भोजपुरी सरोकारन से जुड़ल पत्रिका भोजपुरी पंचायत

आजु जब भोजपुरी के पत्रिका प्रकाशन के स्थिति खराब चलत बा आ शायदे कवनो पत्रिका बिया जवना के नियमित प्रकाशन आ उहो समय पर हो रहल बा. एह दिसाईं दिल्ली से प्रकाशित होखे वाली पत्रिका भोजपुरी पंचायत बधाई के हकदार बिया कि अपना शुरुआत से अबले ओकर चारो अंक एकदम समय पर प्रकाशित होखत आइल बा.

हर नया अंक में एह पत्रिका के जुड़ाव भोजपुरी सरोकारन से बढ़ल जात बा. अलग बात बा कि साथही साथ पत्रिका के अपना व्यावसायिको हित के संरक्षण करे के पड़त बा. सब कुछ का बावजूद पत्रिका के कलेवर आ सामग्री के चयन में सुधार होखत बा. ई बात हम एहसे नइखी कहत कि अब एह पत्रिका में अँजोरिया पर प्रकाशित बतकुच्चनो के चुनल कड़ी प्रकाशित होखत बावे. अब एह पत्रिका में भोजपुरी रचना आ भोजपुरी सरोकार साफ झलके लागल बा. एह सब का बावजूद हमार निहोरा रही कि एह पत्रिका में विचारणीय विषय चाहे जवन राखल जाव साहित्यिक रचना भोजपुरीए में दिहल जाव त नीक रही.

सितम्बर के अंक अगस्त का आखिरी सप्ताह में नेट पर उपलब्ध हो गइल रहे. अगर एकरा के एक हफ्ता अउर विलम्ब से प्रकाशित कइल गइल रहीत त एहमें दिल्ली में पिछला २९ अगस्त के भइल धरना प्रदर्शन के खबर आ रपट सामयिक हो जाइत.

सब कुछ का बावजूद एह पत्रिका के सफलता खातिर अँजोरिया परिवार का तरफ से मंगल कामना हमेशा कइल जाई.

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बतकुच्चन ‍ – ७५


बेर, बेरा, बारी आ बारी. बारी दू बेर आइल एकरो कारण बा. जवन आगा चल के बताएब. बेर मतलब कि आवृति, माने कि हाली. कव हाली भा कव बेर. कतना हाली भा कतना बेर. बाकिर बेर बेरा के बिगड़ल रूपो हो सकेला. बेरा मतलब समय. सबेरा, गदबेरा, एहबेरा, ओह बेरा, अबेरा, कुबेरा वगैरह. एह सब उपयोग में बेरा के मतलब समय से बा. बाकिर ई बेरा बिगड़ के कई जगहा बेर हो जाला आ मतलब उहे रहेला. सबेर, अबेर, कुबेर, गदबेर, एह बेर, ओह बेर में मतलब आवृति से ना हो के समय से होला. कई बेर मतलब ना बदले बाकिर कबो कबो बदल जाला. जइसे कि कुबेरा के कुबेर कहला से हो सकेला कि कुछ भ्रम हो जाव. कुबेर देवता लोग के खजांची हउवें भा रहलें. एह बारे में हमार जानकारी, हर जानकारी का तरह थोड़ही बा. हम अपना के कुबेर माने कि कुबेरा में समेट के राखब. कुबेरा खातिर कई बेर अबेरा के इस्तेमाल कर दिहल जाला बाकिर ठीक से देखीं भा सोचीं त कुबेरा आ अबेरा साफ अलग अलग होला. जब कवनो बात बिना समय के, कुसमय में हो जाव त कुबेरा कहल ठीक रही. अबेरा देर खातिर इस्तेमाल होखे क चाहीं. काहे कि कवनो जरूरी नइखे कि जवन अबेरा बा तवन कुबेरो होखे. देर रात के बिना पहिले से बतवले कवनो हित पाहुन आ जाव त कहल जाला कि कुबेरा आ गइलें. बाकिर समय दिहला का बाद देरी से आवसु त कहे के चाहीं कि अबेरा अइलन, अबेर कर दिहलन. ई त भइल अबेर कुबेर के बात. चलीं थोड़ीका सबेर आ गदबेरो के बतिया लिहल जाव. काहे कि पता ना कवन कारण बा कि जब जब संसद के बइठका होखे वाला रहेला तब तब कवनो बात अइसन कुबेरा में हो जाला कि बइठकी में बवाल हो जाला आ संसद में जवन काम सेकराहे हो जाए के चाहत रहे ओकरा में अबेर होखे लागेला. सेकराहे मतलब जल्दी होला बाकिर कबो कबो कुछ लोग एकर इस्तेमाल सबेरे खातिर कर देलें. काल्हु सेकराहे चल अइह. मतलब त इहे भइल कि काल्हु जल्दी चल अइहऽ. ई ना कि सबेरे सबेरे आ के दुआर ठोके लगीहऽ. सबेरा के इस्तेमाल कई बेर अबेरा से उल्टा मान के कर दिहल जाला हालांकि होखे के ना चाहीं. अबेरा के सही विलोम सेकराहे होखे के चाहीं सबेरे ना. सबेरा के विलोम होला गदबेरा. गदबेरा खातिर कबो अबेरा भा कुबेरा के इस्तेमाल ना कइल जाव. गदबेरा त हमेशा अपना समय पर आवेला, जइसे कि सबेरा आवेला. ना त सेकराहे, ना अबेरा, ना कुबेरा. गदबेर के इस्तेमाल गोधुलि वाला समय खातिर होला. बाकिर हमरा समुझ से, अब चाहे ई समुझ कतनो कम काहे ना होखे, गोधुलि आ गदबेरा मे तनी फरक होला. गोधुलि ओह समय के कहल जात रहे जब साँझि बेरा लवटत गाय बैल के झुंड के खुर से उड़त गरदा गुबार साँझि के बढ़त अन्हार से मिल जुल के गदबेर बना देत रहुवे. गरदा जइसन समय गदबेर. वइसे अलग बाति बा कि देश के संसद में हमेशा गदबेरे जइसन माहौल बनल रहेला. काहे कि ओहिजा बेरा कुबेरा हमेशा लोग अपना खुर से गरदा उड़ावे में लागल रहेला. अब एह सब बाति में अतना बाति निकल आइल कि बारी आ बारी के फरक अगिला बारी.

