आवऽ लवटि चलीं जा – (1)

Dr.Ashok Dvivedi

– डा॰अशोक द्विवेदी

भाई का डंटला आ झिरिकला से गंगाजी के सिवान छूटल त बीरा बेचैन होके अनासो गांव चौगोठत फिरसु. एने ओने डँउड़िआइ के बगइचा में फेंड़ा तर बइठि जासु आ सोचल करसु. सोचसु का, खाली उड़सु. कल्पना का महाकाश में बिना सोचल-समझल उड़सु. एह उड़ान में कब पाछा से आके पनवा शामिल हो जाव, उनके पता ना चले. आम के मोजरि दनात रहे, ओकर पगली गंध बीरा के न जाने कवन मादक निसा में गोति-गोति देव. पनवा के दमकत गोराई, ललछौंही मोहखरि, लसोरि तिरछी चितवन आ गदराइल देहिं, रहि-रहि के उनके अपना ओर घींचे लागे. रहि-रहि के उनका मन परि जाव ऊ इनार आ पियास लागि जाव. कंठ सूखि के अगियाए लागे त उठि के घरे चलि देसु.

ई ना रहे जे पनवा चैन से होखे. बैखरा लेले रहे ओकरा के. बीरा के पाम्ही आवत गोल चेहरा, गोर गेंठल देंहि, पियासल आंखि, आ लकाधुर बोली रहि-रहि के ओकरा के बहरा दउरा देव, बाकिर बीरा ना लउकसु. रेता में उछरि के गिरल मछरी लेखा तलफत पनवा के सन्तोख होखो त कइसे? बीरा कवनो गांव-घर के त रहलन ना.

बलुआ से थोरिके दूर बीरा के गाँव रहे सिमरनपुर. बाप-मतारी रहे ना. छोट्टे पर से बड़ भाई आ भउजाई के ऊ बाप-मतारी का रूप में देखत आइल रहलन. एगो बहुत छोट गिरहस्त रहे लोग ऊ. दू बिगहा के खेत, खपड़ा के घर, एगो बैल आ एगो भइंसि – इहे उनकर पूंजी रहे. बीरा दुसरा दर्जा का बाद पढ़बे ना कइलन. अइसन ना कि उनकर मन पढ़े में ना लगल. घर के परिस्थितिए अइसन रहे. भउजाई भइंसि चरावे के कह देसु, खेत में भाई के खाना-खेमटाव ले जाए के कहि देसु आ एही तर धीरे धीरे अपनहीं पढ़ाई छुटि गइल.

जवानी के उठान आ चमक अईसन ह कि करियो कलूठ आ लंगड़ो-लूल सुघ्घर आ भरल-पूरल लागे लागेला! फेर त बीरा के पुछहीं के ना रहे – गेहुँवा रंग, छरहर-कसरती देंहि. अपना उमिर का लड़िकन में सबसे पनिगर आ चल्हांक. नवहा लड़िकन का संगे गंगाजी का सरेंही ले भइंसि घुमावत, कबड्डी-चिक्का खेलत बीरा के दिन बड़ा ढंग से बीतत रहे. बलुआ गाँव से होत, गंगाजी का तीर ले के आवाजाही में, पता न कब उनकर आमना-सामना पनवा से भइल आ कब उनका भीतर प्रेम के पातर स्रोत फूटल, केहू ना जानल. सोता से झरना बनल तब्बो यार-दोस्त ना समुझलन स, बाकिर उहे प्रेम जब नदी के लहरन अस लहरे आ उमड़े लागल त सभे जानि गइल.

नदी के बेग आ बहाव के रोके खातिर बीरा के घर-पलिवार आ पनवा के खनदान हुमाच बान्हि के परि गइल. बान्हे-छान्हे के कवन उतजोग ना भइल, बाकि दू पाटन का बीच में बहे वाली नदी भला एक्के जगहा कइसे रुकि जाइत? भाई भउजाई के दिन-रात हूँसल-डाँटल आ धिरावल बीरा के बहुत खराब लागल रहे – अतना खराब कि ओघरी ऊ लोग. उनकर सबसे बड़ दुश्मन बुझाए लागल. चार पांच दिन से बेचैन होके डँउड़ियाइल फिरत बीरा मन के जतने आवेंक में करे के कोसिस करसु, ऊ अमान बछरु लेखा कूल्हि छान्ह पगहा तुरा के भागे लागे. बीरा कतनो महँटियावस, कतनो भुलवावस बाकि मन में रचल-बसल पनवा के खिंचाव उनके कल से ना रहे देव. जहाँ कहीं एकन्ता-अकेल बइठस उनके पनवा के मिलला के एक-ए-गो घटना मन परे लागे.

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बरिस-बरिस के तिहुवार ह फगुवा. बेयार डोलत कहीं कि लइका-छेहर, बूढ़-जवान सभका पर फगुनहट चढ़ि जाला. दस दिन अगहीं से भरबितनो रँगे-रँगाए सुरु क दिहन स. ननद-भउजाई आ देवर तिनहुन के रोआँ-रोआँ रंग बरिसावे लागी. लसोर तिरिछी नजरि डोले लगिहें स आ अब्बर-दुब्बर करेजा में गड़ि के करके लगिहें स. फेरु अस मीठ दरद उठी कि बुढ़वा-मंगर बितलो पर बेचैन करी. ई बेचैनी तब अउरी बढ़ि जाई जब पहिल प्रेम के दरियाव भीतर उमड़त होखे.

तेहू में ओह दिन फगुवा अपना पूरा रंग में बलुआ गाँव पर चढ़ि गइल रहे. घर-आँगन-दुआर, खेती-खरिहान चारु ओर रंग बरिसत रहे. किसिम-किसिम के रंग. ढोलक झाल का संगे होहकार मचावत नवछेड़ियन के गोलि चउधुर का दुआरे पहुँचल त लम्मे भइल चउधर टोकलन, ‘‍बड़-बूढ़ देखि के रे बचवा!’ फेरु लड़िकन के लकुराध से कुछु डेराइले उ ओसारा का ओर जाए लगलन. उनका हाथ में गुड़गुड़ी रहे. करीमन काका चउधुर के पुरान सँघतिया रहलन. चउधुर के घसकल देखि के, एगो लइका का हाथ से रंग के बल्टी झपटलन आ कल्ले-कल्ले धवरि के चउधुर का पीठी भभका दिहलन. हल्ला मचि गइल. चउधुर अनखाइले कुछु कढ़ावहीं के रहलन कि करीमन काका नौछेड़ियन के उसुकावत पिहिकारा छोड़ि दिहलन –

फागुन में,
फागुन में बूढ़ देवर लागे,
फागुन में….

ढोल धिनधिना उठल. झाल झनझनाए लगली स. करीमन के कर्हियांव लचकावल देखि के चउधुरी के खीसि बुता गइल. उ ठहाइ के हँसि दिहलन. ठेका टूटल देखि के करीमन काका नौछेड़ियन के ललकरलन, ‘जवनिए में मुरचा लागि गइल का रे?’ ई बाति बीरा अस नवहा के छाती में समा गइल. उ झपटि के आगा कूदल, ‘अ र् र् र् कबीर ऽऽ….!’ कवाँड़ी के पल्ला तर लुकाइल फँफरा मुहें झाँकत पनवा के हँसी छूटि गइल. अभिन त रेखियाउठान रहे बीरा के. गोर गठल सरीरि. सुन्नर सुरेख चेहरा. गाले ललका रंग. नवहन का गोल में उ लचकि-लचकि के गावे सुरू क देले रहलन …….

केकरा हाथ कनक पिचकारी
केकरा हाथे अबीर?
अरे केकरा हाथे अबीर!
राधा का हाथ कनक पिचकारी
मोहन का हाथे अबीर!

गावत-बजावत हुड़दंग मचावत नवहन के गोलि आगा बढ़ि गइल. बीरा के गवनई आ मस्त थिरकन पनवा का आँखी समा गइल. कल्पना का सनेहि से ओकर मन गुदुराए लागल. बाकि बाप के दुलरुई आ मुहलगुवी पनवा के गोड़ लाजि बान्ह लिहलस. बहुत देरी ले कँवाड़ी के पल्ला धइले ठाढ रहि गइल. बेहोसी में ऊ चलल चाहे बाकि ओकर डेग ना आगा जाव ना पाछा. अजब हालत हो गइल रहे पनवा के.

गाँव घुमरियावत दुपहर भइल. गोल फूटे लागल. बीरा सोचलन कि एही पड़े नहइले चलल जाव. गंगाजी नियरहीं रहली. उ अपना सँघतिया से सनमति कइलन. सहुवा किहाँ से उधारी साबुन किनाइल आ खोरी-खोरी, हँसत बतियावत चल दिहल लोग. बीच-बीच में बोलबजियो होत रहे.

चउधुरी के दुअरा, इनार पर मेहरारू ठकचल रहली स. बेदी के हेठा घोरदवर मचल रहे. निहुरि के कनई उठावत पनवा के नजरि बीरा पर गइल. दूनों जना के नजर मिलली स. पनवा लाजे कठुवा गइल. बीरा के आँखि कनई से होत-हवात पनवा के दहकत गाल पर ठहरि गइल. पनवा के थथमी टूटल. उ लजाते-लजात कनई उठवलसि आ छपाक से एगो मेहरारु पर दे मरलसि. मेहरारु पाँकि में पूरा सउनाइल रहे. उ हँसत झपटल त पनवा फट से फेरू निहुरि गइल. बीरा एह चंचल उफनत रुप के इन्द्रजाल निहारे में भुला गइलन. उनुका आँखि के तार टूटे के नांवें ना लेइत, अगर उनुकर सँघतिया ना टोकित, ‘ का हो, डेगे नइखे परत का?’

बीरा चिहुँकि के चाल त तेज क दिहलन, बाकिर उनका भितरी पनवा का ललछौंही गोराई के चंचल छवि किलोल करत रहे. रहि रहि बेचैन करत रहे पनवा के लसोरि मीठि चितवन.

रंग धोवाइल, रंग चढ़ल आ अइसन चढ़ल कि बीरा डगमगाए लगलन. भाँग के नसा में बारह बजे राति ले गवनई कइला के बाद जब ऊ घरे पहुँचलन त निखहरे खटिया पर फइलि गइलन. आँखि मुनाइल रहे बाकिर कनई उठावत, निहुरल पनवा के समूचा देंहि के उमड़त यौवन उनका सोझा देरी ले थरथरात रहे. बीरा हहाइल-पियासल आँखि का अँजुरी से ओह उमड़त सुघराई के पीए लगलन. पियते पियत कब दूनी भोर हो गइल आ कब उ नीनी गोता गइलन, पते ना चलल.

घाम भइला, जब भउजाई झकझोरलसि त नीनि टूटल. ‘का हो बबुआ राति ढेर चढ़ि गइल रहुवे का? कब आके सूति गउवऽ? कुछु बोलबो ना करुवऽ. हम खाएक ध के राति ले अगोरत रहुवीं.’ बीरा मुस्कियात बोललन, ‘ सांचो रे भउजी? केवाड़ी त बन्न रहुवे?’ आ ठठाई के हँसि देहुवन. भउजाई लजा के भितरी भागि गउवी. बीरा देरी ले मुस्कियात रहुवन.

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फगुवा बीतल त बीरा के गंगा के कछार घोरवठे क सूर चढ़ल. उ रोज खाइ-पी के निकल जासु. हरियरी से जीउ उचटे त बलुआ गाँव के पकवा इनार पर आके खड़ा हो जासु. पूरब का ओसारा में बइठल पनवा के जइसे एकर पूरा पता रहे कि बीरा के पानी पिए के ईहे जून ह. उ आधा घंटा पहिलहीं से ओसारा में आके कुछ न कुछ काम-धंधा सुरु क देव.

अक्सर खँभिया का ओर बीरा के आवत देखि के पनवा के अगोरत मन उछरे लागे, बाकि ऊ जान बूझि के मूड़ी गोतले रहे. बीरा का खँखारते ओकर मूड़ी उठे आ नजर मिलते बीरा सिटपिटा जासु. आखिर लजाते लजात बीरा के कहहीं के परि जाव, ‘तनी पानी पियइबू हो?’ पनवा एक हालि तरेर के देखे फेरु बनावटी खीसि में बोले, ‘तहरा रोज पियासे लागल रहेला?’ फेरू ऊ भितरी से डोर बाल्टी के लेके छने भर में बहरा निकलि आवे.

ओकरा इनार पर पहुँचत-पहुँचत किसिम-किसिम के बिचार बीरा का मन में फफने लागे. कबो पनवा के साँचा में ढारल सुघ्घर देंहि पर, कबो ओकरा बेफिकिर जवानी पर, कबो ओकरा जोमिआइल चाल पर आ कबो ओकरा माँगि में भरल सेनुर पर. बाकिर विचार के बवंडर गुर्चिआए का पहिलहीं छिटा जाव. ‘काहो, पानी पियबऽ कि हम जाईं?’ आ जब चिरुआ में पानी गिरे लागे तब बीरा के आंखि अनासो निहुरल पनवा के गरदन के नीचा टँगा जाव. कनपटी दहके लागऽ सन आ पियास गहिर होत चलि जाव. जब बाल्टी के पानी ओरा जाव त बीरा के करेजा जुड़ाए का बदला अउरु धधके लागे.

बाल्टी लटकावत पनवा अगराइ के पूछे, ‘का हो अभिन तोहार पियास ना गइल?’ बीरा अतिरिपित नियर मूड़ी डोला देसु. का जाने काहें उनुकर ओंतरे ताकि के मूड़ी डोलावते पनवाके देंहि चिउँटि रेंगे शुरु क द सन. ऊ भितरे-भितर कसमसाइ के रहि जाव. ओफ्फ नजरि ह कि बान…….. . थिराइलो पानी हँढोरि देले बीरा के इ नजरि. पनवा कुछ देर त सम्मोहन में बन्हाइल रहे, बाकि टोला-महल्ला के सुधि अवते ओकर सम्मोहन टूटि जाव. ऊ जल्दी जल्दी भरल बाल्टी उठावे, डोर लपेटे आ तिरछे ताकत घूमि के चल देव.

बीरा जगहे प खड़ा हहरत ताकसु – आ तबले ताकति रहि जासु जबले पनवा अपना ओसारा से होत घर में ना हेलि जाव.

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ओह दिन बीरा जब कान्हे गमछा आ लउर लिहले अचके में आके इनार पर खाड़ भइलन, त भईंस के लेहना गोतत पनवा के आंखि में एगो खास किसिम के चमक उठल, मन पोरसन उछरि गइल. अगर लोक-लाज के भय ना रहित त ऊ धवरि के बीरा के अँकवारी में भरि लेइत.

बीरा से आंखिए-आंखी पुछलन, ‘का हो का हाल बा?’ पनवा आंखिए-आंखी कहलस, ‘खूब पूछ तारऽ. कुल्हि करम त क घललऽ.’ फेर बिना कुछ बोलल बतियावल ऊहे बालंटी, ऊहे डोर, ऊहे इनार. पानी पियत खान बीरा के ओहीं तरे निहारल आ पनवा के सकुचाइ के अपना भीतर बटुराइल……फेर थथमि के आंखि तरेरल.

आजु बिना कुछ पुछले बीरा के बोली फूटल – ‘तहार गुलामियो बजइतीं, अगर नोकरी मिलि जाइत?’ पनवा अचकचा के तकलस, झूठही खिसिअइला के भाव देखवलस आ मुस्कियाइ के बल्टी इनार में छोड़ि दिहलस. बल्टी सरसरात नीचे चलि गइल. ओने बाल्टी बुड़बुड़ाइल एने पनवा के बोली सुनाइल, ‘अतना बरियार करेजा बा तोहार? दम बा त बाबू से बतियावऽ!’

बीरा के बुझाइल कि इ चुनौती पनवा उनका पौरुष आ साहस के दे तिया. नेह के निश्चय बड़ा दृढ़ होला. तब अउरू, जब जवानी में जोम होखे. ऊ दृढ़ होके कहलन, ‘अब त समनहीं आई. बाकिर अतने डर बा कि आगि लहकला का पहिलहीं तु पानी जिन छोड़ि दीहऽ.’

पनवा बाल्टी के बान्हन खोलत रहे. ओकर मन कइल जे खोलि के कहि देव. कहि देव कि जरुरत परी त हम तहरा खातिर इ घर दुआर महतारी-बाप कुल्हि छोड़ देब. बाकिर ऊ अतने कहलस, ‘दोसरा के सिच्छा देबे का पहिले अपना के अजमावऽ!’ अतने में रामअंजोर चौधरी दुआरे आ गइलन. बीरा इनारे भइल गोड़ लगलन, ‘पायँ लागी बाबा!’ चउधुर कुछ कहितन एकरा पहिलहीं पनवा बल्टी लेले निहुर गइल, ‘ल पियऽ!’ बीरा फेरु पानी पिए लगलन.

चलत खान चउधुर बोलवलन, ‘सुनि रे बचवा!’ पहिले त बीरा डेराइ गइलन. धीरे धीरे फाल डालत, सोचत-गुनत चल दिहलन. नियराँ गइला पर खुलासा भइल, ‘बड़ा फजीहत हो गइल बा एघरी. अब ई खेती के लउँजार संभरत नइखे. बुढ़ापा का कारन हम सकि नइखीं पावत. कवनो चरवाहा नइखन सँ भेटात. बीरा, तहरा किहाँ कवनो भेटइहन स?’ जवने रोगिया के भावे तवने वैदा फुरमावे! बीरा के मन माँगल इनाम मिल गइल. बाकि बड़ा अस्थिराहे कहलन, ‘बाबा हम परसों ले कुछ जोगाड़ बान्हब! एक दू आदमी बा, सवाच के बताइब!’

गाँव का नियरा पहुँचत-पहुँचत बीरा का दिमाग में पूरा योजना तैयार हो गइल रहे. ‘हमहीं चौधरी किहाँ चरवाही करब!’ बीरा जइसे पूरा तय क के बुदबुदइलन. उनका आँखि मे पनवा समाइल रहे. हर घरी ओकरा के देखला आ नगीच पहुँचला के ललक उनके बेकल कइले रहे. भगवान सहाय बाड़न तब्बे न चउधरी का मुंह से ई बात निकसल हऽ. उनका भीतर हलचलो होत रहे. ऊ डेरासु त इहे सोचि के, कि पनवा बियुहती ह. ओकर खियाल उनके छोड़ देबे के चाहीं. बाकिर ओकरे बोली….. उ चुनौती. उनुका बुझाइल जे पनवा मेहना मार तिया – ‘ईहे मरद बनल रहलऽ हा. प्रेम हँसी ठठ्ठा ना हऽ. करेजा के बड़ा पोढ़ करे के परी. केहू का क ली? मरद बाड़ऽ त आवऽ तलवार का धार प चलि के देखावऽ. प्रेम कइले बाड़ऽ त भागत काहें बाड़ऽ? ताल ठोंकि के मैदान में कूदऽ!’

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दू-चार दिन बीतत-बीतत बीरा चउधुर से बतिया लिहलन. बतिया का लिहलन, पूरा इत्मीनान करा दिहलन. चउधुर सोचलन कि बूझला खेत बारी कम बा आ भाई से कुछ खटपट बा, एही से बीरा खुदे चरवाहि करे खातिर सकार लिहलन. दू दिन बाद चउधुरी किहाँ बीरा काम करे शुरु क दिहलन. उनका भीतर जब बेचैनी होखे त केवनो ना केवनो बहाना से गंगाजी का ओर बाड़ में निकल जासु. कबो गंगा नहाए, कबो खेत घूमे. चौधरी का ना बुझाइल कि बीरा उनुका चरवाही का संगे लेहना-पताई, गोरू-बछरू, खेत-बधार सब कुछ कइसे सँभारि लिहलन? ऊ सोचलन, हम ठहरली बूढ़ आदिमी. अकेल जीउ, एने ओने डँउड़िअइला से फुरसते नइखे. पनवो के भीरि कम होखी. पनवा के त जइसे मन माँगल मुराद मिलि गइल होखे. खुसी के मारे डेग एने से ओने परे लागल. ऊ फुदकत फिरे. जेके देखे खातिर छछाइल रहे, ऊ अब चउबीसो घन्टा के सँघाती बनि गइल रहे.

धीरे-धीरे बीरा चउधुरी का घर के जिम्मेदारी कपारे ओढ़ि लिहलन. पनवा के त सपने फुला गइल रहे. ऊ उतराइल फिरे. ओकरा निगिचा आवत-जात, बोलत-बतियावत बीरा ओकर अतना आपन हो गइलन कि दुइयो घरि अन्हे भइल पहाड़ लागे. टोला-परोसा के आँखि गड़के लागल. मेहरारु जात आगी के लुत्ती होले. हवा लागत कहीं कि लहरि उठल. लोग पनवा का एह बदलाव प गौर करे लागल. बीरा आ पनवा के एक-ए-गो हरकत पर आँखि सिकुरे-फइले लगली स. गाँव टोला कवनो बड़ शहर त होला ना कि कुछ बात होखे आ हवा ओके ना फइलावे.

आखिर चिनिगी से सुनुगत सुनुगत एक दिन धधोक उठिए गइल. कानाफूसी, खुसुर-फुसुर से होत, बात चउधुर के काने लागल. चउधरि लाल भभूक भइलन बाकिर पनवा खुल्लमखुल्ला कूल्हि बेजायँ अपना कपारे ओढ़ि लिहलस. चउधुर के घुड़कला पर कहलसि, ‘ए बाबू! कूल्हिं दोस हमार हऽ! मारऽ काटऽ हमरा के, बीरा के कुछऊ कहबऽ त ठीक ना होई.’ चउधुर के भाला ले ढेर घाव लागल. ऊ खून के घोंट पी के रहि गइलन. मन थिराइल त पनवा के समझवलन, ‘लरिक बुद्धि में जिन परु. हम आजु ले आपन कुल्ही लाड़-प्यार तोरे के दिहलीं. आज हमार माथ कटाता. हमार इज्जत तोरा हाथे बा पनवां. अबहियों कुछ बिगड़ल नइखे.’ बाकिर पनवा त पिरीत का दरियाव में बहत रहे. ऊभ-चुभ करत, खालि अतने कहलसि, ‘तहार कुल्हि बात अपना जगहाँ ठीके बा बाबू. बाकिर बीरा से बिलग होके हम मुवले समान बानी. अगर हमरा के जीयत देखल चाहऽ त ए ममिला में आपन फैसला बदल लऽ.’

चउधुर के बार उजरात रहे. ऊ सोचलन ……. हमरे गलती से ई कूल्हि बखेड़ा खड़ा हो गइल. अबहियो से संभरि सकेला. हमरा जल्दी से जल्दी पनवा के गवना क देबे के चाही. ऊ उठि के नाऊ किहां चलि दिहलन.

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चौधरी के चरवाही बीरा के जिनिगी बदलि दिहलस. ऊ पनवा से लम्मा रहलन त ओकर रूप का खिंचाव में बन्हाइल रहलन. जब निगिचा अइलन त रूप के दवँक उनका दिल-दिमाग दूनों के तपाइ के निखारि दिहलस. अब हाल इ रहे कि टोला-महल्ला, समाज केहू के परवाह ना रहि गइल उनुका.

का जाने कइसन आन्ही आइल आ उनके उड़ा ले गइल. बीरा गंगा जी का अरार पर बइठि के इहे सोचत रहलन. रूप आ प्रेम के खिंचाव पर, उनकर दसा का से का हो गइल। कवन-कवन अछरंग ना लागल? सब थुड़ी-थुड़ी करऽता, तेवन एकोर, चउधरी कतना दुखी बाड़न? पनवा के बिदाई खातिर ओकरा ससुरा के लोग अलगे उनकर मूड़ी जँतले बा. आ पनवा बिया कि ओकरा कुछू के परवाहे नइखे. काल्हिए से फेंटले बिया, ‘चलऽ इ गाँव छोड़ि के कहीं लम्मा भागि चलीं जा.’

कहाँ भागि चलीं? आजु ले कहीं बहरा गइलीं ना. गाँव के ढेर लोग कलकत्ता बा लोग. आसाम में उनकर एगो संघतिया बा. बाकिर इ सोचला से फायदा का? बीरा का भीतर तनाव अउरी बढ़ि गइल. दिमाग में पनवा के निहोरा गूंजे लागल ‘हम तहरा बिना एको छन ना जीयब. ढेर तंग करबऽ त माहुर खा लेब.’

का जाने कवन मोह बा ओकरा से कि छोड़लो नइखे बनत आ छोड़ि दिहला पर जियलो कठिन बूझाता. ‘का, का ना भइल बीरा? चउधुर मारे परलन, गांव थुथुकारल, भाई गरियवलस, पंच डंड धइलस …….. पनवां तूँ जीए ना देबे हमरा के!’ ऊ तनी जोर से कहलन. गंगा के लहर उछाल मारत आइल आ नीचे अरार से टकराइ के छितरा गइल. सुरूज के किरिन तेज हो गइली सन. घाम तिखवे लागे लागल त बीरा कपारे अंगौछी बान्हि लिहलन. लहरि एक हालि फेरू आइल आ अरार से लड़ि के छिटा गइल ‘बदरकट्टू घाम सचहूं बड़ा तिक्खर होला!’ उ बुदबुदइलन.

बीरा के एक लट्ठा पाछा ले दरार परि गइल. बाकिर अपनेमें गुमसुम, कहानी बनत, बीरा के इचिको खबर ना रहे. कहानी बढ़ल जात रहे. लहरि जब चले त बुझाव कि कवनो गिरोह एक-ब-एक हमला बोलता. बाकि अरार के चट्टान नियर जामल माटी ओकर कूल्हि घाव सहि के ओके छीटि देत रहे.

‘लड़ऽसन! खूब लड़ऽसन!!’ बीरा जोर से कहलन. फेरु जइसे मन परल ‘हमहूँ अइसहीं नू बानीं. एही अरार लेखा. सभ चोट सहि के घठाउर हो गइल बानीं!’ बीरा के का पता कि सांचो उ अरार पर बइठि के अरारे हो गइल बाड़न आ उनका भीतर के घाव अवरू गहिराइल जाता. ई गहिराई उनुका के भीतरे-भीतर काटत जाता. कब एगो कड़ेराह धक्का लागी आ ऊ ढहि जइहें? ई खुद उनहीं के नइखे पता. मन में बवंडर चलत रहे आ तनिको थम्हे पटाए के नाँव ना लेत रहे.

पाछा के दरार धीरे-धीरे ढेर फइल गइल. दू चार बार धक्का के अवरू देरी रहे. पनवा फेरु मन परल. बीरा का भीतर जइसे ऊखि के एक मूट्ठी पतई जरि गइल. आंच गर ले चढ़ि आइल. उ अपना हालत पर मुस्किअइलन. सूखल हँसी फेफरिआइल ओठ पर फइल गइल. ‘दुर मरदे! तोरा ले बरियार करेजा त पनवा के बा! मेहरारु होइके अडिग. सगरो बवाल, सगरो दुतकार के जवाब दु टूक, ‘हँ बीरा हमार कूल्हि हउवनि!’ ‘बाह रे पनवा.’ अनासो उनका मुँह से निकलि गइल.

दरार अउर फइल गइल. बीरा के का पता कि सोझा से मार करत लहरन के गिरोह अब अपना सफलता का जोस में आखिरी बेर आव तिया. लहरि आइल आ कगरी के माटी हंढ़ोरि के लवटि गइल. उनुका तब बुझाइल जब पनवा झकझोर के उठवलस ‘भँउवाइल बाड़ऽ का? एने दरार फइलल जाता आ तहरा कुछ फिकिरे नइखे?’ पाछा देखते उ चिहा गइलन. झट से पनवा के फनवलन आ पाछे अपनहूं पार भइलन. अरार थसकल आ एक बएक भिहिला के लहरन में समा गइल. हँड़ोरइला से ओतना दूर के पानी कुछ अउरी मटिया गइल.

पनवा दूनूं हाथ छाती पर धइले अब ले हांफत रहे. सांस थमल त बोलल, ‘आज त तूं हमार जाने ले लेले रहितऽ! कहऽ कि हम उबिया के कवनो बहाना से, एने चलि अइनी हां. जान तारऽ उ दुआरे आके बइठल बाड़न स. बाबू बिदाई के तइयारी कर तारन. हम उनका के कहि सुनि के थाक गइलीं हां. अइनी हां त आपन जान देबे, बाकिर अचके में तहरा पर नजरि परि गइल हा.’ पनवा उनका छाती में समा के सुसुके लागल. बीरा कातर हो के ऊकर पीठ सुहुरावे लगुवन. ‘पागल अभिन हम जियते नु बानीं.हमरा रहते तें जान देबे. चलु आज तोरे बात रही. तुं कहत न रहले हा कि चलऽ कहीं लम्मा भागि चलीं जा. हम तेयार बानीं. जहाँ कहबे तहाँ चलब.’ भाववेग में ऊ कहते चलि गइलन. पनवा के हालत उनके फैसला करे के जइसे शक्ति दे देले रहे.

पनवा आपन भींजल पलक उठवलसि, ओकरा जइसे बीरा पर बिसवास ना भइल. पुछलस, ‘संचहू?’ ‘हँ रे, सांच ना त झूठ!’ बीरा ओके परतीति दियवलन. पनवा खुशी में मकनाइल, लपटा गइल बीरा से……… . जइसे फेंड़ में बँवर लपटे, ओकर हाथ बीरा के बान्हि लिहलस. नदी जइसे समुद्र में मिलि के अपना के भुला देले, ओघरी ओकरा किछऊ के चेत ना रहे. ना दीन के ना दुनिया के. बीरा टोकलन, ‘ अरे तोरा नीक जबून किछऊ बुझाला ना का? केहु देखी त का कही?’ पनवा अलगा हो गइल. ओकरा फीका मुसकान में सगरी समाज के प्रति उपेक्षा के भाव रहे.

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“आवऽ लवटि चलीं जा” लघु उपन्यास के पहिला हिस्सा १९७९ में भोजपुरी पत्रिका “पाती” में “सनेहिया भइल झाँवर” शीर्षक से छपल रहे आ एकर दुसरका हिस्सा “समकालीन भोजपुरी साहित्य” के जून १९९७ के कथा विशेषांक में ” पनवाँ आ गइल” शीर्षक से छपल. हालांकि ई देहात के बे पढ़ल-लिखल पनवाँ आ बीरा के प्रेमकथा ह, बाकिर एम्में गाँव से शहर के पलायन आ फेरु ओसे मोहभंग के साथे-साथ वापसी आ अन्तःसंघर्ष के चित्रण बा.

ई लघु उपन्यास बाद में अँजोरिया में धारावाहिक रुप से प्रकाशित भइल रहे. अब ओही उपन्यास के अँजोरिया के एह नयका संस्करण पर प्रकाशित कइल जात बा. कोशिश बा कि पुरनका संस्करण से सम्हारे जोत रचनन के एह खंड में ले आवल जाव जेहसे कि पाठकन के खोजे पढ़े में सुविधा होखे.

उपन्यासकार डा॰ अशोक द्विवेदी के नाम भोजपुरी साहित्य में जानल मानल आ मशहूर बा. अँजोरिया के सौभाग्य बा कि डा॰ द्विवेदी के रचना नियमित रूप से मिलत रहेला प्रकाशन खातिर आ हर बेर ओकरा के प्रकाशित कर के मन खुश होला. डा॰ अशोक द्विवेदी का बारे में भोजपुरी साहित्य के एगो पुरहर स्तंभ पाण्डेय कपिल के कहना बा कि, “गीत, गजल, नई कविता, निबंध, कहानी, लघुकथा, आलोचना आ संपादन का क्षेत्र में डा॰ अशोक द्विवेदी के जे अनमोल अवदान भोजपुरी के मिलत रहल बा ओकरा से भोजपुरी के ठोस आ वास्तविक समृद्धि सुलभ भइल बा…… उनुकर कहानी परम्परागत भोजपुरी कहानियन के इतिवृत, आदर्श आ औपचारिक विवरण से आमतौर पर मुक्त बा. यथार्थ जिनिगी के नीमन‍-बाउर अनुभवन से उपजल कहानी जहाँ एक ओर भाषा के संपूर्ण संस्कृति संस्कार से लैस बा, उहें एकनी में देश आ काल का मोताबिक उभरल चरित्र तीखा आ क्रिटिकल भइला का साथे बड़ा सहज ढंग से उभरल बाड़ें स.”


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भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” – 1

– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय

योगेश्वर नाम रखले रहस उनकर मास्टर चाचा जवन कलकाता में पढ़ावत रहस. स्कूल में भरती का समय राउत जी मास्टर साहेब ठीक (!) कइलन युगेश्वर. लेकिन गांव में सबका खातिर उ जिंदगी भर आ मरलो के बाद जुगेसरे रहस. शिवदत्त महतो के बेटा जुगेसर परसाद. बड़ा नाम कइलस लडिक़ा. लेकिन गांव के लोग के ओसे का भईल? ना आइल ना गइल. ना केहू से मिलल जुलल. हां, जबे अपना होनहार बिरवा के उपदेश देबे के होखे कायथ टोली में त एके गो नाम होखे – जुगेसर.

मोतिहारी से करीब दस कोस रहे शिवदत्त महतो के गांव. एक भाई कलकाता में मास्टरी करस आ आपन परिवार के साथे रहस. दोसर एकजाना भाई कबो स्कूल ना गइले. तनी बुरबक किसिम के बचपने से. सबेरे से सांझ तक खेते में पड़ल रहस. बुजुर्ग लोग कहेला बियाह भइल रहे उनकर लेकिन उनकर मेहरारू के बाल बच्चा ना होत रहे एही से शुरू में छोड़ देले रहे लोग. खैर उनका दूनो बेरा खाना भौजाई दे देस.

शिवदत्त ओह जमाना में गांव का प्राइमरी स्कूल से पांच क्लास तक पढ़ले रहन. खेती बाड़ी बढिय़ा से होखे आ कबो-कभार कलकाता वाला भाई कुछ रुपया पइसा भेज देस. गांव का हिसाब से शिवदत्त के परिवार खात-पियत इज्जतदार परिवार रहे.

गांव के आउर लडिक़न का लेखा जुगेसरो गांवे के प्राइमरी स्कूल में भरती हो गइले. जइसन सब लडिक़ा करस उहो एगो बोरा भा एगो झोला लेके स्कूल जाये लगले. बोरा बइठे खातिर आ झोला स्लेट पेंसिल राखे खातिर. लडिक़न में कवनो भेदभाव ना रहे. सभे बराबर जबले साल भर ना बीतल.

सालभर बाद जुगेसर सीधा दू में चल गइले काहे कि उनका हरफ लिखे आ बीस तक पहाड़ा याद हो गइल रहे. फेर त जुगेसर कहीं ना रुकले फस्ट त फस्ट. साथे-साथे बाप का नजर के हीरा बन गइले. हर बाप का ईच्छा होला बेटा उ सब करो जे उ ना कर पउले. शिवदत्त जुगेसर के खेती बाड़ी के काम में एकदम ना भेजस. बाकिर सब लडिक़ा स्कूल जाये का पहिले खेत खलिहान में कुछ ना कुछ कर स.

फस्ट डिविजन में मैट्रिक ओह गांव में जुगेसरे पास भइल रहन. गांव खातिर एहसे गर्व के बात का हो सके. लक्ष्मी प्रसाद खुद चल के शिवदत्त के दरवाजा पर अइले आ कहले – ‘बड़ा खुसी भइल शिवदत्त, बेटा के रिजल्ट सुन के. ओकरा के अब मास्टरी के ट्रेनिंग में दे द. मोतीहारी का ट्रेनिंग कालेज में हमार सरबेटा बाबू बा. हम चिट्ठी लिख दे तानी. मिल आव.’

सफलता अपने आप आदमी के मोलायम बना देला. शिवदत्त बहुते मोलायम आवाज में कहले – ‘हमनी के ईच्छा बा आगे पढ़ावे के. फर्स्ट भइल बा जुगेसर. कालेज में छात्रवृतिओ मिली.’

‘देखऽ. कालेज में पढ़ावल बड़ा खरचीला बा.’ मने-मने कुढक़े लक्ष्मीप्रसाद बोललन.

मोतीहारी कालेज में नाम लिखावे का समय मास्टर चाचा आ गइल रहस. उहे कहले – ‘भईया तू चिन्ता मत कर. अइसन तेज लडिक़ा खातिर जरूरत पड़ी त खेत बेचल जाई.’

