भोजपुरी सरोकारन से जुड़ल पत्रिका भोजपुरी पंचायत

आजु जब भोजपुरी के पत्रिका प्रकाशन के स्थिति खराब चलत बा आ शायदे कवनो पत्रिका बिया जवना के नियमित प्रकाशन आ उहो समय पर हो रहल बा. एह दिसाईं दिल्ली से प्रकाशित होखे वाली पत्रिका भोजपुरी पंचायत बधाई के हकदार बिया कि अपना शुरुआत से अबले ओकर चारो अंक एकदम समय पर प्रकाशित होखत आइल बा.

हर नया अंक में एह पत्रिका के जुड़ाव भोजपुरी सरोकारन से बढ़ल जात बा. अलग बात बा कि साथही साथ पत्रिका के अपना व्यावसायिको हित के संरक्षण करे के पड़त बा. सब कुछ का बावजूद पत्रिका के कलेवर आ सामग्री के चयन में सुधार होखत बा. ई बात हम एहसे नइखी कहत कि अब एह पत्रिका में अँजोरिया पर प्रकाशित बतकुच्चनो के चुनल कड़ी प्रकाशित होखत बावे. अब एह पत्रिका में भोजपुरी रचना आ भोजपुरी सरोकार साफ झलके लागल बा. एह सब का बावजूद हमार निहोरा रही कि एह पत्रिका में विचारणीय विषय चाहे जवन राखल जाव साहित्यिक रचना भोजपुरीए में दिहल जाव त नीक रही.

सितम्बर के अंक अगस्त का आखिरी सप्ताह में नेट पर उपलब्ध हो गइल रहे. अगर एकरा के एक हफ्ता अउर विलम्ब से प्रकाशित कइल गइल रहीत त एहमें दिल्ली में पिछला २९ अगस्त के भइल धरना प्रदर्शन के खबर आ रपट सामयिक हो जाइत.

सब कुछ का बावजूद एह पत्रिका के सफलता खातिर अँजोरिया परिवार का तरफ से मंगल कामना हमेशा कइल जाई.

पत्रिका के सितम्बर के अंक पढ़े खातिर रउरा नेट से डाउनलोड कर सकीलें.
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फगुआ के पहरा: डा॰ विमल के काव्य संग्रह

डा॰ रामरक्षा मिश्र विमल के हालही में प्रकाशित काव्य संग्रह “फगुआ के पहरा” में २७ गो गीत, २२ गो गजल आ ६ गो कविता बाड़ी सँ. डा॰ विमल हिन्दी आ भोजपुरी के साहित्यकार हईं आ मूल रूप से गीतकार हईं. अँजोरिया के सौभाग्य बा कि एहिजो डा॰ विमल के रचना प्रकाशित होत रहेला. फगुआ के पहरा में डा॰ विमल के शुरूआत से ले के आजु तकले के रचनाकाल के प्रतिनिधि रचना दिहल गइल बा जवना से नवही गीतकार के पोढ़ होत देखल जा सकेला.

चूंकि हम समीक्षक ना हईं एहसे एह संग्रह के समीक्षा ना कर के अपना मन के बात कहत बानी. एह संग्रह में कुछ रचना मन के छू लिहलसि त कुछ उपरे उपर निकल गइल. “कइल बदले के जे गलती हवा के रुख बगइचा में / ठेठावल जात बा जाङर उठवना रोज कुछ दिन से” समय के रुख देखावत बा त ” चतुर रहे दुशमन त नीमन बुरबक बेटो बाउर ह” लोकोक्तियन के सुन्दर इस्तेमाल.

गीत आ गजल का बारे में खुद डा॰ विमल मनले बानी कि एहमें शास्त्र मर्यादित फार्मेट के कठिन आग्रह ठीक ना होखी. निबाह ठीक रही बाकिर प्रयोग के राह खुलल रहे के चाहीं.

संग्रह के प्रकाशन बनारस के कला प्रकाशन से भइल बा. जहाँ तहाँ छपाई के गलती सवाद बिगाड़े के काम करत बा. भोजपुरी प्रकाशन के अभाव का चलते भोजपुरी के टाइपिंग आ प्रूफ रीडिंग में गलती रहबे करी आ एहु संग्रह में वइसने भइल बा. किताब के दाम २१० रुपिया राखल गइल बा जवन आजु का जमाना का हिसाब से प्रकाशक भले सही ठहरा देव आम पाठक एह दाम पर किताब खरीदे से कतराई जरूर.

डा॰ रामरक्षा मिश्र के संपर्क सूत्र

डा॰ रामरक्षा मिश्र विमल,
केन्द्रीय विद्यालय बैरकपुर (थल सेना)
कोलकाता 700120
मोबाइल – 09831649817

प्रकाशक के पता

कला प्रकाशन,
बी 33/33-ए-1, न्यू साकेत कालोनी,
बी॰एच॰यू॰, वाराणसी – 5

रामचन्दर शुक्ल जी इतिहास में कबीर, गोरखनाथ आ संत रैदास के महत्व ना देहलन

बीएचयू के निदेशक प्रा॰ सदानन्द शाही से भोजपुरिया अमन के सम्पादक डॉ॰ जनार्दन सिंह से लमहर बातचीत के एगो छोटहन अंश –

राउर जनम कहां, कब भइल रहे आ प्राथमिक शिक्षा से लेके अन्तिम शिक्षा कब पूरा भइल, बतावल जा?

हमार जनम कुशीनगर जिला के रामकेला के लगे सिंगहा गॉव में 7 अगस्त 1958 के भइल रहल. प्राइमरी से लेके हाईस्कूल तक गाँव में पढ़ाई कइनीं। इण्टर के पढ़ाई रामकोला इण्टर कालेज से पूरा भइल। स्नातक के पढ़ाई उदित नारायन कालेज पड़रौना से कइनीं.1981 में उहवॉ छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहनीं. एम.ए.आ पीएचडी गोरखपुर विश्वविद्यालय से कइनी. 19९० से गोरखपुर विश्वविद्यालय में अध्यापन कइनी. आ सन् 20०1 में बीएचयू में हिन्दी विभाग में आ गइनी.

रउआ समाज सेवा आ साहित्य के प्रेरणा कहां से मिलल?

हमार जनम किसान परिवार में भइल. हमरे मामाजी गोरखपुर विश्वविद्यालय में कमेस्ट्री के वैज्ञानिक शिक्षक प्रो॰ रविन्द्र प्रताप राव जी रहलन. उ आस्ट्रेलिया, अमेरिका कई गो देश में भी गइलन. 42 बरिस के अवस्था में बेल्जियम में उनके मौत हो गइल. उनहीं के जिनगी से विशेष रूप से हमरा प्रेरणा मिलल. हमरा बाबा के पिताजी के भी हमरी पढ़ाई पर जोर रहल.

