भोजपुरी के चाहीं संवैधानिक मान्यता

– अजीत दुबे

हाल ही में संघ लोकसेवा आयोग एगो जनहित याचिका के अनुपालनक करत मुंबई उच्च न्यायालय में हलफनामा दिहले बा कि सिविल सेवा परीक्षा में उम्मीदवार कवनो मान्यता प्राप्त भाषा मे साक्षात्कार दे सकेलें. भारतीय भाषा आ ओकरा के बोलेवालन खातिर ई बहुते खुशी आ गौरव के बाति बा. संघ लोक सेवा आयोग के ई पहल स्वागतजोग बा. आ एहसे भारतीय भाषावन के बढ़न्ती के राह अउरी खुली. इहे ना अपना मातृभाषा मे साक्षात्कार देबे में उम्मीदवारो सहज रहीहें आ उनुका सहुलियत रही. बाकिर एह फैसला के मद्दे नजर जब भोजपुरी समाज पर नजर जात बा त हिया में एगो हूक जस उठत बा. भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के मांग जमाना से उठत आवत बा. हाल ही में एक बेर फेरु संसद में ई माँग उठल रहे.

हर साल यूपीएससी इम्तिहान में भोजपुरी भाषी उम्मीदवारो बड़हन संख्या में शामिल होखेलें बाकिर उनुका भाषा भोजपुरी में परीक्षा आ साक्षात्कार देबे के सहूलियत ना मिल पावे. काहे कि भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता नइखे दिहल गइल. अब ई देश के विडंबना बा कि नेपाली आ सिंधी, जवन हिन्दूस्तानी मूल के भाषा ना हईं सँ, में त इम्तिहान आ साक्षात्कार दिहल जा सकेला बाकिर देश में हिंदी का बाद बोले जाए वाली दोसरकी बड़की भाषा भोजपुरी में ना. ई भोजपुरी भाषियन का साथे एगो अन्याये जस बा. बाकिर ई तबहिए हट पाई जब भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिहल जाई.

मारीशस में पिछला साल १४ जून २०११ के भोजपुरी के सरकारी मान्यता दे दिहल गइल बाकिर दुनिया भर के सोलह देशन में बीस करोड़ से अधिका लोगन के हजार साल से बेसी पुरान भाषा के भारत में आजुवो मान्यता नइखे. भोजपुरी का लगे आपन समृद्ध साहित्य, अपार शैक्षणिक सामर्थ्य, समृद्ध सांस्कृतिक आ एतिहासिक विरासत मौजूद बा लेकिन ऊ अपनही देश में सरकारी अनदेखी झेलत बिया.

गंभीरता से विचारल जाव त भोजपुरी में ऊ सबकुछ बा जवना से ओकरा के आठवीं अनुसूची में शामिल कइल जा सके. एह अनुसूची में शुरूआत में लिहल चौदह गो भाषा का बाद जवन आठ गो अउरी भाषा, सिंधी, कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली, बोडो, डोगरी, मैथिली आ संथाली, के जोड़ल गइल तवनन में से कवनो भाषा भोजपुरी से कवनो मामिला में बीस ना ठहरी. अगर खाली बोले वालन के गिनिती लिहल जाव त एह आठो भाषा मिला के बोले वालन के गिनिती साल २००१ के जनगणना में ३, १६,४४, ७४३ रहल जवन कि भोजपुरी बोलेवालन के संख्या के कवनो पासंग में नइखे काहे कि भोजपुरी बोले वाला बीस करोड़ से बेसी बाड़े.

आजु देश के अनेके विश्वविद्यालयन में भोजपुरी के पढ़ाई होखत बा. दुनिया के सबले बड़का खुला विश्वविद्यालय इग्नू में एकर फाउंडेशन कोर्स चलावल जात बा. दिल्ली सरकार मैथिली भोजपुरी अकादमी आ बिहार सरकार भोजपुरी अकादमी के स्थापना कर के भोजपुरी भाषा, कला आ संस्कृति के नया आयाम दिहला का संगेसंग नया पहिचानो दिहले बिया. मूल रूप से भोजपुरी इलाका के महापर्व छठ आजु गँवे गँवे सगरी हिन्दुस्तान में श्रद्धा भक्ति संग पूरा उत्साह से मनावल जाए लागल बा. ई भोजपुरी संस्कृति के व्यापकता देखावत बा. केंद्र आ दि्ल्ली सरकार एह पर्व पर वैकल्पिक अवकाश देबे लागल बाड़ी सँ.

भोजपुरी के उपयोगिता आ बढ़त प्रभाव के अंदाजा एहू बात से लागत बा कि बहुराष्ट्रीय कंपनिओ अब आपन विज्ञापन भोजपुरी में बनवावे लागल बाड़ी सँ. भोजपुरी टीवी चैनलन पर आवे वाला विज्ञापन आ भोजपुरी इलाका में लागल होर्डिंग्स एकर साक्षात गवाह बाड़ी सँ. महुआ आ हमार टीवी जइसन भोजपुरी चैनल भोजपुरी के देश विदेश में पसार करे में आपन महती भूमिका निभावत बाड़ी सँ. भोजपुरी सिनेमा आजु हिंदी सिनेमा के जोरदार टक्कर देत बा आ लाखो लोग के रोजगार के साधन बनल बा.

अइसन नइखे कि भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के माँग नइखे उठल. साल १०६९ के चउथी लोकसभा से लगाइत अबहीं ले पन्द्रह हाली संसद में एकरा खातिर निजी विधेयक पेश भइल बा. सांसद अली अनवर अंसारी साल २००७, २००८ आ २००९ में स्पेशल मेंशन का रूप में पेश कइले त सांसद योगी आदित्यनाथ एकरा के साल २००७ में नियम ३७७ का तहत संसद में उठवलें. अनेके सांसद जइसे कि ओमप्रकाश यादव, नीरज शेखर, जगदंबिका पाल, आ उमाशंकर सिंह साल २०१० में गृहमंत्री के पाती लिख के एह मामिला पर जरूरी कार्रवाई करे के गोहार लगवलें.

३० अगस्त २०१० के १५वीं लोकसभा में पहिला बेर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का जरिए भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करावे के मुद्दा सांसद संजय निरूपम, रघुवंश प्रसाद सिंह आ जगदंबिका पाल बहुते जोर शोर से उठवले. एकरा जवाब में तब के गृह राज्य मंत्री अजय माकन कहलें कि सरकार भोजपुरी आ राजस्थानी के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के विचार करत बिया बाकिर एहला कवनो समय सीमा ना बान्हल जा सके. वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी दखल देत कहलन कि एह मामिला के सार्थक चरचा खातिर नियम १९३ के तहत उठावे के चाहीं.

एह सब का बावजूद भोजपुरी अपने देश में अबहीं ले अपना हक के लड़ाई लड़त बिया आ अबले के सरकार एह मुद्दा के अनदेखी करत आइल बाड़ी सँ.


लेखक अजीत दुबे भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष हईं.

