दिल्ली में मनावल गइल भिखारी ठाकुर के पुण्य तिथि

भोजपुरी के शेक्सपीयर के नाम से मशहूर लोक कलाकार भिखारी ठाकुर अपना जमाना में जवना सामाजिक बुराईयन का खिलाफ लड़ाई लड़लन ऊ समस्या आ सामाजिक बुराई कमोवेश आजुओ समाज में मौजूद बा. भिखारी ठाकुर के नाटकन में नशाखोरी, धर्मिक पाखण्ड, संयुक्त परिवार बिखरे के त्रासदी, बेटी बेचे के कुप्रथा, नारी पर अत्याचार वगैरह का खिलाफ आवाज बुलंद कइले रहन. जरूरत बा कि आजुओ भिखारी ठाकुर के विचार अपना के देश आ समाज के सही दिशा दिहल जाव. अइसने राय रखलन आधुनिक साहित्य पत्रिका के संपादक आ विश्व हिंदी साहित्य परिषद् के अध्यक्ष आशीष कंध्वे जे दिल्ली में बिहारी खबर का कार्यालय में आयोजित भिखारी ठाकुर पुण्य स्मृति का कार्यक्रम के अध्यक्षता करत कहलन.

भिखारी ठाकुर मेमोरियल ट्रस्ट, चैतन्य भारत न्यास, अउर बिहारी हेल्प लाइन के मिलल जुलल आयोजन में ‘भिखारी ठाकुर लोक भाषा पुस्तकालय’ के विधिवत शुरूआत कइल गइल. पुस्तक संस्कृति आंदोलन के प्रणेता आ रामधारी सिंह दिनकर न्यास के अध्यक्ष नीरज कुमार पुस्तकालय के उद्घाटन करत कहलन कि देश भर में पुस्तकालय आंदोलन चलावे के मकसद ई बतावल बा कि आदमी के शराब ना किताब चाहीं. नीरज कुमार पुस्तकालय ला हर संभव मदद करे के भरोसा दिहलन.

भोजपुरी जिनगी के संपादक संतोष पटेल अपना कविता के माध्यम से भिखारी ठाकुर के श्रद्धांजलि दिहलन आ पुस्तकालय आंदोलन के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगावे पर जोर दिहलन. आर.टी.आई. कार्यकर्ता सत्येन्द्र उपाध्याय कहलन कि भिखारी ठाकुर के विचार जन-जन तक पहुंचावे के जरूरत बा. ऊ दिल्ली के कवनो सड़क के नाम भिखारी ठाकुर के नाम पर राखे के मांग कइलन.

भिखारी ठाकुर मेमोरियल ट्रस्ट के सचिव लोकगायक गजाधर ठाकुर अगिला छह महीना ले भिखारी ठाकुर लोक उत्सव के आयोजन के जानकारी दिहलन. ज्ञान गंगोत्री संस्था के अध्यक्ष भाई बी.के. सिंह गोहार लगवलन कि भिखारी ठाकुर पुस्तकालय में अधिका से अधिका पुस्तक दान दिहल जाव. बिहारी हेल्प लाईन आ बिहारी खबर के संस्थापक अश्वनी कुमार पुस्तकालय ला 51 सौ रुपये के सहयोग दिहलन आ बिहार के छपरा में भिखारी ठाकुर लोककला संग्रहालय स्थापित करे खातिर फाउंडेशन के जमीन दान देबे के एलान कइलन.

एह कार्यक्रम में बिहारी खबर के संवाददाता संतोष सिंह, नीलांजन बनर्जी, श्रीकृष्णा गिरी, उज्जवल कुमार मंडल आ बब्लु कुमार वगैरह लोग शामिल भइल. कार्यक्रम के संयोजन आ संचालन मुन्ना पाठक कइलन.


(ईमेल से मिलल खबर)

छपरा के लोग भुला दिहल भिखारी ठाकुर के

पिछला मंगल १० जुलाई का दिने जब पटना आ कुतुबपुर में भोजपुरी के शेक्सपियर कहाएवाला भिखारी ठाकुर के पुण्यतिथि मनावल गइल तवना दिने छपरा के भिखारी ठाकुर मोड़ पर मौजूद भिखारी ठाकुर आ उनुका मण्डली के मूर्ति बाट जोहत रह गइल एगो फूल माला के. ई मूर्ति स्थापित कइला का बाद ई पहिला मौका रहल जब एह जगहा पर कवनो कार्यक्रम आयोजित ना भइल. ना त कवनो राजनेता अइलें ना भोजपुरी के नाम पर आपन चेहरा आ धंधा चमकावे वाला लोग, देश विदेश में भोजपुरी के अलख जगावे वाला लोग.

गनीमत अतने रहल कि बिहार भोजपुरी अकादमी आ भिखारी ठाकुर के गाँव के कुछ नवजवान भिखारी ठाकुर के श्रद्धांजलि देबे के औपचारिकता निबाह दिहलें. कुतुबपुर में आयोजित कार्यक्रम में भिखारी ठाकुर के पोता राजेन्द्र ठाकुर, भिखारी ठाकुर के सहकर्मी रहल गोपालजीम विष्णुदेव शर्मा, चरण जी वगैरह का साथ कुछ जनकवि भिखारी ठाकुर लोक साहित्य व संस्कृति मंच के पदाधिकारी ललन राय, चुनमुन गु्पता, रवि कुलभूषण, गोपाल राय, किशुनदेव शर्मा, चंद्रशेखर बैठा, कृष्ण कुमार वैष्णवी आ कुछ स्थानीय लोग भिखारी ठाकुर के मुर्ति पर फूल माला चढ़ावल आ उनुका के श्रद्धांजलि दिहल. भिखारी ठाकुर के नाटक के प्रस्तुति भइल.

दुनिया भर में गूँजी अब भिखारी ठाकुर के वरासत

आ एह वरासत के गूंज सुनल जाई कल्पना पटवारी का आवाज में.

आसाम के लड़की भोजपुरी के लोकप्रिय गायिका कल्पना पटवारी ऊ काम कर देखवली जवना के कोशिश कबो कवनो दोसर गायक ना कइलन. कल्पना पटवारी के गावल गीत भिखारी ठाकुर के मूल गवनई के जस के तस परोसत बाड़ी सँ. जे भिखारीओ ठाकुर के सुनले बा आ कल्पना के एह नयका अलबम “दि लीगेसी आफ भिखारी ठाकुर” के सुनत बा ओकरा ई बात माने में इचिको हिचक नइखे होखत कि कल्पना भिखारी ठाकुर के गवनई से पूरा न्याय कइले बाड़ी. वइसे विशुद्धता वादी कह सकेलें कि एकाध जगहा कल्पना के उच्चारण जरूर गड़बड़ा गइल बा बाकिर एकर दोष हम कल्पना के ना देके ओकरा के देब जे एकर ट्रांसक्रिप्ट लिखले होखी.

भिखारी ठाकुर के जीवन के कहानीओ एह गीतन में मौजूद बा. उनुका जनम के कहानी, उनुका लड़िकाई के दिन, कइसे पाठशाला में मन ना लागल त भाग के बंगाल के मिदनापुर चहुँपले. फेर कइसे ओहिजा पेट पाले खातिर आपन पुश्तैनी धंधा, लोग के हजामत बनावल, शादी बियाह में नाई के जिम्मेदारी उठावल कइलें, आ एही बीच जब रामलीला आ बगाल के लोक नाटक जात्रा देखलें तब उनुका मन में एगो सपना जागल वइसने कुछ कर देखावे के. इहे सपना लिहले गाँवे लवटलें आ अपना दोस्त भगवान दास बनिया से अक्षर ज्ञान सीखलें जेहसे कि गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस पढ़ सकसु. जस जस पढ़त गइले राम में मन लागे लागल आ एक दिन जब अपना संगी साथियन के बिटोर कर के गांव मे पहिला बेर भोजपुरी में रामलीला के मंचन कइले त सगरी गाँव वाह वाह कर उठल. मंडली बनत गइल बाकिर देखते देखत नाच मंडली में बदल गइल. बाप महतारी के वर्जना रोक ना पवलसि भिखारी ठाकुर के आ ऊ चल दिहलें ओह राह पर जवना पर उनुकर सही मूल्याकन उनुका जिनिगी में त ना भइल बाकिर बाद में जरूर उनुका के भोजपुरी के शेक्सपियर के सम्मान दोसर केहू ना खुद दर्जन भर भाषा के ज्ञानी आ महान साहित्यकार पंडित राहुल सांस्कृतयायन दिहलें.

अब ओह महान भोजपुरिया लाल भिखारी ठाकुर के जीवनी आ रचना पेश करे के जीवट देखवले बाड़ी कल्पना पटवारी आ एह अलबम के गीत सुनला क बाद हम त इहे कहब कि कल्पना भिखारी ठाकुर के रचना से, उनका शैली से पूरा न्याय कइले बाड़ी. एह अलबम के संगीत आधुनिक होखला का बावजूद भिखारी ठाकुर के संगीत शैली के दोहरावत लागत बा. अलग बाति बा कि भिखारी ठाकुर के मर्दानी आवाज कल्पना पटवारी के आवाज में खोजल गलत होई. बाकिर हर भोजपुरी प्रेमी का घर मे एह अलबम के एगो कैसेट होखल जरूरी होखे के चाहीं आ ओहू लोग के जे भोजपुरी के बेंवत से सहमत नइखे. उहो लोग सुने कि भोजपुरी के मिठास कइसन होले.