हमरा परिवार के माहौल धर्मिक रहल बाकिर धरम के कर्म काण्ड के प्रति कबो हमरा श्रद्धा न हो पावल. युवावस्था में ही ओकरा प्रति विद्रोह के भावना रहल. जब हम पढ़त रहनीं त दु गो घटना एक साथे घटल.

एक त मुक्तिबोध कविता पढ़ला के बाद एगो बड़हन विक्षोभ मन में पैदा हो गइल. तब ओह कविता के असर से वामपंथी विचारधारा के आकर्षण हमरे मन में पैदा हो गइल. दिशा छात्र संगठन से हम अध्यक्ष के चुनाव लड़ल रहनीं. गोरखपुर विश्वविद्यालय में 5-6 साल संगठन के काम कइनीं. ओह में जवन सपना समाज बदले के रहल, उ बहुते प्रभवित कइले रहल.

प्रेमचन्द्र साहित्य संस्थान 1996 में गोरखपुर से ही बनल रहल. ओकरा माध्यम से एगो साखीनामा के पत्रिका भी छपे. हमरा विचार से समझ में आइल कि एगो अइसन परम्परा हमरा समाज में रहल बा. उ परम्परा के प्रतिरोध करे वाला परम्परा रहल.

अच्छा इ बताईं कि साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में रउआ कवन-2 काम कइले बानीं?

साहित्य-संस्कृति के मोर्चा पर जवन काम कइनीं ओह दरम्यान इ समझ में आइल कि बाहर से दबाव बनवला से बदलाव ना आई. जवन परम्परा के भीतर आलोचना प्रतिरोध के स्वर बा ओकरा के मान के विरोध कइल जाला. जवन वर्ण व्यवस्था बनल बा ओही में भेदभाव बा. दहेज के खिलाफ हाई स्कूल में संकल्प लेहनी कि हम बिना दहेज के शादी कइनीं. अन्तर्जातीय विवाह के मौका आइल ओकरा प्रश्रय देहनी.

वर्ण व्यवस्था भीतर घुस के मुक्ति आन्दोलन, बुद्ध धर्म, मार्क्सवादी आन्दोलन के भी चाट गइलस. वैचारिक रूप से कबीर का प्रेमचन्द्र जी के परम्परा पर हम काम कइनीं. 2003 में कबीर काम करे खतिर जर्मनी गइल रहनीं.

भोजपुरी अध्ययन केन्द्र बी॰एच॰यू॰ में स्थापना कबसे भइल? एकरा बारे में बताईं.

विश्व भोजपुरी सम्मेलन 2007 में बीएचयू के तत्कालीन कुलपति पंजाब सिंह जी भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के घोषणा कइलन. डी॰पी॰सिंह कुलाधिपति के हाथ से 26 जून 2०09 के स्थापना भइल आ बनल.

भोजपुरी के विकास के बारे में बताई? भोजपुरी के विकास काहे ना भइल?

अवधी के विकास तुलसीदास में रामभक्ति के सहारा मिलल. भोजपुरी के सहारा रामदास, कबीरदास, गोरखनाथ आदि लोगन से मिलल. जवना के इ लोग हकदार रहल, एह लोगन के उ सम्मान ना मिलल. एसे कि ब्रह्मवाद के लोग मान पोषक ना रहल.

रामचन्द्र शुक्ल जी इतिहास में कबीर, गोरखनाथ आ संत रैदास के महत्व ना दिहलन.एसे महत्व ना मिलल. जबकि परम्परा के विरोध के आवाज भोजपुरी उठवलस.

राउर प्रिय भेजन का ह, बताई?

हमार प्रिय भोजन कढ़ी आ भात ह. दोसर आलू के चोख-रोटी आ बाटी-चोखा, रहर के दाल, रोटी-भात पसन्द करीले.

भोजपुरी भाषा के संविधान के अठवीं अनुसूची में शामिल कइला के बारे में बताई?

इ त राजनीतिक मसला ह. इ जवन समय बा भोजपुरी खातिर भाग-दौड़ के नजरिया से बहुत बढ़िया समय बा. एह भाषा के मान्यता भोजपुरी समाज के मिले वाला बा, आहट हो रहल बा.

अमेरिका के कवि माक्टवेन लिखले रहले कि ‘भगवान पहिले मॉरीशस बनवले आ ओकरे सकल पर स्वर्ग बनवले.’

मारीशस के भोजपुरिया लोग बनावल. जब लोग मारीशस गइल त कई जाति के रहे. सभे जा के उहां मिल गइल. अगर रउआ चाहतानी जे भोजपुरी भाषा के विकास होखे तऽ भोजपुरिया लोग मारीशस, हॉलैण्ड, सूरीनाम आ फीजी बना सकता त आपन घर ना बनाई?

इहवाँ ढपोरशंखी,करमकाण्ड, ढोंग, अंधविश्वास के लोग बढ़ावा देके लोग बांट रहल बा. एह भाषा के जवन संभावना बा तवन सामने नइखे आइल. कवनों भाषा समाज के विकास पीछे ना देखेला, आगे देखेला. भोजपुरी अध्ययन केन्द्र एह क्षेत्र में काम कर रहल बा.

भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के बारे में बताई?

कृषि, कला, विज्ञान सगरों के अध्ययन करे के बा. अध्ययन क के इ देखे के परी की पुरखन के भाँति खुरहुरी दवाई केतना उपयोगी बाड़ी सन. इ सब विचार क के काम कइल जाना.

भोजपुरी केन्द्र में हमार जवन काम बा भोजपुरी में ट्रेंड लोग चाहीं. शब्द कोष, साहित्य के भण्डार चाहीं. भोजपुरी आज ना त बिहान अठवीं अनुसूची में अइबे करी. अइला के बाद भी जवन जरूरत होई, ओकर तइयारी करतानी जा.

एह समाज में गरीबी, बेरोजगारी जियादे बा हमन के अइसन विचार करतानी जा कि भोजपुरिहा लोगन के रोजगार कइसे मिली. कवन-2 अइसन चीज बा जवना से रोजगार के सृजन कइल जा सकता जइसे कोहार, लोहार, बढ़ई, मेहरारून के बनावल कलाकृति आदि के बढ़ावा दे के बाहर के भोजपुरिया देशन में व्यापार बढ़ावल जाई. एहसे एहजा के कलाकृति जिन्दा हो जाई. लोगन के रोजगार मिली. अध्ययन केन्द्र में हमन के इ प्रस्ताव करतानी जा.