खैर खेत ना बेचे के पड़ल. भगवान का कृपा से जुगेसर के हर क्लास में स्कालरशिप मिलल. मोतिहारी में घर भाड़ा लेके उ पढ़ाई करे लगलन. ओजा अपने हाथ से खाना बनावस. घर से चावल आटा ले आवस. कालेज के सब लडिक़ा उहे करस. हँ, समस्या होखे घर से बस स्टैंड आवे में. उनका गांव से बस स्टैंड आवे खातिर रास्ता बोल के खेत के मेड़ रहे आ बांध. गांव के बारे में जतना रोमांटिक बात होला उ जुगेसर का कुछ ना पता चलल. केमिस्ट्री में फर्स्ट क्लास आनर्स मिलल जुगेसर का जवन ओह समय में बिरले मिले. बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर से चिट्ठी आइल – एमएससी में प्रवेश लेले से छात्रबृत्ति मिली. लेकिन जुगेसर निर्णय लिहलन पटना विश्वविद्यालय में प्रवेश खातिर. अब आपने निर्णय लेवे खातिर स्वतंत्र रहस उ.

ठीक एही समय जुगेसर का जिन्दगी में परिवर्तन आइल. कब कइसे भइल उनका सोचे के समयो ना मिलल. हॉस्टल के वातावरण सही ना मिलल. हॉस्टल के वातावरण बहुते विचित्र रहे. पहिले त उनका बिहार विश्वविद्यालय लेके पटना वाला उनकर खिंचाई करस. फेर जब दिन बीतल लडिक़ा के पहुंच कहां तक बा. उनको बिस्वास होखे लागल ऊपर जाये खातिर बैकग्राउंडो ज्यादा जरूरी बा. ओकरा बाद जात-पांत वाला चर्चो खुलेआम होखे. एतना दिन जवना बिषय के उनका सोचे के समय ना रहे ऊहे सब महत्वपूर्ण होखे लागल.

कालेज प्रयोगशाला में एगो इंस्ट्रक्टर रहस बैकुण्ठ प्रसाद जी. उनकर स्वभाव जुगेसर का बड़ा पसंद आवत रहे. अपना काम से काम राखस. ओहदिन जुगेसर के मिजाज बड़ा उखड़ल-उखड़ल रहे. घरे से खबर आइल रहे माई के तबीयत खराब बा. जाये-आवे में कवनो बात ना रहे लेकिन माई के याद त आवते रहे. बैकुण्ठे प्रसाद बोललन – ‘का बात बा जुगेसर जी! आज राउर मूड कुछ ठीक नइखे लागत.’

-‘ना-ना. कवनो अइसन बात नइखे, सर! सब ठीक बा!’ जुगेसर के घबड़ाइल अस आवाज निकलल. बैकुण्ठ जी पास आ गइले. कहलन – ‘देखऽ भाई! तू इहां पढ़े-लिखे आइल बाड़. दोसरा बात पर मन दीहला पर बर्बादी छोड़ के कुछ ना मिली.’

फेर एक दिन जुगेसर हॉस्टल छोड़े के मन बना लिहलन. लेकिन ई त मोतिहारी ना रहे कि जहां तहां रहे के व्यवस्था हो जाई. जे कमरा भाड़ा मांगल जाए सुन के स्टूडेंट भाग जायं. आपन मन के बात एकदिन उ बैकुण्ठ जी के बतवलन. बैकुण्ठ जी कुछ चिन्ता कइलन. फेर कहलन – ‘आच्छा हम काल्ह बताइब.’

दोसरा दिन बैकुण्ठ जी जवन प्रस्ताव दिहलन जुगेसर का जइसे हाथ में लड्डू मिल गइल. बैकुण्ठ जी कहलन – ‘देखीं, हमार घर त छोटहन बा. लेकिन एगो कमरा हम किराया पर देले रनी ह. हमरा परिवार में उहो कमरा के जरूरत बा लेकिन रउरा रहब त हमनी के काम जइसे एतना दिन से चलत बा, आउरो एक डेढ़ साल निकल जाई.’

जुगेसर सकुचात-सकुचात पूछ भइलन-‘देखीं सर, हम रउआ के बड़ी इज्जत करीला. अपने के घर में रहला पर न जाने कवनो अइसन-वइसन हो जाई त हम खुद के कबो माफ ना करब.’

-‘अरे भाई. हमरो बाल धूप में सफेद नइखे भइल. आप पर हमार विश्वास ना रहीत त कबो स्टूडेंट के घर में राखे के सोचबो ना करतीं.’

-‘खाए पीए के कइसे इन्तजाम होखी?’

जुगेसन के प्रश्न स्वाभाविक रहे.

‘आगे वाला किरायेदार खाना बना लेत रलन ह. बाकी पास में एगो होटल बा उ महीन पर खिआवेला. ठीके-ठाक बा. बहुत अकेले रहे वाला लोग उहां भोजन करेला.’

अब आखिरी सवाल जुगेसर का गला में अटकल रहे. भाड़ा? बैकुण्ठ जी समझदार त रहले रहस. स्पष्ट कइलन – ‘पहिलका किरायेदार सौ रुपया देत रल. आप ओतने देब.’

शाम में दूनो जाना एके साथ निकलल लोग. कदमकुंआ में रहे बैकुण्ठ जी के घर लेकिन घूम फिर के कइगो गली से होके जाये के पड़े. रेल लाइन पासे में रहे. बैकुण्ठ जी के खटखटावला पर कवनो लडक़ी दरवाजा खोललस. बैकुण्ठ जी ऊपर के चाभी मंगवलन. दरवाजा से घुस के एगो छोट आंगन रहे. जब तक चाभी लेके उ लडक़ी फेरू आइल जुगेसर एक नजर चारों ओर दौड़वलन. पास में प्रकाश रहे. एगो कमरा पास में बाथरूम जइसन लागल. आंगन के तीनों ओर एक-एक गो कमरा रहे. एगो कमरा से लागल सीढ़ी रहे पातर अस.

बैकुण्ठ जी सीढ़ी से ऊपर गइलन आ उनका पीछे-पीछे जुगेसर. ऊपर खुलल छत रहे जवन चांद का प्रकाशे से साफ दीखत रहे. कमरा के आगे बरामदा जइसन थोड़ जगहो रहे जवन सीढ़ी से लागल रहे. छत के दोसरा तरफ बाथरूम रहे. बाकी छत पर कइक गो रस्सी तानल रहे.

देख के जुगेसर के मन खुश हो गइल. अगिला महीना के पहिला तारीख से आवे के ठीक हो गइल. पहिला तारीख के शनिचर रहे एहसे ठीक भइल एकतीसे से जइहन. होटलोवाला से बात हो गइल – दू बेरा खाना सुबह भा शाम में एक बेर नास्ता. दिन में भात-दाल सब्जी. सप्ताह में एक दिन आमिष. 200 रुपया कुल लागत. छुट्टी खातिर कम से कम एक दिन पहिले बतावे के पड़ी.

दू चार दिन जुगेसर का अच्छा ना लागल. कहां होस्टल के जिन्दगी आ कहां अकेले. लोग बाग बा लेकिन केहु बोले बतियाये वाला ना. हालांकि जुगेसर का कभी होस्टल ना सोहाइल रहे. नापसंदगीओ आदत हो जाला आदमी के, आ ई नापसंदगी के अभावो चुभेला.

कबो-कभार आवत जात में बैकुण्ठ जी के लडिक़ीयन वाला घर पर नजर पड़ जाव जुगेसर के. बडक़ी बहन हरदम किताब के साथे दीखे. कभी कुर्सी पर बइठल त कभी कमरा में टहलत. टहलत-टहलत ऊ किताब पर आंख गड़वले रहे.

ओह दिन एतवार रहे. जुगेसर बिछावन पर लेटल रहस खाना खाके. तबहिए बैकुण्ठ जी अइलन.

– ‘आ जाईं.’ जुगेसर कहलन आ बैकुण्ठ जी आके कुर्सी पर बइठलन.

-‘का हाल चाल बा?’ पुछलन उनसे.

-‘रउआ जइसन गार्जियन रहला पर कुछ खराब हो सक ता. सब ठीक बा.’ जुगेसर वातावरण के हल्का करे का लिहाज से कहलन.

-‘ ई त राउर बड़प्पन बा. हमरा के भगवान दीहलही का बाडऩ.’ उदास उदास अस जवाब दीहलन बैकुण्ठ बाबू. जुगेसर का अंदाज भइल बैकुण्ठ बाबू जरूर कवनो मतलब से आइल बाडऩ? उ बात बढ़वलन – ‘का कह तानी सर. रउरा जइसन कतना लोग का बा आज का दिन में. बढिय़ा नौकरी, पटना जइसन शहर में घर. हसत खेलत घर संसार.’

-‘अरे संसारे त झमेला बा. बाबुजी बाबा का दबाव में पढ़ाईए-लिखाई का समय में हमार शादी कर दिहनी. लडिक़ा के चक्कर में दू गो बेटी आ गइल लोग. अब एही चिन्ता में रहीला हमेशा.’

जुगेसर दिमाग पर जोर देबे लगलन. न जाने का कहे आइल बाडऩ बैकुण्ठ जी. उनकर त उमर भइले रहे. उनका शादी खातिर न जाने केतना प्रस्ताव आवत रहे मैट्रिक पास भइला के बादे से. थोड़ देर खातिर मन बहक गइल. वर्तमान में अइला पर महसूस कइलन बैकुण्ठ जी असली बात कहे वाला बाडऩ.

-‘देखीं ना अर्चना मेडिकल के तैयारी कर तारी. पढ़े लिखे में त अच्छा बा लेकिन प्रतियोगिता अइसन बा कि विश्वास नइखे होत. बूझात नइखे कि रउरा से कइसे कहीं?’

-‘बताईं ना. हमरा खातिर रउरा एतना करतानी. रउरा खातिर कुछऊ करे के अवसर हम भगवाने के आशीर्वाद समझब.’ जुगेसर के स्वर में बैकुण्ठ जी के मतलब जाने के आग्रह साफ झलकत रहे.

-‘बात बा कि अर्चना फिजिक्स में थोड़िका कमजोर बाड़ी. रउरा यदि थोड़ समय निकाल सकतीं….’ बैकुण्ठ जी रुक गइलन. जुगेसर का ई कहानी के प्लाट जइसन लागत रहे. तब बैकुण्ठ जी के अपना इहां लावे के असली मतलब रहे. अब दोसर पदक्षेप लडक़ी के पढ़ावे के. फिर…

बैकुण्ठ जी का उपस्थितिए में अर्चना के पढ़ावल आरम्भ कइलन जुगेसर. पहिलहीं दिन बुझा गइल.. ई लडक़ा के पढ़ाई छोड़ के दोसर कुछ नइखे माथा में.

जवन चीज समझावे के कोशिश करस जुगेसर जी ऊ फटाफट आंख मूद के मंत्र जइसन बुदबुदाव आ दोहरावे लागल. धीरे-धीरे जुगेसर समझ गइले एकरा खातिर तोता रटंते ठीक बा. कइएक दिन का बाद सब कुछ जइसे सामान्य हो गइल. बढिय़ा बिद्यार्थी शिक्षक के बहुते प्यारा हो जाला. अइसन जुगेसर के ऊ पहिला छात्र रहे. ओकरा प्रति उनकर स्नेह कुछ बेसिए हो गइल. लेकिन उमिरो के आपन तकाजा होला. जेठ के दिन में एगो घटा के छोट टुकड़ा जइसे कबो-कबो उनका दिमाग पर दीख जाव. का बैकुण्ठ जी के मन में अर्चना आ उनका के बीच कवनो प्रस्ताव त नइखे मने-मने. लडिक़ी त ठीके बिया. अर्चना जब आंख बंद कर के रटा लगावत रहे ऊ ओकरा ओर चोर निगाह से निहारस. एक दिन त कुछ गड़बड़ो हो गइल.

अर्चना के ऊ आणविक संरचना बतावत रहलन. थ्रीडाइमेंसनल कन्सेप्ट ऊ जवनो तरह बतावस अर्चना के ठीक स्पष्ट न होत रहे. जुगेसर जी घुमा फिरा के बतावस लेकिन अर्चना कॉपीए पर समझे के कोशिश करे. थोड़ खिसियाइल अस बोललन ऊ – ‘अरे भाई बार-बार कहतानी कॉपी के पन्ना टूडाइमेंसनल बा. आणविक संरचना समझे खातिर सोचे के पड़ी, कल्पना करे के पड़ी, आपने दिमाग में तस्वीर बनावे के पड़ी.’

अर्चना आंख मूंद के सोचे शुरू क दिहलस आ बुदबुदात रहे. जुगेसर ओकरा चेहरा पर नजर गड़वले रहस. एकदम स्तब्धता. तबहीं दरवाजा पर हंसल खिलखिलाइल सुनाइल. दूनो के आंख एके साथ खुलल.

अर्चना के बहिन पूजा खड़ा रहे. हंसी रोक के कहलस – ‘अरे दीदी पढ़ऽतारू कि योगासन करऽतारू ?’

दूनो जाना झेंप गइल लोग. पूजा एह साल मैट्रिक के परीक्षा देबे वाली बाड़ी. बडक़ी बहिन से बिल्कुल उल्टा स्वभाव. भीजल कपड़ा छत पर उहे पसारे आवे. रंगो साँवर रहे. ए घर में ओकरे हंसी सुनाव. बाकी अर्चना के मुस्कुराहट देखे खातिर त जुगेसर के आत्मा तरसत रहे.

समय कइसे बीत गइल. अर्चना के परीक्षा हो गइल. बतवलस बढिय़ा भइल बा. जुगेसरो के फस्ट इयर के परीक्षा होखे वाला रहे. अपना पढ़ाई पर ध्यान देबे लगलन. अर्चना के पढ़ावे से जवन रुटीन बनल रहे ऊ टूट गइल. हँ, एगो बात रहे घर के सभे उनका से आवत जात बतियावे लोग. अर्चनो कबो-कबो ‘प्रणाम सर’ कह जाव. एतने काफी रहे उनका खातिर. हां पूजा जबो छत पर आवे एक बार उनका कमरा में जरूर आवे आ हाल-चाल पूछे. ऊ मैट्रिक सेकेंड डिवीजन से पास होके कालेज में भर्ती हो गइल रहे. बैकुण्ठ जी के जान पहचान से साइंस में भर्ती हो गइल रहे.

प्रेक्टिकल के दूगो पेपर बाकी रहे. तबहिए खबर लागल कि घरे जुगेसर के माई बीमार बाड़ी. माई खातिर मन दुखित हो गइल लेकिन का करस सामने परीक्षा रहे. घरे से सम्पर्क कइलो संभव ना रहे. परीक्षा खतम भइला पर घरे जाये के प्लान बनवलन. जहिया जाए के रहस पता चलल मेडिकल के रिजल्ट निकले वाला बा. लेकिन रुके के कवनो सवाले ना रहे. सुबह-सुबह निकल के महेन्द्रू घाट अइलन. उहंई से मोतिहारी के टिकट मिल गइल. स्टीमर से गंगा पार होके गाड़ी मिल गइल जवन सीधे मुजफ्फरपुर जाव. मुजफ्फरपुर से ट्रेन बदल के मोतिहारी पहुंचलन त पांच बज गइल रहे. गांवे जाये बाला आखिरी बस खचाखच भरल रहे. ऊपर नीचे लोग भरल रहे. ऊपर चढक़े जइसे-तइसे जगह बनाके बइठ गइलन. बस छूटल साढ़े पांच बजे. अपना स्टैंड पर पहुंचते-पहुंचत अन्हार हो गइल. स्टैंड पर केहू कहीं ना रहे. ऊ धीरे-धीरे गांव के ओर वाला रास्ता पर चले लगले. करीब साल भर बाद घरे जात रहस.

संसार के चक्रो अपना गति से चलेला. केहू खातिर ओकरा क्षणभर ठहरे के फुर्सत नइखे. जुगेसर का जिन्दगी में पहिला अनुभव ओहि दिने भइल. घरे पहुंचला पर पता चलल माई एक दिन पहिलहीं गुजर गइल बाड़ी. उनुका ठकुआ मार दिहलसि. बोले के चहलन त आवाज ना निकलल. रोए के चहलन त आंख ना पसीजल. माई से बइठ के ऊ कबो भर मन बतिअवले ना रहस. माई के सब बात ओकरा आंख से प्रकट होखे. जब लडिक़ाई में ऊ लालटेन का सामने पढ़स त माई दूर बइठ के खाली निहारे उनका के जबले ऊ सुत ना जास ऊ बइठल रहे. माई के सूतल ऊ अपना होश में ना देखले रहस. ऊ माई नइखे. अब कबहूं माई के चेहरा ना देखे के मिली. कवनों फोटवो त नइखे.

सब हीत नात आवे लागल लोग. दू दिन बाद श्राद्ध रहे. मास्टरो चाचा पहुंच गइलन. जुगेसर से भेंट होते कहलन – ‘हँ भाई का सोचतार? कवनो कंपटिसन वगैरह दे तार कि ना?’

जुगेसर के पढ़ावे खातिर इहे चाचा जोर लगवले रहस. लेकिन जबसे उनकर आपन लडिक़ा सेकेंड डिवीजन से पास भइलन जुगेसर के प्रति उनकर भाव बदल गइल रहे. अब मिलले पर हाल-चाल होखे. आदमी के आपन आ गैर में अंतर अइसने समय पर होला. जुगेसर का अब ई वातावरण पसंद ना आवत रहे. बाबूजी सादा कपड़ा पहिनले रहस. घर में बिना हल्दी के खाना बने. हीत पाहुन जेही आइल रहे आपन-आपन हाल चाल कहे में लागल रहे. केहूके मरला में जे आइल बा ना बुझात रहे.

भगवान किहां का चलता आदमी सोच ना सके. एही अज्ञानता से शायद संसार चलता. ओह दिन बाबूजी आ चाचा साथे-साथे श्राद्ध के बाजार करे मोतिहारी गइल लोग. रात का पहिले लवटे के कवनो सवाले ना रहे. सभे आपन-आपन काम में लागल रहे. दुआर पर लालटेन जला के जुगेसर बइठल रहस. तबही दूगो लडिक़ा हांफत-हांफत अइलन स. दूनो बस स्टैंड मोड़ पर ओही लोग के सामान ले आवे गइल रहलन. सामान उतार के हड़बड़ाइले जे बतवले स ओकर मतलब रहे लवटे के समय बाबूजी आ चाचा सामान के साथे छत पर बइठ के आवत रल लोग. शहर से निकले का बेर कइसे बाबूजी से बिजुली के तार छुआ गइल बा. उनका के लेके चाचा अस्पताल गइल बाड़े. हाल ठीक नइखे बूझे में जुगेसर का कवनो समय ना लागल. लेकिन अबही का कइल जाव. कवनो बस त बा ना एह समय. सारा गांव में खबर फइल गइल. लोग जमा हो गइल. कइसे तार झूलत रहेला से लेके बिजली कइसे बनेला आ कहां जाला तक बात हो गइल. अस्पताल पहुंचलो जरूरी बा केहू ना कहे.

तबही जगमोहन आइल. ई जगमोहन जुगेसर का साथे सातवीं क्लास ले पढ़े जाव. ओकरा बाद आपन खेतबारी में काम करे लागल रहे. जात के त ब्राह्मण रहे लेकिन घर के अवस्था अच्छा ना रहे. कवनो पंडिताईओ ना रहे ओ सब का. आवत आवत कहलस – ‘का सोचऽतार जुगेसर ?’
-‘हमरा त कुछ नइखे बुझात जगमोहन भाई.’
-‘कह त मोतिहारी चलल जाव.’
-‘कइसे जाइल जाई?’
-‘एगो साइकिल त हमरा बा. एगो साइकिल जोगाड़ हो जाइ त दूनो आदमी चल चलती स.’
-‘हम केकरा से साइकिल मांगी?’
-‘देखऽ ना बैजनाथ मास्टर का बढिय़ा साइकिल बा.’
मास्टर लगहीं खड़ा रहस. आपन नाम सुनके सामने आ गइलन. पूछलन-‘का भइल हो जगमोहन?’
-‘का भइल, हमरा से पूछतानी. आपन साइकिल दीतीं त हमनी दूनो आदमी अभी मोतिहारी चल जइतीं.’
धर्मनाथ मास्टर कह भइलन – ‘अरे देख ना काल सबेरहीं स्कूल जाये के बा. डिपुटी सुपरिटेंडेंट आवे वाला बाड़े.’
जगनमोहन का जइसे मालुमे रहे मास्टर आपन साइकिल ना दीहन.
-‘त जाईं तैयारी करीं. इहां समय बर्बाद काहें कर तानीं.’
फेर जुगेसर का ओर देखके कहलन – ‘तू तइयार होख. हमनी एके गो साइकिल पर चलल जाई.’
विपत्ति जइसे आवेला ओकरा सहे के बेंवतो भगवान दे देले. पांच दिन बाद बाबूजी के लेके सब लोग लवटि आइल. उनका के सहारा लेके चलावे फिरावे के पड़े. अपना हाथ से खाए के कोशिश करे के पड़े. डॉक्टरो कहले रहे अइसने करे के.

माई के श्राद्ध बीत गइल जइसे तइसे. सब हीत पाहुन चल गइल लोग. चाचो चल गइले. जाए का बेर जुगेसर के लम्बा चौड़ा उपदेश दे गइले. साथ में इहो रहे अब कुछ नौकरीओ चाकरी के कोशिश करे के चाहीं. कालेज त अभी बंदे रहे लेकिन जुगेसर एतना दिन रहे के ना सोचले रहस. एह सब में गांव वाला चाचा चुपचाप रहस. जब सब लोग चल गइल जुगेसर पूछलन – ‘अब का होई चाचा?’

जिन्दगी में पहिला बार चाचा से बतियावत रहस जुगेसर. चाचा उनका पास आके फुसफुसइलन – ‘बनकटा से एक आदमी भउजी का श्राद्ध में आइल रल. कहत रल ओकर हाल ठीक नइखे. बाप त कबे मर गइले. एगो बेटा कहां भाग गइल बा. भाई भउजाई का देखी.’
चाचा रुक गइलन. जुगेसर सब जोड़ के बात समझ गइलन. जेकरा के सभे बुड़बक समझत रहल ओकरो मन में कतना बड़ तूफान दबल बा. फेर कहलन – ‘अच्छा चाचा, चाची के यदि बोलावल जाव त इहां आ जइहन ?’
-‘आवे के त पूरा मन बड़हीस लेकिन केहु का जाए के पड़ी तबे आई. बडक़ी मनबढ़ू ह शुरुए के.’
-‘के जाई लावे?’
-‘जाए के त हमरे चाहीं.’
दोसरे दिन चाचा गांव के एगो आदमी के साथ लेके चल गइलन. बाबूजी इशारा से पुछलन – ‘ऊ कहां गइले ह ?’
जुगेसर बतवले – ‘चाची के ले आवे.’
बाबूजी के चेहरा लाल हो गइल. ई बात जइसे उ कइसे हजम करस. जुगेसर धीरे-धीरे उनके ठंडा कइलन.

घरे के कारबार एक तरह खिसके लागल. एक महीना कइसे बीत गइल पता ना चलल. न जाने पटना के का हाल होई. अर्चना के त अब तक एडमीशन हो जाए के चाहीं. अब त कालेजो चालू हो गइल होई. गांव त जुगेसर का कबो अच्छा ना लागत रहे. अबकी त अच्छा लागे के कवनो कारन ना रहे. बाबूजी आपन काम धंधा करे लागल रहले. चले में तनिक तकलीफ होखे. एक दिन बाबूजी से कहलन – ‘अब हमरा जाए के पड़ी.’

बाबूजी खाली माथा हिला दिहलन. जुगेसर अब उनका खातिर अनजान बन गइल रहस. उनका से कवनो आशा त उनकर कबे टूट गइल रहे. शाम के सात बजे वाला स्टीमर से उतरलन महेन्द्रघाट जुगेसर. एगो रिक्सा क के डेरा पहुंचलन. कांध पर किताब के झोरा. माथा मुड़ल. विचित्र चेहरा दीखत रहे. बैकुण्ठजी के बंद दरवाजा पर दस्तक दिहलन. भीतर से आवाज आइल – ‘के ?’
-‘जुगेसर प्रसाद.’
-‘आव तानी.’
आवाज सुनके लागल अर्चना हई. लेकिन दरवाजा पूजा खोललस. चिरपरिचित उत्साह से चहकल – ‘प्रणाम सर.’ ओकर नजर ठहर गइल. जुगेसर के अइसन हालत के अंदाज उ ना कइले रहे.

जुगेसर भांप गइलन. कहलन -‘माई मर गइल ओही से माथ मुड़वले हईं. पापा कहां बानी?’
-‘पापा त दीदी के एडमीशन करावे दिल्ली गइल बानी. सोमवार के आइब. रउरा ऊपर चलीं. हम चाय ले आवतानी.’
धीरे-धीरे सीढ़ी चढक़े जुगेसर ऊपर अइलन. कमरा के चाभी खोलके खिडक़ी खोललन. बड़ा ही थकान लागत रहे. बिछावन खोलके लेट गइलन. दरवाजा खुलले रहे. ऊ थोड़ा देर आंख मुंदलन. तभी खुलल दरवाजा खट्-खट् के आवाज भइल. पूजा चाय लेके खड़ा रहे. एक झटका उठ बइठलन. पूजा के कुर्सी पर बइठे के इशारा कइलन. चाय बढ़ाके पूजा कुर्सी पर बइठ गइल.

जुगेसर चाय के घूंट लगाके बात करे के नीयते से पूछलन – ‘कब से गइल बानी प्रसाद सर.’
-‘सात दिन हो गइल. दीदी के एम्स में एडमीशन खातिर गइल बानी.’
-‘बहुते अच्छा खबर बा. आ तहार का भइल.’
-‘हमार वोमेन कॉलेज में एडमीशन हो गइल बा.’
-‘कवन विषय लेलू ह?’
-‘पापा ना मननी ह. साइंस में एडमीशन भइल ह. बायलोजी में.’
जुगेसर का समझे में देर ना लागल. एगो संतान के सफल भइला पर मां-बाप समझेलन सब बच्चा ओइसने होई. लेकिन अइसन आशा अधिकांश रेगिस्तान के पानी में बदल जाला.

आज पूजा बड़ी खुलके बतिआवत रहे. जुगेसरो बहुत दिन का बाद खुलके बात कइलन. चाय कब के खतम हो गइल रहे. पूजा प्लेट उठाके जाए खातिर खड़ा भइल. पुछलस – ‘सर, आज हम खाना बनावतानी. रउआ खाये बाहर मत जाइब.’
नियम मान के जुगेसर कहलन – ‘ना ना तू तकलीफ काहे उठइबू. हम बाहर खा आइब.’
-‘वाह रे. रउरा खइला से हमरा तकलीफ होई.’ पूजा औरताना अंदाज से कह भइलस.
जुगेसर का गंभीर चेहरा पर मुस्कुराहट के एगो झलक दीख गइल. एक बार कालेज खुलल त जुगेसर पूरा तरह व्यस्त हो गइलन. फस्ट ईयर में उनकर विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान रहे. ‘डू और डाई’ ए उनका खातिर स्लोगन हो गइल. कालेज में जबहीं क्लास ना रहे उ पुस्तकालय चल जास. बैकुण्ठो जी से ज्यादा कुछ बात ना हो सके. ओह दिन डेरा रात के दस बजे पहुंचलन. आवे में बरखा होत रहे. भींग गइल रहस. दरवाजा पूजे खोललस. ऊ सीधा ऊपर गइलन. देह पोंछ के पायजामा पहिनलन. सर्ट डलहीं जात रहस कि देखलन गेट पर चाय लिहले पूजा खड़ा बानी. ऊ शरमा गइलन.

-‘का जरूरत रल.’ बड़ा कष्ट से कह पवलन.
-‘रउवा का चीज के जरूरत बा सर हम समझ सकीला. लीं चाय पीहीं जल्दी-जल्दी. हम खाना ला रहल बानी.’
तबहीं जोर के छींक आइल जुगेसर का.
-‘समझ में हमरा आइल कि रउवा चाय के केतना जरूरत बा. अदरखो डलले बानी.’ पूजा मुड़ के चल गइली.
चाय पीयत-पीयत जुगेसर आज पहिला दफा पूजा का बारे में सोचलन. कतना खुलल बिया. अर्चना का ठीक उल्टा.

समय अपना तरह से बीते लागल. घरे से बाबूजी के चिट्ठी आइल जवना के सार रहे अब एह अवस्था में उनकर इच्छा बा एक बार बहू के मुंह देखे के. जुगेसर पढ़ के रख दीहलन. उनका मुंह से एतने निकलल-‘जाहिल कहीं के.’ एने फाइनल परीक्षा के तारीख फेर बढ़ गइल. ई खबर के उनका जिन्दगी में ज्यादा महत्व रहे. अब बड़ा मुश्किल लागत रहे समय निकालल. ई त बैकुण्ठ प्रसाद जी रहस कि पइसा के अभाव खटकत ना रहे. अभी ऊ त भाड़ा लेहल बंद कर देले रहस, एक बेरा खाइल भी उनके इहां हो जाव. एक दिन अखबार में एगो खबर निकलल रहे. समस्तीपुर के पास कवनो स्कूल में साइंस के शिक्षक के जरूरत रहे. जुगेसर अइसहीं एगो दरखास्त भेज दिहलन. हठात् पता चलल परीक्षा एक महीना के अन्दर करावे के ऊपरी आदेश आइल बा. यूनिवर्सिटी में अफरा-तफरी मच गइल. जुगेसर फिर से किताब कापी में मन लगा दीहलन.

पूजा के नाम त बीएसी में लिखा गइल लेकिन ओकरा मां-बाप के पूरा दबाव रहे मेडिकल कम्पीट करे के. ओकर हालत बेचारी जइसन हो गइल रहे. पहिले त पढ़तानी बोलके जुगेसर का सामने किताब पसार के घंटन बइठल रहे. अब त ऊहो बंद रहे. चाय- खाना पहुंचावे का नाम से उनका पास जाये के बहाना ढूंढत रहे. जुगेसर के पढ़ाई में एकाग्रचित्त देख के ओकर अंतर जुड़ाय जाव.

ओने जुगेसर के परीक्षा समाप्त भइल आ एने मेडिकल प्री-टेस्ट के तारीख निकलल. एही बहाने उनका पटना रहे के एक्सटेंशन मिल गइल. बैकुण्ठजी खुदे कहलन-‘जुगेसर जी, आप यदि ई एक महीना पूजा के देख दीतीं त का जाने कहीं भगवान के कृपा हो जाइत. जुगेसर का अच्छा तरह समझ रहे पूजा खातिर समय निकालल असंभव बा. तबहियो बैकुण्ठ जी के उपकार का बदला चुकावे के इच्छा से राजी हो गइलन.

एक तरह से रिलैक्स अनुभव करत रहस जुगेसर. तबहीं एगो लिफाफा आइल उनका नाम से. भेजे वाला के पता के जगह पर एगो हल्का सा मुहर रहे. खोललन. अंदर से एगो चिट्ठी निकलल. प्रेषक मूलचंद जैन उच्च विद्यालय, समस्तीपुर. स्कूल उनका के पन्द्रह दिन के अन्दर ज्वाइन करे के अनुरोध कइले रहे. मासिक वेतन 400 रुपया. जिन्दगी में पहिला नौकरी के पत्र पाके अलग तरह के अनुभव होला. पूछे-पाछे वाला त हिसाब रहले ना रहे. ऊ मने-मने जाये के तैयार हो गइले. अभी रिजल्ट में भी देर रहे. पूजा के पढ़ावे के जवन बाधा रहे ओकरो समाधान हो गइल. ओकर परीक्षा भी एक महीना के अन्दर ही हो जाये वाला रहे.

जाये के समय जवन सीन भइल ओकर कल्पना जुगेसर का ना रहे. पहिला बार बैकुण्ठ जी के पत्नी उनका सामने अइली. साथ में बैकुण्ठ जी आ पीछे-पीछे पूजा. सबकर दिल भरल रहे आ आंख डबडबाइल. केहू कुछ बोल ना पावत रहे. हिम्मत कर के जुगेसर ही कहलन – ‘अरे हम त एगो किरायेदार रनी ह, का भइल रउरा सब के?’
नदी के बांध जइसे टूट गइल. बैकुण्ठ जी त सिसके लगलन. पूजा भाग के नीचे चल गइल. बैकुण्ठ जी के स्त्री कइसहूं कहली-‘हँ बाबू, इहे सुने के रल. तू हमनी के मकान मालिके समझल एतना दिन.’
जुगेसर का बुझाइल का गलती बोल गइलन. जवन मन माई का मरला में ना पसीजल रहे एके बार सब बांध टूट गइल. ऊ आवेश में उनकर जोड़ल हाथ पकड़ लीहलन – ‘ना चाची. हम कइसे भुला पाइब रउवा लोग के. आ हम हमेशा खातिर जात थोड़े बानी. रउरा नाहियों चाहब त रउरा सब के छोड़ के जीये के सोचिओ ना सकीला.’
धीरे-धीरे वातावरण कुछ हल्का भइल. बैकुण्ठ जी संभल गइल रहस. कहलन – ‘अच्छा चलल जाव. स्टीमर के समय भइल जात बा.’
जुगेसर आपन छोट-छोट सामान एगो बैग में रखले रहस. ओकरा के उठावे खातिर बैकुण्ठ जी झुकलन. जुगेसर भाग के बैग लीहलन. उनका स्त्री के पैर छूवे खातिर बढ़लन. खड़ा होके कहलन – ‘हम कुछ दिन में आवते बानी.’
बैकुण्ठजी आगे-आगे, पीछे उनकर स्त्री, बीच में जुगेसर. नीचे उतर के जुगेसर कहलन – ‘अरे एक बार हम अपना स्टूडेंट क त डंटले जाईं.’
बैकुण्ठ जी पूजा के कमरा के ओर मुखातिब भइले. जुगेसर अन्दर गइले. पूजा तकिया में मुंह डाल के औंधे मुंह लेटल रहे. जुगेसर आवाज दिहलन-‘पूजा.’
ऊ फटाक से उठ के खड़ा भइल. आंख लाल-लाल भइल रहे. जुगेसर आगे बढक़े ओकरा सर पे हाथ रखलन – ‘ठीक से परीक्षा दीह. हम जल्दिए लवटब.’
फिर मुड़ के घर से बाहर निकललन. बैकुण्ठजी से बिदा लेवे के चहलन लेकिन ऊ रिक्सा पर बइठा के ही बिदा कइलन.

समस्तीपुर स्कूल के मैनेजमेंट अच्छा रहे. मुश्किल इ रहे कि साइंस टीचर ज्चादा दिन टिकस ना. जुगेसरो के देख के बुझा गइल ईहो ज्यादा दिन रुकिहन ना. लेकिन मजबूरी. अच्छा लडिक़ा साइंसे पढ़े चाहस. स्कूले परिसर में रहे के व्यवस्था हो गइल. स्कूल के चपरासी रहे खानो बना देव.

