. अन्दर ड्राइंग रूम में बइठवलन. सोफा रखल रहे. सामने छोटहन टीवी. साइड में फ्रिज. उनका के बैठा के विनय जी अन्दर गइलन. अन्दर जनानी आवाज सुनाइल. एगो गिलास में पानी ले आ के जुगेसर का सामने रखाइल.

बहुत देर तक बातचीत चलत रहल. एही बीच एगो औरत ड्राइंग रूम में आइल. उहां जे कोई बइठल बा एपर जइसे ध्यान ना दिहलस. सलवार सूट में. इ समझ में ना आइल कि ऊपर के हिस्सा कहां खतम भइल आ नीचे कहां शुरू भइल. लागत रहे ताड़ के गाछ पर कपड़ा बा. छोट-छोट केस.

जुगेसर के जिज्ञासा समझ गइलन विनय जी कहलन – ‘तोहार भाभी.’

भाभी सुन के उहो मूड़ी घुमवली. जुगेसर के जोड़ल हाथ ओइसहीं रुक गइल – ‘प्रणाम भाभी जी’ के सम्बोधन जइसे गला में अटक गइल. निकले के चाहीं सोच के जुगेसर जी उठे लगलन – ‘फिर अइह योगेश्वर. आज त तहरा के चायो ना पिला सकनी. असल में काम करे वाली गांवे चल गइल बिया.’

जुगेसर का समझे के कुछ बाकी ना बाचल. बड़ा महंगा सौदा कइले बाडऩ विनय पाण्डेय. ना ऊ अइसन ना करिहन. रात के बाबूजी के चिट्ठी लिखे बइठलन. तीन-चार दिन के छुट्टी रहे. जुगेसर ठीक कइलन एक बार गांवे घूम आइल जाव. जाये में दू दिन बाकी रहे. बाबूजी के चिट्ठी सारा प्लान बिगाड़ दीहलसि.

चिट्ठी में त बहुत कुछ लिखल रहे. जवन मुख्य बात रहे ओकर माने रहे उनकर पिछला चिट्ठी बाबूजी के इज्जत जरा के खाक कर देले बा. रामसुन्दर प्रसाद जी के रिश्ता ना करके ऊ आपन त जिन्दगी खराब कइलहीं बाडऩ खानदानो के आशा गंगाजी में बहा दिहलन.

एगो लाइन दू तीन बार रहे-

– ‘तहरा से हम आपन सम्पर्क तुड़त बानी. तू हमरा मरलो पर मत अइह, ई प्रार्थना कम से कम रखिह.’

जुगेसर त एक बार किंकर्तव्यविमूढ़ हो गइलन. जब सामान्य भइलन त उनकर दृढ़ निश्चय चेहरा पर झलके लागल. छुट्टी में चपरासीओ कहीं जाए के प्लान कइले रहे. जुगेसरो सोचले पटने घूम आवल जाव. स्टीमर से उतर के रिक्सा में बइठलन. बैकुण्ठ जी का दरवाजा पर घंटी बजावे का पहिले एक बार मन हिचकल. लेकिन दोसरा जगह कहां जइहन सोच के घंटी बजवलन. अन्दर से बैकुण्ठे जी के आवाज आइल. बतवले – ‘योगेश्वर.’

सुनाई पड़ल – ‘अरे पूजा, देख के आइल बा?’

दरवाजा खुलल. सामने पूजा. पीछे बैकुण्ठ जी. सबसे पीछे उनकर स्त्री. पूजा के पैर जइसे एकबारगी ठिठक गइल. चारो आंख एक दूसरा पर ठहर गइल. दूनो जाना के पैर छुअलन जुगेसर. बैकुण्ठजी उनके लेके ऊपर गइलन. उनकर कमरा ओइसने रहे जइसन छोड़ गइल रहस. ऊ बिछावन फइलवलन. तब तक बैकुण्ठजी खिडक़ी खोल दिहलन. एक जना कुर्सी पर आ एक जन बिछावन पर बइठलन. दूनो जाना का मुंह से एके साथ निकलन – ‘का हाल चाल बा?’

बैकुण्ठ जी मुंह खोललन – ‘हमरा घर के त हाल आपके मालुम होई. पूजा के मेडिकल ना निकलल. पार्ट वनो जइसे तइसे कइलसि ह. अब कहतारी मेडिकल में ना बइठेब.’

उनकर रोवल देख के जुगेसर पुछलन – ‘आ अर्चना के का हाल बा?’
-‘ठीके-ठाक बा. आइल रली छुट्टी में. सेकेंड ईयर हो गइल एह साल. अब आपन बतावल जाव.’
-‘हमार त नया जिन्दगी बा. स्कूल के मास्टरी. कइसहूं चलता.’
-‘अरे मास्टरी त आप शौक से ज्वाइन कइली हँ. अब त महीना भर में रिजल्ट आई. पटना विश्वविद्यालय के फर्स्ट क्लास फर्स्ट लडिक़ा मास्टरी थोड़े करी.’
‘का जे कहतानी.’ जइसे शरमा गइलन जुगेसर. – ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट हमरा जइसन आदमी ना मिलेला का?’
-‘देखीं हमहूं विश्वविद्यालय में बानी. कुछ त खबर पाइला. एह बार कवनो बंगाली लडिक़ा बा ना क्लास में. एहू से प्रो.चटर्जी एकदम टाइट बाडऩ. बाकिर झा जी आ राय जी के झगड़ा आप के मालुमे बा. दूनो जाना एक दोसरा क कैंडिडेट के टांग खींचे में लागले बा लोग.’ बाकी जुगेसर चुपचाप सुनत रहलन.- ‘ई शिक्षा व्यवस्था ह. इहां पढ़ाई नां, जात-भाई के बिचार होता ग्रेड देबे में.’
-‘देखी हम ओकर आसो नइखी रखले. जल्दी रिजल्ट निकल जाव इहे बहुत बा.’
-‘एक महीना के अन्दर निकल जाई. एक्सटर्नल सुननी ह नम्बर भेजिओ दिहले बा.’
तबही पूजा एगो ट्रे में दूगो चाय आ एक प्लेट में समोसा लेके ढुकली. एक बेर जुगेसर ओकरा ओर देखलन. आंख मिलल. पूजा आंख झुका लिहलस. धीरे से प्लेट टेबुल पर रख के खड़ा हो गइली.
-‘लीहल जाव. ‘ कहके बैकुण्ठ जी चाय के कप मुंह से लगवनल. जुगेसर के शुरू कइल देख के पूजा कहलस – ‘आज हम खाना बनावतानी. बाहर मत खाइब.’
जुगेसर जिज्ञासा सूचक नजर से बैकुण्ठ जी का तरफ देखलन.

दोसरा दिन जुगेसर यूनिवर्सिटी के तरफ गइलन. चटर्जी सर के कमरा पर खटखटा के अन्दर गइलन.
-‘यस मिस्टर प्रसाद, हाऊ डू यू डू.’
-‘सर, ठीक हूं. ‘
-‘देन, आगे क्या प्रोग्राम है प्रसाद?’
-‘अब सारा कुछ त रिजल्ट पर निर्भर बा, सर.’
-‘दैट विल कम वैरी सून. लुक, अभी जो टाइम आ रहा है टीचिंग में रहने का वास्ते पीएच.डी. बहुत जरूरी है. तुम अभी उस तरफ सोचो.’
-‘मन तो मेरा भी होता है सर. लेकिन…’
-‘आई नो, आई नो. जेनेरल प्रोब्लम ऑफ बिहारीज. नो जाब, नो मनी. आर यू मैरेड?’
-‘नो सर.’
-‘देखो माई ब्वाय. पहले ठीक करो.. फिर रास्ता ऊपर वाला देगा. हैव फेथ इन योरसेल्फ. ओ.के..’
जुगेसर देखलन चटर्जी सर टेबुल पर कुछ लिखे लगलन. ऊ प्रणाम कर के निकल गइलन. बहुते प्रोत्साहन महसूस होत रहे. त का बैकुण्ठ जी ठीके कहत रलहन?
कब दिन निकल गइल. एगो क्लासमेट मिल गइल. पटने के रहे. ऊ आईएएस के तैयारी करत रहे. पिछला बार एलायड मिलल रहे ना गइल. ओकरे साथे गांधी मैदान से टहलत-टहलत फ्रेजर रोड का ओर निकल गइलन जुगेसर. उहां से स्टेशन के तरफ. ऊ हनुमान जी के बड़ा भक्त रहे. ओकरा साथ-साथ जुगेसरो भगवान का सामने माथा झुकवलन तब हनुमान मंदिर के चेहरा आज जइसन ना रहे. लौटे में करीब 9 बज गइल. गेट पूजा खोलली.
-‘कहां-कहां घूमत रनीह सारा दिन. हाथ मुंह धोईं हम खाना ले आवतानी. ‘
जुगेसर कमरा में जाके कपड़ा बदललन. हाथ मुंह धोके अभी पायजामे पहिनले रहस कि पूजा खाना लेके पहुंच गइल. अपना खाली बदन पर बड़ा लाज लागत रहे. शर्ट बैग में रहे. जवना के निकाले जाए का जगह पूजा खड़ा रहे. उनकर शरमाइल देख के पूजा खिलखिला के निकल गइल. तब जा के उनका सांस में सांस आइल.

तिसरका दिन साँझिए के बैकुण्ठ जी के बता दिहलन जुगेसर जे काल्हु सबेरे ऊ निकल जइहन. रात में नींद ना आवत रहे. ऊ उठ के छत पर टहले लगलन. चांदनी रात रहे. चारों ओर सन्नाटा. ऊ सीढ़ी के पीछे की ओर रहस. तबही कुछ आहट महसूस भइल. देखलन पूजा हई. धीरे-धीरे फुसफुसाइल – ‘नींद नइखे आवत. ‘
जुगेसर निरुत्तर. ऊ अउर पास अइली. धीमा आवाज आइल – ‘आप त चल जाइब. हमरा के भुला ना नु जाइब?’

जुगेसर चुपचाप निहारत रहलन. टहटह अंजोरिया के परकास में खुलल बाल का बीच चेहरा साफ-साफ देखाई देत रहे.
ऊ आगे बढक़े एकदम सामने आ गइल. दूनो हाथ पकड़ के कहली – ‘का भइल, कुछ बोलत काहे नइखी? जुगेसर के होठ हिलल. दूनो हाथ से पूजा के सर पकड़लन. पूजा के चेहरा अपने आप ऊपर उठ गइल. दूनो के होठ सट गइल. दूनो के सांस रुक गइल रहे. आ साथ में हवो ठहर गइल जइसे. चांद के मुस्कुराइल देख के कहीं कवनो आवारा चिडिय़ा शान्ति भंग क दिहलस. पूजा चिहुंक के अपना के उनका बाहुपाश से अलग कइलस आ तेज पैर नीचे चल गइल.

जुगेसर का पैर पर जोर ना मिलत रहे. ऊ धीरे-धीरे कमरा में अइलन. बिछावन पर लेटत-लेटत कब नींद के गोद में समां गइलन, पता ना चलल.

अबकी बार समस्तीपुर एगो नया अनुभूति लेके अइले जुगेसर. दिन त स्कूल में निकल जाव लेकिन रात में उहे अनुभूति तरह-तरह से याद आवे. ई अइसन बात रहे जवना के केहु से कहलो ना जा सके. एक तरह के कसक, जवना के अनुभव उनका पहिला बार भइल रहे. बीच-बीच में विनोद पाण्डेय जी से कालेज में मिल आवस. एक दिन विनोद जी क्लास लेत रहस. जुगेसर का सब लेक्चरर लोग से परिचय हो गइल रहे. डॉ.ठाकुर अकेलहीं बइठल रहस. उहे समस्तीपुर कालेज में पीएच.डी. कइले रहस. स्वाभाविक रूप में थोड़ा अकड़ रहे. आज उहे बात उठवलन – ‘कब तक रिजल्ट आ रहा है आप लोगों का योगेश्वर बाबू?’
-‘सर, कहत रल लोग एही महीना में. ‘
-‘फिर क्या सोच रहे हैं? टीचिंग में आना है या कोई दूसरा विचार कर रहे हैं. ‘
-‘अभी तक त कुछ निर्णय ना कर पइले हईं. ‘
-‘यही तो प्राब्लम है बिहारियों का. सोचते हैं समय आने पर सोचेंगे. अरे भाई, समय आने पर सोचने का समय थोड़े मिलता है. ‘ अपना अलंकृत वाक्य पर खुद मुस्कुराये लगलन डॉ.ठाकुर.
-‘अब हम का कहीं सर. सबकर आपन लिमिटेशन होला.’
-‘लिमिटेशन का सहारा लेकर अपना दोस्त की तरह नहीं बन जाना भैया.’

जुगेसर इशारा समझे के कोशिश कइलन. उनकर भंगिमा देख के डॉ.ठाकुर समझ गइलन स्पष्ट कइल जरूरी बा. ऊ कहलन – ‘लिमिटेशन लाता है समझौता. और आदमी जब जिन्दगी से समझौता करता है एक के बाद दूसरा समझौता उसे नीचे ढकेलता जाता है.’

जुगेसर डॉ.ठाकुर के एक-ए-गो शब्द जइसे समझे के कोशिश करे लगलन. तब ले घंटी बज गइल. डॉ.ठाकुर उठके उनका पीठ पर हाथ रख के कहलन -‘हम क्लास में चलें भाई. बेस्ट ऑफ लक.’

थोड़ देर में विनोद जी आ गइलन. आज जुगेसर उनका ओर बड़ा ध्यान से देखे लगलन. ऊ धम्म से कुर्सी पर बइठलन. पानी के गिलास हाथ में लेत-लेत पुछलन – ‘कतना देर अइला भइल योगेश्वर जी?’
पानी पीके ऊ एगो लम्बा सांस लिहलन. एगो अल्कोहल जइसन गंध अनुभव कइलन जुगेसर. त का ड्रिंक करे लगलन विनोद जी?
बातचीत करे लागल लोग. पटना से जवन पता चलल रहे जुगेसर बतवलन. साथ ही उनको के पता लगावे के कहलन. आज बातचीत में कुछ मजा ना आवत रहे.

———

ऊ महीना निकल गइल. रिजल्ट के पता ना चलल. इन्तजार के समय बड़ा लम्बा होला. एक दिन ऊ क्लास में रहस. तबहीं चपरासी आइल. बतवलस-प्रो.पाण्डेय आइल बाडऩ. जुगेसर क्लास छोड़ के भागल-भागल अइलन. उनका के देखते विनोद जी खुद खड़ा होके आगे बढ़लन. जुगेसर कुछ कहस एहसे पहिलहीं ऊ उनकरा के अंकवारी में भर लिहलन. – ‘अरे यार, कमाल कर दिया तूने.’ दोसरा लोग की ओर देखके कहलन – ‘ग्रेट, जानतार सब लोग ? योगेश्वर हैज गौट फर्स्ट क्लास फर्स्ट.’

जुगेसर के त होश उड़ गइल.

विनोद जी जब मुक्त कइलन उनके ऊ कुछ बोल ना पवले. सुख आ दुख दुनु के चरम अनुभूति आदमी के मौन बना देला. विनोद जी चपरासी के पजरा बोलवलन. पाकेट से बीस रुपया देके कहलन – ‘भाई जा मिठाई ले आव. हमार भाई कमाल कर दिहले बा.’

जुगेसर का सच में लागल आज जिन्दगी सफल हो गइल. आज विनोद पांडे उनका सबसे बड़ा हितैषी लागत रहस. उनकर सर अपने आप विनोद जी का पैर पर झुक गइल.

विनोद जी उनका के उठा के अपना से सटा लिहलन. उनकर अवस्था देख के जुगेसरो अपना के रोक ना सकलन.

दोसरे दिन ऊ रवाना हो गइलन पटना. पहुंचत-पहुंचत शाम हो गइल. कालेज जाए के कवनो मतलब ना रहे. सीधा पहुंचलन ऊ बैकुण्ठ जी का घरे. दरवाजा खटखटवलन. बैकुण्ठ जी दरवाजा खोल के उनका के गले लगा लिहलन.
-‘भगवान आखिर सच के पक्ष में फैसला दे देहलन. तू फर्स्ट क्लास फर्स्ट आइल बाड़.’ आज पहिला बार बैकुण्ठ जी का मुंह से उनका प्रति तू सम्बोधन निकलल रहे.

जुगेसर के लडिक़ा जइसन हाथ पकड़ के ऊ अन्दर ले गइलन. आज ऊपर ना ले गइलन. सीधे अपना कमरा में ले गइलन. उनका बइठत बइठत उनकर मेहरारू हाथ में एगो प्लेट में लड्डू लेके अइली. ऊ उठ के उनकर पैर छुवलन. अपना हाथ से मिठाई उनका मुंह तक बढ़वली. मिठाई अपना हाथ से पकड़ के खाए लगलन जुगेसर.

बैकुण्ठ जी आज कुछ बेसिए बोले लगलन – ‘बड़ी लड़ाई रल. पटना विश्वविद्यालय में फर्स्ट भइल मुख्यमंत्री भइला से कम नइखे. हमरा संतोष बा कि एगो हीरा हमरा कुटिया में कुछ दिन रहल.’

जब सब कुछ सहज हो भइल त जुगेसर पुछलन – ‘पूजा नइखी का?’
– ‘नइखी माने ? ऊ त जब से खबर पवले बिया खुशी से नाचतिया. उहे त मिठाई लेके आइल रल. सबसे कहत फिरता हमार सर फर्स्ट भइल बाडऩ केमिस्ट्री में.’
थोड़ देर रुक के कहलन – ‘लागता तहरे जाए क पड़ी पूजा का पास.’
-‘चलीं.’ कहके जुगेसर उठ पड़लन. बैकुण्ठ जी आगे-आगे पूजा वाला कमरा में जा के लाइट जलवलन. पूजा एकेबेर में उठ खड़ा भइली.
-‘देख के आइल बा?’
पूजा टुकुर-टुकुर ताके लगली. आंखिन का ओर देख के जुगेसर महसूस कइलन आंख सूजल बा. आंख झुका के खाली अतने कह पवली पूजा – ‘कांग्रेचुलेशन.’
-‘खाली कांग्रेचुलेशन कहला से होई?’ जुगेसर कहलन. पूजा सर झुकवले झुकवले कहली – ‘ हम आउर का कर सकिला?’
-‘काहें? अब तू फर्स्ट आके हमरा के कांग्रेचुलेशन देबे के बाध्य कर.’ माहौल सामान्य हो गइल. आ पूजो. ऊ कहली – ‘बइठीं सब. हम चाय ले आवतानी’

ऊ किचेन में चल गइल. जुगेसरे कहलन – ‘चलल जाव, ऊपरे बइठल जाव.’ दूनो आदमी ऊपर कमरा में गइल लोग. आज ऊपर बिछावन लागल रहे. बइठे का पहिले हाथ से छुवलन जुगेसर. एगो अलग सुख पूरा शरीर में फइल गइल. तरह-तरह के बात भइल. आगे के कैरियर जुगेसर खातिर ज्यादा महत्वपूर्ण रहे. उनका इ त समझ में आ गइल टीचिंगे उनकर लक्ष्य हो सकेला. ओह खातिर कवनो कालेज ज्वाइन कइल जरूरी बा.

जेकर केहू ना होला, ओकर खातिर भगवान होले. भगवान जब मदद करे चाहेलन केहू ना केहू व्यक्ति उनके रूप में आ जाला. जुगेसर खातिर विनोद पाण्डेय भगवान के दूत बन के मिलल रहस.

समस्तीपुर में आवत-आवत ऊ विनोद जी से मिले गइले. सुबह के समय रहे. हल्का-हल्का सर्दी रहे. बाहर लॉने में विनोद जी टहलत मिल गइलन.
-‘आव आव योगेश्वर. हम तहरे प्रतीक्षा करत रहलीं ह.’
जुगेसर उनकर पैर छुए के चहलन. पैर खींच के विनोद जी कहलन – ‘अरे भाई हमरा के एतना महान मत बनाव. हम तोहार बड़ भाई बानी.’
-‘बड़ भइयो बाप के समान होला.’ जुगेसर उनका के निरुत्तर कर दिहलन.
-‘अरे भाई अब पटना यूनिवर्सिटी के फर्स्ट ब्वाय से हम जीत सकिला का. चल बइठल जाव.’
आज नौकर रहे. दू कप चाय लेके आइल. बात होखे लागल.
तय भइल विनोद जी कालेज मैनेजमेंट से बात कइले बाडऩ. जुगेसर आपन बायोडाटा दे अइहन. विनोद जी से सम्पर्क के बारे में सबका मालूम रहे. दरभंगा विश्वविद्यालय बनला पर ऊ जे एगो महत्वपूर्ण जगह पइहन सबका पता रहे. विश्वविद्यालय से अच्छा सम्पर्क कालेज खातिर हमेशा लाभप्रद होला.
एक महीना के अन्दर जुगेसर जी समस्तीपुर कालेज में केमिस्ट्री के लेक्चरार हो गइलन. ऊ पहिला काम कइलन पटना बैकुण्ठ जी के पत्र लिखके सूचित कइलन. ओमे अपना कालेज के फोन नम्बरो दिहलन. सकुचाइल सकुचाइल बाबूओजी के चिट्टी भेजलन.

करीब एक महीना बाद कहीं से फोन आइल. जुगेसर का हलो कइला पर जवन आवाज आइल ओकर आशा ऊ ना कइले रहस. पूजा रहल. शुरू में त आवाज में थोड़ा घबराहट रहे. धीरे-धीरे ठीक हो गइल.
-‘हमनी के फोन लाग गइल.’ बतवली पूजा – ‘अब रउरा फोन करब.’
-‘लेकिन नम्बर त बताव.’ जुगेसर मुस्कुराइल ना रोक पवलन.
फोन से बतियावे के सबसे बड़ा फायदा बा – जवन बात आदमी सामने ना कह सके, ऊहो आराम से कह लेला. पूजो आज बहुत कुछ कह गइली. हालांकि कवनो क्रम ना रहे लेकिन जुगेसर के सोचे के एगो अलग आयाम जरूर मिल गइल. जुगेसर स्वभाव से अंतर्मुखी रहस लेकिन पूजा उनका जिन्दगी में एगो अलग तरह के रंग ला देले रही. अइसहूं बचपन से अब तक के लड़ाई थम गइल रहे. जिन्दगी के ठहराव वाला स्थितिओ बड़ा महत्वपूर्ण होला. ए समय के तुलना दूसरा ग्रह के यात्रा पर निकलल रॉकेट से कइल जा सकेला. जैसे चन्द्रमा पर जाए वाला रॉकेट बा. पृथ्वी के कक्ष में चक्कर लगावत-लगावत उ अइसन जगह पहुंचेला जहां पृथ्वी आ चन्द्रमा दूनो के गुरुत्वाकर्षण एक दूसरा के बैलेन्स कर देला. इहां से चन्द्रमा के कक्ष में घुसे खातिर रॉकेट का एगो अलग फोर्स के जरूरत होला. यदि ऊ फोर्स सटीक समय पर ना मिले त रॉकेट पृथ्वी के चारों ओर घुमते रह जाई. आ चांद के यात्रा कभी पूरा ना कर पावेला. जिन्दगीओ के लड़ाई कुछ अइसने होला. पढ़ाई के अवधि ले आदमी जवना ताकत के इस्तेमाल करेला ऊ ओकरा बाद अइसहूं कमजोर हो जाला. जबकि जीवन कक्ष में सफल प्रवेश खातिर ज्यादा अलग तरह के ताकत के जरूरत होला. ज्यादातर आदमी अपना पुरनका जीवन के चारों ओर चक्कर लगावे में रह जाला. मजा त ई कि ऊ पुरनका जीवन में लवटिओ ना पावेला.