भोजपुरी साप्ताहिक “भोजपुरिया अमन” लखनऊ के 08 जून, 2012 का अंक से साभार

पंचायत बावना में एक पन्ना भोजपुरिओ खातिर

Bhojpuri Panchayat Patrikaआजुवे इमेल से मिलल लिंक से डाउनलोड कइनी नोएडा से छपल भोजपुरी पंचायत पत्रिका के पहिलका अंक. कवर समेत बावन पन्ना के एह पत्रिका में भोजपुरी में एक पन्ना दिहल गइल बा. बाकिर सब कुछ हिन्दी में, कविता, कहानी, लेख सगरी हिन्दी के. हँ एह पत्रिका से साफ पता लाग जात बा कि भोजपुरी के मौजूदा कर्णधार के के बा, के के हो सकेला. हालांकि एगो चेहरा जरूरे बेजगहा लागल आ ऊ चेहरा ह नीतीश कुमार के. पता ना का सोच के भा कवना मकसद से नीतीश कुमार के फोटो भोजपुरी के रियल हीरो के समूह में शामिल कइल गइल बा. भोजपुरी खातिर नीतीश कुमार के योगदान के जानकारी हमहू पावल चाहब. खैर, चूंकि लगभग पूरा पत्रिका हिंदी में एह से हमरा ढेर ध्यान देबे के जरूरत ना लागल. भोजपुरी पंचायत पत्रिका भोजपुरी के कम भोजपुरी राजनीति के पत्रिका बेसी लागल. गंगा बहल शुरू ना भइली बाकिर नहाए हाथ धोवे के तइयारी पूरा बा. दिल्ली में देश के दिल बसेला. ओहिजा से राजनीति चलावल चमकावल बहुते आसान होला. बाकिर अगर ई पत्रिका भोजपुरीए में रहीत त जरूरे बहुत नीक लागीत. पत्रिका के साज सज्जा, छपाई के गुणवत्ता बहुते बढ़िया बा. देखे लायक होखी कि ई पत्रिका भोजपुरी इलाकन में कब ले आ कइसे चहुँपत बा. भोजपुरी पत्रिका प्रकाशित कइल बहुत खर्चा वाला काम होला आ ओकर खरचो निकालल दूभर होले. बाकिर हिंदी में पत्रिका होखला का चलते एह पत्रिका के विज्ञापन के भरपूर समर्थन मिली एकर उमेद कइल जा सकेला आ उहो लोग एकरा के चाव से पढ़ सकेला जेकरा भोजपुरी बोले समुझे त आवेला बाकिर लिखे पढ़े ना.
एह पत्रिका के संपादक, प्रकाशक, आ मुद्रक कुलदीप कुमार हउवें. पत्रिका के बेसी जानकारी फोन 011-43022731 से लिहल जा सकेला.
रउरो चाहीं त एह पत्रिका के http://www.bhojpuripanchayatlive.com/June-Cover.pdf से डाउनलोड कर सकीलें.

‘गंगा-तरंगिनी’ (पुस्तक समीक्षा)

जिये-जियावे क सहूर सिखावत अमानुस के मानुस-मूल्य देबे वाली ‘गंगा-तरंगिनी’
‘गंगा-तरंगिनी’ (काव्य-कथा) अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर. मूल्य – पचास रुपये.
प्रथम संस्करण. कवि – रविकेश मिश्र

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 22वी प्रस्तुति)

– सांत्वना द्विवेदी

गंगा के दूनो पाट मनुष्य के जिये आ जियावे के सहूर सिखावेला. ओकरा भव-बोध के नया आधार नया विस्तार देला. गोमुख-गंगोत्री से निकलल गंगा उत्तराखंड से यू.पी., बिहार होत पच्छिम बंगाल गंगासागर तक का यात्रा में पहाड़, जंगल आ खेती के त जीवनी-शक्ति मिलबे करेला, पशु-पक्षी आ मानव के यति-गति आ प्राण मिलेला. रास्ता में ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग आ काशी जइसन जगह गंगा का निर्मल जल का पवित्रता के धरन कइला से, पुण्यवान तीरथ बन जाला. परलोक से लोक आ लोक से लोकोत्तर क यात्रा ह ई गंगा. ‘भारतीय मन’ – खास कर ‘लोकमन’ से शाश्वत संबंध बनावे वाली गंगा राह में जवना-जवना नदियन से मिलि के ‘संगम’ रचेली ऊ जगहिये पतितपावन हो जाला. ओइजा स्नान कइ के लोग तन-मन निर्मल करेला. गंगा का प्रति अनुरागी आस्था आ विश्वास के, ‘लोक मन’ में बढ़ियात लहर आज तक नइखे थमल – चाहे ऊ जतना बढ़ियासु भा बहावसु, इहाँ के लोगन के जिये-मुवे दूनो हालत में गंगाजी रोग-शोक-पाप नाशिनी परम फल दायिनी बाड़ी.

त एही गंगा क ‘स्मृतिबोध’ करावत, एक सौ सोलह सवैयन क संग्रह हवे – पं. रविकेश मिश्र के ‘गंगा-तरंगिनी’. लोक-भावना आ आस्था के सँजोवल, इतिहास-परंपरा आ संस्कृति के सहेजल, ‘महिमा’ आ ‘महातम’ क सकारल मानवी-विवेक के नाँव हवे ‘गंगा-तरंगिनी’. गंगा के उद्गम, अवतरण, लीला-यात्रा के अतीत आ वर्तमान से जोड़त रविकेश मिश्र गंगा के आज के विडंबनामय-जथरथ से रू-ब-रू करावत बाड़न जवन में गंगा के अस्तित्वे दाँव पर बा. जवना में ऊ जनतंत्री दोमुही-ढुलमुल-राजनीति के शिकार होत बाड़ी, जवना में मानव-मूल्यन क छीजत-भिहिलात आ अतिक्रमण क भेंट चढ़त बा. गंगा आ उनकर दूनो पाट बड़-बड़ शहरन का गंदगी, कचरा आ सड़ांध के बटोरत, समेटत गंगा से मनुष्य क दूरी दिन पर दिन बढ़वले जा रहल बा.