जुगेसर खातिर ई नया माहौल रहे. शुरू में थोड़ा झिझक लागल लेकिन लडिक़न के मनोविज्ञान समझे में उनका देरी ना लागल. आवत-आवत दूगो चिट्ठी लिखलन – एगो बैकुण्ठ प्रसाद जी के, दोसर बाबूजी के. बाबूजी के जवाब आइल – ‘दिल बड़ा खुश भइल तहरा नौकरी के खबर पा के. एक बार आव. हमार त भगवान के जइसन इच्छा बा चल रहल बा.’
एक दिन ऊ क्लास में पढ़ावत रहस कि चपरासी आके बतवल केहू उनके से मिले आइल बा.
उनका से ईहां के मिले आयी? सोचत-सोचत ऑफिस में अइलन.
एगो आदमी कुर्सी पर बइठल रहे. जुगेसर हाथ जोड़लन – ‘हम पहचननी ना आपके.’
-‘अरे बबुआ, तू कइसे पहचनब हमके. हम तहरा मामा के सम्बंधी हईं. तहार ममो आवत रलेह लेकिन हम सोचनी ह पहिले देख त आईं तहरा के.’
-‘का बात बा?’ जुगेसर सच में कुछ समझ ना पवलन. पास में ही हिन्दी टीचर तिवारी जी रहस. पान खाइल मुंह उठाके कहलन – ‘जोगेश्वर बाबू शादी-वादी करियेगा कि नहीं..?’
तिवारी जी का थूके खातिर बाहर जाये के पड़ल. आके कहलन – ‘अरे भाई. शादी करिये. हम लोगों को बारात में ले चलना नहीं भूलिएगा.’
तिवारी जी समय के नजाकत समझ के बाहर चल गइलन. जुगेसर कुछ बोलस एकरा पहिले ऊ सज्जन कहे लगलन – ‘बबुआ देख. तहरा पास सैकड़ों प्रस्ताव आई लेकिन हमरा जइसन बड़ा मुश्किल बा. के बा हमरा टक्कर के जिला में. दुआर पर दूगो भैंस बा. अभी हाले में टैक्टरो लेनी ह. तहार एगो साला बीएसएफ में बा. मुखिया के चुनाव त समझ ऊ पंडितवा के पालटिक्स से हार गइनी हं. तू चनपटिया स्टेशन पर केहू से कह रामसुन्दर प्रसाद कीहां जाये के बा. बीसो आदमी संगे लाग जइहन…’

का-का कहलन जुगेसर का कुछ समझ में ना आइल. उनका चुप होखे के इन्तजार में जुगेसर के धैर्य टूट गइल. कहलन – ‘अच्छा ठीक बा. लेकिन अबही हमरा शादी के कवनो प्लान नइखे. अबही तक हमार खुद ठीक नइखे.’
-‘तू आपन हमरा पर छोड़ द. तहार एम.ए. के रिजल्ट निकल जाये द. अपने जात के एगो कालेज खुल रहल बा. हम बात कइनी हं एमएलए साहेब से. अपने जात हउवन. पचास हजार लीहन प्रोफेसर बन जइब. ई साला स्कूल के मास्टरी कवनो चीज बा?’
अब जुगेसर का एगो रास्ता निकललन पिंड छोड़ावे के. हाथ जोडक़े विदा करे के मुद्रा में कहलन – ऊहे त हमहूं सोच तानी. एमएससी के रिजल्ट आ जाव त सोचल जाई ई सब. अभी त बडक़ा बेल घूरे में बा.’
ऊ सज्जन आपन जीत निश्चित समझ के चले के तइयार भइलन. बरदान देवे के मुद्रा में कहलन – ‘तू निश्चिन्त रह. अरे हीरा के केहू कोइला से ढक सकेला. आ एक बार सम्बंध होखे द ना. समझब ससुराल का होला.’
उनका गइला पर जुगेसर धम्म से बइठलन. हाथ सर पर चल गइल.
जब चपरासी गिलास में पानी लाके के दिहलस, पानी पीके मुंह से आवाज निकलल – ‘बाप रे.’
एक दिन इच्छा भइल त समस्तीपुर कालेज में गइलन जुगेसर. केमिस्ट्री विभाग में पता करे कि के के लेक्चरार बा. ऊहां गइला पर पूछे के ना पड़ल. उचक के देखलन त विनय पांडेय जी रहस. जब ऊ एमएससी में भर्ती भइलन त ऊ फाइनल में रहस. हास्टले में परिचय भइल रहे. बड़ा ही सीधा-सादा रहस. सबका मालूम रहे जातिवाद के कारण उनका फर्स्ट क्लास फर्स्ट ना मिलल रहे.


(बाकी फेर अगिला कड़ी में)


आपन बात


भोजपुरी में लिखे खातिर हमार आपन स्वार्थ निहित बा. हमरा दूसरा कवनो भाषा में लिखे में हमेशा डर लागल रहेला. आ भोजपुरी माई के गोद जइसन बा. हम जानतानी कि भले माई से दूर बानी, बहुत दूर, लेकिन उनके पास जाइब त ऊ हमरा के डटीहन ना, हमार गलती माफ कर दीहन.

– हरेन्द्र कुमार

भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” के भूमिका

आदर्श युवक के सम्मोहक प्रेम के सूत्र में बंधल सामाजिक ताना बाना

‘जुगेसर’ उपन्यास एगो अइसन व्यापक फलक वाला आधुनिक उपन्यास ह जवना में गांव अउर शहर दूनों के सामाजिक परिस्थिति अउर चुनौती के वस्तुपरक ढंग से बहुत व्यापक अर्थ में चित्रण बा. कथानक के पात्र खाली व्यक्ति ना हउअन बलुक ऊ मौजूदा समाज के एगो अइसन व्यक्ति बनके आइल बाडऩ जवना में उनका निजीपन के अतिक्रमण भइल बा आ ऊ समाज के लाखोंलाख लोगन के प्रतिनिधित्व करे में समर्थ बाडऩ. उपन्यास के नायक जुगेसर कउनो साधारण युवक ना हउअन बलुक ऊ एगो अइसन जोशीला, आदर्शवादी अऊर निष्कपट व्यक्ति हउअन जवन समाज में व्याप्त तमाम समस्या से जूझऽता अउर अपना ढंग से प्रतिक्रिया देऽता अउर एही समाज में अपने जीए के एगो अलग रास्ता बनावऽता. ई रास्ता संघर्ष के नइखे ऊ सहअस्तित्व के सिद्धांत पर चलऽता. दोसरा के बदले के त बहुत प्रयास नइखन करत लेकिन अपना आचरण के शुचिता के आखिर ले बरकरार राखे में सफल बाड़े. जुगेसर के जीवन अपने आपमें एगो आदर्श युवक के जीवन बा अऊर चुपचाप एगो मॉडल देश-दुनिया के सामने रखऽता कि कइसे विपरीत परिस्थितिओ में बिना समझौता कइले व्यक्ति सादगी अउर बिना भ्रष्टाचार के कवनो रास्ता अपनवले आपन जीवन शुचिता से गुजार सकऽता.

जुगेसर साइंस के मेधावी छात्र रहे अउर बिना कवनो जोड़ तोड़ के अपना व्यक्तित्व के खूबी के साथो तरक्की करत चलल जा ता. पद प्रतिष्ठा में जुगेसर से सफलो व्यक्ति ओकरा व्यक्तित्व का आगे नत हो जाता अउर पाठक के निगाह में बौनो. सफल व्यक्ति हमेशा समाज के आदर्श व्यक्ति ना होखे ई बात पूरा शिद्दत से हरेन्द्र कुमार जी अपना ए उपन्यास में उठवले बानी आ ईहो एगा कारण बा जवन एह उपन्यास के सार्थकता प्रदान कर ता.

उपन्यास में खाली सामाजिक ठोस यर्थाथे नइखे. एकर प्रमुख विशेषता बा एकर रोचकता. हृदयस्पर्शी एगो प्रेम कथा के सूत्र से ई उपन्यास बंधल बा जवन जुगेसर के दाम्पत्यो जीवन में बरकरार रह ता, जवन ना सिर्फ युवा पाठकन के बलुक पोढ़ो पाठकन के समान रूप से आकृष्ट करी. स्त्री के व्यक्तित्व के औदात्यपूर्ण चित्रणो एह उपन्यास के अर्थवान बनावे में समर्थ भइल बा. जुगेसर के प्रेमिका पूजा, जवना से बाद में जुगेसर अपना परिवार के अनिच्छा के बावजूद शहर में विवाह कर ले ता, एगो अइसन आदर्श नारी के रूप में उभर के आवऽतिया जे भारतीय समाज के पारिवारिक ताना-बाना के मजबूत कऽ के आदर्श प्रस्तुत करऽतिया. प्रेम परिवार से अलगाव करावे ला के प्रचलित धारणा के विपरीत मौका पड़ला पर प्रेम के परिधि केतना विस्तृत हो सकेला पूजा के चरित्र ओकर उदाहरण बा. उपन्यास में प्रेम के द्वंद्व, अंतरजातीय विवाह के समस्या, शिक्षा जगत आ राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार आदि समस्या के बखूबी उठावल गइल बा जवन उपन्यास के उपन्यासे नइखे रहे देत बल्कि समाज के मौजूदा स्वरूप पर सार्थक टिप्पणी बन जाता. उपन्यास में प्रेम क कएकगो दृश्य एतना जीवन्त बा कि पढ़त समय पाठक के सामने दृश्य उपस्थित करे में समर्थ बा. हरेन्द्र जी के लेखन शैली एतना सादगी पूर्ण अउर भाषा एतना सरल-सहज आ प्रवाहपूर्ण बा कि कहीं से साहित्यिकता के आतंक नइखे होत बल्कि रोचकता, सरसता आ आगे का भइल जाने के जिज्ञासा अन्त तक बनल रह ता. अउर अन्त में उपन्यास पढ़ के आंख छलाछला जाय तो एके उपन्यास दोष न मानल जाव, मन भारी हो जाई लेकिन उपन्यास के कथानक अउर चरित पाठक के मन में हमेशा-हमेशा खातिर आपन जगह त बनाइए ली, ई पूरा विश्वास बा.

– डॉ.अभिज्ञात


आपन बात

हरेन्द्र कुमार पाण्डेय अँजोरिया पाठकन खातिर अपरिचित ना हईं. इहाँ के लिखल उपन्यास सुष्मिता सान्याल के डायरी बहुत पहिले से अँजोरिया पर मौजूद बा. दुख एक बात के बा कि पीडीएफ फार्मेट में होखला आ बहुते बड़हन फाइल होखला का चलते बहुते कम लोग एकरा के पढ़ले बा. सौभाग्य से डा॰ हरेन्द्र कुमार अपना नया उपन्यास “जुगेसर” के साफ्ट कॉपी भेज दिहले बानी. एह उपन्यास के प्रकाशन धारावाहिक रूप में कोलकाता के लोकप्रिय हिन्दी दैनिक “सन्मार्ग” में हो चुकल बा आ बाद में पुस्तकाकारो में प्रकाशित भइल बा सन्मार्ग का तरफ से. पेश बा उहे उपन्यास अँजोरिया के पाठकन खातिर.

एह तरीका से प्रकाशित होखला से भोजपुरी साहित्य पूरा दुनिया के भोजपुरी पाठक पाठिकन के सहज रूप से मिल जाई आ भोजपुरी खातिर ई सबले बढ़िया तरीका लागेला हमरा.

एहिजा इहो बता दिहल जरूरी लागल कि बता दीं कि उपन्यास के अँजोरिया शैली में डाले का चलते कुछ कुछ बदलाव कइल गइल बा. एह धृष्टता खातिर हम माफी माँगब बाकिर हमरा ई जरूरी लागल एह से हम कइले बानी. आशा बा कि लेखक समीक्षक के एह पर ढेर आपत्ति ना होखी.

पूरा उपन्यास बहुते जल्दिए पूरा प्रकाशित कर दिहल जाई काहे कि ई भोजपुरी में लिखल गइल बा आ अनुवाद करे के परेशानी नइखे एकरा साथे जइसे कि “लोक कवि अब गाते नहीं” का साथे भइल बा आ अबही ले ओकर पूरा अनुवाद प्रकाशित नइखे हो सकल.

ओम,
संपादक, अँजोरिया.कॉम

लोक कवि अब गाते नहीं – १७

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

सोरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे आपन दलाली वसूले का फेर में गणेश तिवारी अपने पट्टीदार फौजी तिवारी का खिलाफ पोलदना के हथियार बनवलन. बाकिर जब बाद में पोलदनो पलटि गइल त ओकर समूल नाश करवा दिहलन फौजी तिवारी के बेटा से. एह सब का बावजूद फौजी तिवारी के बेटा उनकर असलियत जान लिहले रहुवे आ एहसे उनुका के अपना लगे सटे ना दिहलस. ओहिजा से गणेश तिवारी आपन पोंछि सटकवले लवटि आइल रहले. अब आगे पढ़ीं…


त ई आ अइसनके तमाम कथा कहानी के केंद्र में रहे वाला इहे गणेश तिवारी अब भुल्लन तिवारी के नतिनी का शादी में रोड़ा बने के भूमिका बान्हत रहले. कारण दू गो रहे. पहिला त ई कि भुल्लन तिवारी के नतिनी का शादी ख़ातिर पट्टीदारी के लोगन में से चुनल “संभ्रांत” लोग का सूची में लोक कवि उनुकर नाम काहे ना रखले. आ नाम राखल त फरका भेंटो कइल जरूरी ना समुझले. तब जब कि ऊ उनुकर “चेला” हवे. दोसरका कारण ई रहे कि उनुकर जेब एह शादी में कइसे किनारे रह गइल ? त एह तरह अहम आ पइसा दुनु के भूख उनुकर तुष्ट ना होत रहुवे. से ऊ चैन से कइसे बइठल रहतन भला ? ख़ास कर तब आ जब लड़िकी के ख़ानदान ऐबी होखो. बाप एड्स से मरल रहुवे आ आजा जेल में रहल ! तबहियो उनुका के पूछल ना गइल. त का उनुकर “प्रासंगिकता” गांव जवार में ख़तरा में पड़ गइल रहे ? का होखी उनुका विलेज बैरिस्टरी के ? का होखी उनुकर बियहकटवा वाला कलाकारी के ?

वइसे त हर गांव, हर जवार के हवा में शादी काटे वाला बियहकटवा बिचरते रहेले. कवनो नया रूप में, कवनो पुरान रूप में त कवनो बहुरुपिया रूप में. लेकिन एह सब कुछ का बावजूद गणेश तिवारी के कवनो सानी ना रहे. जवना सफाई, जवना सलीका, जवना सादगी से ऊ बियाह काटसु ओह पर नीमन-निमन लगो न्यौछावर हो जायं. लड़की होखो भा लड़िका सबकर ऐब ऊ एह चतुराई से उघाड़सु आ लगभग तारीफ के पुल बान्हत कि लोग लाजवाब हो जाव. अउर उनुकर “काम” अनायासे हो जाव. अब कि जइसे कवनो लड़िकी के मसला होखे त ऊ बतावसु, “बहुते सुंदर, बहुते सुशील. पढ़े लिखे में अव्वल. हर काम में “निपुण”. अइसन सुशील लड़िकी रउरा हजार वाट क बल्ब बार के खोजीं तबो ना मिली. आ सुंदर अतना कि बाप रे बाप पांच छ गो ल लौंडा पगला चुकल बाड़े.”
“का मतलब?”
“अरे, दू ठो तो अबहिये मेंटल अस्पताल से वापिस आइल बाड़े”
“इ काहें?”
“अरे उनहन बेचारन के का दोष. ऊ लड़िकी हईये बिया एतना सुंदर.” ऊ बतावसु, “बड़े-बड़े विश्वामित्र पगला जायँ.”
“ओकरा सुंदरता से इनहन के पगलइला के का मतलब ?
“ए भाई, चार दिन आप से बतियाए आ पँचवा दिने दोसरा से बोले-बतियाए लागे, फेर तिसरा, चउथा से. त बकिया त पगलइबे नू करीहें !”
“ई का कहत बानीं आप?” पूछे वाला के इशारा होखे कि, “आवारा हियऽ का?”
“बाकी लड़िकी गुण के खान हियऽ.” गणेश तिवारी अगिला के सवाल अउर इशारा जानतबूझत पी जासु आ तारीफ के पुल बान्हत जासु. उनुकर काम हो जाव.
कहीं-कहीं ऊ लड़िकी के “हाई हील” के तारीफ कर बइठसु बाकिर इशारा साफ होखे कि नाटी हियऽ. त कहीं ऊ लड़िकी के मेकअप कला के तारीफ करत इशारा करसु कि लड़िकी सांवर हवे. बात अउर बढ़ावे के होखे त ऊ डाक्टर, चमइन, दाई, नर्स वगैरहो शब्द हवा में बेवजह उछाल देसु कवनो ना कवनो हवाले आ इशारा एबार्सन क होखे. भैंगी आंख, टेढ़ी चाल, मगरूर, घुंईस, गोहुवन जइसन पुरनको टोटका ऊ सुरती ठोंकते खात आजमा जासु. उनका युक्तियन आ उक्तियन क कवनो एक चौहद्दी, कवनो एक फ्रेम, कवनो एक स्टाइल ना होखत रहे. ऊ त रोजे नया होत रहे. महतारी के झगड़ालू होखल, मामा के गुंडा होखल, बाप के शराबी होखल, भाई के लुक्कड़ भा लखैरा होखल वगैरहो ऊ “अनजानते” सुरती थूकत-खांसत परोस देसु. लेकिन साथ-साथ इहो संपुट जोड़त जासु कि, “लेकिन लड़िकी हियऽ गुण के खान.” फेर अति सुशील, अति सुंदर समेत हर काम में निपुण, पढ़ाई-लिखाई में अव्वल, गृह कार्य में दक्ष वगैरह.
इहे-इहे आ अइसने-अइसन तरकीब ऊ लड़िकनो पर आजमावसु. “बहुते होनहार, बहुते वीर” कहत ओकरा “संगत” के बखान बघार जासु आ काम हो जाव.

एक बेर त गजबे हो गइल. एगो लड़िका के बाप बड़ा जतन से ओह दिन बेटा के तिलक के दिन निकलववलन जवना दिने का ओह दिन का आगहू-पाछा गांव में गणेश तिवारी के मौजुदगी के अनेसा ना रहल. बाकिर ना जाने कहाँ से ऐन तिलक चढ़े से कुछ समय पहिले ऊ गांव में ना सिरिफ प्रगट हो गइलें बलुक ओकरा घरे हाजिरो हो गइले. सिरिफ हाजिरे ना भइलन. जाकेट से हाथ निकालत गांधी टोपी ठीक करत-पहिनत तिलक चढ़ावे आइल तिलकहरुवने का बीचे जा के बइठ गइलन. उनुका ओहिजा बइठते घर भर के लोग के हाथ गोड़ फूल गइल. दिल धकधकाए लागल. लोगो तिलकहरुवन के आवभगत छोड़ के गणेश तिवारी के आवभगत शुरू कर दिहल. लड़िका के बाप आ बड़का भाई गणेश तिवारी क आजू-बाजू आपन ड्यूटी लगा लिहले. जेहसे उनुका सम्मान में कवनो कमी ना आवे आ दोसरे, उनुका मुंह से कहीं लड़िका के तारीफ मत शुरू हो जाव. गणेश तिवारी के नाश्ता अबहिं चलत रहल आ ऊ ठीक वइसहीं काबू में रहलें जइसे अख़बारन में दंगा वगैरह का बाद ख़बरन के मथैला छपेला “स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में.” त “तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में” वाला हालाते में लड़िका के बाप के एगो उपाय सूझल कि काहे ना बेटा के बोलवा के गणेश तिवारी के गोड़ छूआ के इनकर आशीर्वाद दिआ दिहल जाव. जेहसे गणेश तिवारी के अहं तुष्ट हो जाव आ तिलक बिआह बिना विघ्न-बाधा संपन्न हो जाव. आ ऊ इहे कइलन. तेजी से घर में गइले आ ओही फुर्ती से बेटा के लिहले चेहरा पर अधिके उत्साह आ मुसकान टांकत गणेश तिवारी का लगे ले गइलन जे बीच तिलकहरु स्पेशल नाश्ता पर जुटल रहले. लड़िका के देखते गणेश तिवारी धोती के एगो कोर उठवले आ मुंह पोंछत लड़िका के बापो से बेसी मुसकान आ उत्साह अपना चेहरा पर टांक लिहले आ आंख के कैमरा “क्लोज शाट” में लड़िके पर टिका दिहले. बाप के इशारा पर लड़िका झुकल आ दनुबु हाथे गणेश तिवारी के दुनु गोड़ दू दू बेर एके लाइन में छुवत चरण-स्पर्श करते रहल कि गणेश तिवारी आशीर्वादन के झड़ी लगा दिहले. सगरी विशेषण, सगरी आशीर्वाद देत आखिर में ऊ आपन ब्रह्ममास्त्र फेंक दिहलन, “जियऽ बेटा! पढ़ाई लिखाई में त अव्वल रहबे कइलऽ, नौकरीओ तोहरा अव्वल मिल गइल, अब भगवान के आशीर्वाद से तोहार बिआहो होखत बा. बस भगवान क कृपा से तोहर मिरिगियो ठीक हो जाव त का कहे के!” ऊ कहलन, “चलऽ हमार पूरा-पूरा आशीर्वाद बा !” कहिके ऊ लड़िका के पीठ थपथपवले. तिलकहरुअन का ओर मुसुकात मुखातिब भइलन आ लगभग वीर रस में बोललन, “हमरा गांव, हमरा कुल के शान हउवन ई.” ऊ आगे जोड़लन, “रतन हवे रतन. आप लोग बहुते खुशनसीब हईं जे अइसन योग्य आ होनहार लड़िका के आपन दामाद चुननी.” कहिके ऊ उठ खड़ा होत कहले, “लमहर यात्रा से लवटल बानी. थाकल बानी. आराम कइल जरूरी बा. माफ करब, चलत बानी. आज्ञा दीं.” कहिके दुनु हाथ ऊ जोड़लन आ ओहिजा से चल दिहलन.
गणेश तिवारी त ओहिजा से चल दिहले बाकिर तिलकहरुअन का आंखिन आ मन में सवालन के सागर छोड़ गइले. पहिले त आंखिये-आंखि में ई सवाल सुनुगल. फेर जल्दिये जबान पर भदके लागल इ सवाल कि, “लड़िका के मिर्गी आवेला ?” कि, “लड़िका त मिर्गी क रोगी ह?” कि, “मिर्गी के रोगी लड़िका से शादी कइसे हो सकेला?” कि, “लड़िकी के जिनिगी खराब करे के बा का?” आ आखिरकार एह सवालन के आग लहकिए गइल. लड़िका के बाप, भाई, नात-रिश्तेदार आ गांव के लोगो सफाई देत रह गइल, कसम खात रह गइल कि, “लड़िका के मिर्गी ना आवे,” कि “लड़िका के मिर्गी आइत त नौकरी कइसे मिलीत ?” कि “अगर शक होइए गइल बा त डाक्टर से जँचवा लीं!” आदि-आदि. बाकिर एह सफाइयन आ किरियन के असर तिलकहरुअन पर जरिको ना पड़ल. आ ऊ लोग जवन कहाला थरिया-परात, फल-मिठाई, कपड़ा-लत्ता, पइसा वगैरह लिहले ओहिजा से उठ खड़ा भइले. फेर बिना तिलक चढ़वलही चल गइलन. ई कहत कि, “लड़िकी के जिनिगी बरबाद होखे से बाच गइल.” साथही गणेश तिवारी ओरि इंगितो करत कि, “भला होखो ओह शरीफ आदमी के जे समय रहिते आँख खोल दिहलसि. नाहीं त हमनी का त फँसिये गइल रहीं सँ. लड़िकी के जिनिगी बरबाद हो जाइत!”

जइसे अनायासे आशीर्वाद दे के गणेश तिवारी एह लड़िका के निपटवले रहले वइसही भुल्लन तिवारी के नतिनी का शादीओ में ऊ अनायासे भाव में सायास निपटावे ख़ातिर जुट गइल रहले. भुल्लन तिवारी के नातिन के कम लोक कवि के जेब के बहाने अपना गांठ के चिंता उनुका के बेसी तेज कइले रहुवे. बाति वइसहीं बिगड़ल रहुवे, गणेश तिवारी के तेजी आग में घीव के काम कइलसि. आखिरकार बात लोक कवि ले चहुँपल. पहुंचवलसि भुल्लन तिवारी के बेटा के साला लखनऊ में आ कहलसि कि, “बहिन के भाग में अभागे लिखल रहे लागत बा भगिनी का भाग में एहुसे बड़ अभाग लिखल बा.”
“घबराईं मत.” लोक कवि उनुका के तोस दिहलन. कहलन कि, “सब ठीक हो जाई.”
“कइसे ठीक हो जाई ?” साला बोलल, “जब गणेश तिवारी के जिन्न ओकरा बिआह का पाछा लाग गइल बा. जहँवे जाईं आपसे पहिले गणेश तिवारी चोखा चटनी लगा के सब मामिला पहिलही बिगाड़ चुकल रहेलें !”
“देखीं अब हम का कहीं, आपो भी ब्राह्मण हईं. हमरा ला देवता तुल्य हईं बाकिर बुरा मत मानब.” लोक कवि बोले, “गणेशो तिवारी ब्राह्मण हउवें. हमार आदरणीय हउवें. बाकिर हउवन कुत्ता. कुत्तो से बदतर!” लोक कवि जोड़लन, “कुत्ता के इलाज हम जानीलें. दू चार हजार मुँह पर मार देब त ई गुर्राए, भूंके वाला कुत्ता दुम हिलावे लागी.”
“लेकिन कब? जब सबहर जवार जान जाई तब? जब सब लोग थू-थू करे लागी तब?”
“नाहीं जल्दिए.” लोक कवि बोलले, “अब इहै गणेश तिवारिए आप के भगिनी के तारीफ करी.”
“तारीफ त करते बा.” साला बोलल, “तारीफे कर के त ऊ काम बिगाड़त बा. कि लड़की सुंदर हवे, सुशील हवे. बाकिर बाप अघोड़ी रहल. एड्स से मर गइल आ आजा खूनी ह. जेल में बंद बा.”
“त ई बतिया कइसे छुपा लेब आप आ हम?”
“नाहीं बाति एहीं ले थोड़े बा.” ऊ बोलल, “गणेश तिवारी प्रचारित करत बाड़े कि भुल्लन तिवारी के पूरा परिवार के एड्स हो गइल बा. साथ ही भगिनियो के नाम ऊ नत्थी कर देत बाड़े.”
“भगिनिया के कइसे नत्थी कर लीहें?” लोक कवि भड़कले.
“ऊ अइसे कि….. साला बोलल, “जाए दीं ऊ बहुते गिरल बात कहत बाड़े.”
“का कहतारें?” धीरे से बुदबुदइले लोक कवि, “अब हमरा से छुपवला से का फायदा? आखि़र ऊ त कहते बाड़ब नू?”
“ऊ कहत बाड़े कि जीजा जी अघोड़ी रहलन बेटी तक के ना छोड़ले. से बेटीओ के एड्स हो गइल बा.”
“बहुते कमीना बा!” कहत लोक कवि पुच्च से मुंह में दबाइल सुरती थूकलें. बोलले, “आप चलीं, हम जल्दिए गणेश तिवारी के लाइन पर लेआवत बानी.” वह बोलले, “ई बात रहल त पहिलवैं बतवले रहीतऽ. एह कमीना कुत्ता के इलाज हम कर दिहले रहतीं.”
“ठीक बा त जइसे एतना देखें हैं आप तनी एतना अउर देख लीं.” कहिके साला उठ खड़ा भइल.
“ठीक बा, त फेर प्रणाम!” कहिके लोक कवि दुनु हाथ जोड़ लिहले.
भुल्लन तिवारी के बेटा के साला के जाते लोक कवि चेयरमैन साहब के फोन मिलवलन आ सगरी रामकहानी बतवलन. चेयरमैन साहब छूटते कहले, “जवन पइसा तू ओकरा के दिहल चाहत बाड़ऽ उहे पइसा कवनो लठैत भा गुंडा के दे के ओकर कुट्टम्मस करवा द. भर हीक कुटवा द, हाथ पैर तूड़वा द. सगरी नारदपना भूला जाई.”
“ई ठीक होखी भला?” लोक कवि ने पूछा.
“काहें खराब का होखी ? चेयरमैनो साहब पूछलन. कहलन, “अइसन कमीनन का साथे इहे करे के चाहीं.”
“आप नइखीं जानत ऊ दलाल ह. हाथ गोड़ टूटला का बादो ऊ अइसन डरामा रच लीहि कि लेबे के देबे पड़ जाई.” लोक कवि बोले, “जे अइसे मारपीट से ऊ सुधरे वाला रहीत त अबले कई राउंड ऊ पिट-पिटा चुकल रहीत. बड़ा तिकड़मी ह से आजु ले कब्बो नइखे पिटाइल.” ऊ कहलन, “खादी वादी पहिर के अहिंसा-पहिंसा वइसै बोलत रहेला. कहीं पुलिस-फुलिस के फेर पड़ गइल त बदनामी हो जाई.”
“त का कइल जाव? तूहीं बतावऽ !”
“बोले के का बा. चलि के कुछ पइसा ओकरा मुँह पर मार आवे के बा!”
“त एहमें हम का करीं?”
“तनी सथवां चलि चली. अउर का!”
“तोहार शैडो त हईं ना कि हरदम चलल चलीं तोहरा साथे!”
“का कहत बानी चेयरमैन साहब!” लोक कवि बोलले, “आप त हमरे गार्जियन हईं.”
“ई बात है?” फोने पर ठहाका मारत चेयरमैन साहब कहले, “त चलऽ कब चले के बा ?”
“नहीं, दू चार ठो पोरोगराम एने लागल बा, निपटा लीं त बतावत बानी.” लोक कवि कहले, “असल में का बा कि एह तरे के बातचीत में आप के साथ होला से मामिला बैलेंस रहेला अउर बिगड़ल काम बनि जाला.”
“ठीक बा, ठीक बा. अधिका चंपी मत करऽ. जब चले होखी त बतइहऽ.” ऊ रुकले आ कहले, “अरे हँ, आजु दुपहरिया में का करत बाड़ऽ?”
“कुछ नाईं, तनी रिहर्सल करब कलाकारन का साथे.”
“त ठीक बा. तनी बीयर-सीयर ठंडी-वंडा मंगवा लीहऽ हम आएब.” ऊ कहलन, “तोहरा के आ तोहरा रिहर्सल के डिस्टर्ब ना करब. चुपचाप पीयत रहब आ तोहार रिहर्सल देखत रहब.”
“हँ, बाकिर लड़िकियन का साथे नोचा-नोची मत करब.”
“का बेवकूफी बतियावत बाड़ऽ.” ऊ कहले, “तू बस बीयर मंगवा रखीहऽ.”
“ठीक बा आई!” लोक कवि बेमन से कहले.