सुकुलजी..रउआँ बहुते बेजोड़ बानी जी

Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

आजु हमरा सुकुलजी के बहुते इयादि आवता. जब हमरा खूब हँसे के मन करेला त हम सुकुलजी के इयादि क लेनी. सुकुलजी के एइसन-ओइसन मति समझीं सभे. सुकुलजी त बहुते काम के चीज हईं. सुकुलजी त ओमे के हईं की उहाँ का बालू में से तेल निकालि देइबि.
सुकुलजी जब घरे रहबि त फटही बंडी अउर लुंगी पहिनी के, कांधे पर गमझा लटका के, नंगे गोरे पूरा गाँव का जवार घूमि देइबि पर उहे सुकुलजी जब कवनो रिस्तेदारी में जाए के तइयार होखबि त गवनही मेहरारू कुल की तरे सजबि, सँवरबि. 
पता ना सुकुलजी के बाबूजी उहाँकी बिआहे में कोट सिउआ के सही कइनी की गलती, इ हम ना कहि सकेनी पर बिआहे की 20-22 साल बादो आजुओ सुकुलजी के कोट ओहींगा चमकता. हँ इ अलग बाति बा की ओमे-किसिम-किसिम के बटाम लागि गइल बा. अब रउआँ सोंचति होखबि की इहाँ कोट के बखान काहें कइल जाता, त हम इ कहल चाहतानी की जब सुकुल जी कहीं पहुनाई में निकलबि त इ आपन बिहउती कोट अउर बिहउती मोजा-जूता जरूर पहिनबि.
सुकुलजी के अगर रऊआँ उनकी गाँव में देखि लेइबि त इहे कहबि के कवनो भकभेल्लर ह (भकभेल्लर हम एसे कहनी हँ की हम सुनले बानी की सुकुलजी की बिआहे में जब सुकुलजी अपनी ससुरारी में खीर खाए बइठने त ओ गाँव के जनाना बुढ़-पुरनिया एगो गीत सुरु कइल सब…ई भकभेलरा दामाद कहाँ से हमरी इहाँ आइल रे, बरओ पाकल, मोछियो पाकल, लागता इ भागलपुर के भागल… ई भकभेलरा दामाद कहाँ से हमरी इहाँ आइल रे…) चाहें हँसमतिया के भाई ह पर उहे सुकुलजी जब गवनहीं मेहरारू कुल की तरे बनि-छनि के रिस्तेदारी में जाए के निकलिहें त लागि की कवनो दुबिआहा अब पहिले-पहल अपनी ससुरारि जाता.
सुकुलजी के इयादि आवते हमरा हँसी काहें आ जाला इहो बता देतानी अउर गारंटी दे तानी की रउओं आपन हँसी रोकि ना पाइबि. खैर हम त सुकुलजी के तीन-चार गो खेला देखले बानी ओमे से रउआँ सब के अबे एक्के गो सुनाइबि, काँहे कि सगरी सुना देहलहुँ पर मजा किरकिरा हो जाई.
हम सुकुल जी के जबन घटना बखाने जा तानी उ टटका बा, कहले के मतलब इ बा की पिछलहीं गरमिए में उनकर इ खेला हम देखनी.
बिआह-सादी के दिन रहे अउर हमहुँ नोकरी पर से छुट्टी ले के गाँवे गइल रहनी. रउआँ सब के त पते बा की बिआह-सादी की दिन में केतना नेवता गिरेला. अगर घर में 3-4गो सवांग होखे लोग तबो सबके एक-आध दिन आंतर दे के कवनो तिलक, बिआह आदि में जाहीं के परेला. हमार बाबा कुछ नेवता लिआ के हमरी आगे ध देहने अउर कहने की बाबू छाँटि ल की तूँ ए में से कगो में जइबS, वइसे तोहरी ऊपर बा ना त झुनझुन-मुनमुन के भेजि देइबि चाहें हमहीं चलि जाइबि. हम नेवतन के निहारे लगनी त का देखतानी की ओ ही में सुकुलोजी के नेवता बा. सुकुलजी के नेवता देखते तS हम ओ के खोलि के लगनी पढ़ें. सुकुलजी की छोट बहिन के बिआह रहे अउर एकदिन की बादे तिलक रहे. अब हम काहे के अउर नेवतन के देखीं, हम दउरि के बाबा की लगे गइनी अउर कहि देहनी की सुकुलजी वाला तिलक अउर बिअहवो में हमहीं जाइब. बाबा कहने नया रिस्तेदार हउअन अउरी तिलके में घरभरी के चले के कहले बाने. तोहार बाबूओजी आ रहल बाने बिहने सबेरे, ओ तिलके में जाए खातिर. फेर बाबा कुछ सोंचि के कहने ठीक बा तूँ अउर तोहार बाबूजी चलि जइहS जा. हमरा त अंदर से लड्डू फूटत रहे, हम कहनीं ठीक बा.
दूसरा दिन हम बाबूजी की साथे दुपरिअवे में सुकुलजी की इहाँ पहुँच गइनी. साँझिखान तिलक पहुँचि गइल लइका की दुआरे पर. अरे इ का तिलक त चढ़ि गइल पर तिलक चढ़ले की बादे अचानक हल्ला सुनाए लागल. सुकुलजी के बाबूजी अउर लइका की काका में लेन-देन के ले के कुछ बतकही होत रहे. हमहँ उहाँ पहुँचनी. सुकुलजी त पहिलहीं से उहाँ बँसखटिया पर मुँह लटका के बइठल रहने. सुकुलजी के बाबूजी खूब तेज आवाज में कहने की हमार सामान वापस क दS…तहरी घरे हमरी लइकिनी के बिआह ना होई. लइको के काका जोर से कहने की घर में से इनकर सामान ले आके वापस क द सन. इ बहुत चालू बाभन बाने सन. कहतानेसन कुछ अउर तथा करतानेसन कुछ अउर. सुकुलजी के बाबूजी सुकुलजी पर घोंघिअइने, “इ सब, एही सारे मउगे के कइल-धइल हS…का तय कइले बा..का नाहीं केहू के बतवले नइखे..अउर पूछले पर कहत रहल हS की हम बानी न सब संभारी लेइबि..तूँ टेंसन मति लS.”
अरे इ का ए दादा. सुकुलजी की बाबूजी की एतना कहते सुकुलजी त लगने भोंकार पारि के खूब जोर-जोर से रोवे. एइसन लागे की कवनो मेहरारू गवने जा तिया. सब लोग एकदम सांत हो गइल पर सुकुलजी आपन रोवल चालू रखने अउर बीच-बीच में रुँआँसे बोली में बोलत जाँ, ” इ हमार बाप नइखन, कसाई बाने. हर जगहिए कुछ न कुछ नाटक क के सब काम बिगाड़ि देने. खरमतियो कि बिआहे में इ एहींगा नाटक कइले रहनें..ऊँ…ऊँ…ऊँ……..” अरे अब त सुकुलजी के बाबूजी के ठकुआ मारि देहलसि, उ एकदम से चुप हो गइने, उनकर मुँह झँउआ गइल. एकरी बाद सुकुलजी उठने अउर रोवते लइका की काका से हाथि जोड़ि के कहने, “निकलवा दीं महराज, हमार समान. हमार बापे एइसन बा. राउर कवनो दोस नइखे.ऊँ…ऊँ…ऊँ……..”
सुकुलजी के रोवाई से सब गमा गइल रहे, सोंचे पर मजबूर हो गइल रहे पर हमार हँसी रुके ना…काँहे कि हमरा पता रहे की अब सुकुलजी की दाँव से केहू बँची ना. लइका के काका केतनो हुँसीयार होखों पर उनकरा अब फँसहिंके बा.
सुकुलजी के रोवाई अब अउर तेज होत जाव….बीच-बीच में कहल करें…अब हमार बहिन कुँआरे रही…जब बापे एइसन बा…त का कइल जा सकेला. अब त सुकुलजी की अगल-बगल में कईगो रिस्तेदार जुटी के समझावे लागल रहे लोग…बाबू..चुपा जा…ओने लइका की कको के समझावे खातिर कइगो मेहरारू (लइका के बुआ, ईया) घर में बाहर आ गइल लोग. लइका के ईया लइका की काका से कहली, “जा ए मास्टर, तोहरा इजति के कवनो लाज नइके. दुआरे पर हित-नात के बोला के एतना नाटक कS देहलS. देखबS सुकुल बाबू केतना रोवताने.”
अब हमरा पूरा यकीन हो गइल रहे की सुकुलजी अपनी खेला में कामयाब हो जइहें, काहें कि लइका के फुआ, माई, ईया सबलोग एकट्ठा हो के सुकुलजी के चुप करावे लागल अउर लइका की काका के डांटे लागल. लइका के कको ठकुआ गइल रहनें. हमार हँसी अब रूकले मान के ना रहे. काहे के सामान अब घर में से बाहर आओ, जे जहें रहे उहवें गमा गइल रहे. तिलकहरू लोग आराम से खाइल-पियल. अब लइका की काका के तनको हिम्मत ना रहे की एको सब्द बोलें. घर में जा के एकदम से गमा गइने. एकरी बाद बिआहो एकदम निमने-निमने बीत गइल. बिआह बितले की बाद हम सुकुलजी से कहनी की महराज राऊर कवनो जबाब नइखे, जहाँ सुई ना घुसी उहाँ रउआँ हाथी घुसा देइबि, काम परले पर गदहवो के बाप बना लेइबि. सुकुलजी की चेहरा पर कुटिल मुस्कान तैरि गइल.
बाद में पता चलल की सुकुलजी लइका की ओर से जेतना फरमाइस भइल रहे सब मानि ले ले रहने…पर देखा देहने लइका की काका के अँगूठा.. जय हो..