भोजपुरी भाषा के बेंवत आ ताकत से, ‘भोजपुरी मन’ के सरधा-विस्वास आ चिंता-फिकिर से भोजपुरी क्षेत्र का सोच-सरोकार आ भावना से जुड़ि के ‘गंगा जी’ के ई स्तुति-स्तवन, प्रार्थना-निहोरा अद्भुत बा. गंगा-तरंगिणी में 116 गो सवैया संकलित बा. कवि का अनुसार ‘लोकमन’ में बसल, ‘लोक संस्कृति’ में रचल-रमल गंगा के वर्तमान दश के व्यथा-कथा कहला का साथ-साथ ‘गंगा के बहाने देश-दुनिया के खोज-खबर लेहल’ चाहऽता. सुधी-सहृदय-संस्कारित-सुसंस्कृत कवि पं. रविकेश मिश्र, का भीतर गंगा के जवन छवि-छटा उभरल, ओके सजीवे उरेहे आ आस्थावान लेख गंगा के विमल-सुयश गावे-सुनावे में ‘गंगा-तरंगिनी’ के रचना भइल होई, एम्मे कवनो शक-शुबहा नइखे. खुशी एह बात के बा कि गंगाजी के बहाने कवि जब अपना देश आ समाज के अंदरूनी चाल-ढाल के पड़ताल करत बा, त तटस्थ नइखे रहि पावत ओकर धार आ तेवर बदल जाता. उहाँ ऊ गंगा के जरिये बिगड़ल ‘जनतंत्र’ के छिपल चेहरा देखावे के सार्थक उतजोग करत लउकत बाड़न.

‘सुमिरन’ के पहिली लाइन में गंगा जी के ‘गणेश के माई के सौति’ कहलें बाड़न, एगो पिटा-पिटाइल परिपाटी पर चलके उनकर बखान नइखन कइले, एगो देवी के रूप् में सुंदर से सुंदरतम बनावत, नख-शिख वर्णन नइखन कइले. गंगा माई कइसे भरत के गँवई संस्कृति से जुड़ल बाड़ी एकर वर्णन ‘रोटी-बेटी’ में लिखत ख रविकेश मिश्र कहत बाड़ें –
‘ओही कमाई में सबके समाई बा,
मनई से चिरई-चुरूंग के हिस्सा.’

माने सभकरा के साथ लेके चले वाला संस्कृति में परिवार के सदस्य निहर हिस्सेदारी करत गंगा माई. ई कृति लोक संस्कृति के संगे-संगे गंगा मइया के रूपक के जरिये एगो अउर खस संस्कृति के परिकल्पना करत बा, ऊ ह लोकतंत्र के संस्कृति, जहाँ ऊ कहत बाड़न कि छोट आदमी, होखे भ बड़, कौनो जाति धर्म के होखे, भले ऊ देश के पूर्व प्रधनमंत्री जवाहरलाल नेहरू होखस सभकर, राखि ओही धरा में समाविष्ट हो जाला.
लंदन लौटल नेहरू के भी जब
राखि समेटि एही में फेंकाला.

अपना भूमिका में रविकेश मिश्र एह बात के स्वीकारो कइले बाड़न कि ‘जवने तरे गंगा ब्रह्मा के कमंडल में रहि के व्यक्तिगत संपत्ति रहली आऽ फेर सार्वजनिक हित खातिर धरती पर अइली, का ई एगो रूपक नइखे हो सकत – सत्ता के, समृद्धि के – व्यक्तिगत राजशाही से मुक्त होके लोकतंत्र के रूप में ढलले के.’ गंगा राजा के ना, लोक के बाड़ी.

संस्कृति और परंपरा से जुड़ल गंगा के एह रूप में देखला में आधुनिक सोच बा एगो आधुनिक दृष्टि बा जवना से एह कविता के एगो सांचा दिहल बा. एह कृति के खूबसूरती, एहकर गरिमा एही मंतव्य में छुपल बा. हमनी के आज समाज में जवन आधुनिकता ले आवे के कोशिश करऽ तानी जा. या विद्वान लोग जवन यूरोपियन आधुनिकता के नकार के भारत के आधुनिकता के देशज आधुनिकता कहत बाड़ें अउर ओकर बीज मध्ययुग के साहित्य में परंपरा से जोड़ के देखत बाड़े, ओह लोगन के तनी झांक के एक बार हमनी के क्षेत्रीय साहित्यो, लोक साहित्य में भी देख लेबे के चाहीं.

काफी समय बाद भोजपुरी में लंबी कविता देखे के मिलल, खुशी भइल कि कृतिकार एके प्रबंध काव्य नइखन बनवले. लमहर कविता लिखे के परिपाटी लगभग खतमे होता, अइसने में एह विधा के प्रयोग कइल अपने आप में बेजोड़ बा. अउर ओहू से बेजोड़ बा एह कविता में भइल प्रयोग. मिश्र जी कविता के कुछ उपशीर्षक भा मथेला में बंटले बाड़े जइसे ‘कथा-पुरान’, ‘लोक-मत’, ‘आपन-मत’, ‘रोटी-बेटी’ आदि. लेकिन ओकरा के बँटलो के बाद कविता के लय गंगाजी के धार नियर टूटल नइखे. मिश्र जी खुद भी मानेलन कि ‘कविता आ नदी के धार मनमौजी ह.’ आ भाषा त ठेठ माटी में सनाइल बिया, ओह में शिष्टता खोजल मूर्खता होई, इहे एह कृति के सफलता ह कि ई लोकजन खातिर ह अभिजन-खातिर ना. कालातीत कवि हमेशा कृति पर कम रचना-प्रक्रिया पर ढेर कहे के कोशिश करेला, मिश्र जी के ई पंक्ति हमके अज्ञेय के ‘शेखर: एक जीवनी (1)’ के भूमिका के याद दियवलस –
तीस बरस ले बीज पकल,
टकटोरत राह, न लांघत घेरा.

बिम्ब अइसन बाटे कि अगर रउवां ओह संस्कृति, परंपरा, आ माटी के रग-रग से वाकिफ नइखीं त रउवां बुझाई ना. जे सूर्य भगवान अउर संध्या के बियाह, फेरू, यम और यमुना के जन्म, संध्या के छोड़ के गइल आ बाद में अइला के मिथक जानत होई उहे एह पंक्ति के बूझ सकेला – ‘साथे बहावें कलिन्दी के ऊ, जमराज भी आवे त बार न टूटी’.

वर्तमान में गंगाजी के जवन स्थिति बा ऊ शोकजनक बा. भूपेन हजारिका के गीत याद आवत बा ‘ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों?’


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

हम जरूर आइबि !