चेयरमैन साहब बीच दुपहरिया लोक कवि किहाँ पहुंच गइले. रिहर्सल अबही शुरूओ ना भइल रहे लेकिन चेयरमैन साहब के बीयर शुरू हो गइल. बीयर का साथे लइया चना, मूंगफली आ पनीर के कुछ टुकड़ा मंगवा लिहल रहे. एक बोतल बीयर जब ऊ पी चुकले आ दोसरकी खोले लगले त बोतल खोलत-खोलत ऊ लोक कवि से बेलाग हो के कहले, “कुछ मटन-चिकन मंगवावऽ आ ह्विस्कीओ!” ऊ जोड़लें, “अब ख़ाली बीयर-शीयर से दुपहरिया कटे वाली नइखे.”
“अरे, लेकिन रिहर्सल होखल बाकी बा अबही.” लोक कवि हिचकत संकोच घोरत कहले.
“रिहर्सल के रोकत बा?” चेयरमैन साहब कहले, “तू रिहर्सल करत-करवावत रह. हम खलल ना डालब. किचबिच-किचबिच मत करऽ, चुपचाप मंगवा ल.” कहिके ऊ जेब से कुछ रुपिया निकाल लोक कवि ओर फेंक दिहले.
मन मार लोक कवि रुपिया उठवले, एगो चेला के बोलवले आ सब चीज ले आवे खातिर बाजार भेज दिहले. एही बीच रिहर्सलो शुरू हो गइल. तीन गो लड़िकी मिल के नाचल गावल शुरू कर दिहली. हारमोनियम, ढोलक, बैंजो, गिटार, झाल, ड्रम बाजे लागल. लड़िकिया सब नाचत गावत रहलीं, “लागऽता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला/आलू, केला खइलीं त एतना मोटइलीं/दिनवा में खा लेहलीं, दू-दू रसगुल्ला!” अउर बाकायदा झुल्ला देखा-देखा, आंख मटका-मटका, कुल्हा अउर छातियन के स्पेशल मूवमेंट्स के साथे गावत रहलीं. अउर एने ह्विस्की के चुस्की ले-ले के चेयरमैन साहब भर-भर आंख “ई सब” देखत रहले. देखत का रहले पूरा-पूरा मजा लेत रहले. गाना के रिहर्सल ख़तम भइल त चेयरमैन साहब दू गो लड़िकियन के अपना तरफ बोलवले. दुनु सकुचात चहुँपली सँ त ओहनी के आजू-बाजू कुर्सियन पर बइठवले. ओहनी के गायकी के तारीफ कइलन. फेर एने ओने के बतियावत ऊ एगो लड़िकी के गाल सुहरावे लगलन. गाल सुहरावत-सुहरावत कहले, “एकरा के तनी चिकन आ सुंदर बनावऽ!” लड़िकी लजाइल. सकुचात कहलसि, “प्रोग्राम में मेकअप कर लिहले. सब ठीक हो जाला.”
“कुछ ना!” चेयरमैन साहब बोलले, “मेकअप से कब ले काम चली? जवानीए में मेकअप करत बाड़ू त बुढ़ापा में का करबू” ऊ कहले, “कुछ जूस वगैरह पियऽ, फल फ्रूट खा!” कहत ऊ अचानके ओकर ब्रेस्ट दबावे लगले, “इहो बहुत ढीला बा. एकरो के टाइट करऽ!” लड़की अफना के उठ खड़ा भइल त ओकर हिप के लगभग दबावत आ थपथपावत कहले, “इहो ढीला बा, एकरो के टाइट करऽ. कुछ इक्सरसाइज वगैरह कइल करऽ. अबही जवान बाड़ू, अबहिये से ई सब ढीला हो जाई त काम कइसे चली?” ऊ सिगरेट के एगो लमहर कश खींचत कहले, “सब टाइट राखऽ. जमाना टाइट के बा. अउर अफना के भागत कहाँ बाड़ू? बैठऽ एहिजा अबहीं तोहरा के कुछ अउर बतावे के बा.” लेकिन ऊ लड़िकी “अबहीं अइनी!” कहत बाहर निकल गइल. त चेयरमैन साहब दोसरकी लड़िकी ओर मुखातिब भइलन जवन बइठल-बइठल मतलब भरल तरीका से मुसुकात रहुवे. त ओकरा के मुसुकात देख चेयरमैनो साहब मुसुकात कहले, “का हो तू काहें मुसुकात बाड़ू ?”
“ऊ लड़िकी अबही नया बिया चेयरमैन साहब!” ऊ इठलात कहलसि, “अबही रंग नइखे चढ़ल ओकरा पर!”
“बाकिर तू त रंगा गइल बाड़ू !” ओकर दुनु गाल मीसत चेयरमैन साहब बहकत बोलले.
“ई सब हमरहू साथे मत करीं चेयरमैन साहब.” ऊ तनिका सकुचात, लजात अउर लगभग विरोध दर्ज करावत कहलसि, “हमार भाई अबहिये आए वाला बा. कहीं देख ली त मुश्किल हो जाई.”
“का मुश्किल हो जाई?” ऊ ओकरा उरोज का तरफ एगो हाथ बढ़ावत कहले, “गोली मार दी का?”
“हां, मार दी गोली!” ऊ चेयरमैन साहब के हाथ बीचे में दुनु हाथे रोकत कहलसि, “झाड़ू, जूता, गोली जवने पाई मार दीहि!”
ई सुनते चेयरमैन साहब थथम गइले, “का गुंडा, मवाली ह का?”
“ह तो ना गुंडा मवाली पर जे आप सभे अइसहीं करब त बन जाई!” ऊ कहलसि, “ऊ त हमरा गवलो-नचला पर बहुते ऐतराज मचावेला. ऊ ना चाहे कि हम प्रोग्राम करीं.”
“काहें?” चेयरमैन साहब के सनक अबले सुन्न पड़ गइल रहुवे. से ऊ दुनारा बहुते सर्द ढंग से बोलले, “काहें?”
“ऊ कहेला कि रेडियो, टी.वी. तकले त ठीक बा. ज्यादा से ज्यादा सरकारी कार्यक्रम कर ल बस. बाकी प्राइवेट कार्यक्रम से ऊ भड़केला.”
“काहें?”
“ऊ कहेला भजन, गीत, गजल तक ले त ठीक बा बाकिर ई फिल्मी उल्मी गाना, छपरा हिले बलिया हिले टाइप गाना मत गावल करऽ.” ऊ रुकल आ कहलसि, “ऊ तो हमरे के कहेला कि ना मनबू त एक दिन ऐन कार्यक्रम में गोली मार देब आ जेल चलि जाएब!”
“बड़ा डैंजर है साला!” सिगरेट झाड़त चेयरमैन साहब उठ खड़ा भइले. खखारत ऊ लोक कवि के आवाज लगवलन आ कहले, “तोहार अड्डा बहुते ख़तरनाक होखल जात बा. हम त जात बानी.” कहिके ऊ साचहू ओहिजा से चल दिहले. लोक कवि उनुका पीछे-पीछे लगबो कइलन कि, “खाना मंगवावत बानी खा-पी के जाएब.” तबहियो ऊ ना मनले त लोक कवि कहलेले, “एक आध पेग दारू अउर हो जाव!” बाकिर चेयरमैन साहब बिन बोलले हाथ हिला के मना करत बाहर आ के अपना एंबेसडर में बइठ गइले आ ड्राइवर के इशारा कइलन कि बिना कवनो देरी कइले अब एहिजा से निकल चलऽ.
उनुकर एंबेसडर स्टार्ट हो गइल. चेयरमैन साहब चल गइले.
भीतर वापिस आ के लोक कवि ओह लड़िकी से हंसत कहले, “मीनू तू त आजु चेयरमैन साहब के हवे टाइट कर दिहलू!”
“का करतीं गुरु जी आखि़र!” ऊ तनिका संकोच में खुशी घोरत कहलसि, “ऊ त जब आप आंख मरनी तबहिये हम समझ गइनी कि अब चेयरमैन साहब के फुटावे के बा.”
“ऊ त ठीक बा बाकिर ऊ तोहार कवन भाई ह जवन एतना बवाली ह?” लोक कवि पूछले, “ओकरा के एहिजा मत ले आइल करऽ. डेंजर लोग के एहिजा कलाकारन में जरूरत नइखे.”
“का गुरु जी आपहू चेयरमैन साहब के तरे फोकट में घबरा गइनी.” मीनू बोलल, “कहीं कवनो अइसन भाई हमारा बा? अरे, हमार भाई त एगो भाई बा जे भारी पियक्कड़ ह. हमेशा पी के मरल रहेला. ओकरा अपने बीवी बच्चा के फिकिर ना रहे त हमार फिकिर कहाँ से करी?” ऊ ककहलिस, “आ जे अइसही फिकिर करीत त म्यूजिक पार्टियन में घूम-घूम के प्रोग्रामे काहें करतीं?”
“तू त बड़हन कलाकार हऊ.” मीनू के हिप पर हलुके चिकोटी काटत, सुहुरावत लोक कवि बोलले, “बिलकुल डरामा वाली.”
“अब कहां हम कलाकार रह गइनी गुरू जी. हँ, पहिले रहीं. दू तीन गो नाटक रेडिअउयो पर हमार आइल रहे.”
“त अब काहें ना जालू रेडियो पर?” लोक कवि तारीफ के स्वर में कहले, “रेडिअउवे पर काहें टी.वी. सीरियलो में जाइल करऽ!”
“कहां गुरु जी?” वह बोली, “अब के पूछी ओहिजा.”
“काहें?”
“फिल्मी गाना गा-गा के फिल्मी कैसेटन पर नाच-नाच के ऐक्टिंग वैक्टिंग भूल-भुला गइल बानी.” वह बोली, “आ फेर एहिजा तुरते-तुरते पइसो मिल जाला आ रेगुलर मिलेला. बाकिर ओहिजा पइसा कब मिली, काम देबहू वालन के मालूम ना रहे. आ पइसा के त अउरियो पता ना रहेला.” ऊ रुकल आर बोलल, “ह, बाकिर लड़िकियन के साथे सुतावे, लिपटावे-चिपटावे के बात सभका मालूम होला.”
“का बेवकूफी के बात करत बाड़ू.” लोक कवि कहले, “कुछ दोसर बात करऽ.”
“काहें बाउर लाग गइल का गुरु जी?” मीनू ठिठोली फोड़त कहलसि.
“काहें नाहीं बाउर लागी?” लोक कवि कहले, “एकर मतलब बा कि जे कहीं अउर बाहर जात होखबू त अइसही हमरो बुराई बतियावत होखबू.”
“अरे नाहीं गुरु जी! राम-राम!” कहि कर ऊ आपन दुनु कान पकड़त बोलल “आप के बारे में एह तरह क बात हम कतहीं ना करीं. हम काहें अइसन बात करब गुरु जी!” ऊ विनम्र होखत कहलसि, “आप हमें आसरा दिहनी गु जी. आ हम एहसान फरामोश ना हईं.” कहिके ऊ हाथ जोड़ के लोक कवि के गोड़ छूवे लागल.
“ठीक बा, ठीक बा!” लोक कवि आश्वस्त होखत कहले, “चलऽ रिहर्सल शुरू करऽ!”
“जी गुरु जी!” कहि के ऊ हारमोनियम अपनी ओरि खींचलसि अउर ओह दोसरकी लड़िकी के, जे थोड़ दूर बइठल रहल, गोहरावत कहलसि,”तूहूं आ जा भई!”
ऊ लड़िकीओ आ गइल त हारमोनियम पर ऊ दुनु गावे लगली सँ, “लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला.” एकरा के दोहरवला का बाद दुसरकी टेर लिहलसि आ मीनू कोरस, “आलू केला खइली त एतना मोटइलीं, दिनवा में खा लेहलीं दू-दू रसगुल्ला, लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला.” फेर दुबारो जब दुनु शुरू कइली सँ इ गाना कि, “लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला/आलू केला खइलीं…..” तबहियें लोक कवि दुनु के डपट दिहले, “ई गावत बाड़ू जी तू लोग?” ऊ कहलन, “भजन गावत बाड़ू लोग कि देवी गीत कि गाना?”
“गाना गुरु जी.” दुनु एके साथ बोल पड़ली.
“त एतना स्लो काहें गावत बाड़ू लोग?”
“स्लो ना गुरु जी, टेक ले के नू फास्ट होखब जा!”
“चोप्प साली.” ओ कहलन, “टेक ले के काहें फास्ट होखबू लोग? जानत नइखू कि डबल मीनिंग गाना ह. शुरूवे से एकरा के फास्ट में डालऽ लोग.”
“ठीक बा गुरु जी!” मीनू बोलल, “बस ऊ ढोलक, बैंजो वाला आ जइतं त शुरूवे से फास्ट हो लेतीं सँ. ख़ाली हरमुनिया पर तुरंतै कइसे फास्ट हो जाईं जा?” ऊ दिक्कत बतवलसि.
“ठीक बा, ठीक बा. रिहर्सल चालू राखऽ लोग!” कहिके लोक कवि चेयरमैन साहब के छोड़ल बोतल से पेग बनावे लगले. शराब के चुस्की का साथे गाना के रिहर्सलो पर नजर रखले रहले. तीन चार गाना के रिहर्सल का बीचे ढोलक, गिटार, बैंजो, तबला, ड्रम, झाल वाला सब आ गइले. से सगरी गाना लोक कवि के मन मुताबिक “फास्ट” में फेंट के गावल गइल. एह बीच तीन गो लड़िकी अउरी आ गइली सँ. सजल-धजल, लिपाइल-पोताइल. देखते लोक कवि चहकलन. आ अचानके गाना-बजाना रोकत ऊ लगभग फरमान जारी कर दिहलन, “गाना-बजाना बंद कर के कैसेट लगावऽ जा. अब डांस के रिहर्सल होखी.”
कैसेट बाजे लागल आ लड़िकिया नाचे लगलीं स. साथे-साथ लोको कवि एह डांस में छटके-फुदके लगले. वइसे त लोक कवि मंचों पर छटकत, फुदकत, थिरकत रहले, नाचत रहले. एहिजा फरक अतने भर रहल कि मंच पर ऊ खुद के गावल गाने में छटकत फुदकत नाचसु. बाकिर एहिजा ऊ दलेर मेंहदी के गावल “बोल तररर” गाना वाला बाजत कैसेट पर छटकत फुदकत थिरकत रहले. ना सिरिफ थिरकत रहले बलुक लड़िकियन के कूल्हा, हिप, चेहरा आ छातियन के मूवमेंटो “पकड़-पकड़” के बतावत जात रहलन. एगो फरक इहो रहे कि मंच पर थिरकत घरी माइक का अलावा उनुका एक हाथ में तुलसी के मालो रहत रहे. बाकिर एहिजा उनुका हाथ में ना माइक रहे, ना माला. एहिजा उनुका हाथ में शराब के गिलास रहल जवना के कबो-कबो ऊ अगल बगल का कवनो कुरसी भा कवनो जगहा राख देत रहले, लड़िकियन के कूल्हा, छाती आ हिप्स के मूवमेंट बतावे ख़ातिर. आंख, चेहरा अउर बालन के शिफत बतावे ख़ातिर. लड़िकी त कई गो रहलीं सँ एह डांस रिहर्सल में आ लोक कवि लगभग सगरी पर “मेहरबान” रहले. बाकिर मीनू नाम के लड़िकी पर ऊ ख़ास मेहरबान रहले. जब तब ऊ मूवमेंट्स सिखावत-सिखावत ओकरा के चिपटा लेसु, चूम लेसु, ओकरा बाल ओकरा गाल समेत ओकर “36” वाली हिप ख़ास तौर पर सुहरा देसु. त उहो मादक मुसकान रहि-रहि के फेंक देव. बिलकुल अहसान माने वाला भाव में. जइसे कि लोक कवि ओकर बाल, गाल आ हिप सुहरा के ओकरा पर ख़ास एहसान करत होखसु. आ जब ऊ मदाइल, मीठकस मुसुकान फेंके त ओहमें सिरिफ लोके कवि ना, ओहिजा मौजूद सभे लोग नहा जाव. मीनू दरअसल रहबे अइसन मदाइल कि ऊ मुसुकाव तबहियो. ना मुसुकाव तबहियो लोग ओकरा मदइला में उभ-चूभ होखत डूबिये जाव. मंचों पर कई बेर ओकरा एह मदइला से मार खाइल बाऊ साहब टाइप लोग भा बाँका शोहदन में गोली चले के नौबत आ जाव आ जब ऊ कुछ मादक फिल्मी गानन पर नाचे त सिर फुटव्वल मच जाव. “झूमेंगे गजल गाएंगे लहरा के पिएंगे, तुम हमको पिलाओ तो बल खा के पिएंगे….” अर्शी हैदराबादी के गावल गजल पर जब ऊ पानी भरल बोतल के “डबल मीनिंग” में हाथ में लिहले मंच से नीचे बइठल लोगन पर पानी उछाले तो बेसी लोग ओह पानी में भींजे खातिर पगला जाव. भलही सर्दी ओह लोग के सनकवले होखे तबो ऊ लोग पगलाइल कूदत भागत आगे आ जाव. कभी-कभार कुछ लोग एह हरकत के बाउरो मान जासु बाकिर जवानी के जोश में आइल लोग त “बल खा के पिएंगे” में बह जाव. बह जाव मीनू के बल खात, धकियावत “हिप मूवमेंट्स” के हिलकोरन मे. बढ़ियाईल नदी का तरे उफनात छातियन का हिमालय में भुला जासु. भुला जासु ओकरा अलसाइल अलकन का जाल में. अउर जे एह पर कवनो केहू टू-टपर करे तो बाँहन के आस्तीन मुड़ जाव. छूरा, कट्टा निकल आवे. पिस्तौल, राइफल तना जाव. फेर दउड़ के आवसु पुलिस वाला, दउड़त आवे कुछ “सभ्य, शरीफ अउर जिम्मेदार लोग” तब जा के ई जवानी के लहर बमुश्किल थथमे. बाकिर “झूमेंगे गजल गाएंगे लहरा के पिएंगे, तुम हमको पिलाओ तो बल खा के पिएंगे…..” के बोखार ना उतरे.


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एगो जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

लोक कवि अब गाते नहीं – १६

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

पन्दरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
कि कइसे गणेश तिवारी झूठ के साँच आ साँच के झूठ बनावे का तिकड़म में लागल रहेले. अबकी उनुका तिकड़म के माध्यम बनल बा पोलादन जे आपन जमीन गणेश तिवारी के एगो पटीदार के बेचले रहुवे आ अब गणेश तिवारी लागल बाड़े कि ओकर जमीन ओकरा वापिस मिल जाव बिना दाम लवटवले. पोलादन के विश्वास त नइखे होत बाकिर तबहियो ऊ गणेश तिवारी के खेवा खरचा खातिर कई हजार रूपिया दे आवत बा आ लवटति घरी सोचत बा कि पता ना जमीनवा मिली कि ना कि पइसवो डूबी ? अब आगे पढ़ीं…


हफ्ता, दू हफ्ता बीतल. कुछ भइबे ना कइल. ऊ गणेश तिवारी का लगे जाव आ आंखे-आंखि में सवाल फेंके. त ओने से गणेशो तिवारी ओकरा के आंखे-आंखि में जइसे तसल्ली देसु. बोलत दुनु ना रहले. गणेश तिवारी के त ना मालूम रहे पोलादन का, बाकिर ऊ ख़ुदे सुलगत रहल. मसोसत रहल कि काहें एतना पइसा दे दिहनी ? काहें गणेश तिवारी जइसन ठग आदमी का फेर में पड़ गइनी ? ऊ एही उभचुभ में रहे कि एक राति गणेश तिवारी ओकरा घरे अइलन. खुसुर-फुसुर कइलन आ गांव छोड़ के कहीं चल गइले. ओही रात फौजी तिवारी का घर पर पुलिस के छापा पड़ल आ उनुका दुनु बेटा समेत उनुका के थाना उठा ले आइल. दोसरा दिने ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट का सोझा ऊ आ उनुकर दुनु बेटा पेश कइल गइले. उनुकर नाते रिश्तेदार, गोतिया पट्टीदार आ शुभचिंतक लोग बहुते दउड़ धूप कइल बाकिर जमानत ना मिलल काहे कि उनुका पर हरिजन एक्ट लाग गइल रहे. बड़का से बड़का वकील कुछ ना कर पवले ! कहल गइल कि अब त हाईये कोर्ट से जमानत मिल पाई. आ जाने जमानत मिली कि सजाय?

जेल जात-जात फौजी तिवारी रो पड़ले. रोवते-रोवत बोलले, “ई गणेश तिवारी गोहुवन सांप हवे. डंसले इहे बा. पोलदना तो बस इस्तेमाल भइल बा औजार का तरह.” फेर ऊ एगो खराब गारी दिहलन गणेश तिवारी के. कहले, “भोसड़ी वाला के पचीस हजार के दलाली ना दिहनी त एह कमीनगी पर उतर आइल !”
“त दे दिहले होखतऽ दलाली !” फौजी तिवारी के साला बोलल, “हई दिन त ना देखे पड़ीत !”
“अब का बताई ?” कहिके फौजी तिवारी पहिले मूछ में ताव दिहले फेर फफक के रो पड़ले.
साँझ हो गइल रहे से उनुका आ उनुका बेटवन के पुलिस वाले पुलिस ट्रक में बइठा के जेहल ओरि चल दिहले. एह पूरा प्रसंग में फौजी तिवारी टूटल, रोआइन आ बेचारा जइसन कुछ ना कुछ बुदबुदात रहलन आ उनुकर बेटा निःशब्द रहले स. लेकिन ओकनी का चेहरा पर आग खउलत रहे आ आंखिन में शोला समाइल रहे.
जवने होखे बाकिर गांव भर का पूरा जवार के जानत देर ना लागल कि ई सब गणेश तिवारी के कइल धइल ह आ एही बहाने गांव जवार में एक बार फेरू गणेश तिवारी के आतंक पसर गइल, कवनो गुंडे भा कवनो आतंकवादी के आतंक का होखत होई जे गणेश तिवारी के आतंक होखत रहुवे. जवन आतंक ऊ खादी पहिर के , बिना हिंसा के आ ख़ूब मीठ बोल के बरपावत रहले.
एह भा ओह तरह से लोग आतंक में जिये आ गणेश तिवारी के विलेज बैरिस्टरी चलत जात रहुवे.
कई बेर ऊ एह सभका बावजूद निठल्ला हो जासु. लगन ना होखे त गवनई के सट्टो ना होखे. मुकदमा ना होखे त कचहरीओ जा के का करीतें ? कबो-कभार मुकदमो कम पड़ जाव. त ऊ एगो ख़ास तकनीक अपनावसु. पहिले ऊ ताड़सु कि केकरा-केकरा में तनातनी चलत बा भा तनातनी के अनेसा बा भा उमेद हो सकेला. एहमे से कवनो एक फरीक से कई-कई बइठकी में मीठ-मीठ बोलि के, ओकर एक-एक नस तोल के ऊ ओकरा मन के पूरा थाह लेसु. कुछ “उकसाऊ” शब्द ओकरा कान में अइसहीं डालसु. बदला में ऊ दोसरा फरीक खातिर कड़ुआ शब्दन के भंडार खोल बइठे, कुछ राज अपना विरोधी पक्ष के बता जाव आ आखिर में ओकर अइसन तइसन करे लागे. फेर गणेश तिवारी जब देखसु कि चिंगारी शोला बन गइल बा त ऊ बहुते “शांत” भाव से चुप करावसु आ ओकरा के बहुते धीरज आ ढाढ़स का संगे समुझावसु, “ऊ साला कुकुर ह त ओकरा से कुकुर बनि के लड़बऽ का ?” ऊ ओकरा के बिना मौका दिहले कहसु, “आदमी हउव आदमी का तरे रहऽ. कुत्ता का साथे कुत्ता बनल ठीक हवे का ?”
“त करीं का?” अगिला खीझियात पूछे.
“कुछु ना आदमी बनल रहऽ. अउर आदमी का पाले बुद्धि होले, सो बुद्धि से काम लऽ !”
“का करब बुद्धि ले के ?” अगिला अउड़ बउराव.
“बुद्धि के इस्तेमाल करऽ !” ऊ ओकरा के बहुते शांत भाव से समुझावसु, “खुद लड़े के का जरूरत बा ? तू खुद काहे लड़ऽतारऽ ?”
“त का चूड़ी पहिर के बइठ जाईं ?”
“नाहीं भाई, चूड़ी पहिने के के कहत बा ?”
“त ?”
“त का !” ऊ गँवे से बोलसु, “ख़ुद लड़ला ले नीमन बा कि ओकरे के लड़ा देत बानी.”
“कइसे?”
“कइसे का?” ऊ पूछसु, “एकदम बुरबके हउव का ?” ऊ जोड़सु, “अरे कचहरी काहें बनल बा ! कर देत बानी एक ठो नालिश, दू ठो इस्तगासा !”
“हो जाई !” अगिला खुशी से उछलत पूछे.
“बिलकुल हो जाई.” कहिके गणेश तिवारी दोसरा फरीक के टोहसु आ ओकरा खिलाफ पहिला फरीक के कइल कड़ुआ टिप्पणी, खोलल राज बतावसु त दोसरको फरीक लहकि जाव त ओकरो के धीरज धरावसु. धीरज धरावत-बन्हावत ओकरो के बतावसु कि, “खुद लड़े के का जरूरत बा ?” कहसु, “अइसन करत बानी कि ओकरे के लड़ा देत बानी.”
एह तरे दुनु फरीक कचहरी जा के भिड़ जासु बरास्ता गणेश तिवारी. कचहरी में उनुकर “ताव” देखे लायक होके. सूट फाइल होखे, काउंटर, रिज्वाइंडरे में छ-आठ महीना गुजर जाव. साथ ही साथ दुनु फरीक के जोश खरोश अउर “तावो” उतरि जाव. नौबत तारीख़ के आ जाव. आ जइसन कि हमेशा कचहरियन में होला न्याय कहीं, फैसला कहीं मिले ना, तारीख़े मिले. आ ई तारीख़ो पावे खातिर पइसा खरचे पड़े. एह पर पक्ष भा प्रतिपक्ष विरोध जतावे त गणेश तिवारी बहुते सफाई से ओकरा के “राज” के बात बतावसु कि, “अबकी के तारीख़ तोहर तारीख़ ह. तोहरा मिलल बा आ तोहरे तारीख पर ओकरो आवे के पड़ी !”
“अउर जे ऊ ना आइल त ?” अगिला असमंजस में पड़ल पूछे.
“आई नू !” ऊ बतावसु, “आख़िर गवर्मेंट के कचहरी के तारीख़ हवे. आई कइसे ना. अउर जे ऊ ना आइल त गवर्मेंट बन्हवा के बोलवाई. अउर कुछु ना त ओकर वकिलवा त अइबे करी.”
“आई नू !”
“बिलकुल आई !” कहि के गणेश तिवारी ओकरा के निश्चिंत करसु. आ भलही जेनरल डेट लागल होखे तबहियो गणेश तिवारी ओकरा के ओकर तारीख बतावसु आ ओकरा से आपन फीस वसूलसु. इहे काम आ संवाद ऊ दोसरको फरीक पर गाँठसु आ ओकरो से फीस वसूलसु. दुनु के वकीलन से कमीशन अलगा वसूलसु. कई बेर मुवक्किल उनुका मौजूदगीए में वकील के पैसा देव त हालांकि ऊ अंगरेजी ना जानसु तबहियो मुवक्किल के सोझा ट्वेंटी फाइव फिफ्टी, हंडरेड, टू हंडरेड, फाइव हंडरेड, थाउजेंड वगरैह जइसन उनुकर जरूरत भा रेशियो जवने बने बोलि के आपन कमीशन तय करवा लेसु. बाद में अगिला पूछे कि, “वकील साहब से अऊर का बात भइल?” त ऊ बतावसु, “अरे कचहरी के ख़ास भाषा ह, तू ना समुझभऽ.” आ हालत ई हो जाव कि जइसे-जइसे मुकदमा पुरान पड़त जाव दुनु फरीक के “ताव” टूटत जाव आ ऊ लोग ढीला पड़ जाव. फेर एक दिन अइसन आवे कि कचहरी जाए का बजाय कचहरी के खरचा लोग गणेश तिवारी का घरे दे जाव. मुकदमा अउरी पुरान होखे त दुनु फरीक खुल्लमखुल्ला गणेश तिवारी के “खर्चा-बर्चा” देबे लागसु आ आखिरकार कचहरी में सिवाय तारीख़ के कुछु मिले ना से दुनु फरीक सुलह सफाई पर आ जासु आ एगो सुलहनामा पर दुनु फरीक दस्तखत करि के मुकदमा उठा लेसु. बहुते कम मुकदमा होखे जे एक कोर्ट से दूसरका कोर्ट, दूसरका कोर्ट से तिसरका कोर्ट ले चहुँपे. अमूमन त तहसीले में मामिला “निपट” जाव.
सौ दू सौ मुकदमन में से दसे पांच गो जिला जज तक चहुँपे बरास्ता अपील वगैरह. अउर एहिजो से दू चार सौ मुकदमन में से दसे पाँच गो हाइकोर्ट के रुख़ करि पावे. अमूमन त एहीजे दफन हो जाव. फेर गणेश तिवारी जइसन लोग नया क्लाइंट का तलाश में निकल पड़े. ई कहत कि, “खुदे लड़ला के का जरूरत बा, ओकरे के लड़ा दिहल जाव.” आ “ओकरे के” लड़ावे का फेर में आदमी खुद लड़े लागे.
लेकिन गणेश तिवारी का ई नयका शिकार पोलादन एकर अपवाद रहल. फौजी तिवारी के ऊ साचहु लड़ा दिहलसि काहे कि गणेश तिवारी ओकरा के हरिजन ऐक्ट के हथियार थमा दिहले रहन. हरिजन एक्ट अब उनुकर नया अस्त्र रहे आ साचहु उहे भइल जइसन कि गणेश तिवारी पोलादन से कहले रहले, “खेत बोवले जरूर फौजी पंडित बाकिर कटबऽ तूं.” त पोलादन ऊ खेत कटलसि, बाकायदा पुलिस का मौजूदगी में. खेत कटला ले फौजी तिवारी आ उनुकर दुनु बेटा जमानत पर छूट के आ गइल रहले बाकिर दहशत का मारे ऊ खेत का ओरि झाँकहु ना गइले. खेत कटत रहल. काटत रहल पोलादन खुद. दू चार लोग फौजी तिवारी से आ के खुसुर फुसुर बतइबो कइल, “खेतवा कटात बा!” बाकिर फौजी तिवारी कवनो प्रतिक्रिया ना दिहलन, ना ही उनुकर बेटा लोग.
एह पूरा प्रसंग पर लोक कवि एगो गानो लिखलन. गाना त ना चलल बाकिर लोक कवि के पिटाई जरूर हो गइल एह बुढ़ौती में. फौजी तिवारी के छोटका बेटा पीटलसि. उहो फौज में रहल आ गणेश तिवारी अउर पोलादन के हथियार हरिजन एक्ट ओकर फौजी नौकरी दांव पर लगा दिहले रहे.
बहरहाल, जब खेत वगैरह कट कटा गइल, पोलादन पासी के बाकायदा कब्जा हो हवा गइल खेतन पर त एक रात गणेश तिवारी खांसत-खंखारत पोलादन पासी का घरे खुद चहुँपले. काहे कि ऊ त बोलवलो पर उनुका घरे ना आवत रहे. खैर, ऊ चहुँपले आ बाते बाति में दबल जबान से फौजी तिवारी मद में बाकी पइसा के जिक्र कर बइठले. तवना पर पोलादन दबल जबान से ना, खुला जबान गणेश तिवारी से प्रतिवाद कइलसि. बोलल, “कइसन पइसा ?” ऊ आंख तरेरलसि आ जोड़लसि, “बाबा चुपचाप बइठीं. नाई अब कानून हमहूं जानि गइल हईं. कहीं आपहु के खि़लाफ कलक्टर साहब के अंगूठा लगा के दरखास दे देब त मारल फिरल जाई.”
सुन के गणेश तिवारी के दिल धक् हो गइल. आवाज मद्धिम हो गइल. बोलले, “राम-राम! ते त हमार चेला हऊवे! का बात करत बाड़े. भुला जो पइसा वइसा !” कहिके ऊ माथ पर गोड़ धइले ओहिजा से सरक लिहलन.
रास्ता भर ऊ कपार धुनत अइलन कि अब का करीहें ? बाकिर कुछ बुझात ना रहे उनुका. घरे अइलन. ठीक से खाइयो ना पवले. सूते गइलन त पंडिताइन गोड़ दबावे लगली. ऊ गँवे से कहलन, “गोड़ ना, कपार बथत बा.” पंडिताइन कपार दबावे लगली. दबावत-दबावत दबले जुबान से पूछ बइठली, “आखि़र का बात हो गइल?”
“बात ना, बड़हन बात हो गइल !” गणेश तिवारी बोलले, “एकठो भस्मासुर पैदा हो गइल हमरा से !”
“का कहत हईं ?”
“कुछ नाहीं. तू ना समझबू. दिक् मत करऽ. चुपचाप सुति जा !”
पंडिताइन मन मार के सूति गईली. लेकिन गणेश तिवारी का आंखिन में नींद ना रहे. ऊ लगातार सोचत रहलन कि भस्मासुर बनल पोलादन से कइसे निपटल जाव ! भगवान शंकर जइसन मति भा बेंवत त रहे ना उनुका में बाकिर विलेज बैरिस्टर त ऊ रहबे कइलन. आ अब उनुकर इहे विलेज बैरिस्टरी दांव पर चेल रहे. ओने उधर फौजी तिवारी के छोटका बेटा के फौज के नौकरी दांव पर रहुवे पोलादन पासी के हरिजन ऐक्ट के हथियार से. से ऊ ओकरे के साधे के ठनलन. गइलन ओकरा लगे मौका देखि के. बाकिर ऊ गणेश तिवारी का मुँह पर थूक दिहलसि आ अभद्दर गारी देबे लागल. कहलसि कि तोरा नरको में ठिकाना ना मिली. बाकिर गणेश तिवारी ओकरा कवनो बाति के खराब ना मनलन. ओकर थूकल पोंछ लिहलम. कहले, “अब गलती भइल बा त प्रायश्चितो करब. आ गलती कइला पर छोटको बड़का के दंड दे सकेला. हम दंड के भागी बानी.” फेर अपना बोली में मिसिरी घोरत कहले, “हम अधम नीच बड़ले बानी एही लायक ! तबहियों तोहरा लोगन का साथे भारी अन्याय भइल बा. इंसाफो कराएब हमहीं. आखि़र हमार ख़ून हउव तू लोग. हमनी का नसन में आखि़र एके ख़ून दउड़त बा. अब तनिका मतिभरम का चलते ई बदलि त ना जाई. आ ना ही ई चमार-सियारन भा पासियन-घासियन का कुटिलता से बदल सकेला. रहब त हमनी का एके ख़ून. ऊ कहले, “त ख़ून त बोली नू नाती !” एह तरह आखिरकार फौजी तिवारी के छोटका बेटा गणेश तिवारी के एह “एके ख़ून” वाला पैंतरे में फंसिये गइल. भावुक हो गइल. फेर गणेश तिवारी आ ओकर छने लागल. उमिर के दीवर तूड़त दुनु साथे-साथ घूमे लगले. गलबहियां डलले. पूरा गांव अवाक रहे कि ई का होखत बा ? विचलित पोलादन पासीओ भइल ई सब देखि सुनि के. ऊ तनिका सतर्को भइल ई सोचि के कहीं गणेश तिवारी पलट के ओकरे के ना डंस लेसु. बाकिर ओकरा फेर से हरिजन एक्ट, कलक्टर अउर पुलिस के याद आइल. त एह तरह हरिजन एक्ट के हथियार का गुमान में ऊ बेख़बर हो गइल कि, “हमार का बिगाड़ लिहें गणेश तिवारी !”
दिन कटत रहल. एक मौसम बदल के दोसरका आ गइल बाकिर पोलादन पासी के गुमान ना गइल. ओह घरी ओकर बेटा बंबई से कमा के लवटल रहे. बिटिया के शादी बदे. शादी के तइयारी चलत रहे. पोलादन के नतिनी अपना सखियन का साथे फौजी तिवारी वाला ओही खेत क मेड़ पर गन्ना चूसत रहे कि फौजी तिवारी के छोटका बेटा ओने से गुजरल. ओकरा के देखि पोलादन के नतिनी ताना कसलसि, “रसरी जरि गइल, अईंठन ना गइल !”
“का बोललिस ?” फौजी के बेटा डाँड़ में बान्हल लाइसेंसी रिवाल्वर निकाल के हाथ में लेत भड़क के बोलल.
“जवन तू सुनलऽ ए बाबा !” पोलादन के नातिन ओही तंज में कहलसि आ खिलखिला के हँस दिहलसि. साथे ओकर सखियो हँसे लगली सँ.
“तनी एक बेर फेर से त कहु !” फौजी तिवारी के बेटा फेर भड़कत ओही ऐंठ से बोलल.
“ई बंदूकिया में गोलियो बा कि बस खालिए भांजत हऊव ए बाबा !”
एतना सुनल रहेकि फौजी तिवारी के बेटा “ठांय” से हवा में फायर कइलसि त सगरी लड़की डेरा के भागे लगली. ऊ दउड़ के पोलादन के नातिन के कस के पकड़ लिहलसि, “भागत काहे बाड़ी ? आव बताईं कि बंदूक में केतना गोली बा !” कहिके ऊ ओहिजे खेत में लड़की को लेटा के निवस्तर कर दिहलसि. बाकी लड़की भाग चलली सँ. पोलादन के नातिन बहुते चीखल चिल्लाइल. हाथ गोड़ फेंकत बहुते बचाव कइलसि बाकिर बाच ना पवलसि बेचारी. ओकर लाज लुटाइये गइल. फौजी तिवारी के बेटा ओकरा देहि पर अबही ले झुकले रहला का बाद अबगे निढाले भइल रहुवे कि पोलादन पासी, ओकर बेटा आ नाती लाठी, भाला लिहले चिल्लात आवत लउकले. ऊ आव देखलसि ना ताव. बगल में पड़ल रिवाल्वर उठवलसि. रिवाल्वर उठवते लड़की सन्न हो गइल. बुदबदाइल “नाई बाबा, नाई, गोली नाहीं.”
“चुप भोंसड़ी!” कहिके फौजी के बेटा रिवाल्वर ओकरा कपारे पर दे मरलसि, साथही निशाना साधलसि आ नियरा आवत पोलादन, ओकरा बेटा, ओकरा नाती पर बारी-बारी गोली दाग दिहलसि. फौजी तिवारी के बेटवो फौजी रहल से निशाना अचूक रहे. तीनों ओहिजे ढेर हो गइले.
अब तीनों के लहुलुहान लाश आ निवस्तर लड़िकी खेत में पड़ल रहे. एकनी के केहु तोपत रहुवे त बस सूरज के रोशनी !
पूरा गांव में सन्नाटा पसर गइल. गाय, बैल, भैंस, बकरी सब के सब ख़ामोश हो गइले. पेड़ के पत्तो खड़खड़ाइल बंद कर दिहले.बयार जइसे थथम गइल रहे.
ख़ामोशी टूटल फौजी तिवारी के जीप का गड़गड़ाहट से. फौजी तिवारी, उनुकर दुनु बेटा आ परिवार के सगरी बेकत घर में ताला लगा के जीप में बइठ गांव से बहरी चलि गइले. साथ में पइसा, रुपिया, जेवर-कपड़ा-लत्ता सगरी ले लिहलन. फौजी तिवारी के बेटा जइसे कि सब कुछ सोच लिहले रहुवे. शहर पहुंचिके ऊ अपना वकील से मिलल. पूरा वाकया सही-सही बतवलसि आ वकील के सलाह पर दोसरा दिने कोर्ट में सरेंडर कर दिहलसि.