-प्रभाकर पाण्डेय, हिंदी अधिकारी, सी-डैक, पुणे

बतकुच्चन ‍ – ७४


भोजपुरी में मन के भाव बतावे वाला शब्द अतना आ अइसन अइसन बाड़ी सँ जवना के दोसरा भाषा में अनुवाद करे में पसीना सूख जाई. पिछला दिने कुछ अइसने शब्द दिमाग में चमके लागल जब देश के सबले बड़की बईठका में एगो नेताइन, कहे के मतलब कि महिला नेता, एगो दोसरा नेता के बात पर अइसन पनपना गइली कि लागल कि कुछ परपरा गइल होखे आ ओह पनपनाहट में ऊ अपना दल के नेता सब के उकसावत लउकली कि बवाल करऽ लोग. अब ऊ का कइली, काहे कइली एह सब से त एह बतकुच्चन के मतलब नइखे. मतलब बा त पनपनइला से, परपरइला से आ छनछनइला से.
उकसावे का बारे में फेर कबो बतिआवल जाई आजु मत उकसाईं.

पनपनाइल परपराइल आ छनछनाइल में से पनपनाइल आ छनछनाइल सामने आ जाला बाकिर परपराइल उहे महसूस करेला जेकरा परपराला. सामने वाला ना जान सके कि का परपराइल, कहवाँ परपराइल. अब चलीं जानल जाव कि परपराइल का होला. अगर घाव पर मरीचा के बुकनी पड़ जाव त जवन महसूस होखेला तवने के परपराइल कहल जाला. अगर घाव ना होखे त परपरा ना सके कतनो बुकनी बुक दीं. एही बीच बुकनी शब्द आ गइल त एकरो के समुझत चलल जाव. बुकनी संज्ञा आ क्रिया दुनु ह. एकर दुनु मतलब होला पावडर आ पावडर बनावल. बुकनी संज्ञा ह त बुकल क्रिया. बतकुचनो में हम कवनो ना कवनो बात ध के ओकरा के बुकत रहीलें बुकनी बनावे का फेर में. एहीसे मिलत जुलत एगो शब्द ह बुनिया. मैदा के घोल के गरम तेल में बुँद बुँद डाल के तइयार होखे वाला चीझु बुनिया कहल जाला. अब एह बुनिया के चीनी का पाग में डाल दीं त मिठाई बन जाई, मुट्ठी में बान्ह के लड्डू बना लीं भा अइसहीं खा लीं. दही में डाल के नून मरीचा छीट के रायता बना लीं. राउर मरजी. बुनिया के आपन कवनो जिद्द ना होला सामने वाला का मरजी से आपन सवाद बदलत रहेला.

हँ त बात होत रहुवे परपरइला के त. जब कुछ परपराए लागेला त आदमी खीसि पनपन करे लागेला. ओकरा चेहरा पर रौद्र रूप साफे लउके लागेला. मन करेला कि सामने वाला के कच्चे चबा जाईं जे हमरा घाव पर मरीचा के बुकनी डललसि. पनपनाइल आ छनछनाइल एक जइसन होइओ के अलग अलग होला. गरम तेल में पानी पड़ जाव त छन छन के आवाज आवेला आ ओहि से बनल छनछनाइल. जब केहू के अइसने गरम तेल जइसन बात कह दिहल जाई त ऊ छनछनइबे करी. छनछनाए वाला आदमी के देहि पर कवनो घाव बा कि ना एहसे कवनो अंतर ना पड़े. ओकरा हर हाल में छनछनाए के बा. बाकिर परपरइला में घाव के मौजूदगी जरूरी होले. अब इ रउरा पर बा कि रउरा का कहब ओह नेताइन के. ऊ पनपनाइल रहली कि छनछनाइल.

अब आईं सोचल जाव कि एह पनपनइला, छनछनइला आ परपरइला के अनुवाद हिंदी भा अंगरेजी में करे के पड़ो त कइसे होखी. एह एक एक शब्द खातिर एगो लमहर वाक्य लिखे के पड़ जाई. आ अनुवाद करे वाला के चेहरा जवन पितरिआई कि देखल बनी. चलीं छोड़ीं, एह पितरिअइले के अनुवाद कर देखाईं.

बतकुच्चन ‍ – ७३


गोल के बात का निकलल पिछला बेर कि माथा गोल हो गइल. मन में तरह तरह के सोच आपन आपन गोलबन्दी करे लागल. एह में गोलियात तीन गो शब्द सामने आइल गोल, गोला आ गोली. गोल कवनो समूह के कहल जाला. ई गोल खिलाड़ियन के होखे, होरिहारन के होखे, कवनो बाबा के होखे बा राजनीतिक विचार के होखे. एह गोल आ अंगरेजी के गोल में बहुते फरक होला. अंगरेजी के गोल लक्ष्य के कहल जाला ऊ लक्ष्य फुटबाल भा हॉकी जइसन खेल के होखे भा जिनिगी के मकसद. बिना गोल के जिनिगी सफल ना होखे. बाकिर हमार गोल त बा भोजपुरी शब्दन पर बतकुच्चन करे के से ओहिजे लवटल जाव. गोल गोला गोली में गोली बन्दूक भा पिस्तौल से निकलेले. गोली अउरियो तरह के होले. लइकन के खेले वाला गोली खातिर टई शब्द बेसी प्रचलित बा, डाक्टर के दिहल गोली ला टैबलेट. अब ई मत कहीं कि टैबलेट त अंगरेजी के ह ओकरा के भोजपुरी में काहे लिहल जाव त जानत चलीं कि अंगरेजी आजु अंगरेजी एह ले बिया कि ओकरा हर भाषा के शब्द पचावे के ताकत बा. दुनिया भर के भाषा से लिहल शब्दन के उ अपना में समवले जाले. पिछला साल नाहियो त दू हजार शब्द दोसरा भाषा से अंगरेजी में आक्सफोर्ड डिक्शनरी शामिल कर लिहलसि जवना में करीब दू सौ शब्द हिन्दुस्तानी बाड़ी सँ. एहसे रेलगाड़ी के लौहपंथगामिनी कहला के ना त कवनो जरूरत बा ना कहे के चाहीं. बहुते शब्द भोजपुरी में पहिले से चलन में बाड़ी सँ आ हर दिन कुछ ना कुछ नया आवते जात बा. मोबाइल हर पाकिट में आइल त हर भाषो में घुस गइल. टेलीफोन के त दूरभाष बन गइल बाकिर मोबाइल के जेबी दूरभाष कहल बेजरूरत होखी. फेर बात एने ओने बहक गइल. लवटल जाव गोल गोला गोली पर. गोली त अबके थोड़ देर पहिले छूटल ह से चलीं अब गोला के बात कर लिहल जाव. गोला लाल साँढ़ो के कहल जाला बाकिर सबसे बेसी चलन में ई शब्द बाजार खास कर के थोक बाजार खातिर इस्तेमाल होला. सड़क किनारे के छोटहन बाजार चट्टी कहल जाला त बड़हन बाजार गोला. अब ई गोला कइसे बनल से त हम ना जानीं बाकिर पटना के गोलघर से एकर कवनो संबंध ना होखे के चाहीं. हालांकि पटना के गोलघर गोदामे खातिर बनल रहे आ शायद अबहियों गोदामे का तरह इस्तेमाल होला. बाकिर गोला सामान के समूह कम दूकानन के समूह बेसी होला. बाजार में दूकान होखे कवनो जरूरी नइखे बाकिर गोला में दूकान होखल जरूरी होला. राहे बाजार लागल हाट के गोला ना कहल जाव. जवना जगहा कई एक दूकान हो जा सँ तहवाँ के गोला कहल जात रहे. अब बड़की शहरन में ई मॉल हो गइल से अलग बात बा. गोला बेमारियो खातिर कहल जाला जब पेट में कवनो गोल बेमारी बन जाव आ बढ़े लागे त कहल जाला कि पेट में गोला हो गइल. ई गोला तोप के गोला से कम खतरनाक ना होखऽ सँ. जब फाटी त बहुते कुछ नुकसान करा जाई. अइसने गोला कबो कबो पित्त का थैली भा किडनी में बने लागेला बाकिर ऊ छोट होला से ओकरा के पथरी, पत्थर जस, कहल जाला कि पेट में पथरी हो गइल बा. एह गोला गोला गोली के चक्कर में हो सकेला कि रउरा शहर के गोलम्बर याद आवत होखे काहे कि अधिकतर शहर में कवनो ना कवनो मशहूर गोलम्बर जरूर होला. बाकिर गोलावट भा गोलवट रउरा धेयान में ना आवत होखी. एक त ई बहुते बदनाम शब्द ह आ जे एकरा गोल में आइओ जाला उहो ना सकारे भा ना जनावल चाहे कि ऊ गोलावट का फेर में पड़ गइल बा. जब दू आदमी के बिआह एक दोसरा के बहिन से हो जाला त कहल जाला कि ई गोलावट भा गोलवटिआ बिआह ह. बाकिर सामाजिक नजरिया से गोलवट बिआह खराब मानल जाला एहसे एकर बेसी चरचा ना होखे. अब बतकुच्चन के गोल में ई घेरा के सामने आ गइल त का कइल जाव. खैर, खून, खाँसी, खुशी, बैर, प्रीत, मधुपान / रहिमन दाबे ना दबे जाने सकल जहान.