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 17वी प्रस्तुति)

– गदाधर सिंह

हम ओह राति में अधनिनियाँ में रहीं. अचके में हमार खटिया हिलल, खट-पट भइल आ हमार आँखि खुलि गइल. हम का देखतानी कि हमरा खाटी के ठीक लगे एगो पाँच-छव बरिस के कमनीय काया खाड़ बा. ओकरा मुँह पर अजबे किसिम के आभा रहे. हमरा बुझाइल कि हमरा कोठरी में सुकवा तरेंगन उगि आइल बा. हम भकुआ गइनीं आ लगनीं अचकचा के ओकरा के घूरि-घूरि के ताके. ऊ कवनो छाया-परछाई ना रहे आ ना सपना रहे. चेहरा चीन्हल बुझाइल. ऊ बोललि – तू चिन्हलऽ हमरा के ? हम कबसे खाड़ बानी. आं तूँ सूंतल बाड़ऽ. लगनी इयाद करे, इयाद परि गइल – ऊहे रूप, उहे कद काठी, उहे बोली, उहे आत्मीय हास्य ! ऊहे वात्सल्य-भाव.

– अरे सोमारो, हमार सोमरिया ? तोहरा के देखला ढेर दिन भइल रहे, ढेर दिन से तोहरा से भेंटे के मन करत रहे, मन ना मानल. चलि अइनीं हाँ. ऊ का-का दो अवरू कुछ कहलसि. हम चुप-चाप सुनत रहनीं – हमरा मुँह से बोली फुटबे ना कइल, ना जाने कवना भव-लोक में हम चलि गइलीं.

दरिआव के उफनत पानी लेख आँखि से झर-झर लोर बहे लागल. मुँह से बोली ना निकसल, ऊहो कुछ ना बोललि, बाकिर ओकरा आँखि से लोर के जवन पनार बहत रहे, ओह से हमार सउँसे देहि भींजि गइल. हमरा बुझाइल कि हम पाँच-छव बरिस के लइका बानीं आ हमरा भिरी बइठल बाड़ी हमार बाल-सखी- सोमारो, सोमारिया.

हमरा अचरज के मौन तूरत ऊ पूछली – नीक से बाड़ऽ नू ? हम इयाद परींला ? सोंचले रहनीं कि ईया आ भउजी के गोड़ लागबि, बाकिर मन मसोसि के रहि गइनीं. अब दूनों जानीं नइखीं. कतना छोह करत रहीं जा ? ‘एह घरी तूँ’कहाँ रह तारू ? कहाँ से आव तारूँ ? हम पूछनीं. हमार घर देखते नइखऽ ? ऊहे कबूरवे नू हमार घर ह ! ना जाने कतना बरिस, कयामत तक ओही में रहे के बा.बड़ा तकलीफ होला ओह में, बाकी करीं का ? मन उजुबुजा जाला त एने-ओने तनी मनीं घूमि-फिरि लीहीं ला. ना रहाइल हा त चलि अइलीं तोहरा से भेंट करे. हम कहनीं कि हमरे भिरी रहऽ ना ? एने-ओने छिछियाइल चलऽ तारू ? ऊ जबाब ना देली. खिरकी के बहरी तकली – आन्ही चले लागल रहे. ऊ कहली – झट से उठऽ, आन्हीं बहे लागल, बगइचा में आम गिरत होई, देरी करबऽ त लँगड़ा आ इसमइला पहिलहीं पहुँचि के आम बटोरि लीहें स. आम बीने के नाँव सुनते, हम खाटी पर से नीचे कूदि गइनीं, झोरा उठवनीं आ दूनों आदमी दउरनीं जा बगइचा के ओर. अइसे त बगइचा हमरे रहे, बाकिर आम लूटे में लइकन के जवन मजा मिलेला ओकरा के उमिरिगर आदमी का बुझिहें ? लइकन के एगो गोल बगइचा में पहुँचि गइल रहे. हम लइकन के आम लूटे से बरिजनीं त लइका जानि के इसमइला हमरा से अझुरा गइल. इसमइला सभ लइकन में बरिआर रहे. बस, सोमरिया इसमइला के अइसन चमेटा मरलसि कि इसमाइल राम चार ढिमिलिया खा गइले आ एक जना जब सोमरिया पर छड़ी चलवले त ऊ उनकर गरदन अइसन चींपलसि कि लगलन काइँ-काइँ करे. हम कहनीं, वाह रे सोमारो, तें अतना बरिआर बाड़े, हम ना जानत रहीं. लइका लोग चलल पराइ. आन्ही थमल त मचान पर बइठि के हमनीं के आम के चेका मारे लगलीं जा. सोमारो बड़ खुश रही. हम कहलीं – सोमारो ! एकबाल के बछिया हमरा के मारि देले रहे, त तें कतना रोवति रहलसि, इयाद बा नूं ? हँ इयाद त बड़ले बा. हमरो इहो इयाद बा कि पोखरवा में नहाये के बेरिया हम डूबे लगलीं त तूं कतना चिचियात रहलऽ ? तूं त आपन गमछी फेंकलऽ बाकिर तूहूँ फेंका गइल आ लगल तूहूं डूबे. ऊ त अमीन दादा हमनीं दूनों के छानि लेलनि नाहीं त. .. काली मइया के दोआ से हमनी दूनों के जान बाँचि गइल.

हमरा इयाद बा कि सोमारो दिन भर हमरे घरे रहत रही. साथे-साथे गोटी खेलबि जा, साथे-साथे पंडित जी के इहाँ मोट बस्ता लेके जाइबि जा. ढेर रद्दी कागज भरि के बस्ता के मोट बना देबि जा. हमार माई जब हमरा के खाये के दीही त साथे-साथे सोमारो के थरिया परोसाई. जवन हम खाइबि तवने सोमारो खइहनि, बाकिर उनकर छीपा अलगे रही. मन त करे कि एके छिपा में हम आ सोमारो साथे-साथे खाईं जा बाकिर माई बरिजि दीही. हमरा बुझइबे ना करे कि हिन्दू-मुसलमान का चीज ह ! हमार बहिनियाँ जब हमरा संघे खाले त सोमारो काहे ना खइहें ? एहसे जब हम रूसि जाइबि माई दुलार से कही कि सेयान होखब त दूनों के बिआह क देबि. ई सुनि के सोमारो खूबे खुश हो जासु बाकिर जब माई हँसे खातिर कहि दे कि सोमारू तू बदमासी करतारू ! तोहार बिआह एकरा संघे ना करबि, त सोमारो मुँह फुला के खइबे ना करसु. माई जब उनका के मनाईं आ दूनों के बिआह करेके बाकित कही त खुश हो जासु. एक दिन भउजी मनचउल करे खातिर कहि देली कि तें रोज-रोज का आवेलिसि ? लरिकवा के बिगरबे का? एह पर सोमारो रोवास मुँह बनाके कहली कि इनका के काहे नइखू बरिजत ! हम कवनो दिन लकड़ी बीने चलि जाईंला, त हमरा के बोलावे खातिर हमरा घर चलि आवेले. इनकर झँवाइल मुँह देखि के हमरा मोह लागे लागेला. माई हँसि के सोमारो के पीठि थपथपा दीही आ कही – ना हो सोमारो, तू रोजे आव, तू अपने नू बेटी हऊ ! दूनों के बिआह हम जरूर करबि.