जुगेसर के पटना आइल-गइल कुछ बेसिए बढ़ गइल. अब ऊ प्रोफेसर प्रसाद रहस. पटना महात्मा गांधी पुलो बन गइल. अब समस्तीपुर से बस सीधा पटना पहुंचा देव. ऊहां से ऊ बैकुण्ठ प्रसाद के घर जास. अब खाली हाथ ना जास. मिठाई के डब्बा रहे हाथ में. एक बार बैकुण्ठ जी के पत्नी खातिर एगो साड़ीओ ले गइल रहस. मुंह से त ना नुकुर कइली ऊ लेवे में लेकिन अन्दर के प्रसन्नता चेहरा पर साफे झलकत रहे.

थोड़ मुश्किल रात में भइल. खाना लेके पूजा आइल रहे. ओकरा के कुछ बोलत ना देख के ऊ पुछलन – ‘का बात बा आज हमार पूजा नाराज लउकतारी?’
पूजा मुंह बिचकवली – ‘हमरा नाराज होखे के कवन अधिकार बा?’
-‘तब त सचमुच में पूजा रानी गुस्सा में बाड़ी. लेकिन न बतवला से हम कइसे समझब?’
-‘वाह, मम्मी खातिर त स्पेशल गिफ्ट आइल ह. हम त यादो ना अइनी.’
जुगेसर का समझ में आ गइल. कहलन – ‘सॉरी बाबा. वैरी सॉरी. लेकिन इ कइसे समझलू ह कि हम तहरा के भूल गइल बानी.’
फेर अपना बैग से एगो पैकेट निकललन. उनका देबे के पहिलहीं पूजा झपट के ले लिहलस. खोलत-खोलत कहलस – ‘का ह?’
कहे के ना पड़ल. पैकेट में एगो पेन सेट रहे. पूजा का थैंक्यू कहला पर जुगेसर कहलन – ‘खाली थैंक्यू कहला से ना होई.’
‘छि:!’ कहके पूजा कमरा से बाहर हो गइल. रात में जुगेसर के नींद खुल गइल. अभी-अभी 2 बजल रहे. कतनो कोशिश कइलन नींद ना आइल. तबहीं लागल कोई आव ता. ऊ सांस बंद कर के इन्तजार करे लगुअन. कुछ देर तक कुछ ना बुझाइल त आंख खोललन.
गेट पर खड़ा रहे ऊ. ऊ आगे बढ़लन. दूनो के बांह उठ गइल. फिर दूनो शरीर एक दूसरा के जकड़ लीहलस. सुनसान रात में दूगो होठ मिले के आवाज आइल. फेरु सहारा देके बिछावन का ओर ले अइलन. हल्का सा विरोध बुझाइल ओने से.
बेहोशी भंग भइल.
-‘इ का कइनी?’
-‘हम ना तू.’
-‘दूनो जने लेकिन फल?’
-‘दूनो का मिली. ‘
-‘सच त?’
-‘अबहीं ले हम झूठ नइखी बोलत. ‘
-‘हमरा विश्वास बा तबहीं त… ‘
आगोश में भर लिहलन ऊ. कसमसाहट के आवाज.
समस्तीपुर के बस रहे चार बजे. जुगेसर सबसे बिदा लिहलन.

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पढ़ावल सबसे सुन्दर पेशा ह. यदि मन से कइल जाव. खासकर के यदि विद्यार्थी समझदार होखे. आज बीएससी में क्लास लेत रहस जुगेसर. तब क्लास में अंग्रेजी बोले के रिवाज रहे. विषय रहे आणविक संरचना. शुरू में कएक मिनट बोले में थोड़ा हकलाहट रहे उनका में, आ छात्रन में अकुलाहट. एकरा पहिले इ क्लास डॉ.ठाकुर लेस. फिर त जुगेसर रम गइलन.
-‘आप सब का ब्रह्माण्ड संरचना के बारे में त थोड़ा बहुत ज्ञान होई. आणविक संरचनो बहुत हद तक ओइसहीं बा. बल्कि अइसे कहल जा सकेला हरेक परमाणु ब्रह्माण्डे के छोटहन स्वरूप ह. हरेक परमाणु मुख्यत: तीन चीज से बनल बा प्रोटान, न्यूट्रान अउर इलेक्ट्रान. प्रोटान (+) पाजिटिव आवेश से, इलेक्ट्रान (-) निगेटिव आवेश से आवेशित होला, जबकि न्यूट्रान के कवनो आवेश ना होला. प्रोटान आ न्यूट्रान के वजन होला जबकि इलेक्ट्रान में कवनो वजन ना होखे. प्रोटान आ न्यूट्रान मिलके न्यूक्लियस बनावेला. कौनो पदार्थ के आणविक वजन ओकरा में प्रोटान आ न्यूट्रान से निर्धारित होला.
अब जवन स्वाभाविक प्रश्न उठत बा ऊ ई कि प्रोटान (+) आ इलेक्ट्रान (-) होके अलग-अलग कइसे रहता. (+) प्लस आ (-) माइनस एक दूसरा के खींचत काहे नइखे.

थोड़ा रुकले जुगेसर. क्लास में चारो ओर नजर दौड़वले. क्लास में कुल चार गो लडक़ी रहलीं जवन सामने साइड का बेंच पर सब बइठल रहे. ओह समय लडक़ी के क्लास में अलग बइठही के चलन रहे. सब लडिक़ा चोर नजर से ओनिए देखत रह स. जुगेसर हल्का सा मुस्कुरा के फिर शुरू क दिहलन – ‘काहे कि इलेक्ट्रान न्यूक्लियस के चारों ओर चक्कर लगावत रहेला, एगो निर्धारित कक्ष में. जब तक ऊ घूमत रही परमाणु रही, आ घूमल बंद त परमाणु के अस्तित्व खतम.’

न जाने कब से विनोद जी पीछे खड़ा भइल रहस. साथ में प्रिंसिपल भी रहस. जुगेसर एतना मगन होके पढ़ावत रहस कि ध्यान ना दिहले. क्लास का बाद विनोद जी कहलन-‘अरे भाई तू त सबकर छुट्टी कर देब. चल आज शाम के हमरा घर पर पार्टी बा. हमार घरे नइखी त थोड़ा मस्ती कइल जाव.’

‘नया अनुभव’ इहे जुगेसर के भेंटाइल रहे. जिन्दगी के हरेक मोड़ पर नया नया परिचय. अइसन पार्टी से ऊ पहिला बार मुखातिब भइलन. उनका कालेज के लोग रहले रहे. एगो विशिष्ट व्यक्तिओ रहस. उनका नया से परिचय भइल. नाम रहे सत्यकाम जी.
कालेज के चपरासी बडक़ा बैग में सामान लेके पहुंचल. सोफा पर ऊ पांचों जाना बइठ गइल लोग. पांच गो गिलास आ पानी रख गइल चपरासी. जुगेसर जी पानी ढार के पीए लगलन. डॉ.ठाकुरे कहलन – ‘अरे योगेश्वर जी, पानिए से पेट भरिएगा का?’
तब तक एगो बोतल खुलल. ढारे का बेर जुगेसर एक बार हिचकलन लेकिन खुद के पिछड़ल ना समझल जाव सोच के कुछ बोललन ना. एगो प्लेट में चना के भूंजा रहे, तेल मिर्ची का साथ मिलावल. सभे शुरू क दिहलन – ‘चियर्स.’
पहिलका घूंट में जुगेसर का लागल उल्टी हो जाई. का गन्दा गंध आ स्वाद रहे. ऊ जल्दी से एक मुट्ठी चना मुंह में डललन. -‘ बाप रे.’
-‘धीरे-धीरे, जनाब.’ डॉ.ठाकुर अपना चिरपरिचित अदब से कहलन.


(बाकी फेर अगिला कड़ी में)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

आवऽ लवटि चलीं जा – (1)

Dr.Ashok Dvivedi

– डा॰अशोक द्विवेदी

भाई का डंटला आ झिरिकला से गंगाजी के सिवान छूटल त बीरा बेचैन होके अनासो गांव चौगोठत फिरसु. एने ओने डँउड़िआइ के बगइचा में फेंड़ा तर बइठि जासु आ सोचल करसु. सोचसु का, खाली उड़सु. कल्पना का महाकाश में बिना सोचल-समझल उड़सु. एह उड़ान में कब पाछा से आके पनवा शामिल हो जाव, उनके पता ना चले. आम के मोजरि दनात रहे, ओकर पगली गंध बीरा के न जाने कवन मादक निसा में गोति-गोति देव. पनवा के दमकत गोराई, ललछौंही मोहखरि, लसोरि तिरछी चितवन आ गदराइल देहिं, रहि-रहि के उनके अपना ओर घींचे लागे. रहि-रहि के उनका मन परि जाव ऊ इनार आ पियास लागि जाव. कंठ सूखि के अगियाए लागे त उठि के घरे चलि देसु.

ई ना रहे जे पनवा चैन से होखे. बैखरा लेले रहे ओकरा के. बीरा के पाम्ही आवत गोल चेहरा, गोर गेंठल देंहि, पियासल आंखि, आ लकाधुर बोली रहि-रहि के ओकरा के बहरा दउरा देव, बाकिर बीरा ना लउकसु. रेता में उछरि के गिरल मछरी लेखा तलफत पनवा के सन्तोख होखो त कइसे? बीरा कवनो गांव-घर के त रहलन ना.

बलुआ से थोरिके दूर बीरा के गाँव रहे सिमरनपुर. बाप-मतारी रहे ना. छोट्टे पर से बड़ भाई आ भउजाई के ऊ बाप-मतारी का रूप में देखत आइल रहलन. एगो बहुत छोट गिरहस्त रहे लोग ऊ. दू बिगहा के खेत, खपड़ा के घर, एगो बैल आ एगो भइंसि – इहे उनकर पूंजी रहे. बीरा दुसरा दर्जा का बाद पढ़बे ना कइलन. अइसन ना कि उनकर मन पढ़े में ना लगल. घर के परिस्थितिए अइसन रहे. भउजाई भइंसि चरावे के कह देसु, खेत में भाई के खाना-खेमटाव ले जाए के कहि देसु आ एही तर धीरे धीरे अपनहीं पढ़ाई छुटि गइल.

जवानी के उठान आ चमक अईसन ह कि करियो कलूठ आ लंगड़ो-लूल सुघ्घर आ भरल-पूरल लागे लागेला! फेर त बीरा के पुछहीं के ना रहे – गेहुँवा रंग, छरहर-कसरती देंहि. अपना उमिर का लड़िकन में सबसे पनिगर आ चल्हांक. नवहा लड़िकन का संगे गंगाजी का सरेंही ले भइंसि घुमावत, कबड्डी-चिक्का खेलत बीरा के दिन बड़ा ढंग से बीतत रहे. बलुआ गाँव से होत, गंगाजी का तीर ले के आवाजाही में, पता न कब उनकर आमना-सामना पनवा से भइल आ कब उनका भीतर प्रेम के पातर स्रोत फूटल, केहू ना जानल. सोता से झरना बनल तब्बो यार-दोस्त ना समुझलन स, बाकिर उहे प्रेम जब नदी के लहरन अस लहरे आ उमड़े लागल त सभे जानि गइल.

नदी के बेग आ बहाव के रोके खातिर बीरा के घर-पलिवार आ पनवा के खनदान हुमाच बान्हि के परि गइल. बान्हे-छान्हे के कवन उतजोग ना भइल, बाकि दू पाटन का बीच में बहे वाली नदी भला एक्के जगहा कइसे रुकि जाइत? भाई भउजाई के दिन-रात हूँसल-डाँटल आ धिरावल बीरा के बहुत खराब लागल रहे – अतना खराब कि ओघरी ऊ लोग. उनकर सबसे बड़ दुश्मन बुझाए लागल. चार पांच दिन से बेचैन होके डँउड़ियाइल फिरत बीरा मन के जतने आवेंक में करे के कोसिस करसु, ऊ अमान बछरु लेखा कूल्हि छान्ह पगहा तुरा के भागे लागे. बीरा कतनो महँटियावस, कतनो भुलवावस बाकि मन में रचल-बसल पनवा के खिंचाव उनके कल से ना रहे देव. जहाँ कहीं एकन्ता-अकेल बइठस उनके पनवा के मिलला के एक-ए-गो घटना मन परे लागे.

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बरिस-बरिस के तिहुवार ह फगुवा. बेयार डोलत कहीं कि लइका-छेहर, बूढ़-जवान सभका पर फगुनहट चढ़ि जाला. दस दिन अगहीं से भरबितनो रँगे-रँगाए सुरु क दिहन स. ननद-भउजाई आ देवर तिनहुन के रोआँ-रोआँ रंग बरिसावे लागी. लसोर तिरिछी नजरि डोले लगिहें स आ अब्बर-दुब्बर करेजा में गड़ि के करके लगिहें स. फेरु अस मीठ दरद उठी कि बुढ़वा-मंगर बितलो पर बेचैन करी. ई बेचैनी तब अउरी बढ़ि जाई जब पहिल प्रेम के दरियाव भीतर उमड़त होखे.

तेहू में ओह दिन फगुवा अपना पूरा रंग में बलुआ गाँव पर चढ़ि गइल रहे. घर-आँगन-दुआर, खेती-खरिहान चारु ओर रंग बरिसत रहे. किसिम-किसिम के रंग. ढोलक झाल का संगे होहकार मचावत नवछेड़ियन के गोलि चउधुर का दुआरे पहुँचल त लम्मे भइल चउधर टोकलन, ‘‍बड़-बूढ़ देखि के रे बचवा!’ फेरु लड़िकन के लकुराध से कुछु डेराइले उ ओसारा का ओर जाए लगलन. उनका हाथ में गुड़गुड़ी रहे. करीमन काका चउधुर के पुरान सँघतिया रहलन. चउधुर के घसकल देखि के, एगो लइका का हाथ से रंग के बल्टी झपटलन आ कल्ले-कल्ले धवरि के चउधुर का पीठी भभका दिहलन. हल्ला मचि गइल. चउधुर अनखाइले कुछु कढ़ावहीं के रहलन कि करीमन काका नौछेड़ियन के उसुकावत पिहिकारा छोड़ि दिहलन –

फागुन में,
फागुन में बूढ़ देवर लागे,
फागुन में….

ढोल धिनधिना उठल. झाल झनझनाए लगली स. करीमन के कर्हियांव लचकावल देखि के चउधुरी के खीसि बुता गइल. उ ठहाइ के हँसि दिहलन. ठेका टूटल देखि के करीमन काका नौछेड़ियन के ललकरलन, ‘जवनिए में मुरचा लागि गइल का रे?’ ई बाति बीरा अस नवहा के छाती में समा गइल. उ झपटि के आगा कूदल, ‘अ र् र् र् कबीर ऽऽ….!’ कवाँड़ी के पल्ला तर लुकाइल फँफरा मुहें झाँकत पनवा के हँसी छूटि गइल. अभिन त रेखियाउठान रहे बीरा के. गोर गठल सरीरि. सुन्नर सुरेख चेहरा. गाले ललका रंग. नवहन का गोल में उ लचकि-लचकि के गावे सुरू क देले रहलन …….

केकरा हाथ कनक पिचकारी
केकरा हाथे अबीर?
अरे केकरा हाथे अबीर!
राधा का हाथ कनक पिचकारी
मोहन का हाथे अबीर!

गावत-बजावत हुड़दंग मचावत नवहन के गोलि आगा बढ़ि गइल. बीरा के गवनई आ मस्त थिरकन पनवा का आँखी समा गइल. कल्पना का सनेहि से ओकर मन गुदुराए लागल. बाकि बाप के दुलरुई आ मुहलगुवी पनवा के गोड़ लाजि बान्ह लिहलस. बहुत देरी ले कँवाड़ी के पल्ला धइले ठाढ रहि गइल. बेहोसी में ऊ चलल चाहे बाकि ओकर डेग ना आगा जाव ना पाछा. अजब हालत हो गइल रहे पनवा के.

गाँव घुमरियावत दुपहर भइल. गोल फूटे लागल. बीरा सोचलन कि एही पड़े नहइले चलल जाव. गंगाजी नियरहीं रहली. उ अपना सँघतिया से सनमति कइलन. सहुवा किहाँ से उधारी साबुन किनाइल आ खोरी-खोरी, हँसत बतियावत चल दिहल लोग. बीच-बीच में बोलबजियो होत रहे.

चउधुरी के दुअरा, इनार पर मेहरारू ठकचल रहली स. बेदी के हेठा घोरदवर मचल रहे. निहुरि के कनई उठावत पनवा के नजरि बीरा पर गइल. दूनों जना के नजर मिलली स. पनवा लाजे कठुवा गइल. बीरा के आँखि कनई से होत-हवात पनवा के दहकत गाल पर ठहरि गइल. पनवा के थथमी टूटल. उ लजाते-लजात कनई उठवलसि आ छपाक से एगो मेहरारु पर दे मरलसि. मेहरारु पाँकि में पूरा सउनाइल रहे. उ हँसत झपटल त पनवा फट से फेरू निहुरि गइल. बीरा एह चंचल उफनत रुप के इन्द्रजाल निहारे में भुला गइलन. उनुका आँखि के तार टूटे के नांवें ना लेइत, अगर उनुकर सँघतिया ना टोकित, ‘ का हो, डेगे नइखे परत का?’

बीरा चिहुँकि के चाल त तेज क दिहलन, बाकिर उनका भितरी पनवा का ललछौंही गोराई के चंचल छवि किलोल करत रहे. रहि रहि बेचैन करत रहे पनवा के लसोरि मीठि चितवन.

रंग धोवाइल, रंग चढ़ल आ अइसन चढ़ल कि बीरा डगमगाए लगलन. भाँग के नसा में बारह बजे राति ले गवनई कइला के बाद जब ऊ घरे पहुँचलन त निखहरे खटिया पर फइलि गइलन. आँखि मुनाइल रहे बाकिर कनई उठावत, निहुरल पनवा के समूचा देंहि के उमड़त यौवन उनका सोझा देरी ले थरथरात रहे. बीरा हहाइल-पियासल आँखि का अँजुरी से ओह उमड़त सुघराई के पीए लगलन. पियते पियत कब दूनी भोर हो गइल आ कब उ नीनी गोता गइलन, पते ना चलल.

घाम भइला, जब भउजाई झकझोरलसि त नीनि टूटल. ‘का हो बबुआ राति ढेर चढ़ि गइल रहुवे का? कब आके सूति गउवऽ? कुछु बोलबो ना करुवऽ. हम खाएक ध के राति ले अगोरत रहुवीं.’ बीरा मुस्कियात बोललन, ‘ सांचो रे भउजी? केवाड़ी त बन्न रहुवे?’ आ ठठाई के हँसि देहुवन. भउजाई लजा के भितरी भागि गउवी. बीरा देरी ले मुस्कियात रहुवन.

===

फगुवा बीतल त बीरा के गंगा के कछार घोरवठे क सूर चढ़ल. उ रोज खाइ-पी के निकल जासु. हरियरी से जीउ उचटे त बलुआ गाँव के पकवा इनार पर आके खड़ा हो जासु. पूरब का ओसारा में बइठल पनवा के जइसे एकर पूरा पता रहे कि बीरा के पानी पिए के ईहे जून ह. उ आधा घंटा पहिलहीं से ओसारा में आके कुछ न कुछ काम-धंधा सुरु क देव.

अक्सर खँभिया का ओर बीरा के आवत देखि के पनवा के अगोरत मन उछरे लागे, बाकि ऊ जान बूझि के मूड़ी गोतले रहे. बीरा का खँखारते ओकर मूड़ी उठे आ नजर मिलते बीरा सिटपिटा जासु. आखिर लजाते लजात बीरा के कहहीं के परि जाव, ‘तनी पानी पियइबू हो?’ पनवा एक हालि तरेर के देखे फेरु बनावटी खीसि में बोले, ‘तहरा रोज पियासे लागल रहेला?’ फेरू ऊ भितरी से डोर बाल्टी के लेके छने भर में बहरा निकलि आवे.

ओकरा इनार पर पहुँचत-पहुँचत किसिम-किसिम के बिचार बीरा का मन में फफने लागे. कबो पनवा के साँचा में ढारल सुघ्घर देंहि पर, कबो ओकरा बेफिकिर जवानी पर, कबो ओकरा जोमिआइल चाल पर आ कबो ओकरा माँगि में भरल सेनुर पर. बाकिर विचार के बवंडर गुर्चिआए का पहिलहीं छिटा जाव. ‘काहो, पानी पियबऽ कि हम जाईं?’ आ जब चिरुआ में पानी गिरे लागे तब बीरा के आंखि अनासो निहुरल पनवा के गरदन के नीचा टँगा जाव. कनपटी दहके लागऽ सन आ पियास गहिर होत चलि जाव. जब बाल्टी के पानी ओरा जाव त बीरा के करेजा जुड़ाए का बदला अउरु धधके लागे.

बाल्टी लटकावत पनवा अगराइ के पूछे, ‘का हो अभिन तोहार पियास ना गइल?’ बीरा अतिरिपित नियर मूड़ी डोला देसु. का जाने काहें उनुकर ओंतरे ताकि के मूड़ी डोलावते पनवाके देंहि चिउँटि रेंगे शुरु क द सन. ऊ भितरे-भितर कसमसाइ के रहि जाव. ओफ्फ नजरि ह कि बान…….. . थिराइलो पानी हँढोरि देले बीरा के इ नजरि. पनवा कुछ देर त सम्मोहन में बन्हाइल रहे, बाकि टोला-महल्ला के सुधि अवते ओकर सम्मोहन टूटि जाव. ऊ जल्दी जल्दी भरल बाल्टी उठावे, डोर लपेटे आ तिरछे ताकत घूमि के चल देव.

