भोजपुरी के विकासमान वर्तमान

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

Ram Raksha Mishra Vimal

अपना प्रिय अंदाज, मिसिरी के मिठास आ पुरुषार्थ के दमगर आवाज का कारन भोजपुरी शुरुए से आकर्षण के केंद्र में रहल बिया. भाषा निर्भर करेले विशेष रूप से भौगोलिक कारन आ बोलेवाला लोगन के आदत, रुचि आ प्रकृति पर. विशेष परिस्थिति एह में आपन बरियार प्रभाव छोड़ेले. भोजपुरिया लोगन के अलग-अलग क्षेत्रन में प्रभावित करेवाला अलग-अलग कारकन का चलते भोजपुरियो के कई गो रूप लउकऽता आ अभी तक कवनो महाबीर एकरा के अनुशासित कऽके मानक रूप ना दे पवले. वर्तमान में ई काम आसान नइखे रहि गइल, बहुत कठिन बा. खासकर अइसना में जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जबर्दस्त प्रवेश भइल बा भोजपुरी में. जब भी अंकुश चली त मुद्रिते माध्यम का हाथ से, ओकर कवनो विकल्प नइखे बाकिर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के प्रभाव सौ गुना अधिक रही. बहुत सोच समझ के, पूर्व योजना बनाइके ई काम करे के परी. एकरा बादे भोजपुरी भाषा अउर साहित्य के गत्यात्मक आ विकासमान वर्तमान स्वरूप कवनो भाषा के ईर्ष्या के विषय बन सकऽता.

भले भोजपुरी के मानकत्व खतिर अधिकांश साहित्यकार एकर ध्यान रख रहल बाड़े कि अइसने प्रयोग चलावल जाव, जवन मानकीकरण का चौहद्दी में समा के, जवन सभका खतिर सुग्राह्य होखे आ तर्कसंगत होखे. जे अपना क्षेत्रीय बोली का मोह से ऊपर ना उठि पाई ओकर मेहनत कुछ पानी में जाई, एह में कवनो संदेह नइखे. कुछो होखे, लेखन कार्य चलत रहे के चाहीं आ आजु तक के भोजपुरी साहित्य संपदा पर खाली संतोषे ना गर्व गइल जा सकऽता जेकरा भंडार में कवनो विधा के स्तरीय रचनन के अभाव नइखे. भोजपुरी प्रकाशक का अभाव आ छपाई में बेसी खर्च का चलते ढेर पुस्तक बरिसन से प्रकाशनाधीन बाड़ी सन आ प्रकाशितो पुस्तकन के अशेष सूची बनावल शोध कार्य के विषय हो गइल बा. राष्ट्रीय आ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एकाध गो पुस्तकालयन का निर्माण से एह कार्य में सहूलियत मिल सकऽता, जो हर रचनाकार आपन किताब ओहिजा भेजे तऽ. हालांकि अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना, भोजपुरी अकादमी, पटना आ रामसखी रामबिहारी स्मृति पुस्तकालय-सह-शोध संस्थान, सारण का सङहीं पांडेय नर्मदेश्वर सहाय, पं. गणेश चौबे, पांडेय कपिल, श्री जगन्नाथ, डॉ. नंदकिशोर तिवारी, डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य आ ‘पाती’ का जरिये अशोक द्विवेदी जइसन एकसदस्यीय संस्था एह संदर्भ में आपन भूमिका बखूबी निभवले बाड़ी सन आ आजो निभा रहल बाड़ी सन बाकिर ओके पर्याप्त नइखे कहल जा सकत.