दू दिन बीत गइल. सोमारो हमरा घरे ना अइली. हम एने जाईं, ओने जाईं, मने ना लागे. माई कहली कि सोमारो के लूक लागि गइल बा. बिना खइले-पियले तेज धूप में ओकर भउजाई लकड़ी बीने खातिर भेजि दीहले रहली हा, बस लूक के चपेट में धरा गइली. माई के बात सुनते हम दउरि के उनका घरे चलि गइनीं. देहिया छुअनीं त ओकर सँउसे शरीर आगि के भउर लेखा तवत रहे. उनका सँउसे देहि में आम पका के छापल रहे. ऊ आँखि मुँदले रही. कुछु बोलली ना. हमरो रोआई आ गइल. हमरा के लोग गोदी में उठा के घरे पहुँचा दीहल. रात भर सुतलीं ना. बुझाव कि कवनों भकाऊँ हमरा के धइले बा. हम रहि-रहि के चिचिआए लागीं. माई डेरा गइल आ मिरिए के जतन बाबा के बोला के झाड़-फूँक करवलसि. पाँ बाबा बुदबुदा के कुछ मन्तर पढ़ले. माई सवा गो रोपेआ ओंइछि के जतन बाबा के दिहलसि. फजिरे उठनीं त मन ना लागे. दउरि के सोमारो के घरे चलि गइनीं. हम का देखतानीं कि धप-धप ऊज्जर कपड़ा में सोमारो के ढाँपल रहे. उनका के उठा के लोग कबूरगाह में ले गइल. हमनी लइका सभ डरे ना जात रहीं जा. लोग बतिआई कि कबूरगाह में कवन-कवन दो जिन्ना-भूत रहेले सं. बगले में इमली के बड़का फेंड़ पर कवल बाबा रहेले. उहे लइकन के जिन्ना-भूतन से बचावे ले. ना जाने हमरा में कवन शक्ति आ गइल कि हम दउर के कबूरगाह में चलि गइनीं. सोमारो के एगो लकड़ी के तख्ता पर सुतावल रहे. बगलीं गाँव के मोलबी साहेब आइल रहले. ऊ का-का दो मन्तर पढ़ले आ आखिर में हमरा सोमारो के खेदल गड़हा में सुता दीहल गइल आ ऊपर से अइसन माटी भराइल कि जइसे ऊ छत के नीचे सुतल होखसु. हम चिचिया के लगलीं रोवे आ कबुरगाह जाये के छरिआये लगलीं. लोग दउरिके हमरा के धइल. हम कई दिन ले बोखार में पड़ल रहनीं. नीमन भइनीं त लुका के कबुरगाह चलि जाईं आ सोमारो-सोमारो कहिके बोलाईं. ओने से कवनो जबाब ना मिले त खिझिआ के ढेला उठा के मारीं. लइका हल्ला क देहले स कि ई कबूरगाह में जाके सोमरिया-सोमरिया कहिके चिचियाला. तबसे हमरा पर पहरा परि गइल.

आजु सोमरिया के अपना लगे देखि के मन खुश हो गइल बाकिर रुसि के कहनीं कि हमरा के छोड़ि के तें काहे चलि गइले ? एहिजे आके रहु. ऊ कहली कि हम त हवा नू हो गइल बानीं. हमार कहनाम रहे कि तें हमरो के हवा बना ले आ अपना संगे ले चलु. तोरा बिनु हमार मन नइखे लागत. ऊ हमार मुँह चाँपि देलसि. कहलसि कि अइसन बोलबऽ त हम तोहरा से बोलबि ना. अरे हम त गरीब रहनीं, दवाई ना भइल त हम हवा हो गइनीं. तूँ मन लगा के पढ़ऽ लिखऽ, बड़ आदमी बनऽ. माई कहत रहली तोहरा से हमार बिआह करेके. अब हम जा तानीं. तोहार बिआह देखे हम जरूर आइबि – हम भकुअइले खुलल खिरकी से बहरा ताके लागल रहीं.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

राघव मास्टर


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 16वी प्रस्तुति)

– गिरिजा शंकर राय ‘गिरिजेश’

गांव में प्राइमरी स्कूल खुलते चारो ओर खुशी के वातावरण छा गइल. एकरा ले पहिले सब डेढ़गांवा जात रहे. जहिया ना जायेके मन करे कोइरिया का संऊफ का खेत में घुसके सब बइठ जाय आ बीचे में गमछा बिछा के तास जमक जा. एक दिन ई खबर स्कूल पर पहुँच गइल आ खेदन मास्टर लइकन का साथे आके खेत में लुकाइल लइकन के पकड़ लिहलन. ओह दिन खूब पिटाई भइल रहे. कइगो बांस के कइन टूट गइली स. केतने जाना का पीठ पर गोहिया पड़ गइल रहे. गांवे स्कूल खुलल त सब एह बात से खुश रहे कि अब लइका पढ़ लिहें स. अब त आवत जात सब देखियो लेई. अब कहाँ सऊफ का खेत में लुकाये के मोका मिली.

