छठ के आयोजन

पूर्वांचलवासियन के आस्था के महापर्व छठ हर साल का तरह एहू साल भोजपुरी समाज दिल्ली के आइएनए कालोनी शाखा धूमधाम से आयोजित कइलसि. अतवार का दिने नहाय खाय से शुरू होके बुध का भोर में उगते सूरज के अरघ दिहला का साथे छठ व्रत के विधि पूरा भइल. एक तरफ कॉलोनी में जहॉं महापर्व छठ के छटा के विहंगम दृश्य देखे कि मिलत रहे त दोसरा तरफ ‘कांचऽ ही बांस के बहँगिया… आ मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगवा गिरे मुरुझाय..जइसन गीतन से वातावरण संगीतमय बनल रहुवे.

छठ पूजा के उपलक्ष्य में बुध का साँझ एगो सामूहिक रात्रिभोज के आयोजनो कइल गइल जवना में भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दूबे, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के क्षेत्रीय कार्यपालक निदेशक (उत्तरी क्षेत्र) अनुज अग्रवाल, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के कार्यपालक निदेशक (सीएनएस) रवि प्रकाश, भूतपूर्व क्षेत्रीय कार्यपालक निदेशक यू.एन.सिंह आ भोजपुरी समाज, आइएनए कालोनी शाखा के अध्यक्ष वी.के. त्रिपाठी वगैरह समेत समाज के सगरी सदस्य सपरिवार शामिल भइले.

अजीत दुबे सभका के शुभकामना देत भोजपुरी आ पूरबी समाज के सम्मान खातिर दिल्ली में भोजपुरी समाज के प्रयासन का बारे में बतवले. कहलन कि देश में हिंदी का बाद सबले बड़हन भाषा के आजु ना काल्हु संविधान के 8वीं अनुसूची में शामिल करहीं के पड़ी. बाकिर एकरा खातिर पूर्वांचलवासियन के समर्थन मिलत रहल जरूरी बा. आइएनए कालोनी शाखा के अध्यक्ष वी.के. त्रिपाठी सगरी अतिथियन के धन्यवाद दिहलें. मंच संचालन शाखा के सांस्कृतिक सचिव देवकान्त पाण्डेय कइलन.

कार्यक्रम के सफल बनावे में रामजीत साह, बनारसी त्रिपाठी, शैलेश कुमार, के.के. प्रजापति, जयमंगल सिंह, अजय दूबे, विभूति झा, राम सुमेर यादव, अरविन्द कुमार मेहता, गणेश ठाकुर, हसमुद्दीन अंसारी, शमीम अहमद, उमेश शर्मा, मनीष कुमार, देवांशमणि आ भोजपुरी समाज, आइएनए शाखा के बाकी सगरी कार्यकारिणी सदस्य अहम भूमिका निभवले.


(स्रोत – भोजपुरी समाज दिल्ली के आईएनए कॉलोनी शाखा)

तमसो मा ज्योतिर्गमय

– पाण्डेय हरिराम

आजु दीपावली ह, अन्हार के दूर भगावे के तेहवार. एह तेहवार के भारतीय लोकजीवन में बहुते आध्यात्मिक, सांस्कृतिक आ सामाजिक महत्व ह. दीपावली के रात में दिया जला के हमनी का अन्हरिया पर उजियार के जीत के जश्न मनाइले. अन्हरिया असत्य, अन्याय भा नकारात्मक पक्ष के सूचक ह, ओहिजे उजियार सत्य, न्याय आ सकारात्मक पक्ष के. समाज में फइलल बुराइयन पर अच्छाई के विजयो के प्रतीक ह दीवाली. ई पर्व सुख आ समृद्धिओ के प्रतीक ह. एह पर्व के व्यक्तिगतो जीवन में बहुते महत्व बा. एह दिन हमनी का दिया जरा के अन्याय, असत्य अउर अन्हार के भगवला का साथे मन के मनिलतो के अपना से दूर भगाइलें. उजाला हमनी के भीतर सत्य, न्याय अउर निमना गुण के समावेश करेला.

