करप्शन से विकास होला आ रोजगार बढ़ेला

– जयंती पांडेय

गुरू लस्टमानंद मार कुर्ता धोती अपना बेग में से निकाल के बिगत रहले साफ करे के. अतने में राम चेला अइले. दंडवत क के पूछले का ह हो बाबा कई दिन से ना लउकलऽ. कहां चल गइल रहल ? बाबा कहले, दिल्ली गईल रहीं. राम चेला के चेहरा पर सवाल रहे जेकर माने कि काहे के? कहले भ्रष्टाचार पर सेमिनार रहे. गवई भ्रष्टाचार मुख्य विषय रहे. अब ऊ त अण्णा पार्टी बोलवले रहे आ पिटाई के खतरा रहे एही से कवनो चैनली पत्रकार त आइल ना. हार पाछ के हमनी के बोलावल लोग.

ओहिजा का बताई कि चारू ओर से करप्शन के प्रतिनिधि लोग आइल रहे. झारखंड से उत्तराखंड ले आ बंगाल से बनारस ले. सब ओर से भ्रष्टाचार. उहां सेमिनार के आयोजक कहले कि विचार के विषय बा कि, मीडिया में करप्शन के बड़ा बदनामी हो रहल बा. ई बदनामी के हटावे खातिर कुछ करे के चाहीं. सब तरह आ वेराइटी के करप्शनन के, के राय धइल कि मीडिया में सबके बात आवे ला. कभी करप्शन के आपन पीड़ा केहु ना कहल. एगो करप्शन के आपन नजरिया से सम्बद्ध लेख तइयार कइल जाउ आ मीडिया के दिहल जाउ. सब लोग तइयार हो गइल. एह में सबसे बड़हन बात ई बा कि सब बहस इमानदारी के नजरिया से होला. बेइमानी के एंगल से केहु ना देखे. आखिर ओकरो बात त सुने के चाहीं. मीडिया चाहे अण्णा पाटीं के लोग कहेला कि करप्शन बड़ा खराब चीज ह. एकरा से दूर रहे के चाहीं. लेकिन हमरा रात में अचानक करप्शन महराज सपना में अइले. हमरा से कहले लस्टमानंद, भले हम अबहीं तनी कमजोर पड़ गइल बानी, सब लोग कहऽता कि एकरा मेटा के रहब लेकिन केहु ई नइखे पूछत कि ओकर आपन नजरिया का बा.

करप्शन के बड़ा फायदा बा. सबसे बड़हन बात बा कि एह से विकास के गति तेज हो जाला. दासरका फायदा बा कि करप्ट आदमी सुस्त ना हो सकेला. जब देख तब जोगाड़ में लागल रहेला. कबहु शांति से ना बइठ सके. कुछ करे के चक्कर आ ओकरा बाद जवन क देहलस ओकरा के बचावे के आ खुद बांचे के चक्कर. इहे ना करप्शन से डबल विकास होला. जइसे मान ल कि कहीं एगो पुल बनऽता. अब इमानदारी से त पुल बनी लेकिन करप्शन से एगो पुल बनी आ ओही में से थोड़ सीमिंट, छड़, पइसा वगैरह निकाल के कहीं एगो बंगलो बनि जाई. अरे बंगला मान लऽ अपने बनल लेकिन विकास भइल न. एगो बजट में पुलो बन गइल आ बंगलो बन गइल. एतने ना इमानदारी से रोजगार मिलेला आ करप्शन रोजगार के संभावना बढ़ावे ला. अब मान ल कि एगो रोड बनऽता. ओह से एक बेर कुछ लोगन के रोजगार मिल गइल. अब करप्शन का करी कि ओह रोड के अइसन बनाई कि तीने महीना में टूट जाई. अब ओकरा मरम्मत के खातिर कुछ लोग के रोजगार मिल जाई. ओकर बजट आयी त फेर कवनो घर बन जाई चाहे गाड़ी किना जाई आ फेर तीन महीना के बाद सड़क दूट जाई त फेर इहे चालू हो जाई. रोजगार आ आमदनी के प्रचुर इंतजाम एगो सड़क से. हां कुछ लोग कहेला कि करप्शन चुप चोरी होला. अरे भाई अतना चुप चोरी होइत त अतना खबर कइसे फइलित ? एह से मीडिया से निवेदन बा कि ऊ करप्शन के पाछ छोड़ देऊ.

