भोजपुरी सरोकारन से जुड़ल पत्रिका भोजपुरी पंचायत

आजु जब भोजपुरी के पत्रिका प्रकाशन के स्थिति खराब चलत बा आ शायदे कवनो पत्रिका बिया जवना के नियमित प्रकाशन आ उहो समय पर हो रहल बा. एह दिसाईं दिल्ली से प्रकाशित होखे वाली पत्रिका भोजपुरी पंचायत बधाई के हकदार बिया कि अपना शुरुआत से अबले ओकर चारो अंक एकदम समय पर प्रकाशित होखत आइल बा.

हर नया अंक में एह पत्रिका के जुड़ाव भोजपुरी सरोकारन से बढ़ल जात बा. अलग बात बा कि साथही साथ पत्रिका के अपना व्यावसायिको हित के संरक्षण करे के पड़त बा. सब कुछ का बावजूद पत्रिका के कलेवर आ सामग्री के चयन में सुधार होखत बा. ई बात हम एहसे नइखी कहत कि अब एह पत्रिका में अँजोरिया पर प्रकाशित बतकुच्चनो के चुनल कड़ी प्रकाशित होखत बावे. अब एह पत्रिका में भोजपुरी रचना आ भोजपुरी सरोकार साफ झलके लागल बा. एह सब का बावजूद हमार निहोरा रही कि एह पत्रिका में विचारणीय विषय चाहे जवन राखल जाव साहित्यिक रचना भोजपुरीए में दिहल जाव त नीक रही.

सितम्बर के अंक अगस्त का आखिरी सप्ताह में नेट पर उपलब्ध हो गइल रहे. अगर एकरा के एक हफ्ता अउर विलम्ब से प्रकाशित कइल गइल रहीत त एहमें दिल्ली में पिछला २९ अगस्त के भइल धरना प्रदर्शन के खबर आ रपट सामयिक हो जाइत.

सब कुछ का बावजूद एह पत्रिका के सफलता खातिर अँजोरिया परिवार का तरफ से मंगल कामना हमेशा कइल जाई.

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बतकुच्चन ‍ – ७५


बेर, बेरा, बारी आ बारी. बारी दू बेर आइल एकरो कारण बा. जवन आगा चल के बताएब. बेर मतलब कि आवृति, माने कि हाली. कव हाली भा कव बेर. कतना हाली भा कतना बेर. बाकिर बेर बेरा के बिगड़ल रूपो हो सकेला. बेरा मतलब समय. सबेरा, गदबेरा, एहबेरा, ओह बेरा, अबेरा, कुबेरा वगैरह. एह सब उपयोग में बेरा के मतलब समय से बा. बाकिर ई बेरा बिगड़ के कई जगहा बेर हो जाला आ मतलब उहे रहेला. सबेर, अबेर, कुबेर, गदबेर, एह बेर, ओह बेर में मतलब आवृति से ना हो के समय से होला. कई बेर मतलब ना बदले बाकिर कबो कबो बदल जाला. जइसे कि कुबेरा के कुबेर कहला से हो सकेला कि कुछ भ्रम हो जाव. कुबेर देवता लोग के खजांची हउवें भा रहलें. एह बारे में हमार जानकारी, हर जानकारी का तरह थोड़ही बा. हम अपना के कुबेर माने कि कुबेरा में समेट के राखब. कुबेरा खातिर कई बेर अबेरा के इस्तेमाल कर दिहल जाला बाकिर ठीक से देखीं भा सोचीं त कुबेरा आ अबेरा साफ अलग अलग होला. जब कवनो बात बिना समय के, कुसमय में हो जाव त कुबेरा कहल ठीक रही. अबेरा देर खातिर इस्तेमाल होखे क चाहीं. काहे कि कवनो जरूरी नइखे कि जवन अबेरा बा तवन कुबेरो होखे. देर रात के बिना पहिले से बतवले कवनो हित पाहुन आ जाव त कहल जाला कि कुबेरा आ गइलें. बाकिर समय दिहला का बाद देरी से आवसु त कहे के चाहीं कि अबेरा अइलन, अबेर कर दिहलन. ई त भइल अबेर कुबेर के बात. चलीं थोड़ीका सबेर आ गदबेरो के बतिया लिहल जाव. काहे कि पता ना कवन कारण बा कि जब जब संसद के बइठका होखे वाला रहेला तब तब कवनो बात अइसन कुबेरा में हो जाला कि बइठकी में बवाल हो जाला आ संसद में जवन काम सेकराहे हो जाए के चाहत रहे ओकरा में अबेर होखे लागेला. सेकराहे मतलब जल्दी होला बाकिर कबो कबो कुछ लोग एकर इस्तेमाल सबेरे खातिर कर देलें. काल्हु सेकराहे चल अइह. मतलब त इहे भइल कि काल्हु जल्दी चल अइहऽ. ई ना कि सबेरे सबेरे आ के दुआर ठोके लगीहऽ. सबेरा के इस्तेमाल कई बेर अबेरा से उल्टा मान के कर दिहल जाला हालांकि होखे के ना चाहीं. अबेरा के सही विलोम सेकराहे होखे के चाहीं सबेरे ना. सबेरा के विलोम होला गदबेरा. गदबेरा खातिर कबो अबेरा भा कुबेरा के इस्तेमाल ना कइल जाव. गदबेरा त हमेशा अपना समय पर आवेला, जइसे कि सबेरा आवेला. ना त सेकराहे, ना अबेरा, ना कुबेरा. गदबेर के इस्तेमाल गोधुलि वाला समय खातिर होला. बाकिर हमरा समुझ से, अब चाहे ई समुझ कतनो कम काहे ना होखे, गोधुलि आ गदबेरा मे तनी फरक होला. गोधुलि ओह समय के कहल जात रहे जब साँझि बेरा लवटत गाय बैल के झुंड के खुर से उड़त गरदा गुबार साँझि के बढ़त अन्हार से मिल जुल के गदबेर बना देत रहुवे. गरदा जइसन समय गदबेर. वइसे अलग बाति बा कि देश के संसद में हमेशा गदबेरे जइसन माहौल बनल रहेला. काहे कि ओहिजा बेरा कुबेरा हमेशा लोग अपना खुर से गरदा उड़ावे में लागल रहेला. अब एह सब बाति में अतना बाति निकल आइल कि बारी आ बारी के फरक अगिला बारी.