बीरा जगहे प खड़ा हहरत ताकसु – आ तबले ताकति रहि जासु जबले पनवा अपना ओसारा से होत घर में ना हेलि जाव.

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ओह दिन बीरा जब कान्हे गमछा आ लउर लिहले अचके में आके इनार पर खाड़ भइलन, त भईंस के लेहना गोतत पनवा के आंखि में एगो खास किसिम के चमक उठल, मन पोरसन उछरि गइल. अगर लोक-लाज के भय ना रहित त ऊ धवरि के बीरा के अँकवारी में भरि लेइत.

बीरा से आंखिए-आंखी पुछलन, ‘का हो का हाल बा?’ पनवा आंखिए-आंखी कहलस, ‘खूब पूछ तारऽ. कुल्हि करम त क घललऽ.’ फेर बिना कुछ बोलल बतियावल ऊहे बालंटी, ऊहे डोर, ऊहे इनार. पानी पियत खान बीरा के ओहीं तरे निहारल आ पनवा के सकुचाइ के अपना भीतर बटुराइल……फेर थथमि के आंखि तरेरल.

आजु बिना कुछ पुछले बीरा के बोली फूटल – ‘तहार गुलामियो बजइतीं, अगर नोकरी मिलि जाइत?’ पनवा अचकचा के तकलस, झूठही खिसिअइला के भाव देखवलस आ मुस्कियाइ के बल्टी इनार में छोड़ि दिहलस. बल्टी सरसरात नीचे चलि गइल. ओने बाल्टी बुड़बुड़ाइल एने पनवा के बोली सुनाइल, ‘अतना बरियार करेजा बा तोहार? दम बा त बाबू से बतियावऽ!’

बीरा के बुझाइल कि इ चुनौती पनवा उनका पौरुष आ साहस के दे तिया. नेह के निश्चय बड़ा दृढ़ होला. तब अउरू, जब जवानी में जोम होखे. ऊ दृढ़ होके कहलन, ‘अब त समनहीं आई. बाकिर अतने डर बा कि आगि लहकला का पहिलहीं तु पानी जिन छोड़ि दीहऽ.’

पनवा बाल्टी के बान्हन खोलत रहे. ओकर मन कइल जे खोलि के कहि देव. कहि देव कि जरुरत परी त हम तहरा खातिर इ घर दुआर महतारी-बाप कुल्हि छोड़ देब. बाकिर ऊ अतने कहलस, ‘दोसरा के सिच्छा देबे का पहिले अपना के अजमावऽ!’ अतने में रामअंजोर चौधरी दुआरे आ गइलन. बीरा इनारे भइल गोड़ लगलन, ‘पायँ लागी बाबा!’ चउधुर कुछ कहितन एकरा पहिलहीं पनवा बल्टी लेले निहुर गइल, ‘ल पियऽ!’ बीरा फेरु पानी पिए लगलन.

चलत खान चउधुर बोलवलन, ‘सुनि रे बचवा!’ पहिले त बीरा डेराइ गइलन. धीरे धीरे फाल डालत, सोचत-गुनत चल दिहलन. नियराँ गइला पर खुलासा भइल, ‘बड़ा फजीहत हो गइल बा एघरी. अब ई खेती के लउँजार संभरत नइखे. बुढ़ापा का कारन हम सकि नइखीं पावत. कवनो चरवाहा नइखन सँ भेटात. बीरा, तहरा किहाँ कवनो भेटइहन स?’ जवने रोगिया के भावे तवने वैदा फुरमावे! बीरा के मन माँगल इनाम मिल गइल. बाकि बड़ा अस्थिराहे कहलन, ‘बाबा हम परसों ले कुछ जोगाड़ बान्हब! एक दू आदमी बा, सवाच के बताइब!’

गाँव का नियरा पहुँचत-पहुँचत बीरा का दिमाग में पूरा योजना तैयार हो गइल रहे. ‘हमहीं चौधरी किहाँ चरवाही करब!’ बीरा जइसे पूरा तय क के बुदबुदइलन. उनका आँखि मे पनवा समाइल रहे. हर घरी ओकरा के देखला आ नगीच पहुँचला के ललक उनके बेकल कइले रहे. भगवान सहाय बाड़न तब्बे न चउधरी का मुंह से ई बात निकसल हऽ. उनका भीतर हलचलो होत रहे. ऊ डेरासु त इहे सोचि के, कि पनवा बियुहती ह. ओकर खियाल उनके छोड़ देबे के चाहीं. बाकिर ओकरे बोली….. उ चुनौती. उनुका बुझाइल जे पनवा मेहना मार तिया – ‘ईहे मरद बनल रहलऽ हा. प्रेम हँसी ठठ्ठा ना हऽ. करेजा के बड़ा पोढ़ करे के परी. केहू का क ली? मरद बाड़ऽ त आवऽ तलवार का धार प चलि के देखावऽ. प्रेम कइले बाड़ऽ त भागत काहें बाड़ऽ? ताल ठोंकि के मैदान में कूदऽ!’

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दू-चार दिन बीतत-बीतत बीरा चउधुर से बतिया लिहलन. बतिया का लिहलन, पूरा इत्मीनान करा दिहलन. चउधुर सोचलन कि बूझला खेत बारी कम बा आ भाई से कुछ खटपट बा, एही से बीरा खुदे चरवाहि करे खातिर सकार लिहलन. दू दिन बाद चउधुरी किहाँ बीरा काम करे शुरु क दिहलन. उनका भीतर जब बेचैनी होखे त केवनो ना केवनो बहाना से गंगाजी का ओर बाड़ में निकल जासु. कबो गंगा नहाए, कबो खेत घूमे. चौधरी का ना बुझाइल कि बीरा उनुका चरवाही का संगे लेहना-पताई, गोरू-बछरू, खेत-बधार सब कुछ कइसे सँभारि लिहलन? ऊ सोचलन, हम ठहरली बूढ़ आदिमी. अकेल जीउ, एने ओने डँउड़िअइला से फुरसते नइखे. पनवो के भीरि कम होखी. पनवा के त जइसे मन माँगल मुराद मिलि गइल होखे. खुसी के मारे डेग एने से ओने परे लागल. ऊ फुदकत फिरे. जेके देखे खातिर छछाइल रहे, ऊ अब चउबीसो घन्टा के सँघाती बनि गइल रहे.

धीरे-धीरे बीरा चउधुरी का घर के जिम्मेदारी कपारे ओढ़ि लिहलन. पनवा के त सपने फुला गइल रहे. ऊ उतराइल फिरे. ओकरा निगिचा आवत-जात, बोलत-बतियावत बीरा ओकर अतना आपन हो गइलन कि दुइयो घरि अन्हे भइल पहाड़ लागे. टोला-परोसा के आँखि गड़के लागल. मेहरारु जात आगी के लुत्ती होले. हवा लागत कहीं कि लहरि उठल. लोग पनवा का एह बदलाव प गौर करे लागल. बीरा आ पनवा के एक-ए-गो हरकत पर आँखि सिकुरे-फइले लगली स. गाँव टोला कवनो बड़ शहर त होला ना कि कुछ बात होखे आ हवा ओके ना फइलावे.

आखिर चिनिगी से सुनुगत सुनुगत एक दिन धधोक उठिए गइल. कानाफूसी, खुसुर-फुसुर से होत, बात चउधुर के काने लागल. चउधरि लाल भभूक भइलन बाकिर पनवा खुल्लमखुल्ला कूल्हि बेजायँ अपना कपारे ओढ़ि लिहलस. चउधुर के घुड़कला पर कहलसि, ‘ए बाबू! कूल्हिं दोस हमार हऽ! मारऽ काटऽ हमरा के, बीरा के कुछऊ कहबऽ त ठीक ना होई.’ चउधुर के भाला ले ढेर घाव लागल. ऊ खून के घोंट पी के रहि गइलन. मन थिराइल त पनवा के समझवलन, ‘लरिक बुद्धि में जिन परु. हम आजु ले आपन कुल्ही लाड़-प्यार तोरे के दिहलीं. आज हमार माथ कटाता. हमार इज्जत तोरा हाथे बा पनवां. अबहियों कुछ बिगड़ल नइखे.’ बाकिर पनवा त पिरीत का दरियाव में बहत रहे. ऊभ-चुभ करत, खालि अतने कहलसि, ‘तहार कुल्हि बात अपना जगहाँ ठीके बा बाबू. बाकिर बीरा से बिलग होके हम मुवले समान बानी. अगर हमरा के जीयत देखल चाहऽ त ए ममिला में आपन फैसला बदल लऽ.’

चउधुर के बार उजरात रहे. ऊ सोचलन ……. हमरे गलती से ई कूल्हि बखेड़ा खड़ा हो गइल. अबहियो से संभरि सकेला. हमरा जल्दी से जल्दी पनवा के गवना क देबे के चाही. ऊ उठि के नाऊ किहां चलि दिहलन.

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चौधरी के चरवाही बीरा के जिनिगी बदलि दिहलस. ऊ पनवा से लम्मा रहलन त ओकर रूप का खिंचाव में बन्हाइल रहलन. जब निगिचा अइलन त रूप के दवँक उनका दिल-दिमाग दूनों के तपाइ के निखारि दिहलस. अब हाल इ रहे कि टोला-महल्ला, समाज केहू के परवाह ना रहि गइल उनुका.

का जाने कइसन आन्ही आइल आ उनके उड़ा ले गइल. बीरा गंगा जी का अरार पर बइठि के इहे सोचत रहलन. रूप आ प्रेम के खिंचाव पर, उनकर दसा का से का हो गइल। कवन-कवन अछरंग ना लागल? सब थुड़ी-थुड़ी करऽता, तेवन एकोर, चउधरी कतना दुखी बाड़न? पनवा के बिदाई खातिर ओकरा ससुरा के लोग अलगे उनकर मूड़ी जँतले बा. आ पनवा बिया कि ओकरा कुछू के परवाहे नइखे. काल्हिए से फेंटले बिया, ‘चलऽ इ गाँव छोड़ि के कहीं लम्मा भागि चलीं जा.’

कहाँ भागि चलीं? आजु ले कहीं बहरा गइलीं ना. गाँव के ढेर लोग कलकत्ता बा लोग. आसाम में उनकर एगो संघतिया बा. बाकिर इ सोचला से फायदा का? बीरा का भीतर तनाव अउरी बढ़ि गइल. दिमाग में पनवा के निहोरा गूंजे लागल ‘हम तहरा बिना एको छन ना जीयब. ढेर तंग करबऽ त माहुर खा लेब.’

का जाने कवन मोह बा ओकरा से कि छोड़लो नइखे बनत आ छोड़ि दिहला पर जियलो कठिन बूझाता. ‘का, का ना भइल बीरा? चउधुर मारे परलन, गांव थुथुकारल, भाई गरियवलस, पंच डंड धइलस …….. पनवां तूँ जीए ना देबे हमरा के!’ ऊ तनी जोर से कहलन. गंगा के लहर उछाल मारत आइल आ नीचे अरार से टकराइ के छितरा गइल. सुरूज के किरिन तेज हो गइली सन. घाम तिखवे लागे लागल त बीरा कपारे अंगौछी बान्हि लिहलन. लहरि एक हालि फेरू आइल आ अरार से लड़ि के छिटा गइल ‘बदरकट्टू घाम सचहूं बड़ा तिक्खर होला!’ उ बुदबुदइलन.

बीरा के एक लट्ठा पाछा ले दरार परि गइल. बाकिर अपनेमें गुमसुम, कहानी बनत, बीरा के इचिको खबर ना रहे. कहानी बढ़ल जात रहे. लहरि जब चले त बुझाव कि कवनो गिरोह एक-ब-एक हमला बोलता. बाकि अरार के चट्टान नियर जामल माटी ओकर कूल्हि घाव सहि के ओके छीटि देत रहे.

‘लड़ऽसन! खूब लड़ऽसन!!’ बीरा जोर से कहलन. फेरु जइसे मन परल ‘हमहूँ अइसहीं नू बानीं. एही अरार लेखा. सभ चोट सहि के घठाउर हो गइल बानीं!’ बीरा के का पता कि सांचो उ अरार पर बइठि के अरारे हो गइल बाड़न आ उनका भीतर के घाव अवरू गहिराइल जाता. ई गहिराई उनुका के भीतरे-भीतर काटत जाता. कब एगो कड़ेराह धक्का लागी आ ऊ ढहि जइहें? ई खुद उनहीं के नइखे पता. मन में बवंडर चलत रहे आ तनिको थम्हे पटाए के नाँव ना लेत रहे.

पाछा के दरार धीरे-धीरे ढेर फइल गइल. दू चार बार धक्का के अवरू देरी रहे. पनवा फेरु मन परल. बीरा का भीतर जइसे ऊखि के एक मूट्ठी पतई जरि गइल. आंच गर ले चढ़ि आइल. उ अपना हालत पर मुस्किअइलन. सूखल हँसी फेफरिआइल ओठ पर फइल गइल. ‘दुर मरदे! तोरा ले बरियार करेजा त पनवा के बा! मेहरारु होइके अडिग. सगरो बवाल, सगरो दुतकार के जवाब दु टूक, ‘हँ बीरा हमार कूल्हि हउवनि!’ ‘बाह रे पनवा.’ अनासो उनका मुँह से निकलि गइल.

दरार अउर फइल गइल. बीरा के का पता कि सोझा से मार करत लहरन के गिरोह अब अपना सफलता का जोस में आखिरी बेर आव तिया. लहरि आइल आ कगरी के माटी हंढ़ोरि के लवटि गइल. उनुका तब बुझाइल जब पनवा झकझोर के उठवलस ‘भँउवाइल बाड़ऽ का? एने दरार फइलल जाता आ तहरा कुछ फिकिरे नइखे?’ पाछा देखते उ चिहा गइलन. झट से पनवा के फनवलन आ पाछे अपनहूं पार भइलन. अरार थसकल आ एक बएक भिहिला के लहरन में समा गइल. हँड़ोरइला से ओतना दूर के पानी कुछ अउरी मटिया गइल.

पनवा दूनूं हाथ छाती पर धइले अब ले हांफत रहे. सांस थमल त बोलल, ‘आज त तूं हमार जाने ले लेले रहितऽ! कहऽ कि हम उबिया के कवनो बहाना से, एने चलि अइनी हां. जान तारऽ उ दुआरे आके बइठल बाड़न स. बाबू बिदाई के तइयारी कर तारन. हम उनका के कहि सुनि के थाक गइलीं हां. अइनी हां त आपन जान देबे, बाकिर अचके में तहरा पर नजरि परि गइल हा.’ पनवा उनका छाती में समा के सुसुके लागल. बीरा कातर हो के ऊकर पीठ सुहुरावे लगुवन. ‘पागल अभिन हम जियते नु बानीं.हमरा रहते तें जान देबे. चलु आज तोरे बात रही. तुं कहत न रहले हा कि चलऽ कहीं लम्मा भागि चलीं जा. हम तेयार बानीं. जहाँ कहबे तहाँ चलब.’ भाववेग में ऊ कहते चलि गइलन. पनवा के हालत उनके फैसला करे के जइसे शक्ति दे देले रहे.

पनवा आपन भींजल पलक उठवलसि, ओकरा जइसे बीरा पर बिसवास ना भइल. पुछलस, ‘संचहू?’ ‘हँ रे, सांच ना त झूठ!’ बीरा ओके परतीति दियवलन. पनवा खुशी में मकनाइल, लपटा गइल बीरा से……… . जइसे फेंड़ में बँवर लपटे, ओकर हाथ बीरा के बान्हि लिहलस. नदी जइसे समुद्र में मिलि के अपना के भुला देले, ओघरी ओकरा किछऊ के चेत ना रहे. ना दीन के ना दुनिया के. बीरा टोकलन, ‘ अरे तोरा नीक जबून किछऊ बुझाला ना का? केहु देखी त का कही?’ पनवा अलगा हो गइल. ओकरा फीका मुसकान में सगरी समाज के प्रति उपेक्षा के भाव रहे.

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“आवऽ लवटि चलीं जा” लघु उपन्यास के पहिला हिस्सा १९७९ में भोजपुरी पत्रिका “पाती” में “सनेहिया भइल झाँवर” शीर्षक से छपल रहे आ एकर दुसरका हिस्सा “समकालीन भोजपुरी साहित्य” के जून १९९७ के कथा विशेषांक में ” पनवाँ आ गइल” शीर्षक से छपल. हालांकि ई देहात के बे पढ़ल-लिखल पनवाँ आ बीरा के प्रेमकथा ह, बाकिर एम्में गाँव से शहर के पलायन आ फेरु ओसे मोहभंग के साथे-साथ वापसी आ अन्तःसंघर्ष के चित्रण बा.

ई लघु उपन्यास बाद में अँजोरिया में धारावाहिक रुप से प्रकाशित भइल रहे. अब ओही उपन्यास के अँजोरिया के एह नयका संस्करण पर प्रकाशित कइल जात बा. कोशिश बा कि पुरनका संस्करण से सम्हारे जोत रचनन के एह खंड में ले आवल जाव जेहसे कि पाठकन के खोजे पढ़े में सुविधा होखे.

उपन्यासकार डा॰ अशोक द्विवेदी के नाम भोजपुरी साहित्य में जानल मानल आ मशहूर बा. अँजोरिया के सौभाग्य बा कि डा॰ द्विवेदी के रचना नियमित रूप से मिलत रहेला प्रकाशन खातिर आ हर बेर ओकरा के प्रकाशित कर के मन खुश होला. डा॰ अशोक द्विवेदी का बारे में भोजपुरी साहित्य के एगो पुरहर स्तंभ पाण्डेय कपिल के कहना बा कि, “गीत, गजल, नई कविता, निबंध, कहानी, लघुकथा, आलोचना आ संपादन का क्षेत्र में डा॰ अशोक द्विवेदी के जे अनमोल अवदान भोजपुरी के मिलत रहल बा ओकरा से भोजपुरी के ठोस आ वास्तविक समृद्धि सुलभ भइल बा…… उनुकर कहानी परम्परागत भोजपुरी कहानियन के इतिवृत, आदर्श आ औपचारिक विवरण से आमतौर पर मुक्त बा. यथार्थ जिनिगी के नीमन‍-बाउर अनुभवन से उपजल कहानी जहाँ एक ओर भाषा के संपूर्ण संस्कृति संस्कार से लैस बा, उहें एकनी में देश आ काल का मोताबिक उभरल चरित्र तीखा आ क्रिटिकल भइला का साथे बड़ा सहज ढंग से उभरल बाड़ें स.”


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फोन – 08004375093
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भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” – 1

– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

योगेश्वर नाम रखले रहस उनकर मास्टर चाचा जवन कलकाता में पढ़ावत रहस. स्कूल में भरती का समय राउत जी मास्टर साहेब ठीक (!) कइलन युगेश्वर. लेकिन गांव में सबका खातिर उ जिंदगी भर आ मरलो के बाद जुगेसरे रहस. शिवदत्त महतो के बेटा जुगेसर परसाद. बड़ा नाम कइलस लडिक़ा. लेकिन गांव के लोग के ओसे का भईल? ना आइल ना गइल. ना केहू से मिलल जुलल. हां, जबे अपना होनहार बिरवा के उपदेश देबे के होखे कायथ टोली में त एके गो नाम होखे – जुगेसर.

मोतिहारी से करीब दस कोस रहे शिवदत्त महतो के गांव. एक भाई कलकाता में मास्टरी करस आ आपन परिवार के साथे रहस. दोसर एकजाना भाई कबो स्कूल ना गइले. तनी बुरबक किसिम के बचपने से. सबेरे से सांझ तक खेते में पड़ल रहस. बुजुर्ग लोग कहेला बियाह भइल रहे उनकर लेकिन उनकर मेहरारू के बाल बच्चा ना होत रहे एही से शुरू में छोड़ देले रहे लोग. खैर उनका दूनो बेरा खाना भौजाई दे देस.

शिवदत्त ओह जमाना में गांव का प्राइमरी स्कूल से पांच क्लास तक पढ़ले रहन. खेती बाड़ी बढिय़ा से होखे आ कबो-कभार कलकाता वाला भाई कुछ रुपया पइसा भेज देस. गांव का हिसाब से शिवदत्त के परिवार खात-पियत इज्जतदार परिवार रहे.

गांव के आउर लडिक़न का लेखा जुगेसरो गांवे के प्राइमरी स्कूल में भरती हो गइले. जइसन सब लडिक़ा करस उहो एगो बोरा भा एगो झोला लेके स्कूल जाये लगले. बोरा बइठे खातिर आ झोला स्लेट पेंसिल राखे खातिर. लडिक़न में कवनो भेदभाव ना रहे. सभे बराबर जबले साल भर ना बीतल.

सालभर बाद जुगेसर सीधा दू में चल गइले काहे कि उनका हरफ लिखे आ बीस तक पहाड़ा याद हो गइल रहे. फेर त जुगेसर कहीं ना रुकले फस्ट त फस्ट. साथे-साथे बाप का नजर के हीरा बन गइले. हर बाप का ईच्छा होला बेटा उ सब करो जे उ ना कर पउले. शिवदत्त जुगेसर के खेती बाड़ी के काम में एकदम ना भेजस. बाकिर सब लडिक़ा स्कूल जाये का पहिले खेत खलिहान में कुछ ना कुछ कर स.

फस्ट डिविजन में मैट्रिक ओह गांव में जुगेसरे पास भइल रहन. गांव खातिर एहसे गर्व के बात का हो सके. लक्ष्मी प्रसाद खुद चल के शिवदत्त के दरवाजा पर अइले आ कहले – ‘बड़ा खुसी भइल शिवदत्त, बेटा के रिजल्ट सुन के. ओकरा के अब मास्टरी के ट्रेनिंग में दे द. मोतीहारी का ट्रेनिंग कालेज में हमार सरबेटा बाबू बा. हम चिट्ठी लिख दे तानी. मिल आव.’

सफलता अपने आप आदमी के मोलायम बना देला. शिवदत्त बहुते मोलायम आवाज में कहले – ‘हमनी के ईच्छा बा आगे पढ़ावे के. फर्स्ट भइल बा जुगेसर. कालेज में छात्रवृतिओ मिली.’

‘देखऽ. कालेज में पढ़ावल बड़ा खरचीला बा.’ मने-मने कुढक़े लक्ष्मीप्रसाद बोललन.