आपन भाषण खतम क के जब लस्टमानंद सांस लेहले तले ठीकदार साहेब उनका के फरका बोला ले गइल. का जाने का बात रहे.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

अकाल राहत के स्वागत में अफसर

– जयंती पांडेय

बाबा लस्टमानंद जिला मुख्यालय गइले. उहां अजब माहौल रहे. चारू ओर खुसी से अफसरान अमला मातल रहे. पते ना चले कि का भइल बा. एगो परिचित से पूछले त पता चलल कि ई समय पर बरखा ना भइला के खुसी ह. अब सब बात उनका समझ में आ गइल. ऊ बूझि गइले कि इहवां काम ना होई आज. गांवे गइले त रामचेला पूछले कि का हो बाबा जवना काम खातिर कलक्टरी में गइल रहलऽ ऊ भईल ?

बाबा कहले, ना हो.

काहे, रामचेला सवचले.

बाबा कहले, का बताईं? पूरा कलक्टरी बरखा ना होला आ अकाल क्षेत्र घोषित होखे के उमेद में मस्त बा. सब लोग खुसी से सराबोर बा.

अइसन काहे, रामचेला पूछले.

बात ई ह कि तूं त ठहरलऽ एक दम देहाती भुच्च. अरे अकाल आवेला त अकाल राहत के करोड़ो रुपिया सम्बद्ध विभागन के मन में केतना ठंडा पहुंचावेला, ई तूं का जनबऽ. ई रहस्य ऊ विभाग के अफसरन आ उनकर चमचन से पूछऽ. अकाल सरकारी विभागन खातिर एगो दीया ह जे अपने त जरेला लेकिन दोसरा लोगन के जिनगी में अंजोर ले आ देला. राहत के भारी रकम कतना राहत देला ई तूं अकाल पीड़ित गिरहथन से जनि पूछ, ई बात तूं नेता लोगन, अफसर लोगन आ उनकर चमचन से सवाचऽ.

भाई रामचेला, जानि जा जे कि ई त सब उनका टीपन के फल ह. एह में हम चाहे तूं का कर सकेनी सन. अब बरखा ना भइल, धरती फाटि गइल आ फसल मरि गइल त एह में ऊ लोग के का दोस बा. ऊ त भाग कहऽ कि उनका सर्विस काल में एगो दूगो अकाल परि गइल आ बाढ़ि आ गइल ना त ऊ बेचारा लोग के जीवन त बे पइसे के, बिना कवनों बजट के कटत रहे. काल्हु ले जे लोग मंत्री से संतरी तक के घोटाला में मगज मारत रहे आज बुझाता कि उनका जीवन में बहार आ गइल. मंत्री लोग के घोटाला से ऊ लोग के जीवन में हीन भावना भर गइल रहे कि हम पूरा सर्विस कुछ ना कर पवनी आज अकाल के घोषणा भइला से संभावित घोटाला के कल्पना से उनकर मन हरिअर हो गइल बा. लोग कल्पना में डूबि गइल. कतना लोग के घर बन जाई आ बेटी के बियाह हो जाई. चुनाव पर घटत विस्वास आ भ्रष्टाचार के चिंता में अब ऊ अफसर लोग के परे के ना परी. उहो लोग के मौका मिल जाई. काल्हु ले जे एक किलो आलू कीने के हिम्मत ना करत रहे आज पूरा बजार कीने खातिर ताल ठोकऽता. अब राहत राजा के स्वागत में सब अफसर लोग लागल बा.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

हाथ के संगे लेकिन हाथ भर फरका

– जयंती पांडेय

सब केह हाथ के संगे बा बाकिर हाथ भर फरका. शरद पवार भईया खिसियाइल बाड़े. उनका के देखि के बुझाला ना कि खिसियइबो करेले. हमशा खुशे लऊकेलें. लेकिन खिसिया गईल बाड़े. ऊ त अईसन जीव हउअन कि यूपीए के आठ बरिस में कबहुओं ना खिसिअइले. ओहु समय ना जब ई कहल गईल कि महंगी से पार पावे नइखे आवत. ओहु समय ना जब उनका पर आरोप लागल कि ऊ दाम बढ़े घटे के भेद व्यापारी लोगन के दे देत रहले, उहो समय ना खिसियइले जब कांग्रेसी भाई लोग कहल कि ऊ खाद्य मंत्रलय नईखन चला पावत त छोड़ि देस हमनी का चला लेब सन. ओहु समय ना जब सबलोग खिसियात रहे, रंज होत रहे. यूपीए के पहिलका समय में लेफ्ट खिसिया के साथ छोड़ दिहलस, द्रमुको कबो- कबो रंज हो जात रहे बाकिर पवार जी ना खिसिअइले.लेकिन अब ऊ खिसिया गईल बाड़े तबो कहतारे कि साथ ना छोड़ेब.