ओने गांव में पसरल सन्नाटा फेर पुलिस तूड़लसि. फौजी तिवारी के घर त भाग चुकल रहुवे. पुलिस तबहियो “सुरागरशी” कइलसि आ गणेश तिवारी को धर लिहलसि. लेकिन “हजूर-हजूर, माई-बाप” बोल-बोल के ऊ पुलिसिया मार पीट से अपना के बचवले रहले आ कुछु बोलले ना. जानत रहले कि थाना के पुलिस कुछु सुने वाली नइखे. हँ, जब एस.एस.पी. अइले तब ऊ उनुका गोड़ पर लोट गइले. बोलले, “हजूर आप त जानते हईं कि हम गरीब गुरबा के साथी हईं.” ऊ कहले, “ई पोलादन जी का साथे जब फौजी अन्याय कइलें तब हमही त दरखास ले-ले के आप हाकिम लोगन का लगे दउड़त रहीं. आ आजु देखीं कि बेचारा ख़ानदान समेत मार दिहल गइल !” कहि के ऊ रोवे लगले.कहले, “हम त ओकर मददगार रहनी हजूर आ दारोगा साहब हमहीं के बान्ह लिहलें.” कहिके ऊ फेरु एस.एस.पी. का गोड़ पर टोपी राखत पटा गइले.
“क्या बात है यादव?” एस.एस.पी. दारोगा से पूछले.
“कुछ नहीं सर ड्रामेबाज है.” दारोगा बोलल, “सारी आग इसी की लगाई हुई है.”
“कोई गवाह, कोई बयान वगैरह है इस के खि़लाफ?”
“नो सर!” दारोगा बोलल, “गांव में इस की बड़ी दहशत है. बताते भी हैं इस के खि़लाफ तो चुपके-चुपके, खुसुर-फुसुर. सामने आने को कोई तैयार नहीं है.” ऊ बोलल, “पर मेरी पक्की इंफार्मेशन है कि सारी आग, सारा जहर इस बुढ्ढे का ही फैलाया हुआ है.”
“हजूर आप हाकिम हईं जवन चाहीं करीं बाकिर कलंक मत लगाईं.” गणेश तिवारी फफक के रोवत बोलले, “गांव के एगो बच्चो हमरा खि़लाफ कुछु ना कहि सके. राम कसम हजूर हम आजु ले एगो चिउँटिओ नइखीं मरले. हम त अहिंसा के पुजारी हईं सर, गांधी जी के अनुयायी हईं सर !”
“यादव तुम्हारे पास सिर्फ इंफार्मेशन ही है कि कोई फैक्ट भी है.”
“अभी तो इंफार्मेशन ही है सर. पर फैक्ट भी मिल ही जाएगा.” दारोगा बोलल, “थाने पहुंच कर सब कुछ खुद ही बक देगा सर !”
“शट अप, क्या बकते हो!” एस.एस.पी. बोलल, “इसे फौरन छोड़ दो.”
“किरिपा हजूर, बड़ी किरिपा!” कहिके गणेश तिवारी एस.एस.पी. के गोड़ पर फेरु पटा गइले.
“चलो छोड़ो, हटो यहां से !” एस.एस.पी. गणेश तिवारी से गोड़ छोड़ावत कहले, “पर जब तक यह केस निपट नहीं जाता, गांव छोड़ कर कहीं जाना नहीं.”
“जइसन हुकुम हजूर !” कहिके गणेश तिवारी ओहिजा से फौरन दफा हो गइले.
बाकिर गांव में सन्नाटा अउर तनाव जारी रहुवे. गणेश तिवारी समुझ गइले कि केस लमहर खिंचाइल त देर सबेर उहो फंसि सकेले. से ऊ बहुते चतुराई से पोलादन पासी, ओकरा के बेटा आ नाती का लाशन का लगे से लाठी, भाला के बरामदगी दर्ज करवा दिहले. अउर फौजी तिवारी के वकील से मिलिके पेशबंदी कर लिहले. आ भइल उहे जे ऊ चाहत रहले. कोर्ट में ऊ साबित करवा लिहले कि हरिजन एक्ट का नाम पर पोलादन पासी वगैरह फौजी तिवारी आ उनुका परिवार के उत्पीड़न करत रहले. ई सगरी मामिला सवर्ण उत्पीड़न के ह. बाकिर चूंकि सवर्ण उत्पीड़न पर कवनो कानून नइखे से ऊ एकर ठीक से प्रतिरोध ना करि पवले आ हरिजन एक्ट का तहत पहिले जेहल में भेजा गइले. तब जब कि बाकायदा नकद पांच लाख रुपिया दे के होशोहवास में खेत के रजिस्ट्री करववले रहले. पोलादन के ई पांच लाख रुपिया देबे के सुबूतो गणेश तिवारी पेश करवा दिहलन आ खुदे गवाह बनि गइलन. बात हत्या के आइल त फौजी तिवारी के वकील ने एकरा के हत्या ना, अपना के बचावे के कार्रवाई स्टैब्लिश कर दिहलन. बतवलन कि तीन-तीन लोग लाठी भाला लिहले ओकरा के मारे आवत रहले त उनुका मुवक्किल के अपना रक्षा ख़ातिर गोली चलावे के पड़ल. कई पेशी, तारीख़न का बाद जिला जजो वकील के एह बात से “कनविंस” हो गइले. रहल बाति पोलादन के नातिन से बलात्कार के त जांच अउर परीक्षण में उहो “हैबीचुअल” पावल गइल. आ इहो मामिला ले दे के रफा दफा हो गइल. पोलादन के नातिनो चुपचाप “मुआवजा” पा के “ख़ामोश” हो गइल.
बेचारी करबो करीत त का ?
सब कुछ निपट गइला पर एक दिन गणेश तिवारी चहुँपले फौजी तिवारी का घरे. खांसत-खखारत. बाते बाति में गांधी टोपी ठीक करि के जाकेट में हाथ डालत कहले, “आखि़र आपन ख़ून आपने ख़ून होला.”
“चुप्प माधरचोद !” फौजी तिवारी के छोटका बेटा बोलल, “जिंदगी जहन्नुम बना दिहलऽ पचीस हजार रूपए के दलाली ख़ातिर आ आपन ख़ून, आपन ख़ून के रट लगवले बइठल ना.” ऊ खउलत कहलसि, “भागि जा माधरचोद बुढ़ऊ नाहि त तोहरो के गोली मारि देब. तोहरा के मरला पर हरिजन एक्टो ना लागी.”
“राम-राम! बच्चा बऊरा गइल बा. नादान हवे.” कहत गणेश तिवारी मनुहार भरल आंखिन से फौजी तिवारी का ओरि देखलन. त फौजीओ तिवारी के आंख गणेश तिवारी के तरेरत रहल. से “नारायन-नारायन!” करत गणेश तिवारी बेआबरू होइये के सही ओहिजा से खिसकिये गइला में आपन भलाई सोचलन.


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एगो जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

लोक कवि अब गाते नहीं – १५

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

चउदहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
कि गोपाल पंडित के बेटी के बिआह खातिर लोक कवि रुपिया त दे अइलन बाकिर बिआह ठीक ना हो पावल. सिरिफ पइसा भर से केहु के शादी ब्याह तय हो जाइत त फेर का बाति रहीत ? अब आगे पढ़ीं…


फेर गांव में एगो विलेज बैरिस्टर रहले. नाम रहे गणेश तिवारी. अइसन बाति जहां नाहियो पँहुचल रहो गणेश तिवारी पूरा चोखा चटनी लगा के चहुँपावे के पूरा हुनर राखत रहले. ना सिरिफ बतिये चहुँपावे के बलुक बिना सुई, बिना तलवार, बिना छुरी, बिना धार ऊ केहुओ के मूड़ी काट सकत रहले, ओकरा के जड़मूल से बरबाद कर सकत रहले. आ अइसे कि कटे वाला तड़पियो ना सके, बरबाद होखे वाला उफ तकले ना कर सके. ऊ कहसु, ‘वकील लोग वइसहीं थोड़े केहु के फांसी लगवा देला.’ वकीलन का गरदन पर बान्हल फीता देखावत कहसु, ‘अरे, पहले गटई में खुदे फंसरी बांन्हेले फेर फांसी चढ़वावेले !’ फेर गणेश तिवारी बियाह काटे में त अतना पारंगत रहले जतना केहु के प्राण लेबे में यमराज. ऊ कवनो “दुल्हा” के मिर्गी, दमा, टी.वी., जुआरी, शराबी वगैरह वगैरह गुण से विभूषित कर सकत रहले.अइसहीं ऊ कवनो “कन्या” के, भलही ओकर अबहीं महीनो ना शुरू भइल होखे त का, दू चार बेर पेट गिरवा सकत रहले. एह निरापद भाव, एह तटस्थता, एह कुशलता अउर एह निपुणता के साथ कि भले ऊ राउरे बेटी काहे ना होखो, एक बेर त रउरो मान लेब. एह मामिला में उनुकर दू चार गो ना, सैकड़न किस्सा गांव जवार में किंवदंती बन चलल रहे. एतना कि जइसे कवनो शुभ काम शुरू करे का पहिले लोग ‘ॐ गणेशाय नमः’ कर के श्री गणेश करेला जेहसे कि कवनो विघ्न बाधा ना पड़े ठीक वइसही एहीजा लोग शादी बिआह के लगन निकलवावे खातिर पंडित आ उनुकर पंचांग बाद में देखे, पहिले ई देखे कि गणेश तिवारी कवना तिथि के गांव में ना होखीहें !

तबहियो ना जाने लोग के दुर्भाग्य होखे कि गणेश तिवारी के गांव में आवे के दुर्निवार संयोग, ऊ अचके में ऐन मौका पर प्रकट हो जासु. अइसे कि लोग के दिल धकधका जाव. त गणेश तिवारी के दुर्निवार संयोग भुल्लन तिवारी के बेटा गोपला के बेटीओ के शादी काटे में खादी के जाकेट पहिरले, टोपी लगवले कूद पड़ल. ख़ास करके तब उनुकर नथुना अउरी फड़फड़ा उठल जब उनुका पता चलल कि लोक कविया एहमें पइसा कौड़ी खरचा करत बा. लोक कविया के ऊ आपन चेला मानत रहले. एह लिहाज से कि गणेश तिवारी अपनहुँ गवईया रहले. एगो कुशल गवईया. अउर चूंकि गांव में ऊ सवर्ण रहले से श्रेष्ठो रहले. आ उमिरो में लोक कवि से बड़का रहले. लेकिन चूंकि जाति से ब्राह्मण रहलें से शुरु में ऊ गांवे-गांव, गलीए-गली घूम-घूम के ना गा पवलें. चुनावी मीटिंगो में ना जा पवले गाना गावे. जबकि लोक कवि खातिर अइसन कवनो पाबंदी ना पहिले रहे, ना अब रहुवे. अउर अब त अइसन पाबंदी गणेशो तिवारी तूड़ दिहले रहुवन. रामलीला आ कीर्तन में गावत-बजावत अब ऊ ठाकुरन, ब्राह्मणन का बिआहो में महफिल सजावे लागल रहले. बाकायदा सट्टा लिखवा के. बाकिर बहुते बाद में. एतना कि जिला जवार से बहरा केहु उनुका के जानतो ना रहे. तब जबकि एहु उमिर में भगवान उनुका गला में सुर के मिठास, कशिश आ गुण बइठा रखले रहले. लोक कवि का तरह गणेश तिवारी का लगे कवनो आर्केस्ट्रा पार्टी ना रहुवे, ना ही साजिंदन के भारी भरकम बेड़ा. ऊ त बस खुद हारमोनियम बजावसु आ ठेका लगावे खातिर एगो ढोलकहिया साथे राखसु. उहो ब्राह्मणे रहल. ऊ ढोलक बजावे आ बीच-बीच में गणेश तिवारी के ‘रेस्ट’ देबे का गरज से लतीफागोईओ करे. जवन अधिकतर नानवेज लतीफा होखत रहे धुर गंवई स्टाइल के. लेकिन ई लतीफा सीधे-सीधे अश्लीलता छूवे का बजाय सिरिफ संकेत भर देव से ‘ब्राह्मण समाज’ में ‘खप-पच’ जासु. जइसे कि एगो लतीफा ऊ अकसर सुनावल करसु, ‘बलभद्दर तिवारी बहुते मजाकिया रहले. बाकलिर ऊ अपना छोटका साला से कबहियो मजाक ना करत रहले. छोटका साला के ई शिकायत हरदम बनल रहत रहे कि, ‘जीजा हमरा से मजाक काहे ना करीं ?’ बाकिर जीजाजी अकसर महटिया जासु. बाकिर जब ई ओरहन ढेरे बढ़ि गइल त एक बेर रात खाँ खाए बेरा बलभद्दर तिवारी उ ओरहन खतम करा देबे के ठान लिहले. उनुकर दुआर बहुते बड़हन रहे आ सामने एगो इनारो रहुवे. इनारे का लगे ऊ मरीचा रोप रखले रहले. से खाये से पहिले ऊ छोटका साला के बतवले कि, ‘एगो बड़की समस्या बा एह मरीचा के रखवाली.’
‘काहे ?’ साला सवाल उठवलसि.
‘काहे कि एगो औरत परिकल बिया. जइसहीं हम राति खाँ खाये जाइलें उउ मरीचा तूड़े चहुँप जाले.’
‘ई त बड़ा गड़बड़ बा.’ साला बोललसि.
‘बाकिर आजु मरीचा बाँच सकेला आ तू जे साथ दे द त ओह औरतो के पकड़ल जा सकेला.’
‘कइसे भला?’
‘उ एइसे कि हमनी का आजु बारी-बारी से खाईं.’ बलभद्दर तिवारी बोललन, ‘पहिले तू खा लीहऽ, फेर हम खाये जाएब.’
‘ठीक बा जीजा !’
‘बाकिर ऊ औरत बहुते सुन्दर हियऽ. ओकरा झाँसा में मत आ जइहऽ.’
‘अरे, ना जीजा !’
फेर तय बाति के मुताबिक साला पहिले खा लिहलसि. फेर बलभद्दर तिवारी खाना खाए गइलन. खाते-खात ऊ अपना मेहरारू से कहले कि, ‘तनी टटका हरियर मरीचा इनरा पर से तूड़ ले आवऽ.’
मेहरारू पहिले त भाई का रहला का बहाने टाल मटोल कइली त बलभद्दर तिवारी कहले, ‘पिछुआड़ी ओर से चलि जा.’
मेहरारू मान गइली आ चल दिहली पिछुआड़ी का राहे मरीचा तूड़े. एने उनुकर भाईओ ‘सुंदर’ औरत के पकड़े जा फेराक में अकुताइल बइठल रहले. मरीचा तूड़त औरत के देखते ऊ कूद पड़ले आ ओकरा के कस के पकड़ लिहले. ना सिरिफ पकड़िये लिहले ओह औरत के अंग के जहें तहें दबावे सुघरावहु लगले. दबावत सुघरावत चिल्लइलें, ‘जीजा-जीजा ! पकड़ लिहनी. पकड़ लिहनी चोट्टिन के.’
जीजो आराम से लालटेन लिहले चहुँपले. तबले साले साहब औरत के भरपूर दबा-वबा चुकल रहले. बाकिर लालटेन का अँजोर में अपना बहिन के चिह्नत उनुका पर कई घइला पानी पड़ चुकल रहुवे. बहिनो लजाइल रहली बाकिर अतना जरूर समुझ गइली कि ई सगरी कारस्तानी उनुका मजाकिया पतिदेवे के हवे. ऊ तंज करत कहली, ‘रउरो ई सब का सूझत रहेला ?’ ऊ कहली, ‘भाईयो-बहिन के ना छोड़ीं रउरा ?’
‘कइसे छोड़तीं ?’ बलभद्दर तिवारी कहले, ‘तोहरा भाई के बड़हन शिकायत रहुवे कि रउरा हमरा से कवनो मजाक काहे ना करीं त सोचनी कि सूखल-सूखल का करीं, प्रैक्टिकले मजाक कर दीं. से आजु इनकर शिकायतो दूर कर दिहनी.’ कहत ऊ साला का तरफ मुसुकात मुखातिब भइले, ‘दूर हो गइल नू कि कवनो कोर कसर बाकी रहि गइल बा ? रह गइल होखे त उहो पूरा करवा दीं.’
‘का जीजा!’ कहत साला बाबू ओहिजा से सरक लिहले.

ई लतीफा ढोलक मास्टर ठेंठ भोजपुरी में पूरा ड्रामाई अंदाज में ठोंकसु आ पूरा रस भर-भर के. से लोग अघा जाव. अउर एह अघइले में खइनी ठोंकत गणेश तिवारी के हारमोनियम बाज उठे आ ऊ गावे लागसु, ‘रात अंधियारी मैं कैसे आऊं बालम!’ ऊ सुर में अउरी मिठास घोरसु, ‘सास ननद मोरी जनम की दुश्मन कैसे आऊं बालम !’ फेर ऊ गावसु, ‘चदरिया में दगिया कइसे लागल/ना घरे रहलें बारे बलमुआ, ना देवरा रहै जागल/फेर कइसे दगिया लागल चदरिया में दगिया कइसे लागल!’ ई आ अइसने गाना गा के ऊ लोगन के जइसे दीवाना बना देसु. का पढ़ल-लिखल, का अनपढ़. ऊ फिल्मी गानन के दुतकारबो करसु आ बहुते फरमाइश पर कबो कभार फिल्मीओ गा देसु पूरा भाष्य दे-दे के. जइसे कि जब ऊ “पाकीजा” फिल्म के गाना ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मोरा’ गावसु त एह तोपाइल तकलीफ आ ओकर तंजो अपना वाचन में बांचसु आ कहसु कि, ‘बाकिर लोग एह गाना में ओह औरत के तकलीफ ना देखसु, मजा लेबेलें. तब जब कि ऊ बजजवा, रंगरेजवा आ सिपहिया सभका के घेरा में लेले. ओकर दुपट्टा, दुपट्टा ना ओकर इज्जत हवे.’ उनुका एह वाचन में डूब के एह गाना सुने के रंगे दोसर हो जाउ. अइसही तमाम निर्गुणो ऊ एही ‘ठाठ’ में सुनावसु आ रहि-रहि के जुमलेबाजीओ कसत रहसु. आ आखिर में तमाम क्षेपक कथा अपना गायकी में गूंथत गावसु, ‘अंत में निकला ये परिणाम राम से बड़ा राम का नाम.’ कुछ पौराणिक कथो के ऊ अपना गायकी में ले आवसु. जइसे पांडवन के अज्ञातवास के एगो प्रसंग उठावसु जवना में अर्जुन आ उर्वशी प्रकरण आवे. ओहमें उर्वशी जब अर्जुन से एगो वर मांगत अर्जुन से एगो बेटा मांग बइठस त अर्जुन मान जासु. आ जवन युक्ति निकालस ओकरा के गणेश तिवारी अइसे लयकारी में गावसु, ‘तू जो मेरी मां बन जा, मैं ही तेरा लाल बनूं.’ एह गायकी में ऊ जइसे एह प्रसंग के दृश्य-दर-दृश्य उपस्थित करा देसु त लोग लाजवाब हो जाव. ऊ अपना ‘प्रोग्राम’ में भोजपुरी के तमाम पांरपरिक लोकगीतो के थाती का तरह इस्तेमाल करसु. सोहर, लचारी, सावन, गारी कुछऊ ना छोड़सु आ पूरा ‘पन’ से गावसु. बाते बात में केहु लोक कवि के चर्चा चला देव त ऊ कहसु, ‘अरे ऊ तो हमरा चेला है ! बहुते सिखाया पढ़ाया.’ ऊ जइसे जोड़सु, ‘पहिले बहुते बढ़िया गावत रहे. अतना कि कबो कबो हमरा लागे कि हमरो से बढ़िया मत निकल जाव ! आगे मत निकल जाव, हम ई सोच के जरत रहनी ओकरा से. बाकिर ससुरा छितरा गइल.’ ऊ कहसु, ‘अब त लखनऊ में आर्केस्ट्रा खोल के लौंड़ियन के नचा के कमात खात बा. एह लौड़ियन के नचा के दू चार गो गाना अपनहु गा लेला.’ कहत ओ आह भरे लागसि, ‘बाकिर ससुरा भोजपुरी के बेंच दिहलसि. नेतवन के चाकरी करत नाम आ इनाम कमात बा त लौड़ियन के नचा के रुपिया कमात बा. मोटर गाड़ी से चलेला. हवाई जहाज में उड़ेला. विदेश जाला. माने कुल्ह ई कि बड़का आदमी बन गइल बा. नसीब वाला बा. बाकिर कलाकार अब ना रहि गइल, व्यापारी बन गइल बा. तकलीफ एही बाति के बावे.’ ऊ कहसु, ‘हमार चेला ह से नाक हमरो कटेला.’

लेकिन लोक कवि?

लोक कवि ई य मानसु कि गणेश तिवारी उनुका से बहुते बढ़िया गावेलें आ कि बहुते मीठ गला हवे उनुकर. बाकिर ‘चेला’ के बाति आवते लोक कवि करीब बिदक जासु. कहसु, ‘ब्राह्मण हउवें. पूजनीय हउवें बाकिर हम उनुकर चेला ना हईं. ऊ हमरा के कुछ सिखवले नइखन. उलुटे गांव में रहत रहीं त नान्ह जाति कहिके ‘काटत’ रहले. हँ, ई जरूर रहे कि हमरा के दुई चार गाना जरूर ऊ बतवले जवन हम ना जानत रहीं आ पीपर का फेंड़ का नीचे गाना बजाना में हमरो के गावे के मौका देत रहले.’ ऊ जोड़सु, ‘अब एह तरह ऊ अपना के हमार गुरु मानेलें त हमरो कवनो ऐतराज नइखे. बाकी गांव के बुजुर्ग हउवें, ब्राह्मण हउवें, हम आगे का कहीं ?’

लोक कवि त ई सब कुछ गणेश तिवारी का पीठ पाछा कहसु. सोझा रहसु त चुप रहसु. बलुक जब गणेश तिवारी लोक कवि के देखसु त देखते गोहारसु, ‘का रे चेला!’ आ लोक कवि उनुकर गोड़ छूवत कहसु, ‘पालागी पंडित जी!’ आ ऊ ‘जियो चेला! जीते रहो ख़ूब नाम और यश कमाओ!’ कहि के आशीर्वाद दिहल करसु. लोक कवि अपना जेब का मुताबिक सौ-दू सौ, चार सौ पांच सौ रुपिया धीरे से उनुका गोड़ पर रख देसु जवना के गणेश तिवारी ओहि ख़ामोशी से रख लेसु. बाति आइल गइल हो जाव.

एहसान फरामोशी के इहो एगो पराकाष्ठा रहुवे.

बाकिर गणेश तिवारी त अइसने रहले, अइसहीं रहे वाला रहले. गांव में उनुका पट्टीदारी के एगो आदमी फौज में रहल. रिटायर भइला के कुछ समय पहिले ओकरा रंगरूट भरती के काम मिल गइल. खूब पइसा पीटलसि. गांव में आ के खूब बड़हन दू मंजिला घर बनवलसि. पइसा के गरमी साफे लउके. जीपो वगैरह ख़रीदलस. ओह फौजी के पत्नी खेत ख़रीदे के बाति चलवलसि त फौजी एही विलेज बैरिस्टर गणेश तिवारी से खेत ख़रीदे के चरचा कइले. काहेकि गणेश तिवारी के गांवे भर के का पूरा जवार के लोग के खसरा खतियौनी, रकबा, मालियत पुश्त-दर-पुश्त जबानी याद रहुवे. एही बिना पर ऊ कब केकरा के लड़वा देसु, केकरा के कवना में अझुरा देसु, कुछ ठिकाना ना रहत रहुवे. त फौजी के इहे सुरक्षित लागल कि गणेश तिवारी के अँगुरी पकड़ के खेत ख़रीदल जाव. गणेश तिवारी आनन फानन उनुका के पाँच लाख में पांच बिगहा खेत ख़रीदवाइयो दिहलें. रजिस्ट्री वगैरह हो गइल तबहियो फौजी गणेश तिवारी का मद में गांठ ना खोललसि. त फेर एक दिन गणेश तिवारी खुदही मुंह खोल दिहले, ‘बेटा पचीस हजार रुपिया हमरो के दे द.’
‘से त ठीक बा.’ फौजी कहलसि, ‘बाकिर कवना बाति के ?’
‘कवना बाति के ?’ गणेश तिवारी बिदकले, ‘अरे कवनो भीख भा उधार थोड़े मांगत बानी. मेहनत कइले बानी. आपन सब काम बिलवा के, दुनिया भर के अकाज करिके दउड़ भाग कइले बानी त मेहनत के माँगत बानी.’
‘त अब हमहीं रह गइल रहनी दलाली वसूले ख़ातिर ? फौजी भड़क के कहलसि, ‘लाजो नइखे लागत पट्टीदारी में दलाली मांगत?’
‘लजा तू, जे मेहनताना के दलाली बतावत बाड़ऽ.’
‘काहे के लाज करीं ?’
‘त चलऽ दलालिये समुझ के सही, पइसवा दे द !’ गणेश तिवारी कहले, ‘हमहीं बेशर्म हो जात बानी.’
‘बेशर्म होईं भा बेरहम. हम दलाली के मद में एको पइसा ना देब.’
‘ना देबऽ त बाद में झँखबऽ.’ गणेश तिवारी जोड़ले, ‘रोअबऽ आ रोवलो पर रोआई ना आई !’
‘धमकी मत दीं. फौजी आदमी हँई कवनो ऐरा गैरा ना.’
‘फौजी ना, कलंक हउवऽ!’ ऊ कहले, ‘जवानन ला भरती में घूस कमा के आइल बाड़ऽ. गवर्मेंट के बता देब त जेल में चक्की पीसबऽ.’ ऊ एक बेर फेरु चेतवले कि, ‘पइसा दे द ना त बहुते पछतइबऽ. बहुते रोअबऽ.’
‘ना देब.‘ फौजी झिड़कत कहलसि, ‘एक बेर ना, सौ बेर कहत बानी कि ना देब. रहल बाति गवर्मेंट के त हम अब रिटायर हो गइल बानी. फंड-वंड सब ले चुकल बानी. गवर्मेंट ना, गवर्मेंट के बाप से कहि दऽ हमार कुछ बिगड़े वाला नइखे.’
‘गवर्मेंट के छोड़ऽ, खेतवे में रो देबऽ.’
‘जाईं जवन उखाड़े के होखे उखाड़ लीं. बाकिर हम एको पइसा नइखीं देबे वाला.’
‘पइसा कइसे देबऽ?’ ऊ हार के कहले, ‘तोहरा नसीब में रोवल जे लिखल बा.’ कहिके गणेश तिवारी चुपचाप चल अइले अपना घरे. ख़ामोश रहले कुछ दिन. बाकिर साँच में ख़ामोश ना रहले. एने फौजी अपना पुश्तैनी खेतन का साथही ख़रीदलो खेत के बड़ जोरदार तइयारी से बोआई करववलसि. खेत जब जोता बोआ गइल त गणेश तिवारी एक दिन ख़ामोश नजर से खेत के देखिओ अइले. बाकिर जाहिरा तौर पर अबहियो कुछ ना कहले.
एक रात अचानक ऊ अपना हरवाहा के बोलववले. ऊ आइल त ओकरा के भेज के ओह आदमी के बोलववले जेकरा से फौजी खेत खरीदले रहल. ऊ आइओ गइल. आवते गणेश तिवारी के गोड़ छूवलसि आ किनारा जमीने पर उकडूं बइठ गइल.
‘का रे पोलदना का हाल बा तोर?’ तनि प्यार के चासनी घोरत आधे सुर में पूछलन गणेश तिवारी.
‘बस बाबा, राउर आशीर्वाद बा.’
‘अउर का होत बा ?’
‘कुछ ना बाबा! अब तो खेतियो बारी ना रहल. का करबग भला? बइठल-बइठल दिन काटत बानी.’
‘काहें तोर लड़िका बंबई से लवटि आइल का ?’
‘ना बाबा, ऊ त ओहिजे बा.’
‘त तूहु काहे ना बंबई चल जात ?’
‘का करब ओहिजा जा के बाबा ! उहँवा बहुते सांसत बा.’
‘कवने बाति के सांसत बा ?’
‘रहे खाये के. हगे मूते के. पानी पीढ़ा के. सगरी के सांसत बा.’
‘त एहिजा सांसत नइखे का ?’
‘एह कुल्हि के सांसत त नहियै बा.’ ऊ रुकल आ फेर कहलसि, ‘बस खेतवा बेंच दिहला से काम काज कम हो गइल बा. निठल्ला हो गइल बानी.’
‘अच्छा पोलादन ई बताव कि जे तोर खेत तोरा फेरू वापसि मिल जाव त ?’
‘अरे का कहत हईं बाबा!’ ओ आंख सिकोड़त कहलसि, ‘अबले त ढेरे पइसो चाट गइल बानी.’
‘का कइलिस रे?’
‘घर बनवा दिहनी.’ ऊ मुदुकात कहलसि, ‘पक्का घर बनवले बानी.’
‘त कुल्हि रुपिया घरही में फूंक दिहलिस ?’
‘नाहीं बाबा! दू ठो भईंसियो ख़रीदले बानी.‘
‘त कुच्छू पइसा नइखे बाँचल ?’ जइसे आह भरि के गणेश तिवारी पूछले, ‘कुच्छू ना !’
‘नाहीं बाबा तीस-चालीस हजार त अबहिनो हौ. बकिर ऊ नतिनी के बियाह ख़ातिर बचवले बानी.’
‘बचवले बाड़ऽ नू ?’ जइसे गणेश तिवारी के सांस लवटि आइल. ऊ कहले, ‘तब त काम हो जाई.’’
‘कवन काम हो जाई.’ अचकचा के पोलादन पूछलसि.
‘तें बुड़बक हइस. तें ना समुझबे. ले, सुरती बनाव पहिले.’ कहके जोर से हवा ख़ारिज कइलन गणेश तिवारी. पोलादन नीचे बइठल चूना लगा के सुरती मले लागल. आ गणेश तिवारी खटिया पर बइठले-बइठल बइठे के दिशा बदललन आ एक बेर फेरू हवा ख़ारिज कइलन बाकिर अबकी तनिका धीरे से. फेर पोलादन से एक बीड़ा सुरती ले के मुंह में जीभ तर दबावत कहले, ‘अच्छा पोलदना ई बताव कि अगर तो खेतो तोरा वापिस मिल जाव आ तोरा पइसा वापिसो करे के ना पड़े त ?’
‘ई कइसे हो जाई बाबा?’ पूछत पोलादन हांफे लागल आ दउड़ के गणेश तिवारी के गोड़ पकड़ बइठल.
‘ठीक से बइठ, ठीक से.’ ऊ कहले, ‘घबराव जिन.’
‘लेकिन बाबा सहियै अइसन हो जाई.’
‘हो जाई बाकिर….!’
‘बाकिर का ?’ ऊ विह्वल हो गइल.
‘कुछ खर्चा-बर्चा लागी.’
‘केतना?’ कहत ऊ तनिका ढीला पड़ गइल.
‘घबरा मत.’ ओकरा के तोस देत ऊ अंगुरी पर गिनती गिनत धीरे से कहले, ‘इहे कवनो तीस चालीस हजार !’
‘एतना रुपया?’ कहत पोलादन निढाल हो के मुँह बा दिहलसि. पोलादन के ई चेहरा देख गणेश तिवारी ओकर मनोविज्ञान समुझ गइलन. आवाज तनिका अउर धीमा कइले. कहले, ‘सगरी पइसा एके साथ ना लागी.’ तनि रुकले आ फेर कहले, ‘अबहीं तू पचीस हजार रुपिया दे द. हाकिम हुक्काम के सुंघावत बानी. फेर बाकी तूं काम भइला का बादे दीहऽ.’
‘बाकिर काम हो जाई?’ ओकरा सांस में जइसे सांस आ गइल. कहलसि, ‘खेतवा मिलि जाई?’
‘बिलकुल मिलि जाई.’ ऊ कहले, ‘बेफिकिर हो जा.’
‘नाईं. मनो हम एह नाते कहत रहनी जे कि ऊ फौजी बाबा खेतवा जोत बो लिए हैं.’
‘खेतवा बोवले नू बाड़न ?’
‘हँ, बाबा!’
‘कटले त नइखन ?’
‘अबहिन काटे लायक हईये नइखे.’
‘त जो. खेत बोवले जरूर बावे ऊ पागल फौजी, बाकिर कटबऽ तू.’ ऊ कुछ रुक के कहले, ‘बाकी पइसा तूं जल्दी से जल्दी ला के गिन जा !’
‘ठीक बा बाबा!’ ऊ तनि मेहराइल आवाज में कहलसि.
‘इ बतावऽ कि हमरा पर तोहरा भरोसा त बा नू ?’
‘पूरा-पूरा बाबा.’ ऊ कहलसि, ‘अपनहू से जियादा.’
‘तब इहां से जो! अउर हमरे साथे-साथे अपनहू पर विश्वास राख. तोर किस्मत बहुतै बुलंद बा.’ ऊ कहलें, ‘रातो बेसी हो गइल बा.’
रात साँचहु बेसी हो गइल रहे. ऊ उनुकर गोड़ छू के जाये लागल.
‘अरे पोलदना हे सुन!’ जात-जात अचानके गणेश तिवारी ओकरा के गोहरा पड़ले.
‘हँ, बाबा!’ ऊ पलटि के भागत आइल.
‘अब एह बाति पर कहीं गांजा पी के पंचाइत मत करे लगीहे !’
‘नाहीं बाबा!’
‘ना ही अपना मेहरारू, पतोह, नात-रिश्तेदार से राय बटोरे लगीहे.’
‘काहें बाबा!’
‘अब जेतना कहत बानी वोतने कर.’ ऊ कहले, ‘ई बाति हमरे तोरा बीचे रहल चाहीं . कवनो तिसरइत के एकर भनको जन लागे.’
‘ठीक बा बाबा!’
‘हँ, नाहीं त बनल बनावल काम बिगड़ जाई.’
‘नाहीं हम केहू से कुछ नाहीं कहब.’
‘त अब इहां से जो और जेतना जल्दी हो सकै पइसा दे जो!’ ऊ फेर चेतवले, ‘केहू से कवनो चर्चा नइखे करे के.’
‘जइसन हुकुम बाबा!’ कहि के ऊ फेर से गणेश तिवारी के दुनु गोड़ छूवलसि आ दबे पाँव चल गइल.

पोलादन चल त आइल गणेश तिवारी का घर से. लेकिन भर रास्ता उनुकर नीयत थाहता रहे. सोचत रहे कि कहीं अइसन ना होखे कि पइसवो चल जाव आ खेतवो ना मिले. ‘माया मिले न राम’ वाला मामिला मत हो जाव. ऊ एहु बाति पर बारहा सोचत रहे कि आखि़र गणेश बाबा फौजी का जोतल बोअल खेत जवन ऊ खुदे बैनामा कइले बा पांच लाख रुपिया नकद ले कर, ओकरा वापिस कइसे मिल जाई भला ? ओ एही बिंदु पर बार-बार सोचता रहुवे. सोचता रहे लेकिन ओकरा कुछ बूझात ना रहुवे. आखिर में हार मान के ऊ सीधे-सीधे इहे मान लिहलसि कि गणेश बाबा के तिकड़मी बुद्धिए कुछ कर देव त खेत मिली बिना पइसा दिहले. बाकिर ओकरा कवनो रास्ता ना लउकत रहे. एही उधेड़बुन में ऊ घरे पहुंचल.

तीन चार दिन एही उधेड़बुन में रहल. रातों में ओकरा आंखिं में नींद ना उतरे. इहे सब ऊ सोचता रहि जाव. ओकरा लागल कि ऊ पागल हो जाई. बार-बार सोचे कि कहीं गणेश तिवारी ओकरा के ठगत त नइखन ? कि पइसवो ले लेसु आ खेतवो न मिलै? काहे से कि उनुका ठगी विद्या के कवनो पार ना रहे. एह विद्या का ओते कब ऊ केकरा के डँस लीहें एकर थाह ना लागत रहुवे. फेर ऊ इहो सोचे आ बार-बार सोचे कि आखि़र कवना कानून से गणेश बाबा पइसा बिना वापिस दिहले फौजी बाबा के जोतल बोवल खेत काटे खातिर वापिस दिआ दीहें ? तब जब कि ऊ बाकायदा रंगीन फोटो लगा के रजिस्ट्री करवा चुकल बा. फेर ऊ सोचलसि कि का पता गणेश बाबा ओकरा बहाने फौजी बाबा के अपना ठगी विद्या से डंसत होखसु ? पट्टीदारी के कवनो हिसाब किताब बराबर करत होखसु ? हो न हो इहे बाति होखी ! ई ध्यान आवते ऊ उठ खड़ा भइल. अधरतिया हो चुकल रहे तबहियो ऊ अधरतिया के खयाल ना कइलसि. सूतल मेहरारू के जगवलसि, बक्सा खोलववलसि, बीस हजार रुपिया निकलववलसि आ ले के चहुँप गइल गणेश तिवारी का घरे.