फगुआ के पहरा: डा॰ विमल के काव्य संग्रह

डा॰ रामरक्षा मिश्र विमल के हालही में प्रकाशित काव्य संग्रह “फगुआ के पहरा” में २७ गो गीत, २२ गो गजल आ ६ गो कविता बाड़ी सँ. डा॰ विमल हिन्दी आ भोजपुरी के साहित्यकार हईं आ मूल रूप से गीतकार हईं. अँजोरिया के सौभाग्य बा कि एहिजो डा॰ विमल के रचना प्रकाशित होत रहेला. फगुआ के पहरा में डा॰ विमल के शुरूआत से ले के आजु तकले के रचनाकाल के प्रतिनिधि रचना दिहल गइल बा जवना से नवही गीतकार के पोढ़ होत देखल जा सकेला.

चूंकि हम समीक्षक ना हईं एहसे एह संग्रह के समीक्षा ना कर के अपना मन के बात कहत बानी. एह संग्रह में कुछ रचना मन के छू लिहलसि त कुछ उपरे उपर निकल गइल. “कइल बदले के जे गलती हवा के रुख बगइचा में / ठेठावल जात बा जाङर उठवना रोज कुछ दिन से” समय के रुख देखावत बा त ” चतुर रहे दुशमन त नीमन बुरबक बेटो बाउर ह” लोकोक्तियन के सुन्दर इस्तेमाल.

गीत आ गजल का बारे में खुद डा॰ विमल मनले बानी कि एहमें शास्त्र मर्यादित फार्मेट के कठिन आग्रह ठीक ना होखी. निबाह ठीक रही बाकिर प्रयोग के राह खुलल रहे के चाहीं.

संग्रह के प्रकाशन बनारस के कला प्रकाशन से भइल बा. जहाँ तहाँ छपाई के गलती सवाद बिगाड़े के काम करत बा. भोजपुरी प्रकाशन के अभाव का चलते भोजपुरी के टाइपिंग आ प्रूफ रीडिंग में गलती रहबे करी आ एहु संग्रह में वइसने भइल बा. किताब के दाम २१० रुपिया राखल गइल बा जवन आजु का जमाना का हिसाब से प्रकाशक भले सही ठहरा देव आम पाठक एह दाम पर किताब खरीदे से कतराई जरूर.

डा॰ रामरक्षा मिश्र के संपर्क सूत्र

डा॰ रामरक्षा मिश्र विमल,
केन्द्रीय विद्यालय बैरकपुर (थल सेना)
कोलकाता 700120
मोबाइल – 09831649817