राघो मास्टर पहिला मास्टर रहलन जवन स्कूल पर तबादला पर आइल रहलन. पूरा नांव राघव प्रसाद रहे बाकिर राघो मास्टर का नांव से सभ गोहरावे. ठिगना सरीर, गोल चेहरा, आंख पर मोट सीसा के चश्मा, आधा बांहि के खद्दर के कुर्त्ता, खद्दर के धोती, गांधी आश्रमी जूता, रंग सांवर, हाथ में बकुड़ी वाली छड़ी इहे उनकर पहिचान रहे. चलसु त छड़ीसे ठेघत-ठेघत चलसु. बाकिर पढ़ावे में एक नम्बर के रहले. लइका त तारीफ करबे कर सु. स्कूल के नांवो भइल रहे. उनकर गांव एहिजा से पाच-छः किलोमीटर होखी एहसे खली शनीचर के धरे जासु. अतवार के घरके काम करसु, सोमवार के फेनु स्कूल पर हाजिर हो जासु. अक्सर ऊं रुक जासु. स्कूल का बगले में बत्तक बाबू के दुआर रहे. ऊ ओहिजे रुक जासु आ हर लइका कीहें पारी बान्ह देले रहलन. साझ के त खियइबे करे सबेरहू के भार ओही पर रहे. छठवां छः मास केहू के नम्बर आवे एह से सब स्वीकार कइले रहे केहू विरोध ना कइल. घरन में भोजन करत राघो मास्टर घरऊ हो गइल रहलन. गांव में घर-घर के मेहरारू उनकर परिचित रहली स. सबकर उनकरा पर विश्वास रहे. गांव के पंचाइतो करसु. आज काल्हु त घरे-घरे विवाद बा. राघे मास्टर कीहें कवनो न कवनो मामिला आइल करे ऊ ओके सुलझा देसु. एह से गांव के लोग अउरी माने. एकरा बारे में उनकर कवनो सहयोगी डिप्टी साहब से सिकाइत क देले रहे जवना पर मास्टर साहेब के तबादला दूसरा गावें हो गइल रहे. जब ई खबर आइल त गांव के लोग के खिनिस चढ़ि गइल. ऊ लोग प्रधान का साथे जिला परिषद् का चेयरमैन कीहें धरना दे दिहलन. मजबूर होके तबादला रोके क परल. बाद में बेसिक शिक्षा अधिकारी का अधिकार में प्राइमरी स्कूल आ गइल. मास्टर साहब के लोकप्रियता देख के उनकर हिम्मत ना पड़ल कि फेनु कबों उनकर तबादला करो. केतने मास्टर अइलन गइलन बाकिर राघे मास्टर खैरा पीपर हो गइलन आ ना डोललन.

पता चलल मास्टर साहेब बेमार बाड़न. गांव भरके मरद-मेहरारू उनकर हाल-चाल लेबे खातिर गांव पर जमि गइलन. जे जाव फल फूल का साथे जाव. एतना फल आइल कि महिनवन मास्टर खइलन. गांव के नेह देखके ऊ निहाल रहलन. राघो मास्टर का तीन लइकिये रहली. तीनों क बहुत मानस. केहू लइका के बात करे त ऊ कहसु का लइका का लइकी. कुल्हि भगवाने के बनावल ह. नइखऽ सुनले कहल जाला कि लइकी जनमें ले त दू खनदान जुटे के बात होले. लइका जनमेंला त घरके देवालि दरक जाले. अंगना में डड़वार उठे के तइयारी हो जाले. मास्टर क बड़की लइकी का बियाह में सगरे गांव से नेवता गइल रहे, जवन बेटी के बियाह के भारे ना मास्टर पर पड़े दिहलस. देखते-देखत अउरी दूनो लइकिन के बियाह मास्टर क दिहलन. घर वर बड़ा अच्छा खोजले रहलन.

समय पांखि लगा के उड़त रहे. एक दिन खबर आइलि का राघव मास्टर रिटायर हो गइलन. गांव भर में ई बाति फइल गइल. जे सुने ऊ मास्टर कीहें आके पूछे. बाद में एगो शनदार विदाई समारोह के आयोजन कइल गइल रहे. सभकरा घरसे भेंट आइल. केतने आदमी त समारोह में बोलत के मास्टर साहब के स्नेह क चरचा करत भोंकारि मार के रोवे लगलन. मास्टर सबके धीरज बन्हावत कहलन ”आइल गइल त संसार के नियम ह. हमनी का सभे एह नियम में बन्हाइल बा. स्कूल से विदा होत बानी रउरा मन से कहां विदा होत बानी. हमरा मनमे आ रउरा मन में हमनी का सदा बसल रहब जा. जब बोलाइब तब हम आइब. केतना दूर गांव बंटले बा. आ सांचो रिटायर भइला का बाद काज-परोज में त मास्टर अइबे करसु ओहू तरे जब मन अगुता त भागल उधरनपुर चल आवसु. लोग उनकर ओहितरे भाव करे जइसे पहिले सब करत रहे.

मास्टर गांव में आवसु जेही कीहे मन करे ओकरा कीहें भोजन के कढ़वा देसु बाकिर रहसु बत्तके बाबू के दुआर पर. चाह-पानी के बेवस्था उनकर ओहिजा परमानंद रहे. रिटायर भइला पर पेंशन मिले. ऊ दूनो बेकति खातिर बहुत रहे. मास्टराइन एतना किफायत कके खरच करसु कि ओहू में बच जा. जमीन जवन रहे तवन मास्टर तीनों लइकिन का नांवे करवा दिहलन. एहसे उनकर दयाद उनकरा पर बड़ा नराज रहलन. उन्हन खतिर राघो मास्टर ले खराब आ खनदान के दीया बुझावे वाला केहू दूसर ना रहे. बाकिर मास्टर का एकर कवनो चिन्ता ना रहे. ऊ अपना धुन में रमल रहलन. गांव में तनिको जीव घबड़ाय त उधरनपुर के रास्ता धरसु. कबों कबों मास्टराइनो आ जासु. शादी बियाह में त मास्टर साहेब परधान रहसु. का का जलपान में बनी, खाये में का का रही. भण्डार के बेवस्था कइसे रही, परोसे वाला कइसन रहिहन जवना से खाना जियान न होखे ई कुल्हि के बेवस्था में राघो मास्टर क भूमिका प्रमुख रहे. मड़वा में कवनो बात बिगरे ना एह पर उनकर विशेष ध्यान रहे. कवनो मुद्दा उठ जा त ओके हल करावे में ऊ जीव जान लड़ा देसु.

ओह दिन राघो मास्टर जिलेबा भउजी कीहें बइठल रहलन. एहर ओहर के बात होत तीरथ-बरत पर बतकही होखे लागल. भउजी कहली मास्टर साहेब ! रउरा त खुदे दूसरा के गियान देइला हमका समुझाईं. अनपढ़-गंवार हई बाकिर एतना जानीला कि ई दुनिया मोह माया ह. आपन करतब कइला का बाद एह मोह का बंधन से निकले के चाही. एह तइयारी में तीरथ एगो कड़ी हउवन स. तीरथ कइला से मन में विराग जनमेला. रउरो कुछ तीरथ क आईं. हम त इहे कहब ई कुल्हि मोह माया के बाजार छोड़ी. अब त राउर तीरथ करे के उमिरो हो गइल बा.