एह अलबम के परिकल्पना खुद कल्पना पटवारी के बा. जे अपना आइकन भूपेन हजारिका के राह चलत भोजपुरी में वइसन आइकन खोजे निकलली त खोज आ के ठहरि गइल भिखारी ठाकुर पर. भोजपुरी में भिखारी ठाकुर ले बढ़ के कवनो लोक गायक नइखे भइल. जनता से जमीनी स्तर पर जुड़ल भिखारी ठाकुर जन भावना के, समाज के समस्या के जतना जियतार तरीका से पेश कइलन वइसन दोसर केहू ना कर पावल. एह जगहा महेन्दर मिसिर के नाम ना लिहल अन्याय हो जाई बाकिर महेन्दर मिसिर के रचना आ भिखारी ठाकुर के रचना अलगा अलगा स्तर पर बा. महेन्दर मिसिर जवन रचले तवन अपना प्रेम में ओकरा विरह में. भिखारी ठाकुर जवन रचलें तवन समाज के पीड़ा देख के, ओह पीड़ा के सहज समाधान खोजे का फेर में. एह मामिला में भिखारी ठाकुर के महत्व अतुलनीय हो जात बा.

कल्पना पटवारी के एह अलबम, “दि लीगेसी आफ भिखारी ठाकुर” के पिछला दिने लंदन में विश्व स्तरीय म्यूजिक कंपनी वर्जिन रिकार्ड्स, ईएमआई म्यूजिक का तरफ से रिलीज कइल गइल. दुनिया भर के म्यूजिक रिटेल आउटलेट, मॉल. आ प्लानेट एम के स्टोरन में बिकात एह अलबम के दाम एकसौ पंचानबे रुपिया राखल गइल बा. भोजपुरी के ई सबले महँग आडियो कैसेट अपना दाम से बेसी के वजन रखले बिया आ पूरा उमेद बा कि एह अलबम से भोजपुरी संगीत भोजपुरी के मौजूदा लोअर क्लास सर्किल से उपर उठि के मिडिल आ अपर क्लास ले आपन पहुँच बना ली.

भिखारी ठाकुर के रचना आ कल्पना पटवारी के आवाज के एह जुगलबंदी के सफलता खातिर अँजोरिया के हार्दिक शुभकामना बा.
– संपादक, अँजोरिया


एह अलबम का बारे में बेसी जानकारी खातिर

भोजपुरी अनुरागी आचार्य प्रतापादित्य के निधन

गोरखपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता, आनंद मार्ग के वरिष्ठ आचार्य, थियोसाफिकल सोसाइटी गोरखपुर के अध्यक्ष, गोरखपुर विश्वविद्यालय के विधि विभाग के पूर्व प्राध्यापक आ भोजपुरी साहित्यकार रहल आचार्य प्रतापादित्य के निधन काल्हु बुध का दिने भोर में हो गइल.

आचार्य प्रतापादित्य के जनम 24 मई, 1933 के विश्वनाथपुर (सरया तिवारी), विकास खण्ड खजनी गोरखपुर भइल रहे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए, एलएलबी कइला का बाद साल 1959 से गोरखपुर में अधिवक्ता बन के काम शुरू कइनी. साल 1966 से 1979 ले आप गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रवक्ता विधि रहनी. जागृति, भोजपुरी वार्ता समेत अनेके पत्र-पत्रिकायन के संपादन कइनी. आध्यात्मिक विषय पर आचर्य जी के दर्जनों पुस्तकें छप चुकल बाड़ी सँ.

आचार्य प्रतापादित्य के अंतिम संस्कार 2 मई के सबेरे राजघाट स्थित बैकुंठ धाम में आनंदमार्ग विधि से कइल गइल. सराध 4 मई के अरविंद आवास, बेतियाहाता में होखी.

उनासी बरीस के आचार्य जी लगातार भोजपुरी में लिखत रहीं आ कई अखबारन में उहाँ के लिखल भोजपुरी स्तम्भ प्रकाशित होत रहल.

आचार्य के निधन पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रह चुकल गिरिजाशंकर राय गिरिजेश आपन शोक जतवले बानी.

एह मनीषि के अँजोरिया के तरफ से हार्दिक श्रद्धांजलि

भोजपुरी कवि रामजियावन दास बावला के निधन

काल्हु पहली मई २०१२ के दुपहरिया नब्बे साल के बाबा रामजियावन दास बावला के लमहर बेमारी का बाद निधन हो गइल.

चकिया चंदौली के भीखमपुर गाँव मे एगो किसान रामदेव विश्वकर्मा का घरे माता सुदेश्वरी देवी के पहली जून १९२२ के जनमल पुत्र राम जियावन के पढ़ाई लिखाई में मन ना लागत रहे आ ऊ चउथा क्लास से आगा ना पढ़ पवलें आ भगवत भजने में मन लगा लिहलें. अपना बड़का बाबूजी रामस्वरूप विश्वकर्मा के संगति में ऊ रामायणिक बन गइले आ रामायण पाठ करे लगले.

भोजपुरी में कविता रचे आ गावे वाला रामजियावन कब अपना दोस्तन से मिलल नाम “बावला” अपना लिहले कहल ना जा सके. बाकिर बनारस के घाट पर नहाए गइल रामजियावन दास से एगो साधु पूछलसि कि कहवाँ से आइल बाड़े बावला ? आ उनुकर दोस्त तबहिए से उनुका के बावला कहे लगले.

रामजियावन दास के रामायण प्रेम का चलते आ राम से जुड़ल कविताई का चलते भोजपुरी के तुलसीदास कहल जाए लागल रहुवे. अपना अंतिम समय ले रामजियावन दास बावला अपना माटी, संस्कार आ भाषा से जुड़ल रहलें.

अपना वाचिक परंपरा का चलते बावला के अधिकतर रचना गाँव जवार के लोकगीतन में समात चलि गइल आ ऊ प्रकाशन आ प्रचार से दूरे रहलें. बाद में स्व॰ विद्यानिवास मिश्रा जी के प्रयास से बावला के गीतन के एगो संकलन “गीतलोक” प्रकाशित भइल रहे.

बावला के एगो गीत के मुखड़ा “कहवाँ से आवेलऽ कवना ठईयाँ जइबऽ बबुआ बोलत ना, के हो देहलसि तोहके बनवास बबुआ बोलत ना” रउरो सुनले होखब.

बावला के रचना के कुछ अउर बानगी एहिजा देखीं.

तोरि के पाताल के आकाश में उछाल देब
ढाल देब पानी-पानी पूरा एक दान में।
बाहु बल बिधि क बिधान हेर फेर देब
का करी अकाल जान डाल देब जान में।
धानी रंग धरती क रंग नाहीं उतरी त
उतरी कब उतरी सोनहुला सिवान में।
रूठ जाय अदरा औ बदरा भी रूठ जाय
भदरा न लगइ देब खेत खलिहान में ।।

भा फेर गाँव गिराँव के चरचा देखीं.

पग पग धरती सिवनवा क नापइ देहियाँ क सुधि नाहीं फटहा झिंगोला ।
तपनी थिथोर होय सँझवा के दर दर बुढ़ऊ क कहनी सोहाय भर टोला।
उँखिया क रस कोल्हुवड़वा बोलावइ गुड़वा सोन्हाय त उमगि जाय चोला।
गँवई क गाँव जहाँ दिन भर चाँव माँव धूरिया लपेट के फिरैलैं बम भोला।।

एह भोजपुरी प्रेमी के अँजोरिया के श्रद्धांजलि.

कवि सम्मेलन आ स्व॰ गणेशदत्त ‘किरण’


(स्मरण – आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’)
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 9वी प्रस्तुति)

– रामजी पाण्डेय ‘अकेला’

‘किरण’ जी का बारे में, हमार छोटकी चाची जे बसाँव के स्व॰ बृजा ओझा के बेटी हई, बतवली कि – ‘बैरी के ‘गनेशदत्त तिवारी’ भोजपुरी में बड़ा निमन कविता लिखेले आ बड़ा जोश में गावेले’. हम पता लगवलीं त ‘किरण’ जी हीत नाता के दायरा में आ गइले. पहिली मुलाकात ‘किरण’ जी से हमरा बिहिया कवि सम्मेलन में सन् 1968 में भइल. ओहिजे स्व॰ कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र जी’ हमनी दूनो आदमी के परिचय करवले. ओही सम्मेलन के दरम्यान हमहन में इयारी बढ़ल, जवन उनका मरते दम तक रहल. कवि सम्मेलन खतम भइला के बाद हमनी के खियाइ के एगो छोटे कोठरी में जमीन पर चारि गो बोरा बिछा के आयोजक के एगो कार्यकर्त्ता कहलसि कि – ‘रउवां सभ एही में आराम करीं, हम फेरू सबेरे आके विदाई कइ देबि’. हमनी का प्रतीक्षा करे लागलीं जा कि जाड़ के दिन बा त कवनो ओढ़ना-बिछौना ले आई. बाकिर ओकरा त आवहीं के ना रहे से नाहिये आइल. आध घंटा तक प्रतीक्षा कइला के बाद ओही सीलन भरल कोठरी में बोड़ा के बिछौना पर हमनी का दूनो आदमी आपन दूनो चादर साटि के सुते के प्रयास करे लगनी जा. मगर जाड़ा नीचे-ऊपर से अतना लागत रहे कि नींद आवे के सवाले ना रहे. काहें कि जाड़ से डेरा के उँघई महरानी विद्रोह कइ देले रही. जब जाड़ा से परेशनी ज्यादा बढ़े लागल त हम ‘किरण’ जी से कहलीं – ‘मरदे हमनी का त इहाँ जाड़े कठुआ जाइबि जा. तीन बजत बा. चलीं जा स्टेशन, चार बजे गाड़ी मिली त हमनी का बक्सर पाँच बजे पहुँचि जाइबि जा. आठ बजे ले सुतियो लेबि जा.’ दूनों आदमी बिहिया स्टेशन आके बनारस एक्सप्रेस पकड़ि के पाँच बजे तक बक्सर पहुँचि गइलीं जा. ओघरी हम स्टेशन के पासे चीनी मिल में एगो डेरा 10 रु॰ भाड़ा प लेले रही. जब चीनी मिल बेचाये लागल त हम ओही डेरा के खरीदि के आजु मकान बना लेले बानी. हमनी के ओह कवि सम्मेलन में एको पइसा के बोहनी ना भइल. किरण जी के पता ना कउँवा कवि सम्मेलन रहे, बाकिर हमार त पहिलके रहे.