मोतीहारी कालेज में नाम लिखावे का समय मास्टर चाचा आ गइल रहस. उहे कहले – ‘भईया तू चिन्ता मत कर. अइसन तेज लडिक़ा खातिर जरूरत पड़ी त खेत बेचल जाई.’

खैर खेत ना बेचे के पड़ल. भगवान का कृपा से जुगेसर के हर क्लास में स्कालरशिप मिलल. मोतिहारी में घर भाड़ा लेके उ पढ़ाई करे लगलन. ओजा अपने हाथ से खाना बनावस. घर से चावल आटा ले आवस. कालेज के सब लडिक़ा उहे करस. हँ, समस्या होखे घर से बस स्टैंड आवे में. उनका गांव से बस स्टैंड आवे खातिर रास्ता बोल के खेत के मेड़ रहे आ बांध. गांव के बारे में जतना रोमांटिक बात होला उ जुगेसर का कुछ ना पता चलल. केमिस्ट्री में फर्स्ट क्लास आनर्स मिलल जुगेसर का जवन ओह समय में बिरले मिले. बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर से चिट्ठी आइल – एमएससी में प्रवेश लेले से छात्रबृत्ति मिली. लेकिन जुगेसर निर्णय लिहलन पटना विश्वविद्यालय में प्रवेश खातिर. अब आपने निर्णय लेवे खातिर स्वतंत्र रहस उ.

ठीक एही समय जुगेसर का जिन्दगी में परिवर्तन आइल. कब कइसे भइल उनका सोचे के समयो ना मिलल. हॉस्टल के वातावरण सही ना मिलल. हॉस्टल के वातावरण बहुते विचित्र रहे. पहिले त उनका बिहार विश्वविद्यालय लेके पटना वाला उनकर खिंचाई करस. फेर जब दिन बीतल लडिक़ा के पहुंच कहां तक बा. उनको बिस्वास होखे लागल ऊपर जाये खातिर बैकग्राउंडो ज्यादा जरूरी बा. ओकरा बाद जात-पांत वाला चर्चो खुलेआम होखे. एतना दिन जवना बिषय के उनका सोचे के समय ना रहे ऊहे सब महत्वपूर्ण होखे लागल.

कालेज प्रयोगशाला में एगो इंस्ट्रक्टर रहस बैकुण्ठ प्रसाद जी. उनकर स्वभाव जुगेसर का बड़ा पसंद आवत रहे. अपना काम से काम राखस. ओहदिन जुगेसर के मिजाज बड़ा उखड़ल-उखड़ल रहे. घरे से खबर आइल रहे माई के तबीयत खराब बा. जाये-आवे में कवनो बात ना रहे लेकिन माई के याद त आवते रहे. बैकुण्ठे प्रसाद बोललन – ‘का बात बा जुगेसर जी! आज राउर मूड कुछ ठीक नइखे लागत.’

-‘ना-ना. कवनो अइसन बात नइखे, सर! सब ठीक बा!’ जुगेसर के घबड़ाइल अस आवाज निकलल. बैकुण्ठ जी पास आ गइले. कहलन – ‘देखऽ भाई! तू इहां पढ़े-लिखे आइल बाड़. दोसरा बात पर मन दीहला पर बर्बादी छोड़ के कुछ ना मिली.’

फेर एक दिन जुगेसर हॉस्टल छोड़े के मन बना लिहलन. लेकिन ई त मोतिहारी ना रहे कि जहां तहां रहे के व्यवस्था हो जाई. जे कमरा भाड़ा मांगल जाए सुन के स्टूडेंट भाग जायं. आपन मन के बात एकदिन उ बैकुण्ठ जी के बतवलन. बैकुण्ठ जी कुछ चिन्ता कइलन. फेर कहलन – ‘आच्छा हम काल्ह बताइब.’

दोसरा दिन बैकुण्ठ जी जवन प्रस्ताव दिहलन जुगेसर का जइसे हाथ में लड्डू मिल गइल. बैकुण्ठ जी कहलन – ‘देखीं, हमार घर त छोटहन बा. लेकिन एगो कमरा हम किराया पर देले रनी ह. हमरा परिवार में उहो कमरा के जरूरत बा लेकिन रउरा रहब त हमनी के काम जइसे एतना दिन से चलत बा, आउरो एक डेढ़ साल निकल जाई.’

जुगेसर सकुचात-सकुचात पूछ भइलन-‘देखीं सर, हम रउआ के बड़ी इज्जत करीला. अपने के घर में रहला पर न जाने कवनो अइसन-वइसन हो जाई त हम खुद के कबो माफ ना करब.’

-‘अरे भाई. हमरो बाल धूप में सफेद नइखे भइल. आप पर हमार विश्वास ना रहीत त कबो स्टूडेंट के घर में राखे के सोचबो ना करतीं.’

-‘खाए पीए के कइसे इन्तजाम होखी?’

जुगेसन के प्रश्न स्वाभाविक रहे.

‘आगे वाला किरायेदार खाना बना लेत रलन ह. बाकी पास में एगो होटल बा उ महीन पर खिआवेला. ठीके-ठाक बा. बहुत अकेले रहे वाला लोग उहां भोजन करेला.’

अब आखिरी सवाल जुगेसर का गला में अटकल रहे. भाड़ा? बैकुण्ठ जी समझदार त रहले रहस. स्पष्ट कइलन – ‘पहिलका किरायेदार सौ रुपया देत रल. आप ओतने देब.’

शाम में दूनो जाना एके साथ निकलल लोग. कदमकुंआ में रहे बैकुण्ठ जी के घर लेकिन घूम फिर के कइगो गली से होके जाये के पड़े. रेल लाइन पासे में रहे. बैकुण्ठ जी के खटखटावला पर कवनो लडक़ी दरवाजा खोललस. बैकुण्ठ जी ऊपर के चाभी मंगवलन. दरवाजा से घुस के एगो छोट आंगन रहे. जब तक चाभी लेके उ लडक़ी फेरू आइल जुगेसर एक नजर चारों ओर दौड़वलन. पास में प्रकाश रहे. एगो कमरा पास में बाथरूम जइसन लागल. आंगन के तीनों ओर एक-एक गो कमरा रहे. एगो कमरा से लागल सीढ़ी रहे पातर अस.

बैकुण्ठ जी सीढ़ी से ऊपर गइलन आ उनका पीछे-पीछे जुगेसर. ऊपर खुलल छत रहे जवन चांद का प्रकाशे से साफ दीखत रहे. कमरा के आगे बरामदा जइसन थोड़ जगहो रहे जवन सीढ़ी से लागल रहे. छत के दोसरा तरफ बाथरूम रहे. बाकी छत पर कइक गो रस्सी तानल रहे.

देख के जुगेसर के मन खुश हो गइल. अगिला महीना के पहिला तारीख से आवे के ठीक हो गइल. पहिला तारीख के शनिचर रहे एहसे ठीक भइल एकतीसे से जइहन. होटलोवाला से बात हो गइल – दू बेरा खाना सुबह भा शाम में एक बेर नास्ता. दिन में भात-दाल सब्जी. सप्ताह में एक दिन आमिष. 200 रुपया कुल लागत. छुट्टी खातिर कम से कम एक दिन पहिले बतावे के पड़ी.

दू चार दिन जुगेसर का अच्छा ना लागल. कहां होस्टल के जिन्दगी आ कहां अकेले. लोग बाग बा लेकिन केहु बोले बतियाये वाला ना. हालांकि जुगेसर का कभी होस्टल ना सोहाइल रहे. नापसंदगीओ आदत हो जाला आदमी के, आ ई नापसंदगी के अभावो चुभेला.

कबो-कभार आवत जात में बैकुण्ठ जी के लडिक़ीयन वाला घर पर नजर पड़ जाव जुगेसर के. बडक़ी बहन हरदम किताब के साथे दीखे. कभी कुर्सी पर बइठल त कभी कमरा में टहलत. टहलत-टहलत ऊ किताब पर आंख गड़वले रहे.

ओह दिन एतवार रहे. जुगेसर बिछावन पर लेटल रहस खाना खाके. तबहिए बैकुण्ठ जी अइलन.

– ‘आ जाईं.’ जुगेसर कहलन आ बैकुण्ठ जी आके कुर्सी पर बइठलन.

-‘का हाल चाल बा?’ पुछलन उनसे.

-‘रउआ जइसन गार्जियन रहला पर कुछ खराब हो सक ता. सब ठीक बा.’ जुगेसर वातावरण के हल्का करे का लिहाज से कहलन.

-‘ ई त राउर बड़प्पन बा. हमरा के भगवान दीहलही का बाडऩ.’ उदास उदास अस जवाब दीहलन बैकुण्ठ बाबू. जुगेसर का अंदाज भइल बैकुण्ठ बाबू जरूर कवनो मतलब से आइल बाडऩ? उ बात बढ़वलन – ‘का कह तानी सर. रउरा जइसन कतना लोग का बा आज का दिन में. बढिय़ा नौकरी, पटना जइसन शहर में घर. हसत खेलत घर संसार.’

-‘अरे संसारे त झमेला बा. बाबुजी बाबा का दबाव में पढ़ाईए-लिखाई का समय में हमार शादी कर दिहनी. लडिक़ा के चक्कर में दू गो बेटी आ गइल लोग. अब एही चिन्ता में रहीला हमेशा.’

जुगेसर दिमाग पर जोर देबे लगलन. न जाने का कहे आइल बाडऩ बैकुण्ठ जी. उनकर त उमर भइले रहे. उनका शादी खातिर न जाने केतना प्रस्ताव आवत रहे मैट्रिक पास भइला के बादे से. थोड़ देर खातिर मन बहक गइल. वर्तमान में अइला पर महसूस कइलन बैकुण्ठ जी असली बात कहे वाला बाडऩ.

-‘देखीं ना अर्चना मेडिकल के तैयारी कर तारी. पढ़े लिखे में त अच्छा बा लेकिन प्रतियोगिता अइसन बा कि विश्वास नइखे होत. बूझात नइखे कि रउरा से कइसे कहीं?’

-‘बताईं ना. हमरा खातिर रउरा एतना करतानी. रउरा खातिर कुछऊ करे के अवसर हम भगवाने के आशीर्वाद समझब.’ जुगेसर के स्वर में बैकुण्ठ जी के मतलब जाने के आग्रह साफ झलकत रहे.

-‘बात बा कि अर्चना फिजिक्स में थोड़िका कमजोर बाड़ी. रउरा यदि थोड़ समय निकाल सकतीं….’ बैकुण्ठ जी रुक गइलन. जुगेसर का ई कहानी के प्लाट जइसन लागत रहे. तब बैकुण्ठ जी के अपना इहां लावे के असली मतलब रहे. अब दोसर पदक्षेप लडक़ी के पढ़ावे के. फिर…

बैकुण्ठ जी का उपस्थितिए में अर्चना के पढ़ावल आरम्भ कइलन जुगेसर. पहिलहीं दिन बुझा गइल.. ई लडक़ा के पढ़ाई छोड़ के दोसर कुछ नइखे माथा में.

जवन चीज समझावे के कोशिश करस जुगेसर जी ऊ फटाफट आंख मूद के मंत्र जइसन बुदबुदाव आ दोहरावे लागल. धीरे-धीरे जुगेसर समझ गइले एकरा खातिर तोता रटंते ठीक बा. कइएक दिन का बाद सब कुछ जइसे सामान्य हो गइल. बढिय़ा बिद्यार्थी शिक्षक के बहुते प्यारा हो जाला. अइसन जुगेसर के ऊ पहिला छात्र रहे. ओकरा प्रति उनकर स्नेह कुछ बेसिए हो गइल. लेकिन उमिरो के आपन तकाजा होला. जेठ के दिन में एगो घटा के छोट टुकड़ा जइसे कबो-कबो उनका दिमाग पर दीख जाव. का बैकुण्ठ जी के मन में अर्चना आ उनका के बीच कवनो प्रस्ताव त नइखे मने-मने. लडिक़ी त ठीके बिया. अर्चना जब आंख बंद कर के रटा लगावत रहे ऊ ओकरा ओर चोर निगाह से निहारस. एक दिन त कुछ गड़बड़ो हो गइल.

अर्चना के ऊ आणविक संरचना बतावत रहलन. थ्रीडाइमेंसनल कन्सेप्ट ऊ जवनो तरह बतावस अर्चना के ठीक स्पष्ट न होत रहे. जुगेसर जी घुमा फिरा के बतावस लेकिन अर्चना कॉपीए पर समझे के कोशिश करे. थोड़ खिसियाइल अस बोललन ऊ – ‘अरे भाई बार-बार कहतानी कॉपी के पन्ना टूडाइमेंसनल बा. आणविक संरचना समझे खातिर सोचे के पड़ी, कल्पना करे के पड़ी, आपने दिमाग में तस्वीर बनावे के पड़ी.’

अर्चना आंख मूंद के सोचे शुरू क दिहलस आ बुदबुदात रहे. जुगेसर ओकरा चेहरा पर नजर गड़वले रहस. एकदम स्तब्धता. तबहीं दरवाजा पर हंसल खिलखिलाइल सुनाइल. दूनो के आंख एके साथ खुलल.

अर्चना के बहिन पूजा खड़ा रहे. हंसी रोक के कहलस – ‘अरे दीदी पढ़ऽतारू कि योगासन करऽतारू ?’

दूनो जाना झेंप गइल लोग. पूजा एह साल मैट्रिक के परीक्षा देबे वाली बाड़ी. बडक़ी बहिन से बिल्कुल उल्टा स्वभाव. भीजल कपड़ा छत पर उहे पसारे आवे. रंगो साँवर रहे. ए घर में ओकरे हंसी सुनाव. बाकी अर्चना के मुस्कुराहट देखे खातिर त जुगेसर के आत्मा तरसत रहे.

समय कइसे बीत गइल. अर्चना के परीक्षा हो गइल. बतवलस बढिय़ा भइल बा. जुगेसरो के फस्ट इयर के परीक्षा होखे वाला रहे. अपना पढ़ाई पर ध्यान देबे लगलन. अर्चना के पढ़ावे से जवन रुटीन बनल रहे ऊ टूट गइल. हँ, एगो बात रहे घर के सभे उनका से आवत जात बतियावे लोग. अर्चनो कबो-कबो ‘प्रणाम सर’ कह जाव. एतने काफी रहे उनका खातिर. हां पूजा जबो छत पर आवे एक बार उनका कमरा में जरूर आवे आ हाल-चाल पूछे. ऊ मैट्रिक सेकेंड डिवीजन से पास होके कालेज में भर्ती हो गइल रहे. बैकुण्ठ जी के जान पहचान से साइंस में भर्ती हो गइल रहे.

प्रेक्टिकल के दूगो पेपर बाकी रहे. तबहिए खबर लागल कि घरे जुगेसर के माई बीमार बाड़ी. माई खातिर मन दुखित हो गइल लेकिन का करस सामने परीक्षा रहे. घरे से सम्पर्क कइलो संभव ना रहे. परीक्षा खतम भइला पर घरे जाये के प्लान बनवलन. जहिया जाए के रहस पता चलल मेडिकल के रिजल्ट निकले वाला बा. लेकिन रुके के कवनो सवाले ना रहे. सुबह-सुबह निकल के महेन्द्रू घाट अइलन. उहंई से मोतिहारी के टिकट मिल गइल. स्टीमर से गंगा पार होके गाड़ी मिल गइल जवन सीधे मुजफ्फरपुर जाव. मुजफ्फरपुर से ट्रेन बदल के मोतिहारी पहुंचलन त पांच बज गइल रहे. गांवे जाये बाला आखिरी बस खचाखच भरल रहे. ऊपर नीचे लोग भरल रहे. ऊपर चढक़े जइसे-तइसे जगह बनाके बइठ गइलन. बस छूटल साढ़े पांच बजे. अपना स्टैंड पर पहुंचते-पहुंचत अन्हार हो गइल. स्टैंड पर केहू कहीं ना रहे. ऊ धीरे-धीरे गांव के ओर वाला रास्ता पर चले लगले. करीब साल भर बाद घरे जात रहस.

संसार के चक्रो अपना गति से चलेला. केहू खातिर ओकरा क्षणभर ठहरे के फुर्सत नइखे. जुगेसर का जिन्दगी में पहिला अनुभव ओहि दिने भइल. घरे पहुंचला पर पता चलल माई एक दिन पहिलहीं गुजर गइल बाड़ी. उनुका ठकुआ मार दिहलसि. बोले के चहलन त आवाज ना निकलल. रोए के चहलन त आंख ना पसीजल. माई से बइठ के ऊ कबो भर मन बतिअवले ना रहस. माई के सब बात ओकरा आंख से प्रकट होखे. जब लडिक़ाई में ऊ लालटेन का सामने पढ़स त माई दूर बइठ के खाली निहारे उनका के जबले ऊ सुत ना जास ऊ बइठल रहे. माई के सूतल ऊ अपना होश में ना देखले रहस. ऊ माई नइखे. अब कबहूं माई के चेहरा ना देखे के मिली. कवनों फोटवो त नइखे.

सब हीत नात आवे लागल लोग. दू दिन बाद श्राद्ध रहे. मास्टरो चाचा पहुंच गइलन. जुगेसर से भेंट होते कहलन – ‘हँ भाई का सोचतार? कवनो कंपटिसन वगैरह दे तार कि ना?’

जुगेसर के पढ़ावे खातिर इहे चाचा जोर लगवले रहस. लेकिन जबसे उनकर आपन लडिक़ा सेकेंड डिवीजन से पास भइलन जुगेसर के प्रति उनकर भाव बदल गइल रहे. अब मिलले पर हाल-चाल होखे. आदमी के आपन आ गैर में अंतर अइसने समय पर होला. जुगेसर का अब ई वातावरण पसंद ना आवत रहे. बाबूजी सादा कपड़ा पहिनले रहस. घर में बिना हल्दी के खाना बने. हीत पाहुन जेही आइल रहे आपन-आपन हाल चाल कहे में लागल रहे. केहूके मरला में जे आइल बा ना बुझात रहे.

भगवान किहां का चलता आदमी सोच ना सके. एही अज्ञानता से शायद संसार चलता. ओह दिन बाबूजी आ चाचा साथे-साथे श्राद्ध के बाजार करे मोतिहारी गइल लोग. रात का पहिले लवटे के कवनो सवाले ना रहे. सभे आपन-आपन काम में लागल रहे. दुआर पर लालटेन जला के जुगेसर बइठल रहस. तबही दूगो लडिक़ा हांफत-हांफत अइलन स. दूनो बस स्टैंड मोड़ पर ओही लोग के सामान ले आवे गइल रहलन. सामान उतार के हड़बड़ाइले जे बतवले स ओकर मतलब रहे लवटे के समय बाबूजी आ चाचा सामान के साथे छत पर बइठ के आवत रल लोग. शहर से निकले का बेर कइसे बाबूजी से बिजुली के तार छुआ गइल बा. उनका के लेके चाचा अस्पताल गइल बाड़े. हाल ठीक नइखे बूझे में जुगेसर का कवनो समय ना लागल. लेकिन अबही का कइल जाव. कवनो बस त बा ना एह समय. सारा गांव में खबर फइल गइल. लोग जमा हो गइल. कइसे तार झूलत रहेला से लेके बिजली कइसे बनेला आ कहां जाला तक बात हो गइल. अस्पताल पहुंचलो जरूरी बा केहू ना कहे.

तबही जगमोहन आइल. ई जगमोहन जुगेसर का साथे सातवीं क्लास ले पढ़े जाव. ओकरा बाद आपन खेतबारी में काम करे लागल रहे. जात के त ब्राह्मण रहे लेकिन घर के अवस्था अच्छा ना रहे. कवनो पंडिताईओ ना रहे ओ सब का. आवत आवत कहलस – ‘का सोचऽतार जुगेसर ?’
-‘हमरा त कुछ नइखे बुझात जगमोहन भाई.’
-‘कह त मोतिहारी चलल जाव.’
-‘कइसे जाइल जाई?’
-‘एगो साइकिल त हमरा बा. एगो साइकिल जोगाड़ हो जाइ त दूनो आदमी चल चलती स.’
-‘हम केकरा से साइकिल मांगी?’
-‘देखऽ ना बैजनाथ मास्टर का बढिय़ा साइकिल बा.’
मास्टर लगहीं खड़ा रहस. आपन नाम सुनके सामने आ गइलन. पूछलन-‘का भइल हो जगमोहन?’
-‘का भइल, हमरा से पूछतानी. आपन साइकिल दीतीं त हमनी दूनो आदमी अभी मोतिहारी चल जइतीं.’
धर्मनाथ मास्टर कह भइलन – ‘अरे देख ना काल सबेरहीं स्कूल जाये के बा. डिपुटी सुपरिटेंडेंट आवे वाला बाड़े.’
जगनमोहन का जइसे मालुमे रहे मास्टर आपन साइकिल ना दीहन.
-‘त जाईं तैयारी करीं. इहां समय बर्बाद काहें कर तानीं.’
फेर जुगेसर का ओर देखके कहलन – ‘तू तइयार होख. हमनी एके गो साइकिल पर चलल जाई.’
विपत्ति जइसे आवेला ओकरा सहे के बेंवतो भगवान दे देले. पांच दिन बाद बाबूजी के लेके सब लोग लवटि आइल. उनका के सहारा लेके चलावे फिरावे के पड़े. अपना हाथ से खाए के कोशिश करे के पड़े. डॉक्टरो कहले रहे अइसने करे के.

माई के श्राद्ध बीत गइल जइसे तइसे. सब हीत पाहुन चल गइल लोग. चाचो चल गइले. जाए का बेर जुगेसर के लम्बा चौड़ा उपदेश दे गइले. साथ में इहो रहे अब कुछ नौकरीओ चाकरी के कोशिश करे के चाहीं. कालेज त अभी बंदे रहे लेकिन जुगेसर एतना दिन रहे के ना सोचले रहस. एह सब में गांव वाला चाचा चुपचाप रहस. जब सब लोग चल गइल जुगेसर पूछलन – ‘अब का होई चाचा?’