भोजपुरी भाषियन से केन्द्र सरकार के धोखाधड़ी

संसद के पिछला सत्र में तब के गृहमंत्री पी चिदम्बरम भोजपुरी में एगो वाक्य का पढ़ दिहलन कि लागल सरकार अब भोजपुरी के ओकर जायज हक देइए दिहलसि. चारो ओर से नगाड़ा बाजे लागल. बाकिर अबकी के सत्र में विचार करे वाला विषयन में भोजपुरी के विषय शामिले ना रहल.

बिहार भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष प्रो॰ रविकांत दुबे केन्द्र सरकार के एह आचरण के धोखाधड़ी बतावत खुलासा कइले बाड़न कि केन्द्रीय गृहमंत्रालय भोजपुरी के मान्यता के सवाल लटकावे खातिर बिहार सरकार आ ओकरा माध्यम से भोजपुरी अकादमी से नौ बिन्दूवन पर जानकारी मँगवले बिया. जवन सवाल पूछल गइल बा तवनन के उलूल जलूल बतावत प्रो॰ दुबे कहले बाड़न कि एह तरह के बेमतलब सवाल पूछला से इहे लागत बा कि केन्द्र सरकार भोजपुरी के मसला लमहर दिन ले लटकावल चाहत बिया.

भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष प्रो॰ दुबे ओह सवालन के जानकारी देत कहले बाड़न कि केन्द्र सरकार जानल चाहत बिया कि बिहार सरकार के कवन कवन विभाग भोजपुरी के इस्तेमाल करेले, भोजपुरी लिपि में कतना विद्यार्थी कवन कवन विषय के परीक्षा देबेलें, कतना लोग भोजपुरी बोलेला, कतना प्राथमिक आ मध्य विद्यालयन में भोजपुरी पढ़ावल जाले आ कतना विद्यार्थी एकरा कक्षा में बाड़ें, सरकार कतना भोजपुरी शिक्षक बहाल कइले बिया, आ कवना स्तर ले सरकारी काम में भोजपुरी के इस्तेमाल होला. एह सवालन से केन्द्र सरकार के मनसा साफ पता लागत बा.

एह दिसाईं प्रो॰ दुबे कहले बाड़न कि भोजपुरी अकादमी भोजपुरी इलाका के ओह सांसदन के विरोध करी जे लोग संसद में भोजपुरी के सवाल पुरजोर तरीका से नइखे उठवले.


(भोजपुरी अकादमी के विज्ञप्ति से)

संविधान के अठवीं अनुसूची में भोजपुरी शामिल करावे ला जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन

पिछला २९ अगस्त का दिने दिल्ली के जंतर मंतर पर एगो बड़हन धरना प्रदर्शन कर के जोरदार ढंग से भोजपुरी भाषा के संविधान के अठवीं अनुसूची में शामिल करावे ला सरकार पर दबाव बनावे के कोशिश भइल. ई धरना प्रदर्शन पूर्वांचल एकता मंच, भोजपुरी समाज दिल्ली, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन आ भोजपुरी के अनेके संगठनन के अगुवाई में भइल. एहमें शामिल होखे ला देश भर से लोग आइल.

याद बा कि संसद के पिछला सत्र में तब गृह मंत्री रहल पी़ चिदम्बरम ई आस धरवले रहलें कि मानसून सत्र में भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता खातिर बिल संसद में पेश कर दिहल जाई. बाकिर मानसून सत्र में सरकार एकरा ला कवनो पहल ना कइलसि जवना पर नाराजगी जतावे खातिर जंतर-मंतर पर भोजपुरिया बुद्धिजीवी लोग आ भोजपुरी प्रेमी सामाजिक कार्यकर्ता ई धरना प्रदर्शन कइलें.

एह मौका पर बोलत सांसद उमा शंकर सिंह बतवलें कि एह बाबत ऊ आ सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी से मिलल रहुवे आ उनुका के सरकार के दिहल आस के याद करावल लोग. कहलन कि ई त हंगामा के भेंट चढ गइल लागऽता बाकिर विश्वास जतवले कि अगिला सत्र में ई मांग पूरा हो जाई. सांसद महाबलो मिश्र ने कहलें कि उहो एह मुद्दा पर नजर गड़वले बाड़न आ जी जान से लागल बाड़न अगिला सत्र में बिल जरूर पास हो जाई. भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे कहलें कि पिछलका सत्र में दिहल भरोसा का बावजूद एह सत्र के विचारणीय सूची में शामिल 32 गो बिल में भोजपुरी वाला बिल शामिल नइखे. अजीत दुबे सरकार से निहोरा कइलें कि भोजपुरी के ई माँग अगिला सत्र में जरूर पूरा कर दिहल जाव. पूर्वांचल एकता मंच के अध्यक्ष शिवजी सिंह के कहना रहल कि समय अब आर पार के लडाई के बा. सरकार आपन बात पूरा करे ना त गांव से लगायत दिल्ली ले जनांदोलन कइल जाई. अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के महामंत्री डॉ. गुरुचरण सिंह कहलन कि पिछला चालीस साल से चलत एह कोशिश के सरकार हलुका मत ले ना त भारी पड़ी. कुँअर वाहिनी के अध्यक्ष प्रो.जीतेन्द्र स्वामीओ धिरवलें कि सरकार भोजपुरी भाषा, साहित्य अउर संस्कृति के कमतर आंके के कोशिश मत करे आ जल्दी से जल्दी भोजपुरी के 8वीं सूची में शामिल कर देव.