अब देखऽ सभे कि ऊ आठि बरिस ना खिसिअइले लेकिन चुनाव जब दू बरिस बा त खिसिआ तारे. जब खिसिअइले त एकदमे जामा से बाहर हो गइले जइसन बंगाल के दीदी करेली. लेकिन चिंता के कवनो बात ना. काहे कि पवार चाचा कहतारे कि ऊ कांग्रेस के हाथ ना छोड़िहें. भले गारी दिहें, आलोचना करिहें, कमी गिनइहें लेकिन हाथ धईले रहिहें. ऐने सुनल जाता कि दीदीओ चाहे जेतना खिसिआस लेकिन यूपीए में बनल रहिहें. हँ त प्रणव बाबा के वोट दे के ऊ खुस ना भइली आ कहली कि मजबूरी में ई करे के परल. अइसन ना होखो कि एक दिन कहि देस कि यूपीए में मजबूरी में रहतानी. ओकरा से खुस नईखी, ओकर कवनो बात ना मनिहें लेकिन साथहे रहिहें. हालांकि ऊ बंगाल में कांग्रस के संगे नईखी. इहे हाल द्रमुक के बा. हं ईबार वाला यूपीए में ऊ ओइसन नईखी नाराज जईसन पछिलका बेर होत रही. ऊ समय दोसर रहे. ऊ कांग्रेस के धमकाइओ देत रहली आ अलगा होखे के बातो कहि देत रहली. लेकिन अबनी बार ऊ जलवा नईखे. मुलायमो जी यूपीए के संगही रहिहें. हां ई कहऽ कि ओकरा घर में ढुकिहें लेकिन खान पान दिल्लगी ठठ्ठा चलत रही. एहि से जवन पैकेज उनका मिलल ऊ दीदी के ना मिलल. असहीं मायावती जी के देखीं. ऊ मोलायम के साथ ना रहिहें लेकिन यूपीए के हाथ ना छोड़िहें. ई बात दोसर बा कि राहुल बबुआ के गरिआवत रहिहें. लेकिन साथे रहिहें. माने कि घर में झगरा कतनो भारी होखो पर साथे रही लोग, चाहे हाथ भर फरके काहे ना रहे लोग.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

धमकावे आ धमकियावे के आपन फायदा

– जयंती पांडेय

बाबा लस्टमानंद एकदम मूड में रहले. आज काल बड़हन नेता लोगन के धमकावे आ ऊहो अपना से छोटकन के धमकावे के मामला पर चर्चा में कहले, जान जा रामचेला कि धमकावे के आपन फायदा होला आ धमकियावे के अलग. जे धमकावे ला ऊ तऽ जान जा कि रातेरात मीडिया में बढ़ि के मसहूर हों जाला आ जेकरा धमकियावल जाला ऊ तऽ भर रात सहानुभूति के छंइटी मूड़ी पर ध के घूमत रहेला. जे धमकावे ला ऊ हीरो हो जाला आ जेकरा के धमकावल जाला ऊ….

रामचेला कहले, जीरो!

बाबा कहले , भाग बुड़बक, आजु मीडिया के जमाना में केहु जीरो ना होला. जेकरा धमकावल जाला ओकर सब दोस माफ. लोग लागेला पुचकारे, सहानुभूति देखलावे. लागे ला लोग कहे कि ‘अरे ऊ कमवा तऽ ठीके करत रहे बाकिर बड़का लोगवा करे देउ तब नु?’ अइसन हालत में ऊ आदमी कम आ बेचारा बेसी लागेला. बस रोआइन मुंह बनवले चुपचाप चारु ओर तिकवत रहेला. शालीनता के मुखौटा लगवले रहेला. अइसन मुखौटा पहिलको जमाना में रहे आ आजुओ बा आ काल्हुओ रही. हर पार्टी के हर बड़हन नेता के अइसन मुखौटा के दरकार होला. काहे कि ऊ अचके बहड़हन त बन ना गइल. जइसे सासो कबहुओं पतोह होली सन, दहीओ कबहुं दूध होला ओसही बड़को नेता छोटका नेता रहेला आ हमेसा बड़कन के आगे छोट बनत रहे के परेला. लेकिन जान जा कि ई मुखौटन के परसानी तब बढ़ जाला जब ऊ अपना के असली चेहरा बूझे लागे. जबले नाप के मुस्काई आ तौल के बोली तबले त ठीक बा जसहीं ऊ अपना के प्राणधारी बूझे लागी ओसहीं संकट चालू हो जाई आ ओकरा के उपेक्षा के गरम कुंड में बिग दियाई.

मुखौटन के परसानी ई बा कि ऊ हमेसा एके नाहिन रहेले सन. ना दुख में दुखी ना सुख में सुखी. आ एने लोकतंत्र के मजबूरी होला कि हमेसा नाटक करे के परे ला आ जब हंसे के चाहे खुशी देखावे के बेरा आवे ला त ऊ लागे ला मुंह बिसूरे. बिना आला कमान के परमिसन के ऊ त कुछ ना कर सके. अइसन मोका पर उहे सफल होला जे आपन चदर देखि के गोड़ पसारी आ जगहि देखि के पांख निकाली. मुखौटा सदा हरान रहेले सन आ रोआइन मुंह बना के कुर्सीमान रहे ले सन. आपन कवनो पहचान ना बने.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

नेतवो बिला जइहें लोग त देस में बांची का?