जिन्दगी में पहिला बार चाचा से बतियावत रहस जुगेसर. चाचा उनका पास आके फुसफुसइलन – ‘बनकटा से एक आदमी भउजी का श्राद्ध में आइल रल. कहत रल ओकर हाल ठीक नइखे. बाप त कबे मर गइले. एगो बेटा कहां भाग गइल बा. भाई भउजाई का देखी.’
चाचा रुक गइलन. जुगेसर सब जोड़ के बात समझ गइलन. जेकरा के सभे बुड़बक समझत रहल ओकरो मन में कतना बड़ तूफान दबल बा. फेर कहलन – ‘अच्छा चाचा, चाची के यदि बोलावल जाव त इहां आ जइहन ?’
-‘आवे के त पूरा मन बड़हीस लेकिन केहु का जाए के पड़ी तबे आई. बडक़ी मनबढ़ू ह शुरुए के.’
-‘के जाई लावे?’
-‘जाए के त हमरे चाहीं.’
दोसरे दिन चाचा गांव के एगो आदमी के साथ लेके चल गइलन. बाबूजी इशारा से पुछलन – ‘ऊ कहां गइले ह ?’
जुगेसर बतवले – ‘चाची के ले आवे.’
बाबूजी के चेहरा लाल हो गइल. ई बात जइसे उ कइसे हजम करस. जुगेसर धीरे-धीरे उनके ठंडा कइलन.

घरे के कारबार एक तरह खिसके लागल. एक महीना कइसे बीत गइल पता ना चलल. न जाने पटना के का हाल होई. अर्चना के त अब तक एडमीशन हो जाए के चाहीं. अब त कालेजो चालू हो गइल होई. गांव त जुगेसर का कबो अच्छा ना लागत रहे. अबकी त अच्छा लागे के कवनो कारन ना रहे. बाबूजी आपन काम धंधा करे लागल रहले. चले में तनिक तकलीफ होखे. एक दिन बाबूजी से कहलन – ‘अब हमरा जाए के पड़ी.’

बाबूजी खाली माथा हिला दिहलन. जुगेसर अब उनका खातिर अनजान बन गइल रहस. उनका से कवनो आशा त उनकर कबे टूट गइल रहे. शाम के सात बजे वाला स्टीमर से उतरलन महेन्द्रघाट जुगेसर. एगो रिक्सा क के डेरा पहुंचलन. कांध पर किताब के झोरा. माथा मुड़ल. विचित्र चेहरा दीखत रहे. बैकुण्ठजी के बंद दरवाजा पर दस्तक दिहलन. भीतर से आवाज आइल – ‘के ?’
-‘जुगेसर प्रसाद.’
-‘आव तानी.’
आवाज सुनके लागल अर्चना हई. लेकिन दरवाजा पूजा खोललस. चिरपरिचित उत्साह से चहकल – ‘प्रणाम सर.’ ओकर नजर ठहर गइल. जुगेसर के अइसन हालत के अंदाज उ ना कइले रहे.

जुगेसर भांप गइलन. कहलन -‘माई मर गइल ओही से माथ मुड़वले हईं. पापा कहां बानी?’
-‘पापा त दीदी के एडमीशन करावे दिल्ली गइल बानी. सोमवार के आइब. रउरा ऊपर चलीं. हम चाय ले आवतानी.’
धीरे-धीरे सीढ़ी चढक़े जुगेसर ऊपर अइलन. कमरा के चाभी खोलके खिडक़ी खोललन. बड़ा ही थकान लागत रहे. बिछावन खोलके लेट गइलन. दरवाजा खुलले रहे. ऊ थोड़ा देर आंख मुंदलन. तभी खुलल दरवाजा खट्-खट् के आवाज भइल. पूजा चाय लेके खड़ा रहे. एक झटका उठ बइठलन. पूजा के कुर्सी पर बइठे के इशारा कइलन. चाय बढ़ाके पूजा कुर्सी पर बइठ गइल.

जुगेसर चाय के घूंट लगाके बात करे के नीयते से पूछलन – ‘कब से गइल बानी प्रसाद सर.’
-‘सात दिन हो गइल. दीदी के एम्स में एडमीशन खातिर गइल बानी.’
-‘बहुते अच्छा खबर बा. आ तहार का भइल.’
-‘हमार वोमेन कॉलेज में एडमीशन हो गइल बा.’
-‘कवन विषय लेलू ह?’
-‘पापा ना मननी ह. साइंस में एडमीशन भइल ह. बायलोजी में.’
जुगेसर का समझे में देर ना लागल. एगो संतान के सफल भइला पर मां-बाप समझेलन सब बच्चा ओइसने होई. लेकिन अइसन आशा अधिकांश रेगिस्तान के पानी में बदल जाला.

आज पूजा बड़ी खुलके बतिआवत रहे. जुगेसरो बहुत दिन का बाद खुलके बात कइलन. चाय कब के खतम हो गइल रहे. पूजा प्लेट उठाके जाए खातिर खड़ा भइल. पुछलस – ‘सर, आज हम खाना बनावतानी. रउआ खाये बाहर मत जाइब.’
नियम मान के जुगेसर कहलन – ‘ना ना तू तकलीफ काहे उठइबू. हम बाहर खा आइब.’
-‘वाह रे. रउरा खइला से हमरा तकलीफ होई.’ पूजा औरताना अंदाज से कह भइलस.
जुगेसर का गंभीर चेहरा पर मुस्कुराहट के एगो झलक दीख गइल. एक बार कालेज खुलल त जुगेसर पूरा तरह व्यस्त हो गइलन. फस्ट ईयर में उनकर विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान रहे. ‘डू और डाई’ ए उनका खातिर स्लोगन हो गइल. कालेज में जबहीं क्लास ना रहे उ पुस्तकालय चल जास. बैकुण्ठो जी से ज्यादा कुछ बात ना हो सके. ओह दिन डेरा रात के दस बजे पहुंचलन. आवे में बरखा होत रहे. भींग गइल रहस. दरवाजा पूजे खोललस. ऊ सीधा ऊपर गइलन. देह पोंछ के पायजामा पहिनलन. सर्ट डलहीं जात रहस कि देखलन गेट पर चाय लिहले पूजा खड़ा बानी. ऊ शरमा गइलन.

-‘का जरूरत रल.’ बड़ा कष्ट से कह पवलन.
-‘रउवा का चीज के जरूरत बा सर हम समझ सकीला. लीं चाय पीहीं जल्दी-जल्दी. हम खाना ला रहल बानी.’
तबहीं जोर के छींक आइल जुगेसर का.
-‘समझ में हमरा आइल कि रउवा चाय के केतना जरूरत बा. अदरखो डलले बानी.’ पूजा मुड़ के चल गइली.
चाय पीयत-पीयत जुगेसर आज पहिला दफा पूजा का बारे में सोचलन. कतना खुलल बिया. अर्चना का ठीक उल्टा.

समय अपना तरह से बीते लागल. घरे से बाबूजी के चिट्ठी आइल जवना के सार रहे अब एह अवस्था में उनकर इच्छा बा एक बार बहू के मुंह देखे के. जुगेसर पढ़ के रख दीहलन. उनका मुंह से एतने निकलल-‘जाहिल कहीं के.’ एने फाइनल परीक्षा के तारीख फेर बढ़ गइल. ई खबर के उनका जिन्दगी में ज्यादा महत्व रहे. अब बड़ा मुश्किल लागत रहे समय निकालल. ई त बैकुण्ठ प्रसाद जी रहस कि पइसा के अभाव खटकत ना रहे. अभी ऊ त भाड़ा लेहल बंद कर देले रहस, एक बेरा खाइल भी उनके इहां हो जाव. एक दिन अखबार में एगो खबर निकलल रहे. समस्तीपुर के पास कवनो स्कूल में साइंस के शिक्षक के जरूरत रहे. जुगेसर अइसहीं एगो दरखास्त भेज दिहलन. हठात् पता चलल परीक्षा एक महीना के अन्दर करावे के ऊपरी आदेश आइल बा. यूनिवर्सिटी में अफरा-तफरी मच गइल. जुगेसर फिर से किताब कापी में मन लगा दीहलन.

पूजा के नाम त बीएसी में लिखा गइल लेकिन ओकरा मां-बाप के पूरा दबाव रहे मेडिकल कम्पीट करे के. ओकर हालत बेचारी जइसन हो गइल रहे. पहिले त पढ़तानी बोलके जुगेसर का सामने किताब पसार के घंटन बइठल रहे. अब त ऊहो बंद रहे. चाय- खाना पहुंचावे का नाम से उनका पास जाये के बहाना ढूंढत रहे. जुगेसर के पढ़ाई में एकाग्रचित्त देख के ओकर अंतर जुड़ाय जाव.

ओने जुगेसर के परीक्षा समाप्त भइल आ एने मेडिकल प्री-टेस्ट के तारीख निकलल. एही बहाने उनका पटना रहे के एक्सटेंशन मिल गइल. बैकुण्ठजी खुदे कहलन-‘जुगेसर जी, आप यदि ई एक महीना पूजा के देख दीतीं त का जाने कहीं भगवान के कृपा हो जाइत. जुगेसर का अच्छा तरह समझ रहे पूजा खातिर समय निकालल असंभव बा. तबहियो बैकुण्ठ जी के उपकार का बदला चुकावे के इच्छा से राजी हो गइलन.

एक तरह से रिलैक्स अनुभव करत रहस जुगेसर. तबहीं एगो लिफाफा आइल उनका नाम से. भेजे वाला के पता के जगह पर एगो हल्का सा मुहर रहे. खोललन. अंदर से एगो चिट्ठी निकलल. प्रेषक मूलचंद जैन उच्च विद्यालय, समस्तीपुर. स्कूल उनका के पन्द्रह दिन के अन्दर ज्वाइन करे के अनुरोध कइले रहे. मासिक वेतन 400 रुपया. जिन्दगी में पहिला नौकरी के पत्र पाके अलग तरह के अनुभव होला. पूछे-पाछे वाला त हिसाब रहले ना रहे. ऊ मने-मने जाये के तैयार हो गइले. अभी रिजल्ट में भी देर रहे. पूजा के पढ़ावे के जवन बाधा रहे ओकरो समाधान हो गइल. ओकर परीक्षा भी एक महीना के अन्दर ही हो जाये वाला रहे.

जाये के समय जवन सीन भइल ओकर कल्पना जुगेसर का ना रहे. पहिला बार बैकुण्ठ जी के पत्नी उनका सामने अइली. साथ में बैकुण्ठ जी आ पीछे-पीछे पूजा. सबकर दिल भरल रहे आ आंख डबडबाइल. केहू कुछ बोल ना पावत रहे. हिम्मत कर के जुगेसर ही कहलन – ‘अरे हम त एगो किरायेदार रनी ह, का भइल रउरा सब के?’
नदी के बांध जइसे टूट गइल. बैकुण्ठ जी त सिसके लगलन. पूजा भाग के नीचे चल गइल. बैकुण्ठ जी के स्त्री कइसहूं कहली-‘हँ बाबू, इहे सुने के रल. तू हमनी के मकान मालिके समझल एतना दिन.’
जुगेसर का बुझाइल का गलती बोल गइलन. जवन मन माई का मरला में ना पसीजल रहे एके बार सब बांध टूट गइल. ऊ आवेश में उनकर जोड़ल हाथ पकड़ लीहलन – ‘ना चाची. हम कइसे भुला पाइब रउवा लोग के. आ हम हमेशा खातिर जात थोड़े बानी. रउरा नाहियों चाहब त रउरा सब के छोड़ के जीये के सोचिओ ना सकीला.’
धीरे-धीरे वातावरण कुछ हल्का भइल. बैकुण्ठ जी संभल गइल रहस. कहलन – ‘अच्छा चलल जाव. स्टीमर के समय भइल जात बा.’
जुगेसर आपन छोट-छोट सामान एगो बैग में रखले रहस. ओकरा के उठावे खातिर बैकुण्ठ जी झुकलन. जुगेसर भाग के बैग लीहलन. उनका स्त्री के पैर छूवे खातिर बढ़लन. खड़ा होके कहलन – ‘हम कुछ दिन में आवते बानी.’
बैकुण्ठजी आगे-आगे, पीछे उनकर स्त्री, बीच में जुगेसर. नीचे उतर के जुगेसर कहलन – ‘अरे एक बार हम अपना स्टूडेंट क त डंटले जाईं.’
बैकुण्ठ जी पूजा के कमरा के ओर मुखातिब भइले. जुगेसर अन्दर गइले. पूजा तकिया में मुंह डाल के औंधे मुंह लेटल रहे. जुगेसर आवाज दिहलन-‘पूजा.’
ऊ फटाक से उठ के खड़ा भइल. आंख लाल-लाल भइल रहे. जुगेसर आगे बढक़े ओकरा सर पे हाथ रखलन – ‘ठीक से परीक्षा दीह. हम जल्दिए लवटब.’
फिर मुड़ के घर से बाहर निकललन. बैकुण्ठजी से बिदा लेवे के चहलन लेकिन ऊ रिक्सा पर बइठा के ही बिदा कइलन.

समस्तीपुर स्कूल के मैनेजमेंट अच्छा रहे. मुश्किल इ रहे कि साइंस टीचर ज्चादा दिन टिकस ना. जुगेसरो के देख के बुझा गइल ईहो ज्यादा दिन रुकिहन ना. लेकिन मजबूरी. अच्छा लडिक़ा साइंसे पढ़े चाहस. स्कूले परिसर में रहे के व्यवस्था हो गइल. स्कूल के चपरासी रहे खानो बना देव.

जुगेसर खातिर ई नया माहौल रहे. शुरू में थोड़ा झिझक लागल लेकिन लडिक़न के मनोविज्ञान समझे में उनका देरी ना लागल. आवत-आवत दूगो चिट्ठी लिखलन – एगो बैकुण्ठ प्रसाद जी के, दोसर बाबूजी के. बाबूजी के जवाब आइल – ‘दिल बड़ा खुश भइल तहरा नौकरी के खबर पा के. एक बार आव. हमार त भगवान के जइसन इच्छा बा चल रहल बा.’
एक दिन ऊ क्लास में पढ़ावत रहस कि चपरासी आके बतवल केहू उनके से मिले आइल बा.
उनका से ईहां के मिले आयी? सोचत-सोचत ऑफिस में अइलन.
एगो आदमी कुर्सी पर बइठल रहे. जुगेसर हाथ जोड़लन – ‘हम पहचननी ना आपके.’
-‘अरे बबुआ, तू कइसे पहचनब हमके. हम तहरा मामा के सम्बंधी हईं. तहार ममो आवत रलेह लेकिन हम सोचनी ह पहिले देख त आईं तहरा के.’
-‘का बात बा?’ जुगेसर सच में कुछ समझ ना पवलन. पास में ही हिन्दी टीचर तिवारी जी रहस. पान खाइल मुंह उठाके कहलन – ‘जोगेश्वर बाबू शादी-वादी करियेगा कि नहीं..?’
तिवारी जी का थूके खातिर बाहर जाये के पड़ल. आके कहलन – ‘अरे भाई. शादी करिये. हम लोगों को बारात में ले चलना नहीं भूलिएगा.’
तिवारी जी समय के नजाकत समझ के बाहर चल गइलन. जुगेसर कुछ बोलस एकरा पहिले ऊ सज्जन कहे लगलन – ‘बबुआ देख. तहरा पास सैकड़ों प्रस्ताव आई लेकिन हमरा जइसन बड़ा मुश्किल बा. के बा हमरा टक्कर के जिला में. दुआर पर दूगो भैंस बा. अभी हाले में टैक्टरो लेनी ह. तहार एगो साला बीएसएफ में बा. मुखिया के चुनाव त समझ ऊ पंडितवा के पालटिक्स से हार गइनी हं. तू चनपटिया स्टेशन पर केहू से कह रामसुन्दर प्रसाद कीहां जाये के बा. बीसो आदमी संगे लाग जइहन…’

का-का कहलन जुगेसर का कुछ समझ में ना आइल. उनका चुप होखे के इन्तजार में जुगेसर के धैर्य टूट गइल. कहलन – ‘अच्छा ठीक बा. लेकिन अबही हमरा शादी के कवनो प्लान नइखे. अबही तक हमार खुद ठीक नइखे.’
-‘तू आपन हमरा पर छोड़ द. तहार एम.ए. के रिजल्ट निकल जाये द. अपने जात के एगो कालेज खुल रहल बा. हम बात कइनी हं एमएलए साहेब से. अपने जात हउवन. पचास हजार लीहन प्रोफेसर बन जइब. ई साला स्कूल के मास्टरी कवनो चीज बा?’
अब जुगेसर का एगो रास्ता निकललन पिंड छोड़ावे के. हाथ जोडक़े विदा करे के मुद्रा में कहलन – ऊहे त हमहूं सोच तानी. एमएससी के रिजल्ट आ जाव त सोचल जाई ई सब. अभी त बडक़ा बेल घूरे में बा.’
ऊ सज्जन आपन जीत निश्चित समझ के चले के तइयार भइलन. बरदान देवे के मुद्रा में कहलन – ‘तू निश्चिन्त रह. अरे हीरा के केहू कोइला से ढक सकेला. आ एक बार सम्बंध होखे द ना. समझब ससुराल का होला.’
उनका गइला पर जुगेसर धम्म से बइठलन. हाथ सर पर चल गइल.
जब चपरासी गिलास में पानी लाके के दिहलस, पानी पीके मुंह से आवाज निकलल – ‘बाप रे.’
एक दिन इच्छा भइल त समस्तीपुर कालेज में गइलन जुगेसर. केमिस्ट्री विभाग में पता करे कि के के लेक्चरार बा. ऊहां गइला पर पूछे के ना पड़ल. उचक के देखलन त विनय पांडेय जी रहस. जब ऊ एमएससी में भर्ती भइलन त ऊ फाइनल में रहस. हास्टले में परिचय भइल रहे. बड़ा ही सीधा-सादा रहस. सबका मालूम रहे जातिवाद के कारण उनका फर्स्ट क्लास फर्स्ट ना मिलल रहे.


(बाकी फेर अगिला कड़ी में)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” के भूमिका

आदर्श युवक के सम्मोहक प्रेम के सूत्र में बंधल सामाजिक ताना बाना

‘जुगेसर’ उपन्यास एगो अइसन व्यापक फलक वाला आधुनिक उपन्यास ह जवना में गांव अउर शहर दूनों के सामाजिक परिस्थिति अउर चुनौती के वस्तुपरक ढंग से बहुत व्यापक अर्थ में चित्रण बा. कथानक के पात्र खाली व्यक्ति ना हउअन बलुक ऊ मौजूदा समाज के एगो अइसन व्यक्ति बनके आइल बाडऩ जवना में उनका निजीपन के अतिक्रमण भइल बा आ ऊ समाज के लाखोंलाख लोगन के प्रतिनिधित्व करे में समर्थ बाडऩ. उपन्यास के नायक जुगेसर कउनो साधारण युवक ना हउअन बलुक ऊ एगो अइसन जोशीला, आदर्शवादी अऊर निष्कपट व्यक्ति हउअन जवन समाज में व्याप्त तमाम समस्या से जूझऽता अउर अपना ढंग से प्रतिक्रिया देऽता अउर एही समाज में अपने जीए के एगो अलग रास्ता बनावऽता. ई रास्ता संघर्ष के नइखे ऊ सहअस्तित्व के सिद्धांत पर चलऽता. दोसरा के बदले के त बहुत प्रयास नइखन करत लेकिन अपना आचरण के शुचिता के आखिर ले बरकरार राखे में सफल बाड़े. जुगेसर के जीवन अपने आपमें एगो आदर्श युवक के जीवन बा अऊर चुपचाप एगो मॉडल देश-दुनिया के सामने रखऽता कि कइसे विपरीत परिस्थितिओ में बिना समझौता कइले व्यक्ति सादगी अउर बिना भ्रष्टाचार के कवनो रास्ता अपनवले आपन जीवन शुचिता से गुजार सकऽता.

जुगेसर साइंस के मेधावी छात्र रहे अउर बिना कवनो जोड़ तोड़ के अपना व्यक्तित्व के खूबी के साथो तरक्की करत चलल जा ता. पद प्रतिष्ठा में जुगेसर से सफलो व्यक्ति ओकरा व्यक्तित्व का आगे नत हो जाता अउर पाठक के निगाह में बौनो. सफल व्यक्ति हमेशा समाज के आदर्श व्यक्ति ना होखे ई बात पूरा शिद्दत से हरेन्द्र कुमार जी अपना ए उपन्यास में उठवले बानी आ ईहो एगा कारण बा जवन एह उपन्यास के सार्थकता प्रदान कर ता.

उपन्यास में खाली सामाजिक ठोस यर्थाथे नइखे. एकर प्रमुख विशेषता बा एकर रोचकता. हृदयस्पर्शी एगो प्रेम कथा के सूत्र से ई उपन्यास बंधल बा जवन जुगेसर के दाम्पत्यो जीवन में बरकरार रह ता, जवन ना सिर्फ युवा पाठकन के बलुक पोढ़ो पाठकन के समान रूप से आकृष्ट करी. स्त्री के व्यक्तित्व के औदात्यपूर्ण चित्रणो एह उपन्यास के अर्थवान बनावे में समर्थ भइल बा. जुगेसर के प्रेमिका पूजा, जवना से बाद में जुगेसर अपना परिवार के अनिच्छा के बावजूद शहर में विवाह कर ले ता, एगो अइसन आदर्श नारी के रूप में उभर के आवऽतिया जे भारतीय समाज के पारिवारिक ताना-बाना के मजबूत कऽ के आदर्श प्रस्तुत करऽतिया. प्रेम परिवार से अलगाव करावे ला के प्रचलित धारणा के विपरीत मौका पड़ला पर प्रेम के परिधि केतना विस्तृत हो सकेला पूजा के चरित्र ओकर उदाहरण बा. उपन्यास में प्रेम के द्वंद्व, अंतरजातीय विवाह के समस्या, शिक्षा जगत आ राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार आदि समस्या के बखूबी उठावल गइल बा जवन उपन्यास के उपन्यासे नइखे रहे देत बल्कि समाज के मौजूदा स्वरूप पर सार्थक टिप्पणी बन जाता. उपन्यास में प्रेम क कएकगो दृश्य एतना जीवन्त बा कि पढ़त समय पाठक के सामने दृश्य उपस्थित करे में समर्थ बा. हरेन्द्र जी के लेखन शैली एतना सादगी पूर्ण अउर भाषा एतना सरल-सहज आ प्रवाहपूर्ण बा कि कहीं से साहित्यिकता के आतंक नइखे होत बल्कि रोचकता, सरसता आ आगे का भइल जाने के जिज्ञासा अन्त तक बनल रह ता. अउर अन्त में उपन्यास पढ़ के आंख छलाछला जाय तो एके उपन्यास दोष न मानल जाव, मन भारी हो जाई लेकिन उपन्यास के कथानक अउर चरित पाठक के मन में हमेशा-हमेशा खातिर आपन जगह त बनाइए ली, ई पूरा विश्वास बा.