एह प्रदर्शन में शामिल हजारों लोग के संबोधित करे वालान में पी़ एऩ पाण्डेय, वी पी सिंह, संतोष पटेल, मनोज भावुक, निगम पार्षद सत्येन्द्र सिंह राणा, मुकेश सिन्हा, संजय सिंह, निर्मल सिंह, मुकेश कुमार सिंह, एल एस प्रसाद, रामेश्वर सिंह, श्रीकांत यादव, श्रीकांत विद्यार्थी, विनोद श्रीवास्तव अउर अमरेन्द्र सिंह वगैरह शामिल रहलें.

प्रदर्शन के आखिर में प्रधान मंत्री, गृह मंत्री आ लोकसभा अध्यक्ष के भोजपुरी भाषा के संविधान के अउवीं अनुसूची में शामिल करावे बाबत ज्ञापन देके धरना खतम भइल.


(स्रोत समाचारन से)

कोयला त कोयले ह…

– सुशील झा

लड़िकाईं कें अधमुंदाइल आँखिन से अबहियों याद बा कि घर में कोयला प्लास्टिक के छोटहन बोरा में आवत रहे.

एगो चूल्हा होखल करे लोहा आ माटी के बनल जवना में लकड़ी आ कोयला डाल के हवा कइला पर आग जरत रहुवे. कोयला गोल ना रहत रहे. ओकर मुँह हमनिए लेखा टेढ़ मेढ़ बिना कवनो आकार के होत रहे.

जब कोयला जरे त ओहमें से सफेद धुआं उठे आ ओह धुआं से आंख जरे लागे. ओही धुंआ में हम परी बनावल करीं आ सोचल करीं कि बड़ भइला पर एही परियन से बिआह करब.

रात में जरत लाल कोयला पर रोटी फूलल करे. रोटी के ऊ सवाद हीटर आ गैस पर बनल रोटियन में कबो ना मिलल. जड़ाइल रातन में ई चूल्हा बड़ी काम आवल करे गरमावे ला, कोयला एक बेर जर जाला त देर लागेला ओकरा बुताए में.

कोयला के बोरा में कोयला टकराके बुकनी बन जाव त माई ओह बुकनी में भूसी मिलाके पिसान लेखा कुछ बनावल करे आ फेर ओह पिसान से पकोड़ा जइसन गुल्ला बनावल करे. फेर ओह गुल्ला के घाम में सूखा के कोयला का तरह इस्तेमाल कइल करे. कोयला के कण-कण कामे आ जाव.

कोयला के करीखा से हम डरातो ना रजनी काहे कि ऊ करीखा हमरा करिया देहि पर लउके ना. ओही घरी लड़िकाईं में एगो फिलिम आइल रहे जवना में अमिताभ बच्चन कोयला मज़दूर बनल रहलें. ओकरा बाद से हमार बाबूजी हमरा ला अमिताभ बच्चन हो गइल रहलें.

फेरू हीटर आइल, गैस आइल, कोयला छूटल, शहर छूटल आ हम शहर में कोशिश करे लगनी अपना देह के करीखा छोड़ावे के. हमरा का मालूम रहल कि कोयला उड़ के राजधानी ले आवेला. अलगा बात बा कि बारह सौ किलोमीटर के दूरी तय करे में कोयला के रंग सफेद हो जाला !

लुटियन के गलियन में आ नरीमन प्वाइंट चहुँपते कोयला के रंग बदलल जस लागेला. हमरा ला कोयला करिया रहल. राजपथ अउर नरीमन प्वाइंट पर कोयला के रंग झकझक उज्जर. एहिजा कोयला से लोग ना तो रोटी बनावे ना ही ओकर धुआं देखि के उनकर लड़िका नाचसु.

एहिजा कोयला के धुआं फेरारी अउर मर्सिडीज़ के रूप धइले उड़ेला. पांच सितारा होटलन में बड़का-बड़का सम्मेलनन में कोयला के नाम कोल हो जाला आ एह पर जवन रोटी सेंकाला तवना के राजनीतिक रोटी कहल जाला.

हमरा ई बदलल कोयला नीक ना लागे. हमार कोयला करिए ठीक रहल. एहिजा कोयला के उज्जर रंग आँखिन में गड़ेला. केहु कोयला के नाम भठियरपन आ घोटाला से जोड़े त हमार करेजा फाटेला. कोयला हमरा लड़िकाईं के खिलौना ह. हमरा बाप के मेहनत ह. हमरा मुंह के पहिला निवाला ह आ हमरा महतारी के मांग के सेनूर रहल बा.

कोयला बदनाम होखे, ई हमरा बरदाश्त ना होला बाकिर हम करिए का सकीलें.

हम त कोयला संग करिया हो गइनी. जे ताकतवर रहल ऊ कोयला के अपना साथे सफेद करे के कोशिश कइल बाकिर कोयला त कोयले होला…… कोयला के दलाली में मुंह करिये होखी उज्जर ना रहि पाई.


सुशील झा जी साल 2003 से बीबीसी में कार्यरत बानी बतौर रिपोर्टर. ओहसे पहिले दू साल पीटीआई भाषा में रहलीं. जेएनयू से एमए आ एमफिल हईं. पढ़ाई आ पालन पोषण झारखंड में भइल. सोशल मीडिया, धर्मनिरपेक्षता आ आदिवासी मुद्दन के अलावे समसामयिक मुद्दन में रुचि राखिलें.
सुशील जी के ब्लॉग बीबीसी पर नियमित रूप से प्रकाशित होत रहेला जहाँ से ई लेख लिहल गइल बा आ अनुवाद कर के पेश बा.

अँजोरिया के हमेशा से नीति रहल बा कि जतना संभव हो पावे तरह तरह के विचार पेश कइल जाव आ एही क्रम में सुशील झा जी के अनुमति से इहाँ के लिखल लेख के अनुवाद पेश बा.