पहुंच के कुंडा खटखटवलसि गँवे गँवे.
‘कौन ह रे?’ आधा जागल, आधा निंदिआइल तिवराइन जम्हाई लेत पूछली.
‘पालागी पँड़ाइन ! पोलादन हईं.’
‘का ह रे पोलदना! ई आधी रात क का बाति परि गईल?’
‘बाबा से कुछ जरूरी बाति बा!’ ओ जोड़लसि, ‘बहुते जरूरी. जगा देईं.’
‘अइसन कवन जरूरी बाति बा जे भोरे नइखे हो सकत. अधिए रात के होई?’ पल्लू आ अँछरा ठीक करत आंचल ठीक करत ऊ कहली.
‘काम अइसनै बा पँड़ाइन !’
‘त रुक, जगावत हईं.’
कहि के पंडिताइन अपना पति के जगावे चल गइली. नींद टूटते गणेश तिवारी बउरइले, ‘कवन अभागा एह अधरतिया आइल बा ?’
‘पोलदना ह.’ सकुचात पंडिताइन कहली, ‘चिल्लात काहें हईं ?’
‘अच्छा-अच्छा बइठाव सारे के बइठका में आ बत्ती जरा द.’ कहिके ऊ धोती ठीक करे लगले. फेर मारकीन के बनियाइन पहिरले, कुर्ता कान्हे रखले आ खांसत खंखारत बाहर अइले. बोली में तनि मिठास घोरत पूछले, ‘का रे पोलदना सारे, तोरा नींद ना आवेला का?’ तखत पर बइठत खंखारत ऊ धीरे से कहले, ‘हां, बोल कवन पहाड़ टूट गइल जवन तें आधी रात आ के जगा दिहले?’
‘कुछऊ नाहीं बाबा!’ गणेश तिवारी के दुनु गोड़ छूवत ऊंकड़ई बइठत बोलल, ‘ओही कमवा बदे आइल हईं बाबा.’
‘अइसै फोकट में?’ गणेश तिवारी के बोली तनिका कड़ा भइल.
‘ना बाबा. हई पइसा ले आइल हईं.’ धोती के फेंट से रुपिया के गड्डी निकालत कहलसि.
‘बावे कतना?’ कुछ-कुछ टटोरत, कुछ-कुछ गुरेरत ऊ कहले.
‘बीस हजार रुपिया!’ऊ खुसफुसाइल.
‘बस!’
‘बस धीरे-धीरे अउरो देब.’ ऊ आंखें मिचमिचात बोललसि, ‘जइसे-जइसे कमवा बढ़ी, तइसे-तइसे.’
‘बनिया के दोकान बुझले बाड़े का ?’
‘नाहीं बाबा! राम-राम!’
‘त कवनो कर्जा खोज के देवे के बा ?’
‘नाहीं बाबा.’
‘त हमरा पर विश्वास नइखे का?’
‘राम-राम! अपनहू से जियादा!’
‘तब्बो नौटंकी फइलावत बाड़े !’ ऊ आंख तरेर के कहले, ‘फौजी पंडित के पांच लाख घोंटबे आ तीसो चालीस हजार खरचे में फाटत बा तोर !’
‘बाबा जइसन हुकुम देईं.’
‘सबेरे दस हजार अउरी दे जो !’ ऊ कहले, ‘फेर हम बताएब. बाकिर बाकीओ पइसा तइयारे रखीहे !’
‘ठीक बा बाबा!’ ऊ मन मार के कहलसि.
‘अउर बाति एने-ओने मत करीहे.’
‘नाहीं-नाहीं. बिलकुले ना.’
‘ठीक बा. त जो!’
‘बाकिर बाबा काम हो जाई भला?’
‘काहें ना होई?’
‘मनो होई कइसे?’ ऊ थोड़का थाहे का गरज से बोलल.
‘इहै जान जइते घोड़न त पोलादन पासी काहें होखते?’ ऊ तनि मुसुकात, तनि इतरात कहले, ‘गणेश तिवारी हो जइते!’
‘राम-राम आप के हम कहां पाइब भला.’ ऊ उनुकर गोड़ धरत कहलसि.
‘जो अब घरे!’ ऊ हंसत कहले, ‘बुद्धि जेतना बा, वोतने में रह. जादा बुद्धि के घोड़ा मत दउड़ाव!’ ऊ कहले, ‘आखि़र हम काहें ख़ातिर बानी ?’
‘पालागी बाबा!’ कहि के ऊ गणेश तिवारी के गोड़ लगलसि आ चल गइल.
दोसरा दिन फजीरही फेर दस हजार रुपए लेके आइल त गणेश तिवारी तीन चार गो सादा कागज पर ओकरा अंगूठा के निशान लगवा लिहले.
ऊ फेर घरे चल आइल. धकधकात मन लिहले कि का जाने का होखी. पइसा डूबी कि बाँची.


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एगो जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

लोक कवि अब गाते नहीं – १४

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

तेरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
कि कइसे लोक कवि के भतीजा एड्स के शिकार हो गइल रहुवे. रोजी रोटी कमाए परदेस गइल आदमी कइसे छन भर के आनन्द खातिर भर जिनिगी के दुख बिटोर लेता. लोक कवि के मित्र चेयरमैन साहब सलाह देत बाड़न कि कुछ पुण्य कमाये खातिर कवनो ब्राह्मण के बेटी के बिआह करवा द. एह सलाह पर जब लोक कवि का मुँह से चिहा के निकल गइल कि “का ?” अब आगे पढ़ीं…


‘हँ, तोहरा कवनो बेटी हइयो नइखे.’ चेयरमैन साहब कहले, ‘बेसी पैसा मत खरच करऽ. पचीस-पचास हजार जवन तोहरा श्रद्धा में रुचे जा के बुढ़िया पंडिताइन के दे आवऽ ई कहि के कि बिटिया के बिआह कर दीं !’ ऊ इहो कहलन कि, ‘हमहू कुछ दस-पांच हजार कर देब. हालांकि पचास साठ हजार में लड़िकी के शादी त होत नइखे आजु काल्ह. लेकिन उत्तम मद्धिम कुछ त होइये जाई.’ चेयरमैन साहब कहत रहले, ‘अबहीं तूहीं कहत रहुवऽ कि बिआह ना भइल त बाप का राहे चलि के रंडी हो जाई ! तू इहे सोच ल कि ओकरा के रंडी का राह नइखे जाये देबे के. कुछ तू करऽ, कुछ हमहूं करऽतानी. दू चार अउरियो लोग से कहब, बाकी ओकर नसीब !’

‘बाकिर गांव में एह तरे समाज सेवा करब त बिला जाएब.’ लोक कवि संकोच घोरत कहले, ‘हर घर में कवनो ना कवनो समस्या बा. त हम केकर-केकर मदद करब ? जेकर करब, ऊ त खुस हो जाई. जेकरा के मना करब ऊ दुसमन हो जाई ! एह तरे त सगरी गांव हमार दुसमन हो जाई !’

‘एह पुण्य काम खातिर तू पूरा दुनिया के दुसमन बना लऽ.’ चेयरमैन साहब कहले, ‘आ फेर कवनो जरूरी बा का कि तू ई मदद डंका पीट के करऽ. चुपेचाप कर द. गुप-चुप ! केहू जाने ना !’ ऊ कहले, ‘दुनिया भर के रंडियन पर पइसा उड़ावेलऽ त एगो लड़िकी के रंडी बनला से बचावे खातिर कुछ पइसा खरच कर के देखऽ.’ चेयरमैन साहब लोक कवि के नस पकड़त कहले, ‘का पता एह लड़िकी के आशीर्वाद से, एकरा पुण्ये से, तोहार लड़खड़ात मार्केट सम्हरि जाव !’ ऊ कहले, ‘कर के देखऽ ! एहमें सुखो मिली आ मजो आई.’ फेर ऊ तंज कसत कहले, ‘ना होखे त ‘मिसिराइनो’ से मशविरा ले लऽ. देखीहऽ उहो एहला मना ना करी.’

लोक कवि मिसिराइन से त मशविरा ना कइलन बाकिर लगातार एह बारे में सोचत रहलन आ एक दिन अचानके चेयरमैन साहब के फोन मिला के कहले, ‘चेयरमैन साहब हम पचास हजार रुपया खर्चा काट-काट के जोड़ लिहले बानी !’
‘काहे खातिर बे ?’
‘अरे, ओह ब्राह्मण के बेटी के रंडी बने से बचावे खातिर !’ लोक कवि कहले, ‘भूला गइनी का ? अरे, ओकरा शादी खातिर आप ही त बोलले रहीं !’
‘अरे, हँ भाई. हम त भुलाइये गइल रहीं !’ ऊ कहले, ‘चलऽ तू पचास देत बाड़ऽ त पंद्रह हजार हमहू दे देब. दू एक अउरियो लोगन से दस बीस हजार दिलवा देब. कुछ अउरियो करतीं लेकिन हाथ एने तनी तंग बा, मेहरारू के बीमारी में खर्चा बेसी लाग गइल बा. तबहियो तू जहिया कहबऽ पइसा दे देब. एतना पइसा त अबही हमरा पासे बा. कवनो लौंडा के भेज के मंगवा लऽ !’
‘ठीक बा चेयरमैन साहब !’ कह के लोक कवि उनुका किहाँ से पंद्रह हजार रुपिया मंगवा लिहलन. दू जगह से पांच-पांच हजार अउर एक जगह से दस हजार रुपिया चेयरमैन साहब अउरी दिलवा दिहलन. एह तरह पैंतीस हजार रुपिया ऊ आ पचास हजार रुपिया आपन मिला के कुल पचासी हजार रुपिया ले जा के लोक कवि पंडिताइन के दिहलन. ई कहि के कि, ‘पंडित जी के बड़ उपकार बा हमरा पर. नतिनी के बिआह ख़ातिर ले लीं ! ख़ूब धूमधाम से शादी करीं !’

बाकिर पंडिताइन अड़ गइली. पइसा लेबे से मना कर दिहली. कहली कि पंडित जी तोहरा पर का उपकार कइलन हम नइखीं जानत. बाकिर ई तोहार एहसानो हम ना लेब. ऊ माथ पर पल्लू खींचत कहली, ‘गांव का कही भला ? केकर-केकर ताना सुनब ! बेटवा के कलंक क ताना अबहिन ले नइखै ख़त्म भइल. त अब नतिनी ख़ातिर ताना हम नाई सुनब.’ ऊ कहत रहली, ‘ताना सुनले के पहिलवैं कुआं में कूद के मरि जाइब !’ कह के ऊ रोवे लगली. कहली, ‘पंडित जी बेचारे जेल भले भुगत रहल बाटैं बकिर उन के केहु कतली नइखै कहत. सब कहेला जे उनुका के गलत फंसावल गइल बा ! त उनुका इज्जत से हमरो इज्जत रहेले. बाकिर बेटा बट्टा लगा गइल त करम फूट गइल !’ कह के पंडिताइन फेर रोवे लगली. कहली, ‘एतना रुपया हम राखब कहां ? हम नाई लेब !’
‘आखि़र दिक्कत का बा ?’
‘दिक्कत ई हवे कि सुनीलें तू लड़िकिन के कारोबार करेलऽ अउर हमर नतिनी ई कारोबार नाहीं करी. ऊ नाईं नाची कूदी तोहरे कारोबार में !’
सुनिके लोक कवि एक बेर त सकता में पड़ गइले. बाकिर कहले, ‘आप के नतिनी के हम कहीं ना ले जाइब.’ लोक कवि पंडिताइन के दिक्कर समुझत कहले, ‘बिआहो आपे अपना मर्जी से जहां चाहीं, जइसे चाहीं तय कर के कर लेब. बाकिर ई पइसा रख लीहीं आप. कामे आई !’ कह के लोक कवि पंडिताइन का गोड़ पर आपन माथा राख दिहलन, ‘बस ब्राह्मण देवता क आशीर्वाद चाहीं !’
बाकिर पंडिताइन अड़ली त अड़ली रह गइली. पइसा लिहल त दूर, छुअबो ना कइली.
लोक कवि दुखी मन से वापिस लवटि अइलन.

चेयरमैन साहब के घरे जाके उनुका के उनुकर दिहल पैंतीस हजार वापिस करे लगलन त चेयरमैन साहब भड़कले, ‘ई का हो गइल रे तोरा !’
‘कुछ नाहीं।’ लोक कवि उदास होत कहले, ‘दरअसल हमार गांव हमरा के समुझ ना पवलसि !’
‘भइल का ?’
‘तबकी सम्मान के बाद गइल रहीं त लोग नचनिया पदनिया कहे लागल रहे !’
‘अबकी का भइल ?’ चेयरमैन साहब लोक कवि के बात बीचे में काटत कहले.
‘अबकी लड़िकियन के दलाल बन गइनी !’ कह के लोक कवि रोवलें त बा बाकिर अनसा जरूर गइले.
‘के बोलल तोरा के लड़िकियन के दलाल ? ओकर ख़ून पी जाएब !’ चेयरमैन साहब खिसियात कहले.
‘नाहीं केहू एकदमै से दलाल शब्द नाहीं बोलल !’
‘त ?’
‘लेकिन ई कहल कि हम लड़िकियन के कारोबार करीलें ।’ लोक कवि निढाल परत कहले, ‘सीधे-सीधे एकर मतलब दलाले नू भइल ?’
‘के बोलल कि तूं लड़िकियन के कारोबार करे ल ?’ चेयरमैन साहब के खीस फफनाइले रहल.
‘अउर के !’ लोक कवि कहलें, ‘उहे पंडिताइन कहली आ ई पइसा लेबे से मना कर दिहली.”
‘काहे ?’
‘पंडिताइन कहली कि सुनले बानी कि तू लड़िकियन के कारोबार करेलऽ आ हमार नतिनी ई कारोबार नाहीं करी !’ लोक कवि खीझियात कहले, ‘बताईं, हमनी का सोचले रहीं कि ओकरा के गरीबी के फेर में रंडी बने से बचावल जाव आ पंडिताइन उलटे हमरे पर आरोप लगा दिहली कि हम उनुका नतिनी के रंडी बना देब !’ ऊ कहत रहले, ‘तबहियो हम खराब ना मनलीं. ई सोच के कि पुण्य के काम में बाधा आई. त एकरा के बाधा मान के टार गइनी. फेर हम इहो बतवनी कि उनुका नतिनी के हम कहीं ना ले जायब आ कि बिआहो ऊ अपना मर्जी से जहां चाहसु करसु. हमरा से कवनो मतलब नइखे. उनुका गोड़ पर माथा राख के कहबो कइनी कि बस ब्राह्मण देवता क आशीर्वाद चाहीं !’
‘एकमे बऊड़म हउव तू !’ चेयरमैन साहब कहले, ‘देवी के देवता कहबऽ आ आशीर्वाद मँगबऽ त के दी ?’
‘एहमें का गलत हो गइल ?’ लोक कवि दरअसल चेयरमैन साहब के देवी देवता वाली बात समुझले ना.
‘चलऽ कुछऊ गलत ना कइलऽ तू !’ ऊ कहले, ‘गलती हमरा से हो गइल जे एह काम ख़ातिर तोहरा के अकेले भेज दिहनी.’
‘त का अब आप चलब ?’
‘हँ हमहू चलब आ तूहूं चलबऽ.’ ऊ कहले, ‘लेकिन दस बीस दिन रुक के.’
‘हम तो नाहीं जाएब चेयरमैन साहब !’ लोक कवि कहले, ‘जबे गांव जानीं बेइज्जत हो जाइले !’
‘देखऽ, नेक काम ला बेइज्जत होखे में कवनो बुराई नइखे. एगो नेक काम हाथ में लिहले बाड़ऽ त ओकरा के पूरा कर के छोड़ऽ.’ ऊ कहले, ‘फेर तू हर बाति में इज्जत बेइज्जत मत खोजल करऽ ! ओह बेर नचनिया पदनिया पर दुखी हो गइलऽ तू. सम्मान के सगरी मजा ख़राब कर दिहल.’ तनिका रूक के ऊ फेर कहले, ‘ई बतावऽ कि तू अमिताभ बच्चन के कलाकार माने लऽ ?’
‘हँ, बहुते बड़हन कलाकार हउवन ऊ !’
‘तोहरो ले बड़हन ?’ चेयरमैन साहब मजा लेत पूछलें.
‘अरे कहां हम चेयरमैन साहब, अउर कहवाँ ऊ ! काहें मजाक उड़ावत बानीं.’
‘चलऽ केहू के त तू अपना ले बड़हन कलाकार मनलऽ !’ चेयरमैन साहब कहलें, ‘त इहे अमिताभ बच्चन जब 1984 में इलाहाबाद से चुनाव लड़ले बहुगुणा का खि़लाफ त का अख़बार, का नेता सबही इहे कहत रहल कि नचनिया पदनिया ह चुनाव का जीती ! हँ, थोड़ बहुत नाच कूद ली. लेकिन ऊ बहुगुणा जइसन दिग्गज के जब धूड़ि चटा दिहले, चुनाव हरा दिहलन त लोग के मुँह बंद हो गइल.’ चेयरमैन साहब कहलें, ‘त जब एतना बड़हन कलाकार के ई जमाना नचनिया पदनिया कह सकेला त तोहरा के काहे नाहीं कह सके ?’ ऊ कहले, ‘फेर ऊ इलाहाबाद जहवाँ अमिताभ बच्चन के घर बा, ऊ अपना के इलाहाबादी मानेला अउर इलाहाबाद वाले ओकरा के से नचनिया पदनिया. तबहियो ऊ बुरा ना मनलें. काहेकि ऊ बड़का कलाकार हउवें. सचमुच में बड़का कलाकार. ओकरा में बड़प्पन बा. ‘ ऊ कहले, ‘तूहूं त अपना में बड़प्पन ले आवऽ आ तनिका मोलायमियत सीखऽ !’
‘बाकिर पंडिताइन….!’
‘कुछउ ना. पंडिताइन तोहरा के कुछ ना कहली. ऊ त अपना नतिनी के हिफाजत भर करत बाड़ी. ओहमें बुरा माने के बात नइखे.’ ऊ कहले, ‘दस बारह दिन बाद हम चलब तोहरा साथे. तब बात करीह. अबही घरे जा, आराम करऽ, रिहर्सल करऽ अउर ई सब भुला जा !’
अउर साचहु लोक कवि चेयरमैन साहब का साथ कुछ दिन बाद एह नेक अभियान पर एक बेर फेरु निकललन. चेयरमैन साहब तनिका तरीका से काम लिहलन. पहिले ऊ लोक कवि के साथे ले के जेल गइलन. ओहिजा पंडित भुल्लन तिवारी से मिललन. पंडित जेल में रहले जरूर पर माथा पर उनुका तेज मौजूद रहे. विपन्नता के चुगली उनुकर रोआं-रोआं करत रहुवे बाकिर ऊ कातिल ना हउवन, इहो उनुकर चेहरा बतावत रहे. ऊ कहे लगलन, ‘दू जून भोजन खातिर हम जरूर एने-ओने जात रहीं बाकिर कवनो अन्यायी का सोझा, कवनो मतलब, कवनो छल खातिर मूड़ी गिरा दीं ई हमरा खून में नइखे, नाही हमरा संस्कार में !’ ऊ कहत रहले, ‘रहल अन्याय-न्याय के बात, त ई ऊपर वाला के हाथ में बा. हम खूनी हँई कि ना, एकर इंसाफ त अब ऊपरे का अदालत में होखी. बाकी रहल एह जेल के अपमान के बात त जरूर कहीं हमरा कवनो पापे के ई फल हऽ.’ साथ ही ऊ इहो जोड़लन, ‘अउर इहो जरूर हमरा कवनो पापे के कुफल रहे कि गोपला जइसन कुकलंकी हमरा वंश में जनमल !’ ई कहत उनुकर आंख डबडबा गइल. गला रुंधिया गइल. फेर ऊ फफक पड़लन.
‘मत रोईं !’ कह के लोक कवि उनुका के सांत्वना दिहलन आ हाथ जोड़ के कहलन कि, ‘पंडित जी एक ठो विनती बा, हमार विनती मान लीं !’
‘ई अभागा पंडित का तोहार मदद कर सकेला ?’
‘आशीर्वाद दे सकीलें.’
‘ऊ त हरमेस सभका साथे बा.’ ऊ रुकलन आ कहले, ‘बाकिर एह अभागा के आशीर्वाद से का तोहार बनि सकेला ?’
‘बन सकेला पंडित जी !’ लोक कवि कहले, ‘पहिले बस अब आप हां कह दीं.’
‘हँ बावे, बोलऽ !’
‘पंडित जी एगो ब्राह्मण कन्या के बिआह करावे के पुण्य पावल चाहत बानी.’ लोक कवि कहले, ‘बिआह आप लोग अपने समाज में अपने मर्जी से तय करीं. बाकिर खरचा बरचा हमरा उपर छोड़ दीं.’
‘ओह ! समझनी.’ भुल्लन पंडित कहले, ‘तू हमरा पर उपकार कइल चाहत बाड़ऽ !’ ई कहत भुल्लन पंडित तल्ख़ हो गइले. कहले, ‘बाकिर कवना खुशी में भाई ?’
‘कुछु ना पंडित जी, ई मूरख हऽ !’ चेयरमैन साहब कहले, ‘नाच गा के त ई बड़ा नाम गांव कमा चुकल बा अउर अब कुछ समाज सेवा कइल चाहत बा. एक पंथ दू काज ! ब्राह्मण के आशीर्वाद आ पुण्य दुनु चाहत बा.’ ऊ कहले, ‘मना मत करब !’
‘बाकिर ई त पंडिताइने बतइहें.’ तौल-तौल के बोलत भुल्लन पंडित कहले, ‘घर गृहस्थी त अब उहे देखत बाड़ी. हम त कैदी हो गइल बानी.’
‘लेकिन मीर मालिक तो आप ही हईं पंडित जी !’
‘रहनी.’ ऊ कहले, ‘अब नइखीं. अब कैदी हईं.’
मुलाकात के समयो खतम हो चुकल रहुवे. भुल्लन पंडित के गोड़ छू के दुनु जने जेल से बाहर अइलन.
‘घर में भूजी भांग नाईं, दुआरे हरि कीर्तन !’
‘का भइल रे लोक कवि ?’
‘कुछु नाई. ई पंडितवे एतना अड़ियाते काहें हैं ? हम आजु ले ना समुझ पवनी.’ लोक कवि कहले, ‘रसरी जर गइल बाकिर अईंठन ना गइल. जेल में नरक भुगतत बाड़न, पंडिताइन भूखों मरत बाड़ी. खाए खातिर गांव में चंदा लागत बा. बाकिर हमार पइसा ना लीहें !’ लोक कवि खीझियात कहले, ”घीव दै बाभन नरियाय! कहां फंसा दिहनी चेयरमैन साहब। अब जाए दीं. ई पइसा कहीं अउर दान दे दिहल जाई. बहुते गरीबी बा. पइसा लेबे ख़ातिर लोग मार कर दीहि.”
‘घबराते काहें बाड़ऽ !’ चेयरमैन साहब कहले, ‘तनिका धीरज राखऽ !’

फिर चेयरमैन साहब लोक कवि के घरे चहुँपले. लोक कवि के घर का रहे, पूरा सराय रहे. उहो लबे सड़क. दरअसल लोक कवि से गांव के लोग के जरतवाही के एगो कारन उनुकर ई पकवा मकानो रहल. छोट जाति के आदमी का लगे अइसन बड़हन पकवा मकान बड़ जाति के लोगन क त खटकते रहे, छोटको जाति के लोगन से हजम ना होत रहुवे. चेयरमैनो साहब एह बात पर अबकी दफा गौर कइलन. बहरहाल, थोड़ देर बाद ऊ लोक कवि के उनुका घरे छोड़ के अकेले उनुका गांव में निकललन. कुछ जिम्मेदार लोग से, जिनका ऊ जानतो ना रहले, भेंट कइलन. उनुकर मन टटोरलन. फेर आपन मकसद बतवलन. बतवलन कि एकरा पाछा कुछ अउर बा, बस मन में आइल मदद के मनसा बा. फेर एह लोगन के ले के लोक कवि का साथे ऊ भुल्लन तिवारी का घरे गइलन. पंडिताइन से मिललन. उनुका खुद्दारी के मान दिहलन. बतवलन कि जेल में पंडितो जी से ऊ लोग मिलल रहे. आपन मनसा बतवले रहे त पंडित जी सब कुछ आपे पर छोड़ दिहलन. फेर उनुकर चिरौरी करत कहलन कि, ‘रउरा मान जाईं त समुझीं कि हमन के गंगा नहा लिहलीं.’ पंडिताइन कुछ बोलली ना. थोड़ देर ले सोचली फेर बिन बोलले आंखे आंख में बात गांववाल न पर छोड़ दिहली. गांव के एगो बुजुर्ग कहले, ‘पंडिताइन भौजी, एहमें कवनो हरज नइखे !’
‘जइसन भगवान क मर्जी!’ हाथ ऊपर उठावत पंडिताइन कहली, ‘अब ई गांव भर क बेटी ह !’
लेकिन पइसा पंडिताइन ना लिहली. बतवली कि जब शादी तय हो जाई तबहिये पइसा का बारे में देखल जाई. फेर गांवही के दू लोग के सुपुर्दगी में ऊ पचासी हजार रुपिया रखवा दिहल गइल. दू तीन लोग शादी खोजे के जिम्मा लिहल. सब कुछ ठीक-ठाक करा लोक कवि अउर चेयरमैन साहब ओहिजा से उठले. चलत-चलत लोक कवि पंडिताइन के गोड़ छुअलन. कहलन कि, ‘शादी में हमहूं के बोलावल जाई !’
‘अ काहें नाहीं!’ पंडिताइन पल्लू ठीक करत कहली.
‘एतने ले नाहीं. कुछ अउरियो उत्तम मद्धिम, घटल बढ़ल होई, उहो बतावल जाई !’
‘अच्छा, मोहन बाबू!’ पंडिताइन के आंखिन में कृतज्ञता झलकल.
लोक कवि अपना गांव से जब लखनऊ ला चललन त उनुका लागत रहे कि साचहु बड़हन पुण्य के काम हो गइल. ऊ अइसने कुछ चेयरमैन साहब से बुदबुदा के बोलबो कइलन, ‘साचहु आजु बड़ा खुसी के दिन बा !’
‘चलऽ भगवान का दया से सब कुछ ठीक-ठाक हो गइल !’ चेयरमैन साहब कहले. आ ड्राइवर से कहलन, ‘लखनऊ चलऽ भाई !’
लेकिन एह पूरा प्रसंग पर अगर कवनो एक आदमी सबसे अँउटाइल रहे, सबले बेसी दुखी रहे त ऊ रहल लोक कवि के छोटका भाई जे कमलेश के पिता रहे. कमलेश के पिता के लागत रहल कि कमलेश के मौत के अगर केहू एक आदमी जिम्मेदार रहल त ऊ गोपाल रहे. आ ओही गोपला के बेटी बियाहे के बेमतलब के खरचा ओकर बड़का भाई मोहन करत रहे जे अब लोक कवि बनल इतराइत चलत बा. कमलेश के पिता के ई सब फूटलो आँखे ना सुहात रहे. बाकिर ऊ बेबस रहे आ चुप रहल. आ ओकरे बड़ भाई ओकरा छाती पर मूंग दलत रहे. नाम गांव कमाए खातिर. बाकिर एने लोक कवि मगन रहले. मगन रहले अपना सफलता पर. कार में चलत ठेका ले-ले के ऊ आपने कवनो गानो गुनगुनात रहले. गदबेर हो चलल रहे. डूबत सूरज के लाल गोला दूर आसमान में तिरात रहल.
लेकिन ऊ कहाला नू कि ‘बड़-बड़ मार कोहबरे बाकी !’
उहे भइल.
सिरिफ पइसा भर से केहु के शादी ब्याह तय हो जाइत त फेर का बात रहीत ? लोक कवि आ चेयरमैन साहब पइसा दे के निश्चित हो गइलन. लेकिन बात साचहु में निश्चिंत होखे के रहल ना. भुल्लन पंडित के नतिनी के शादी एतना आसानी से होखे वाला ना रहल. बाप गोपाल के कलंक अब बेटी के माथे डोलत रहे. शादी खातिर वर पक्ष से सवाल शुरू होखे से पहिलही एड्स के सवाल दउड़त खड़ा हो जाव. कतहिओ लोग जाव, चाहे गांव के लोग होखे भा रिश्तेदार, उनुका से पूछाव कि, ‘आप बेटी के पिता हईं, भाई हईं, के हईं ?’ लोग बतावे कि, ‘ना, गाँव के हईं, पट्टीदार हईं, रिश्तेदार हईं.’ त सवाल उठे कि, ‘भाई, पिता कहां बाड़ें ?’ बतावल जाव कि पिता के निधन हो गइल बा आ कि ….! अबहीं बात पूरो ना होखे तबले वर पक्ष के लोग खुदही बोल पड़े, ‘अच्छा-अच्छा ऊ एड्स वाला दोखी कलंकी गोपला के बेटी ह !’ वर पक्ष के लोग जोड़े, ‘ऊ गोपाल जेकर बापो कतल के जुर्म में जेल काटत बा ?’
रिश्तेदार, पट्टीदार जे ही होखे बेजवाब हो जाव. एकाध लोग तर्को देव कि एहमें लड़िकी के का दोष ? लेकिन एड्स जइसन भारी शब्द के आगा सगरी तर्क पानी हो जाव, आ वर पक्ष के लोग कसाई !


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

लोक कवि अब गाते नहीं – १३

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

बारहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
त्रिपाठी जी के चरचा आ इहो कि लोक कवि कइसे घबड़इले जब पता चलल कि उनुका भतीजा के एड्स हो गइल बा. ओकरा के तुरते बंबई भिजवा दिहले एह हिदायत का साथे कि कतहू ऊ लोक कवि के नांव गांव के नाम ना ली.


दरअसल लोक कवि के सगरी चिंता एहकर रहल कि अगर कहीं लोग के ई पता चलि गइल कि उनुका परिवार में केहू एड्स रोगी बा त बदनामी त होखबे करी, कलाकार भाग जइहें आ कार्यक्रमो खतम हो जाई. मारे डर के आ बदनामी के केहू बोलइबे ना करी. फेर अचानके खयाल आइल कि जवन कलाकार कमलेश का साथे गइल बा, कहीं ओह सार के पता चल गइल आ बात बेबात बात उड़ा दिहलसि तब का होई ?

यह सोचिये के ऊ घबरा गइले. भागत खुद स्टेशन गइले. ओह कलाकार आ कमलेश के बंबई जाये से रोक दिहले आ कमलेश से कहले कि अब तोहार बाग गांव से आई, तबहियर जइहऽ. ओकरा के बोलवा भेजले बानी. फेर ऊ विधायक निवास वाला गैराज पर चल गइले.
लोक कवि के परेशानी के कवनो पार ना रहल !
ऊ सोचे लगलन कि आखि़र कहां फंस गइल ई ? बाहर दिल्ली, बंबई त दूर, गांव से बहरा नातेदारी, रिश्तेदारी छोड़ कहीं गइल ना ई रोग पवलसि कहवाँ से ई ? उनुका समुझ से बाहर रहल ई.
ओने भंवर में कमलेशो रहल.
लोक कवि के अफरा तफरी देख समुझ त उहो गइल रहे कि कवनो गंभीर बेमारी हो गइल बा आ यौन रोग. लेकिन एड्स हो गइल बा, अबही ले एकर अंदाज ओकरा ना रहल. तबहियो ऊ रह-रह के गांवे के एगो पंडित के बेटा के सरापे लागल.
भुल्लन पंडित के बेटा गोपाल !

एक समय भुल्लन पंडित गांव में न्यौता खाए खातिर मशहूर रहले. गरीबी में जियला का बावजूद ऊ बड़ा ईमानदार, निष्कपट, सोझउक, आ भोला रहले. उनुका दूइये गो दिक्कत रहल. एक त गरीबी, दोसर बढ़िया खाये के ललक. गरीबी त जस के तस रहल उनुकर आ ऊ जइबे ना करे. बाकिर निमना खाये के उनुकर ललक न्यौते में जब तब पूरा हो लेव. चाहे शादी बिआह होखे, चाहे केहू के गृह प्रवेश, चाहे केहू के मरन होखे भा पैदाइश. उनुका कवनो फरक ना पड़त रहल. नाम उनुकर भलही भुल्लन तिवारी रहल बाकिर ई सब बाति ऊ भूलात ना रहले. कतहियों, कवनो प्रयोजन में न्यौता खाए खातिर ऊ आ उनुकर लोटा हरमेस तइयार रहत रहल.

बलुक उनुकर लोटा उनुका से बेसी मशहूर रहल. बहुते बड़, बहुते भारी. ऊ न्यौता खाए जासु त लवटति घरी लोटा में भरसक दही भरवा लेसु, अंगोछा में चिउड़ा, चीनी बन्हवा लेसु फेर पान चबावत न्यौता खाये वालन के नेतृत्व करत वापस घर किओर चल देसु. ई सोच के कि जल्दी चलीं जेहसे पंडिताइनो के भूख मिटे चिउड़ा-दही से जवन ऊ लोटा, अंगोछा में बन्हले रहसु. काहे कि न्यौता खाये जाये से पहिले भुल्लन पंडित अपना पंडिताइन के कड़ेर आदेश दे के जासु कि, ‘चूल्हा मत जरइहे, खाए के हम ले आइब !’ कह त जासु पंडित भुल्लन तिवारी पर जरूरी ना रहत रहे कि हर बेर वापसी में उनुका लोटा में दही आ अंगोछा में चिउड़ा-चीनी बान्हले होखे. जजमान-जजमान पर निर्भर करत रहे. से पंडिताइन लगभग कई बेर भूखे पेट सूतसु. भुल्लन पंडित आ उनुकर बेटा गोपाल त सोहारी, तरकारी आ चिउड़ा दही खा के आवसु. डकार भरसु. लेकिन पंडिताइन मारे भूख के पानी पी-पी के करवट बदलसु. लेकिन भुल्लन पंडित उनुका के चूल्हा जरावे ना देसु. कहसु ‘भोजन अब बिहान बनी.’ पंडिताइन एह तरह बार-बार पानी पी-पी के करवट बदलत-बदलत परेशान हो चुकल रहली से बाद का दिन में भुल्लन पंडित के गइला का बाद जल्दी-जल्दी चूल्हा जरा के चार रोटी सेंक के खा लेसु आ चूल्हा फेर से लीप पोत के राख देसु कि लागो कि जरले ना रहे. बाकिर भुल्लनो पंडित मामूली ना रहलन. न्योता खा के लवटसि आ शक होखते चुल्हानी में जा के माटी के चूल्हा हाथ से छू-छू के देखसु. आ जे तनिको हलुका गरम मिल जाव त आ कई बेर त नाहियो मिले तबहियो चूल्हा छूवत कहसु, ‘लागत बा बुढ़िया चूल्हा जरवले रहुवे !’ आ अतना कहि के भुल्लन पंडित दू-तीन राउंड अपना बुढ़िया से लड़ झगड़ लेसु. खास कर के तब जब ऊ लोटा भर के दही आ अंगोछा भर के चिउड़ा-चीनी जजमान किहां से पा के लवटल रहसु.

भुल्लन पंडित के विपन्नता के अंत इहें ले ना रहे. हालत ई रहे कि गांव काओरि से अगर केहू माथ मुड़वले गुर जाव त ओकर खेत ना रहत रहुवे. ओकरा के देखते भुल्लन पंडित ओह बाल मुड़वला के रोकलेसु. रोक के ओकरा गाँव के नाम, के मरल, कब मरल, तेरही कब बा ? वगैरह के ब्यौरा पूछ बइठसु. अइसनका में कई बेर लोग नाराजो हो जासु. खास कर के तब जब केहू मरल ना रहत रहे आ तबो भुल्लन पंडित मरलका के जानकारी मांग लेसु. बाकिर केहू के नाराजगी से भुल्लन पंडित के कवनो सरोकार ना होखे, उनुका त अपना एह दरिद्रता में मधुर भोजने भर से दरकार होखे. मिल गइल त बहुत बढ़िया, ना मिलल त हरे राम !

भुल्लन पंडित का साथे अब उनुकर बेटा गोपालो न्यौता खाए में माहिर होखल जात रहे. भुल्लन पंडित आ उनुका बेटा गोपाल का बीच न्यौता खाए के एगो शुरुआती प्रसंग गांव त का ओह जवार भर में बतौर चुटकुला चल पड़ल रहुवे. ई कि जइसे कवनो बाछा के ‘कुटाई’ का बाद हर जोते में बड़ पापड़ बेले के पड़ेला, ओकरा के ‘काढ़े’ के पड़ेला, माहिर बनावल पड़ेला, ठीक वइसहीं भुल्लन पंडित अपना इकलौता बेटा गोपाल के ओह जमाना में न्यौता खाए में माहिर बनावत रहले.

एक बेर कवनो जजमान किहाँ भोजन का समय जब अधिका पंडित लोग चिउड़ा दही सट-सट सटकत रहुवे आ फेर सोहारी तरकारीओ सरियावत रहे, बिना पानी पियले त अइसनका में गोपाल बार-बार पानी पियत रहुवे. गोपाल के बेर-बेर पानी पियला का चलते भुल्लन पंडित परेशान हो गइले. कबो खांस-खंखार के ओकरा के पानी ना पिये के इशारा करसु त कबो कोहनी मार-मार के. बाकिर गोपाल जे बा कि हर दू चार कौर का बाद पानी पी लेत रहुवे. बावजूद भुल्लन पंडित के कोहनियवला, खँसला, खँखरला के. जजमान का घर से निकल के रास्ता में रोक के भुल्लन पंडित अपना बेटा गोपाल के एही बाति पर तीन चार थप्पड़ लगवले आ कहले कि, ‘ससुरे ओहिजा पानी पिये गइल रहसु कि भोजन करे ?’
‘भोजन करे !’ गोपाल थप्पड़ खइला का बाद बिलबिला के भुल्लन पंडित के बतवलसि.
‘त फेर बेर-बेर पानी काहे पियत रहले ?’ भुल्लन पंडित विरोध जतवले’
‘हम त तह जमा-जमा के खात रहलीं !’ गोपाल बोलल. त भुल्लन पंडित फेरु ओकरा के मारे लगलन आ कहे लगले, ‘जे ई बाति रहल त ससुरा हमरो के बतवले रहतिस, हमहू तह जमा-जमा के खइले रहतीं !’ ई आ अइसनके तमाम किस्सा भुल्लन पंडित का गांव जवार में लोगन का जुबान पर चढ़ चुकल रहे.

