गणतंत्र दिवस पर चंद सवाल

– पाण्डेय हरिराम

आजु हमनी के गणतंत्र दिवस ह, ६२ वाँ गणतंत्र दिवस. हालांकि इतिहास में साठ एकसठ भा बासठ साल बहुत बड़ अवधि ना होला बाकिर कवनो शासन व्यवस्था खातिर ई कमो ना कहल जा सके. संविधान के किताब में हर आम ओ खास के सगरी सुविधा दे दिहल गइल, मसलन असली आजादी, बुनियादी अधिकार वगैरह वगैरह. पर साँच एहसे बहुते दूर बा. अगर हकीकत के ठोस धरातल पर देखल जाव त लागी कि हमनी के देश के एगो बड़हन आबादी अबहियो गुलामी के जिनिगी बसर कर रहल बिया. एह लोग के ना त असली आजादी मिलल, ना अधिकार, ना जरुरत पड़ला पर सही न्याय. आ ई बात किताबी ना हो के हकीकत बा.

रउरा खुदही देख लीं. छोटहन बच्चा बंधुआ मजुरी करत बाड़े, ओकनी के पढ़े के किताब ना मिले, खाये के दू जून के रोटी ना भेंटाय. आजुकाल्हु स्कूलन में जवन भोजन दुपहरिया में मिड डे मिल का नाम पर मिलत बा ओकर मात्रा आ गुणवत्ता के भगवाने मालिक बाड़न. साथही कतार में खड़ा करा के जवना भाव से दिहल जाला ऊ भीख जइसन लागेला. सवाल बा कि निवाला इज्जत का साथ मिलत बा कि ना. ऊ सब पढ़े त जात बाड़े बाकिर पढ़ नइखन पावत. कमे उमिर में ओकनी के सयान बना दिहल जाता आ कमाये खातिर भेज दिहल जात बा.

औरतन के सशक्तिकरण के बाति पर त हँसी आवेला. जवन औरत अपना मामूली हक के लड़ाई ना लड़ सके, जवन हमेशा मरदन से प्रताड़ित होत आइल बाड़ी, ओह औरत के सशक्तिकरण हो रहल बा ! जहाँ ले न्याय मिलला के सवाल बा, आम आदमी के न्याय नइखे मिलत. पुलिस आ न्यायप्रबन्धन दुनु भ्रष्ट हो गइल बा. अपराधी अपना धन आ सत्ता के बल पर छूट जात बाड़े. अपराध के कारोबार दिन दूना रात चौगुना रफ्तार से बढ़ रहल बा. अगर कहल जाव कि हमनी के व्यवस्था में अपराध जड़ जमा लिहले बा त बेजाँय ना कहाई.

एह सगरी जुल्म के शिकार होला आम आदमी. जेकरा लगे न्याय पावे के समुचित साधन नइखे, रास्ता नइखे. उनका कष्ट के जीवन जिये के बा. खुद विचार करीं कि जहवाँ अतना अराजकता अउर समस्या होखे ओहिजा कइसे रहल जा सकेला. एह पर एकजुट हो के सोचे विचारे के जरुरत बा जेहसे कि सही लोकतंत्र स्थापित हो सके.


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी. अँजोरिया के नीति हमेशा से रहल बा कि दोसरा भाषा में लिखल सामग्री के भोजपुरी अनुवाद समय समय पर पाठकन के परोसल जाव आ ओहि नीति का तहत इहो लेख दिहल जा रहल बा.अनुवाद के अशुद्धि खातिर अँजोरिये जिम्मेवार होखी.

भउजी हो !

भउजी हो !

का बबुआ ?

गणतंत्र दिवस के बधाई ले लऽ.

रउरो के बधाई. बाकिर मुँह काहे बनवले बानी ?

का कहीं भउजी, बुझात नइखे कि कइसे विरोध करीं.

कवना बाति के ? काश्मीर में तिरंगा नइखे फहरावे दिहल जात एह बाति के, कि मनमोहन सिंह सलाह दिहले बाड़न कि तिरंगा पर राजनीति ना करी एह बाति पर, कि नीतीश आ देश के सगरी सेकूलर नेता लोग के बयान पर ? रउरा अनेरे परेशान बानी. सुनले बानी नू कि कुकुर के पोंछ बारहो बरीस पर पाइप में राखल जाव तबहियो सोझ ना होखी, पाइप भलही टेढ़ हो जाव.

त सब कुछ असहीं बरदाश्त कर लिहल जाव ?

ना त का करब ? देश के बहुसंख्यक आबादी इहे चाहत बिया त रउरा जइसन कुछ लोग के ढोल बजवला से का होखे वाला बा ? अतने गनीमत मनाईं कि देश के नाम नइखे बदलल जात, देश के झंडा नइखे बदलल जात, कम से कम ओकर एगो रंग नइखे हटावल जात. जतना मिलत बा ओतने में सबुर करीं. एगो उमरे अब्दुल्ला नइखन देश में पाकिस्तानी झंडा फहरावे वालन के तरफदारी करे खातिर. ढेरे लोग बा. कतना लोग के नाम गिनाईं ?

चलऽ भउजी. बाकिर अब हम तबले झण्डा ना फहरायब जबले अइसनका नेतवन से देश के आजादी नइखे मिल जात.