प्रकाशक के पता

कला प्रकाशन,
बी 33/33-ए-1, न्यू साकेत कालोनी,
बी॰एच॰यू॰, वाराणसी – 5

बतकुच्चन – ७०


लस्टम पस्टम में दिहल ज्योति जी के सवाल पर कुछ कहे से पहिले एक बात साफ कर दिहल जरूरी लागत बा. हम ना त भाषा शास्त्री हईं ना भाषा वैज्ञानिक. हम त बस नाच के लबार हईं, सर्कस के जोकर हईं, रमी के पपलू हईं. शब्दन से खिलवाड़ करत बतकुच्चन करत रहीलें. गाईड फिलिम के देवानंद का तरह हमरा के ठोक पीट के स्वामी बनवला के जरूरत नइखे. भाषा के विद्वान लोग हमरा पीछे लट्ठ ले के पड़ो एहले पहिले आपन असलियत दोहरावल जरूरी लागल. सुनले बानी कि बढ़िया डाक्टर भा बढ़िया वकील किताब के सहारा लेत रहेला से हमहूं कुछ एने से कुछ ओने से पढ़त रहीलें, सवाल के जवाब खोजत रहीलें. भोजपुरी त कबो पढ़ावले ना गइल, हिन्दीओ से इंटर का बाद भेंट ना भइल. बाकिर भाषा से प्रेम ह से भाषा का सेवा में लागल रहीलें. अब लवटल जाव ओह सवाल पर कि कहावतन के छूरी तरकारी पर काहे गिरल कि अतना कहावत तरकारी वगैरह पर बन गइल. सब तरकारी के किस्मत ह ज्योति जी. छूरी तरकारी पर गिरे भा तरकारी छूरी पर, कटे के त तरकरिए के बा. गरीब के जोरू गाँव भर के भउजाई होले. बड़ जीउ बतियवले छोट जीउ लतियवले कहावत समाज के मानसिकता देखावेला. अधिकतर कहावत में कमजोरे निशान पर रहेलें आ उनके बहाने समाज के अनुभव हकीकत सामने आवत रहेला. कहावत कहे वाला निमना घरे बायन ना देव. जानेला कि भर पेट भेंटा जाई. बाकिर कमजोरका त हिंहिंया के रहि जाई. रजुआ राजू राजा सेठ. गरीबी पार्वतिओ के परबतिया बना देले. से कहावत अकसरहाँ कमजोरे के निशाना बनावत आइल बा. ई सब बतियावत में जानल जरूरी लागल कि कहावत होला का. जाने के कोशिश कइनी त पता चलल कि कहावत माने कि जवन कहात आवत बा आ एही से कहावत बनल. कहावत अपना आप में पूरा होला. कहावतन में समष्टि के अनुभव सूक्ति का मार्फत सामने आवेला. गागर में सागर का तरह. कहावतन के मकसद होला व्यंग का सहारे हकीकत के बयान. कहियो जाईं आ कहबो ना करीं. व्याकरणाचार्य लोग कहावत के लोकोक्ति का वर्ग में राखेला जहाँ कहावत, मुहावरा, बुझौवल, बाल गीत वगैरह बहुत कुछ आवेला जवन लोग कहत आइल बा. एक मुट्ठी लाई महाबीर पर छिटाई बरखा ओनिए बिलाई भा एक मुट्ठी सरसो भदर भदर बरसो जइसन लोकोक्ति के कवनो मतलब ना होखे. एहसे ई सब कहावतन में शामिल ना भइल. लोकोक्ति में त शामिल हो गइल बाकिर कहावत में ना. बूझवउल त सवाल भर होला जवना के जवाब सामने वाला के देबे के होला. उहो कहावत ना बनली सँ. बाचल मुहावरा त कई बेर गलती से लोग मुहावरो के कहावते में जोड़ देला बाकिर मुहावरा कहावत का बरोबरी में कबो ना आ सके. कहाँ राजा भोज कहाँ गंगुआ तेली. मुहावरा आधा अधूरा होला ओकरा के जबले कवनो वाक्य में इस्तेमाल ना कइल जाव तबले ओकर मतलब साफ ना हो सके बाकिर कहावत स्वतंत्र होलें. अपने से सब कुछ कह जालें. आ एह साफगोई के आधार रहेला कहावतन का पीछे समाज के लमहर अनुभव. बिना हवा के पीपर डोले बिना बोलवले बरुआ बोले ओही अनुभव के देखावेला. समाज के अनुभव जब कवनो सूक्ति वाक्य में समाहित हो जाव त ऊ कहावत बन जाले. हँ सगरी कहावत व्यंग ना होली सँ बाकिर अधिकतर कहावत में व्यंग जरूर रहेला. बाप के नाम साग पात बेटा के परोरा अइसने व्यंग देखावेला जब केहु अपना के बढ़ चढ़ के देखावे बतावे के कोशिश करेला. आ हम अपना के परोरा में शामिल ना करीं. साग पात हईं सागे पात रहे दीं ज्योति जी. पाँय लागत बानी, चले के आदेश दीं.

गोरखपुर के भोजपुरी “बइठकी”

गोरखपुर के भोजपुरी साहित्यकारन के संस्था “भोजपुरी संगम” के बइठकी हर महीना करावल जाले. २८वीं बइठकी पिछला १० जून के साहित्यकार सत्यनारायण सत्तन का घरे भइल रहे जवना के अध्यक्षता गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो॰ सुरेन्द्र दुबे कइले रहनीं.

एह बइठकी का पहिलका सत्र में (बिना बैनरवाला फोटो में बाँए से) चन्द्रेश्वर “परवाना”, प्रो॰ सुरेन्द्र दुबे, प्रो॰ जनार्दन, प्रो॰ रामदेव, गिरिजाशंकर राय “गिरिजेश”, प्रो॰ चित्तरंजन मिश्र, रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी. माहेश्वर कुमार शुक्ल, (बैनरवाला फोटो में बाँए से) रामसमुझ साँवरा, सूर्यदेव पाठक “पराग”, कृष्ण कुमार श्रीवास्तव, धर्मेन्द्र त्रिपाठी, हरिवंश शुक्ला हरीश, श्रीधर मिश्र, सत्यनारायण “सत्तन”, ई॰ राजेश्वर सिंह, केशव पाठक “सृजन”, रामनरेश शर्मा, ज्योतिशंकर पाण्डेय के अलावा लल्लन पाण्डेय आ अवधेश शर्मा “सेन” के भागीदारी में भोजपुरी गीत पर बतकही कइल गइल.

दुसरका सत्र में एह लोग के काव्यपाठ भइल.



भोजपुरी संगम के २९ वीं बइठकी

भोजपुरी संगम के २९ वीं बइठकी में अध्यक्षता करत प्रसिद्ध हिन्दी कथाकार आ उपन्यासकार मदन मोहन जी कहनी कि “कवनो रचना के खासियत इहे होखे के चाहीं कि ऊ अपने समय आ समाज के हूबहु उजागर करे आ अपनी भासाई संपदा में कुछ अउर जोड़ सके.”

पहिलका सत्र मे रुद्रदेव नारायन श्रीवास्त के व्यंग लेख “मूल्य से वैल्यू ले” पर चरचा में प्रो॰ रामदेव शुक्ल के सुझाव रहल कि “भोजपुरी लिखे के समय लेखक के भुला जाए के चाहीं कि ओकरा हिन्दी आ खासकर अँगरेजिओ आवेला.”

समीक्षक गिरिजाशंकर राय “गिरिजेश” एह व्यंग के कथ्य तथ्य से भरल पूरल एगो सार्थक रचना बतावल सुझाव दिहलीं कि रुद्रदेव जी में सफल व्यंगकार के पुरहर सामरथ बा. उहाँ के, लेखक के, भोजपुरी गद्यलेखन के अउर अभ्यास करे के सुझाव दिहलीं.

छपरा विश्वविद्यालय से आइल डा॰ सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी बजार आ नैतिकता के “मूल्य” से, दामाद आ पतोहि के बापन के “वैल्यू” ले के लेखक के नाप तौल के खूबे सरहनी. बाप के कइल पुरनका पंखा के घनघनाहट में बेटा के फटकारत समझावत बाप के मौजूदगी आ नैहर से मिलल पंखा के रख रखाव में ससुरारीवालन के साथे मेहरारुन के उपेक्षाभाग त सिद्धार्थ जी के भावुक क देलस. सूर्यदेव पाठक “परागो” एकर समीक्षा कइलीं.

कृष्णानगर कालोनी में सुधा संस्कृति संस्थान का कार्यालय पर भइल एह बइठकी के दुसरका सत्र में रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी, नरसिंह बहादुर चन्द, धर्मदेव सिंह “आतुर”, आचार्य ओमप्रकाश पाण्डेय, रामसमुझ “सांवरा”, चन्देश्वर “परवाना”, के॰ एन॰ “आजाद”, अवधेश शर्मा “सेन”, हरिवंश शुक्ल “हरीश”, केशव पाठक “सृजन”, आ अब्दुर्रहमान गेहुआँसागरी के काव्यपाठ भइल.


(बइठकी के संयोजक आ संचालक सत्यनारायण मिश्र सत्तन के रपट)

संत तुलसीदास जी

– इं॰ राजेश्वर सिंह

महीना के जवने तिथि के जनमि के, सवा सौ साल से अधिक जियले के बाद, ओही तिथि के आपन देहि तजि के दुनिया से सदा-सदा खातिर चलि जाये वाले विरले लोगन में से तुलसीदास जी एक हउअन. तुलसीदास जी कऽ जनम उत्तरप्रदेश में जिला बॉंदा के गॉंव राजापुर में सम्वत् 1554 के सावन अँजोरिया सतमी, माने कि शुक्ल पक्ष के सप्तमी तिथि, के भइल रहल. उनके बाउ कऽ नाम आत्माराम दूवे अउर माई कऽ नाम हुलसी रहल. कहल जाला की ऊ माई के पेटे में बारह महीना रहले के बाद दुनिया में आइल रहलन जब कि आमतौर से लइका नव-दस महीना बादे माई के पेट से बाहर दुनिया में आ जालन. सगरो लइके जनमते रोवे सुरु कइ देलन लेकिन तुलसीदास जी पइदा होते ‘राम़’ बोल पड़लन. एतने नाही उनके मुहें में बत्तीसो दॉंत रहल अउर कद काठी पॉंच बरिस के लइका नियर रहल. उनके देखते सगरो देखबइया घबरा गइलन. अचरज देखि के सव केहू बाउर भइले के अंदेसा से भरि गइल. उनकर महतारी तीन दिन बादे दसमी के दिन अपने दाई चुनिया के हाथ उनके सौंप के ओहके ससुरारी भेज दिहली अउर अगिले दिन दुनिया छोड़ के स्वर्ग कऽ राहि धइलीं. चुनिया बहुते लाड-पियार से लइका के पलली-पोसली लेकिन पॉंच बरिस कऽ उमर होत-होत उहो दुनिया छोड़ दिहली. लइका अब अनाथ हो गइल.