– जयंती पांडेय

सबेरे सबेरे रामचेला बाबा लस्टमानंद के दुअरा अइले आ लगले गादे करे. बाबा अचकचा के उठले, का हो का अतना प्राण तेयगले बाड़ऽ? सब ठीक बा नऽ? का ठीक बा बाबा, तूं त भईंस बेचि के सुतल बाड़ऽ, देस दुनिया के कवनो फिकिर कहाँ बा.

अरे भईल का? बतइबो करबऽ कि बस खाली चिचिआत रहबऽ.

अरे का बताईं बाबा? चारू ओर आंदोलन चल रहल बा. केहु महंगी से परेशान बा त केहु भ्रष्टाचार से हरान. केहु पेट्रोल के दाम बढ़ला से पसेने पसेने त केहु लइकिन के प्रति अपराधन से. जेने देखऽ अशांति बा. आंदोलन चल रहल बा, कवन कवन नेता एह में लागल बाड़े. एक इयोर जेकर गर्दन काटऽता लोग दोसरा ओर ओही के समर्थन में नारेबाजी करऽता लोग.

अब जान जा रामचेला कि नेता आ जनता में सद्गति आ दुर्गति के पुरान परम्परा ह. नेता एलेक्शन लड़ेलें, जनता वोट देले, नेता भाषण देला, जनता ताली बजावेले, नेता झूठ आश्वासन देला जनता ओकरा पर भरोसा करे ले. नेता कुकर्म करेला, जनता फल भोगेले. नेता भारत बंद करावेला, जनता पेट दाब ले ले. नेता गरीबी हटावल चाहे ला, जनता गरीबी के पिंड ना छोड़े ले. साँच त ई बा कि देश में पेट्रोल के जगहा जनता जरऽतिया.

अपना बात से त तूं सीरियस कन्फ्यूजन पैदा कए दिहलऽ. तहरा कहे के माने ई बा कि ई जे बाबा राम देव, ऊ केजरीवाल साहेब, चाहे किरण दीदी जवन करऽता लोग ओकरा से कवनो फायदा नइखे का?

काश अइसन होइत. ऐह में त नेता बा लोग लेकिन केहु अइसन नइखे जे जनता खातिर लाठी खा सको. इहां त हाल ई बा कि लाठी के भय से लोग मेहरारुन के कपड़ा पहिर के भागऽता. ओतना आंदोलन भइल ओह में तूं ही बताव केहु के खरोंच ले लागल?

ई जान जा कि अबसे पहिले आंदोलन नेता के हाथ में रहत रहे अब नेता लोग आंदोलन के हाथ में बा.

तूं त अईसन भूमिका बान्हऽतारऽ, लेकिन ई बतावऽ कि करप्शन आ महंगाई खातिर के जिम्मेदार बा?

ई बात ठीक कहलऽ. करप्शन खातिर त सांचो सरकार जिम्मेदार ह लेकिन महंगी के मामला ओकरा पर ना ठोकाई.

काहे ना ठोकाई, अगर मनमोहन सिंह दोषी ना रहते त एकरा बारे में कुछ बोलते ना.

कइसे बोलिहें? उ कहाउत सुनले बाड़ऽ कि ना कि जवना डाली पर बइठल जाला ओह डार के काटल ना जाला, चाहे जवना थरिया में खाइल जाला ओह में छेद ना कइल जाला.

तब ई बतावऽ कि मंहगी आ भ्रष्टाचार असहीं रही, केहु दूर ना करी?

सांचो रामचेला तूं बुद्धि से एक दम गोल बाड़ऽ, पूरा बकलोल बाड़ऽ. अरे अगर ई दूर हो जाई त नेता के का होई। नेता प्रजाती पर जुलुम काहे करऽतारऽ? अबहीं त बाघे विलुप्त हो रहल बाड़े सन, नेतवो बिला जइहें लोग त देस में बांची का?


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

अखिलेश के उल्टा घूम गइला से विधायक दुखी

– जयंती पांडेय

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपना राज्य के विधायकन के एमएलए फंड से गाड़ी कीने के औडर दे देहलें त उनका ई औडर से विधायक लोग बड़ा खुस भइल लेकिन बाद में अनासे कहि दिहले कि औडर कैंसिल. अब ऊ लोग के आसा पर पानी पड़ गइल. अब मीडिया चाहे जनता के सामने विधायक लोग चाहे जवन कहो लेकिन सांच त ई ह कि सरकार के ई फैसला से ऊ लोग गदगद रहे. लेकिन फैसला लेहला के चौबीस घंटा क भीतरे ओकरा के पलट दिहल गइल. ई फैसला पलट से विधायक लोग के स्थिति बहुते विचित्र हो गइल. ऊ लोग फैसला रद्द कइला के विरोध में कुछ बोल ना सके काहे कि जनता लागि थूके. लेकिन एह से विधायक लोग के चमचा लोग आ परिवार के लोग आ मेहरारू लोग बड़ा खिसियाइल बा.