– डॉ.अभिज्ञात


आपन बात

हरेन्द्र कुमार पाण्डेय अँजोरिया पाठकन खातिर अपरिचित ना हईं. इहाँ के लिखल उपन्यास सुष्मिता सान्याल के डायरी बहुत पहिले से अँजोरिया पर मौजूद बा. दुख एक बात के बा कि पीडीएफ फार्मेट में होखला आ बहुते बड़हन फाइल होखला का चलते बहुते कम लोग एकरा के पढ़ले बा. सौभाग्य से डा॰ हरेन्द्र कुमार अपना नया उपन्यास “जुगेसर” के साफ्ट कॉपी भेज दिहले बानी. एह उपन्यास के प्रकाशन धारावाहिक रूप में कोलकाता के लोकप्रिय हिन्दी दैनिक “सन्मार्ग” में हो चुकल बा आ बाद में पुस्तकाकारो में प्रकाशित भइल बा सन्मार्ग का तरफ से. पेश बा उहे उपन्यास अँजोरिया के पाठकन खातिर.

एह तरीका से प्रकाशित होखला से भोजपुरी साहित्य पूरा दुनिया के भोजपुरी पाठक पाठिकन के सहज रूप से मिल जाई आ भोजपुरी खातिर ई सबले बढ़िया तरीका लागेला हमरा.

एहिजा इहो बता दिहल जरूरी लागल कि बता दीं कि उपन्यास के अँजोरिया शैली में डाले का चलते कुछ कुछ बदलाव कइल गइल बा. एह धृष्टता खातिर हम माफी माँगब बाकिर हमरा ई जरूरी लागल एह से हम कइले बानी. आशा बा कि लेखक समीक्षक के एह पर ढेर आपत्ति ना होखी.

पूरा उपन्यास बहुते जल्दिए पूरा प्रकाशित कर दिहल जाई काहे कि ई भोजपुरी में लिखल गइल बा आ अनुवाद करे के परेशानी नइखे एकरा साथे जइसे कि “लोक कवि अब गाते नहीं” का साथे भइल बा आ अबही ले ओकर पूरा अनुवाद प्रकाशित नइखे हो सकल.

ओम,
संपादक, अँजोरिया.कॉम

लोक कवि अब गाते नहीं – १७

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

सोरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे आपन दलाली वसूले का फेर में गणेश तिवारी अपने पट्टीदार फौजी तिवारी का खिलाफ पोलदना के हथियार बनवलन. बाकिर जब बाद में पोलदनो पलटि गइल त ओकर समूल नाश करवा दिहलन फौजी तिवारी के बेटा से. एह सब का बावजूद फौजी तिवारी के बेटा उनकर असलियत जान लिहले रहुवे आ एहसे उनुका के अपना लगे सटे ना दिहलस. ओहिजा से गणेश तिवारी आपन पोंछि सटकवले लवटि आइल रहले. अब आगे पढ़ीं…


त ई आ अइसनके तमाम कथा कहानी के केंद्र में रहे वाला इहे गणेश तिवारी अब भुल्लन तिवारी के नतिनी का शादी में रोड़ा बने के भूमिका बान्हत रहले. कारण दू गो रहे. पहिला त ई कि भुल्लन तिवारी के नतिनी का शादी ख़ातिर पट्टीदारी के लोगन में से चुनल “संभ्रांत” लोग का सूची में लोक कवि उनुकर नाम काहे ना रखले. आ नाम राखल त फरका भेंटो कइल जरूरी ना समुझले. तब जब कि ऊ उनुकर “चेला” हवे. दोसरका कारण ई रहे कि उनुकर जेब एह शादी में कइसे किनारे रह गइल ? त एह तरह अहम आ पइसा दुनु के भूख उनुकर तुष्ट ना होत रहुवे. से ऊ चैन से कइसे बइठल रहतन भला ? ख़ास कर तब आ जब लड़िकी के ख़ानदान ऐबी होखो. बाप एड्स से मरल रहुवे आ आजा जेल में रहल ! तबहियो उनुका के पूछल ना गइल. त का उनुकर “प्रासंगिकता” गांव जवार में ख़तरा में पड़ गइल रहे ? का होखी उनुका विलेज बैरिस्टरी के ? का होखी उनुकर बियहकटवा वाला कलाकारी के ?

वइसे त हर गांव, हर जवार के हवा में शादी काटे वाला बियहकटवा बिचरते रहेले. कवनो नया रूप में, कवनो पुरान रूप में त कवनो बहुरुपिया रूप में. लेकिन एह सब कुछ का बावजूद गणेश तिवारी के कवनो सानी ना रहे. जवना सफाई, जवना सलीका, जवना सादगी से ऊ बियाह काटसु ओह पर नीमन-निमन लगो न्यौछावर हो जायं. लड़की होखो भा लड़िका सबकर ऐब ऊ एह चतुराई से उघाड़सु आ लगभग तारीफ के पुल बान्हत कि लोग लाजवाब हो जाव. अउर उनुकर “काम” अनायासे हो जाव. अब कि जइसे कवनो लड़िकी के मसला होखे त ऊ बतावसु, “बहुते सुंदर, बहुते सुशील. पढ़े लिखे में अव्वल. हर काम में “निपुण”. अइसन सुशील लड़िकी रउरा हजार वाट क बल्ब बार के खोजीं तबो ना मिली. आ सुंदर अतना कि बाप रे बाप पांच छ गो ल लौंडा पगला चुकल बाड़े.”
“का मतलब?”
“अरे, दू ठो तो अबहिये मेंटल अस्पताल से वापिस आइल बाड़े”
“इ काहें?”
“अरे उनहन बेचारन के का दोष. ऊ लड़िकी हईये बिया एतना सुंदर.” ऊ बतावसु, “बड़े-बड़े विश्वामित्र पगला जायँ.”
“ओकरा सुंदरता से इनहन के पगलइला के का मतलब ?
“ए भाई, चार दिन आप से बतियाए आ पँचवा दिने दोसरा से बोले-बतियाए लागे, फेर तिसरा, चउथा से. त बकिया त पगलइबे नू करीहें !”
“ई का कहत बानीं आप?” पूछे वाला के इशारा होखे कि, “आवारा हियऽ का?”
“बाकी लड़िकी गुण के खान हियऽ.” गणेश तिवारी अगिला के सवाल अउर इशारा जानतबूझत पी जासु आ तारीफ के पुल बान्हत जासु. उनुकर काम हो जाव.
कहीं-कहीं ऊ लड़िकी के “हाई हील” के तारीफ कर बइठसु बाकिर इशारा साफ होखे कि नाटी हियऽ. त कहीं ऊ लड़िकी के मेकअप कला के तारीफ करत इशारा करसु कि लड़िकी सांवर हवे. बात अउर बढ़ावे के होखे त ऊ डाक्टर, चमइन, दाई, नर्स वगैरहो शब्द हवा में बेवजह उछाल देसु कवनो ना कवनो हवाले आ इशारा एबार्सन क होखे. भैंगी आंख, टेढ़ी चाल, मगरूर, घुंईस, गोहुवन जइसन पुरनको टोटका ऊ सुरती ठोंकते खात आजमा जासु. उनका युक्तियन आ उक्तियन क कवनो एक चौहद्दी, कवनो एक फ्रेम, कवनो एक स्टाइल ना होखत रहे. ऊ त रोजे नया होत रहे. महतारी के झगड़ालू होखल, मामा के गुंडा होखल, बाप के शराबी होखल, भाई के लुक्कड़ भा लखैरा होखल वगैरहो ऊ “अनजानते” सुरती थूकत-खांसत परोस देसु. लेकिन साथ-साथ इहो संपुट जोड़त जासु कि, “लेकिन लड़िकी हियऽ गुण के खान.” फेर अति सुशील, अति सुंदर समेत हर काम में निपुण, पढ़ाई-लिखाई में अव्वल, गृह कार्य में दक्ष वगैरह.
इहे-इहे आ अइसने-अइसन तरकीब ऊ लड़िकनो पर आजमावसु. “बहुते होनहार, बहुते वीर” कहत ओकरा “संगत” के बखान बघार जासु आ काम हो जाव.

एक बेर त गजबे हो गइल. एगो लड़िका के बाप बड़ा जतन से ओह दिन बेटा के तिलक के दिन निकलववलन जवना दिने का ओह दिन का आगहू-पाछा गांव में गणेश तिवारी के मौजुदगी के अनेसा ना रहल. बाकिर ना जाने कहाँ से ऐन तिलक चढ़े से कुछ समय पहिले ऊ गांव में ना सिरिफ प्रगट हो गइलें बलुक ओकरा घरे हाजिरो हो गइले. सिरिफ हाजिरे ना भइलन. जाकेट से हाथ निकालत गांधी टोपी ठीक करत-पहिनत तिलक चढ़ावे आइल तिलकहरुवने का बीचे जा के बइठ गइलन. उनुका ओहिजा बइठते घर भर के लोग के हाथ गोड़ फूल गइल. दिल धकधकाए लागल. लोगो तिलकहरुवन के आवभगत छोड़ के गणेश तिवारी के आवभगत शुरू कर दिहल. लड़िका के बाप आ बड़का भाई गणेश तिवारी क आजू-बाजू आपन ड्यूटी लगा लिहले. जेहसे उनुका सम्मान में कवनो कमी ना आवे आ दोसरे, उनुका मुंह से कहीं लड़िका के तारीफ मत शुरू हो जाव. गणेश तिवारी के नाश्ता अबहिं चलत रहल आ ऊ ठीक वइसहीं काबू में रहलें जइसे अख़बारन में दंगा वगैरह का बाद ख़बरन के मथैला छपेला “स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में.” त “तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में” वाला हालाते में लड़िका के बाप के एगो उपाय सूझल कि काहे ना बेटा के बोलवा के गणेश तिवारी के गोड़ छूआ के इनकर आशीर्वाद दिआ दिहल जाव. जेहसे गणेश तिवारी के अहं तुष्ट हो जाव आ तिलक बिआह बिना विघ्न-बाधा संपन्न हो जाव. आ ऊ इहे कइलन. तेजी से घर में गइले आ ओही फुर्ती से बेटा के लिहले चेहरा पर अधिके उत्साह आ मुसकान टांकत गणेश तिवारी का लगे ले गइलन जे बीच तिलकहरु स्पेशल नाश्ता पर जुटल रहले. लड़िका के देखते गणेश तिवारी धोती के एगो कोर उठवले आ मुंह पोंछत लड़िका के बापो से बेसी मुसकान आ उत्साह अपना चेहरा पर टांक लिहले आ आंख के कैमरा “क्लोज शाट” में लड़िके पर टिका दिहले. बाप के इशारा पर लड़िका झुकल आ दनुबु हाथे गणेश तिवारी के दुनु गोड़ दू दू बेर एके लाइन में छुवत चरण-स्पर्श करते रहल कि गणेश तिवारी आशीर्वादन के झड़ी लगा दिहले. सगरी विशेषण, सगरी आशीर्वाद देत आखिर में ऊ आपन ब्रह्ममास्त्र फेंक दिहलन, “जियऽ बेटा! पढ़ाई लिखाई में त अव्वल रहबे कइलऽ, नौकरीओ तोहरा अव्वल मिल गइल, अब भगवान के आशीर्वाद से तोहार बिआहो होखत बा. बस भगवान क कृपा से तोहर मिरिगियो ठीक हो जाव त का कहे के!” ऊ कहलन, “चलऽ हमार पूरा-पूरा आशीर्वाद बा !” कहिके ऊ लड़िका के पीठ थपथपवले. तिलकहरुअन का ओर मुसुकात मुखातिब भइलन आ लगभग वीर रस में बोललन, “हमरा गांव, हमरा कुल के शान हउवन ई.” ऊ आगे जोड़लन, “रतन हवे रतन. आप लोग बहुते खुशनसीब हईं जे अइसन योग्य आ होनहार लड़िका के आपन दामाद चुननी.” कहिके ऊ उठ खड़ा होत कहले, “लमहर यात्रा से लवटल बानी. थाकल बानी. आराम कइल जरूरी बा. माफ करब, चलत बानी. आज्ञा दीं.” कहिके दुनु हाथ ऊ जोड़लन आ ओहिजा से चल दिहलन.
गणेश तिवारी त ओहिजा से चल दिहले बाकिर तिलकहरुअन का आंखिन आ मन में सवालन के सागर छोड़ गइले. पहिले त आंखिये-आंखि में ई सवाल सुनुगल. फेर जल्दिये जबान पर भदके लागल इ सवाल कि, “लड़िका के मिर्गी आवेला ?” कि, “लड़िका त मिर्गी क रोगी ह?” कि, “मिर्गी के रोगी लड़िका से शादी कइसे हो सकेला?” कि, “लड़िकी के जिनिगी खराब करे के बा का?” आ आखिरकार एह सवालन के आग लहकिए गइल. लड़िका के बाप, भाई, नात-रिश्तेदार आ गांव के लोगो सफाई देत रह गइल, कसम खात रह गइल कि, “लड़िका के मिर्गी ना आवे,” कि “लड़िका के मिर्गी आइत त नौकरी कइसे मिलीत ?” कि “अगर शक होइए गइल बा त डाक्टर से जँचवा लीं!” आदि-आदि. बाकिर एह सफाइयन आ किरियन के असर तिलकहरुअन पर जरिको ना पड़ल. आ ऊ लोग जवन कहाला थरिया-परात, फल-मिठाई, कपड़ा-लत्ता, पइसा वगैरह लिहले ओहिजा से उठ खड़ा भइले. फेर बिना तिलक चढ़वलही चल गइलन. ई कहत कि, “लड़िकी के जिनिगी बरबाद होखे से बाच गइल.” साथही गणेश तिवारी ओरि इंगितो करत कि, “भला होखो ओह शरीफ आदमी के जे समय रहिते आँख खोल दिहलसि. नाहीं त हमनी का त फँसिये गइल रहीं सँ. लड़िकी के जिनिगी बरबाद हो जाइत!”

जइसे अनायासे आशीर्वाद दे के गणेश तिवारी एह लड़िका के निपटवले रहले वइसही भुल्लन तिवारी के नतिनी का शादीओ में ऊ अनायासे भाव में सायास निपटावे ख़ातिर जुट गइल रहले. भुल्लन तिवारी के नातिन के कम लोक कवि के जेब के बहाने अपना गांठ के चिंता उनुका के बेसी तेज कइले रहुवे. बाति वइसहीं बिगड़ल रहुवे, गणेश तिवारी के तेजी आग में घीव के काम कइलसि. आखिरकार बात लोक कवि ले चहुँपल. पहुंचवलसि भुल्लन तिवारी के बेटा के साला लखनऊ में आ कहलसि कि, “बहिन के भाग में अभागे लिखल रहे लागत बा भगिनी का भाग में एहुसे बड़ अभाग लिखल बा.”
“घबराईं मत.” लोक कवि उनुका के तोस दिहलन. कहलन कि, “सब ठीक हो जाई.”
“कइसे ठीक हो जाई ?” साला बोलल, “जब गणेश तिवारी के जिन्न ओकरा बिआह का पाछा लाग गइल बा. जहँवे जाईं आपसे पहिले गणेश तिवारी चोखा चटनी लगा के सब मामिला पहिलही बिगाड़ चुकल रहेलें !”
“देखीं अब हम का कहीं, आपो भी ब्राह्मण हईं. हमरा ला देवता तुल्य हईं बाकिर बुरा मत मानब.” लोक कवि बोले, “गणेशो तिवारी ब्राह्मण हउवें. हमार आदरणीय हउवें. बाकिर हउवन कुत्ता. कुत्तो से बदतर!” लोक कवि जोड़लन, “कुत्ता के इलाज हम जानीलें. दू चार हजार मुँह पर मार देब त ई गुर्राए, भूंके वाला कुत्ता दुम हिलावे लागी.”
“लेकिन कब? जब सबहर जवार जान जाई तब? जब सब लोग थू-थू करे लागी तब?”
“नाहीं जल्दिए.” लोक कवि बोलले, “अब इहै गणेश तिवारिए आप के भगिनी के तारीफ करी.”
“तारीफ त करते बा.” साला बोलल, “तारीफे कर के त ऊ काम बिगाड़त बा. कि लड़की सुंदर हवे, सुशील हवे. बाकिर बाप अघोड़ी रहल. एड्स से मर गइल आ आजा खूनी ह. जेल में बंद बा.”
“त ई बतिया कइसे छुपा लेब आप आ हम?”
“नाहीं बाति एहीं ले थोड़े बा.” ऊ बोलल, “गणेश तिवारी प्रचारित करत बाड़े कि भुल्लन तिवारी के पूरा परिवार के एड्स हो गइल बा. साथ ही भगिनियो के नाम ऊ नत्थी कर देत बाड़े.”
“भगिनिया के कइसे नत्थी कर लीहें?” लोक कवि भड़कले.
“ऊ अइसे कि….. साला बोलल, “जाए दीं ऊ बहुते गिरल बात कहत बाड़े.”
“का कहतारें?” धीरे से बुदबुदइले लोक कवि, “अब हमरा से छुपवला से का फायदा? आखि़र ऊ त कहते बाड़ब नू?”
“ऊ कहत बाड़े कि जीजा जी अघोड़ी रहलन बेटी तक के ना छोड़ले. से बेटीओ के एड्स हो गइल बा.”
“बहुते कमीना बा!” कहत लोक कवि पुच्च से मुंह में दबाइल सुरती थूकलें. बोलले, “आप चलीं, हम जल्दिए गणेश तिवारी के लाइन पर लेआवत बानी.” वह बोलले, “ई बात रहल त पहिलवैं बतवले रहीतऽ. एह कमीना कुत्ता के इलाज हम कर दिहले रहतीं.”
“ठीक बा त जइसे एतना देखें हैं आप तनी एतना अउर देख लीं.” कहिके साला उठ खड़ा भइल.
“ठीक बा, त फेर प्रणाम!” कहिके लोक कवि दुनु हाथ जोड़ लिहले.
भुल्लन तिवारी के बेटा के साला के जाते लोक कवि चेयरमैन साहब के फोन मिलवलन आ सगरी रामकहानी बतवलन. चेयरमैन साहब छूटते कहले, “जवन पइसा तू ओकरा के दिहल चाहत बाड़ऽ उहे पइसा कवनो लठैत भा गुंडा के दे के ओकर कुट्टम्मस करवा द. भर हीक कुटवा द, हाथ पैर तूड़वा द. सगरी नारदपना भूला जाई.”
“ई ठीक होखी भला?” लोक कवि ने पूछा.
“काहें खराब का होखी ? चेयरमैनो साहब पूछलन. कहलन, “अइसन कमीनन का साथे इहे करे के चाहीं.”
“आप नइखीं जानत ऊ दलाल ह. हाथ गोड़ टूटला का बादो ऊ अइसन डरामा रच लीहि कि लेबे के देबे पड़ जाई.” लोक कवि बोले, “जे अइसे मारपीट से ऊ सुधरे वाला रहीत त अबले कई राउंड ऊ पिट-पिटा चुकल रहीत. बड़ा तिकड़मी ह से आजु ले कब्बो नइखे पिटाइल.” ऊ कहलन, “खादी वादी पहिर के अहिंसा-पहिंसा वइसै बोलत रहेला. कहीं पुलिस-फुलिस के फेर पड़ गइल त बदनामी हो जाई.”
“त का कइल जाव? तूहीं बतावऽ !”
“बोले के का बा. चलि के कुछ पइसा ओकरा मुँह पर मार आवे के बा!”
“त एहमें हम का करीं?”
“तनी सथवां चलि चली. अउर का!”
“तोहार शैडो त हईं ना कि हरदम चलल चलीं तोहरा साथे!”
“का कहत बानी चेयरमैन साहब!” लोक कवि बोलले, “आप त हमरे गार्जियन हईं.”
“ई बात है?” फोने पर ठहाका मारत चेयरमैन साहब कहले, “त चलऽ कब चले के बा ?”
“नहीं, दू चार ठो पोरोगराम एने लागल बा, निपटा लीं त बतावत बानी.” लोक कवि कहले, “असल में का बा कि एह तरे के बातचीत में आप के साथ होला से मामिला बैलेंस रहेला अउर बिगड़ल काम बनि जाला.”
“ठीक बा, ठीक बा. अधिका चंपी मत करऽ. जब चले होखी त बतइहऽ.” ऊ रुकले आ कहले, “अरे हँ, आजु दुपहरिया में का करत बाड़ऽ?”
“कुछ नाईं, तनी रिहर्सल करब कलाकारन का साथे.”
“त ठीक बा. तनी बीयर-सीयर ठंडी-वंडा मंगवा लीहऽ हम आएब.” ऊ कहलन, “तोहरा के आ तोहरा रिहर्सल के डिस्टर्ब ना करब. चुपचाप पीयत रहब आ तोहार रिहर्सल देखत रहब.”
“हँ, बाकिर लड़िकियन का साथे नोचा-नोची मत करब.”
“का बेवकूफी बतियावत बाड़ऽ.” ऊ कहले, “तू बस बीयर मंगवा रखीहऽ.”
“ठीक बा आई!” लोक कवि बेमन से कहले.