स्वामी नरहर्यानन्द जी कऽ नजर एह लइका पऽ पड़ल. ऊ एहकर नाम ’रामबोला’ रखि के अपने साथे अयोध्या जी लेके चलि गइलन अउर पाले-पोसे लगलन. स्वामी जी इनके पढाईओ-लिखाई कऽ व्यवस्था कइ दिहलन. तेज बुद्वि कऽ भइले के कारन जल्दिये तमाम विद्या कऽ जानकार हो गइलन. काशी में जाइके बेद-शास्त्रो कऽ भरपूर पढाइ कइ लिहलन. पढाई पूरा कइले के बाद स्वामी जी कऽ आज्ञा लेइके अपने गॉंव राजापुर लवटि पड़लन लेकिन गॉंव में घर-दुआर अउर परिवार कऽ नास हो गइल देखि के दुखी भइलन. गॉंव में अपने परिवार जन कऽ यादगार कायम रखि के रहे लगलन अउर गॉंव बासिन के ’राम-कथा’ सुनावे लगलन. सम्बत् 1583 में रत्नावली नाम के एक सुन्दर-सुशील लइकनी से बिआह हो गइल. रत्नावली बड़ी विद्वान रहली. दूनो जनी सुख से गांव में रहे लगलन. एक बार रत्नावली कऽ भाई उनके अपने साथे माइके लिया के चलि गइलन. रामबोला से वियोग सहि ना गइल. ऊ पीछे लागल ससुरारी चलि गइलन. रत्नावली के उनकर एतना लगाव नींक नाही लागल. ऊ उनके धिक्कारत कहि पड़ली –
अस्थि चर्ममय देह मम, तामे ऐसी प्रीति.
तैसी सो श्री राम मह होत न तब भव भीति..
यानी की हाड़-मास कऽ हमरे देही से जइसन लगाव आप कइले बाड़ी तइसही जे श्री राम जी के पांव से लगवतीं तऽ कल्यान हो जात. एह संसार के भय से छुटकारा मिल जात, मतलब मोक्ष हो जात.

रत्नावली कऽ ई बचन सुनते रामबोला कऽ आंखि खुलि गइल. बोली कऽ एतना असर भइल की ऊ तुरते प्रयाग चलि पड़लन अउर साधुवेष धारन कइ लिहलन. राम भक्ति में आपन पुरहर धियान लगा दिहलन. तीरथ-ब्रत, धियान अउर पूजा-पाठ में लगल रहले से काक भुशुण्डिजी अउर हनुमान जी कऽ दर्शन पवलन. हनुमान जी कऽ आदेश ’रामचरित मानस’ लिखे कऽ पवलन जवने से संत तुलसी दास के नाम से इनकर प्रसिद्धि भइल.

सम्वत् 1631 के रामनवमी के दिन से ऊ ’रामचरित मानस’ कऽ लिखाइ सुरु कइलन, 2 बरिस 7 माह 26 दिन बाद सम्वत् 1633 के माघ अँजोरिया पक्ष में रामविवाह के दिन पूरन कइलन. रामचरितमानस एक अइसन किताब हउए जवना के सगरो हिन्दू बड़े चाव से अपने घरे रखेलन अउर बॉंचेलन. तुलसीदास जी रामचरितमानस के बालकाण्ड में खुदे लिखले बाड़न –
सम्वत् सोलह सौ इकतीसा, करऊँ कथा हिरपद धरि सीसा..

तुलसीदास जी हनुमान जी कऽ दर्शन कइसे पवलन एहकर कहनी एह मतिन सुने के मिलेला –
तुलसीदास जी रोजाना शौच खातिर गंगापार जायें. लवटानी में लोटा में बचल पानी एक पेड़े के जड़ में गिरावत आगे बढि जायं. पानी पवले से पेड़ के हरिआई में कमी ना आवे. ओह पेड़ पऽ एगो प्रेत कऽ बास रहे. प्रेत पानी गिरवले के क्रिया से तुलसीदास जी से प्रसन्न होई के उनके समने प्रकट भइल अउर कहलस कि ’हम तुहसे खुश हईँ तूँ जवन वर चाहऽ तवन हमसे मांग. तुलसीदास जी कहलन की हमके रामजी कऽ दर्शन करा द. प्रेत कहलस की हम ई तऽ ना करा पाइब लेकिन एक उपाय हऽ. हनुमान जी दर्शन करा सकेलन. तुलसीदास जी कहलन की हनुमानजी कइसे मिलिहे? प्रेत बोलल – मन्दिर में रोज साँझे राम कथा होले ओहिजे हनुमान जी नियम से कोढी कऽ भेष बना के आवेलन. कथा सुरु भइले के सबसे पहिले आवेलन अउर समाप्त भइले पऽ सबसे बाद में जालन. ओहीजे जाइके उनही से प्रार्थना करऽ. उहे रामजी कऽ दर्शन करा सकेलन. तुलसीदास जी कथा वाले जगही पऽ पंहुचि के हनुमान जी के गोडे़ पऽ गिर पड़लन अउर दर्शन करावे खातिर प्रार्थना करे लगलन. हनुमान जी कहलन कि चित्रकूट जा. उहवें भगवान श्री रामजी कऽ दर्शन होई. तुलसीदास जी चित्रकूट जा पहुंचलन. जंगल में दुइगो राजकुमार के एक हिरन क पीछा करत देखलन. देखत-देखत राजकुमार आंखि से ओझल हो गइलन. ओहमें से एक सांवर रहलन अउर दूसर गोरहर. आंख से ओझल होते हनुमान जी प्रकट होइ के तुलसीदास जी के बतवलन की दूनो राजकुमारे राम-लक्ष्मण रहलन. तुलसीदास जी बहुत पछिताए लगलन. हनुमान जी धीरज धरवलन अउर कहलन कि पछिता जिन. एकबार फिर दर्शन होई. ओह समय हम इशारा कई के बता देब. सम्वत् 1607 के मौनी अमावस्या के दिन तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पऽ बइठि के चन्दन घिसत रहलन. ओही समय लइका के रुप में भगवान श्री रामचन्द्र जी अइलन अउर चन्दन मांगि के लगावे लगलन. ठीक ओही समय ब्राह्यण कऽ रुप धई के हनुमान जी आइ गइलन अउर गावे लगलन-
चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर.
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रधुबीर..