यूपी में भला अइसन कवन विधायक होई जेकरा लगे गाड़ी ना होखो. बिना गाड़ी वाला लोग के राजनीति में के पूछेला? अइसन लोग के कवनो पार्टी टिकटो ना दी. जब ई चर्चा उड़ल कि विधायक फंड से गाड़ी कीने के अनुमति मिले वाला बा त कई गो विधायक लोग अपना प्रेमिका के 20 लाख के गाड़ी देवे के वादा क दिहल लोग. कुछ लोग त अपना खास चमचन पर मेहरबानी करे के मन बना लिहल त कुछ लोग अपना सार सारिन के देवे के सोचे लागल. हालांकि कुछ ईमानदार बुजुर्ग विधायक ई सोचे लागल कि चल इहे बेटी के दहेज दिया जाई. लेकिन मामला खाली गाड़ी ले नइखे. मुख्यमंत्री त खाली गाड़ी के मांग मंजूर कइलें. कुछ समय से उनका लगे अर्जी दिहल जात रहे कि एम एल ए फंड से अपना देहिओ पर खर्चा करे के मंजूरी मिलो.

कुछ विधायक लोग त मांग कइले रहल कि एम एल ए फंड से जनता खातिर सार्वजनिक रूप में नाच गाना करवावे के मंजूरी मिलो काहे कि जनता के प्रतिनिधि होला क चलते जनता के मनोरंजनो करवावल उनकर कर्त्तव्य ह आ एकर पइसा एम एल ए फंड से भुगतान कइल जाउ. हर हफ्ता कम से कम दू गो नाच चाहे पचास लोग के सिनेमा देखावे के छूट मिले. कुछ विधायक त एही फंड से विदेश जाए के मंजूरी चाहत रहे लोग. ऊ लोग के मांग रहे कि फारेन टूर जनता के हित में होई, ऊ लोग विदेशी तरक्की आ आचरण के अध्ययन कर अपना क्षेत्र में उपयोग करी लोग. एह से जनता के विकास होई. लेकिन सब पर पानी पड़ गइल.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

कबहुं केहु सब्जी तरकारी के बारे में सोचल?

– जयंती पांडेय

एक दिन बाबा लस्टमानंद बड़ा दुखी हो के रामचेला से कहले, हो भाई जदि तोहरा थरिया में परल तरकारी ठीक ना बनल त तूं का अपना मेहरारू के गरियइबऽ कि उल्टा सीधा बोलबऽ? ना नु. लेकिन केहु सब्जी के भावना के खेयाल ना करे. ऊ त आपन खीस सब्जियन पर निकाल ले ता. अब देखऽ केहु के औकात देखावे के बा त कहल जाई ‘तूं कवना खेत के मुरई हउअ?’ अब ई सुनते जेकरा के कहल जाई ऊ झगड़ा क दी. लेकिन कबहु केहु सोचल कि मुरई के कानफिडेंस पर एकर का असर परत होई. केहु ना सोचे. जबकि लोग रोज मुरई के कांच से लेके पका के खाला, अचार बना के खा लेला. ओकर सेवा के लोग बिसार दे ता. मुरई के बाद सबसे ज्यादा निंदा के पात्र चना होला. ई ऊ चना ह जेकर बादशाह शाहजहां खाए के प्रस्ताव दिहले रहले जब उनका के गिरफ्तार क के औरंगजेब पूछलसि कि ऊ एगो कवनो अनाज खा सकेले. एह पर शाहजहां कहले कि ऊ चना खइहें. काहे कि इहे एगो अनाज बा जेकरा कच्चा से ले के भूंज के, पीस के, पका के, भिंजा के सब तरह से खाइल जा सकेला. लेकिन एही चना पर सबसे ज्यादा कहावत बा. पंच जे बा से अकेला चना भाड़ ना फोरेला से ले के लोहा के चना चबावल ले ना जाने केतना कहावत गढ़ दिहले बा. सब कहावत डेरोगेटरी बा. एको गो कहावत में बेचारा चना के बड़ाई नइखे। ई पक्का मान ल रामचेला कि जे तरकरियन का ओर से मुकदमा के गुंजाइश रहित त एह देश के हर आदमी पर एगो मोकदमा चलत रहित.