अपने देश में सौतेलापन के दंश झेलत भोजपुरी

भारत के एक हजार साल पुरान देशज भाषा भोजपुरी अपने देश में आजु सौतेलापन के शिकार बिया. राजनेतवन आ केंद्र सरकार के अनदेखी का चलते भोजपुरी दसियन बरीस से संवैधानिक मान्यता खातिर तरसत बिया. खास त ई बा कि दुनिया के सोलह देश के 20 करोड़ से बेसी लोग के भाषा भोजपुरी के मॉरिशस में संवैधानिक मान्यता मिल चुकल बा बाकिर अपने देश में अपना जायज हक से वंचित राखल जात बा भोजपुरी के. भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे के कहना बा कि समृद्ध सांस्कृतिक विरासत अउर प्रचुर साहित्य वाली भोजपुरी भाषा देश में सरकारी अनदेखी के शिकार बिया. आपन निराशा जाहिर करत अजीत दूबे के कहना बा कि, संविधान के आठवीं अनुसूची में शुरूआत में 14 गो भाषा रहली स बाकिर बाद में समय-समय पर एह सूची में संशोधनों करि के सिंधी, कोंकणी, मणिपुरी, नेपाली, बोडो, डोंगरी, मैथिली आ संथाली के संवैधानिक मान्यता दे दिहल गइल बाकिर भोजपुरी के ई दर्हा देबे में आनाकानी कइल जात बा. जबकि भोजपुरी एह भाषवन से कवनो मामिला में उनइस नइखे.

अजीत दुबे कहले कि इहो अजब विडंबना बा कि संघ लोक सेवा आयोग के परीक्षा तक में अभ्यर्थियन के हिंदी-अंग्रेजी वगैरह का अलावा नेपाली आ सिंधीओ में परीक्षा आ साक्षात्कार देबे के छूट बा बाकिर भोजपुरी के ना. कहलन कि ई भोजपुरी भाषी लाखों उम्मीदवारन का साथे होखे वाला अन्याय बा. भोजपुरी भाषा के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के लेके संसद में पन्द्रहियन बेर निजी विधेयक पेश भइल बा. विशेष ध्यानाकर्षण प्रस्तावो का जरिये एह मुद्दा के उठावल गइल बा. बाकिर सब बेनतीजा. केन्द्र सरकार से हर बेर बस आश्वासने मिल के रहि गइल बा.

आठवीं अनुसूची में अउरियो भाषा शामिल करे खातिर बनल सीताकांत महापात्र समिति जून 2004 में दिहल अपना रिपोर्ट में भोजपुरी के अनुसूची में शामिल करे के पैरवी कइले रहे. जवना का बाद केंद्रीय मंत्री शिवराज पाटिल संसद में घोषणा कइले रहले कि जल्दिये एह भाषा के संवैधानिक मान्यता दे दिहल जाई. 2006 में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवालो अइसने कहले रहले बाकिर सब बेमतलब निकलल. मौजूदा 15वीं लोकसभा में 30 अगस्त 2010 के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का जरिये अनेके पार्टियन के सांसद एह मामला में एकजुटता देखवले रहले बाकिर तबहियो सरकार से बस आश्वासने मिल के रहि गइल.

अजीत दुबे एह सरकारी रवैया के भोजपुरी भाषा खातिर ओकर तिरस्कार बतवले.


(पिछला दिने बलिया में भइल साक्षात्कार का आधार पर)

राजस्थानी का बहाने भोजपुरी के चिन्तन

भोजपुरी आ राजस्थानी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के चरचा ढेर दिन से चल रहल बा. भोजपुरी त वइसन टुअर हिय जेकर कवनो माई बाप नइखे. कवनो राज्य नइखे जे भोजपुरी के लड़ाई लड़ि सको. संजोग से राजस्थानी के लड़ाई लड़े खातिर राजस्थान सरकार मौजूद बिया. एह पर सोचल जा सकेला कि राजस्थानी के आठवीं अनुसुची में शामिल करावल आसान होखी. बाकिर राजस्थानो में अपने में विवाद चल रहल बा. राजस्थान के एगो बड़हन इलाका में राजस्थानी ना बोलल जाव आ ऊ लोग सरकार के एह फैसला के विरोध कर रहल बा जवना में राजस्थानी के राजस्थान राज्य में सरकारी भाषा के रुप में मान्यता दिहल गइल बा.

सरकार के एह फैसला से उदयपुर जयपुर आ पश्चिमी राजस्थान के लोग त सहमत बा बाकिर सांसद सीसराम ओला आ भरतपुर से सांसद रतन सिंह सरकार के एह फैसला का खिलाफ झंडा उठा के खड़ा हो गइल बाड़े. ओह लोग के कहना बा कि एह फैसला के भरपूर विरोध कइल जाई. काहे कि एह फैसला से शेखावती, बागड़ी, मेवाती, मेवारी, बृज आ दोसर भाषा के नुकसान होखी. कहल त इहाँ तक जा रहल बा कि जवना भाषा के राज्य के अधिकांश नागरिक ना जानस ना बोलस ओह भाषा के राजस्थानी कइसे कह दिहल जाई.

भाषा विवाद के एह हालात में एगो बढ़िया खबर बंगाल से आइल बा जहाँ हिन्दी के अल्पसंख्यक भाषा के मान्यता दे दिहल गइल बा. अपना अल्पसंख्यक राजनीति का चलते वाम मोर्चा सरकार उर्दू के त अल्पसंख्यक भाषा के मान्यता आ सुविधा दे दिहले रहल बाकिर गैर बंगाला भाषी अल्पसंख्यकन के अनदेखी कर दिहलसि. ममता बनर्जी के ई फैसला स्वागत योग्य बा जवना में हिन्दी, गोरखा, नेपाली, गुरुमुखी वगैरह के अल्पसंख्यक भाषा के मान्यता दे के भाषायी अल्पसंख्यकन के हित के ध्यान राखल गइल बा.

जहाँ तक बात रहल भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करावे के त एह मामिला में लफ्फाजी आ राजनीति बेसी हो रहल बा काम के बात कम. रह रह के कुछ दिन पर भोजपुरी के मान्यता के सवाल अलग अलग मंच पर उठावल जरुर जा रहल बा बाकिर कवनो संस्था योजना बना के भोजपुरी के विकास खातिर कुछ करत होखे से नइखे लउकत. भोजपुरी में संस्था आ समाजन के कमी नइखे बाकिर अधिकतर के मकसद प्रचारोन्मुखी बा. भोजपुरी भाषा आ संस्कृति के प्रचार प्रसार का दिशा में कवनो खास काम नइखे होत. कहल जात बा कि एक बार भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करा लिहल गइल त भोजपुरी में पढ़ाई लिखाई आ सरकारी काम काज होखे लागी. पढ़ाई लिखाई इ आजुवो भोजपुरी में हो रहल बा. रहल बात काम काज के त ऊ त समहर तरीका से हिन्दीओ में नइखे हो पावत.