बहरहाल, बाद का दिनन में भुल्लन पंडित के इहे बेटा गांव में चोरी चकारी खातिर मशहूर हो गइल. तब जब कि भुल्लन तिवारी न्यौता खइला का मामिला में चाहे जवन जसु अपजसु कमइले होखसु दोसरा मामिलन में उनुका नाम पर कवनो एको गो दाग लगवले ना लागत रहुवे. उनुका शराफतो के किस्सा उनुका न्यौता खाये वाला किस्सन के संगही चलल करे. भुल्लन पंडित अपना गड़ेर खेत के पतई जरइबे ना करसु, कहसु कि, ‘पतई जराएब त साथे-साथ पता ना बेचारा कतना कीड़ो मकोड़ो जर जइहें सँ.’ ऊ जोड़सु, ‘कीड़ो मकोड़ा आखि़र जीवे हउवन सँ. काहें जराईं बेचारन के ?’

बाकिर समयो के अजीब चक्कर चलत रहले. एही भुल्लन पंडित के बेटा जस-जस बड़ होखल जात रहे, चोरी लुक्कड़ई में ओकर नाँव बढ़ले जात रहुवे. पुलिसो केस होखल शुरू हो गइल रहे. ब्राह्मण के विपन्नता ओकरा के अपराधी अउर लंपट बनवले जात रहुवे.

अतना कि भुल्लन पंडित परेशान हो गइलन. एही परेशानी में कुछ लोग उनुका के सलाह दिहलसि कि ऊ गोपाल के शादी करवा देसु. शायद शादी का बाद ऊ सुधर जाव. भुल्लन पंडित अइसने कइले. गोपाल के शादी करवा दिहलन. शादी का बाद साल छ महीना त गोपाल जवानी के मजा लूटे का बहाने सुधरल रहल, चोरी चकारी छूटल रहल. लेकिन जइसहिंये ओकर मेहरारू पेट से भइल, सेक्स के पाठ लायक ना रह गइल, गोपाल फेरू अपराध के राह पर खड़ा हो गइल. हार थाक के भुल्लन पंडित कुछ खेत गिरवी रख के पइसा लिहलन आ पासपोर्ट वगैरह बनवा के गांवे के एगो आदमी का साथे गोपाल के बैंकाक भेज दिहलन. बैंकाक जाइयो के गोपाल के लुक्कड़ई वाला आदत त ना गइल बाकिर पइसा ऊ जरूर कमाये लागल आ खूब कमाये लागल.

कमलेश एही गोपाल के पकिया यार रहल. कमलेश गोपाल का साथ अपराध में त ना बाकिर लोफरई में जरूर हिस्सेदार रहत रहे. गोपाल ओह घरी बैंकाक से आइल रहुवे. गांव में एगो बरई परिवार रहे जवन पान वगैरह के छिटपुट काम करत रहे. ओह बरई के एगो लड़िका दिल्ली के कवनो फैक्ट्री में काम करत रहुवे आ ओकर बीबी गांवे में रहत रहे. ख़ूबसूरत रहल आ दिलफेंको. कोइरी जाति के एगो लड़िका से गुपचुप फंस गइल.

ऊ कोइरी अकसर रात के ओकरा घर में घुस कर घंटनो पड़ल रहत रहे. घर छोटहन रहे से घर के सगरी लोग अमूमन घर के बाहर दुअरे पर सूतत रहे. ऊ कनिया अबही नया रहल से घर का भितरिये सूते. अधरतिया के ऊ जब-तब केंवाड़ खोल देव आ कोइरी भीतर चल जाव. दरवाजा बंद हो जाव आ फेर भोरही में खुले. ई बाति गोपाल तिवारी के कतहीं से पता चल गइल. से गोपालो अपना मोंछि पर कई बेर ताव फेरलसि. ओह बरईन के फेरा मरलसि, लालच दिहलसि. बैंकाक के झाँसा दिहलसि. बाकिर सब बेअसर रहल. बरईनिया गोपाल के बांह में आवे से कतरा गइल.

आखि़र दिल के मामिला रहे आ ओकर दिल ओह कोइरी पर आइल रहे.

लेकिन गोपाल पर त बैंकाक के पइसा के नशा सवार रहे. हार माने के ऊ तइयार ना रहल. आखिरकार कमलेश का साथे मिल के ऊ एगो योजना बनवलसि, योजना मुताबिक एक रात सीढ़ी लेके गोपाल आ कमलेश बरई के घर का पिछवाड़े चहुंप गइले. कमलेश नीचे सीढ़ी पकड़लसि आ गोपाल सीढ़ी चढ़ के बरई के अँगना में कूद गइल. बरईन सूतल रहे. गोपाल जा के ओकरा बगल में लेट गइल बाकिर ऊ अफना के उठल आ खाड़ हो गइल. गोपाल का साथे हमबिस्तर होखे से खुसफुसाइये के सही, हाथ जोड़िये के इंकार कर दिहलसि. गोपाल रुपिया पइसा के लालच दिहलसि. तबहियो ऊ ना मानल त कोइरी का साथे ओकर संबंध के भंड़ाफोड़ करे के धमकी दिहलसि गोपाल त ऊ तनिका सा डिगल. लेकिन मानल तबहियो ना आ कहलसि निकल जा ना त हल्का मचा देब. बाकिर गोपलो एके घाघ रहुवे. कहलसि, ‘मचावऽ हल्ला, हमहू कहि देब कि तूहीं बोलवले रहू !’ ऊ बोलल, ‘फेर कोइरीओ वाला बात बता देब. गाँव में जी ना पइबू !’

हार गइल ऊ एह धमकी का आगा. पटा गइल ऊ गोपाल तिवारी के देह का नीचा. फेर त गोपाल तिवारी अकसरहें बरई के घर सीढ़ी लगावे लागल. सीढ़ी पकड़त-पकड़त कमलेशवो के जवानी उफान मारे लागल. कहे लागल, ‘गोपाल बाबा हमहूं !’ लेकिन गोपाल बाबा ओकरा के मना कर दिहले. कहलन कि, ‘जब हम वापिस बैंकाक चल जाएब त तूं सीढ़ी चढ़ीहऽ !’

आ साँचहू गोपाल बाबा के बैंकाक गइला का बादे कमलेश सीढ़ी चढ़ल. ठीक गोपाले वाला हालात कमलेशो का साथे घटल. बरई के बीवी एकरो के मना कइलसि. बाकिर कमलेश गोपाल का तरह बेसी समय ना लगवलसि. सीधे प्वाइंट पर आ गइल कि, ‘भेद खोल देब. भंडा फोड़ देब.’

फेर ऊ कमलेशो खातिर सूत गइल.

जइसे गोपाल के सीढ़ी नीचे कमलेश पकड़त रहुवे़ ठीक वइसहीं कमलेश के सीढ़ी एगो हरिजन रामू पकड़त रहे. रामू रहे त बिआहल आ अधेड़. हर जोतत रहे एगो पंडित जी के. एक गोड़ से भचकत रहे, लगभग लंगड़ा के चलल करे. बावजूद एह सब के ऊ रसिको रहल से कमलेश खातिर सीढ़ी पकड़ल करे, एह साध में कि एक दिन ओकरो नंबर आइबे करी. ऊ अकसर कमलेश से चिरौरीओ करे, ‘कमलेश बाबू आज हम !’ ठीक वइसही जइसे कमलेश कबो गोपाल के चिरौरी करत रहे, ‘गोपाल बाबा आज हमहूं !’ बाकिर जइसे गोपाल कमलेश के टार देव, वइसहीं कमलेश रामू के.

लेकिन एक दिन भइल का कि बरई के घर का पिछुवाड़ा सीढ़ी लागल रहे. लंगड़ा रामू मय सीढ़ी के रहे आ ओने कमलेश बरईन का साथे अँगना में “सूतत” रहे. एही बीच गांव के कवनो यादव परिवार के औरत बीच अधरतिया दिशा मैदान खातिर गांव का बगल के पोखरी किओर गइल. तबहिये ऊ बरई के घर के पीछे सीढ़ी लागल देखलसि. मारे डर के ओ बोलल ना. टट्टिओ ओकर रुक गइल आ भाग के घरे आ गइल. दुबक के सूत गइल बाकिर रात भर ओकरा नींद ना आइल.

सबेरे ऊ सोचलसि कि बरई के घर में चोरी के ख़बर सगरी गांव अपने आप जान जाई लेकिन चोरी के ख़बर त दूर चोरी के चर्चा ले ना भइल. गांव में त का बरईओ का घर ना रहल चोरी के चर्चा. मतलब चोरी भइबे ना कइल ? ऊ सोचलसि. लेकिन सीढ़ी त लागल रहुवे रात, बरई के घर का पिछूती. फेर ऊ सोचलसि जइसे ऊ डेरा के भागल, हो सकेला कि चोरो ओकरा के देखलें होखँ स आ डेरा के भाग गइल होखँ स. फेर ओकरा लागल कि मौका ताड़ के चोर फेरु चोरी कर सकेलें बरई का घर में. आखि़र लड़िका दिल्ली में कमात बा. से बरई के त आगाह ऊ करिये देव, गांवो वालन के बता देव कि चोर गांव में आवत बाड़े सँ. से ऊ खुसुर-फुसुर स्टाइल में ई बाति गांव में चला दिहलसि. बात के धाह कमलेशो के कान ले चहुँपल. एहसे कुछ दिन ले ऊ सीढ़ी के खेल भुलाइल रहल. कुछ दिन बीतल त ऊ सीढ़ी लगवलसि बरई का घर का पिछुवाड़े बाकिर खुद ना चढ़ल. सोचलसि कि पहिले ट्राई करवावल जाव. से रामू लंगड़ा से कहलसि कि, ‘बहुते परेशान रहले बेटा, आजु जो तें चढ़ !’ रमुआ आव देखलसि ना ताव, भचकत सीढ़ी चढ़ गइल. अबही ऊ सीढ़ी चढ़ के खपरैल ले चहुँपले रहल कि केहू ‘चोर-चोर’ चिल्लाइल. देखते-देखत ई ‘चोर-चोर’ के आवाज एक से दू, दू से तीन अउर तीन से चार में बढ़ती गइल. कमलेश त माथ पर गोड़ राखत भाग लिहलसि. बाकिर रमुआ खपरैल पर बइठले-बइठल रंगे हाथ धरा गइल. ऊ लाख कहत रहल, ‘हम नाहीं, कमलेश !’ ऊ जोड़तो रहल, ‘कमलेशे ना, गोपालो बाबा !’ बाकिर ओकर सुने वाला केहू ना रहल. काहे कि गोपाल त गांवे में ना रहुवे, बैंकाक चल गइल रहुवे आ कमलेश अपना घरे ‘गहीर नीने’ सूतल मिलल. से सगरी बाति रमुआ पर आइल. बेचारा फोकटे में पिटा गइल. लेकिन चूंकि बरई के घर के कवनो ‘सामान’ ना गइल रहे से थाना पुलिस ले बाति ना गइल आ गाँवे में रमुआ के मार-पीट के मामिला सलटा दिहल गइल.

बाकिर मामिला तब सचहूं निपटल कहाँ रहे भला ?
मामिला त अब उठल रहे. गांव में एके साथ सात-सात लोग एड्स से छटपटात रहुवे. खुलम खु्ल्ला. एड्स के बीया गोपाल बोवलसि कि ऊ लड़िका जे दिल्ली में रहत रहे, एह पर मतभेद रहल. बाकिर एड्स बांटे के सेंटर बरई के पतोहु बनल एहमें कवनो दुराय ना रहल. तबहियो अधिकतर लोग के राय रहल कि गांव में एड्स के तार भुल्लन तिवारी के बेटा गोपाल तिवारी का मार्फत आइल.

बरास्ता बैंकाक।

फिलहाल त बैंकाक से गोपाल तिवारी के एड्स से मरला के ख़बर गांव में आ गइल रहल आ गोपाल तिवारी के मेहरारू एड्स से छटपटात रहुवे. साथ ही बरई के पतोहू, बरई के बेटा, बरई के पतोहू से संबंध राखे वाला ऊ कोइरी, ओह कोइरी के मेहरारू आ एने कमलेश. सभही एड्स का चपेटा में रहुवे. लोक कवि के गांव में बाकियो लोग जे बैंकाक, दिल्ली, बंबई भा जहवाँ कतहीं बाहर रहे, सब के सब शक का घेरा में रहल.

उनुका एड्स होखो, न होखो बाकिर एड्स का घेरे में त सभही रहे.

भुल्लन तिवारी पर त जइसे आफते आ गइल. बेटा एड्स के तोहमत ठोंक के मर चुकल रहे आ कहीं कीड़े मकोड़े मत जर जाँ सँ एह डर से ऊँख के पतईयो ना जरावे वाला भुल्लन तिवारी एह दिने जेल में नेवता खात रहले. पट्टीदार सभ उनुका के एगो हत्या में फंसा दिहले रहले.

लेकिन लोक कवि एड्स फेड्स का फेरे में फंसे वाला ना रहले. आखिरकार ऊ अपना छोटका भाई के गांव से बोलवा के सब कुछ बहुते गँवे से समुझवले. मान मर्यादा के वास्ता दिहले. बतवले कि, ‘बड़ी मुश्किल से नाम दाम कमइले बानी एकरा के एड्स का झोंका में मत डुबावऽ !’ फेर रुपिया पइसा दे के बाप बेटे के बंबई भेज दिहलन, बता दिहलन कि, ‘ठीक हो जाव भा मर खप जाव तबहिये अइहऽ. आ जे केहू पूछे कि का भइल, भा कइसे मरल ? त बता दीहऽ कि कैंसर रहे.’ ऊ कहले, ‘हम पता करवा लिहले बानी कि ई बेमारी आहिस्ता से आ जल्दिये से मार देले.’ ऊ जोड़ले, ‘बता दीहऽ ब्लड कैंसर ! एहमें केहू बाचे ना.’

आ आखि़र तबले लोक कवि परेशान रहले, बेहद परेशान ! जबले कि कमलेश मर ना गइल. कमलेश बंबई में मरल त बिजली वाला शवदाह घर में फूंकल गइल. एही तरह बैंकाक में गोपालो तिवारी फूंकल गइल. लेकिन गांव में त विद्युत शवदाह गृह रहल ना. त जब कोइरी, बरई के परिवार वाले मरले ते लकड़ी से उनुका के फूंके के रहे. घर परिवार में जल्दी केहू तईयार ना रहल आगि देबे खातिर. डर रहे कि जे फूंकी ओकरो एड्स हो जाई. फूंकल त दूर के बात रहल, केहू लाशो उठावे भा छूवे के तइयार ना रहल. बाति आखिर में प्रशासन ले चहुँपल त जिला प्रशासन एह सब के बारी-बारी फूंके के इंतजाम करवलसि.

अबही ई सब निपटले रहल कि बैंकाक से लोक कवि के गांव के दू गो अउरी नौजवान एड्स ले के लवटले.
ई सब सुन के लोक कवि से ना रहाइल, ऊ माथा पीट लिहले. चेयरमैन साहब से कहले, ‘ई सब रोकल ना जा सके ?’
‘का ?’ चेयरमैन साहब सिगरेट पियत अचकचा गइले.
‘कि बैंकाक से आइल गइले बंद कर दिहल जाव हमरा गाँव के लोग के !’
‘तू अपना गांव के राजदूत हउवऽ का ?’ चेयरमैन साहब कहले, ‘कि तोहार गांव कवनो देश ह ? भारत से अलगा !’
‘त का करें भला ?’
‘चुप मार के बइठ जा !’ वह बोले, ‘अइसे जइसे कतहीं कुछ भइले ना होखे !’
‘रउरा समुझत नइखीं चेयरमैन साहब !’
‘का नइखीं समुझते रे ?’ सिगरेट के राख झाड़त लोक कवि के डपटत बोलले चेयरमैन साहब.
‘बात तनिको जे एने से ओने भइल त समुझीं कि मार्केट त गइल हमार !’
‘का तूं हर बाति में मार्केट पेलले रहेलऽ !’चेयरमैन साहब बिदकत कहले, ‘एह सब से मार्केट ना जाव. काहे कि भर गाँव के ठेका त तूं लिहले नइखऽ. आ फेर पंडितवनो के त एड्स हो गइल. ई बीमारी ह, एहमें केहू का कर सकेला ? केहू के दोष दिहला से त कुछ होखे ना !’
‘रउरा ना समुझब !’ लोक कवि बोलले, ‘आप काहें समुझब ? रउरा त राजनीतिओ कब्बो मेन धारा वाला ना कइनी. त राजनीतिये के दरद रउरा ना जानीं, त मार्केट के दरद का जानब भला ?’
‘सब जानीलें !’ चेयरमैन साहब बोलले, ‘अब तूं हमरा के राजनीति सिखइबऽ ?’ ऊ इचिका मुसुकात बोलले, ‘अरे चनरमा का बारे में जाने ला चनरमा पर जा के रहल जरूरी होला का ? भा फेर तोहार गाना जाने ला, गाना सुने ला गाना गावहू आवे जरूरी बा का ?’
‘ई हम कब कहनी !’
‘त ई का बोललऽ तू कि राजनीति का मेन धारा !’ ऊ कहले, ‘अब हमरी पार्टी के सरकार नइखे तबहियो हम चेयरमैन बानी कि ना ?’ ऊ खुद ही जवाबो दे दिहलें, ‘बानी नूं ? त ई राजनीति ना हऽ त का हऽ बे ?’
‘ई त हवे !’ कहत लोक कवि हाथ जोड़ लिहलन.
‘अब सुनऽ !’ चेयरमैन साहब बोलले, ‘जब-तब मार्केट-मार्केट पेलले रहेलऽ त जानऽ कि तोहार मार्केट कइसे ख़राब होखत बा ?’
‘कइसे ?’ लोक कवि हकबकइलन.
‘ई जे यादव राज में यादव मुख्यमंत्री का साथे तूं नत्थी हो गइल !’ ऊ कहले, ‘ठीक बा कि तोहरा बड़का सरकारी इनाम मिल गइल, पांच लाख रुपिया मिल गइल, तोहरा नाम पर सड़क हो गइल ! एहिजा ले त ठीक बा. बाकिर तू एगो जाति, एगो पार्टी खास के गवईया बनि के रह गइलऽ.’ ऊ उदास होत बोलले, ‘अरे, तोहार लोक गायक के मारे खातिर ई आर्केस्ट्रा कम पड़त रहल का कि तू ओहिजो नत्थी हो के मरे खातिर चल गइलाऽ फतिंगा का तरह !’
‘हँ, ई नोकसान त हो गइल.’ लोक कवि बोलले, ‘मुख्यमंत्री जी के सरकार गइला का बाद त हमार पोरोगराम कम हो गइल बा. सरकारी पोरोगरामों में अब हमरा के उनुकर आदमी बता के हमार नाम उड़ा दिहल जा ता !’
‘तब ?’
‘त अब का करीं ?’
‘कुछ मत करऽ ! सब समय आ भगवान के हवाले छोड़ि दऽ !’
‘अब इहे करहीं के पड़ी !’ लोक कवि उनुकर गोड़ छुवत कहले.
‘अच्छा ई बतावऽ कि तोहार जवना भतीजा के एड्स भइल रहे ओकरा बाल बच्चा बाड़े सँ ?’
‘अरे नाहीं, ओकर त अबहीं बिआहो ना भइल रहे.’ ऊ हाथ जोड़त बोलले, ‘अब की साल तय भइल रहे. बाकिर ससुरा बिना बिअहले मरि गइल ! भगवान ई बड़का उपकार कइलन.’
‘आ ओह बरई के बच्चा बाड़े सँ ?’
‘हँ, एक ठो बेटा बा. घर वाला देखत बाड़े.’ लोक कवि बोलले, ‘अउर ओह कोइरीओ के दू गो बच्चा घर वाले देखत बाड़े.’
‘एह बचवन के त एड्स नइखे नू ?’
‘ना.’ लोक कवि बोलले, ‘एह सभ के मर मरा गइला का बाद शहर के डाक्टर आइल रहले. एह बचवन के ख़ून ले जा के जँचले रहले. सब सही निकलल. कवनो के एड्स नइखे.’
‘आ ओह पंडितवा के लड़िकन के ?’
‘ओकनियो के ना.’
‘पंडितवा के कतना बच्चा बाड़न सँ ?’
‘एगो बेटी, एगो बेटा.’
‘पंडितवा के बाप त जेहल में बा आ पंडितवा अपना मेहरारू समेत मर गइल त ओकरा बचवन के देखभाल के करत बा ?’
‘बूढ़ी !’
‘कवन बूढ़ी ?’
‘पंडित जी त बेचारे बुढ़उती में बेकसूर जेहल काटत बाड़न, उनुकर बूढ़ी पंडिताइन बेचारी बचवन के जियावत बाड़ी.’
‘ऊ नेवता खा के पेट जिआवे वाला पंडित के घर के खर्चा-बर्चा कइसे चलत बा ?’
‘राम जाने !’ लोक कवि सांस लेत कहले, ‘कुछ समय ले बैंकाक के कमाई चलल ! अब सुनीं ला कि गांव में कब्बो काल्ह चंदा लाग जाला. केहू अनाज, केहू कपड़ा, केहू कुछ पइसा दे देला !’ ऊ कहले, ‘भीख समुझीं. केहू दान त देबे ना. दोसरे, लड़िकिया अब बिआहे लायक हो गइल बिया ! राम जाने कइसे शादी होखी ओकर.’ लोक कवि बोलले, ‘जाने ओकर बिआह होइयो पाई कि बाप के राहे चलि के रंडी बनि जाई !’ लोक कवि रुकले आ कहले, ‘बताईं बेचारा पंडित जी एतना धरम करम वाला रहले, एगो नेवता खाइल छोड़ी दोसर कवनो ऐब ना रहल. बाकिर जाने कवना जनम के पाप काटत बाड़न. एह जनम में त कवनो पाप ऊ कइले ना. लेकिन लड़िका एह गति मरल कलंक लगा के आ अपने बेकसूर रहतो जेहल काटत बाड़न !’
‘तू पाप-पुण्य माने लऽ ?’
‘बिलकुल मानीं ला !’
‘त एगो पुण्य कर लऽ !’
‘का ?’
‘ओह ब्राह्मण के बेटी के बिआह के खरचा उठा लऽ !’
‘का ?’


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

लोक कवि अब गाते नहीं – १२

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

एगरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
गाँवे से लवटि के लखनऊ चहँपलो पर लोक कवि के शानदार स्वागत भइल. सम्मान मिलला का बाद लोक कवि के भाव अउरियो बढ़ि गइल रहे आ लोक कवि के बिहारो के यादव मुख्यमंत्री दू लाख रुपिया के पुरस्कार दे दिहले. आ यादव ना रहला का बावजूद लोक कवि के पूरा जिनिगी यादवने का कृपा से चलत रहे. अब पढ़ीं आगा के कहानी…..


जवने रहे बाकिर अब लोक कवि के चांदी रहुवे. बलुक कहीं कि उनुकर दिन सोना के आ रात चानी के हो गइल रहे. जइसे जइसे उनुकर उमिर बढ़ल जात रहे, लड़िकियन के व्यसनो उनुकर बढ़ल जात रहे. पहिले कवनो लड़िकी उनुकर पटरानी बन के महीनन का साल दू साल ले रहत रहे बाकिर अब महीना, दू महीना, चार महीना, बेसी से बेसी छह महीना में बदल दिहल जाव. केहू टोकबो करे त ऊ कहसु, “हम त कसाई हईं कसाई.” ऊ आगा जोड़सु, “बिजनेस करीला बिजनेसवाला हईं, जवन जतना बेचाले ओतना बेचीले. कसाई मांस ना काटी बेची त खाई का ?”

पता ना काहे ऊ दिन-ब-दिन कलाकारन ला निर्दयीओ बनल जात रहले. पहिले उनुकर छांटल, निकालल कलाकारन में से कुछ लोग मिल जुल के साल दू साल में एक दू गो टीम अलग-अलग बना के गुजारा कर लेत रहे. लोक कविओ उनुका के टीम से भलही अलग कर देत रहले लेकिन अपना गानन के गावे से मना ना करत रहले. त उ नयका टीम अलगा भलही रहत रहे लेकिन रहत रहे लोक कवि के बी टीम बनिये के. लोके कवि के गाना गावत बजावत, लोक कवि के मान सम्मान करत.

बाकिर अब ?

अब त हर तीसरे चौमासे लोक कवि के छंटनीशुदा कलाकार एक दू गो टीम बना लेस. गावस-बजावस लोके कवि के गाना बाकिर उनुका के गरियवला का अंदाज में. शायद एहू चलते कि ई लोग एक त मेच्योर ना होत रहे, दोसरे ओह लोग के लागे कि लोक कवि उनुका साथे अन्याय कइले बाड़े. एहमें से कईजने त ईहाँ ले करसु कि गावस-बजावस सब लोके कवि के गाना पर गाना का आखिर में जहां लोक कवि के नाम आवे, ओहिजा आपन नाम लगा दिहल करसु. गोया कि ई गाना लोक कवि के लिखल ना, ओह कलाकार के आपन लिखल ह, जे गा रहल बा. कबो कभार ओरहन चहुँपावे का अंदाज में ई बात लोग लोक कवि का कानो तक चहुँपावल करे कि, “देखीं, अब फलनवो रउरा गाना में आपन नाम ठूंस के गावत बा.” त ई सब सुन के लोक कवि या त चुप लगा जासु भा बिना खिसियइल कहसु, “जाये दीहीं, खात कमात बा, खाये कमाये दीहीं !” ऊ कहसु, “मंचे पर नू गावऽता, कैसेट में नइखे नू गावत ? अरे जनता जानत बिया कि कवन गाना केकर ह. परेशान जिन होईं. ” ओरहन ले के आइल लोग के ऊ लगभग एही तरह चुप करा देसु.

आ अब त हद ई होखे लागल कि जवने कलाकार के लोक कवि आपन मैनेजर बनावसु उहे ना सिरिफ उनुका कलाकारन के तूड़ देव, बलुक उनुका पइसा रुपिया के हिसाबो में लमहर घपला कर देव. बात एहिजे ले रहीत त गनीमत होखीत, कई बेर त ऊ मैनेजर घपला कर के लोक कवि के कईगो सरकारी कार्यक्रमो चाट जाव. आ कई बेर पोरोगराम लोक कवि करसु बाकिर पेमेंट कवनो अउरे बैनर के नामे हो जाव जे आड़े तिरछे लोक कवि के मैनेजर के बैनर होखल रहे !

परेशान हो जासु लोक कवि अइसन घपल देख-देख के, भुगत-भुगत के ! ऊ पछतासु कि काहें ना ठीक से उहो पढ़ले लिखले. ऊ कहबो करसु कि, “ठीक से पढ़ल लिखल रहतीं त ई बदमाशी ना नू करीत कवनो हमरा साथे !”

नतीजा भइल कि उनुका इर्द-गिर्द अविश्वास के बड़-बड़ झाड़ झंखाड़ उग आइल रहे. ऊ अब जल्दी केहू दोसरा पर भरोसे ना करसु.

अविश्वास का ई उहे दौर रहल जब लोक कवि कभी कभार काफीओ हाऊस में बइठे लगले.

काफी हाऊस में लोक कवि का बइठलो हालांकि एगो शगले रहत रहे बाकिर बहुते दिलचस्प शगल. का रहे कि लोक कवि के पड़ोसी जनपद के एगो तपल तपावल स्वतंत्रता सेनानी रहले त्रिपाठी जी. ख़ूब लमहर, ख़ूब करिया. अपना समय के बड़का आदर्शवादी. एह आदर्शवादे का चलते शुरू-शुरू में त्रिपाठी जी देश के आजाद होखला का बादो, जब तमाम लोग चुनावी राजनीति के मलाई काटे लागल रहुवे, ऊ एकरा से फरके बनल रहले. तमाम फर्जी स्वतंत्रता सेनानी ना सिरिफ चुनावी बिसाते जीतले बलुक सरकार में मंत्रीओ बन गइले. तबहियो आदर्शवाद मे डूबल त्रिपाठी जी एह टोटकन से दूरे रहले. शुरू-शुरू में त सब कुछ चल गइल. बाद में दिक्कत बढ़े लागल. लड़िका फड़िका बड़ होखे लगले. पढ़ाई-लिखाई के खर्रचो बढ़े लागल. ऊ एक बेर हार थाक के एगो चीनी मिल मालिक का भिरी गइले जे उनुका के उनुकर आदर्शवादी राजनीति का चलते जानत रहल. आपन तकलीफ बतवलन. मिल मालिक सरदार रहे. देश भक्ति के जज्बो अबही ओकरा में बाचल रहुवे. त्रिपाठी जी के दिक्कत में ऊ सहारा दिहलसि आ कहलसि कि जबले उनुकर सगरी बच्चा पढ़ लिख नइखन जात तबले ओकनी के पढ़ाई-लिखाई के सगरी खरचा के जिम्मेदारी उनुके रही. आ सरदार जी त्रिपाठी जी खातिर एगो सालाना फंड तुरते फिक्स कर दिहले कंपनी के वेलफेयर फंड से. त्रिपाठी जी के लड़िकन के पढ़ाई सुचारू रूप से होके लागल. लेकिन जइसे-जइसे लड़िकन के उमिर बढ़त गइल, ओकनी के क्लास बदलत गइल, ओकनी के पढ़ाई के खरचो बढ़त गइल. लेकिन चीनी मिल के वेलफेयर फंड से लड़िकन के पढ़ाई ला मिले वाल फंड में कवनो बढ़ोत्तरी ना भइल.

इहे रोना एक दिन त्रिपाठी जी एगो दोसरा सरदार से रोवे लगलन. कहे लगलन कि, “पहिले चीनी मिल वाला सरदार आसानी से मिल लेत रहे, अब पचासन कर्मचारी बाड़े ओकरा से मिलवावे वाला. सगरी नया. कवनो हमरा के जानबेना करे जे हमरा के उनुका से मिलवा देव. मिलवा देव त बताईं कि भाई सारा खर्च, कापी किताब, फीस कहां से कहां निकल गइल लेकिन तोहर वेलफेयर फंड जस के तस बा !” जवना सरदार से ई रोना त्रिपाठी जी रोवत रहले ऊहो सरदार ट्रांसपोर्टर रहे आ ओह घरी ट्रक के टायरो के परमिट चलत रहे. त्रिपाठी जी के एगो आदत इहो रहे कि अकसरहा फउँकल करसु कि फलां मंत्री, फलां अफसर हमार चेला ह. से ट्रांसपोर्टर सरदार बोलल कि, “पंडित जी फलां मिनिस्टर त आप क चेला ह ?”
“हँ, हवे. बिलकुल हवे. ” त्रिपाठी जी पूरा ठसका से बोलले.
“त आप हमरा ला ट्रक के टायरन के परमिट के पक्का इंतजाम ओकरा से करवा दीं. ” सरदार बोला, “फेर हम अतना कुछ त बिटोरिये देब कि रउरा लड़िकन के पढ़ाई खातिर हर साल वेलफेयर फंड देखे के जरूरते ना पड़ी.”
“त ?”
“त का जाईं, रउरा परमिट ले आईं. बाकी इंतजाम हम करत बानी.”
त्रिपाठी जी छड़ी उठवले, गला खंखारले आ चहुँप गइले ओह चेला मिनिस्टर का लगे. ऊ बड़ा आदर सत्कार से त्रिपाठी जी के बईठवलन. फेर त्रिपाठी जी ने तनी घुमा फिरा के ट्रक के टायर के परमिट खातिर बात चला दिहले. उनुकर चेला मिनिस्टर बाति सुन के मुसुकाइल. कहलसि, “पंडित जी, रउरा लगे एगो साइकिल तकले त बा ना, उ ट्रक के टाय के का करब ?”
“पेट में डालब !” त्रिपाठी जी बम-बमा के कहले, “मिनिस्टर बन गइल बाड़ऽ त दिमाग ख़राब हो गइल बा. जानत नइखऽ कि ट्रक के टायर के का करब.”
मिनिस्टर त्रिपाठी जी से माफी मांगलन आ उनुका परमिट ख़ातिर आदेश दे दिहलन.
त्रिपाठी जी के काम बन गइल रहे.
लेकिन अब ई एगो काम एह तरह हो गइला से त्रिपाठी जी के मुंहे खून लाग गइल. अब ऊ अइसन काम खोजत चलसु आ कहत फिरु कि, “केहू के कवनो काम होई त बतइहऽ !” धीरे-धीरे त्रिपाठी जी दलाली खातिर मशहूर होखे लगले. एह फेर में ऊ फजिरही से घर छोड़ देसु आ देर रात घरे चहूँपसु. उनुकर पंडिताइन कबो कभार उनुका से दबल जबान से पूछबो करसु कि, “ए बड़कू क बाबू, आखि़र रउरा कवन नौकरीकरीले जे सबेरे के निकलल देर रात घरे आइले ?” ऊ अड़ोस पड़ोस के हवाला देत बतावसु कि, “फलांने फलांने क बाबू लोग एतने बजे जाला आ एतने बजे घर आइयो जाले ?” फेर ऊ पूछसु, “रउरा काहें सबसे पहिले जाइले आ सबले देर से आइले. आ फेर रउराकवनो छूट्टियो ना मिले. ई कवन नौकरी ह जे आप करीले !”
त्रिपाठी जी बेचाररू का बतऽवतन ? का ई बतऽवतन कि आदर्शवादी स्वतंत्रता सेनानी रहल तोहार ई पति अब दलाली खातिर घूमत रहेला, दिन रात एने-ओने ! ऊ पंडिताइन के घुड़पत एतने कहसु, “सूतऽ तू बुझबू ना !”
एक बार इहे त्रिपाठी जी लोक कवि के धर लिहलन. कहे लगलन, “सुनत बानी ई मुख्यमंत्री तोहार बाति बहुते मानेला. हमार एगो काम करवा द !”
“का काम हवे पंडित जी ?” गोड़ छूवत लोक कवि पूछले.
“बात ई बा कि बिजली विभाग के एगो असिस्टेंट इंजीनियर हवे ओकरे ट्रांसफर रोकवावल चाहऽतानी.” ऊ कहले, “तू तनी मुख्यमंत्री से कह दऽ, बात बनि जाई. हमार इज्जत रहि जाई !”
“लेकिन मुख्यमंत्री जी के त आपहू निमना से जानीले. आपही सीधे कह देब त आपहू के कहल टरिये त नाहीं.” लोक कवि कहले, “आपही कहि दीं !”
“अरे नालायक, अब तू हमरे के पहाड़ा पढ़ावे लगलऽ !” त्रिपाठी जी लोक कवि से कहले, “तू बात त ठीक कहऽतार. मुख्यमंत्री हमार बातो सुन लिहन. ” ऊ कहले, “हम कहनी त ऊ सुनबो कइलन आ कामो कइलना बाकिर कह दिहलन कि अब एह विभाग के दोसर कवनो काम मत ले आएब !”
“हम कुछ समुझनी ना त्रिपाठी जी !” लोक कवि साचहू कुछ ना समुझले रहन.
“त सुन अभागा कहीं का !” त्रिपाठी जी उतावली में बोलत गइले, “एह बिजली विभाग के एगो जूनियर इंजीनियर आपन ट्रांसफर रोकवावे खातिर हमरा के दस हजार रुपया दिहलसि. हम मुख्यमंत्री से कह दिहनी त रुक गइल ओकर ट्रांसफर. अब ओह जूनियर इंजीनियर के ऊपर हवे ई असिस्टेंट इंजीनियर. एकरो ट्रांसफर हो गइल बा. जब जूनियर इंजीनियर के ट्रांसफर रुक गइल आ एकरा पता चलल कि हम रोकववनी त ईहो हमरा लगे आइल. कहलसि बीस हजार रुपिया देब, हमरो ट्रांसफर रोकवा दीं.” त्रिपाठी जी अफनात कहले, “आ मुख्यमंत्रिया पहिलवैं मना कर चुकल हवे !” फेर ऊ आपन किस्मत के कोसे लगले. कहे लगले, “ईहो साला अभागा रहल. ओह जूनियर इंजीनियर से पहिले इहे सार भेंटा गइल रहीत त एकरे काम हो गइल रहीत आ हमरो बेसी पइसा मिलल रहीत !” कह के ऊ आपन माथ ठोंके लगले. लोक कवि से कहले, “कह सुनि के तूही करा द !”
लोक कवि त्रिपाठी जी के दिक्कत समुझले आ उनुकर पैरवी खुद त ना कइले बाकिर करवा दिहलन तब उनुकर काम !
एही त्रिपाठी जी के एगो अउरी शगल रहे. पुरान शगल. ऊ अकसर काफी हाऊस में बइठ जासु. काफी पियसु, कुछ खइबो करसु. अउर केहू जे आपन परिचित लउक जाव त ओकरो के बोला लेसु, खियावसु पियावसु. तब जब कि पइसा उनुका जेब में धेलो ना रहत रहे. तबो उनुकर आदत रहे जब तब काफी हाऊस में बइठल, लोग के बोला के खियावल पियावल. अइसे जइसे कि ऊ कवनो बड़हन नवाब भा धन्ना सेठ हउवें. ऊ लोग के बोलावसु, काफी पियावसु आ पूछसु, “कुछ खइबो करबऽ ?” आ जे ऊ हामी भर दिहलसि त ओकरा के खियइबो करसु. फेर ओकरा से पुछसु, “तोहरा लगे पइसा कतना बा ?” आ जे ओकरा लगे अबही तक के बिल के बराबर पइसा होखे त त्रिपाठी जी कह देसु, “बिल भर द !” अउर जे कहीं ओकरो लगे बिल भर के पइसा ना होखे तबहियो त्रिपाठी जी पर कवनो फरक ना पड़े, ना ही उनुका चेहरा पर कवनो शिकन आवे. ऊ ओही फराख़दिली से तब तक सबका के काफी पिआवत रहसु, कुछ ना कुछ खियावत रहसु, खात रहसु जबले केहू पूरा बिल जमा करे वाला उनुका काफी हाऊस में मिल ना जाव ! तबले ऊ खुदो ना उठसु, बइठल रहसु. एने-ओने के गपियावत रहसु. मजमा बन्हले रहुस. बेफिकिर ! काफी हाऊस के वेटर, मैनेजरो बेफिकर रहत रहले. उहो जानत रहले कि त्रिपाठी जी के खाता के पइसा डूबी ना. केहू ना केहू से त ऊ पेमेंट करवाइये दीहें. अइसनो पेमेंट करे वालन में लोको कवि रहले. आ अकसरहे. कई बेर त लोक कवि जान बूझ के काफी हाऊस का राहे जासु आ भीतर घुस के झाँक लेसु कि त्रिपाठी जी के चौपाल लागल बा कि ना. त्रिपाठी जी ना होखसु त लोक कवि ओहिजा से फौरन निकल लेसु. आ जे त्रिपाठी जी ओहिजा भेंटा जासु त लोक कवि जातही उनुकर गोड़ छू के “पालागी !” बोलसु. कहसु, “त्रिपाठी जी हमहू काफी पियब !”
“हँ, हँ, बिलकुल !” कह के त्रिपाठी जी, “लोको कवि ला काफी ले अइह भाई !” के हांक लगा देसु. लोक कवि जब काफी पी लेसु त त्रिपाठी जी ओही बेफिक्री से कहसु, “लोक कवि पइसा वइसा रखले बाड़ऽ कि बइठब ? केहू दोसरा के आवे के इंतजार कइल जाव !”
अकसर लोक कवि कहसु, “कहां पंडित जी हमारे पास पइसा कहां है ?” ऊ हंसत कहसु, “हमहू बइठब तनी देर रउरा लगे. अबहिये केहू ना केहू आ जाई. काहें फिकिर करऽतानी !”
“हमरा काहें के फिकिर. ” कहत त्रिपाठी जी अपने ठहाका में भुला जासु. आ उनुकर पूरा महफिल. फेर धीरे से लोक कवि वेटर के बोला के सगरी बिल चुकता कर देसु. अइसही ओह साँझ काफी हाऊस में बइठल लोक कवि त्रिपाठी जी के ठहाकन के काफी के साथ पियत गप सड़ाका में लागल रहले कि उनुका एगो अइसन सूचना मिलल कि मिलते उनुका के ठकुआ मार दिहलसि. हरदम का तरह ओह दिन काफी हाऊस के पेमेंटो ना कइलन आ “माफ करब त्रिपाठी जी. ” कहत उठ खड़ा भइलन.