आम आदमी जब बेमार परे ला बड़हन- बड़हन डाक्टर अनार के रस पीए के सलाह देला. लेकिन ओही अनार जब लूगा लूटे के होला त लोग चट दे कहि देला कि एगो अनार सौ गो बेमार. अब सोचऽ कि अनार के अगर बाल बच्चा होईत आ पूछ सकित त पूछित कि ना कि तहरा बारे में लोग अइसन काहे कहे ला? त का जवाब बा तहरा लगे?

बैगन के बारे में देखऽ. कहल जाला कि ऊ तरकारी के राजा ह. लेकिन ओकर औकात त नोकरो के नइखे. जब कवनो दल बदलू के बारे में कहे के होला त चट दे कह दियाला कि फलनवां थरिया के बैंगन ह.

ओसहीं दाल जेपर कई हाली सरकार हिल गइल, ओहु के पंच ना छोड़ल. जब कवनो भ्रष्टाचार के बात कहे के होई त कहि दियाई कि दाल में कुछ करिया जरूर बा. अगर लइकी ना पटल त कहि दियाई कि दाल ना गलल. हम आजु ले अइसन दाल ना देखनी जे कूकर के सीटी पर ना गले लेकिन लोग खट दे कहि देला कि दाल ना गलल.

एकरा अलावा गजरा मुरई के नाहिन कटा गइल त केहु कहि देला कि खरबूजा के देखि के खरबूजा रंग बदलेला आ करैला नीम पर चढ़लो कहावत सुनले होई सभे. अतने नइखे, भोजपुरी भाषा के शब्द शास्त्री अंजोरिया वाला ओ.पी सिंह जी से निहोरा करब कि ऊ बन सके त ई मुहावरा कइस बनल, कइसे चलन में आइल, लोगन के बतावल जाए.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

राष्ट्रपति चुनाव के तैयारी में रामचेला

– जयंती पांडेय

कई दिन से बाबा लस्टमानंद अपना संघतिया राम चेला से हरकल रहत रहले. अनमुन्हसारे रामचेला चलि आवस आ बाबा के घरे अखबार आते सवाचस कि का हो बाबा राष्ट्रपति चुनाव में का हो ता? एक दिन बाबा औंजिया पूछले कि आखिर तूं ई बतिया रोज काहे पूछे ल? कव हाली त ऊनका मन में आइल कि अखबरवे बन करवा दिहल जाउ कि रोज रोज के पूछला के संतापे ओरा जाउ. लेकिन ओही अखबार से नतिया सिविल सर्विस के तैयारी करे ला एही से बन करववला से घर में हुरदुंग होखे के चांस बेसी हो जाई. इहे सोचि के ऊ बंद ना करवावे खातिर मजबूर बाड़े. एक दिन उनका से ना रहल गइल त पूछलें, रामचेला आखिर रोज इहे खबरिया तूं काहे पूछे ल?

रामचेला कहले, बाबा सोचऽ तानी कि राष्ट्रपति पद खातिर आपन उम्मीदवारी ठोकिये दीं. उनकर बात सुनि के बाबा लस्टमानंद खटिया पर से ढिमलाए ढिमलाए हो गइले. लेकिन अपना के सम्हार के बोलले, अरे भाई लेकिन राष्ट्रपति हो के करबऽ का? मौज करेब, फ्री में दुनिया घूमेब, पोता पोती के घूमाएब. बाबा कहले, रेल में आ बस में त कबहीं भाड़ा ना देलऽ आ हवाई जहाज में चढ़े के अरमान! बेसी बकबक ना करे के. बेसी बकबइला से ब्लड प्रेशर बढ़ जाला आ लोग मुंह फइल कहे लागेला. ई देश के लोग अपना तरीका से चली तहरा कहला से ना चली. तूं काहे आपन माथा खराब करऽ तार? रामचेला कहले, आछा ई कुल्ही छोड़ऽ, ई बतावऽ कि राष्ट्रपति होखे खातिर आदमी में का का चाहीं?