अँजोरिया का माध्यम से हर बार सवाल उठाइले कि जवना भाषा के आपन एगो अखबार तक ना होखे आजु का जमाना में ओह भाषा के राजनीतिक शक्ति अतना ना बन सके कि नेता लोग ओह पर ध्यान दे सकस. भोजपुरी के कवनो पत्र पत्रिको एह हालत में नइखे कि ऊ विदेश त छोड़ीं, देश के हर हिस्सा में पसरल भोजपुरियन तक चहुँपत होखे. अब कहल इहो जा सकेला कि आजु का जमाना में हिन्दी पत्रकारिता आ प्रकाशनो के कमोबेस अइसने हालत बा. लोग किताब पढ़े के आदत छोड़ले जात बा. बाकिर हिन्दी में नेट प्रकाशन के कवनो कमी नइखे. हजारो लाखो का संख्या में लोग ओह साइटन पर जाला. पूरा दुनिया में करोड़ो भोजपुरिया रोजे नेट पर आवत जात होखीहें बाकिर भोजपुरी से पाँचो सेकण्ड के लगाव रहीत त हालत दोसर रहीत. दोसरा साइटन का बारे में त हम ना बता सकीं बाकिर अँजोरिया दुनिया भर में पसरला का बावजूद एहिजा मूश्किल से रोजाना एक हजार पाठक का लगभग चहुँपेले.

भोजपुरी के हालत में बहुत सुधार होखे के उम्मीद तबले ना कइल जा सके जबले एहिजा नौ गो कन्नौजिया तेरह गो चूल्हा वाला हालत में बदलाव ना आई. भोजपुरियन में सबले बड़का कमी एका के बा. हमनी के ताकत दोसरा के टाँग खिंचाई में बेसी जाया होले दोसरा के बढ़ावा देबे में कम. अधिकतर सक्रिय लोग के रुचि एह बात में बेसी होला कि ओहलोग के खबर छप जाव, फोटो छप जाव. कुछ प्रचार मिल जाव. उहे लोग अगर मिल बइठ के एगो समावेशी संगठन बना लिहते जवना में हर भोजपुरिया ना त बेसी से बेसी भोजपुरियन के हित सधे त ऊ सबले बड़हन बात होखीत. आ तब मिले वाला प्रचार खातिर प्रयास करे के जरुरत ना पड़ीत.

डा. प्रभुनाथ सिंह के याद में


आजे का दिन 30 मार्च 2009 के गोंडा का लगे वैशाली एक्सप्रेस में हृदयाघात से डा. प्रभुनाथ सिंह के मौत हो गइल. उहां के दिल्ली से छपरा जात रहनी.

ओकरा एके दिन पहिले हमार उहाँ से बातचीत भइल रहे .

– ना, अभी हमरा इहां हमार टी वी नइखे आवत.—-ह हो सोचते रह गइनी. …….अच्छा ,गांव से लौट के आवत बानी त हमार टी वी के आफिस आएम . मतंग सिंह से बहुत पहिले के भेंट ह . —– ह, तहरो से भेंट भइला बहुत दिन हो गइल ….. खुश रहs .

…… तब हमरा का मालूम रहे कि प्रभुनाथ चाचा से फेर कबो भेंट ना होई आ इ हमनी के अंतिम बातचीत ह.

डा. प्रभुनाथ सिंह के निधन से भोजपुरी समाज के अपूरणीय क्षति भइल बा. प्रभुनाथ बाबू अध्यापक का रूप में, राजनेता का रुप में आ भोजपुरी आन्दोलन के एगो कर्मठ कार्यकर्ता का रूप में सभका खातिर एगो आदर्श छोड गइल बानी. लंगट सिंह महाविद्यालय मुजफ्फरपुर का अर्थशास्त्र विभाग में व्याख्याता का पद से आपन कर्मशील जिनिगी शुरु करे वाला प्रभुनाथ बाबू तरैया विधानसभा सीट से दू हालि विधायक चुनइलीं आ बाद में डा॰जगन्नाथ मिश्रा के मंत्रीमण्डल में वित्त राज्य मंत्री के पद पर रहलीं.

डा. प्रभुनाथ सिंह के जनम 2 मई 1940 के सारण जिला के मुबारकपुर गांव मे भइल रहे.गांव उहां के रचनन में रचल – बसल बा . अर्थशास्त्र आ प्रबंध शास्त्र के अलावा भोजपुरी में भी इहां के कई गो किताब लिखले बानी- हमार गीत (निबन्ध संग्रह) ,गाँधी जी के बकरी ( संस्मरण ), हमार गांव हमार घर ( ललित निबन्ध के संग्रह) आ पड़ाव (कहानी संग्रह ).

अइसे त डा. प्रभुनाथ सिंह जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी रहल बानी लेकिन उहां के मुख्य पहचान भोजपुरी आंदोलन के प्रणेता के रूप में ही रहल बा . भोजपुरी के उचित हक खातिर उहां के उम्र भर लडत रह गइनी. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में ले आइल उहां के सपना रहे जवन उहां के जिनगी में पूरा ना हो सकल . एह सपना के पूरा कइल ही उहां के प्रति सच्ची श्रद्धांजली होई.

डा. प्रभुनाथ सिंह जी के निधन से कुछ महिना पहिले इग्नू कैंपस में उहां से भोजपुरी के कई गो ज्वलंत मुद्दा पर बातचीत भइल रहे . प्रस्तुत बा बातचीत के खास अंश –

प्र.- डा. साहब भोजपुरी के सरकारी मान्यता के का स्थिति बा आ आठवीं अनुसूची में एकरा शामिल होखे में काहे विलम्ब हो रहल बा…

उ०- “डुमरी कतेक दूर अब निअराइल बा” स्थिति ई बा कि आज हो जाये काल्ह हो जाये.. सरकार के एक तरह से निर्णय हो चुकल बा… अब एकरा के संसद में ला के एकरा से संबंघित कानून जवन बा,ओकरा के बनावे के बात बा.. आ हमरा बुझाता कि अगिला चुनाव के पहिले ई भी काम सरकार कर दी…

प्र-. अगर भोजपुरी आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईल , त एकरा से आम आदमी के का
लाभ होई…
उ०- आम आदमी के लाभ ई मिली कि जब सरकार एकरा के मान्यता दे दी त एकरा में बहुत बङा हित भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के छिपल बा… जइसे कि राज्यसेवा आयोग के भोजपुरी एगो विषय हो जाई. फेर नौकरी अउर रोटी के सवाल से भोजपुरी जुङ जाई… त भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के चेहरा पर भी एगो मुस्कान आ जाई…आ .. जे लोग भोजपुरी भाषा से जुङल बा,भोजपुरी पढता-लिखता…. एगो अच्छा भविष्य ऊ लोग के हो जाई …