दूसरकी घटना भलुनी भवानी में भइल. ओहिजा देशहरा में अष्टमी के दिन मेलों लागेला आ ओही धकाधुकी में ऊहाँ के लोग एगो विशाल कवि सम्मेलनो करा देला. ‘किरण’ जी कई साल से ऊहाँ आदर के साथ बोलावल जात रहन. सन 1972 में हमनी तीन आदमी के ‘किरण’ जी कहले कि तहनियो लोग चलऽ जा काहें कि ओहिजा के आयोजक का ओरि से हमरा पर जिम्मेदारी सऊँपल बा.’ हमनी का ओही दिन आठ बजे बक्सर से मोटर साइकिल से पयान कइनीं जा, बाकिर अभाग्यवश जवना राजदूत पर ‘किरण’ जी चढ़ल रहन ऊ मोटर साइकिल कोचस में करीब साढ़े नव बजे अड़इल घेड़ा नियन अड़कि गइल, लाख किक मरलो के बाद स्टार्ट होखे के नाम ना लिहलसि. कवि सम्मेलन होखे के समय दस बजे दिने में राखल रहे. दस बजत देखि के ‘किरण’ जी बेचैन हो गइले. काहें कि कवि सम्मेलन के संचालन उनके करे के रहे.

कहले – ‘का हो ‘अकेला’ अब त ईज्जति दाँवपर लागल बा. कइसे पहुँचल जाई ?’

हम कहलीं – ‘हमार भिकी ना धोखा दीही, आईं, एकरे पर बइठीं. हम 11 बजे तक पहुँचा देबि आ ए लोग के छोड़ि दिहल जाव. ई लोग गाड़ी बनवा के आई.’ हमनी का भिकी से चलि दिहलीं जा. मगर वाह रे भाग्य आधा घण्टा के बादे ‘किरण’ जी के एक कुंतल के बोझा ढ़ोवे से हमार भिकी जबाब दे दिहलस. भलुनी से दस किलोमीटर पहिलहीं गरम होके बन हो गइल. बन भइला के बाद ‘किरण’ जी के चेहरा के बेचैनी आ घबड़ाहट देखे में आवत रहे. ‘किरण’ जी कहले – ‘का हो अकेला अब का होई ? अब त लागता कि हमनी का ना पहुँचबि जा.’ हम सांत्वना देत कहलीं – ‘घबड़ाई मति, उपाइ करऽतानी’. अतना कहि के हम आपन गमछी पानी में भेंइके ले अइनी आ भिकी के इंजिन में लपेटनी. दस मिनट के बाद स्टार्ट कइलीं त ऊ स्टार्ट हो गइल. ‘किरण’ जी के चेहरा गुलाब नियर खिलि गइल. फेरू हम ओकरा के बीस कि.मी. के चाल से चलावत आधा घंटा के बादे याने करीब 11.30 बजे तक कवि सम्मेलन स्थल पर पहुँचलीं जा. ओनियो आयोजक के ‘किरण’ जी के ना पहुँचला से मुँह में लावा फूटत रहे. सामियाना में करीब बीस हजार श्रोता कवि सम्मेलन शुरू होखे खतिर परेशान रहलन.

कवि सम्मेलन के अध्यक्षता नामी गिरामी भोजपुरी आ हिन्दी हास्यरस अवतार रामेश्वर ‘कश्यप’ ‘लोहा सिंह’ के करेके रहे. उनका सासाराम से आवे के रहे. ऊ अपना जीप से नवे बजे पहुँचि गइल रहन. एह से स्टेज पर विराजमान रहन. जाते स्टेज पर ‘किरण’ जी के भरि अंकवारी धइके कहले – ‘का मरदे अतना देरी क के अइल हा जा. तहरा बिना कवि सम्मेलन शुरू ना कइल जात रहल हा.’

एकरा बाद कार्यक्रम के अनुसार कवि सम्मेलन शुरू भइल. जमल भी, लोग हास्य, वीर, शृंगार रस में पाँच बजे शम तक सराबोर होखत रहल. पाँच बजे के बाद हमनी के ठहरे आ चाय-नाश्ता के व्यवस्था एगो स्कूल में कइल गइल रहे. खइला-पियला के बाद रात खा ‘लोहा सिंह’ के छोड़ि के हमनी करीब बीस गो कवियन खातिर स्कूल के एगो कमरा में नीचे जमीने पर एगो बड़का दरी बिछावल रहे, तवने पर आग्रह से कहल लोग कि – ‘एही पर रउवा सभ आराम करीं आ हमनी का रउवा सभे के सबेरे, सात बजे तक चाय-नाश्ता कराके बिदाई कइ देबि जा.’ सबेरे आयोजक लोग बड़ा प्रेम से ‘किरण’ जी के पचास गो आ हमरा के पचीस गो रुपया थम्हाइ के हाथ जोरि लिहल. ओह घरी हम अपना भिकी में बीस रुपया के पेट्रोल भरा के गइल रहीं. त समझीं हमार मेहनताना मात्र पाँच रुपया मिलल. जमीन पर सुतला से देंहि अकड़ि गइल. पीठी के हड्डी में दूनों आदमी के दरद हो गइल. कोचस आ के हम पाँच रुपया के दवाई किनि के अपने आ ‘किरण’ जी के खिअवलीं ताकि दरद जल्दी ठीक हो जाउ. तबे से दूनों आदमी कान धइनी जा कि अब भलुनी भवानी के कवि सम्मेलन में ना जाइल जाइ. कई बार लोग ओकरा बादो बोलावे आइल बाकिर हमनी के जे कसम खइलें रहलीं जा ऊ ‘किरण’ जी के मरे तक निबहल.

तिसरकी घटना बलिया सतीशचन्द्र डिग्री कॉलेज के बा. हमनी के चेला अखिलेश भट्ट ओघरी ओही कॉलेज के विद्यार्थी रहे. ओही कालेज के डॉ॰ आद्या प्रसाद द्विवेदी पटना आवे जाये के दरम्यान हमरा किहां ठहरत रहन. एही से हमरा साथे ‘किरण’ जी आ पीयूष जी के बोलावे के प्लान बनल. ‘किरण’
जी किहाँ खबर आइल ‘अकेला’ जी आ ‘पीयूष’ जी के जरूर ले के आइबि. रउवा सभ के खरचे-बरच दियायी.

हम अपना राजदूत में पचास रुपया के तेल भरा के ‘किरण’ जी आ ‘पीयूष’ जी के लेके ओह कवि सम्मेलन में पहुँचलीं. कवि सम्मेलन के संचालन मशहूर संचालक सूंढ़ फैजाबादी करत रहन. पहिले ‘किरण’ के ई कहिके बोलवले कि – ‘किरण जी तो शरीर से पहलवान एवं वीररस के बेजोड़ कवि हैं मगर उपनाम से स्त्रीलिंग हैं. अब आप इनकी कविता से सराबोर होइये.’ ‘किरण’ जी एक हाजिर जबाव आदमी. माइक पर जाते बोलले – ‘रउवा सभ ना जानत होखबि कि सूंढ़ फैजाबादी के नाम काहें पड़ल ? त हम बतावतानी. सूंढ़ फैजाबादी के जनम फैजाबाद के हाथीखाना में भइल रहे. एही से इनकर नाम इनकर माई-बाबू सूंढ़ फैजाबादी राखि दिहले.’ अतना सुनला के रहे कि – हाल ताली से गड़गड़ा उठल आ लोग हँसत-हँसत दोबर होखे लागल. एकरा बाद ‘किरण’ जी अपना वीररस के काव्य ‘किरण बावनी’ के गर्जना के साथ सुना के महफिल लूटि लिहले. हम इनका साथे पचासो कवि सम्मेलन में गइल बानी बाकिर कवि सम्मेलन के स्टेज पर इनका जोड़ के हिन्दी भा भोजपुरी में केहू कवि ना मिलल. एह तरी त दिनकर जी के राँची के स्टेज पर देखले बानी. उनुको के सुने के मोका मिलल बा बाकिर हमरा आजु तक इहे बुझाला कि अगर किरण जी कवनो बड़ा टाउन पटना भा दिल्ली रहिते त ‘दिनकर’ से कम नाँव ना रहित.