एहिजा एगो बाति उठत बा कि अन्हार यदि प्रकाश के ना रहला से होला, त छाया अन्हार आ उजियार का बीच के एगो अइसन स्थिति ह जवन होइये के ना होले आ ना होईये के होले. एहिजा एगो दर्शन बा. अन्हार के मतलब एगो करिया आकार जवन अन्हरिया के समुद्र हवे. आंख बंद करते सभतर अन्हारे अन्हार हो जाल. ओकर कवनो रूप-रंग ना होखे बाकिर छाया अइसन ना होले. छाया के मतलब होला कि प्रकाश त बा, लेकिन ओकरा राह में कवनो बाधा आ गइल बा. ओह बाधा के पृष्ठभूमि में प्रकाश मौजूद रहेला. ओकर किरण ओह बाधा के ना भेद पवला से एने ओने छितरा जाला. ओह बाधा के बिम्बे छाया ह. एह छाया के पहिचानल बहुते कठिन बा. ई त बतावल जा सकेला कि ई पेड़ के छाया ह कि कवनो दोसरा चीज के. बाकिर ई बतावल बहुते कठिन होला कि ई कवना तरह के वृक्ष भा वस्तु के छाया ह. जबले ओह वस्तु के आदमी पहिले ना देखले होखे. छाया विश्रामस्थल त हो सकेले लेकिन ओहिजा ऊ स्पष्टता ना हो सके, काहे कि रोशनी नइखे. जहाँ प्रकाश नइखे ओहिजा स्पष्टतो ना होखे. बिना ज्ञान के चलल अंधमार्ग पर चलल ह. एहसे ज्ञान प्राप्ति के ब्रह्म अउर मोक्ष के मार्ग बतावल गइल बा. प्रकाश का बिना कुछउ सम्भव नइखे. प्रकाश के अवरोधे छाया के निर्माण करेला लेकिन व्यक्ति के पृष्ठभूमि में प्रकाश के उपस्थिति छाया के निर्माण ना करे बलुक परछाई बनावेले. परछाई में छाया त बा, लेकिन ऊ ‘पर’ अर्थात दोसरा के बा. भला स्वयं ओकरे छाया के दोसरा के छाया कइसे कहल जा सकेला ?

हमनी जवन कुछ करत बानी, कहत बानी, ऊ सब दोसरे के त ह, सिवाय एह शरीर के. त बात स्पष्ट बा कि एह शरीर से जवनो कुछ होत बा ऊ आपन छाया ना होके परछाईये त ह. साथ ही एहिजा जवना प्रकाश के बात कहल गइल बा, ऊ प्रकाश स्व-बोध के प्रकाश ह, ई स्व के जाने के ह, स्व के पावे के ह. आ जब आदमी अपना निजता के पा लेला त ओकरा में समूल परिवर्तन हो जाला काहे कि ऊ दुनिया का सोझा मौलिक व्यक्तित्व का रूप में सामने आवेला. एहिसे ऊ विद्रोही मान लिहल जाला. दोसरा के अन्धानुकरण ना करके व्यक्ति के आपन स्वतंत्र आ मौलिक अस्तित्व निर्माण करे के चाहीं. अइसनाक व्यक्तित्व दोसरा खातिर छाया बनेले. छाया कल्याणकारी होले, लेकिन परछाई कवनो रूप में कल्याणकारी ना होखे. प्रकाश बने के प्रयास करे के चाहीं, अगर प्रकाश ना बन सकीं त छाये बन सकीलें, लेकिन परछाई ना बने के चाहीं. ओकरा में ना त सुख बा ना ही आनन्द. प्रकाश के राह के हर बाधा गिरा के हमनी के प्रकाशमय बन जाये के चाहीं. तबहियें हमनी का प्रकाशपुंज होके ज्योतिर्मय हो सकीले.