वर्तमान भोजपुरी के पत्र-पत्रिकन पर संतोष कइल जा सकऽता. एह घरी जबकि हिंदी में साहित्यिक पत्रिका कुछ रचनाकार सदस्यन का भरोसे चल रहल बाड़ी सन ओहिजा भोजपुरी में लघु पत्रिकन के अतना संख्या कम नइखे. कई गो पत्रिका बुता गइली सन बाकिर कई गो उदितो भइल बाड़ी सन. कुछ पत्रिकन के कलेवर आ व्यक्तित्च अपना रंगीनियत में काफी आकर्षक बा. एह में ‘दि संडे इंडियन’, ‘भोजपुरी संसार पत्रिका’ आ ‘सिने भोजपुरिया’ के नाँव खासतौर पे लिहल जा सकऽता. नियमित रूप से मासिक तौर पर छपेवाली पत्रिका में ‘भोजपुरी माटी’ के ना भुलावल जा सके. अपना ठोस, संतुलित आ स्तरीय रूप के बरकरार राखे वाली पत्रिका में ‘सम्मेलन पत्रिका’, ‘पाती’, ‘कविता’ आ सुरसती के नाम गर्व के साथ लिहल जा सकऽता. ‘माई’, ‘पनघट’, ‘परास’, ‘भोजपुरी जिंदगी’, ‘भोजपुरी विश्व’, ‘सिरजनहार’, ‘साखी’ आदि पत्रिकन के अंक बढिया निकलतारे सन. छमाही पत्रिका ‘सूझ-बूझ’ प्रवेशांके से भोजपुरी पत्रकारिता के एगो नया संभावना के रूप में लउकऽतिया. भारत का अलावे दोसरो देशन से पत्रिकन के निकले के खबर मिलत रहऽता बाकिर देश में ओकरा अनुपलब्धता के कारण एह विषय पर गंभीरतापूर्वक कुछ कहल नइखे जा सकत.

इंटरनेट पर अँजोरिया डॉटकॉम, भोजपुरिया डॉटकॉम, जय भोजपुरी डॉटकॉम, ग्लोबल भोजपुरी मूवमेंट डॉटनिंग डॉटकॉम, भोजपुरीलिरिक्स डॉटकॉम, चौराचौरी एक्सप्रेस, भोजपुरी आर्ग डॉटकॉम, बिदेशिया डॉटकॉम, पूर्वांचल एक्सप्रेस डॉटकॉम आदि पत्रिका अपना-अपना खास तेवर का साथ काम कर रहल बाड़ी सन. खुशी के बात ई बा कि एह में हर साइट कवनो खास विधा खतिर विशेष रूप से जानल जाले सन. कवनो समाचार त कवनो साहित्य-संस्कृति, कवनो सोशल नेटवर्किंग, कवनो भोजपुरी अस्मिता, कवनो खूबसूरत पत्रिका त कवनो भाषायी आंदोलन खातिर चर्चित बाड़े सन. कवनो साइट के तेवर अग्र बा त कवनो के धीर, गंभीर, प्रशांत. कवनो के तेवरे नइखे त कवनो के एह से कवनो मतलब नइखे – ईश्वर का कृपा से जइसन बन जाए. साहित्य, संस्कृति से लेके गीत, संगीत, फिल्म, टी॰वी॰ – हर क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित लगभग पचीस-छब्बीस गो वेबसाइट बाडे़ सन. ई भोजपुरी खतिर गर्व के विषय बा. अतने ना कुछ वेबसाइट समाज आ संस्कृति खतिर घातक वेबसाइट, संस्था आ कार्यन पर निगाह जमवले बाड़े सन – भोजपुरी माटी खातिर ई शुभ संकेत बा. नेट का माध्यम से छठ के परसाद भेजाए लागल बा देश का कोना कोना में – ई सराहना के बात बा.