मनोवैज्ञानिक जेहाद की साजिश‏

– पाण्डेय हरिराम

उत्तर-पूर्व के लोग लगातार दक्खिन भारत से भागत जात बा आ महाराष्ट्रो में बहुते तनाव बन गइल बा. ई सब देख सुन के देश भर के सही सोच वाला लोग परेशान बा अनेसा से बाकिर आम आदमी लाचार बा. देखत बानी जा कि पिछला 20 मई से इंटरनेट, सोशल मीडियन आ मोबाइल फोन अउर आई पैड के जरिये लुकाछिपी जिहाद चलत बा. एकर शुरुआत म्यांमार के राखिने प्रांत से भइल जहाँ बौद्धन आ राहिंगा मुसलमानन का बीच झगड़ा का बाद दुनु तरफ के नाहियो त अस्सी लोग मरा गइल.

रोहिंगा मुसलमानन के म्यांमार बंगलादेशी घुसपैठिया मानेला. एह झगड़ा का बाद बहुते लोग ओह इलाका के छोड़ के चल दिहल. बहुते बड़हन पैमाना पर भितरी विस्थापन भइल. आ तबहिए से भारत, बंगलादेश आ म्यांमार के कुछ अनचिन्हार कट्टरपंथी तत्व इंटरनेट आ सोशल मीडिया के जरिये म्यांमार सरकार के बदनाम कइल शुरू कर दिहलें आ मुसलमान समाज एकजुटता देखावे लागल. म्यांमार के प्रेजिडंट सीन थीन ओ आई सी के प्रतिनिधिमंडल से बतवलें कि कइसे सोशल मीडिया आ इंटरनेट के जरिये झूठ तस्वीरन आ मनगढ़ंत खबरन का आधार पर सरकार के बदनाम कइल जात बा.

दरअसल ई अफवाह खाली म्यांमारे के अस्थिर करे के साजिश ना ह, बंगलादेश के शेख हसीना सरकारो के हिलावे के षड्यंत्र ह. काहे कि हसीना सरकार रोहिंगा लोगन के बंगलादेश में घुसे पर रोक लगा दिहले बिया. साथ ही साथ ई षडयंत्र भारतो में मनमुटाव पसरावे के कोशिश बा. एहसे दुतरफा काम कइल जात बा. अगर हसीना सरकार कमजोर होखत बिया त जेहादी ताकतवर बनीहें आ भारत पर दबाव बना सकीहें. साथ ही भारतो अपना बवाल में अझुरा जाई. कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी ताकत आ समूह बाड़ी सँ जे रोहिंगा मुसलमानन पर जुल्मोसितम के बनावटी आ झूठ तस्वीर अउर ब्यौरा फइलावत बाड़ी सँ. एह तस्वीर आ ब्यौरन से मुसलमानन के मन तीत होखत बा आ ओह लोग में खीस उपजे लागत बा. असम में भड़कल हिंसा के विरोध में पिछला 5 अगस्त का दिने मुम्बई आजाद मैदान में भइल सभा के बाद के बवाल एही खीस के उपज रहल. सोशल मीडिया पर डालल तस्वीर आ झूठ ब्योरा से खिसियाइल लोग अपना मुस्लिम नेता लोग के भड़काऊ भाषण से अउरी पनपना गइल. भीड़ पुलिस पर हमला कइलसि, महिलो पुलिस पर हमला भइल, एगो सैनिक स्मारक तूड़ दिहल गइल आ मीडिया के लोग पिटाइल. मीडिया के लोग एह ला पिटाइल कि ऊ लोग सही बात नइखे बतावत. असल में त ओह भीड़ के अचेतन सोशल मीडिया पर डालल तस्वीर आ कहानियने के साँच मानत रहुवे. एहीसे ऊ लोग मीडिया के ब्यौरा के गलत मानत बा आ मीडिया पर खिसियाइळ बा. अनेके मुस्लिम नेता मुम्बई उपद्रव के निंदा कइले बाड़ें.

मुम्बई के बाद कट्टरपंथी दक्खिन भारत में आपन साजिश शुरू कर दिहलें. दक्खिन भारत में पूर्वोत्तर के बहुते लोग या पढ़ाई करत बा या काम काज. एहिजा ई अफवाह फैलावल गइल कि भारत सरकार चूंकि असम में रहत बंगलादेशियन के नागरिकता नइखे देर त एह इलाका में पूर्वोत्तर के लोगो के ना रहे दिहल जाई.

एहिजा गौर करे वाली बात बा कि ई मनोवैज्ञानिक जेहाद मजहब आधारित ना हो के इलाकाई आधार पर बा. जे लोग दक्खिन भारत भा मुम्बई-पुणे से भागत बा ओहमें सभे हिन्दूए ना ह, ईसाईओ लोग बा. अब ई लोग जब भाग के अपना विपदगाथा के साथ पूर्वोत्तर चहुँपी त साम्प्रदायिक तनाव के एगो नया लहर शुरू हो जाई. आजादी के बाद से उत्तर-पूरब के लोग आ भारत के शेष आबादी के मन में एगो खास तरह के मनभेद रहल बा जवना चलते तरह तरह के बगावत होत आइल बा. पिछला दस साल में ई बगावत के आग धीरे धीरे मेहराएल लागल रहे. पूर्वोत्तर के नवहियन के एगो बड़हन संख्या अपना के बाकी भारत से जोड़े लागल रहे जवना से बागियन के मिले वाला नवहियन के गिनिती घट गइल आ दोसरा तरफ ऊ लोग देश के दोसरा हिस्सा में जाए लागल. अब एह नया मनोवैज्ञानिक जेहाद से अनेसा बा कि कहीं फेरू से ऊ मनभेद वापिस मत लवटि आवे आ पूर्वोत्तर आ शेष भारत का बीच एगो बड़ आ चाकर खाई बन जाव. दुर्भाग्यवश हमनी के सुरक्षा एजेंसी सब एह मनोवैज्ञानिक जेहाद के समय पर अंदाजा ना लगा पवली सँ आ अबहियों दोषियन के खोह के बेकाम करे के कोशिश होत लउकत नइखे. जे लोग एह जंग के पसरावत बा ओहनी के जल्दि से जल्दि नेस्तनाबूद कइल चाहीं आ साथही भागत लोग का बीच सुरक्षा के भरोसा बनावल जाहीं ना त आवे वाला दिन बहुते खतरनाक परिणाम ले आई.