सूंढ़ फैजाबादी आशु कवि रहन. ऊ हमरा के ई कहिके परिचय दिहले कि – ‘ये अकेला हैं, इनका ‘अ’ हटाइये, केला बनाइये और खा जाइये, अब अकेला जी माइक पर आ जाइये.’ हाल में ठहाका लागल, लोग हँसत-हँसत बेहाल होखे लागल. जब माहौल शान्त भइल त हम कहलीं – ‘असली बात त सूंढ़ जी कहबे ना कइनी हाँ, इहाँ का ‘लाल किला एक्सप्रेस’ से आवत रहीं, हम ओह घरी मोगलसराय तार घर में काम करत रहीं. बलिया हमसे ओही गाड़ी से बक्सर उतरि के आवे के रहे. गाड़ी अइला पर जब आफिस से बहरी प्लेटफार्म पर अइनी त देखनी सूंढ़ जी थर्ड क्लास डब्बा के सामने भरुका में चाय लेके पियत रहन. एक बेरि इहाँ का बक्सर कवि सम्मेलन में आइल रहनी एह से हम पहचानि लिहलीं. पंजरा जाके प्रणाम – पाती कइला के बाद, पुछलीं कि – ’शायद रउवा बलिया कवि सम्मेलन में जा तानी ?’ ऊ ‘हँ’ में जवाब दिहले. हम बतलवनी कि हम इहँवे रेल में काम करीले. हमरो बलिया चले के बाटे. रउवा कवना डब्बा में बइठल बानी त ऊ जवाब दिहले कि – ‘एही सामने वाला थर्ड क्लास के डब्बा में बइठल बानी.’ ओह घरी रेलगाड़ी में थर्ड क्लास के सेकेण्ड क्लास ना बनावल रहे.’ हम कहलीं – ‘चलीं हमरा साथे फर्स्ट क्लास में. बक्सर तक कवनो परेशनी ना होई.’ दूनो आदमी आगा बढ़ि के फर्स्ट क्लास में बइठली जा. कुचमन स्टेशन आवे के पहिले हम लघुशंका करे पैखना घर में गइलीं. अभी ओही में रहीं तलक गाड़ी कुचमन में आके रुकि गइल. गाड़ी के रुकते दूनो ओरि से मजिस्ट्रेट चेकिंग खतिर पुलिस, टी॰टी॰ई॰ कइगो ओह डब्बा में चढ़ि गइले. सूंढ़ जी जब हमरा के ना देखले त पैखाना में जा के सिटिकिनी भीतर से बन कइके लुका गइले. हम जेवना सीट पर बइठवले रहीं, ओहिजा आके खोजे लगलीं त पता चलल कि पैखाना में गइल बाड़े. हमहूँ घबड़इली कि कहीं उनका के पकड़ि के उतारि मति लेले होखन स. एह से पैखाना के पासे दुआरी पर आके देखे लगलीं. त देखऽतानी कि दूगो पुलिस पैखाना के दरवाजा पीटत कहऽतारन स कि ‘निकलो बाहर नहीं तो हमलोग पैखाना का दरवाजा तोड़ देंगे एवं बाद में खातिर भी करेंगे.’

लाचार होके सूंढ़ जी दरवाजा खोलि के निकलले त टी॰टी॰ई॰ पूछलसि – ‘टिकट दिखइये’ सूंढ़ जी आपन टिकट दिहले. टी॰टी॰ई॰ बोलल- ‘थर्ड क्लास का टिकट लेकर फर्स्ट क्लास में चलते हो ? पेनाल्टी के साथ भाड़ा दो नहीं तो जेल जाना होगा.’ अतना कहला के बाद सूंढ़ जी कहले कि – ‘का तहार पैखनवा फर्स्ट क्लस हऽ ?’ इनकर बात सुनि के सभ हँसे लागल त हम टी॰टी॰ से कहनी कि – ‘इहाँ का हमरा साथे बानी’ त जान छूटल. हम लोगन से बतलवनी कि – ‘इहाँ का हास्य रस के कवि हईं. हमरे साथ बलिया जा तानीं. सूंढ़ जी के ई कहानी सूनि के हाल फेरु ताली से गड़गड़ाइल आ हँसी के फौबारा छूटल.’

शान्त भइला के बाद हम आपन एगो हास्य रस के कविता सुना के जब उनका पासे आके बइठलीं त ऊ कहले – ‘हम त तहरा के केला बनवले रहली हाँ बाकिर तू त हमरा के पैखना में घुसा दिहलऽ.’ एकरा बाद कहले कि – ‘तुम दोनो की जोड़ी कमाल की है. अब तक संचालन के दरम्यान, इतना पलटवार हम पर किसी ने नहीं किया, जितना तुम दोनों ने किया है.’

कवि सम्मेलन खतम होखला के बाद आयोजक लोग हमनी के एक सौ पचहत्तर रुपया दिहले, जवना में हम पचास रुपया पेट्रोल के निकालि के पचास गो ‘पीयूष’ जी के आ ‘किरण’ जी के पचहत्तर गो दे दिहलीं. रात में ‘पीयूष’ जी ओही घरी जीप से बक्सर आ गइले बाकिर हमनी दूनो आदमी अखिलेश भट्ट के डेरा पर खा-पी के सुतलीं जा आ सबेरे मोटर साइकिल से घरे लौटि अइलीं जा.

संस्मरण बहुत बा बाकिर एह अंक में अतने नाहीं त पत्रिका में जगहो मिलल मुश्किल हो जाई. अन्त में – हो गइल सूना ‘किरण’ बिन, आजु बक्सर के माटी. का पता कब, के जनम ली, एह कमी के आके पाटी?


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

केसर के गंध लेके पुरवा चलल रहे


(स्मरण – आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’)
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 8वी प्रस्तुति)

– प्रभाष कुमार चतुर्वेदी

(आखिरी पाँच बरिस)

कविता केसर का गंध जइसन मादक आ पागल बनावे वाली होले. कवि के रचना पर कवि अपना आ पाठक लोग साथे सुनवइयो लोग के पागल बना देला –
केसर के गंध लेके पुरवा चलल रहे
देखलीं त तहरा घर के खिरकी खुलल रहे.

कवि जी प्रकृति का जर्रा-जर्रा में कन-कन में भगवान के दिहल गंध क मजा लेत बाड़न. कवि जी प्रेमी, कविता प्रेमिका. ईश्वर के एह करिश्मा के, के समझा पावेला ? लछुमन, राम क भई रहलन, बाकिर उहो राम क चरित के ना समझ पवलन. कविता क लोच, लचक पर कवि खुद कैस अइसन पागल रहन. एही चाल पर एही अदा पर त कैस निछावर हो गइल.

प्रेमिका के शरीर के छूके जेवन पुरवा चली ऊ प्रेमिका का शरीर क सुगंध लेके चली. जहाँ कवि प्रेमी होखे, कविता प्रेमिका होखे ओहिजा कविता का सुगंध से कवि काहें नाहीं कैस हो जाई ? कवि मजनू हो जाला, कविता लैला.

हमार गुरुदेव ‘किरण’ जी अन्हार के खतम करे खातिर आ भोर लिआवे खातिर जिनगी भर जुझलन. बुला अन्हार अन्हेरे के कहल जाला. जुलम का कारन पढ़ाई छूटल. कालेज आ विश्वविद्यालय क मुंह ना देखलन. हमरा विचार से विद्या स्त्री ह. स्त्री मोह-माया बंधन ह. ज्ञान पुरुष ह. मुक्ति-मोक्ष ज्ञान से मिलेला. अज्ञान के तम के अन्हेर के ज्ञान क एगो किरन भगावेला दूर बहुत दूर. अपना गुरु के हम ज्ञानी मानींला. गुरुजी रहलें – आचार्य, ज्ञानी आ महापंडित.

‘किरन’ जी मुअलन आ मरि-मरि के जियलन. अपना आन-बान खातिर, अपना इज्जत आ शान खातिर, समाज के रक्षा खातिर ऊ रोज-रोज मर मिटत रहलन. अउर जे कही कि किरन जी मर गइलन तऽ ओके हम ‘नासमझ’ कहब. किरन रोजे आपन उजाला भोरे से फैलाई. जब तक धरती आ सृष्टि रही, किरन आपन उजाला फइलावे वाला धरम, अन्हेर मिटावे वाला करम ना छोड़ी. किरन के साहित्य जुग-जुग आपन धरम-करम निबाही. साहित्य के हर विधा – नाटक, उपन्यास, लेख, कविता, समालोचना, गजल, रूबाई, मुक्तक, सानेट, प्रबंध-काव्य, खण्ड-काव्य, हाइकू आदि पर उनकर समान अधिकार रहे.

‘किरन’ जी से पहिला बेरी मुलाकात सन् 2005 में मई-जून के महीना में भइल रहे. मुलाकात के कारन रहे गोरखपुर विश्वविद्यालय में एम॰ए॰ अन्तिम वर्ष में लघु शोध के रूप में हम ‘किरन’ जी के व्यक्तित्व आ कृतित्व“ विषय चुनले रही. ‘किरन’ जी के विषय में, उनका गीत लेखन के विषय में, हम बचपने से सुनले रहीं. मन में भोजपुरी भाषा आ कवि के प्रति भाव रहे, जवन अवसर पावते फूट पड़ल आ उनुका पैतृक गाँव बैरी पहुँच गइलीं.

‘किरन’ जी से जब संवाद भइल कि हम आप पर लघु-शोध करे आइल बानी त उहाँ के विषय पुछलीं. विषय ‘व्यक्तित्व आ कृतित्व’ बतवते उहाँ के इंकार क देनीं. कहलीं बाबू भोजपुरी में एकएगो अगड़घत्त कवि बा लोग, तहरा के हमहीं मिललीं हाँ ? एकरा बाद जब हम जिद्द कइ के पूछे लगलीं त उहाँ के खड़ी बोली में आपन परिचय एह रूप में दिहलीं
किसी संतप्त का टूटा हुआ अरमान हूँ मैं,
नदी के पेट का डूबा हुआ जलयान हूँ मैं.
बुझी-सी वर्तिका हूँ दीप की, जैसे उपेक्षित,
घृणा के योग्य लेकिन हूँ नहीं, इन्सान हूँ मैं.

हमरा मन में अउर कुछ पूछे के आवेग रहे. तब तक उहाँ के कहलीं, अउर जानल चाहऽत बाड़ऽ ?
किसी चक्रान्त का निष्कर्ष हूँ, परिणाम हूँ मैं
प्रभा के शून्य-सा अपकर्ष का आयाम हूँ मैं.
अनल का एक कण, जो दब गया प्रतिकूलता से,
उसी प्रतिकूलता का क्षीण अंग अनाम हूँ मैं.

कवि के प्रति हमार अउर जिज्ञासा बढ़ल. ऊहाँ के आपन अंतिम लाइन में जवन परिचय देहलीं उहे उहाँ के परिचय आ साहित्य के उत्स भूमि हऽ.