ई सुनते तुलसीदास जी पहिचान लिहलन अउर भगवान कऽ चरन पकड़ि लिहलन.
नित्य भगवान श्री रामचन्द्र जी कऽ भक्ति में लगल रहले से उनके अन्दर पारलौकिक शक्ति कऽ बढोत्तरी होत रहे. अनेक किताबन कऽ रचना कइलन जवना में रामचरितमानस, कवितावली, दोहावली, गीतावली, विनय पत्रिका, कवित्त रामायण, वरवै रामायण, रामलला नहछू, रामाज्ञा, कृष्णगीतावली, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, राम सतसइ, रामनाममणि, रामशलाका, हनुमान चालिसा, हनुमान बाहुक, संकट मोचन, बैराग्य संदीपनी, कोश मन्जूषा, आदि बहुते चर्चित हउअन. एह काव्यन कऽ रचना कइ के तुलसीदास जी मनइन कऽ बहुते उपकार कइले हउअन जवना से हम सब केहू उनकर ऋणी हईं. सबकर भलाइ करत-करत ऊ एह दुनिया से 126 बरिस के उम्र में सावन अंजोरिया सप्तमी के हमेशा हमेशा खातिर विदा ले लिहलन.

संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर.
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यों शरीर..


इं॰ राजेश्वर सिंह,
मूल निवास – गोपालपुर, गोला, गोरखपुर.
हाल फिलहाल – पटना में बिहार सरकार के वरिष्ठ लोक स्वास्थ्य अभियन्त्रण सलाहकार
उत्तर प्रदेश जल निगम से अधीक्षण अभियंता के पद से साल २०१० में सेवानिवृत
हिंदी में अनेके किताब प्रकाशित, भोजपुरी में “जिनगी क दूब हरियाइल”, आ “कल्यान क जुगति” प्रकाशित. अनेके साहित्यिक आ सांस्कृतिक संस्था से सम्मानित आ संबद्ध.
संपर्क फोन – 09798083163, 09415208520

बतकुच्चन – ६६-६८

बतकुच्चन – ६६

सोमार के बरखा त बरखल बाकिर अबहीं लर नइखे लागल. लर के मतलब त होला रसरी, सूतरी भा धागा बाकिर एकरा के निरंतरता भा लगातार होखे-बोले वाला बातो खातिर इस्तेमाल कइल जाला. का लर ध लिहले बाड़, एके बात के? जइसे कि पिछला दिने नेता दीदी लर ध लिहले रही एके नाम के कि राष्ट्रपति उनुके के बनाइब. बाद में उहे मुकर गइलन कि ना एह लथार‍-पथार में हम गोड़ ना धरब. बुद्धिमान मनई हउवन से एह लरछूतन से अलगे रहे के फैसला कइलन. लरछूत मतलब छूतहा बेमारी जवन एक लर से दोसरा लर ले पसरल जाला. एह पसरला पर धेयान आइल कि लर आ लतर एके तरह के होला. बाकिर लर अपना से ना बढ़े जबकि लतर अपने से बढ़त जाले. लतर लतरेला अपना फल फूल से बाकिर लर ना फरे ना फुलाव. लर का सहारे दोसर लोग बढ़ेला जबकि लतर दोसरा के सहारा लेके खुद बढ़त जाले. लतर कई बेर परजीविओ होले जबकि लर हमेशा निर्जीव चीज होले. हालांकि लर-झर बड़हन परिवार के कहल जाला. लर माने पुरनका पीढ़ी आ झर माने बाद वाली पीढ़ी. जेकर लर-झर ढेर रहेला ओकरा से केहु अझुराव ना. लथर-पथर आ लथार-पथार में फरक होला. लथर-पथर अस्त-व्यस्त होखला पर कहल जाला जबकि लथार-पथार जरूरत-बेजरूरत के बेसम्हार बिटोर के कहल जाला. जइसे कि कूड़ादान में लथार-पथार मिलेला. कई बेर लर-झरो लथार-पथार के रूप ध लेला. जइसे कि गठबन्हन में. गठबन्हन के लर-झर कब लथार-पथार बनि जाई केहु ना बता सके. लर-झर से परिवार के बेकति जरूर बढ़ जाला बाकिर एह बढ़ला से ओकर बेंवतो बढ़े ई पकिया तौर पर ना कहल जा सके. बेकत माने व्यक्ति, परिवार के सदस्य जबकि बेंवत माने क्षमता, ताकत. काल्हु के बरखा से उमेद हो गइल बा कि मानसून दू चार दिन में पश्चिमी बिहार आ पूर्वाचलो ले चँहुप जाई आ जब बरखा के लर धर ली त धान के बोआई कइल आसान हो जाई. पटवन के जरूरत ना पड़ी. पटवन पटइला जइसन सुने में जरूर लागेला बाकिर एकर मतलब होला सिंचाई, खेतन में पानी पटावल. खेत में पानी पटावल आ राजनीति में गईयाँ पटावल एके जस ना होले. गईंया पटावत पटावत कब पटकनिया दे जाई ई बतावल ना जा सके. गईंया के मतलब होला टीम के सदस्य. एह गईंया के गोतिया से मिलवला के कवनो जरूरत ना होखे काहे कि गोतिया गोत्र से उपजल शब्द ह, पटीदार जब पटीदार ना रह जाव त गोतिया हो जाला. ना त गोतिया पटिदार एके तरह के लोग के कहल जाला. पटीदार से कहीं ना कहीं सीधा जुड़ाव होला जबकि गोतिया से गोत्र का सहारे. पटीदार बिजनेस के पार्टनरो के कहल जा सकेला बाकिर ई अधिकतर पारिवारिक संपति के हिस्सेदारे के कहल जाला. पार्टनर खातिर बढ़िया शब्द होला साझीदार. हालांकि एह साझी में कवना कवना चीज के साझा बावे कहल ना जा सके. नेता दीदी नेता जी के आपन साझीदार बनावल चहली बाकिर नेताजी उनुका के धोबिया पाट दे के आपन गोटी लाल कर लिहलें. भगवान भला करे यूपीए के जिनकर साझीदार हो गइल बाड़ें अब नेताजी. का का आ कतना वसूलीहें ई के जानत बा. बाकिर एह बतकुच्चन के लर कहीं त टूटे के चाहीं. देखीं ना लरछूत लेखा कहाँ से कहाँ चलि अइनी. आजु बस अतने.