चेयरमैन साहब बीच दुपहरिया लोक कवि किहाँ पहुंच गइले. रिहर्सल अबही शुरूओ ना भइल रहे लेकिन चेयरमैन साहब के बीयर शुरू हो गइल. बीयर का साथे लइया चना, मूंगफली आ पनीर के कुछ टुकड़ा मंगवा लिहल रहे. एक बोतल बीयर जब ऊ पी चुकले आ दोसरकी खोले लगले त बोतल खोलत-खोलत ऊ लोक कवि से बेलाग हो के कहले, “कुछ मटन-चिकन मंगवावऽ आ ह्विस्कीओ!” ऊ जोड़लें, “अब ख़ाली बीयर-शीयर से दुपहरिया कटे वाली नइखे.”
“अरे, लेकिन रिहर्सल होखल बाकी बा अबही.” लोक कवि हिचकत संकोच घोरत कहले.
“रिहर्सल के रोकत बा?” चेयरमैन साहब कहले, “तू रिहर्सल करत-करवावत रह. हम खलल ना डालब. किचबिच-किचबिच मत करऽ, चुपचाप मंगवा ल.” कहिके ऊ जेब से कुछ रुपिया निकाल लोक कवि ओर फेंक दिहले.
मन मार लोक कवि रुपिया उठवले, एगो चेला के बोलवले आ सब चीज ले आवे खातिर बाजार भेज दिहले. एही बीच रिहर्सलो शुरू हो गइल. तीन गो लड़िकी मिल के नाचल गावल शुरू कर दिहली. हारमोनियम, ढोलक, बैंजो, गिटार, झाल, ड्रम बाजे लागल. लड़िकिया सब नाचत गावत रहलीं, “लागऽता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला/आलू, केला खइलीं त एतना मोटइलीं/दिनवा में खा लेहलीं, दू-दू रसगुल्ला!” अउर बाकायदा झुल्ला देखा-देखा, आंख मटका-मटका, कुल्हा अउर छातियन के स्पेशल मूवमेंट्स के साथे गावत रहलीं. अउर एने ह्विस्की के चुस्की ले-ले के चेयरमैन साहब भर-भर आंख “ई सब” देखत रहले. देखत का रहले पूरा-पूरा मजा लेत रहले. गाना के रिहर्सल ख़तम भइल त चेयरमैन साहब दू गो लड़िकियन के अपना तरफ बोलवले. दुनु सकुचात चहुँपली सँ त ओहनी के आजू-बाजू कुर्सियन पर बइठवले. ओहनी के गायकी के तारीफ कइलन. फेर एने ओने के बतियावत ऊ एगो लड़िकी के गाल सुहरावे लगलन. गाल सुहरावत-सुहरावत कहले, “एकरा के तनी चिकन आ सुंदर बनावऽ!” लड़िकी लजाइल. सकुचात कहलसि, “प्रोग्राम में मेकअप कर लिहले. सब ठीक हो जाला.”
“कुछ ना!” चेयरमैन साहब बोलले, “मेकअप से कब ले काम चली? जवानीए में मेकअप करत बाड़ू त बुढ़ापा में का करबू” ऊ कहले, “कुछ जूस वगैरह पियऽ, फल फ्रूट खा!” कहत ऊ अचानके ओकर ब्रेस्ट दबावे लगले, “इहो बहुत ढीला बा. एकरो के टाइट करऽ!” लड़की अफना के उठ खड़ा भइल त ओकर हिप के लगभग दबावत आ थपथपावत कहले, “इहो ढीला बा, एकरो के टाइट करऽ. कुछ इक्सरसाइज वगैरह कइल करऽ. अबही जवान बाड़ू, अबहिये से ई सब ढीला हो जाई त काम कइसे चली?” ऊ सिगरेट के एगो लमहर कश खींचत कहले, “सब टाइट राखऽ. जमाना टाइट के बा. अउर अफना के भागत कहाँ बाड़ू? बैठऽ एहिजा अबहीं तोहरा के कुछ अउर बतावे के बा.” लेकिन ऊ लड़िकी “अबहीं अइनी!” कहत बाहर निकल गइल. त चेयरमैन साहब दोसरकी लड़िकी ओर मुखातिब भइलन जवन बइठल-बइठल मतलब भरल तरीका से मुसुकात रहुवे. त ओकरा के मुसुकात देख चेयरमैनो साहब मुसुकात कहले, “का हो तू काहें मुसुकात बाड़ू ?”
“ऊ लड़िकी अबही नया बिया चेयरमैन साहब!” ऊ इठलात कहलसि, “अबही रंग नइखे चढ़ल ओकरा पर!”
“बाकिर तू त रंगा गइल बाड़ू !” ओकर दुनु गाल मीसत चेयरमैन साहब बहकत बोलले.
“ई सब हमरहू साथे मत करीं चेयरमैन साहब.” ऊ तनिका सकुचात, लजात अउर लगभग विरोध दर्ज करावत कहलसि, “हमार भाई अबहिये आए वाला बा. कहीं देख ली त मुश्किल हो जाई.”
“का मुश्किल हो जाई?” ऊ ओकरा उरोज का तरफ एगो हाथ बढ़ावत कहले, “गोली मार दी का?”
“हां, मार दी गोली!” ऊ चेयरमैन साहब के हाथ बीचे में दुनु हाथे रोकत कहलसि, “झाड़ू, जूता, गोली जवने पाई मार दीहि!”
ई सुनते चेयरमैन साहब थथम गइले, “का गुंडा, मवाली ह का?”
“ह तो ना गुंडा मवाली पर जे आप सभे अइसहीं करब त बन जाई!” ऊ कहलसि, “ऊ त हमरा गवलो-नचला पर बहुते ऐतराज मचावेला. ऊ ना चाहे कि हम प्रोग्राम करीं.”
“काहें?” चेयरमैन साहब के सनक अबले सुन्न पड़ गइल रहुवे. से ऊ दुनारा बहुते सर्द ढंग से बोलले, “काहें?”
“ऊ कहेला कि रेडियो, टी.वी. तकले त ठीक बा. ज्यादा से ज्यादा सरकारी कार्यक्रम कर ल बस. बाकी प्राइवेट कार्यक्रम से ऊ भड़केला.”
“काहें?”
“ऊ कहेला भजन, गीत, गजल तक ले त ठीक बा बाकिर ई फिल्मी उल्मी गाना, छपरा हिले बलिया हिले टाइप गाना मत गावल करऽ.” ऊ रुकल आ कहलसि, “ऊ तो हमरे के कहेला कि ना मनबू त एक दिन ऐन कार्यक्रम में गोली मार देब आ जेल चलि जाएब!”
“बड़ा डैंजर है साला!” सिगरेट झाड़त चेयरमैन साहब उठ खड़ा भइले. खखारत ऊ लोक कवि के आवाज लगवलन आ कहले, “तोहार अड्डा बहुते ख़तरनाक होखल जात बा. हम त जात बानी.” कहिके ऊ साचहू ओहिजा से चल दिहले. लोक कवि उनुका पीछे-पीछे लगबो कइलन कि, “खाना मंगवावत बानी खा-पी के जाएब.” तबहियो ऊ ना मनले त लोक कवि कहलेले, “एक आध पेग दारू अउर हो जाव!” बाकिर चेयरमैन साहब बिन बोलले हाथ हिला के मना करत बाहर आ के अपना एंबेसडर में बइठ गइले आ ड्राइवर के इशारा कइलन कि बिना कवनो देरी कइले अब एहिजा से निकल चलऽ.
उनुकर एंबेसडर स्टार्ट हो गइल. चेयरमैन साहब चल गइले.
भीतर वापिस आ के लोक कवि ओह लड़िकी से हंसत कहले, “मीनू तू त आजु चेयरमैन साहब के हवे टाइट कर दिहलू!”
“का करतीं गुरु जी आखि़र!” ऊ तनिका संकोच में खुशी घोरत कहलसि, “ऊ त जब आप आंख मरनी तबहिये हम समझ गइनी कि अब चेयरमैन साहब के फुटावे के बा.”
“ऊ त ठीक बा बाकिर ऊ तोहार कवन भाई ह जवन एतना बवाली ह?” लोक कवि पूछले, “ओकरा के एहिजा मत ले आइल करऽ. डेंजर लोग के एहिजा कलाकारन में जरूरत नइखे.”
“का गुरु जी आपहू चेयरमैन साहब के तरे फोकट में घबरा गइनी.” मीनू बोलल, “कहीं कवनो अइसन भाई हमारा बा? अरे, हमार भाई त एगो भाई बा जे भारी पियक्कड़ ह. हमेशा पी के मरल रहेला. ओकरा अपने बीवी बच्चा के फिकिर ना रहे त हमार फिकिर कहाँ से करी?” ऊ ककहलिस, “आ जे अइसही फिकिर करीत त म्यूजिक पार्टियन में घूम-घूम के प्रोग्रामे काहें करतीं?”
“तू त बड़हन कलाकार हऊ.” मीनू के हिप पर हलुके चिकोटी काटत, सुहुरावत लोक कवि बोलले, “बिलकुल डरामा वाली.”
“अब कहां हम कलाकार रह गइनी गुरू जी. हँ, पहिले रहीं. दू तीन गो नाटक रेडिअउयो पर हमार आइल रहे.”
“त अब काहें ना जालू रेडियो पर?” लोक कवि तारीफ के स्वर में कहले, “रेडिअउवे पर काहें टी.वी. सीरियलो में जाइल करऽ!”
“कहां गुरु जी?” वह बोली, “अब के पूछी ओहिजा.”
“काहें?”
“फिल्मी गाना गा-गा के फिल्मी कैसेटन पर नाच-नाच के ऐक्टिंग वैक्टिंग भूल-भुला गइल बानी.” वह बोली, “आ फेर एहिजा तुरते-तुरते पइसो मिल जाला आ रेगुलर मिलेला. बाकिर ओहिजा पइसा कब मिली, काम देबहू वालन के मालूम ना रहे. आ पइसा के त अउरियो पता ना रहेला.” ऊ रुकल आर बोलल, “ह, बाकिर लड़िकियन के साथे सुतावे, लिपटावे-चिपटावे के बात सभका मालूम होला.”
“का बेवकूफी के बात करत बाड़ू.” लोक कवि कहले, “कुछ दोसर बात करऽ.”
“काहें बाउर लाग गइल का गुरु जी?” मीनू ठिठोली फोड़त कहलसि.
“काहें नाहीं बाउर लागी?” लोक कवि कहले, “एकर मतलब बा कि जे कहीं अउर बाहर जात होखबू त अइसही हमरो बुराई बतियावत होखबू.”
“अरे नाहीं गुरु जी! राम-राम!” कहि कर ऊ आपन दुनु कान पकड़त बोलल “आप के बारे में एह तरह क बात हम कतहीं ना करीं. हम काहें अइसन बात करब गुरु जी!” ऊ विनम्र होखत कहलसि, “आप हमें आसरा दिहनी गु जी. आ हम एहसान फरामोश ना हईं.” कहिके ऊ हाथ जोड़ के लोक कवि के गोड़ छूवे लागल.
“ठीक बा, ठीक बा!” लोक कवि आश्वस्त होखत कहले, “चलऽ रिहर्सल शुरू करऽ!”
“जी गुरु जी!” कहि के ऊ हारमोनियम अपनी ओरि खींचलसि अउर ओह दोसरकी लड़िकी के, जे थोड़ दूर बइठल रहल, गोहरावत कहलसि,”तूहूं आ जा भई!”
ऊ लड़िकीओ आ गइल त हारमोनियम पर ऊ दुनु गावे लगली सँ, “लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला.” एकरा के दोहरवला का बाद दुसरकी टेर लिहलसि आ मीनू कोरस, “आलू केला खइली त एतना मोटइलीं, दिनवा में खा लेहलीं दू-दू रसगुल्ला, लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला.” फेर दुबारो जब दुनु शुरू कइली सँ इ गाना कि, “लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला/आलू केला खइलीं…..” तबहियें लोक कवि दुनु के डपट दिहले, “ई गावत बाड़ू जी तू लोग?” ऊ कहलन, “भजन गावत बाड़ू लोग कि देवी गीत कि गाना?”
“गाना गुरु जी.” दुनु एके साथ बोल पड़ली.
“त एतना स्लो काहें गावत बाड़ू लोग?”
“स्लो ना गुरु जी, टेक ले के नू फास्ट होखब जा!”
“चोप्प साली.” ओ कहलन, “टेक ले के काहें फास्ट होखबू लोग? जानत नइखू कि डबल मीनिंग गाना ह. शुरूवे से एकरा के फास्ट में डालऽ लोग.”
“ठीक बा गुरु जी!” मीनू बोलल, “बस ऊ ढोलक, बैंजो वाला आ जइतं त शुरूवे से फास्ट हो लेतीं सँ. ख़ाली हरमुनिया पर तुरंतै कइसे फास्ट हो जाईं जा?” ऊ दिक्कत बतवलसि.
“ठीक बा, ठीक बा. रिहर्सल चालू राखऽ लोग!” कहिके लोक कवि चेयरमैन साहब के छोड़ल बोतल से पेग बनावे लगले. शराब के चुस्की का साथे गाना के रिहर्सलो पर नजर रखले रहले. तीन चार गाना के रिहर्सल का बीचे ढोलक, गिटार, बैंजो, तबला, ड्रम, झाल वाला सब आ गइले. से सगरी गाना लोक कवि के मन मुताबिक “फास्ट” में फेंट के गावल गइल. एह बीच तीन गो लड़िकी अउरी आ गइली सँ. सजल-धजल, लिपाइल-पोताइल. देखते लोक कवि चहकलन. आ अचानके गाना-बजाना रोकत ऊ लगभग फरमान जारी कर दिहलन, “गाना-बजाना बंद कर के कैसेट लगावऽ जा. अब डांस के रिहर्सल होखी.”
कैसेट बाजे लागल आ लड़िकिया नाचे लगलीं स. साथे-साथ लोको कवि एह डांस में छटके-फुदके लगले. वइसे त लोक कवि मंचों पर छटकत, फुदकत, थिरकत रहले, नाचत रहले. एहिजा फरक अतने भर रहल कि मंच पर ऊ खुद के गावल गाने में छटकत फुदकत नाचसु. बाकिर एहिजा ऊ दलेर मेंहदी के गावल “बोल तररर” गाना वाला बाजत कैसेट पर छटकत फुदकत थिरकत रहले. ना सिरिफ थिरकत रहले बलुक लड़िकियन के कूल्हा, हिप, चेहरा आ छातियन के मूवमेंटो “पकड़-पकड़” के बतावत जात रहलन. एगो फरक इहो रहे कि मंच पर थिरकत घरी माइक का अलावा उनुका एक हाथ में तुलसी के मालो रहत रहे. बाकिर एहिजा उनुका हाथ में ना माइक रहे, ना माला. एहिजा उनुका हाथ में शराब के गिलास रहल जवना के कबो-कबो ऊ अगल बगल का कवनो कुरसी भा कवनो जगहा राख देत रहले, लड़िकियन के कूल्हा, छाती आ हिप्स के मूवमेंट बतावे ख़ातिर. आंख, चेहरा अउर बालन के शिफत बतावे ख़ातिर. लड़िकी त कई गो रहलीं सँ एह डांस रिहर्सल में आ लोक कवि लगभग सगरी पर “मेहरबान” रहले. बाकिर मीनू नाम के लड़िकी पर ऊ ख़ास मेहरबान रहले. जब तब ऊ मूवमेंट्स सिखावत-सिखावत ओकरा के चिपटा लेसु, चूम लेसु, ओकरा बाल ओकरा गाल समेत ओकर “36” वाली हिप ख़ास तौर पर सुहरा देसु. त उहो मादक मुसकान रहि-रहि के फेंक देव. बिलकुल अहसान माने वाला भाव में. जइसे कि लोक कवि ओकर बाल, गाल आ हिप सुहरा के ओकरा पर ख़ास एहसान करत होखसु. आ जब ऊ मदाइल, मीठकस मुसुकान फेंके त ओहमें सिरिफ लोके कवि ना, ओहिजा मौजूद सभे लोग नहा जाव. मीनू दरअसल रहबे अइसन मदाइल कि ऊ मुसुकाव तबहियो. ना मुसुकाव तबहियो लोग ओकरा मदइला में उभ-चूभ होखत डूबिये जाव. मंचों पर कई बेर ओकरा एह मदइला से मार खाइल बाऊ साहब टाइप लोग भा बाँका शोहदन में गोली चले के नौबत आ जाव आ जब ऊ कुछ मादक फिल्मी गानन पर नाचे त सिर फुटव्वल मच जाव. “झूमेंगे गजल गाएंगे लहरा के पिएंगे, तुम हमको पिलाओ तो बल खा के पिएंगे….” अर्शी हैदराबादी के गावल गजल पर जब ऊ पानी भरल बोतल के “डबल मीनिंग” में हाथ में लिहले मंच से नीचे बइठल लोगन पर पानी उछाले तो बेसी लोग ओह पानी में भींजे खातिर पगला जाव. भलही सर्दी ओह लोग के सनकवले होखे तबो ऊ लोग पगलाइल कूदत भागत आगे आ जाव. कभी-कभार कुछ लोग एह हरकत के बाउरो मान जासु बाकिर जवानी के जोश में आइल लोग त “बल खा के पिएंगे” में बह जाव. बह जाव मीनू के बल खात, धकियावत “हिप मूवमेंट्स” के हिलकोरन मे. बढ़ियाईल नदी का तरे उफनात छातियन का हिमालय में भुला जासु. भुला जासु ओकरा अलसाइल अलकन का जाल में. अउर जे एह पर कवनो केहू टू-टपर करे तो बाँहन के आस्तीन मुड़ जाव. छूरा, कट्टा निकल आवे. पिस्तौल, राइफल तना जाव. फेर दउड़ के आवसु पुलिस वाला, दउड़त आवे कुछ “सभ्य, शरीफ अउर जिम्मेदार लोग” तब जा के ई जवानी के लहर बमुश्किल थथमे. बाकिर “झूमेंगे गजल गाएंगे लहरा के पिएंगे, तुम हमको पिलाओ तो बल खा के पिएंगे…..” के बोखार ना उतरे.


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एगो जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

लोक कवि अब गाते नहीं – १६

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

पन्दरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
कि कइसे गणेश तिवारी झूठ के साँच आ साँच के झूठ बनावे का तिकड़म में लागल रहेले. अबकी उनुका तिकड़म के माध्यम बनल बा पोलादन जे आपन जमीन गणेश तिवारी के एगो पटीदार के बेचले रहुवे आ अब गणेश तिवारी लागल बाड़े कि ओकर जमीन ओकरा वापिस मिल जाव बिना दाम लवटवले. पोलादन के विश्वास त नइखे होत बाकिर तबहियो ऊ गणेश तिवारी के खेवा खरचा खातिर कई हजार रूपिया दे आवत बा आ लवटति घरी सोचत बा कि पता ना जमीनवा मिली कि ना कि पइसवो डूबी ? अब आगे पढ़ीं…


हफ्ता, दू हफ्ता बीतल. कुछ भइबे ना कइल. ऊ गणेश तिवारी का लगे जाव आ आंखे-आंखि में सवाल फेंके. त ओने से गणेशो तिवारी ओकरा के आंखे-आंखि में जइसे तसल्ली देसु. बोलत दुनु ना रहले. गणेश तिवारी के त ना मालूम रहे पोलादन का, बाकिर ऊ ख़ुदे सुलगत रहल. मसोसत रहल कि काहें एतना पइसा दे दिहनी ? काहें गणेश तिवारी जइसन ठग आदमी का फेर में पड़ गइनी ? ऊ एही उभचुभ में रहे कि एक राति गणेश तिवारी ओकरा घरे अइलन. खुसुर-फुसुर कइलन आ गांव छोड़ के कहीं चल गइले. ओही रात फौजी तिवारी का घर पर पुलिस के छापा पड़ल आ उनुका दुनु बेटा समेत उनुका के थाना उठा ले आइल. दोसरा दिने ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट का सोझा ऊ आ उनुकर दुनु बेटा पेश कइल गइले. उनुकर नाते रिश्तेदार, गोतिया पट्टीदार आ शुभचिंतक लोग बहुते दउड़ धूप कइल बाकिर जमानत ना मिलल काहे कि उनुका पर हरिजन एक्ट लाग गइल रहे. बड़का से बड़का वकील कुछ ना कर पवले ! कहल गइल कि अब त हाईये कोर्ट से जमानत मिल पाई. आ जाने जमानत मिली कि सजाय?