ऋषि लोग एहिसे बहुते साफ स्पष्ट शब्दन में प्रार्थना कइल कि – ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’. एह साधारण लागे वाला शब्दन में बहुते गंभीर भाव छिपल बा. एहमें भौतिक अन्हार से प्रकाश का ओर ले जाये के प्रार्थना त बड़ले बा, साथे इहो भाव ओहमें समाइल बा कि हमनी के अविद्यान्धकार से छोड़ा के विद्यारूपी सूर्य के प्राप्त करावल जाव. हमनी के पुरनिया वैदिक ऋषि लोग हर तरह के सामाजिक समस्यन के तीन श्रेणियन में बँटले बा – अज्ञान, अन्याय अउर अभाव. चाहे कवनो देश होखे, कइसनो समाज होखे, सभतर ई समस्या रहबे करी. एह तीनो समस्यनो में अज्ञान के समस्या सबले बड़ होला काहे कि ई कहल अनुचित बेजाँय ना होखी कि बाकी दुनु समस्या – अन्याय अउर अभाव के समस्या – अज्ञाने का चलते जनम लेली सँ.

त चलीं, अन्हार से अँजोर का राह पर आगा बढ़ल जाव.

(26 अक्टूबर 2011)


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी.

दुर्गा माई के नौ रुप 9.सिद्धिदात्री

(नवरात्र के नउवां दिन, बुध ५ अक्टूबर २०११)
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि |
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी |
माई दुर्गा अपना नवाँ रूप में ” सिद्धिदात्री ” का नाम से जानल जाली.नवरात्र में नवाँ दिन माई के एही रूप के पूजा होला.इहाँका सभ प्रकार के सिद्धि के देबेवाली हईं.माई सिद्धिदात्री के चार गो भुजा बा आ इहाँके वाहन सिंह हऽ.इहाँका कमल के फूल पर भी आसीन होखींले.एही माई के कृपा से भगवान शिव के आधा शरीर देवी के भइल रहे आ एह कारण उहाँके नाँव अर्धनारीश्वर परल रहे..माई सिद्धिदात्री के उपासना कइला का बाद भक्तन आ साधकन के लौकिक आ पारलौकिक सभे प्रकार के कामना पूर्ण हो जाली सन.नवदुर्गा में अंतिम माई सिद्धिदात्री दुर्गाजी के जय हो.


(चित्र आ विवरण डा॰रामरक्षा मिश्र का सौजन्य से)

दुर्गा माई के नौ रुप 8.महागौरी


(नवरात्र के अठवा दिन, मंगल ४ अक्टूबर २०११)
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः |
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा |
माई दुर्गा अपना आठवाँ रूप में ” महागौरी ” का नाम से जानल जाली.नवरात्र में आठवाँ दिन माई के एही रूप के पूजा होला.इहाँके रंग गोर हऽ.इहाँके उमिरि आठ बरिस मानल गइल बा.माई के चार गो भुजा बा आ इहाँके वाहन बैल हऽ.इहाँके मुद्रा अत्यंत शांत हऽ.माई महागौरीके भक्ति आ उपासना से सभ प्रकार के पाप धुल जाला.नवदुर्गा में आठवीं माई महागौरी दुर्गाजी के जय हो.


(चित्र आ विवरण डा॰रामरक्षा मिश्र का सौजन्य से)

दुर्गा माई के नौ रुप 7.कालरात्रि


(नवरात्र के सतवा दिन, सोमार ३ अक्टूबर २०११)

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता |
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी |
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा |
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी |
माई दुर्गा अपना सातवाँ रूप में ” कालरात्रि ” का नाम से जानल जाली.नवरात्र में सातवाँ दिन माई के एही रूप के पूजा होला.इहाँके शरीर के रंग घनघोर अन्हार नियर एकदम करिया बा.सिर के बाल बिखरल आ गरदन में बिजली अस चमकत माला.माई के तीन गो आँख बा आ चार गो भुजा आउर इहाँके वाहन गदहा हऽ.इहाँके स्वरूप देखे में अत्यंत भयानक बा बाकिर हमेशा शुभे फल देलीं.माई कालरात्रि के भक्ति आ उपासना से हर तरह के डर खतम हो जाला.नवदुर्गा में सातवीं माई कालरात्रि दुर्गाजी के जय हो.