हमार नाम वैरागी हऽ बाकिर हम किरन जी से मिललीं त उहाँ के साँचो के वैरागी पवलीं. मान-सम्मान से बहुत दूर सादा जिनिगी बसर करे वाला संत. छल-प्रपंच से दूर. प्रशंसा आ निन्दा से दूर. सहृदय मनीषी. हमरा के शिष्य त बनवलन, बाकिर अतिथि सत्कार कइला का बाद. भरपेट स्वादिष्ट भोजन, ठंढा-गरम सब कुछ खिअवला-पिअवला का बाद.

‘किरन’ जी अपना धर्मपत्नी के नाम ना लेस. ऊ हमेश उनके ‘लिलिया के माई’ कह के सम्बोधित करस. किरन जी आ माता जी अपना जिनगी के छोट-बड़ घटना के हर बात खोल के बतावस हमरा से. कइसे दुराकांछी लोग कतल का केस में फँसवलन. कइसे उनकर प्रिय पुत्र के अभिमन्यु अस चक्रव्यूह में फँसा के कतल कइल गइल. कइसे ऊ पुलिस के दुश्चक्र में प्रताड़ित भइलन. कइसे किरन जी के दारोगा झूठा केस में बूट से मरलस ? घायल शेर, घायल योद्धा अस किरन जी थाना में दहाड़ मारत रह गइलन. कविवर के दुश्मन उनुका के डकैत साबित करे के प्रयास में रहल लोग. आजीवन कारावास के सजा करीब-करीब सुनिश्चित हो गइल रहे. एही बीच कविवर के रचना ‘अग्निपथ’ कोर्ट में लागल. जज एतना प्रभावित भइल कि कविवर बाइज्जत बरीं हो गइलन.

‘किरन’ जी अपना जीवन के अप्रिय प्रसंगन के हमरा से ना बतावसु, लेकिन किरन जी के धर्मपत्नी, (लिलिया के माई) ओह प्रसंगन के भी खुलके हमरा से बतावस. ‘लिलिया के माई’ हर घरी किरन जी के साथ देहली, अंतिम साँसो के उहे साक्षी बाड़ी. एक बार एगो प्रसंग में बतवली कि किरन जी पर एकबार कातिलाना हमला होखे वाला रहे. किरन जी शौच खातिर सुबह-सुबह घर से दूर सुनसान खेत में बइठल रहन. श्रीमती जी छत से देखली हमलावर दूर से आवत बाड़ें सऽ. ऊ बंदूक चलावे ना जानत रही, लेकिन फाँड़ में गोली आ हाँथ में बंदूक ले के तेजी से बढ़ के शौच करत किरन जी के पीछे से गंजी खींच के बंदूक थमा दिहली. धाँय-धाँय गोलियन के गर्जन से सारा गाँव सन्न रह गइल रहे. किरन जी के जान लिलिया के माई एह तरे बचवले रही. आजो लिलिया के माई पचहत्तर बरिस के अवस्था में वीरांगना अस लागेली.

‘किरन’ जी के हम अपना गाँवें उनवाँस जवन हमरा से पहिले आचार्य शिवपूजन सहाय के गाँव हऽ, कई बार बोलवलीं. ऊहाँ के छोट-बड़ एकाध गो सम्मान सभ भी आयोजित करवलीं. एह आवाजाही में हमारा पिताजी पर गुरुदेव किरन जी आ किरन जी पर पिताजी दूनों जाना एक दूसरा पर एतना आकृष्ट भइलन कि पिता जी बार-बार किरन जी के घरे आ किरन जी पिताजी के पास आवसु.

गृहप्रवेश, शादी, तिलक का अवसर पर किरन जी हमार मुख्य अतिथि रहलीं. बड़े-बड़े विद्वान, अफसर, नेता, प्रोफेसर अक्सर आवसु, आ किरन जी के व्यक्तित्व से अभिभूत हो जाव लोग.

एक बार हमरा तिलक का अवसर पर गुरूदेव के साथे, जवन दुर्घटना हो गइल कि हमार पूरा परिवार सन्न रहि गइल. हम आज तक ओह अपराध बोध से निबट ना पवलीं. ऊ अपराध बोध हमरा के ‘किरन’ जी के अन्तिम समय में किरन जी से दूर कई देलस लेकिन किरन जी हमरा मन से कभी दूर ना गइलें. घटना ई भइल कि पूरा गाँव, तिलकहरू आ जवार के भोजन करवला के बाद करीब रात के 12 बजे परिवार के लोग भोजन करे बइठल रहे. गुरुदेव दालान में अन्य सम्मानित अतिथियन का साथे सूतल रहलीं. ऊहाँ के सेवा के जिम्मेदारी हमरा बड़ भाई ‘महात्मा’ के दिहल रहे. एतने में अचानक बरखा सुरू हो गइल. महात्मा जी अन्य अतिथियन के समुचित व्यवस्था करे में जुट गइलें. एही बीच किरन जी लघुशंका खातिर नाली पर जाए चाहत रहलीं. ऊहाँ के कई बार महात्मा-महात्मा आवाज लगवलीं. ओहिजा उपस्थित अन्य लोग ई ना समझ पावल कि किरन जी केके आवाज दे तानी. बड़ भाई महात्मा के घरेलू नाम बबलू रहे. किरन जी बड़ा उत्साही व्यक्तित्व के रहलीं. ऊहाँ के अपना अस्वस्थ शरीर आ कमजोर दृष्टि के दरकिनार कइ के खुद खड़ा होखल चहलीं, लेकिन दुर्भाग्य शरीर धोखा दे देलस आ ऊहाँ के दिवाल के भरम में तेज गति से चलत स्टैंड फैन में हाथ डाल देनी. पूरा पंजा पंखा में पड़ते चार गो अंगुरी कट के झूल गइली सन. खून के फौब्बारा से सारा बिछावन सराबोर हो गइल. डाक्टर के बोलवा के पट्टी बंधावल गइल. खून एतना बहे कि बंद होखे के नावें ना ले. मुख्य अतिथि किरने जी रहलीं. सब स्तब्ध रहे. किरन जी के दर्द घटावे वाली आ नींद क दवा खूब दिआइल. किरन जी कहलीं कि अब हम ना बाँचब. बाकिर तोहन लोग के हम आशीर्वाद देत बानी कि भगवान तोहन लोग क मंगल करसु. आ पिता जी से कहलें कि जेवन होखे वाला होला तेवन होला, विधि के विधान इहे रहल ह. तोहन लोग अपना मन में अपराध बोध मत रखिहऽ जा. सुबह किरन जी कुछ ठीक भइलीं त जीउ में कुछ सांस आइल. पिताजी बहुत दुःख का साथे माताजी (श्रीमती किरन) से घर में जाइके घटना के बतवनी आ दुआर पर किरन जी के देखे खातिर बोलवलीं. किरन जी समझलीं कि हमार परिवार अपराध बोध से घिर गइल बा. हमनीं के सहज बनावे खातिर सुबह किरन जी गा-गा के आँख चमका-चमका के हाँथ से अभिनय कऽ के आपन रचल गीत सुनवलीं. संयोग कि रात के नर्तकी महफिल में इहे गीत गवले रहे. माता जी (श्रीमती किरन) उहाँ के चुप करवावस आ कहस, का लड़िकचुल्ली कइले बाड़ऽ ? हिलला डुलला से फेरू खून बहे लागी. किरन जी कहलन- ‘का बोलऽताड़ू, जब गोली लगला से मउवत ना आइल तऽ हे अंगुरी छिछोहइला से मउवत ना आई.’

‘किरन’ जी के एगो अऊर प्रसंग हमके याद बा. एक बार हमरा दुआर पर विद्वान मण्डली के जमघट लागल रहे. किरन जी ओहू सभा में मुख्य अतिथि रहीं. उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ आई॰ए॰एस॰ विनोद शंकर चौबे, गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रख्यात इतिहासकार व साहित्यकार प्रो॰ माताप्रसाद त्रिपाठी, सागर विश्वविद्यालय के अ॰ प्रोफेसर डॉ॰ आशुतोष मिश्र, डॉ॰ धीरेन्द्र राय, डॉ॰ इन्द्रदेव राय, डॉ॰ अवधेश तिवारी, डॉ॰ महात्मा, श्री सुदर्शन पाण्डेय (प्रोफेसर साहब), डॉ॰ त्रिभुवन जइसन विद्वान साहित्यकार लोग उपस्थित रहे. दुपहर के भोजन के बाद साहित्यिक गलचऊरा सुरू हो गइल. हमरा बाबू जी के किरन जी से बोलवावे खातिर कुछ छेड़े के आदत रहे. ऊहाँ के किरन जी के सुना के कहलीं – ‘इतिहास कुछ ना हऽ. गड़ल कब्र खोद के निकालल, राजा-रानी क कहनी, खण्डहर आ टीला क कहनी हऽ. एके जानल आ ना-जानल बराबर हऽ.’ एह बात पर प्रो॰ माताप्रसाद त्रिपाठी जी कहनी – ‘ना ! एतने इतिहास ना ह, मानव सभ्यता क विकास क गाथा, कुशल शासन-प्रशासन के अध्ययन, आ जन कल्याण के उपाय के खोज इतिहासे बतावेला.’ पं॰ विनोद शंकर चौबे कहलन – ‘एतने ना. हमरा प्रशासन क खामी, गुण-दोष, दिश-निर्देशन, मार्ग-दर्शन इतिहासे से पता चलेला. देश में सुख-शंति कायम कइसे होई, ई उपाय इतिहास बताई.’

किरन जी मौन सधले रहीं. बाबूजी फिर आपन एगो बिना माँगल सलाह देहनीं – ”आप लोगन के चाहीं कि सरकार के सलाह देहीं जा कि हिंदी आ इतिहास क पढ़ाई बंद क देहल जाय.“ किरन जी – ‘ल ना ! ई काहें?’
बाबू जी – ‘कविता का हऽ’ – ”एगो झूठ कल्पना. नदी गावतिया, फूल हंसऽता, हिमालय सर उठवले बा, ई झूठ ना त का हऽ. कविता में रोवऽ, रोवावऽ, गावऽ, गवावऽ, ई कुल का हऽ. समय बरबाद कइला क सिवा ?“
किरन जी एकर जबाब दिहलीं –
इन्सान वही जो रोता है इन्सान वही जो हंसता है
गैरों के सुख-दुःख में न जिए इन्सान नहीं वो पत्थर है.