बतकुच्चन – ६७

जबरा मारबो करे आ रोवहू ना देव. एह भोजपुरी कहाउत के सच्चाई से शायदे केहू के विरोध हो सकेला. आ ई जबरा रउरा कतहींओ भेंटा सकेला. घर में, आफिस में, सफर में, राजनीति में, संगठन में. ओकर खासियत इहे होला कि अपने ऊ कतनो चिल्लाव बाकिर सामने वाला का मुँह पर हमेशा जाबी रहें के चाहीं. अब जाबी जाने नी नू कि कवना चीझु के कहल जाला? मत कहीं कि दँवाइल नइखीं देखले, धान के दँवरी ना होखे गेंहू जौ के जरूर होला. आ दँवरी होखत घरी दँवरी करे वाला बैलन का मुँह पर जाबी पहिरावल रहेला कि ऊ मुँह मत मारे आ चुप चाप दँवरी करत रहे. जाबी कवनो चीझु से बनल हो सकेला, बस मुँह बान्हे लायक होखे के चाहीं. अब जबरा के पीटल आ बएला के दाँवल एके जइसन नू होला. दुनु के मकसद एके होला कि सामने वाला के एतना तूड़ दीं कि ओकर सब कुछ जबरा का हाथे लाग जाव. पिछला दिने राजनीति के एगो जबरा देखे के मिलल जे अपने संघतिया का मुँह पर जाबी लगावत कहलसि कि तू आपन नेता चुन लऽ. चुने के काम तोहार बा बाकिर बस अइसन चुनऽ जवना के हम चाहऽतानी. आ तोहरा लगे केहू ओइसन नइखे त हमरे में का बुराई बा हमरे के आपन नेता घोषित कर द. एकरा बाद त ढेर दिन से दमि सधले ढेबुसा बेंग निकले लगलें आ टर्र टर्र शुरु हो गइल. बाकिर कहल गइल बा नू कि ना अति बरखा ना अति धूप, ना अति बोलता ना अति चुप. अति कवनो चीझु के खराब होले. अति के अंतो जल्दिए हो जाला. तबे नू एगो ट्रक का पीछे लिखल देखनी कि जुल्म किए तीनो गए धन धरम और वंश, ना मानो तो देख लो रावण कौरव कंस! रावण के अतिए के परिणाम रहल कि एक लाख पूत सवा लाख नाती ओकरा घरे दिया ना बाती. एह बात के हमेशा धेयान में राखे के चाहीं आ कबो कवनो बात के अति ना करे के चाहीं. जबरा तबहिए ले मार सकेला जबले मार खाए वाला बरदाश्त कइले बा. जहिया ऊ तय कर लिहलसि बस तहिये बस में आ जाए के पड़ेला हर जबरा के. पिछला दिने इमरजेन्सी के बरखी मनावल गइल. हालांकि कवनो बेसी चरचा ना भइल काहे कि इमरजेन्सी के समर्थक आ विरोधी दुनु छितरा गइल बाड़ें आ दुनु तरफ मौजूद बाड़ें. बाकिर एक बात त मानही के पड़ी कि तब सरकार के लागल रहे कि विरोध के अति होखऽता त ऊ इमरजेन्सी लगवलसि आ जब लोग के लागल कि ई अति हो गइल त बरेली का बाजार में झुमका गिरही के रहल गिरबो कइल. हालांकि ओकरा बाद जवन भइल तवन दोसरे तरह के अति हो गइल. ढेर दिन से बेमार आदमी के ठीक भइला पर अचके भारी गरिष्ठ खाना ना दिहल जाव खाए के. ओकरा के पथ दिहल जाला. पथ माने पथ्य जवन आसानी से पच जाव. काहे कि ना पचे वाला भोजन अएगुन कर सकेला, नुकसान चहुँपा सकेला. अएगुन अवगुण से बनल बा आ जबरा में अवगुण भरल होला. जबर होखल अपने में एगो अवगुण होला जवन अएगुन करबे करी. आ जबरा के उलटा होला अबरा, अबर. अबर माने जेकरा में बर, बल, ना होखे. जे बरियार बा से जबरा बनि जाला जे बरियार ना होखे ओकरा अबर बनि के जिए पड़ेला. बाकिर हमेशा याद राखीं कि केहू के जबरा बनावे का पाछा सामने वाला के अबर होखल जरूरी होला. एहसे अबर मत बनीं कि जबर झेले के पड़े.


बतकुच्चन – ६८

आजु बतकुच्चन लिखे बइठल बानी त दिमाग में भगाड़ जइसन बन गइल बा. भगाड़ जानीले कि का होला? कवनो बड़हन गड़हा के भगाड़ कहल जाला आ मकान बनावत घरीओ भगाड़ बनावल जाला जवना में मकान बनावे के मसाला फेंटल जाला. ऊ मसाला पुरनका जमाना में माटी आ बस माटी होत रहल, बाद में सुर्खी चूना आइल आ आजु का जमाना में सीमेंट बालू छर्री. कुछ अइसने एगो बड़हन भगाड़ वैज्ञानिक बनवलें जमीन का डेढ़ सौ मीटर गहिरा में जहाँ ऊ लोग गॉड पार्टिकिल के खोज करे खातिर आपन प्रयोग कइल. आजु ओह प्रयोग के कुछ जानकारी देत वैज्ञानिक लोग दावा कइले बा कि अब ऊ लोग गॉड पार्टीकिल का बहुते नजदीक ले चहुँप गइल बा आ एह प्रयोग में गॉड पार्टिकिल जइसन कुछ कण के झलक देखे के मिलल बा. अपना देश के चउबीस घंटा चले वाला खबरिया चैनलन पर भर दिन चलल. मिल गइले भगवान, वैज्ञानिक भगवान के खोज निकललें, भगवान कण मिल गइल वगैरह वगैरह अनेके मथैला देखे के मिलल अलग अलग चैनलन पर जहां हर केहू एह फिराक में रहल कि कइसे एह खबर के दोसरा से बेसी मसालेदार बनावल जा सके. एह खबर का बीच में ऊ खबर दब गइल जवना में कहल गइल बा कि एक जने के दस्तखत वाला कागज फर्जी ह. सब भगवान के कृपा. खुदा मेहरबान त गदहा पहलवान. बाकिर आजु हमहू भगवाने कण का बारे में बतियाएब काहे कि कुछेक बेर हमार चेक बैंक वाले एहले कैंसिल कर दिहलें कि हमार दस्तखत मिलत ना रहे उनुका रिकार्ड से. ऊ ई त मानलेसु कि हम सहीं हईं आ दस्तखतो हमरे ह बाकिर उनुका खातिर त ओह रिकार्ड से मिलावल जरुरी होला. खैर. लवटल जाव गॉड पार्टिकिल का तरफ. कहल गइल बा कि हममें तुममें खड़े खंभ में घट घट व्यापे राम! आ वैज्ञानिक ओही के खोज में लागल बाड़ें जे सबका में बा आ कतहूं नइखे. जेकरा बिना कवनो दोसरा चीज के अस्तित्व ना हो सके बाकिर खुद जेकर अस्तित्व सिद्धांत से आगा बढ़ के साबित ना कइल जा सके, देखल देखावल ना जा सके. कहे के त ओह कण के नाम दिहल गइल हिग्स बोसान कण बाकिर वैज्ञानिको लोग का बातचीत में ओकरा के गॉड पार्टिकिल कह कह के संबोधित कइल जाला. अब ऊ त रहल विज्ञान के बात हमरा जइसन बतबनवन का बस के बाहर. बाकिर अगर बतकुच्चना बतकु्च्चन कर के बात के कूच काच ना सके त ओकरा रहले ना रहले में का अंतर. से हम सोचे लगनी कि एह सब का बीच कवनो खबरिया चैनल एह बात के खबर काहे ना लिहलसि कि भगवान के भगवाने काहे कहल गइल कुछ अउर काहे ना? आ गाड़ी चलावे वाला के गाड़ीवान, दरवाजा सम्हारे वाला के दरवान, पहल करे के ताकत राखे वाला के पहलवान कहल जाला त भगवान कवना भग के मालिक भा चलावे वाला हउवें ? भग के कई गो मतलब होला बाकिर सबसे सटीक मतलब होला नारी जाति के जननांग जहाँ से सभे कुछ जनमेला. आ एही जनला का चलते भगवान के भगवान कहल गइल काहे कि ऊ सब कुछ के जनले. उनुका बिना दोसरा कवनो चीज के अस्तित्वे ना हो सके. भग सूरजो के कहल जाला. काहे कि अइसन मानल जाला कि सगरी उर्जा के जने वाला सूरज हउवें आ ओही उर्जा से सब कुछ जनमेला से सूरज के भग कहला में कवनो गलती ना होखी. अब भगवान आ भाग्यवान सुने में बहुत कुछ एके जइसन लगला का बावजूद अलग होलें. भाग्यवान भाग्य वाला के कहल जाला जेकरा के भगवान चुन ले लें सौभाग्य बाँटे खातिर. ओकर हर गलत सही मान लिहल जाला काहे कि ऊ भाग्यवान हऽ आ ओकरा के एगो भगवान आपन उम्मीदवार बना लिहले बाड़ें. लिहले बाड़ी शायद व्याकरण का हिसाब से गलत हो जाई, बा कि ना?