कवनो भाषा आ भाषायी संस्कृति के व्यापक प्रचार-प्रसार में सिनेमा के महत्वपूर्ण भूमिका होले. भोजपुरी में ई अनमोल आ सुखद घड़ी आइल पहिल फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के 1962 में रिलीज भइला से, जेकर मुहूर्त भइल रहे 1961 में. एकर निर्माता नाज़िर हुसैन जी के भोजपुरी संसार कबो ना भुलाई. तब से कई गो फिल्म भोजपुरी भाषी क्षेत्र में हिंदी फिल्म के समानांतर सफलता के झंडा गाड़े शुरू कइली सन. 1986 तक के फिल्मन में लागी नाहीं छूटे, बिदेशिया, हमार संसार, दंगल, दुलहा गंगा पार के के विशेष रूप से चर्चा कइल जा सकऽता. लगभग सात बरिस का अंतराल में भोजपुरिया दर्शक त जइसे भोजपुरी फिल्म के भुलाइए गइल. दरअसल ओह घरी तक भोजपुरी फिल्म का ऊपर हिंदी फिल्म के मसाला फार्मूला पूरी तरह हावी हो गइल रहे. मौलिकता से कोसो दूर आ अपना माटी से भटकल भोजपुरी फिल्म के 2003 में फेरू से एगो नया जन्म मिलल ससुरा बड़ा पइसा वाला से, जेकर अभिनेता रहन लोकगायक मनोज तिवारी आ तबसे जे भोजपुरी फिल्मन के दौर चलल त नया-नया प्रयोग करत अजुओ पूरा गति में बा. ई बात दीगर बा कि आज कई गो भोजपुरी फिल्म बक्सा में बंद बाड़ी सन आ ढेर त मुँहहीं का भरे गिरऽतारी सन बाकिर तबहुँओ निर्माता लोगन के आकर्षण का केंद्र में त ई बिजनेस बड़ले बा. एहिजा ई कहल ज्यादे ठीक होई कि भोजपुरी फिल्म निर्माता लोगन के एह विषय पर मंथन करेके चाहीं कि काहें अतना असफल हो तारी सन फिल्म. फिल्म के कथानक का साथ-साथ गीत आदि के भी पृष्ठभूमि जो भोजपुरी के आपन मौलिक ना रही त नीमन दिन देखे के लोभ छोड़हीं के परी. लोकोगायन के चर्चा कइल ओतने जरूरी हो गइल बा काहें कि भोजपुरी समाज पर ओकर खासा असर बा. एह में कवनो संदेह नइखे कि आज भोजपुरी संगीत मड़ई आ चौपाल से उठिके राष्ट्रीय आ अंतर्राष्ट्रीय मंचन पर आसीन हो चुकल बा आ ई बहुत खुशी के बात बा बाकिर एकर आयोजन अतना महङा होखे लागल बा कि मड़ई आ चौपाल से ई जइसे अलोपिते हो गइल बा. पइसा आ प्रचार का लोभ में लोकसंगीत का सङे खेलवाड़ो खूब भइल. नया धुन का चक्कर में कवनो अवसर के धुन कवनो अवसर के गीतन में भी खूब ढुकावल गइल बा. अगिला पीढी खातिर लोकगीतन के वास्तविक धुनन के पहिचानल बहुत कठिन काम हो जाई. फूहड़ गीतन के बाढ़ि एकर रहलो-सहल कोर-कसर पूरा कऽ दिहलसि. फूहड़पन आ असभ्य भाषा के लोकगायन में जबर्दश्त प्रवेश भोजपुरी संस्कृति खातिर बहुत बड़ खतरा बा. भोजपुरी संगीत खातिर लिखे जाये वाला गीतन के रचनाकारन में साहित्यकार लोगन के संख्या ना के बराबर बा – ई एगो बरियार कारन बा एकर. संस्कार गीत, धोबी गीत, जँतसार, रोपनी के गीत, पचरा आदि लोकगीतन के संरक्षण आज के महत्त्वाकांक्षी गायकन का मिलावटी प्रवृत्ति का कारण चुनौतीपूर्ण हो गइल बा. एही तरह से सोरठी बृजभार, लोरकी आदि लोकगाथा आ गोंड़ऊ नाच, हुरका के नाच आदि लोकनृत्यन के बचावल बहुत जरूरी बा. एह संदर्भा में वर्तमान बाजार में प्रतिष्ठित गायक लोग आ महुआ, ईटीवी आदि चैनल जो रुचि देखाई त संरक्षण के उमेदि कइल जा सकऽता.