भउजी के बात सुनके राघो मास्टर का चेहरा पर एगो हल्लुक हंसी आइल फेनु कहे लगलन – रउरा ठीके कहत बानी हम ओकरा खिलाफ नइखी बाकिर आपके बतावत बानी कि हम ‘कन्या तीर्थ’ कइले हईं. तीन-तीन बेटिन के कन्या दान कइले हईं. शास्त्रन में लिखल ह कि –
तिस्त्र कन्या यथान्याय पालयित्वा निवेद्य च
न पिता नरके याति नारी वा स्त्री प्रसूयिनी.
अर्थात् जे तीन कन्याओं को विधिवत पाल-पोस कर उन्हें योग्य वर को ‘दान’ करता है. उसे नरक की प्राप्ति नहीं होती. मुझे गर्व है कि मैंने अपनी तीन बेटियों का दान दिया है. एतना कहला का बाद मास्टर साहेब का चेहरा पर एगो तेज चमक गइल, जवना में संतोष झलकत रहे. ऊ कहले एह तीर्थ कइला का बाद अब के तीर्थ करे. एहसे बड़हन तीर्थ कवनो नइखे. लोग कहेला कि बेटा उद्धार करेला हम एके सोच के तनिको चिन्तित नइखी. काहें कि अपना लइकिन पर हमरा गर्व बा. उन्हनी का हमार सबकुछ बाड़ी स. उन्हन बिना हम जीये के कल्पना ना क सकी.

राघव मास्टर कहलन – हमहूं रउरा से उहे कहलीं ह जवन हमरा मन में आइल ह. लइका-लइकी में हम कवनो फर्क ना करी. आ ई त भगवान के मरजी ह. ऊ ना जानत होखिहें कि बेटा ना भइला से एकर मुक्ति ना होई ? अगर एके जानत होइतन त बेवस्था करतन. ई कुल्हि आदमी के बनवल ह. भगवान के त जबरन घुसेड़ दिहल बा.

भउजी फेनु बिचहीं में टोकली, मास्टर जी, हमार ई ना विचार रहल. ओकरा पीछे एगो भावना रहलि ह. जमीन-मकान लइकिन का नावें तूं झटके में क दिहल. तोहार दयाद जनबे ना कइलन. अगर बात फूट गइल रहित त तोहके ऊ कबों ना लिखे दिहले रहतन स. एह बात के लेके बड़हन बवण्डर उठि गइल रहित. एह बात पर गांव भर उन्हन का साथे बा. गांव में कवनो दूसरा कुरी के लोग भा नवासा ना रहे दिही लोग. तूं अकेल पड़ जइब. ई सही बा कि कानूनी रूप से राउर पछ मजबूत बा बाकिर समाजो त कवनो चीज ह. ऊ नराजगी अबही आजो बा. हम चाहत रहलीं ह कि तीरथ का नाव पर कुछ दिन हटि जइतीं त मामिला ठंढा जाई. फेनु के केके पूछत बा.

मास्टर साहब हंसत कहलन – अरे हमार केहू कुछ ना करी. रउरा हमार हित-मीत बानी एही से हमार भलाई सोचत बानी. अबहीं बात होते रहे तबले एगो लइका आइल आ कहलस कि बत्तक बाबू बोलवले ह. मास्टर साहेब तुरते बत्तक बाबू का दुआर पर अइलन. बत्तक बाबू कहलन – हई छांगुर भई बइठल बाड़न. एह लोग में बंटवारा रउरा काहें नइखी करवा देत. कहत बाड़न कि कई दिन ले धउरत हई बाकिर मास्टर साहब के मोके नइखे लागत.

राघो मास्टर कहलन – बत्तक बाबू उधरनपुर में कवनो परिवार अलगा होला त ना जानी काहें हमार मन दुखित हो जाला. पूरा गांव एक परिवार बा एह में कवनो टूटन हमके नीक ना लागे बाकिर जब चलावं नइखे त हम बटवारा त कराइये देव. चलऽ छांगुर लट्ठा आ जरीब लेले चलिहऽ. लट्ठा-कठा होखी तवन जोड़ घटाके निकाल देब. छांगुर के लेके राघो मास्टर बंटवारा करावे चल गइलन.

ओह दिन पूरा उधरनपुर में कोहराम मच गइल रहे. सबेरे मुनेसरा खबर लियउवे कि राघो मास्टर मू गइलन. काल्हु साझ ले ठीक रहले ह. खाना खाके राति के सुतुवन त मस्टराइन से कहत रहुवन उधरनपुर गइले कई दिन हो गइल बा. काल्हु ना होखे त तूहूं चल. मास्टराइन हामी भर दिहुवी. आज सबेरे जब मास्टर साहेब ना उठलन हा त ऊ जगावे गइली ह. मास्टर साहेब पांचे बजे उठ जात रहलन ह. जब झकझोर के उठउवी त मास्टर साहेब क मूंडी एक ओर लटकि गइल रहुवे. सुतले में उनकर प्राण शरीर छोड़ दिहले रहुवे. गांव के लोग राघो मास्टर का गांवे पर उनका घरे पहुंच गइल. कई अदमी आ मेहरारू भोंकार मारि के रोवत रहुए.

राघो मास्टर के लाशि टिकठी पर कफन ओढ़ाके सुतावल रहुवे. क्रिया कर्म करे से, दाग देबे से देयाद इनकार क देले रहुवन स. दयादन के कहनाम रहुए कि लाश हमनी का श्मशान घाट पहुंचा देइब जा बाकिर मुखाग्नि हमनी का ना देइब जा. मास्टराइन रोवत सुसकत लोगन से हथजोरिया करत रहुवी बाकिर केहू तनिको ना पसिजुवे. सब सोचमें रहुवे कि का होई. एही बीच में उनकर तीनों बेटी, दमाद एगो वकील साहब का साथे चहुँपले. वकील साहब कहलन कि राघो मास्टर के अंतिम इच्छा रहल ह. हम ओके सुना देत बानी ओही का अनुसार किरिया कर्म होखी. वकील साहब पढ़े लगले – ‘हम राघवेन्द्र प्रताप पूरा होशोहवास में लिख रहल बानी कि हमरा मुअला पर हमरा मुंहे आगि हमार बेटी दमाद दीहे. खासतौर पर ई काम छोटकी बेटी आ दमाद का जिम्मा सौंपत बानी. बाकी क्रिया कर्म हमार दूनो बेटी दमाद करिहें. दयाद लोग हमार लाश मत छुई. हमरा कवनो पछतावा नइखे. बेटिन पर हमरा गर्व बा.’

वकील साहब पढ़ि के चुपा गइलन. इहे भइबो कइल. राघव मास्टर क लोक परलोक दूनो पूरा भइल. पुरान रूढ़ि तूरि के नया बिचार के स्थापना का सांथ.


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