बाबा कहले, सुनले बानी कि आदमी तंदुरुस्त होखे के चाहीं, पागल उगल ना होखे चाहीं. जइसे बाबा कहले कि पागल उगल ना होखे के चाहीं, तइसे रामचेला पगलवन नाहिन हंसले आ कहले, हो बाबा तूं खाली सुनले बाड़ऽ कि सांच कह? खाली सुनले बाड़ऽ कि जानऽ तार? आउर हँ दिवालिया ना होखे के चाहीं ना पाकिट से ना दिमाग से. राम चेला फेर हंसले। तूं केतना आदमी के जानऽ तार जे दूनो से एकदम चकाचक होखे? हम त आछा आछा लोग के जानऽ तानी जे चौबीसो घंटा कटोरा उठवले रहेला. केहु पइसा मांगहे ला, केहु.. .आउर सुनऽ, आदमी के पढ़ल लिखल होखे चाहीं. रामचेला कहले, आजु काल्हु आतना पराइवेट शिक्षा संस्थान खुलि गइल बा कि गदहो पढ़ि लिहले बाड़े सन. हमार डिग्री देखबऽ? ऊ आदमी के चरित्र ठीक होखे के चाहीं. रामचेला कहले, अब त बजारि में चरित्र प्रमाण पत्र बिकाला, जेतना चाहीं ले ल. हँ, कंडिडेट के सरकार में पहुंच होखे के चाहीं. ई सुन के रामचेला के चहरा उतरि गइल. कहले, इहे त नइखे. तब त हम चुनाव ना लड़ेब. उनका ई बात से बाबा के मन हरिहर हो गइल, काहे कि एक त रोज रोज के उनका सवाल से जान बांचि गइल आ दोसरे कि एगो कंडीडेट कम हो गइल. ना त इहां प्रस्तावक घटत जात रहले.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

जांच चलत रहेला आ घपला होत रहेला

– जयंती पांडेय

आजुकाल रोज सरकार के ओर से एगो आश्वासन दिहल जाला – अगर कहीं गलती भइल होखी त ओकर जांच होई. जांच चलत रहेला, नतीजा कबहुओं सामने ना आवे. जेतना गलत काम होला सबके शुरुआत जांच से होला आ खत्म ई नतीजा से होला कि कवनो गलती नइखे भइल. सरकारी धन के कवनो दुरुपयोग नइखे भइल, भा खाली कुछ मामूली नियम के चाहे कहीं प्रक्रिया के उल्लंघन भइल बा. प्रक्रियो में सरकार के मंशा ठीके रहे. सम्बन्धित मंत्री, अफसर आदि के इरादा खराब ना रहे. काम तेज गति से पूरा करे खातिर आ बजट के प्रोपर उपयोग करे खातिर ई सब चले ला. जांच एजेन्सीज के काम ह जांच कइल आ सरकार के काम ह विकास के काम के तेजी से पूरा कइल. मार्च में त करोड़ो अरबों रुपया के सरकार अलग अलग संस्था के दे के लेप्स होखे से बचा लेले आ धीरे धीरे जांच चलत रहे ला.

सरकार हर जांच के बाद कहेले कि जे दोष कइले बा लोग ऊ लोगन के छोड़ल ना जाई. दोषी के सजा जरूर मिली. सरकारी धन वसूलल जाई. लेकिन कुछ होला ना. कई बेर जांच के बाद रिपोर्ट के बारे में अफसर भा मंत्री कह देला – हम त अबे जोईन कइले बानी ई हमरा आवे से पहिले के मामला ह. जियादा होशियार मंत्री-अफसर कहेले – मामला के बारे में हमरा त मालूमे ना रहे ई त आप बतवनी हं त पता चलल. अबहींए चेक करऽ तानी. दोषी बांची ना. मगर दोषी बच जाला. जे बेसी खुर्राट होला ऊ पहिलका सरकार पर दोष मढ़ देला आ जनता के धन्यवाद दे देला कि ऊ ओइसन नकारा सरकार के उखाड़ के बिग दिहलस. जांच चलत रहेला. सरकारो चलत रहेले. घपला, घोटाला, भ्रष्टाचारो चलत रहेला. सरकार कड़ा कदम उठावे के घोषणा करेले. कठोर निर्णय लेवे के किरिया खाले. ज्यादा कहला पर सरकार विदेशी हाथ होखे के गीत गावे लागे ले. सरकार कहेले कि कुछ देश में अस्थिरता पैदा करे के चाहऽतारे सन, हम एकनी के सफल ना होखे देब. जांच से जांच एजेन्सी व मीडिया के फायदा होला. जांच रिपोर्ट लीक क के मीडिया टी आर पी आ पत्रिका के बिक्री बढ़ा लेला. जांच जारी रहेला अउर भ्रष्टाचारो जारी रहेला. घोटालो जारी रहेला आ घपलो जारी रहेला. ई जान जाईं कि जांच आ घपला में उहे सम्बंध बा जे फूल आ ओकर सुंदरता में बा. काहे कि जे घपला ना होई त जांच कवन बात के आ जब जांचे ना होई त घपला के स्टैंडर गिर जाई.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

पुलिस के नाक कटला से बचाईं

– जयंती पांडेय

एक दिन एगो प्रोफेसर साहेब, उनकर नांव ह रवींद्र पाठक जी, बिहार के सिवान जिला से आ के लस्टमानंद से भेंट कइले. बाते बात में पुलिस पर चर्चा चलि गइल त पाठक जी बड़ा दुखी हो के बतवले ‘आजुओ काल पुलिस के बारे में लोग के अच्छा विचार नइखे. एक दिन हमार मोबाइल फोन चोरी हो गइल. थाना में रिपोर्ट लिखवा दिहनी. पुलिस चोर के ध लिहलस. लेकिन जब हम गइनी त चोर थाना में ना रहे. पुलिस ओकरा के छोड़ चुकल रहे. लेकिन हमार मोबाइल जब्त क लिहले रहे. जब हम मंगनी त कहले कि मोबाइल के कोर्ट से छोड़ावे के परी. हम दंग कि चोर के त पुलिस छोड़ि दिहलस लेकिन मोबाइल कोर्ट से छूटि.’ बाबा तहार का विचार बा पुलिस कं बारे में.