राजनीतिक गोलन का बीच एकजुटता के जरूरत

असम के कोकराझाड़ में रहवासियन आ घुसपैठियन के झगड़ा के कुछ मतलबी फिराक ओकरा के मुसलमानन का खिलाफ हिंसा के नाम दे दिहलें आ अफवाहन के चिंगारी छोड़ दिहलें जवन दावानल बन गइल बा. ई अफवाह बम सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय साजिश के हिस्सा ह. जवना तरह से एह साजिश के अंजाम दिहल गइल ओहसे सुरक्षा एंजेसी सकता में पड़ल बाड़ी सँ. आई बी के वरिष्ठ अधिकारी एह तरह के अभियान के बेहद खतरनाक बतावत बाड़ें. ओह लोग के कहना बा कि सोशल मीडिया के जरिए चलावल जात एह मुहिम के मकसद देश के मुसलमानन के खोंचियावल बा. एकरा पीछे लश्कर-ए-तायबा अउर आईएसआई के हाथ ना. सूत्र बतावत बाड़ें कि पिछला चार साल में लश्कर देश में अइसन जमात बना दिहले बावे जे हमेशा कुछऊ कर गुजरे के तइयार बाड़ें. एह आतंकवादी संगठनन ला खुलेआम काम करे वाला लाखों लोग हाजिर बा जवना में कुछ जनप्रतिनिधिओ शामिल बाड़ें.

एह बवाल में सोशल मीडिया के बहुते खराब भूमिका रहल बा. कुछ मतलबी लोग असम दंगा के एगो बड़हन सांप्रदायिक तनाव बनावे के कोशिश में लागल बाड़ें. बंगलोर से भागत लोग के कहना रहल कि उनुका एकर भरोसा नइखे कि वक्त पर केहु ओह लोग के मदद ला आगे आई.

बहुलतावादी संस्कृति में भरोसा राखे वाला लोकतांत्रिक समाज खातिर एहसे बेसी शर्मिंदगी के बात अउर का हो सकेला ? एहसे जरूरी बा कि जबले हालात पर काबू नइखे मिल जात तबले देश भर के पुलिस आ खुफिया एजेंसी बेहद सतर्क रहऽ सँ. राजनीतिको गोल ला जरूरी बा कि ऊ मुसलमान नेता लोग का संपर्क में रहस आ हालात सुधारे में उनकर मदद लेसु. ओज लोग के बतावल जाव कि असम आ दोसरा जगहन पर सरकार कवनो कदम उठावत बिया आ एकर राजनीतिक लाभ ना उठावल जाए. अगर कवनो मुस्लिम नेता एह सलाह के ना माने त पुलिस ओकरा पर कानूनी कार्रवाई जरूर करे आ बाकी राजनीतिक नेतृत्व एहमें दखल मत देव.

इहे ना सगरी राजनीतिक गोल एक जुट होके एह अफवाह के रोकसु आ देशवासियन में कानून में भरोसा पैदा करे के कोशिश करसु.

(20 अगस्त 2012)



पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.

आजादी के पैंसठवा सालगिरह पर राष्ट्रपति के सबोधन भोजपुरी में

हमार साथी नागरिक,

हमरा ला ई बड़हन सौभाग्य के बाति बा कि देश के आजादी के पैंसठवाँ सालगिरह पर देश में आ दुनिया के सैकड़ों कोना में रहत अपना साथी भारतीयन के संबोधित करे के सौभाग्य मिलल बा. एह महान पद पर बइठावे ला आपन लोग आ जनप्रतिनिधियन के पूरा आभार शब्दन में ना जतावल सके, ई बढ़िया से जनला का बावजूद कि अपना लोकतंत्र में सबले बड़हन सम्मान एह पद से नइखे बलुक एह देश के, अपना मातृभूमि के, नागरिक होखला में बा. अपना महतारी, देश भारत, का सोझा हमनी सभे बरोबर बानी जा आ हमनी के अपना से ई सवाल कइला के जरुरत बा कि राष्ट्रनिर्माण के जटिल काम में हमनी का आपन काम बढ़िया से, इमानदारी से, पूरा लगन आ संविधान के बनावल मूल्यन मे पूरा निष्ठा संगे निबाहत बानी जा.

आजादी का एह तारीख पर ई बाति याद राखल जरूरी बा कि साम्राज्यन का दिन में आजादी दिहल ना जात रहे, लिहल जात रहे. ई आजादी महान मनईयन के पीढ़ियन से हासिल भइल. जवना के नेतृत्व भाग्य के ताकतवर महात्मा गाँधी कइलें पूरा निस्वार्थ भाव से आ इतिहास में तबके सबले बड़हन ताकत का खिलाफ राजनीतिक सोच बदल देबे वाला अपना नैतिक बल का सहारे कइलें आ जवना के झंकार आजुवो दुनिया के बड़हन घटना में सुनात रहेला. अगर यूरोपियन उपनिवेशिकरण के शुरूआत अठारहवीं सदी के भारत मे भइल त एकर अन्त के संकेत साल १९४७ के जै हिन्द के सामूहिक नारा से भइल. विजय के निर्णायक गोहार सुभाष चन्द्र बोस के, जिनका के आजुओ हर हिन्दुस्तानी “नेताजी” के रूप में जानेला, नारा जय हिन्द से मिलल. पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबा साहब अम्बेदकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू आ अनेके लोग आजाद भारत के राह बनावल. ई महान लोग हमनी के काल्हु खातिर आपन आजु बलिदान कर दिहल. आ ऊ काल्हु आ गइल बा, आ हमनी के अपना से ई सवाल पूछल जरूरी हो गइल बा कि का हमनी का ओह महापुरुषन के दृष्टि के एगो राष्ट्र का तरह, एगो समाज का तरह सम्मान कइनी जा का?