किरन जी अपना अंतिम समय में शारीरिक रुप से एकदम अशक्त हो गइल रहीं. कान, आँख, पैर, सभ जबाब दे देले रहे, खाली वाणी के ओज बचल रह गइल रहे. हम अपना चरित्रवन वाला मकान के गृहप्रवेश में ‘किरन’ जी के लेबे खातिर उहाँ के सोहनी पट्टी वाला मकान पर गइल रहीं. बाबूजी गृहप्रवेश के दू-दिन पहिलहीं गुरूदेव से आवे खातिर अनुरोध कइले रहीं. किरन जी हमरा किहाँ आवे खातिर बहुते उत्साहित रहीं. हम उहाँ के पीठ पर टाँग के घर से मुख्य सड़क तक ले अइनी आ फेरू रिक्श से आवास पर. गुरूदेव के ओह दिन के शान-बान एकदम निराला रहे. हांथ में सुन्दर छड़ी, सर पर काली टोपी. चमचमात कुर्ता-धोती पर काला जैकेट. कंधा पर पश्मीना के शाल. शाल के ऊपर एगो गोटादार झालरदार गमछा. साइत किरन जी का पोशाक का सामने ओह दिन पं॰ नेहरूवो जइसन पोशाक के सौखीन एकदम हवा हो जइतें. तिरछी काली टोपी, गरदन एगो विशेष अदा में तिरछा सहारा लेके. चलत खानी चाल में एगो गजब बड़प्पन झलकत रहे.

मकान पर पहुँचते ओहिजा उपस्थित सभ अतिथि लोग किरन जी के उठ के स्वागत कइल. बातचीत होखे लागल. जलपान के बाद पिताजी गुरूदेव के गला में एगो बड़हन फूलमाला डललीं.

पिताजी कहलीं – ‘भाभी जी में देवर के आधा हक होला कविवर. उनका गला में भी माला डाल देईं नऽ?’

गुरूदेव कहलीं – ‘अरे ! आपके आधा हक नाहीं पूरा हक बा. आधा हक त समाज देलहीं बा आधा आप वकील हईं लड़ि के लेइये लेब.’

‘तऽ आपकऽ आज्ञा बा नऽ ?

गुरूदेव – ‘हँ जी, आप उनका गर में जयमाल डाल देहीं आ ऊ आपका गर में जयमाल डाल देंसु, गनना त हम जानते बानीं कि आप लोग के पहिलहीं ले बनल बा.’ एकरा बाद दूनों जन ठठाके हंस देहल.
ना आरती उतारे मन्दिर में लोग जाई
ईमान अगर नर में तनिको बनल रहे..
हम दर्द सुनवलीं त सब मुस्कुरा उठल
कुछ लोग बतावल जे बढ़िया गजल रहे..
कुछ लोग बतावल जे भाष के दोष बा
एने त अपना मुँह पर बारह बजल रहे..

बेईमानी आ ढकोसला के खिलाफ किरन जी बिगुल फुंकले रहलीं जिनगी भर. जमाना से लड़लीं बाकिर झुकलीं ना. ‘मुंह पर बारह बजल रहे’ एगो क्रांतिकारी नारा हऽ, कविवर के. अभाव के जिनिगी में भी प्रशंसा आ निन्दा से दूर. जइसे कैस के जमाना पागल कहल, ओइसहीं किरन जी जिनगी भर पागल कहइलें. राणा प्रताप दर-दर ठोकर खइलन बाकिर अकबर के जै ना बोललन. प्रताप पागल रहलन आजादी के. कैस पागल रहे प्रेम के, किरन पागल रहलन राणा नियर आन के, कैस नियर लैला के, प्रिया कविता, प्रेमिका कविता आ सुन्दरी कविता खातिर.

लैला माने कालिख, किरन माने अंजोर, ज्योति, प्रकाश. जइसे रात के बिना दिन के अर्थ नइखे, वइसहीं लैला बिना कैस बेमानी बा. अइसनें अन्हार आ, किरन के सम्बन्ध बा. जग के अन्हार मिटावत-मिटावत किरन अमिट हो गइलन. उहां के चहितीं त खूब ठाढ-बाट के जिनिगी बीतित, बाकिर राणा के अरावली में भटकल पसन्द रहे. किरन जी अपना सिद्धांत से समझौता कबो ना कइलन.

किरन जी हमनी के छोड़ के चल गइलन, लोग अइसन कहत बा. हमरा त इ बुझाता कि किरन जी आजुओ कहीं नइखन गइल. ऊ उहें गइलन जवन मनुष्य के, जीवात्मा के अंतिम लक्ष्य होला.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

बावन गो बौना पर, एक किरन-बावनी


(इयाद)
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 7वी प्रस्तुति)

– आचार्य गणेश दत्त ‘किरण’


जन्म: मई 1933 मृत्यु : सितंबर 2011
गहिर संवेदना, इतिहास-बोध, पौराणिक लोक-परम्परा के समझ आ कल्पना-प्रवणता वाला आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’ भेजपुरी भाषा के प्रतिभाशाली आ समर्पित कवि-रचनाकार रहलन. भोजपुरी के भूषण नॉँव से चर्चित, ‘बावनी’ (1966) के कवि किरण जी के कवि-प्रतिभा आ कौशल के दर्शन उनका प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘अंजुरी भर गीत’, ‘सत्यपंथी’ (खण्डकाव्य) ‘रामचरित’ आ ‘महाभारत’ (महाकाव्य) में कइल जा सकेला. ‘विचार के तार’ उनकर निबन्ध संग्रह हऽ. बहुआयामी सृजनात्मक व्यक्तित्व के धनी ‘किरण जी’ भोजपुरी में पौराणिक, ऐतिहासिक भावबोध के कुछ बेजोड़ उपन्यास भोजपुरी के दिहलन. ‘धूमिल चुनरी’ (1980), ‘रावण उवाच’ (1982), ‘सती के सराप’ आ ‘तोहरे खातिर’ (1985) भोजपुरी उपन्यास-साहित्य के समृद्धि में रेघरियावे लायक विशेषता वाला उपन्यास बाड़न सऽ.



‘बावनी‘ के कुछ छन्द

दसों नोह जोरि सारदा से करीं अरजी हम
कलम के बनाइ आज हमरा लउर दऽ।
बहुत गीत गवलीं, अब गाइब लवटला पर,
भारत के अबहीं बचावे मउर दऽ।
पेकिंग पर जाइ बरसाईं अकासे से
हमरा के ऐटम के टटका भउर दऽ।
चाहे त, खउरे दऽ मुदई के नीके से,
नाहीं त हमरा के निपटे खउर दऽ।।1।।

एने पिया के बाँहि गर्दन में माला अस
ओने गुलामी के फंदा मुँह बावत बा।
एने करेजा में बान लगे नैनन के,
ओने सिपाही के करतब बोलावत बा।
माया के बन्धन ना रोकि सकल बीरन के
कवनो निसाचर कैलास गिरि उठावत बा।
तेजि के बिलास भोग कूदति समरांगन में,
धावऽ धावऽ कहि के हिमालय गोहरावत बा।।2।।

एक बेर सेल्यूकस चंद्रगुप्त पर दउरल
खूब जब कुटाइल, लुकाइल मचानी पर।
आखिर में बेटी ऊ, देइके बचवलस जान
पोंछ सरकाइ के पराइल पलानी पर।
एँड़ी के जगहा पर, अँगूठा हम दिहलीं ना
अइलीं लुटावत हम जान एक पानी पर।
उगिले अँगार जे ना आग भरल बोली सुन
बाटे धिरकार ओह जोश पर, जवानी पर।।3।।

मैकमोहन बुझिहऽ जे लक्षुमन के पारल हऽ
लाँघी से काहे ना खून फेंकि मरि जाई।
भरतमाता के जे, चाही चोरावल तऽ
काहे ना रावन, फतिंगा अस जरि जाई।
लागी केहुनाठ जामवंत हनुमान के तऽ
ठेहुना भर भूभुर में पेटकुनिये परि जाई।
कइलो अनेत भला निबहेला जिनिगी भर
पगरी से मोती के पानी उतरि जाई।।4।।

धइके कचारबि, लथारबि हम पटकि-पटकि
बान्हबि मुसुक दूनो बांहिन के चउर-चउर।
सरपट छोड़ाइ देब, थूर देबि लोल दूनो
ठेगन ठेठाइ देब हुमचि-हुमच टउर-टउर।
हिन्द महासागर में चीन के दबोरबि जब
बाँची ना जान तब लुकइला से दउर-दउर।
अपने त जइबऽ, ले जइबऽ खनदानो के
सबके चबइबऽ तूँ डाहि-डाह खउर-खउर।।5।।

धइके बिलार, जस मूस के दबोरेले
तोहरा के ओसहीं कचाक दे दबोर देब।
हमरा सिवाना में लात जे लगवलऽ त
केतनो केंकियइबऽ, हम तहके भँभोर देब।
आँख के देखावल बरदास कबो कइलीं ना
जानऽ कि आँख जे देखवलऽ त फोर देब।
गुरुये पर चेलाजी लंगी लगइबऽ त
धइला पर चीन्हबि ना, लादे खँखोर देब।।6।।

सूप से ओसाइ पंचशील उधियवले बा,
रात-दिन सपना ई देखत बा जूध के।
गदहा के यारी सनसनहट हऽ लातन के
बड़ भरी लबजा1 बा चेला ई बूध के।
दीक कइल चाहत बा, रहि रहि के डाहत बा
लाँघि के सिवाना दबेरत बा सूध के।
फोर देबि धइके फँफेली नकियवला पर
कबले रहबि भला धोवल हम दूध के।।7।।