प्र-. हिन्दी के विद्वान लोग ई कहेला कि भोजपुरी के विकास से हिन्दी के अहित होई, नुकसान होई ऊ लोग खातिर राउर का कहनाम बा..
उ०- ई जे प्रश्न लोग उठावेला…. हमरा ई बात समझ में ना आवे……. काहें कि वस्तु स्थिति ई बा कि प्रायः जे भोजपुरी के साहित्यकार बाङे , ऊ लोग कवनो ना कवनो रूप में हिन्दी के भी साहित्यकार रहल बाङें,चाहें बाङें… अइसन बहुत कम आदमी होइहें जे केवल भोजपुरी के साहित्यकार बाङें, लेकिन हिन्दी के साहित्यकार नइखन… प्रायः लोग अइसन बा कि ऊ हिन्दी के साहित्यकार के रूप में ऊँचाई पा चुकल बा… ओकरा बाद से भोजपुरी के साहित्यकार के रूप में ऊँचाई मिलल बा…. लेकिन आज तक हमरा एगो अइसन उदाहरण नइखे मिलल कि हिन्दी में लिखला से ओह लोग के भोजपुरी गङबङाइल होखे .. आ भोजपुरी में लिखला से ऊ लोग के हिन्दी गङबङाइल होखे… एक तरह से ई आपन आपन एगो सोच हो सकेला… हमरा नइखे बुझात कि एह सोच में कवनो तरह के दम बा… दोसर बात हम ई संबंध में ई कहें के चाहत बानी कि हिन्दी हमार राष्ट्र भाषा ह .. भोजपुरी हमनी के मातृभाषा ह… अउर जवना घङी ई समझ में आ जाई कि भोजपुरी के विकास से हिन्दी के क्षति होई.. त ओह दिन हमनी के भोजपुरी में लिखल बंद कर देब .. जेतना मान-सम्मान के प्रश्न बा ऊ जेतना भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के हिन्दी के प्रति बा, ओतना हिन्दी वाला लोग के नइखे … राष्ट्रभाषा खातिर हमनी के कवनो कुर्वानी कर सकेलीं …

प्र- . डा. साहेब रउआ पीछला पचीस-तीस वरिस से भोजपुरी आंदोलन से जुङल रहल बानी, लोग त इहां तक कहेला कि रउरा लगला बिना भोजपुरी के कवनो अधिवेशन, कवनो कांफ्रेंस ,कवनो जग, कवनो अनुष्ठान सफल ना होला त कइसन रहल सफर पिछला पचीस-तीस बरिस के…

उ०- जहां तक भोजपुरी आंदोलन के एगो दिशा देवे के सवाल बा… कांफ्रेंस करके, ओकर सम्मेलन करके साहित्यकार लोग के जुटान करके हमरा बराबर एकर सुखद अनुभव रहल बा… पहिला ए मामला में कि, जे भी साहित्यकार लोग के अधिवेशन में बोलाबल गइल –.. हम समझ तानी कि भोजपुरी साहित्य में एगो अलग तरह के साहित्यकार बाङें कि सब लोग अपना खेबा-खर्चा से पहुँचेला,अपना खेबा-खर्चा से जाला… आज ले केहू टी. ए. डी. ए. के मांग ना करेला … दोसर विशेषता ई बा कि जे लोग भी एह में रचना कइले बा , उ आपन खेत-बधार बेंच के रचना के छापल …….ओकर बाजार त ओतना नइखे,लेकिन एह सम्मेलन में जाके ओकरा के बाँट के …. ओकरा प्रचार-प्रसार में जवन इ लोग आपन जीवन के आहुति देले बा, उ एगो चिरस्मरणीय भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एगो अलग अध्याय बा…. तीसर बात ई बा कि जहां तक लोग के सवाल बा रउआ दुआरी केतना छु्अतानी,एकरा पर आधारित बा… लेकिन आज तक हमरा पइसा के कमी ना भइल, लेकिन समय के कमी जरूर बुझाइल…. रउआ अगर सच्चा दिल से , सच्चा भाव से भोजपुरी साहित्य-संस्कृति के विकास खातिर आगे बढ़त बानी… त भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र के लोग रउआ से दू डेग आगे बा .

प्र. आज रउआ इहां इग्नू कैंपस में आइल बानी. इग्नू में भोजपुरी के आधार पाठ्यक्रम बन रहल बा. इग्नू में अब भोजपुरी के पढ़ाई शुरू होखे जा रहल बा.. रउआ बताईं भोजपुरी अउर कवना-कवना विश्वविधालय में पढावल जाता.. अउर कब से एकर पढाई शुरू भइल.. रउआ त विश्व में भोजपुरी के पहिला व्याख्याता रहल बानी.. त एकरा बारे में तनी विस्तार से बताई…

उ०- ई एगो ऐतिहासिक क्षण बा.. कि इग्नु भोजपुरी के पाठ्यक्रम के शुरू करे जा रहल बा…दोसर विश्वविधालय अउर इग्नू में अंतर बा… हम धन्यवाद देब भोजपुरी भाषा-भाषी लोग आ साहित्यकार लोग के ओर से इग्नू विश्वविधालय के कुलपति विशेषकर शत्रुध्न प्रसाद जी के, जे एकर अगुवाई कर रहल बानी,…. अउर विश्वधालय में भोजपुरी के पढ़ाई आ इग्नू में भोजपुरी के पढ़ाई में जमीन असमान के फर्क बा. इग्नू भोजपुरी के पढ़ाई शुरू कर रहल बा त एकर मतलब बा कि पठन -पाठन के ममिला में भोजपुरी अंतरराष्ट्रीय क्षितिज़ पर स्थापित हो रहल बा… विश्वधालय में जहां तक भोजपुरी के पढाई के सवाल बा त सबसे पहिले १९६८ में स्नातक स्तर तका बिहार विश्वधालय में भोजपुरी के पढाई प्रारंभ भइल . ओकरा बाद कुंवर सिंह विश्वधालय में एम .ए स्तर पर भोजपुरी के पढाई शुरू भइल. बिहार के प्राय : सब विश्वधालय में भोजपुरी एगो स्वतंत्र पत्र के रूप में पढावल जाला. स्वतंत्र पत्र के रूप में ना त कवनो विशेष पत्र के रुप में ……त हमरा बुझाता कि पूर्वांचल के जेतना विश्वधालय बा उ सब में एकर पढाई प्रारंभ हो चुकल बा .लेकिन बिहारे एगो अइसन प्रदेश बा जहां कि भोजपुरी एगो स्वतंत्र पत्र के रूप में B.A, I.A से लेके M.A तक पढावल जाता .. एकर भविष्य बडा उज्ज्वल लागता .अब जे लोग एकरा के एगो बोली मानत रहे ,ओह सब लोग के जबाब मिल चुकल बा कि भोजपुरी आज उ नइखे जे 50-51 में रहे . भोजपुरी आज एगो साहित्य के दर्जा ले चुकल बा , एकर पठन -पाठन शुरु हो चुकल बा त अब लोग के कवनो तरह के शंका ना होखे के चाहीं. अब भोजपुरी साहित्य के …… चाहे देश के कवनो साहित्य होखे , चाहे विश्व के कवनो साहित्य होखे ओकरा सामने सम्मान के साथ रखल जा सकेला .