जब नेताजी, ताप्ती का किनार भइल इण्डियन नेशनल कांग्रेस के ५१ वाँ अधिवेशन के राष्ट्रपति का तौर पर, हमनी के याद करवलन कि “हमनी के असली राष्ट्रीय समस्या गरीबी, अशिक्षा आ बीमारी हटावल बा”, तब हम एगो नन्हका रहलीं. नेताजी के कहल बात हमरा घर में गूंजल जइसे कि ई देश के लाखों करोड़ों घरन में गूंजल. हमार बाबूजी आजादी के लड़ाका रहलन आ ओह घरी जब आजादी एगो भ्रम जइसन लागत रहे हमनी का अपना में, अपना नेतवन में, अहिंसा के ताकत में, आ डर से बेडर भइल हिन्दुस्तानियन के साहस में भरोसा बनवले रखनी जा. बाकिर हमनी का तबहियों इ जानत रहीं, जइसन कि आजुवो जानत बानी जा, कि आजादी के मतलब रोटी आ सपना दुनु होखे के चाहीं.

नेताजी आ नेहरू जी मानत रहीं कि भारत समन्वयवाद, साम्यवाद के इस्तेमाल से, जवन कि उपर झापर देखत एक दोसरा के विरोधी लागेला, के सहारे भविष्य जीत ली. ओह लोग के भरोसा रहे कि आजाद भारत अपना आर्थिक समानता आ अलग अलग समुदायन का बीच गलतफहमी से उपजत झगड़ा मिटावत समन्वयवाद के सामाजिक आन्दोलन का सहारे उपनिवेश काल के बाद वाला दुनिया में वैकल्पिक उदाहरण बन के उभरी. मजहब के आजादी, लैंगिक आजादी आ सभका ला आर्थिक न्याय के बल पर भारत एगो आधुनिक राष्ट्र बन जाई. छोट मोट घटना एह सच्चाई के ना झूठला सके कि भारत एगो आधुनिक राष्ट्र बनत बा, हमनी के देश में कवनो संप्रदाय खतरा में नइखे, आ मरद मेहरारू के बरोबरी हमनी के समय के सबले बड़ हासिल बा.

हमार साथी नागरिक लोग,

हम निराशावादी ना हईं, हमरा ला गिलास हमेशा आधा भरल होला ना कि आधा खाली. हम त इहाँ ले कहल चाहब कि आधुनिका भारत के गिलास आधा से अधिका भरल बा. हमनी के उत्पाद श्रमिक वर्ग, हमहन के ताकत देत किसान वर्ग, जे अकाल ग्रस्त भूमि के अन्न के अधिकता वाला देश बना दिहल, हमनी के कल्पनाशील आद्यौगिक उद्यमी चाहे ऊ सार्वजनिक क्षेत्र में होखसु भा निजी क्षेत्र में, हमनी के बुद्धिजीवी, हमनी के शिक्षाविद्, आ हमनी के राजनीतिक वर्ग मिलजुल के अइसन आधुनिक राष्ट्र बनवलें जे कुछे दसेक साल में कई सौ साल वाला आर्थिक विकास आ अग्रगामी सामाजिक नियमन हासिल कर लिहल.

हमनी के जबले ई ना समुझब कि साल १९४७ में हमनी के कहाँ से शुरूआत कइनी जा तबले हमनी के एह बात के सही से ना समुझ पाएब जा कि हमनी का कतना आगा आइल बानी. जइसन कि जवाहरलाल नेहरू अपना भाषण आ लेखन में कई बेर बतवलन कि हमनी के देश तब गरीब ना रहल जब हमनी के आजादी छीन लिहल गइल रहे. का हम ई जोड़ सकीलें कि, केहू कवनो गरीब देश के जीते ला हजारन मील के सफर ना करे. तब के अंतर्राष्ट्रीय विद्वानन के दिहल आंकड़ा एह बात के झूठलावे वालन के चुप करे ला सुबूत बा. साल १७५० में, पलासी के लड़ाई से सात साल पहिले, दुनिया के २४.५ फीसदी उत्पादन भारत में होत रहे जबकि इंगलैंड में मात्र १.९ फीसदी रहल. दोसरा शब्द में कहीं त दुनिया के बाजार में तब मिले वाला हर
चार सामान में से एक सामान भारत में बनत रहे. साल १९०० लें भारत के उत्पादन दुनिया के उत्पादन के मात्र १.७ फीसदी रह गइल रहे आ ब्रिटेन के बढ़ के १८.५ फीसदी हो गइल रहे. पश्चिम के औद्यिगिक क्रांति अठारहवीं सदी में अपना शुरूआती दौर में रहल बाकिर ओहु समय में प्रति व्यक्ति औद्योगीकरण मामिला में भारत सातवाँ जगहा से चढ़ के पहिला जगहा चहुँप गइल रहे जबकि इंगलैंड दसवाँ जगह से सरक के सौंवा जगहा पर आ गइल रहे. साल १९०० से १९४७ का बीच भारत के आर्थिक विकास दर के सालाना औसत १ फीसदी रहल. ओह निचला जगहा से हमनी के चढ़ाई शुरू कर के पहिले ३ फीसदी पर आइल, आ फेर एगो लमहर छलांग ले के आजु, दुनिया के हिला देबे वाला आ कुछ देश के डूबो देबे वाला दू गो बड़हन अंतर्राष्ट्रीय संकट का बावजूद, सालाना औसत विकास दर पिछला सात साल से ८ फीसदी के उपर बा.

अगर हमनी के आर्थिक हालात क्रिटिकल मास हासिल कर लिहले बा, त ई हमनी के अगिला छलांग के लांचिंग पैड जरूर बने के चाही. एह बात के पक्का कर लेबे खातिर कि भारत हमेशा ला भूख, बीमारी आ गरीबी से आजाद हो जाव, हमनी के आजादी के एगो दोसर लड़ाई के जरूरत बा. जइसन कि हमनी के राष्ट्रपति रहल महान व्यक्तित्व डा॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन कि एही मंच से आजादी के १८वीं सालगिरह पर कहले रहीं, “आर्थिक विकास लोकतंत्र के परख में से एक होला”.