भारत के ठाट-बाट ईजति-आ हुरमत तूँ
पूछऽ हुएनसांग से आ फेरू फाहियान से।
अपने पुरनियन से पुछलऽ ना कहलो पर
देखे ना पवलऽ, त सुनिये लऽ कान से।
सोझिया के सोझिया आ ढीठन के ढीठ हम,
लंगा के लंग बनि, कूटीले घानि से।
एक धूर लेबऽ का, देबऽ तूँ चार धूर
दूहीले दूध, गाय-करकट का थान से।।8।।

मारे के चाहे जे, ओकरे के मारीला
आँटेला ओकरा के समती भर आँटीले।
चिरई-चुरुंगो तक मुदई के चीन्हेला
निपटे मत जानऽ कि घास हम काटीले।
के-के पराइल बा, भारत से चोट खइ
पूछऽ तूँ खैबर आ बोलन के घाटी ले।
तखते उलाटीले, धरती के पाटीले
भहराइल कांखेलन, भर-भर मुँह माटी ले।।9।।

जोति भगजोगनी के आदित का आगा का ?
बउली के, सागर का आगा हहास का ?
पत्थल का आगा, के माटी के बात करो ?
कनइल के चन्नन का आगा सुबास का ?
सक्ती के आगा सरूप के बसाइल कब ?
चाउर के आगा, मुरेना के घास का ?
लेखा का भारत आ चीन देस दूनो के
बेना के आन्ही का, आगा बतास का ?।।10।।

खर्चे कंजूस, आ बिलारी से मूस डरे
फूस डरे आगि से, चिरई कुल पासी से।
दाबा से फेंड़-खूँटि, संकर से कालकूट
उरुवा अँजोरा से, चोर डरे खँसी से।
मोरन से साँप डरे, पानी से ताप डरे
पापी के गर्दन डरे न्याय का गँड़ासी से।
कुकुर लुकाठी से, जरते खोरनाठी से
ओसहीं थर-थर काँपे, चीन हिन्दवासी से।।11।।

नइखे चढ़ाई लद्दाख चुसुल नेफा पर
बूझऽ आजादी पर भारत का खतरा बा।
सोना का चिरई के चाहत बझावे के
लासा आ कम्पा से अपना, जगतरा बा।
कोठ भइल दाँत आ रँगाइ गइल ओठ तब
आग में हेराइ गइल कागज क पतरा बा।
छीपा भुलइला पर, खोजत बा गगरी में
मुँह भइल करिया, पोताइल अलकतरा बा।।12।।

रहिला जे होई बरियार अउर गोटहन त
भूँजत खा, फोरि कबो घाली भरसाँई ना।
देखत संसार एह करनी पर भरनी के
बदी से, नेकी के बायन दियाई ना।
झुठहूँ के गोंइठा में, घीउ के सुखवल बा
बखरा हिमालय में केहू के बाइ ना।
नीन कहीं-टूटल त, ना जाने का होई ?
बोली सियारन के, सिंह का सहाई ना।।14।।

सिहुर-सिहुर कइला से दुष्ट कबो माने ना
नीच जीव मानेला सीकम भर कँड़ला से।
पिटले पर झाँझ-डफ, ढोल-झाल बाजेला
बीजो अँखुवा जाला धरती में गड़ला से।
बुद्धी गँवारन के आवे ठेकाना में –
गाल में हुमचि के तमाचा का जड़ला से।
लातन के देव कबो बातन से मानसु ना
कुत्ता के पोंछि भला सोझ होई मँड़ला से ??15।।

चाहीं त पर्बत के फोरि महमंड दीहीं
चाहीं त धरती झकझोरि के हिलाइ दीं।
चाहीं त हाथी के देंहि बिधुनियाइ दीहीं
चाहीं त पत्थल में फूल हम खिलाइ दीं।
चाहीं त सूरुज के पच्छिम उगाईं हम,
चाहीं त माटी में, माटी मिलाइ दीं।
अहल-दिल चाहीं त ‘चाऊ’ का बापो के
रन में उठाइ तेग, पानी पियाइ दीं।।13।।

छेहर करछुटकू के छीलि-छालि छोड़बि हम
छक्का छोड़ाइ देबि छीन-छान छावनी।
लालन के रहत, केहू लीली ना लाल मोर
लहकि-लहकि लुतुकी लय लहराई लावनी।
पीढ़ा पर पटकी आ काटी छप-छप छपाक
पाटी पड़ोसी से पहाड़ी भूमि पावनी।
बुतरू का बेड़ा पर, बम बरिसी बीस लाख
बावन गो बौना पर, एक किरन-बावनी।।16।।


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

मूरख मिले बलेस्सर पढ़ा लिखा गद्दार ना मिले

(9 जनवरी के पहिला पुण्य तिथि पर)
बालेश्वर के बिना एक साल

– दयानंद पांडेय

बालेश्वर के बिना ई एक बरीस बहुते चुभन का साथे बीतल. दोस्ती त इयाद आइबे करेले. हर भिनुसहरा, हर सँझिया याद आवेले. बाकिर एह साल एतना सगरी नया घटना भइली स आ हर बेर बालेश्वर याद अइले. ऊ चाहे राजा, कलमाडी, कनिमोझी भा येदियुरप्पा वगैरह के जेल गइल होखो, मंहगाई, भ्रठियरपन, लोकपाल भा अन्ना के मुद्दा रहल होखो, भा उत्तर प्रदेश में धकाधक बीस गो मंत्रियन के बर्खास्तगी भा इस्तीफ़ा होखो. भा तमाम अउरी मसला. हर बेर बालेश्वर याद अइलन. एहले याद अइलन कि अगर ऊ रहीतन त एह मसलन पर उनुकर एकाध गो गीत आ गइल रहीत.व्यवस्था विरोध आ बदलाव के जवन गीत बालेश्वर ललकार के गावत रहले, ऊ गाना गावे वाला अब केहु नइखे रहि गइल. ठकुरसुहाती गाना आ गोंइयां, सइयां से आगे भोजपुरी गायकी के अगर भिखारी ठाकुर का बाद केहु ले गइल त ऊ बालेश्वरे रहले. ऊ त गावसु कि “दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार ना मिले” आ जइसे कि विसंगति के रेघरियावत रहले, “मूरख मिले बलेस्सर, पढ़ा लिखा गद्दार न मिले”. अब देखीं ना, अधिकतर पढ़ल लिखल लोगे देश आ समाज का साथे गद्दारी करत मिलत बाड़े. पता चली कि आक्सफोर्ड के पढ़ल हउवन आ करोड़ो अरबो के भठियरपन में डूबत उतरात बाड़न.

बालेश्वर के एगो गाना हवे, “नाचे न नचावे केहू पइसा नचावे ला”. जब ई गाना लिखले रहले बालेश्वर तब नरसिंहा राव प्रधान मंत्री रहले. सुखराम के घोटाला सामने आइल रहे आ चंद्रास्वामी के राजनीति में गरमाहट रहल आ घोटालो में. त बालेश्वर गावसु, “नाचे न नचावे केहू पइसा नचावे ला” आ फेरू जोड़सु कि, “हमरी न मानो सुखराम जी से पूछ लो”. फेरू ऊ चंद्रास्वामी अउर नरसिंहा राव ले आ जासु. बालेश्वर के गायकी दरअसल व्यवस्था के फुलौना में पिन चुभावत रहे. ऊ चाहे राजनीतिक व्यवस्था होखो भा सामाजिक कुरीति. ऊ हर जगहा चोट मारसु. व्यवस्था पर अइसन चोट अब भोजपुरी गायकी से नदारद बा. एही से बालेश्वर के इयाद आवत बा. बालेश्वर के एगो गाना ह, “मोर पिया एम पी, एम एल्ले से बड़का, दिल्ली लखनऊआ में वोही क डंका” आ जब ऊ एहमें ललकार के जोड़सु कि, “अरे वोट में बदलि देला वोटर क बक्सा ! मोर पिया एम पी, एम एल्ले से बड़का !” त चुनावी दलालन के चेहरा बरबस सामने आ जात रहुवे. “बाबू क मुंह जैसे फ़ैज़ाबादी बंडा, दहेज में मांगेलैं हीरो होंडा” भा फेरु “बिकाई ए बाबू बीए पास घोड़ा” जइसन गीतो बालेश्वर किहाँ बहुतायत में रहे. बालेश्वर असल में भोजपुरी गायकी में कबीर जइसन साफगोई अउर बांकपने खातिर जानलो जासु. से ऊ गाइबो करसु, “बिगड़ल काम बनि जाई, जोगाड़ चाही !” एक समय मंडल कमंडलो पर ऊ खूब गावसु. “फ़िरकापरस्ती वाली बस्ती बसाई न जाएगी” गावसु आ बतावसु कि “हिटलरशाही मिले पर मिली जुली सरकार ना मिले.” दलबदलुओं पर तंज करत एक समय ऊ गावसु “चार गो भतार ले के लड़े सतभतरी !” मंहगाई ले के उनुकर एगो तंज देखीं. “चंद्रलोक का टिकट कटा है, आगे और लडाई है, सोनरा दुकनिया भीड़ लगी है कोई कहता मंहगाई है.” ऊ त इहो गावसु “जब से लइकी लोग साइकिल चलावे लगलीं तब से लइकन क रफ़्तार कम हो गइल.” भा फेर “समधिनिया क पेट जइसे इंडिया क गेट” जइसन गानन में उनुकर गायकी के गमक देखले बनत रहे. “नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर के” जइसन गाना त उनुका के गायकी के माथ पर बइठा दिहलसि.