प्र- रउरा भोजपुरी सिनेमा में गीतो लिखले बानी. आज जे भोजपुरी फिल्म बनता ओकरा बारे में का कहनाम बा .
उ०- कवनो भी सिनेमा के ….चाहे उ हिंदी होखे , भोजपुरी होखे या अंग्रेजी …ओकर आपन एगो बाजार होला. आ बाज़ार के इ मतलब ह कि उपभोक्ता जवन मांग करेला ओकरे आपूर्ति कइल जाला.आज से १५-२० साल पहिले जे उपभोक्ता के मन अउर मिजाज रहे , समय के साथ अउर वैश्वीकरण के साथ ओकरा में बदलाव आ गइल बा .ओकर असर त सिनेमा पर होखबे करी, चाहे उ हिंदी के सिनेमा होखे चाहे भोजपुरी के .एकरा के रोकल त कठिन बा. चूंकि जवन देखे वाला पसंद करी , उहे सिनेमा बनाई काहे कि ओकर इ रोज़गार बा . उ कवनो गांधी जी अउर महत्मा बुद्ध नइखे जे समाज आ देश के सेवा खातिर उ सिनेमा बनावता . ओकर व्यवसायिक जवन उदेश्य बा उ त मूल बा …..आ एकरा बाद ओकर साहित्यिक – सांस्कृतिक जवन उदेश्य बा ओकर भी भरसक पालन होखे के चाहीं. तब अइसन स्थिति में हमार इ सुझाव बा कि कुछ बाजार खातिर भी सिनेमा बने त कुछ कलात्मक आ ऊंचाई वाला सिनेमा भी

प्र- अब त भोजपुरी के चैनल भी आ गइल . राउर प्रतिक्रिया ?

उ०- एहू में दूनू के बढिया समन्वय होखे, व्यवसायिकता के भी आ स्वस्थ सांस्कृतिक जवन पक्ष बा ओकर भी. हमरा जहां तक बुझाता कि आम दर्शक अच्छा स्वाद के बाडन . कुछे दर्शक अइसन बाडन जेकर स्वाद बिगडल बा. आ जइसन रउरा परोसब लोग उहे खाई.जब अच्छा चीज रउरा परोसब त लोग अच्छे खाई. खराब चीज रउरा परोसल शुरु करब त कवनो उपाय नइखे, लोग खराबे खाई.लेकिन भोजपुरी में जवन भी रउरा परोसब लोग खाई काहे कि एह में जवन स्वाद बा , संप्रेषण के जवन ताकत ब , उ अउर कहीं नइखे.एह से भोजपुरी चैनल के भविष्य उज्ज्वल बा. हमार शुभकामना .

– मनोज भावुक

डा. प्रभुनाथ सिंह के याद में


आजे का दिन 30 मार्च 2009 के गोंडा का लगे वैशाली एक्सप्रेस में हृदयाघात से डा. प्रभुनाथ सिंह के मौत हो गइल. उहां के दिल्ली से छपरा जात रहनी.

ओकरा एके दिन पहिले हमार उहाँ से बातचीत भइल रहे .

– ना, अभी हमरा इहां हमार टी वी नइखे आवत.—-ह हो सोचते रह गइनी. …….अच्छा ,गांव से लौट के आवत बानी त हमार टी वी के आफिस आएम . मतंग सिंह से बहुत पहिले के भेंट ह . —– ह, तहरो से भेंट भइला बहुत दिन हो गइल ….. खुश रहs .

…… तब हमरा का मालूम रहे कि प्रभुनाथ चाचा से फेर कबो भेंट ना होई आ इ हमनी के अंतिम बातचीत ह.

डा. प्रभुनाथ सिंह के निधन से भोजपुरी समाज के अपूरणीय क्षति भइल बा. प्रभुनाथ बाबू अध्यापक का रूप में, राजनेता का रुप में आ भोजपुरी आन्दोलन के एगो कर्मठ कार्यकर्ता का रूप में सभका खातिर एगो आदर्श छोड गइल बानी. लंगट सिंह महाविद्यालय मुजफ्फरपुर का अर्थशास्त्र विभाग में व्याख्याता का पद से आपन कर्मशील जिनिगी शुरु करे वाला प्रभुनाथ बाबू तरैया विधानसभा सीट से दू हालि विधायक चुनइलीं आ बाद में डा॰जगन्नाथ मिश्रा के मंत्रीमण्डल में वित्त राज्य मंत्री के पद पर रहलीं.

डा. प्रभुनाथ सिंह के जनम 2 मई 1940 के सारण जिला के मुबारकपुर गांव मे भइल रहे.गांव उहां के रचनन में रचल – बसल बा . अर्थशास्त्र आ प्रबंध शास्त्र के अलावा भोजपुरी में भी इहां के कई गो किताब लिखले बानी- हमार गीत (निबन्ध संग्रह) ,गाँधी जी के बकरी ( संस्मरण ), हमार गांव हमार घर ( ललित निबन्ध के संग्रह) आ पड़ाव (कहानी संग्रह ).

अइसे त डा. प्रभुनाथ सिंह जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी रहल बानी लेकिन उहां के मुख्य पहचान भोजपुरी आंदोलन के प्रणेता के रूप में ही रहल बा . भोजपुरी के उचित हक खातिर उहां के उम्र भर लडत रह गइनी. भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में ले आइल उहां के सपना रहे जवन उहां के जिनगी में पूरा ना हो सकल . एह सपना के पूरा कइल ही उहां के प्रति सच्ची श्रद्धांजली होई.

डा. प्रभुनाथ सिंह जी के निधन से कुछ महिना पहिले इग्नू कैंपस में उहां से भोजपुरी के कई गो ज्वलंत मुद्दा पर बातचीत भइल रहे . प्रस्तुत बा बातचीत के खास अंश –

प्र.- डा. साहब भोजपुरी के सरकारी मान्यता के का स्थिति बा आ आठवीं अनुसूची में एकरा शामिल होखे में काहे विलम्ब हो रहल बा…

उ०- “डुमरी कतेक दूर अब निअराइल बा” स्थिति ई बा कि आज हो जाये काल्ह हो जाये.. सरकार के एक तरह से निर्णय हो चुकल बा… अब एकरा के संसद में ला के एकरा से संबंघित कानून जवन बा,ओकरा के बनावे के बात बा.. आ हमरा बुझाता कि अगिला चुनाव के पहिले ई भी काम सरकार कर दी…

प्र-. अगर भोजपुरी आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईल , त एकरा से आम आदमी के का
लाभ होई…
उ०- आम आदमी के लाभ ई मिली कि जब सरकार एकरा के मान्यता दे दी त एकरा में बहुत बङा हित भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के छिपल बा… जइसे कि राज्यसेवा आयोग के भोजपुरी एगो विषय हो जाई. फेर नौकरी अउर रोटी के सवाल से भोजपुरी जुङ जाई… त भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के चेहरा पर भी एगो मुस्कान आ जाई…आ .. जे लोग भोजपुरी भाषा से जुङल बा,भोजपुरी पढता-लिखता…. एगो अच्छा भविष्य ऊ लोग के हो जाई …