(चित्र आ विवरण डा॰रामरक्षा मिश्र का सौजन्य से)

दुर्गा माई के नौ रुप 6.कात्यायनी


(नवरात्र के छठा दिन अतवार, २ अक्टूबर २०११)
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना |
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी |

माई दुर्गा अपना छठा रूप में ” कात्यायनी ” का नाम से जानल जाली.नवरात्र में छठा दिन माई के एही रूप के पूजा होला.”कत” नामक प्रसिद्ध ॠषि के पुत्र “कात्य” का गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन भइले.ई भगवती पराम्बा के उपासना करत कई बरिस तक कठिन तपस्या कइले.इनकर इच्छा रहे कि माई भगवती इनका घर में बेटी का रूप में जन्म लेसु.माई इनकर प्रार्थना स्वीकार कऽ लिहली.एही से माई के नाँव कात्यायनी परल.माई कात्यायनी अमोघ फल देबेवाली हई.भगवान कृष्ण के पति रूप में पावे खातिर ब्रज के सभ गोपी लोग यमुना जी के किनारे इहाँके पूजा कइले रही.इहाँके स्वरूप भव्य आ दिव्य बा.माई के चार गो भुजा बा आ इहाँके वाहन सिंह हऽ.माई कात्यायनी के भक्ति आ उपासना से बहुते सहजता से अर्थ,धर्म,काम आ मोक्ष चारो फल प्राप्त हो जाला.नवदुर्गा में छठवी माई कात्यायनी दुर्गाजी के जय हो.


(चित्र आ विवरण डा॰रामरक्षा मिश्र का सौजन्य से)

दुर्गा माई के नौ रुप 5.स्कन्दमाता


(नवरात्र के पाँचवा दिन शनि, १ अक्टूबर २०११)

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया |
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी |

माई दुर्गा अपना पाँचवा रूप में ” स्कन्दमाता ” का नाम से जानल जाली.नवरात्र में पाँचवा दिन माई के एही रूप के पूजा होला.भगवान स्कन्द के माई भइला के कारन इहाँके नाँव स्कन्दमाता परल.भगवान स्कन्द के “कार्तिकेय जी ” के नाँव से भी जानल जाला.इहाँका प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवता लोगन के सेनापति बनल रहीं. माई के एह विग्रह में माई का गोद में भगवान स्कन्द जी अपना बाल रूप में बइठल बानी.माई स्कन्दमाता के चार गो भुजा बाड़ी सन जवना में दूगो में कमल के फूल,एगो वर मुद्रा में आ एगो से भगवान स्कन्द के गोद में पकड़ले बानी.इहाँके बाहन सिंह हऽ.माई स्कन्दमाता के उपासना से भक्तन के सभे मनोकामना पूरा हो जाली सन,एह मृत्युलोक में भी परम शांति आ सुख के अनुभव होखे लागेला.नवदुर्गा में पाँचवी माई स्कन्दमाता दुर्गाजी के जय हो.


(चित्र आ विवरण डा॰रामरक्षा मिश्र का सौजन्य से)

दुर्गा माई के नौ रुप 3.चन्द्रघण्टा


(नवरात्र के तीसरा दिन शुक ३० सितम्बर २०११)
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता |
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता |

माई दुर्गा अपना तीसर रूप में “चन्द्रघण्टा” का नाम से जानल जाली. नवरात्र में तिसरका दिन माई के एही विग्रह के पूजा होला. इहाँके मस्तक में घंटा के आकार के अर्धचंद्र बा एही कारन इहाँका चन्द्रघण्टा कहाईले. इहाँके शरीर के रंग सोना अस चमकेवाला हऽ. इहाँके दस गो हाथ बा आ दसो अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित. इहाँके वाहन सिंह हऽ. इहाँके घंटा नियन भयानक स्वर से अत्याचारी लोग थर-थर काँपत रहेलन. माई के एह रूप के आराधना से तुरंते फल मिलेला. माई के ई रूप परम शांतिदायक आ कल्याणकारी हऽ. माई के एह चन्द्रघण्टा रूप के उपासना से मनुष्य में वीरता, निर्भयता, सौम्यता आ विनम्रता के बढ़ोत्तरी होला. नवदुर्गा में तिसरकी माई चन्द्रघण्टा दुर्गाजी के जय हो.


(चित्र आ विवरण डा॰रामरक्षा मिश्र का सौजन्य से)

दुर्गा माई के नौ रुप 4.कूष्माण्डा


(नवरात्र के चउथा दिन शुक ३० सितम्बर २०११)

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च |
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे |

माई दुर्गा अपना चौथा रूप में ” कूष्माण्डा ” का नाम से जानल जाली.नवरात्र में चउथका दिन माई के एही विग्रह के पूजा होला.अपना मंद-मंद मुस्कान से ब्रह्मांड के उत्पन्न कइला का कारन इहाँके नाँव कूष्माण्डा परल.जब सृष्टि के अस्तित्व ना रहे,चारू ओर अंधकारे अंधकार रहे,तब ईहे माई अपना हल्का हँसी से सृष्टि के रचना कइले रहीं.माई के आठ गो भुजा बाड़ी सन आ आठों में क्रमशः कमंडल,धनुष,बाण,कमल के फूल,अमृत से भरल कलश,चक्र आ गदा बा.आठवाँ हाथ में सभे सिद्धि आ निधि के देबेवाली जपमाला बा.कूष्माण्ड माने कोंहड़ा.बलिदान में कोंहड़ा के बलि इहाँके प्रिय हऽ.माई कूष्माण्डा तनिका सेवा आ भक्ति से भी खुश हो जालीं.माई के भक्ति से आयु,यश,बल आ आरोग्य के बढ़ोत्तरी होला. नवदुर्गा में चउथकी माई कूष्माण्डा दुर्गाजी के जय हो.


(चित्र आ विवरण डा॰रामरक्षा मिश्र का सौजन्य से)

दुर्गा माई के नौ रुप 2.ब्रह्मचारिणी

(नवरात्र के दुसरा दिन बियफे २९ सितम्बर २०११)

दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू |
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा |
माई दुर्गा अपना दूसर रूप में ” ब्रह्मचारिणी ” का नाम से जानल जाली.नवरात्र में दोसरका दिन माई के एही रूप के पूजा होला.ब्रह्मचारिणी माने तप के आचरण करेवाली.माई के ई रूप पूरा ज्योतिर्मय आ अत्यंत भव्य बा.इहाँके दहिना हाथ में जप के माला आ बाएँ हाथ में कमंडल रहेला.पर्वतराज हिमालय का बेटी के रूप में पैदा भइला का बाद भगवान शिवजी के अपना पति का रूप में पावे खातिर कारन इहाँ के बहुत तपस्या करेके परल रहे.कई हजार बर्ष के कठिन तपस्या से प्रसन्न होके भगवान शंकर इहाँ के वर दिहलीं कि तोहार मनोकामना जरूर पूरा होई.माई के ई रूप भक्तन के अनंत फल देबेवाला हऽ.माई के एह ब्रह्मचारिणी रूप के उपासना से मनुष्य में तप,त्याग,वैराग्य,सदाचार आ संयम के बढ़ोत्तरी होला. नवदुर्गा में दोसरकी माई ब्रह्मचारिणी दुर्गाजी के जय हो.


(चित्र आ विवरण डा॰रामरक्षा मिश्र का सौजन्य से)