अगर बढ़त अभिलाषा का सोझा हमनी के विकास कम लागत बा, खास कर के नवहियन के, त खीस उभरबे करी हमनी अइसन देश हईं जे रोज नवही होखल जात बा, उमिर आ उमंग दुनु में. ई एगो चुनौती आ मौका दुनु बा. जानकारी बढ़ावे खातिर नवहियन के भूख ओह लोग के कौशल बढ़ाई आ एगो मौका दी जवना से भारत पहिला दुनिया के तेज राह पर आ सकी. नवहियन का लगे चरित्र बा बस मौका चाहीं. शिक्षा बीज ह आ आर्थिकहालात ओकर फल. बढ़िया शिक्षा दीं, बीमारी गरीबी आ भूख घटे लागी. जइसन कि हम अपना पहिला संबोधन में कहले रहीं हमनी के ध्येय वाक्य होखल चाहीं “ज्ञान ला सभे आ सभका ला ज्ञान.” दृष्टि खुला आसमान ना हो के नवहियन पर जरूर से केन्द्रित होखे के चाही.

प्रिय नागरिक,

बाहरी हालातन का चलते उपजल बेहद दबाव का बावजूद हमनी के आर्थिक हालात आजु अधिका मजगर आ लचीला बा. लगातार आर्थिक सुधारन के दू दशक हमनी के औसत आमदनी के आ घरेलू खपत के, शहरी आ देहाती इलाका दुनु में, बढ़वले बा. अनेके पिछड़ा इलाकन में एगो नया सक्रियता उपजल बा राष्ट्र के आर्थिक मुख्यधारा में आवे के. तबहियों अइसन बहुते खाई बा जवना के पाटल, ओहपर पुल बनावल, जरूरी बा. हरित विकास के पूर्वोत्तर राज्यन में चहुँपावे के बा. नीमन आ निकहा संसाधन बनावल तेज करे के बा. शिक्षा आ स्वास्थ्य सेवा के समाज के आखिरी आदमी ले चहुँपावे के बा,. बहुत कुछ कइल गइल बा, बहुत कुछ करे के बाकी बा.

एह साल मानसून धोखा दे दिहले बा. हमनी के देश के बड़हन इलाका सूखा के चपेट में बा, त कुछ दोसर इलाका बाढ़ के त्रासदी झेलत बा. महँगाई, खास कर के भोजन सामग्री के महँगाई, चिन्ता के कारण बनल बा. हमनी के अनाज उपलब्धता बढ़िया बा आ एह खातिर हमनी का ओह किसानन के ना भुला सकीं जे खराबो हालात में एकरा के संभव बनवलें. ऊ लोग समय पर देश ला खाड़ रहल, त ओह लोग के संकट का घड़ी में देशो के खाड़ होखे के पड़ी.

हम ना मानीं कि वातावरण संरक्षण आ आर्थिक विकास में कवनो विरोधाभास मौजूद रहेला. जबले हमनी का गाँधी जी के पाठ याद राखब जा कि दुनिया में आदमी के जरूरत ला पर्याप्त सामान मौजूद बा बाकिर ओकरा लालच ला ना, तबले हमनी का सुरक्षित रहब. हमनी के प्रकृति से मिल के रहल सीखहीं के पड़ी. प्रकृति हमेशा एक जइसन ना रहे, हमनी का ठीक समय में मिलल उपहार के बचा के राखे के पड़ी जेसे कि कमी का समय में छुंछे ना रहीं.

भठियरपन के कड़ुहट का खिलाफ खीस जायज बा, जइसे कि देश के संसाधन आ संभावना लूटे का खिलाफ होखत विरोध. अइसनो समय आवेला जब आदमी आपन धीरज खो देला बाकिर ई सब लोककतांत्रिक संस्थन पर हमला करे के कारण ना बने के चाहीं.

संस्था संविधान के सम्हारे वाला खंभा हईं सँ. अगर ऊ टूटल त संविधान के आदर्शवाद ना बचावल जा सकी. ई संस्था सिद्धांत आ नागरिकन का बीच के संपर्क सूत्र हईं स. हमनी के संस्था गुजरल समय से कुछ कमजोर पड़ल हो सकेली सँ बाकिर जवन बनल बा तवना के बिगाड़ल सही ना होई. ओकनी के फेर से मजगर बनावे के चाहीं जेहसे कि ऊ हमनी के आजादी के रक्षा कर सकऽ सँ.

हमनी के सीमा पर चौकसी ओतने जरूरी बा जतना देश के भीतर के चौकसी हमनी के अपना शासनव्यवस्था के ओह इलाकन के, न्यायपालिका कार्यपालिका आ विधायिका के, विश्वसनीयता बढ़ावे के जरूरत बा जहाँ थकान आ खराबी का वजह से कुछ कमी आ गइल बा. लोग के आपन विरोध जतावे के अधिकार बा बाकिर हमनी के इहो समुझे के चाहीं कि विधायिका से कानून बनावे के अधिकार आ न्यायपालिका से न्याय करे के अधिकार ना छीनल जा सके.

जब शासन मनमानी करे लागे त लोकतंत्र के नुकसान होला बाकिर जब विरोध चारो ओर पसर जाव त हमनी का अव्यवस्था के नेवतत होखीलें. लोकतंत्र एगो हिस्सेदारी ह. हमनी का साथही जीतीलें चा हारीलें. लोकतात्रिक सुभाव अपना बेवहार के सम्हारे के आ असहमति के बर्दाश्त करे वाला होला. संसद अपने कैलेंडर आ चाल से चली. कबो कबो ऊ चाल बेचाल लाग सकेला बाकिर लोकतंत्र में हमेशा एगो कयामत के दिन आवत रहेला जब चुनाव होला. संसद देश के आत्मा होले, लोग के आत्मा होले. एकरा अधिकार भा काम के चुनौती अपने के नुकसान चहुँपावे के खतरा हो सकेला. .