बाबा सुर्ती थूकि के कहले , हो पाठक बाबा रउआ त अइसन पूछऽतानी कि बुझाता कि कवनो चैनलीय पत्रकार हईं. बाकी ई जान लीं कि प्रात: स्मरणीय आ दुपहरिया के विस्मरणीय आ सांझ के असहनीय पुलिस के सबसे बड़हन खूबी ह कि ऊ सबके एके आंखि से देखे ले चाहे ऊ गुंडा होखो चाहे घोटालाबाज. चाहे ऊ शरीफ होखो चाहे मजदूर. जवन भ्रष्टाचार के ले के आतना हाला बा ऊ ई पुलिस के पवित्र संस्कृति ह. ई लोग गाली दिहला में आ गोली चलवला में ही माहिर ना होला लोग बल्कि आउर कई गो कला बा जेकर महारत ई लोग में रहेला. ई लोग टेबुल के नीचे आ परदा के पीछे के इसारा के खूब बूझेला. एकदम साफ डीलिंग होला ई लोग के. या त लाठी के भासा बूझेला लोग ना त पईसा के भासा. जेकरा हमनी का अपराध कहेनी सन ओकरा के ई लोग उद्योग बूझेला आ ऊ लोग के बसे खातिर अवसर आ जगहि दिवावे ला. एगो पुलिस अधिकारी बतवले कि समाज जेकरा से मुंह मोड़ लेला ओकरा हमनी का जीए के मौका देनी सन. ई केतना आदर्श समाज सेवा ह कि जेकरा के अपराधी कहि के समाज अलग क देला ओकरा के पुलिस सहारा देले. अब ओकर गलत मतलब लगा ल त केहु का करो.

अब सड़क पर ट्राफिक पुलिस के ओर से लिखल लउके ला कि ‘वी केयर फार यू’ , माने हम रउरा सब के खेयाल राखी ले. अब अगर केहु गाड़ी चलावे वाला एने ओने ताको आ केहु के लाग जाउ, चाहे रउरा कवनो कारण से सिगनल ना मानीं त धराहीं के बा, लेकिन ऊ मामला के रफा दफा करे खातिर जवन फीस ले ला ऊ ओकर सेवा भावना आ समाज से पक्का निष्ठा के उदाहरण ह. अब रउरा कवनो ट्राफिक के नियम भंग कईनी त फाइन होई. अब ऊ डांड़ देवे जब ट्रेजरी में जायेब चाहे थाना में जायेब त टाइम बरबाद होई. राउर काम हरजा होई आ मन में तनाव बढ़ि. एके हाली ई सबसे छुटकारा मिल जाई. केतना मौलिक चिंतन बा. अब ई चिंतन के बड़ाई करे के बजाय लोग एकर बुराई करे ला. पुलिस वाला भाई लोग गांधी जी के परम भगत होला. हमेसा पाकिट में गांधी छाप कड़क नोट राखेला आ जादे से जादे उनकर फोटो वाला नोट लेवे के चक्कर में रहेला लोग. भारतीय पुलिस दुनिया के सबसे तेज पुलिस ह. एक हाली एगो अमरीकी पुलिस के अफसर आ एगो ब्रिटिश पुलिस के अफसर के संगे एगो भारतीय पुलिस के अफसर बइठल रहे. बात चलल कि के केतना देर में कवनो अपराध के सुराग खोज ले ला. अमरीकी पुलिस वाला अफसर कहलस कि हमनी का त चौबीस घंटा में पता लगा लेनी सन. ब्रिटिश कहलस कि हमनी का 12 घंटा में पता लगा लेनी सन. ई सुन के भारतीय पुलिस वाला ठठा के हंसलस आ कहलस कि हमनी का त अपराध होला के 12 घंटा पहिले से जानेनी सन कि कहां ऊ होई आ मामला में केकरा के सजा दिहल जाई. एगो सर्वे में आइल रहे कि हमार भारत के पुलिस भ्रष्टाचार के मामला में दुनिया में चौथा नम्बर पर बा. अब ई हम देशवासी लोग के कर्त्तव्य ह कि एकरा एक नम्बर पर ले आईं सन ना त बेचारी पुलिस के नाक कटा जाई.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.