प्र-. हिन्दी के विद्वान लोग ई कहेला कि भोजपुरी के विकास से हिन्दी के अहित होई, नुकसान होई ऊ लोग खातिर राउर का कहनाम बा..
उ०- ई जे प्रश्न लोग उठावेला…. हमरा ई बात समझ में ना आवे……. काहें कि वस्तु स्थिति ई बा कि प्रायः जे भोजपुरी के साहित्यकार बाङे , ऊ लोग कवनो ना कवनो रूप में हिन्दी के भी साहित्यकार रहल बाङें,चाहें बाङें… अइसन बहुत कम आदमी होइहें जे केवल भोजपुरी के साहित्यकार बाङें, लेकिन हिन्दी के साहित्यकार नइखन… प्रायः लोग अइसन बा कि ऊ हिन्दी के साहित्यकार के रूप में ऊँचाई पा चुकल बा… ओकरा बाद से भोजपुरी के साहित्यकार के रूप में ऊँचाई मिलल बा…. लेकिन आज तक हमरा एगो अइसन उदाहरण नइखे मिलल कि हिन्दी में लिखला से ओह लोग के भोजपुरी गङबङाइल होखे .. आ भोजपुरी में लिखला से ऊ लोग के हिन्दी गङबङाइल होखे… एक तरह से ई आपन आपन एगो सोच हो सकेला… हमरा नइखे बुझात कि एह सोच में कवनो तरह के दम बा… दोसर बात हम ई संबंध में ई कहें के चाहत बानी कि हिन्दी हमार राष्ट्र भाषा ह .. भोजपुरी हमनी के मातृभाषा ह… अउर जवना घङी ई समझ में आ जाई कि भोजपुरी के विकास से हिन्दी के क्षति होई.. त ओह दिन हमनी के भोजपुरी में लिखल बंद कर देब .. जेतना मान-सम्मान के प्रश्न बा ऊ जेतना भोजपुरी भाषा-भाषी लोग के हिन्दी के प्रति बा, ओतना हिन्दी वाला लोग के नइखे … राष्ट्रभाषा खातिर हमनी के कवनो कुर्वानी कर सकेलीं …

प्र- . डा. साहेब रउआ पीछला पचीस-तीस वरिस से भोजपुरी आंदोलन से जुङल रहल बानी, लोग त इहां तक कहेला कि रउरा लगला बिना भोजपुरी के कवनो अधिवेशन, कवनो कांफ्रेंस ,कवनो जग, कवनो अनुष्ठान सफल ना होला त कइसन रहल सफर पिछला पचीस-तीस बरिस के…

उ०- जहां तक भोजपुरी आंदोलन के एगो दिशा देवे के सवाल बा… कांफ्रेंस करके, ओकर सम्मेलन करके साहित्यकार लोग के जुटान करके हमरा बराबर एकर सुखद अनुभव रहल बा… पहिला ए मामला में कि, जे भी साहित्यकार लोग के अधिवेशन में बोलाबल गइल –.. हम समझ तानी कि भोजपुरी साहित्य में एगो अलग तरह के साहित्यकार बाङें कि सब लोग अपना खेबा-खर्चा से पहुँचेला,अपना खेबा-खर्चा से जाला… आज ले केहू टी. ए. डी. ए. के मांग ना करेला … दोसर विशेषता ई बा कि जे लोग भी एह में रचना कइले बा , उ आपन खेत-बधार बेंच के रचना के छापल …….ओकर बाजार त ओतना नइखे,लेकिन एह सम्मेलन में जाके ओकरा के बाँट के …. ओकरा प्रचार-प्रसार में जवन इ लोग आपन जीवन के आहुति देले बा, उ एगो चिरस्मरणीय भोजपुरी साहित्य के इतिहास में एगो अलग अध्याय बा…. तीसर बात ई बा कि जहां तक लोग के सवाल बा रउआ दुआरी केतना छु्अतानी,एकरा पर आधारित बा… लेकिन आज तक हमरा पइसा के कमी ना भइल, लेकिन समय के कमी जरूर बुझाइल…. रउआ अगर सच्चा दिल से , सच्चा भाव से भोजपुरी साहित्य-संस्कृति के विकास खातिर आगे बढ़त बानी… त भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र के लोग रउआ से दू डेग आगे बा .

प्र. आज रउआ इहां इग्नू कैंपस में आइल बानी. इग्नू में भोजपुरी के आधार पाठ्यक्रम बन रहल बा. इग्नू में अब भोजपुरी के पढ़ाई शुरू होखे जा रहल बा.. रउआ बताईं भोजपुरी अउर कवना-कवना विश्वविधालय में पढावल जाता.. अउर कब से एकर पढाई शुरू भइल.. रउआ त विश्व में भोजपुरी के पहिला व्याख्याता रहल बानी.. त एकरा बारे में तनी विस्तार से बताई…

उ०- ई एगो ऐतिहासिक क्षण बा.. कि इग्नु भोजपुरी के पाठ्यक्रम के शुरू करे जा रहल बा…दोसर विश्वविधालय अउर इग्नू में अंतर बा… हम धन्यवाद देब भोजपुरी भाषा-भाषी लोग आ साहित्यकार लोग के ओर से इग्नू विश्वविधालय के कुलपति विशेषकर शत्रुध्न प्रसाद जी के, जे एकर अगुवाई कर रहल बानी,…. अउर विश्वधालय में भोजपुरी के पढ़ाई आ इग्नू में भोजपुरी के पढ़ाई में जमीन असमान के फर्क बा. इग्नू भोजपुरी के पढ़ाई शुरू कर रहल बा त एकर मतलब बा कि पठन -पाठन के ममिला में भोजपुरी अंतरराष्ट्रीय क्षितिज़ पर स्थापित हो रहल बा… विश्वधालय में जहां तक भोजपुरी के पढाई के सवाल बा त सबसे पहिले १९६८ में स्नातक स्तर तका बिहार विश्वधालय में भोजपुरी के पढाई प्रारंभ भइल . ओकरा बाद कुंवर सिंह विश्वधालय में एम .ए स्तर पर भोजपुरी के पढाई शुरू भइल. बिहार के प्राय : सब विश्वधालय में भोजपुरी एगो स्वतंत्र पत्र के रूप में पढावल जाला. स्वतंत्र पत्र के रूप में ना त कवनो विशेष पत्र के रुप में ……त हमरा बुझाता कि पूर्वांचल के जेतना विश्वधालय बा उ सब में एकर पढाई प्रारंभ हो चुकल बा .लेकिन बिहारे एगो अइसन प्रदेश बा जहां कि भोजपुरी एगो स्वतंत्र पत्र के रूप में B.A, I.A से लेके M.A तक पढावल जाता .. एकर भविष्य बडा उज्ज्वल लागता .अब जे लोग एकरा के एगो बोली मानत रहे ,ओह सब लोग के जबाब मिल चुकल बा कि भोजपुरी आज उ नइखे जे 50-51 में रहे . भोजपुरी आज एगो साहित्य के दर्जा ले चुकल बा , एकर पठन -पाठन शुरु हो चुकल बा त अब लोग के कवनो तरह के शंका ना होखे के चाहीं. अब भोजपुरी साहित्य के …… चाहे देश के कवनो साहित्य होखे , चाहे विश्व के कवनो साहित्य होखे ओकरा सामने सम्मान के साथ रखल जा सकेला .