जेल जात-जात फौजी तिवारी रो पड़ले. रोवते-रोवत बोलले, “ई गणेश तिवारी गोहुवन सांप हवे. डंसले इहे बा. पोलदना तो बस इस्तेमाल भइल बा औजार का तरह.” फेर ऊ एगो खराब गारी दिहलन गणेश तिवारी के. कहले, “भोसड़ी वाला के पचीस हजार के दलाली ना दिहनी त एह कमीनगी पर उतर आइल !”
“त दे दिहले होखतऽ दलाली !” फौजी तिवारी के साला बोलल, “हई दिन त ना देखे पड़ीत !”
“अब का बताई ?” कहिके फौजी तिवारी पहिले मूछ में ताव दिहले फेर फफक के रो पड़ले.
साँझ हो गइल रहे से उनुका आ उनुका बेटवन के पुलिस वाले पुलिस ट्रक में बइठा के जेहल ओरि चल दिहले. एह पूरा प्रसंग में फौजी तिवारी टूटल, रोआइन आ बेचारा जइसन कुछ ना कुछ बुदबुदात रहलन आ उनुकर बेटा निःशब्द रहले स. लेकिन ओकनी का चेहरा पर आग खउलत रहे आ आंखिन में शोला समाइल रहे.
जवने होखे बाकिर गांव भर का पूरा जवार के जानत देर ना लागल कि ई सब गणेश तिवारी के कइल धइल ह आ एही बहाने गांव जवार में एक बार फेरू गणेश तिवारी के आतंक पसर गइल, कवनो गुंडे भा कवनो आतंकवादी के आतंक का होखत होई जे गणेश तिवारी के आतंक होखत रहुवे. जवन आतंक ऊ खादी पहिर के , बिना हिंसा के आ ख़ूब मीठ बोल के बरपावत रहले.
एह भा ओह तरह से लोग आतंक में जिये आ गणेश तिवारी के विलेज बैरिस्टरी चलत जात रहुवे.
कई बेर ऊ एह सभका बावजूद निठल्ला हो जासु. लगन ना होखे त गवनई के सट्टो ना होखे. मुकदमा ना होखे त कचहरीओ जा के का करीतें ? कबो-कभार मुकदमो कम पड़ जाव. त ऊ एगो ख़ास तकनीक अपनावसु. पहिले ऊ ताड़सु कि केकरा-केकरा में तनातनी चलत बा भा तनातनी के अनेसा बा भा उमेद हो सकेला. एहमे से कवनो एक फरीक से कई-कई बइठकी में मीठ-मीठ बोलि के, ओकर एक-एक नस तोल के ऊ ओकरा मन के पूरा थाह लेसु. कुछ “उकसाऊ” शब्द ओकरा कान में अइसहीं डालसु. बदला में ऊ दोसरा फरीक खातिर कड़ुआ शब्दन के भंडार खोल बइठे, कुछ राज अपना विरोधी पक्ष के बता जाव आ आखिर में ओकर अइसन तइसन करे लागे. फेर गणेश तिवारी जब देखसु कि चिंगारी शोला बन गइल बा त ऊ बहुते “शांत” भाव से चुप करावसु आ ओकरा के बहुते धीरज आ ढाढ़स का संगे समुझावसु, “ऊ साला कुकुर ह त ओकरा से कुकुर बनि के लड़बऽ का ?” ऊ ओकरा के बिना मौका दिहले कहसु, “आदमी हउव आदमी का तरे रहऽ. कुत्ता का साथे कुत्ता बनल ठीक हवे का ?”
“त करीं का?” अगिला खीझियात पूछे.
“कुछु ना आदमी बनल रहऽ. अउर आदमी का पाले बुद्धि होले, सो बुद्धि से काम लऽ !”
“का करब बुद्धि ले के ?” अगिला अउड़ बउराव.
“बुद्धि के इस्तेमाल करऽ !” ऊ ओकरा के बहुते शांत भाव से समुझावसु, “खुद लड़े के का जरूरत बा ? तू खुद काहे लड़ऽतारऽ ?”
“त का चूड़ी पहिर के बइठ जाईं ?”
“नाहीं भाई, चूड़ी पहिने के के कहत बा ?”
“त ?”
“त का !” ऊ गँवे से बोलसु, “ख़ुद लड़ला ले नीमन बा कि ओकरे के लड़ा देत बानी.”
“कइसे?”
“कइसे का?” ऊ पूछसु, “एकदम बुरबके हउव का ?” ऊ जोड़सु, “अरे कचहरी काहें बनल बा ! कर देत बानी एक ठो नालिश, दू ठो इस्तगासा !”
“हो जाई !” अगिला खुशी से उछलत पूछे.
“बिलकुल हो जाई.” कहिके गणेश तिवारी दोसरा फरीक के टोहसु आ ओकरा खिलाफ पहिला फरीक के कइल कड़ुआ टिप्पणी, खोलल राज बतावसु त दोसरको फरीक लहकि जाव त ओकरो के धीरज धरावसु. धीरज धरावत-बन्हावत ओकरो के बतावसु कि, “खुद लड़े के का जरूरत बा ?” कहसु, “अइसन करत बानी कि ओकरे के लड़ा देत बानी.”
एह तरे दुनु फरीक कचहरी जा के भिड़ जासु बरास्ता गणेश तिवारी. कचहरी में उनुकर “ताव” देखे लायक होके. सूट फाइल होखे, काउंटर, रिज्वाइंडरे में छ-आठ महीना गुजर जाव. साथ ही साथ दुनु फरीक के जोश खरोश अउर “तावो” उतरि जाव. नौबत तारीख़ के आ जाव. आ जइसन कि हमेशा कचहरियन में होला न्याय कहीं, फैसला कहीं मिले ना, तारीख़े मिले. आ ई तारीख़ो पावे खातिर पइसा खरचे पड़े. एह पर पक्ष भा प्रतिपक्ष विरोध जतावे त गणेश तिवारी बहुते सफाई से ओकरा के “राज” के बात बतावसु कि, “अबकी के तारीख़ तोहर तारीख़ ह. तोहरा मिलल बा आ तोहरे तारीख पर ओकरो आवे के पड़ी !”
“अउर जे ऊ ना आइल त ?” अगिला असमंजस में पड़ल पूछे.
“आई नू !” ऊ बतावसु, “आख़िर गवर्मेंट के कचहरी के तारीख़ हवे. आई कइसे ना. अउर जे ऊ ना आइल त गवर्मेंट बन्हवा के बोलवाई. अउर कुछु ना त ओकर वकिलवा त अइबे करी.”
“आई नू !”
“बिलकुल आई !” कहि के गणेश तिवारी ओकरा के निश्चिंत करसु. आ भलही जेनरल डेट लागल होखे तबहियो गणेश तिवारी ओकरा के ओकर तारीख बतावसु आ ओकरा से आपन फीस वसूलसु. इहे काम आ संवाद ऊ दोसरको फरीक पर गाँठसु आ ओकरो से फीस वसूलसु. दुनु के वकीलन से कमीशन अलगा वसूलसु. कई बेर मुवक्किल उनुका मौजूदगीए में वकील के पैसा देव त हालांकि ऊ अंगरेजी ना जानसु तबहियो मुवक्किल के सोझा ट्वेंटी फाइव फिफ्टी, हंडरेड, टू हंडरेड, फाइव हंडरेड, थाउजेंड वगरैह जइसन उनुकर जरूरत भा रेशियो जवने बने बोलि के आपन कमीशन तय करवा लेसु. बाद में अगिला पूछे कि, “वकील साहब से अऊर का बात भइल?” त ऊ बतावसु, “अरे कचहरी के ख़ास भाषा ह, तू ना समुझभऽ.” आ हालत ई हो जाव कि जइसे-जइसे मुकदमा पुरान पड़त जाव दुनु फरीक के “ताव” टूटत जाव आ ऊ लोग ढीला पड़ जाव. फेर एक दिन अइसन आवे कि कचहरी जाए का बजाय कचहरी के खरचा लोग गणेश तिवारी का घरे दे जाव. मुकदमा अउरी पुरान होखे त दुनु फरीक खुल्लमखुल्ला गणेश तिवारी के “खर्चा-बर्चा” देबे लागसु आ आखिरकार कचहरी में सिवाय तारीख़ के कुछु मिले ना से दुनु फरीक सुलह सफाई पर आ जासु आ एगो सुलहनामा पर दुनु फरीक दस्तखत करि के मुकदमा उठा लेसु. बहुते कम मुकदमा होखे जे एक कोर्ट से दूसरका कोर्ट, दूसरका कोर्ट से तिसरका कोर्ट ले चहुँपे. अमूमन त तहसीले में मामिला “निपट” जाव.
सौ दू सौ मुकदमन में से दसे पांच गो जिला जज तक चहुँपे बरास्ता अपील वगैरह. अउर एहिजो से दू चार सौ मुकदमन में से दसे पाँच गो हाइकोर्ट के रुख़ करि पावे. अमूमन त एहीजे दफन हो जाव. फेर गणेश तिवारी जइसन लोग नया क्लाइंट का तलाश में निकल पड़े. ई कहत कि, “खुदे लड़ला के का जरूरत बा, ओकरे के लड़ा दिहल जाव.” आ “ओकरे के” लड़ावे का फेर में आदमी खुद लड़े लागे.
लेकिन गणेश तिवारी का ई नयका शिकार पोलादन एकर अपवाद रहल. फौजी तिवारी के ऊ साचहु लड़ा दिहलसि काहे कि गणेश तिवारी ओकरा के हरिजन ऐक्ट के हथियार थमा दिहले रहन. हरिजन एक्ट अब उनुकर नया अस्त्र रहे आ साचहु उहे भइल जइसन कि गणेश तिवारी पोलादन से कहले रहले, “खेत बोवले जरूर फौजी पंडित बाकिर कटबऽ तूं.” त पोलादन ऊ खेत कटलसि, बाकायदा पुलिस का मौजूदगी में. खेत कटला ले फौजी तिवारी आ उनुकर दुनु बेटा जमानत पर छूट के आ गइल रहले बाकिर दहशत का मारे ऊ खेत का ओरि झाँकहु ना गइले. खेत कटत रहल. काटत रहल पोलादन खुद. दू चार लोग फौजी तिवारी से आ के खुसुर फुसुर बतइबो कइल, “खेतवा कटात बा!” बाकिर फौजी तिवारी कवनो प्रतिक्रिया ना दिहलन, ना ही उनुकर बेटा लोग.
एह पूरा प्रसंग पर लोक कवि एगो गानो लिखलन. गाना त ना चलल बाकिर लोक कवि के पिटाई जरूर हो गइल एह बुढ़ौती में. फौजी तिवारी के छोटका बेटा पीटलसि. उहो फौज में रहल आ गणेश तिवारी अउर पोलादन के हथियार हरिजन एक्ट ओकर फौजी नौकरी दांव पर लगा दिहले रहे.
बहरहाल, जब खेत वगैरह कट कटा गइल, पोलादन पासी के बाकायदा कब्जा हो हवा गइल खेतन पर त एक रात गणेश तिवारी खांसत-खंखारत पोलादन पासी का घरे खुद चहुँपले. काहे कि ऊ त बोलवलो पर उनुका घरे ना आवत रहे. खैर, ऊ चहुँपले आ बाते बाति में दबल जबान से फौजी तिवारी मद में बाकी पइसा के जिक्र कर बइठले. तवना पर पोलादन दबल जबान से ना, खुला जबान गणेश तिवारी से प्रतिवाद कइलसि. बोलल, “कइसन पइसा ?” ऊ आंख तरेरलसि आ जोड़लसि, “बाबा चुपचाप बइठीं. नाई अब कानून हमहूं जानि गइल हईं. कहीं आपहु के खि़लाफ कलक्टर साहब के अंगूठा लगा के दरखास दे देब त मारल फिरल जाई.”
सुन के गणेश तिवारी के दिल धक् हो गइल. आवाज मद्धिम हो गइल. बोलले, “राम-राम! ते त हमार चेला हऊवे! का बात करत बाड़े. भुला जो पइसा वइसा !” कहिके ऊ माथ पर गोड़ धइले ओहिजा से सरक लिहलन.
रास्ता भर ऊ कपार धुनत अइलन कि अब का करीहें ? बाकिर कुछ बुझात ना रहे उनुका. घरे अइलन. ठीक से खाइयो ना पवले. सूते गइलन त पंडिताइन गोड़ दबावे लगली. ऊ गँवे से कहलन, “गोड़ ना, कपार बथत बा.” पंडिताइन कपार दबावे लगली. दबावत-दबावत दबले जुबान से पूछ बइठली, “आखि़र का बात हो गइल?”
“बात ना, बड़हन बात हो गइल !” गणेश तिवारी बोलले, “एकठो भस्मासुर पैदा हो गइल हमरा से !”
“का कहत हईं ?”
“कुछ नाहीं. तू ना समझबू. दिक् मत करऽ. चुपचाप सुति जा !”
पंडिताइन मन मार के सूति गईली. लेकिन गणेश तिवारी का आंखिन में नींद ना रहे. ऊ लगातार सोचत रहलन कि भस्मासुर बनल पोलादन से कइसे निपटल जाव ! भगवान शंकर जइसन मति भा बेंवत त रहे ना उनुका में बाकिर विलेज बैरिस्टर त ऊ रहबे कइलन. आ अब उनुकर इहे विलेज बैरिस्टरी दांव पर चेल रहे. ओने उधर फौजी तिवारी के छोटका बेटा के फौज के नौकरी दांव पर रहुवे पोलादन पासी के हरिजन ऐक्ट के हथियार से. से ऊ ओकरे के साधे के ठनलन. गइलन ओकरा लगे मौका देखि के. बाकिर ऊ गणेश तिवारी का मुँह पर थूक दिहलसि आ अभद्दर गारी देबे लागल. कहलसि कि तोरा नरको में ठिकाना ना मिली. बाकिर गणेश तिवारी ओकरा कवनो बाति के खराब ना मनलन. ओकर थूकल पोंछ लिहलम. कहले, “अब गलती भइल बा त प्रायश्चितो करब. आ गलती कइला पर छोटको बड़का के दंड दे सकेला. हम दंड के भागी बानी.” फेर अपना बोली में मिसिरी घोरत कहले, “हम अधम नीच बड़ले बानी एही लायक ! तबहियों तोहरा लोगन का साथे भारी अन्याय भइल बा. इंसाफो कराएब हमहीं. आखि़र हमार ख़ून हउव तू लोग. हमनी का नसन में आखि़र एके ख़ून दउड़त बा. अब तनिका मतिभरम का चलते ई बदलि त ना जाई. आ ना ही ई चमार-सियारन भा पासियन-घासियन का कुटिलता से बदल सकेला. रहब त हमनी का एके ख़ून. ऊ कहले, “त ख़ून त बोली नू नाती !” एह तरह आखिरकार फौजी तिवारी के छोटका बेटा गणेश तिवारी के एह “एके ख़ून” वाला पैंतरे में फंसिये गइल. भावुक हो गइल. फेर गणेश तिवारी आ ओकर छने लागल. उमिर के दीवर तूड़त दुनु साथे-साथ घूमे लगले. गलबहियां डलले. पूरा गांव अवाक रहे कि ई का होखत बा ? विचलित पोलादन पासीओ भइल ई सब देखि सुनि के. ऊ तनिका सतर्को भइल ई सोचि के कहीं गणेश तिवारी पलट के ओकरे के ना डंस लेसु. बाकिर ओकरा फेर से हरिजन एक्ट, कलक्टर अउर पुलिस के याद आइल. त एह तरह हरिजन एक्ट के हथियार का गुमान में ऊ बेख़बर हो गइल कि, “हमार का बिगाड़ लिहें गणेश तिवारी !”
दिन कटत रहल. एक मौसम बदल के दोसरका आ गइल बाकिर पोलादन पासी के गुमान ना गइल. ओह घरी ओकर बेटा बंबई से कमा के लवटल रहे. बिटिया के शादी बदे. शादी के तइयारी चलत रहे. पोलादन के नतिनी अपना सखियन का साथे फौजी तिवारी वाला ओही खेत क मेड़ पर गन्ना चूसत रहे कि फौजी तिवारी के छोटका बेटा ओने से गुजरल. ओकरा के देखि पोलादन के नतिनी ताना कसलसि, “रसरी जरि गइल, अईंठन ना गइल !”
“का बोललिस ?” फौजी के बेटा डाँड़ में बान्हल लाइसेंसी रिवाल्वर निकाल के हाथ में लेत भड़क के बोलल.
“जवन तू सुनलऽ ए बाबा !” पोलादन के नातिन ओही तंज में कहलसि आ खिलखिला के हँस दिहलसि. साथे ओकर सखियो हँसे लगली सँ.
“तनी एक बेर फेर से त कहु !” फौजी तिवारी के बेटा फेर भड़कत ओही ऐंठ से बोलल.
“ई बंदूकिया में गोलियो बा कि बस खालिए भांजत हऊव ए बाबा !”
एतना सुनल रहेकि फौजी तिवारी के बेटा “ठांय” से हवा में फायर कइलसि त सगरी लड़की डेरा के भागे लगली. ऊ दउड़ के पोलादन के नातिन के कस के पकड़ लिहलसि, “भागत काहे बाड़ी ? आव बताईं कि बंदूक में केतना गोली बा !” कहिके ऊ ओहिजे खेत में लड़की को लेटा के निवस्तर कर दिहलसि. बाकी लड़की भाग चलली सँ. पोलादन के नातिन बहुते चीखल चिल्लाइल. हाथ गोड़ फेंकत बहुते बचाव कइलसि बाकिर बाच ना पवलसि बेचारी. ओकर लाज लुटाइये गइल. फौजी तिवारी के बेटा ओकरा देहि पर अबही ले झुकले रहला का बाद अबगे निढाले भइल रहुवे कि पोलादन पासी, ओकर बेटा आ नाती लाठी, भाला लिहले चिल्लात आवत लउकले. ऊ आव देखलसि ना ताव. बगल में पड़ल रिवाल्वर उठवलसि. रिवाल्वर उठवते लड़की सन्न हो गइल. बुदबदाइल “नाई बाबा, नाई, गोली नाहीं.”
“चुप भोंसड़ी!” कहिके फौजी के बेटा रिवाल्वर ओकरा कपारे पर दे मरलसि, साथही निशाना साधलसि आ नियरा आवत पोलादन, ओकरा बेटा, ओकरा नाती पर बारी-बारी गोली दाग दिहलसि. फौजी तिवारी के बेटवो फौजी रहल से निशाना अचूक रहे. तीनों ओहिजे ढेर हो गइले.
अब तीनों के लहुलुहान लाश आ निवस्तर लड़िकी खेत में पड़ल रहे. एकनी के केहु तोपत रहुवे त बस सूरज के रोशनी !
पूरा गांव में सन्नाटा पसर गइल. गाय, बैल, भैंस, बकरी सब के सब ख़ामोश हो गइले. पेड़ के पत्तो खड़खड़ाइल बंद कर दिहले.बयार जइसे थथम गइल रहे.
ख़ामोशी टूटल फौजी तिवारी के जीप का गड़गड़ाहट से. फौजी तिवारी, उनुकर दुनु बेटा आ परिवार के सगरी बेकत घर में ताला लगा के जीप में बइठ गांव से बहरी चलि गइले. साथ में पइसा, रुपिया, जेवर-कपड़ा-लत्ता सगरी ले लिहलन. फौजी तिवारी के बेटा जइसे कि सब कुछ सोच लिहले रहुवे. शहर पहुंचिके ऊ अपना वकील से मिलल. पूरा वाकया सही-सही बतवलसि आ वकील के सलाह पर दोसरा दिने कोर्ट में सरेंडर कर दिहलसि.

ओने गांव में पसरल सन्नाटा फेर पुलिस तूड़लसि. फौजी तिवारी के घर त भाग चुकल रहुवे. पुलिस तबहियो “सुरागरशी” कइलसि आ गणेश तिवारी को धर लिहलसि. लेकिन “हजूर-हजूर, माई-बाप” बोल-बोल के ऊ पुलिसिया मार पीट से अपना के बचवले रहले आ कुछु बोलले ना. जानत रहले कि थाना के पुलिस कुछु सुने वाली नइखे. हँ, जब एस.एस.पी. अइले तब ऊ उनुका गोड़ पर लोट गइले. बोलले, “हजूर आप त जानते हईं कि हम गरीब गुरबा के साथी हईं.” ऊ कहले, “ई पोलादन जी का साथे जब फौजी अन्याय कइलें तब हमही त दरखास ले-ले के आप हाकिम लोगन का लगे दउड़त रहीं. आ आजु देखीं कि बेचारा ख़ानदान समेत मार दिहल गइल !” कहि के ऊ रोवे लगले.कहले, “हम त ओकर मददगार रहनी हजूर आ दारोगा साहब हमहीं के बान्ह लिहलें.” कहिके ऊ फेरु एस.एस.पी. का गोड़ पर टोपी राखत पटा गइले.
“क्या बात है यादव?” एस.एस.पी. दारोगा से पूछले.
“कुछ नहीं सर ड्रामेबाज है.” दारोगा बोलल, “सारी आग इसी की लगाई हुई है.”
“कोई गवाह, कोई बयान वगैरह है इस के खि़लाफ?”
“नो सर!” दारोगा बोलल, “गांव में इस की बड़ी दहशत है. बताते भी हैं इस के खि़लाफ तो चुपके-चुपके, खुसुर-फुसुर. सामने आने को कोई तैयार नहीं है.” ऊ बोलल, “पर मेरी पक्की इंफार्मेशन है कि सारी आग, सारा जहर इस बुढ्ढे का ही फैलाया हुआ है.”
“हजूर आप हाकिम हईं जवन चाहीं करीं बाकिर कलंक मत लगाईं.” गणेश तिवारी फफक के रोवत बोलले, “गांव के एगो बच्चो हमरा खि़लाफ कुछु ना कहि सके. राम कसम हजूर हम आजु ले एगो चिउँटिओ नइखीं मरले. हम त अहिंसा के पुजारी हईं सर, गांधी जी के अनुयायी हईं सर !”
“यादव तुम्हारे पास सिर्फ इंफार्मेशन ही है कि कोई फैक्ट भी है.”
“अभी तो इंफार्मेशन ही है सर. पर फैक्ट भी मिल ही जाएगा.” दारोगा बोलल, “थाने पहुंच कर सब कुछ खुद ही बक देगा सर !”
“शट अप, क्या बकते हो!” एस.एस.पी. बोलल, “इसे फौरन छोड़ दो.”
“किरिपा हजूर, बड़ी किरिपा!” कहिके गणेश तिवारी एस.एस.पी. के गोड़ पर फेरु पटा गइले.
“चलो छोड़ो, हटो यहां से !” एस.एस.पी. गणेश तिवारी से गोड़ छोड़ावत कहले, “पर जब तक यह केस निपट नहीं जाता, गांव छोड़ कर कहीं जाना नहीं.”
“जइसन हुकुम हजूर !” कहिके गणेश तिवारी ओहिजा से फौरन दफा हो गइले.
बाकिर गांव में सन्नाटा अउर तनाव जारी रहुवे. गणेश तिवारी समुझ गइले कि केस लमहर खिंचाइल त देर सबेर उहो फंसि सकेले. से ऊ बहुते चतुराई से पोलादन पासी, ओकरा के बेटा आ नाती का लाशन का लगे से लाठी, भाला के बरामदगी दर्ज करवा दिहले. अउर फौजी तिवारी के वकील से मिलिके पेशबंदी कर लिहले. आ भइल उहे जे ऊ चाहत रहले. कोर्ट में ऊ साबित करवा लिहले कि हरिजन एक्ट का नाम पर पोलादन पासी वगैरह फौजी तिवारी आ उनुका परिवार के उत्पीड़न करत रहले. ई सगरी मामिला सवर्ण उत्पीड़न के ह. बाकिर चूंकि सवर्ण उत्पीड़न पर कवनो कानून नइखे से ऊ एकर ठीक से प्रतिरोध ना करि पवले आ हरिजन एक्ट का तहत पहिले जेहल में भेजा गइले. तब जब कि बाकायदा नकद पांच लाख रुपिया दे के होशोहवास में खेत के रजिस्ट्री करववले रहले. पोलादन के ई पांच लाख रुपिया देबे के सुबूतो गणेश तिवारी पेश करवा दिहलन आ खुदे गवाह बनि गइलन. बात हत्या के आइल त फौजी तिवारी के वकील ने एकरा के हत्या ना, अपना के बचावे के कार्रवाई स्टैब्लिश कर दिहलन. बतवलन कि तीन-तीन लोग लाठी भाला लिहले ओकरा के मारे आवत रहले त उनुका मुवक्किल के अपना रक्षा ख़ातिर गोली चलावे के पड़ल. कई पेशी, तारीख़न का बाद जिला जजो वकील के एह बात से “कनविंस” हो गइले. रहल बाति पोलादन के नातिन से बलात्कार के त जांच अउर परीक्षण में उहो “हैबीचुअल” पावल गइल. आ इहो मामिला ले दे के रफा दफा हो गइल. पोलादन के नातिनो चुपचाप “मुआवजा” पा के “ख़ामोश” हो गइल.
बेचारी करबो करीत त का ?
सब कुछ निपट गइला पर एक दिन गणेश तिवारी चहुँपले फौजी तिवारी का घरे. खांसत-खखारत. बाते बाति में गांधी टोपी ठीक करि के जाकेट में हाथ डालत कहले, “आखि़र आपन ख़ून आपने ख़ून होला.”
“चुप्प माधरचोद !” फौजी तिवारी के छोटका बेटा बोलल, “जिंदगी जहन्नुम बना दिहलऽ पचीस हजार रूपए के दलाली ख़ातिर आ आपन ख़ून, आपन ख़ून के रट लगवले बइठल ना.” ऊ खउलत कहलसि, “भागि जा माधरचोद बुढ़ऊ नाहि त तोहरो के गोली मारि देब. तोहरा के मरला पर हरिजन एक्टो ना लागी.”
“राम-राम! बच्चा बऊरा गइल बा. नादान हवे.” कहत गणेश तिवारी मनुहार भरल आंखिन से फौजी तिवारी का ओरि देखलन. त फौजीओ तिवारी के आंख गणेश तिवारी के तरेरत रहल. से “नारायन-नारायन!” करत गणेश तिवारी बेआबरू होइये के सही ओहिजा से खिसकिये गइला में आपन भलाई सोचलन.


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एगो जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
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