बालेश्वर असल में गरीब गुरबन के गायक रहले. खुदहु गरीब रहलन. दबाइल कचराइल समाज से आवसु से उनुकर दुखोसुख करीब से जानसु. आ उनुकर दुख सुख गाइबो करसु. “लोहवा के मुनरी पर एतना गुमान, सोनवा क पइबू त का करबू!” गीत में गरीबी के जवन दंश आ डाह के जवन डंक ऊ परोससु ऊ अविरल बा. भा फेर “हम कोइलरी चलि जाइब ए ललमुनिया क माई” गीत में बेरोजगारी अउर प्रेम के जवना कंट्रास्ट ऊ परोससु ऊ अदभुत रहे, अदभुत रहे उनुकर ई गीतो कि “तोहर बलम कप्तान सखी त हमरो किसान बा.” गंवई औरत के जवन गुरुर आ स्वाभिमान एह गीत में छलकत सामने आवत बा ऊ विरल बा. “बलिया बीचे बलमा हेराइल” जइसन विरह गीतो उनुका खाता में दर्ज बा, “आव सखी, चलीं ददरी क मेला” भा “अपने त भइल पुजारी ए राजा हमार कजरा के निहारी ए राजा” भा फेर “कजरवा हे धनिया” जइसन गीतन के बहारो बा. “केकरे गले में डालूं हार सिया बउरहिया बनि के” जइसन मार्मिक गीतो बालेश्वर किहाँ मौजूद बा.

बालेश्वर किहाँ प्रेम बा त प्रेम का बहाने अश्लीलतो भरपूर बा. “खिलल कली से तू खेललऽ त हई लटकल अनरवा का होई?” भा फेर “काहें जलेबी के तरसेली गोरकी, बडा मज़ा रसगुल्ला में” भा फेर “लागऽता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला”, “आलू केला खइलीं त एतना मोटइलीं दिनवा में खा लेहलीं दू दू रसगुल्ला”, भा फेर “अंखिया बता रही है, लूटी कहीं गई है” जइसन गीतनो के उनुका लगे कमी नइखे. ऊ मात रहले कि दुअर्थी भा अश्लील गाना गावल गलत ह बाकिर बाज़ार में बनल रहे खातिर एकरा के एगो तरकीब आ ज़रुरी तत्व मानत रहले. कहसु कि “जो यह सब नहीं गाऊंगा तो मार्केट से आऊट हो जाऊंगा. तो मुझ को पूछेगा कौन ? भूखों मर जाऊंगा.”

चाहे जवन होखे, बालेश्वर के गायकी अब भोजपुरी गायकी के धरोहर हवे. अलगा बाति बा कि उनुका निधन का बाद एक से एक लुभावन वायदा भइल. बड़का से बड़का नेता अइले आ चल गइलन तमाम वायदा करि के. अब साल भर बीत गइला का बादो भोजपुरी के एह अमर गायक का नाम से कवनो एगो पार्क, सड़क, मूर्ति भा स्मारक ना बन सकल. अउर भोजपुरी के ठेकेदारी करे वालन के, भोजपुरी के रोज ब रोज बेचे वालन के, भोजपुरी के दुकान चलावे आ भोजपुरी के राजनीति करे वालन के कबहु एकर चिंतो ना भइल. आ ओह बालेश्वर खातिर ना भइल जे अवध का धरती लखनऊ में भोजपुरी के झंडा गाड दिहलसि. आ लखनऊए में ना. सगरी दुनिया में भोजपुरी गायकी के परचम लहरवलसि. भोजपुरी गायकी के स्टारडम से नवज़लसि. भोजपुरी गायकी के ऊ पहिलका स्टार रहले. साले भर में लोग उनुका के बिसरा देव त ई का ह ? भोजपुरी भाषियन के ई कृतघ्नते ह, दोसर कुछ ना ! त का करब. ऊ त लिखिये गइल बाड़न कि “जे केहू से नाईं हारल से हारि गइल अपने से !”

जवन होखे, लोग उनुका के लाख बिसरा देव बाकिर जब ले भोजपुरी गायकी रही तबले बालेश्वर अमर रहीहें. बहुते सगरी कलाकार उनकुर गावल गीत पहिलही से गावत बाड़े. संतोष त एह बाति के बा कि उनुकर मझीला बेटा अवधेश अब उनुकर गायकी के विरासत के ना सिरिफ सम्हार लिहले बाड़े, बलुक उनुका संगी साथियन, साजिंदन, कलाकारन के पूरा टीम, प्रशंसकन, आ उनुका “परोगरामो” के सहेज लिहले बाड़न. उनुकर गायकी, उनुकर मंच, उनुकर कार्यक्रम सब कुछ. अवधेश के मंच पर गावत देखि के युवा बालेश्वर के याद मन में ताजा हो जाऽता. आ फेर बालेश्वर के इयाद आ जाऽता. उनुकर गायकी याद आ जातिया. “फगुनवा में रंग रसे रसे बरसे” उनुका गायकी के एगो अइसन बिरवा ह, अइसन होली गीत ह जवना में रंगो बा, रसो बा, आ रासो बा. फगुआ के ठु्नको बा आ ओकर मुरकी आ खुनकीओ. उनुका आवाज के मिठास के मिसरी मन में आजुओ फूटतिया. “अउरी महिनवा में बरसे न बरसे, फगुनवा में रंग रसे रसे बरसे, सास घरे बरसे, ससुर घरे बरसे अरे उहो भींजि गइलीं, जे निकले न घर से ! फगुनवा में रंग रसे रसे बरसे.” उनुकर ई गायकी अबहियो मन के पुकारेले. रई रई रई रई करि के मन बान्हि लेले, ऊ मरदानी अउर मीठ आवाज़ जवना में समाईल भोजपुरी माटी के खुशबू पागल बना देतिया. त उनुकरे बिरहा के ठेका में कहे के मन करत बा “जियऽ बलेस्सर, जियऽ !”


दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

भिखारी ठाकुर का गाँव में उनुकर जयन्ती समारोह

गदबेरा का बाद अतवार के रात भिखारी ठाकुर के गांव जगमगा उठल जब उनुका जयंती का मौका पर उनुकर लिखल मशहूर नृत्य नाटिका “बिदेसिया” के मंचन करके उनुका के श्रद्धांजलि दिहल गइल. जनकवि भिखारी ठाकुर लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक महोत्सव में भोजपुरी लोक गीत, नाच आ नाटक के सधल कलाकारन के प्रस्तुति का साथे भोजपुरी फिल्म जगत के कलाकारो लोग आपन कार्यक्रम पेश कइल. रात भर प्रोग्राम चलत रहल आ ओह लोग का आगा पूस के हाड़ कंपावे वाला पाला हार गइल. रात भर लोग जमल रहल.

भिखारी ठाकुर के बिदेसिया पेश करत जब उनुकर सहकर्मी रहल 84 साल के कलाकार गोपाल बिदेसिया बनके मंच पर उतरलें त उनुकर कला फेर से जवान हो उठल रहे. साथ दिहलें उनुके हमउमिरिया रामचन्द्र, जे प्यारीसुंदरी बनल रहलें. दुनु के संवाद आ सवाल जबाब के लटका सुनत लोग दंग रहुवे. भोजपुरी फिल्म जगत के कलाकारो देखले कि ओह जमाना के नृत्य नाटिका में कतना खासियत रहत रहल.

धोती पटधरिया पेन्हले, कान्हा पर चदरिया हो बबरिया झार के ना, लगनिया लगनिया लगनिया कहिया लागी सीताराम से लगनिया, इ राम नाम रस घोरी रे मन इहे अरज बा मोर., हमरा रही रही के देहिया में उठताटे देहिया में सुर वगैरह लोकगीतन के माध्यम से भिखारी ठाकुर के गांव के लोग का सोझा मलिकजी फेर जिंदा हो उठलें. एह मौका पर कलाकार वैष्णवी के प्रस्तुतियो शानदार आ सराहे जोग रहल.

समारोह के उद्घाटन विधान पार्षद लालदास राय कइलन. गीतकार आ संगीतकार से विधायक बनल विनय बिहारी खुदे पूरा कार्यक्रम के निर्देशन कइलें. एह मौका पर अनेके कलाकारन, समाजसेवियन आ कुछ पत्रकारन के भिखारी ठाकुर सम्मान से सम्मानितो कइल गइल. एह सम्मानित होखे वालन में विनय बिहारी, दिलीप जायसवाल, प्रदीप कुमार, अवधेश मिश्रा, ठाकुर संग्राम सिंह, श्रीराम तिवारी, राकेश कुमार सिंह, शिशिर कुमार सिन्हा, कवि असलम सागर, कैप्टन शिवजी सिंह, मनोज श्रीवास्तव वगैरह शामिल रहलें. समारोह के संयोजक रहलें ललन राय आ कृष्ण कुमार वैष्णवी.

स्टेशन आ पुल के नाम भिखारी ठाकुर का नाम पर

अतवार का दिने छपरा के विधि मंडल भवन-2 में भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के 124 वीं जयंती धूमधाम से मनावल गइल.एह मौका पर कवि गोष्ठी आयोजित भइल. अध्यक्षता राज किशोर गिरी कइलन. कवि गोष्ठी का बाद भोजपुरी कवि दक्ष निरंजन के शाल भेंट करके सम्मानित कइल गइल.

एह आयोजन में सरकार से माँग कइल गइल कि गोल्डेनगंज स्टेशन आ आरा छपरा पुल के नाम भिखारी ठाकुर के नाम पर राखल जाव.

भिखारी ठाकुर खातिर भारत रत्न के माँग

दिघवारा के रामजंगल सिंह कॉलेज में आयोजित समारोह में केन्द्र सरकार से लोक कवि भिखारी ठाकुर के भारत रत्‍‌न से सम्मानित करे के माँग कइल गइल. माँग कइलन भाजपा नेता अशोक सिंह.