प्र- रउरा भोजपुरी सिनेमा में गीतो लिखले बानी. आज जे भोजपुरी फिल्म बनता ओकरा बारे में का कहनाम बा .
उ०- कवनो भी सिनेमा के ….चाहे उ हिंदी होखे , भोजपुरी होखे या अंग्रेजी …ओकर आपन एगो बाजार होला. आ बाज़ार के इ मतलब ह कि उपभोक्ता जवन मांग करेला ओकरे आपूर्ति कइल जाला.आज से १५-२० साल पहिले जे उपभोक्ता के मन अउर मिजाज रहे , समय के साथ अउर वैश्वीकरण के साथ ओकरा में बदलाव आ गइल बा .ओकर असर त सिनेमा पर होखबे करी, चाहे उ हिंदी के सिनेमा होखे चाहे भोजपुरी के .एकरा के रोकल त कठिन बा. चूंकि जवन देखे वाला पसंद करी , उहे सिनेमा बनाई काहे कि ओकर इ रोज़गार बा . उ कवनो गांधी जी अउर महत्मा बुद्ध नइखे जे समाज आ देश के सेवा खातिर उ सिनेमा बनावता . ओकर व्यवसायिक जवन उदेश्य बा उ त मूल बा …..आ एकरा बाद ओकर साहित्यिक – सांस्कृतिक जवन उदेश्य बा ओकर भी भरसक पालन होखे के चाहीं. तब अइसन स्थिति में हमार इ सुझाव बा कि कुछ बाजार खातिर भी सिनेमा बने त कुछ कलात्मक आ ऊंचाई वाला सिनेमा भी

प्र- अब त भोजपुरी के चैनल भी आ गइल . राउर प्रतिक्रिया ?

उ०- एहू में दूनू के बढिया समन्वय होखे, व्यवसायिकता के भी आ स्वस्थ सांस्कृतिक जवन पक्ष बा ओकर भी. हमरा जहां तक बुझाता कि आम दर्शक अच्छा स्वाद के बाडन . कुछे दर्शक अइसन बाडन जेकर स्वाद बिगडल बा. आ जइसन रउरा परोसब लोग उहे खाई.जब अच्छा चीज रउरा परोसब त लोग अच्छे खाई. खराब चीज रउरा परोसल शुरु करब त कवनो उपाय नइखे, लोग खराबे खाई.लेकिन भोजपुरी में जवन भी रउरा परोसब लोग खाई काहे कि एह में जवन स्वाद बा , संप्रेषण के जवन ताकत ब , उ अउर कहीं नइखे.एह से भोजपुरी चैनल के भविष्य उज्ज्वल बा. हमार शुभकामना .

– मनोज भावुक

भोजपुरी का खिलाफ षडयंत्र पर चुप्पी काहे ?

हमनी का अकसरहा एगो माँग सुनीले कि भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल कइल जाव. बाकिर केहू ना कहे कि ओहसे पहिले एकरा के हिंदी के चंगुल से आजाद कइल जाव. एगो सुनियोजित षडयंत्र का तहत भोजपुरी के स्वतंत्र अस्तित्व गँवे गँवे मेटावल जा रहल बा. जनगणना मे भोजपुरी भाषा के अलगा से गिनिती तक ना होखे, ओकरा के हिंदी का उपभाषा का रुप में शामिल कर लिहल जाला. जनगणना के आँकड़ा एह बाति के देखावत बा. सूची में सैकड़न भाषा के नाम आ ओकरा के बोलेवालन के संख्या दिहल बा बाकिर भोजपुरी के नाम नदारद बा काहे कि ओकरा के हिंदी के उपभाषा बना के हिंदी में गिन लिहल गइल बा.

सरकारे के जनगणना २००१ के आँकड़ा लिहल जाव त भारत में भोजपुरी बोले वालन के संख्या तीन करोड़ तीस लाख निनानबे हजार चार सौ सत्तानबे बा. ई संख्या ओकरा के भारत के भाषा सूची में आठवाँ जगह पर राखत बा जवन कि बाकी पन्द्रह गो अनुसूचित भाषा से बेसी बा. भोजपुरिये का तरह राजस्थानी, मगही, हरियाणवी वगैरह भाषा के हिंदी का उपभाषा में शामिल कर लिहल गइल बा जवना के हिंदी के विद्वानन के षडयंत्र मानल जा सकेला. हिंदी के सगरी उपभाषा के अलगो कर दिहल जाव तबो देश में हिंदी बोले वालन के संख्या सब ले बेसी रही एहसे समुझ में नइखे आवत कि बाकी भाषा का साथे ई अन्याय काहे कइल जा रहल बा.

हिंदी के हित खातिर भोजपुरी के बलिदान करे के बात हमरा समुझ में नइखे आवत. जब बाकी सगरी भाषा अलगा हो सकेली सँ त भोजपुरीए कवनो किरिया खइले बिया का कि ऊ हिन्दी के महारानी बनावे खातिर अपने ओकर दाई बन के रह जाई ? आजु सबले बड़ जरुरत बा कि भोजपुरी के सबले पहिले हिंदी का गुलामी से निकालल जाव. जबले भोजपुरी के अलग ना मानी सरकार, तबले आठवीं अनुसूची में एकर शामिल होखे के सवाले नइखे उठत. ना त एकरा लगे कवनो प्रधानमंत्री के वइसन महिला मित्र बिया जवना के प्रभाव में ओकरा भाषा के आँठवी अनुसूची में शामिल कर लिहल गइल. हमरा से नाम मत बोलवाईं, सभे जानत बा कि कवन प्रधानमंत्री, कवन भाषा.

आजु जरुरत एह बाति के बा कि भोजपुरी के काम करे वाली सगरी संस्था आ नेता एह माँग के पहिले करसु कि भोजपुरी के गिनती हिंदी में मत मिलावल जाव. ओकरा बाद सवाल उठावल जाव कि कवना कमी का चलते भोजपुरी के, जवना के बोले वाला देशे में तीन करोड़ से बेसी लोग बा, त संविधान का आठवीं अनुसूची से बाहर राखल गइल बा बाकिर नेपाली, सिंधी, आ उर्दू के भीतर. कवनो त मापदण्ड होखी एकरा खातिर ? आ ऊ मापदण्ड हमनी भोजपुरियन के मालूम होखे के चाहीं. अगर हमनी का भाषा में कवनो कमी बा त हमनी का ओकरा के दूर करब जा.

भोजपुरी भाषियन के सबले बड़ कमजोरी बा एकता के अभाव. तीन कन्नौजिया तेरह चूल्हा का तरह हर भोजपुरिया के अलगे बथान होला. ऊ केहू दोसरा का साथे मिल के चल ना पावे, दोसरा के बढ़न्ती देख ना पावे. दोसरा के मामर हेठ करे का फेर में आपन मेमर हेठ होखत बर्दाश्त कर लेला. एकरो के दूर कइला के जरुरत बा. हमनी के चाहीं कि भोजपुरी में भा भोजपुरी के काम करे वाला हर आदमी, हर संस्था के बढ़ावा दिहल जाव. केंकड़ा का तरह एक दोसरा के टाँग खिंचाई बन्द कइल जाव. जबले हमनी भोजपुरियन में एह बात खातिर एका ना हो पाई तबले भोजपुरी के सरकारी मान्यता के सवाले नइखे उठत. काहे कि ना त ई कवनो संप्रदाय के भाषा ह, ना कवनो अइसन समूह के जवन आपन बाति मनवावे खातिर नाजायजो करे में ना हिचकिचाव.