लोक कवि के छोट भाई के एगो लड़िका के एड्स हो गइल रहल.
ढेरे दिन से ऊ बेमार रहुवे. इलाज करावत-करावत घर के लोग हार गइल रहले. हार के ओकर इलाज ला लोक कवि का लगे लखनऊ भेज दिहले रहले घर वाले. एहिजो इलाज बेअसर होत रहल. डाक्टर पर डाक्टर बदलइले बाकिर इलाज कारगर ना पावत रहे. थाक हार के लोक कवि अपना एगो कलाकार का साथे ओकरा के मेडिकल कालेज भेजले. ओहिजा शुरुआती जांच पड़ताल में डाक्टर के शक भइल त खून के टेस्ट करवावल गइल. एच.आई.वी. पाजिटिव निकलल. कलाकार रिपोर्ट जान के घबरा गइल. भागत-भागत लोक कवि का घरे गइल. ओहिजा ना भेंटइले त विधायक निवास वाला गैराज पर गइल, मिसिराइन किहां गइल, फेर खोजत-खोजत काफी हाऊस आइल. काफी हाऊस में लोक कवि भेंटा गइले. ऊ आव न देखलसि न ताव. बीच काफी हाऊसे में लोक कवि का कान में बता दिहलसि कि, “कमलेश के एड्स हो गइल बा. डाक्टर बतवलसि ह.”
ई सुनते लोक कवि झट से खड़ा हो गइलन. त्रिपाठी जी समेत अउरियो लोग घबरा के पूछबो कइल कि, “का भइल लोक कवि ?” लेकिन लोक कवि संयम बनवले रखले. कहले, “कुछउ ना, कुछ घरेलू बाति ह. ”
काफी हाऊस के बाहर निकलले आ ओह कलाकार के एक तरफ ले जा के गँवे से पूछले, “ओकरा मालूम हो गइल बा ?”
“केकरा ?”
“कमलेश के !”
“नाहीं गुरु जी !”
“त अबही बतइबो मत करीहऽ. ” लोक कवि बोलले, “केहू के मत बतइहऽ.”
“लेकिन गुरु जी कबले छुपावल जाई ?” कलाकार बोलल, “कबो ना कबो त पता चलिये जाई !”
“कइसे पता चल जाई ?” लोक कवि ओकरा के डपटत बोलले, “ओकरा के आजुवे इलाज खातिर बंबई भेज देतानी. ठीक हो जाई आ नाहीं त ओहिजे मर खप जाई.”
“के ले जाई ?”
“करत बानी कुछ इंतजाम. ” लोक कवि बोलले, “लेकिन ई बाति भूलाइयो के केहू के बतइहऽ जिन. ना त बड़हन बदनामी हो जाई. ” ऊ कहले, “इज्जत त जइबे करी मार्केटो चल का जाई डूबिये जाई. कहीं मुंह देखावे लायक ना रह जाएब. से बेटा बात अपने ले रखीहऽ.” लोक कवि ई बाति ओकरा से बहुते पुचकारत अउर ओकर पीठ ठोंकत बहुते मुलायमियत से कहले. फेर पाकिट से पांच सौ रुपए निकाल के ओकरा के देत कहले, “ल कुछ खर्चा-बर्चा रख ल. ”
“अरे नाहीं गुरु जी, एकर का जरूरत रहल. ” पइसा लेत, लोक कवि के गोड़ छूवत ऊ कहलसि.
“ई बतावऽ कि कमलेश कहां होखी एह घरी ?”
“घरही होखे के चाहीं भरसक !”
“ठीक बा तू चलऽ.” कह के लोक कवि रिक्शा लिहले आ बइठ के घरे चल दिहले. ऊ अतना हड़बड़ाइल आ घबराइल रहले कि एह अफरा तफरी में इहो याद ना रहल कि ओहिजा पासे में उनुकर कार मय ड्राइवर के खाड़ बिया. ख़ैर, ऊ घरे गइल. कमलेश पर ख़ूब बिगड़लन. ओकर बहुते लानत मलामत कइलन. लेकिन ना त घर वाले समुझ पावत रहले, ना ही कमलेशे के बुझात रहल कि आखि़र माजरा का बा ?
आखिर में उनुकर पत्नी बीच में कूदली कि, “आखि़र बाति का ह ? का गलती हो गइल ?”
“तू ना समुझबू, चुप रहव आ भीतर जा. ” लोक कवि खिसियइलन. बोलले, “बहुते बड़ पाप कइले बा. नाम डुबा दिहले बा परिवार के !”
“पाप ! परिवार के नाम डुबा दिहलसि !” लोक कवि के पत्नी बुदबुदइली, “का कह रहल बाड़ीं आप ?”
“कहनी नू कि तू भीतर जा !” लोक कवि पत्नी के डपटले.
“ई बेराम लड़िका, काहें डांटत बाड़ीं. ”
“तू जा भितरी !” अब की लोक कवि पत्नी पर गुर्रा के कहले. त ऊ अंदर चल गइली. तेज-तेज कदम से. लगभग दउड़त.
“तू फौरन आपन बोरिया बिस्तर बान्हऽ. ” कमलेश से लोक कवि बोलले.
“लेकिन त !” कमलेश सहमत-सहमत बोलल, “आखि़र त !”
“कवनो लेकिन, कवनो आखि़र वाखिर ना. ” लोक कवि भुनभुनइले. फेर बोलले, “तोहरा के अब अइसन बेमारी पकड़ लिहले बा कि एहिजा इलाज ना हो सके. ”
“त फिर ?”
“घबरा मत. ” लोक कवि कमलेश के पुचकारत कहले, “तोहार इलाज तबहियो कराएब. लेकिन एहिजा ना, बंबई में.” ऊ कहले, “जतना पइसा खरच होखी सब करब. लेकिन बंबई में, एहिजा ना.”
“लेकिन बीमारी का बा ?” कमलेश सहमत-सहमत बोलल.
“बेमारी के नाम बंबई के डाक्टर बताई. ” लोक कवि रुकले आ किचकिचात बोलले, “जब पाप करत रहल तब ना बुझाइल. अब बेमारी के नाम पूछत बा ?”
“कब जाए क बा बंबई ?” कमलेश तनिका कड़क होत पूछलसि.
“अबहिये आ तुरते ! अबही एगो कलाकार के भेजत बानी. ” लोक कवि बोलले, “बाद में तोरा बाप के भेजब.” कह के लोक कवि एगो कलाकार के बोलवले. कहले कि, “फौरन बंबई चले के तइयारी करऽ !”
“रिकार्डिंग बा कि कार्यक्रम, गुरु जी ?” खुश हो के कलाकार बोलल.
“कुछऊ नइखे. ” लोक कवि खीझियात कहले, “कमलेश के ओहिजा के अस्पताल में देखावे ले जाए के बा.” कह के लोक कवि कमलेश के पांच हजार रुपए दिहले आ कहले कि, “फौरन निकल जा आ ई डाक्टरी पर्चा, रिपोर्ट ओहिजा के अस्पताल के डाक्टर के देखइहऽ, ऊ भर्ती कर ली.”
“राउर नाम बता देब ?” कमलेश पूछलसि.
“केकरा के नाम बतइबऽ ?”
“डाक्टर के. ”
“का ओहिजा के डाक्टर हमार रिश्तेदार लागेला ?” लोक कवि भड़कले, “ओहिजा के जानी हमरा के ? कवनो लखनऊ ह का !” ऊ कहले, “केहू के हमार नाम, गांव मत बतइहऽ. चुपचाप इलाज करवइहऽ. ई डाक्टरी पर्चे सोर्स ह. देखते डाक्टर भर्ती कर ली.”
“कवना अस्पताल में भरती होखे के बा ?”
“जसलोक, फसलोक, टाटा, पाटा बहुते अस्पताल बाड़ी सँ. कतहीं भर्ती हो जइहे. ” ऊ घबरात कहले, “बाकिर हमार नाम कतहीं भूलाइहो के मत लीहे.” फेर लोक कवि ओह कलाकार के एगो कोना में ले जा के समुझवलनि कि, “एकरा के सम्हार के ले जइहऽ. अस्पताल में भर्ती करवा के चल अइहऽ. चपड़-चपड़ मत करीह.” कह के ओकरा के जाए आवे ख़ातिर किराया खर्चा कह के दिहलन आ कहले कि, “ओहिजा मौका पा के रंडियन का फेर में मत पड़ जइह.” कुछ रुकले आ फेर कहले, “आ एह कमलेशवो से रपटीहऽ, चपटही मत. एकरा बड़ा ख़तरनाक बेमारी हो गइल बा.”
“एड्स हो गइल बा का गुरु जी ?” कलाकार घबरा के बोलल.
“चुप साले !” लोक कवि बिगड़त बोलले, “तू डाक्टर हउव ?”
“ना गुरु जी. ” कह के कलाकार उनुकर गोड़ छूवलसि.
“त अंट शंट मत बकल करऽ. ” लोक कवि कहे, “तोहरा के आपन ख़ास मान के बंबई भेजत बानी.” ऊ रुकले आ बोलले, “ट्रेन में एकरा दिक्कत ना होखे एह खातिर तोहरा के साथे भेजत बानी. आ ओहिजा अस्पताल में एकरा के छोड़ के तू तुरते चल अइहऽ.” ओकर तुरते लवटल पक्का हो जाव एहला लोक कवि ओकरा के भरमइबो कइले, “रिकार्डिंग के तइयारी करे के बा आ एक दू ठो लोकल कार्यक्रमो बावे. एहसे डाक्टर फाक्टर के चक्कर में मत पड़ीह. तू फौरन ओही दिने ट्रेन पकड़ लीहऽ.”
“अच्छा, गुरु जी.” कह के ऊ रिक्शा बुलावे चल गइल. फेर रिक्शा से कमलेश के ले के स्टेशन चल दिहलसि.
एने लोक कवि अपना एगो बेटा के गांवे भेजलन कि ऊ कमलेश के बाप के लखनऊ बोला ले आवे. जेहसे समय से ओकरा के कमलेश का लगे बंबई भेजल जा सके. ऊ बुदबुदात रहले, “पता ना साला बाची कि मरी. अउर जे कहीं भेद खुल खुला गइल त हमार सगरी नाम, सगरी इज्जत माटी में मिला दी!” वह रुकले ना, बड़बड़इले, “अभागा साला !”


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com

लोक कवि अब गाते नहीं – ११

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद)

दसवीं कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं
सम्मान मिलला बाद अपना गाँवे चहुँपल लोक कवि के एगो पंडित के कहल नचनिया पदनिया के बात कतना खराब लागल रहे. बाकिर चेयरमैन साहब का समुझवला पर ऊ अपना मन के तोष दे दिहले रहले. अब पढ़ीं गाँव से लवटि के आइल लोक कवि के कहानी.


लखनऊ चहुँप के लोक कवि साँस लिहले. चेयरमैन साहब का घरे उतरले. जाके उनुका पत्नी के प्रणाम कइले. चेयरमैन साहब से फेर काल्हु भेंट करे के कहत उनुको गोड़ छू लिहले त चेयरमैन साहब गदगद हो के लोक कवि के गले लगा लिहलन. कहलन, “जीयत रहऽ आ एही तरे यश कमात रहऽ.” आगा जोड़लन, “लागल रहऽ एही तरे त एक दिन तोहरा के पद्मश्री, पद्मभूषणो में से कुछ ना कुछ भेंटा जाई.” उ सुन के लोक कवि के चेहरा पर जइसे चमक आ गइल. लपक के फेर से चेयरमैन साहब के गोड़ छू लिहले. घर से बहरी निकलि के अपना कार में बइठ गइलन. चल दिहलन अपना संघतियन का साथे अपना घर का ओरि.
रात के एगारह बज गइल रहे.
ओने लोक कवि घरे चललन. एने चेयरमैन साहब लोक कवि का घरे फोन कइलन त लोक कवि के बड़का लड़िका फोन उठवलसि. चेयरमैन साहब ओकरा के बतवलन कि “लोक कवि घरे चहुँपते होखी. हमरा किहाँ से चल दिहले बा.”
“एतना देरी कइसे हो गइल ?” बेटा चिंता जतावत पूछलसि, “हमनी का साँझही से इन्तजार करत बानी सँ.”
“चिंता के कवनो बाति नइखे. सम्मान समारोह का बाद तोहरा गाँवे चल गइल रहीं सँ. ओहिजा खूब स्वागत भइल लोक कवि के. मेहरारू सभ लोढ़ा ले ले के परीछत रहली सँ. बिना कवनो तर तइयारी के बड़हन स्वागत हो गइल. पूरा गाँव कइलसि.” चेयरमैन साहब बोलत रहले, “फोन एहसे कइनी हँ कि एहिजा तूहू लोग तनी टीका-मटीका करवा दीहऽ. आरती -वारती उतरवा दीहऽ.”
“जी चेयरमैन साहब. ” लोक कवि के बेटा कहलसि, “हमनी का पूरा तइयारी का साथे पहिलही से बानी सँ. बैंड बाजा तक मँगवा लिहले बानी सँ. ऊ आवें त पहिले !”
“बक अप !” चेयरमैन साहब कहले, “त रूकऽ, हमहू आवतानी.” फेर पूछलन, “केहू अउरी त ना नू आइल रहुवे ?”
“कुछ अफसरान आइल रहले. कुछ प्रेसोवाला लोग आ के चल गइल. बाकिर मोहल्ला के लोग बा. कई जने कलाकारो लोग बा, बैंड बाजा वाले बाड़न सँ, घर के लोग बा.”
“ठीक बा. तू बाजा बजवावल शुरू कर द. हमहू चहुँपते बानी. स्वागत में कवनो कोर कसर ना रहे के चाहीं !” ऊ कहले.
“ठीक बा चेयरमैन साहब.” कहि के बेटा फोन रखलसि. बहरी आइल आ बैंडवालन से कहलसि, “बजावल शुरू कर द लोग, बाबूजी आवत बाड़े.”
बैंड बाजा बाजे लागल.
फेर दउड़ के घर में जा के माई के चेयरमैन साहब के निर्देश बतवलसि आ इहो कि गाँवो में बड़हन धूम-धड़ाका भइल बा से एहिजो कवनो कोर-कसर ना रहि जाव. लोक कवि जब अपना घर का लगे चहुँपलन त तनी चिहुँकलन कि बिना बरात के ई बाजा-गाजा ! लेकिन बैंड वाले, “बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है” के धुन बजावत रहले आ मुहल्ला के चार छह गो लखैरा नाचत रहले.
ठीक अपना घर का सोझा उतरलन त बूझि गइलन कि माजरा का बा !
उनुकर धर्मपत्नी अपना दुनु पतोहियन आ मोहल्ला के कुछ औरतन का साथे सजल-धजल आरती के थरिया लिहले खाड़ रहली लोक कवि के स्वागत खातिर. लोक कवि के चहुँपते ऊ चौखट पर नरियर फोड़ली, बड़ा आत्मीयता से लोक कवि के गोड़ छूवली आ उनुकर आरती उतारे लगली. मुहल्लो का लोगो छिटपुट बिटोराये लागल.
गाँव जइसन भावुक आ भव्य स्वागत र ना भइल बाकिर आत्मीयता जरुर झलकल.
लोक कवि के संगी-साथी कलाकार नाचे लगलन. घर में पहिलही से राखल मिठाई बँटाये लागल. तबले चेयरमैनो साहब आ गइलन. लोक कवि के एगो पड़ोसी भागत-हाँफत अइलन, बधाई दे के बोललन, “बहुते बढ़िया रहल राउर सम्मान समारोह. हमार पूरा घर देखलसि. मुख्यमंत्री आ राज्यपाल का साथे रउरा के.”
“का आपहू सभे आइल रहली ओहिजा ?” लोक कवि अचकचात पूछलन, “लेकिन कइसे ?”
“हमनी का टीवी पर न्यूज में देखनी जा. ओहिजा ना गइल रहीं सँ.” पड़ोसी दाँत निपोरत कहले.
“रेडियो न्यूजो में रहल आपके समाचार.” एगो दोसर पड़ोसी बहुते मसोसत बतवले.
रात बेसी हो गइल रहल से लोग जल्दी-जल्दी अपना घरे जाये लागल.
बैंडो-बाजा बन्द हो गइल.
खा-पी के पोता-पोती के दुलरावत लोको कवि सूते चल गइलन. धीरे से उनकर पत्नियो उनुका बिस्तर पर आ के बगल में लेट गइली. लोक कवि अन्हार में पूछबो कइलन, “के हऽ ?” त ऊ धीरे से फुसफुसइली, “केहू नाईं, हम हईं.” सुन के लोक कवि चुपा गइलन.
बरीसन बाद ऊ लोक कवि का बगल में आजु एह तरह लेटल रहली. लोक कवि गाँवे का बात शुरु कर दिहलन त पत्नी उठ के हाँ हूँ करत उनुकर गोड़ दबावे लगली. गोड़ दबवावत-दबवावत पता ना लोक कवि के का सूझल कि पत्नी के पकड़ के अपना नियरा खींच के सूता लिहलन. बहुते बरीस का बाद आजु ऊ पत्नी का साथ “सूतत” रहले. चुपके-चुपके. अइसे जइसे कि सुहागरात वाली रात होखे. गुरुवाइन के ऊ “सूतल” सुख देके संतुष्टे ना परम संतुष्ट कर दिहले. सगरी सुख, सगरी तनाव, सगरी सम्मान ऊ गुरुवाइन पर उतार दिहले आ गुरुवाइनो आपन सगरी दुलार, मान-प्यार, भूख-प्यास आत्मीयता में सान के उड़ेल दिहली. “सूतला” ला थोड़ देर बाद ऊ लोक कवि का बाँहन में पड़ल कसमसात आपन संकोच घोरत बोलली, “टीवी पर आजु हमहूं आपके देखलीं.” फेर जोड़ली, “बड़का बेटउआ देखवलसि !”
सबेरे गुरुवाइन उठली त उनुका चाल में गमक आ गइल रह. उनुकर दुनु पतोहिया जब उनुका के देखली सँ, उनुकर बदलल चाल देखली सँ स दुनु अपने में आँख मारत एक दोसरा के संदेश “दे” आ “ले” लिहली सँ. एगो पतोहिया मजा लेत बुदबुदइबो कइलसि, “लागत जे पाँच लाख रुपयवा इहे पवलीं हईं.”
“मनो अउर का !” दोसरकी पतोह खुसफुसा के हामी भरलसि. बोलल, “पता ना कतना बरिस बाद जोरन पड़ल बा !”

सबेरे अउरियो कई लोग लोक कवि के घरे बधाई देबे अइले.
हिंदी अखबारो में पहिला पन्ना पर लोक कवि के मुख्यमंत्री आ राज्यपाल का साथे सम्मान लेत फोटो छपल रहे. दू गो अखबार में त रंगीन फोटो ! साथही रिपोर्टो. हँ अंगरेजी अखबारन में फोटो जरुर भीतर का पन्ना पर रहल रिपोर्ट का बिना.
लोक कवि के फोनो दनादन घनघनात रहे.
लोक कवि नहा धोआ के निकललन. मिठाई खरीदलन आ पत्रकार बाबू साहब का घरे चहुँपलन. उनुका के मिठाई दिहलन, गोड़ छूवलन, आ कहलन, “सब आपही के आशीर्वाद से भइल बा.” बाबू साहब घर पर रहले, पत्नी सोझा रहली से कुछ कटु ना बोललन. बस मुसुकात रहले.
लेकिना रास्ता पर ना अइलन, जइसन कि लोक कवि चाहत रहले.
लोक कवि त चाहत रहले कि एह सम्मान का बहाने एगो प्रेस कांफ्रेंस कर के पब्लिसिटी बिटोरल. चाहत रहलन स्पेशल इंटरव्यू छपवावल. सब पर पानी पड़ गइल रहे. चलत-चलत ऊ बाबू साहब से कहबो कइले, ” त साँझी खा आईं ना !”
“समय कहाँ बा ?”कहि के बाबू साहब टार दिहलन लोक कवि के. काहे कि निशा तिवारी के ऊ अपना मन से अबही ले टार ना पवले रहन.
लोक कवि चुपचाप चल अइलन.

बाद में आखिरकार चेयरमैने साहब दुनु जने का बीच पैच अप करवले. बाबू साहब प्रेस कांफ्रेंस के सवाल त रद्द कर दिहलन, कहलन कि “बासी पड़ गइल बा इवेंट.” लेकिन लोक कवि के एगो ठीक-ठाक इंटरव्यू जरुर कइलन.
रियलिस्टिक इंटरव्यू.
बहुते मीठ आ तीत सवाल पूछलन. आ पूरा विस्तार से पूछलन. कुछ सवाल साँचहू बड़ा मौलिक रहली सँ आ जबाब उनुका सवालो से बेसी मौलिक.
लोक कवि जानत रहले कि बाबू साहब उनुकर कुछ नुकसान ना करीहन से बेधड़क हो के जबाब देसु. फेर गोड़ छू के कहियो देसु कि “एकरा के छापब मत !”
जइसे कि बाबू साहब लोक कवि से पूछले कि “जब आप एतना बढ़िया लिखीले आ मौलिक तरीका से लिखीले त कवि सम्मेलनन में काहे ना जाईं ? तब जबकि रउरा के लोक कवि कहल जाला.”
“ई कवि सम्मेलन का होखेला ?” लोक कवि खुल के पूछलन.
“जहवाँ कवि लोग आपन कविता जनता का बीचे सुनावेले, गावेले.” बाबू साहब बतवले.
“अच्छा अच्छा समुझ गइनी.” लोक कवि कहले, “समुझ गइनी. ऊ रेडियो टीवीओ पर आवेला.”
“त फेर काहे ना जाईं आप ओहिजा ?” बाबू साहब के सवाल जारी रहे, “ओहिजा बेसी सम्मान, बेसी स्वीकृति मिलीत. खास कर के रउरा राजनितिक कवितन के.”
“एक त एह चलते कि हम कविता नाहीं गीत लिखीले. एह मारे ना जाइले. दोसरे हमरा के कबो बोलावलो ना गइल ओहिजा.” लोक कवि जोड़ले, “ओहिजा विद्वान लोग जाला, पढ़ल-लिखल लोग जाला. हम विद्वान हईं ना, पढ़लो-लिखल ना हई. एहू नाते जाये के ना सोचीला !”
“लेकिन रउरा लिखला में ताकत बा.बात बोलेला रउरा लिखले में.”
“हमरे लिखले में ना, हमरे गवले में ताकत बा.” लोक कवि साफ-साफ कहले, “हम कविता ना लिखीं, गाना बनाइले.”
“तबो, का अगर रउरा के कवि सम्मेलन में बोलावल जाव त आप जाएब ?”
“नाहीं. कब्बो ना जाएब.” लोक कवि हाथ हिलावत मना करत बोललन.
“काहे ?” पत्रकार पूछले,”काहे ना जाएब आखिर ?”
“ओहिजा पइसा बहुते थोड़ मिलेला.” कहि के लोक कवि सवाल टारल चहले.
“मान लीं कि रउरा कार्यक्रमन से बेसी पइसा मिले तब ?”
“तबो ना जाएब।”
“काहे ?”
“एक त कार्यक्रम से बेसी पइसा मिली ना, दोसरे हम गवईया हईं, कविता वाला विद्वान ना.”
“चलीं मान लीं कि रउरा के विद्वानो मान लिहल जाव आ पइसो बेसी दिहल जाव तब ?
“तबहियो ना.”
“अतना भागत काहे बानी लोक कवि कवि सम्मेलनन से ?”
“एहसे कि हम देखले बानी कि ओहिजा अकेले गावे पड़ेला, त हमरो अकेले गावे के पड़ी. संगी साथी होखिहन ना, बाजा-गाजा होई ना. बिना संगी-साथी, बाजा-गाजा के त हम गाइये ना पाएब. आ जे कहीं गा दिहलीं अकेले बिना गाजा-बाजा त फ्लॉप हो जाएब. मार्केट खराब हो जाई.” लोक कवि बाति अउरी साफ कइलन कि, “हम कविता नाहीं गाना गाइले. धुन में सान के, जइसे आटा सानल जाले पानी डाल के. वइसहीं हम धुन सानीले गाना डाल के. बिना एकरे त हम फ्लॉप हो जाएब.”
“गजब ! का जबाब दिहले बानी लोक कवि रउरा.” बाबू साहब लोक कवि से हाथ मिलावत कहले.
“लेकिन एकरा के छापब मत.” लोक कवि बाबू साहब के गोड़ छुवत कहले.
“काहे ? एहमे का बुराई बा ? एहमें त कवनो विवादो नइखे.”
“ठीक बा, बाकिर विद्वान लोग बिना मतलब नाराज हो जाई.”
“काहे कि उहो लोग इहे करत बा जवन कि आप करत बानी एहसे ? एहसे कि ऊ लोग इहे काम कर के विद्वानन का पाँति में बइठ जात बा, आ इहे काम करि के रउरा गवईयन का पाँति में बइठ जातानी एहसे ?” बाबू साहब कहले, “लोक कवि राउर ई टिप्पणी एह कवियन के एगो कड़ेर झापड़ बा. झापड़ो ना बलुक जूता बा.”
“अरे ना ! ई सब नाहीं.” लोक कवि हाथ जोड़ के कहले, “ई सब छापब मत.”
“अच्छा जे ई ढपोरशंखी विद्वान रउरा एह टिप्पणी से नाराजे हो जइहे त का बिगाड़ लीहें ?”
“ई हमरा नइखे मालूम. बाकिर विद्वान हवे लोग, बुद्धिजीवी हवे, समाज के इज्जतदार लोग हवे. ओह लोग के बेईज्जती ना होखे के चाहीं. ओह लोग के इज्जत कइल हमार धर्म ह.”
“चलीं, छोड़ीं.” कहि के पत्रकार बात आगा बढ़ा दिहले. लेकिन बात चलत चलत फेर कहीं ना कहीं फँस जाव आ लोक कवि हाथ जोड़त कहसु, “बाकिर ई छापब मत.”
एही तरे चलते फँसत बात एक जगहा फेर दिलचस्प हो गइल.
सवाल रहुवे कि, “जब आप अतना स्थापित आ मशहूर गायक हईं त अपना साथे दुगाना गावे खातिर एतना लचर गायिका काहे राखेनी ? सधल गायकी में निपुण कवनो गायिका का साथे जोड़ी काहे ना बनाईं ?”
“अच्छा..!” लोक कवि तरेरत बोललन, “अपना ले नीमन गायिका का साथे दुगाना गाएब त हमरा के के सुनी भला ? फेर त ओह गायिका के बाजार बन जाई, हम त फ्लॉप हो जायब. हमरा के फेर के पूछी ?”
“चलीं नीमन गावे वाली ना सही. पर थोड़ बहुत ठीक ठाक गावे वाली बाकिर खूबसूरत लड़िकी त अपना साथे गावे खातिर रखिये सकीले आप ?”
“फेर उहे बाति !” लोक कवि मुसुकात तिड़कले, “देखत बानी जमाना एतना खराब हो गइल बा. टीम में लड़िकी ना राखीं त केहू हमार परोगराम ना देखी, ना सुनी. आ सोना पर सुहागा ई कर दीं कि अपना साथे गावे वाली कवनो सुन्दर लड़िकी राख लीं !” ऊ बोललन, “हम त फेर फ्लॉप हो जायब. हम बूढ़वा के के सुनी, सब लोग त ओह सुन्दरी के देखही में लाग जाई. बेसी भइल त गोली-बनूक चलावे लगीहें लोग !” ऊ कहले, “त चाहे देखे में सुन्दर भा गावे में बहुते जोग, हमरा साथे ना चल पाई. हमरा त दुनु मामिला में अपना से उनइसे राखे के बा.”
कहे के त लोक कवि साफ-साफ कहि गइलन लेकिन फेरु पत्रकार के गोड़े पड़ गइलन. कहे लगलन, “एकरो के मत छापब.”
“अब एहमें का हो जाई ?”
“का हो जाई ?” लोक कवि कहले, “अरे बड़हन बवाल हो जाई. सगरी लड़िकी नाराज हो जइहे सँ.” ऊ कहले, “अबहीं त सभका के हूर के परी बताइले. बताइले कि हमरा से नीमन गावे लू. बाकिर जब सब असलियत जान जइहें सँ त कपार फोड़ि दीहें स हमार. टूट जाई हमार टीम. कवन लड़िकी भला तब आई हमरा टीम में ?” लोक कवि पत्रकार से कहले, “समुझल करीं. बिजनेस ह ई हमार ! टूट गइल त ?”
त एह तरह कुछ का तमाम कड़ुआ बाकिर दिलचस्प सवालन के जबाबन के काट-पीट के लोक कवि के इंटरव्यू छपल, फोटो का साथ.
एहसे लोक कवि के ग्रेसो बढ़ गइल आ बाजारो !

अब लोक कवि का कार पर उनुका सम्मान के नाम के प्लेट जवन ऊ पीतल के बनववले रहले, लाग गइल रहुवे. बिल्कुल मंत्री, विधायक, सांसद, कमिश्नर, डीएम, भा एसपी के नेमप्लेट का तरह.
लोक कवि के कार्यक्रमो एने बढ़ गइल रहे. अतना कि ऊ सम्हार ना पावत रहले. कलाकारन में से एगो हुसियार लउण्डा के ऊ लगभग मैनेजर बना दिहले. सब इंतजाम, सट्टा-पट्टा, आइल-गइल, रहल-खाइल, कलाकारन के बुकिंग, ओकनी के पेमेंट लगभग सगरी काम ऊ ओहि कलाकार कम मैनेजर के सँउप दिहले रहन.
किस्मत सँवर गइल रहे लोक कवि के. एही बीच उनुका के बिहारो सरकार दू लाख रुपिया के सम्मान से सम्मानित करे के घोषणा कर दिहलसि. बिहारो में एगो यादव मुख्यमंत्री के राज रहल. यादव फैक्टर ओहिजो लोक कवि के कामे आइल. साथही बिहारो में उनुकर कार्यक्रमन के मांग बढ़ गइल.
चेयरमैन साहब अब लोक कवि के रिगइबो करस कि, “साले, अब तू आपन नाम एक बेर फेर बदलि ल. मोहन से लोक कवि भइल रहऽ आ अब लोक कवि से यादव कवि बनि जा.”
जबाब में लोक कवि कुछ कहसु ना बस भेद भरल मुसुकी फेंक के रहि जासय. एक दिन ओही पत्रकार से चेयरमैन साहब कहे लगलन कि़ “मान ल लोककविया के किस्मत अइसहीं चटकत रहल त एक ना एक दिन हो सकेला कि इनका पर रिसर्चो होखे लागो. यूनिवर्सिटी में पीएच॰डी॰ होखे लागे इनका बारे में.”
“हो सकेला, चेयरमैन साहब बिल्कुले हो सकेला.” चेयरमैन साहब के मजाक के वजन बढ़ावत बाबू साहब कहले.
“त एगो विषय त एह लोक कवि पर पीएच॰डी॰ में सबले बेसी पापुलर रही.”
“कवन विषय ?”
“इहे कि लोक कवि का जीवन में यादवन के योगदान !” चेयरमैन साहब तनी तफसील में आवत बोलले, “एकर सबले पहिली ४४० वोल्ट वाली प्रेमिका यादव, एकर सबले पहिला गाना बनल यादव प्रेमिका पर, ई सबसे पहिले “सूतल” यादव लड़िकी का संगे, एकर पहिला लड़िका पैदा भइल यादव मेहरारू से.” चेयरमैन साहब कहत गइले, “पुरस्कार त एकरा बहुते मिलल बाकिर सबले बड़ आ सरकारी पुरस्कार मिलल त यादव मुख्यमंत्री का हाथे, फेर दोसरको सरकारी पुरस्कार यादवे मुख्यमंत्री का हाथे. अतने ना, आजुकाल्हु कार्यक्रमो जवन खूब काट रहल बा उहो यादवे समाज में.” चेयरमैन साहब सिगरेट के लमहर कश खींचल कहले, “निष्कर्ष ई कि यादवन के मारतो ई यादवन के राजा बेटा बनि के बइठल बा.”
“ई त बड़ले बा चेयरमैन साहब !” बाबू साहब मजा लेत कहले.
बाकिर लोक कवि हाथ जोड़ले आँखि मूंदले अइसन बइठल रहले कि मानो प्राणायाम करत होखसु.


फेरु अगिला कड़ी में


लेखक परिचय

अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. एह उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह, सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां, प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित, आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा ई उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127
e-mail : dayanand.pandey@yahoo.com