ई बात हम लोग के डाँटे का भाव में नइखीं कहत, एगो निहोरा का भाव में कहत बानी कि मौजूदा मुद्दन के पीछे लुकाइल खतरा के मुखौटा चिन्हल जाव. लोकतंत्र में अपना शिकायतन के तोड़ खोजे के मौका जवबादेही सकारे के सबले महान संस्था मुक्त चुनावन में मिलत रहेला.

हमहन के राष्ट्र के स्थिरता के चुनौती देबे वाली आग बुताइल नइखे. राख का नीचे अबहियों सुनगत बा. आसाम के हिंसा देखल हमरा ला बहुते दर्दनाक बा. हमनी के अकलियन के सुरक्षा चाहीं, हमला से बचाव, आ ओहलोग के समुझल चाहीं. हिंसा कवनो विकल्प ना होखे, हिंसा बड़हन हिंसा के निमन्त्रण होखल करेले. आसाम के घाव सुखावे खातिर निकहा काम भइल बा जवना में हमनी के प्रधानमंत्री रहल प्रिय राजीव गाँधी आ आसाम के नवहियन का बीचे भइल आसाम समझौता शामिल बा. ओकरा के फेर से देखल आ न्याय ला अउर राष्ट्रहित में जरूरत मुताबिक फेरबदल करे के जरुरत बा. नयका आर्थिक विकास के नयका लहर खातिर शान्ति के माहौल जरूरी बा जवन हिंसा के जड़ मिटा सके.

ई हमहन के भौगोलिक राजनीतिक वास्तविकता ह जवना से कुछ समस्या सीमा पार से आवत रहेला. एह समस्यन के समाधान बातचीत आ मिलजुल के निकाले खातिर सताइस साल पहिले सार्क बनावल गइल रहे, जवना से कि तेज आर्थिक विकास का तरफ बढ़ल जा सके. एक जगहा से दोसरा जगहा होखे वाला अंतरन आ असमान विकास के समस्या के दीर्घकालिक समाधान तेज आर्थिक विकासे से होखी सार्क के एह लक्ष्य के हासिल करे खातिर उर्जावान होखे के पड़ी.

आतंकवाद का खिलाफ सामूहिक लड़ाई में सार्क एगो मजगर औजार होखे के चाहीं. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से बड़हन सफलता संभव बा. निर्दोष लोगन पर आफत बने वाला आतंकियन के न्याय का दायरा में ले आवे खातिर सगरी सार्क देशन के आपस में सहयोग करे के चाहीं. एह उपमहादेश में शांति ले आवे के दोसर कवनो राह नइखे.

हमरा गर्व बा अपना बहादुर सशस्त्र सेना से आ अपना बहादुर पुलिस बल से जे अपना पर आवे वाला खतरन से बेपरवाह हो के आतंकवाद के खात्मा खातिर अतना कुछ करत बाड़ें. ओह लोग के चौकसिए का चलते अउरी बड़हन आफत आवे से बचल बानी जा. अगर हमनी का शांति से सूतत बानी जा त एहसे कि ऊ लोग जागत बा आ मरुभूमि में, पहाड़न में, जंगलात में, समुद्र के निर्जन इलाकन में अपना काम में लागल बा. ओह लोग के देशभक्ति आ लगन के हम सलाम करत बानी. ई बहुते खुशी के बात कि हमनी के सेना हमनी के शांतिए के गारंटी ना देव, ओलम्पिक में देश ला मेडल जीते वालनो के बनावेला. हाल का खेलन में देश के माथ ऊँचा करेवाला खिलाड़ियन के हम बधाई देत बानी जे देश खातिर मेडल जीतल आ ओहू लोग के जे देख ला खेलल. पदक के गिनिती बहुत नइखे बाकिर पिछला बेर ले बहुते अधिका जरूर बा. चार साल बाद, जब हम फेर रउरा सभ के संबोधित करे के आशा राखत बानी, हमरा पूरा विश्वास बा कि हमनी के पदक के बसंत ले आएब.

हमार साथी नागरिक,

अगर इतिहास में एक आदमी बा जेकर नाम शांति के पर्यायवाची बा त ऊ बावे गाँधीजी के नाम, जे हमनी के आजादी के निर्माता रहनी. भारत बहुतायत वाला देश ह जहाँ गरीबी बसेले. भारत का लगे एगो उत्साही आ विकासमान सभ्यता बा जवन हमनी के महान कला में चमकेला आ हमनी के गाँव शहर में दैनन्दिन जीवन में मानवता आ सृजनात्मकता में झलकेला. जब इन्दिरा गाँधी सितारन ले चहुँपली तब ऊ मानत रहली कि उ सब कुछ बारत के अगिला पीढ़ी हासिल कर सकेले. बाकिर राष्ट्रीय एकता आ भाईचारा का बिना हमनी के ना त वर्तमान हो सके ना भविष्य.

हमार साथी नागरिका,

आईं हमनी का नफरत, हिसा आ खीस के पीछे छोड़त चलीं जा. आपस के छोटमोट झगड़ा के किनार करीं जा. अपना देश खातिर मिल जुल के काम करीं जा अपना महतारी के पूजा करे वाला बचवन जइसन. उपनिषदन से मिलल एह ज्ञान में आपन भरोसा जताईं जा :

भगवान हमनी के रक्षा करसु. भगवान हमनी के पोषण करसु. हमनी का मिल जुल के उर्जा आ उत्साह से काम करी सँ. हमनी के अध्ययन बढ़िया रहो. आपस में कवनो विरोध मत होखे. बस शांति शांति शांति रहो. शांतिए हमनी के आदर्श, विकास आ क्षितिज बनो.

जय हिन्द!


आजादी के पै्सठवा सालगिरह से पहिले के सांझ देशवासियन का नामे राष्ट्रपति के सबोधन के भोजपुरी अनुवाद. लाख सावधानी का बादो कुछ गलती हो सकेला एकरा खातिर माफी मँगला का साथे पेश बा ई दस्तावेज.