‍संपादक, अँजोरिया

मातृभाषा से दूर हो गइल समाज आपन पहिचान भुला देला

दिनांक 22 फरवरी 2011 के दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में भोजपुरी समाज दिल्ली का सौजन्य से एगो प्रेस कांफ्रेस के आयोजन भइल जवना के मकसद रहे मारीशस के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री जगदीश गोवर्धन के 50 दिवसीय ‘भारत भोजपुरी यात्रा’ का सिलसिला में उनुकर कोशिश आ विचारन से मीडिया जगत के अवगत करावल. एह प्रेस कांफ्रेस में मारीशस से आइल ओहिजा के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री जगदीश गोवर्धन, डा. अखिलानंद रिसाल अउर उनुकर पत्नी होशिला देवी रिसाल का साथ-साथ भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. नित्यानंद तिवारी, भोजपुरी पत्रिका ‘संडे इंडियन’ के संपादक ओंकारेश्वर पांडेय, पूर्वांचल एकता मंच दिल्ली के अध्यक्ष शिवाजी सिंह, भोजपुरी समाज दिल्ली के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रभुनाथ पांडेय, डा. अजय कुमार ओझा, आ कुलदीप कुमार सहित इलेक्ट्रॉनिक अउर प्रिंट मीडिया के तमाम संवाददाता आ पत्रकार उपस्थित रहले.

(फोटो में : ओंकारेश्वर पाण्डेय, जगदीश गोवर्धन, अजीत दूबे, डा॰ नित्यानन्द तिवारी आ शिवाजी सिंह)
अपना संबोधन में जगदीश गोवर्धन कहनी कि “मनुष्य क सबले महत्वपूर्ण आ प्रिय भाषा ओकर मातृभाषा होले अउर ई मातृभाषा आदमी के मस्तिष्क के सोचे समुझे के बेहतर नजरिया देबेले. जे अपना मातृभाषा से दूर हो जाला ऊ आपन पहिचानो भुला देला. भोजपुरी दुनिया के 20 करोड लोगन के मातृभाषा ह बाकिर आजुवो ई भाषा भारते में अपना सम्मान से वंचित बिया. एकरा के देश के संविधान का आठवीं अनुसूची में शामिल कइल बहुते जरूरी बा आ एकरा ला सगरी भोजपुरी भाषियन अउर देश विदेश में संचालित सगरी भोजपुरी संगठनन के एके साथ एके मंच पर आके बहुते मजगर तरीका से आपन आवाज बुलंद करे के होई. साथही भोजपुरी क्षेत्र के राजनेतवन के साफ सनेसा देबे के होई कि संसद में भोजपुरी के हक में आवाज उठावे वाला राजनेते के हमनी के वोट मिल पाई. जब 20 करोड लोग मिलके एक साथ आवाज उठाई त भोजपुरी के ओकर वाजिब संवैधानिक हक लेबे से केहू ना रोक पाई”.

अपना अध्यक्षीय भाषण में भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे जगदीश गोवर्धन के उनुका एह 50 दिवसीय ‘भारत भोजपुरी यात्रा’ खातिर साधुवाद आ बधाई दिहले आ भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करावे का संबंध में भोजपुरी समाज दिल्ली के कइल प्रयासन के जानकारी देत कहले कि विडंबना बा कि मारीशस जइसन दूर देश में त भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता मिल गइल बा बाकिर अपने देश में भोजपुरी सरकारी अनदेखी के शिकार बिया. ऊ जोर देत कहले कि “एकरा पहिले कि भोजपुरी भाषा आंदोलन विकराल रूप धारण करे एकरा के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करावे खातिर विधेयक संसद के एही सत्र में जरुर पेश हो जाये के चाहीं. अइसनका होखल 20 करोड भोजपुरी भाषियन के भावना के सम्मान होखी. माँग कइले कि केन्द्र सरकार दृढ. राजनीतिक इच्छाशक्ति देखावत संसद के मौजूदा सत्रे एह विधेयक के जरुर पेश कर देव.”

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. नित्यानंद तिवारी के कहना रहे कि “भोजपुरी अइसनका लोगन के भाषा ह जे जानेलन कि संघर्ष आ दुख सहि के सफलता कइसे पावल जाला. मारीशस गइल गिरमिटिया मजदूर एकर सबले बड़ सुबूत बाड़न. भोजपुरी में गुण, संख्या आ दृष्टि के अइसन सामर्थ्य बा कि ऊ आपन सम्मान पा सकेले. एहसे भोजपुरी जेकरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त बा ऊ संविधानो के भाषा बने के हकदार बिया आ ई हक ओकरा मिले के चाहीं.”

भोजपुरी पत्रिका ‘संडे इंडियन’ के संपादक ओंकारेश्वर पांडेय कहले कि “गोरख वाणी से लेके कबीर तक भोजपुरी अतना प्रभावशाली रहल बिया कि आजादीए का समय एकरा उचित सम्मान मिल जाये के चाहत रहे. आठवीं अनुसूची में दर्ज दोसरा भाषावन का तुलना में भोजपुरी का लगे पर्याप्त आधार बा आ एकरा ई हक मिलही के चाहीं.” ऊ सगरी भोजपुरी भाषियन के गोहारो कइले कि जनगणना 2011 में मातृभाषा का कॉलम में भोजपुरी के नाम लिखावस.

पूर्वांचल एकता मंच दिल्ली के अध्यक्ष शिवाजी सिंह के कहना रहे कि जबले तीव्र आंदोलन आ संघर्ष के रास्ता नइखे अपनावल जात तबले भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में शामिल करावल मुश्किल लागत बा.

एह अवसर पर जगदीश गोवर्धन के एह 50 दिवसीय ‘भारत भोजपुरी यात्रा’ संबंधी स्मारिका के विमोचनो कइल गइल.

भोजपुरी खातिर संसद में सवाल उठावल गइल

सोमार का दिने लोकसभा में एगो ध्यानाकर्षन प्रस्ताव के माध्यम से भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के माँग कइल गइल.

मुखर सांसदन में संजय निरुपम, जगदम्बिका पाल, डा॰रघुवंश नारायण सिंह, पी एल वगैरह शामिल रहले. सांसद के जोरदार माँग पर प्रणव मुखर्जी के कहे के पड़ गइल कि एह बाति पर अतना जल्दबाजी में पूरा बहस ना करावल जा सके. अगिला सत्र में एह बाति पर विस्तार से चर्चा कइल जाई. सरकार भोजपुरी, राजस्थानी समेत देश के ३८ गो भाषा के एह अनुसूची में शामिल करावे पर सोच विचार कर रहल बिया.

अब ना नौ मन तेल होखी ना राधा जी नचीहें बाकिर भोजपुरी के सवाल उठावे वाला सांसदो तय कर लिहले बाड़न कि अगिला चुनाव से पहिले एकर फैसला करा के मनीहें.