पिछला कई साल से संविधन के आठवीं अनुसूची में भोजपुरी के दर्ज करावे खातिर प्रयास चल रहल बा. एने एह में अउर तेजी आइल बा बाकिर सिवाय आश्वासन के कवनो परिणाम नइखे. एमें कवनो संदेह नइखे कि भोजपुरी भाषियन के संख्या भारत में बड़हन बिया, एकरा सङही विश्व के कई गो देशन – मारिशस, सूरीनाम आदि के मुख्य भाषा हऽ भोजपुरी. अइसना में एकरा साहित्य, संस्कृति आदि के विकासमान रूप में अउरी बढ़ंती खातिर जरूरी बा कि संविधान के आठवीं अनुसूची में एकरो नाम दर्ज होखो.

अब त कई विश्वविद्यालयनो में भोजपुरी के पढ़ाई चालू हो गइल बा आ कहीं न कहीं भोजपुरी से संबंधित चर्चा चलिए रहल बा – ई संतोष के विषय बा. बाकिर अतने से काम ना चली. खाली साहित्य-सृजन से बात ना बनी. साहित्य का अलावे भोजपुरी के भाषा रूपो पर मंथन कइल बहुत जरूरी हो गइल बा. भाषा शास्त्री लोगन के चाहीं कि बिना कवनो पूर्वग्रह के बिना समय गँववले एह काम में लागि जाईं. जब तक भोजपुरी के मानक रूपो के एगो मोटा-मोटी रूपो सामने ना आई तब तक व्याकरण आदि के लेखन ओतना महत्वपूर्ण नइखे.

लेकिन, एह सभसे जरूरी ई बात बा कि भोजपुरी के गैरसाहित्यकार वर्ग में ई जागरूकता ले आइल जाव कि लोग बाहर-भीतर हर जगह खुल के भोजपुरी बोलसु, खरीद के भा माङिके भोजपुरी के किताब आ पत्र-पत्रिका पढ़सु. एह तरह के जागरूकता अभियान भोजपुरी के अग्रणी संस्थान के चलावे के परी. बुद्धिजीवी वर्ग के दायित्व त अभी शुरूए नइखे भइल. अभी तक भोजपुरी के स्थिति ई बा कि ऊ अपने लोगन के नजर में सम्मान के भाषा नइखे. हमनी के बियाह, जनेऊ आदि हर तरह के परोजन खतिर नेवता, पोस्टर आदि हिंदी का सङहीं भोजपुरियो में लिखे शुरू करे के परी. भोजपुरी सम्मान के क्रांति अब ज्यादा प्रासंगिक हो गइल बिया. जब तक एह शून्य से सम्मान यात्रा के शुरूआत ना कइल जाई आ जब तक हर जुबान से भोजपुरी स्वाभिमान के रस ना बरिसे लागी, तब तक एह विषय पर कवनो गंभीर टिप्पणी महत्त्व नइखे राखत.


(भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के ६४वाँ अंक से. पूरा पत्रिका पाती के वेबसाइट पर मौजूद बा.)

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गीत


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 23वी प्रस्तुति)

– रिपुसूदन श्रीवास्तव

जिन्दगी हऽ कि रूई के बादर हवे,
एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे.

जवना घर में ना पहुँचे किरिन भोर के
जवना आँखिन से टूटे ना लर लोर के
केकरा असरे जिए ऊ परानी इहाँ
जहवाँ हर साँस बन्हकी बा बल जोर के
सउँसे इन्साफ के गाँव आन्हर हवे.
एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे.

कवनो मंजिल, ना साथी, ना सपना इहाँ
देश बाटे बेगाना, ना अपना इहाँ
राति बाटे अन्हरिया, फुलाइल नदी
नाव बाटे, न बा कवनो दियना इहाँ
गोड़ डगमग करे राह पातर हवे.
एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे.

कबहूँ तलफत भुभुर जेठ बैशाख के
शीतलहरी कबो पूस के माघ के
कबो फगुआ का राग में नहा के हँसे
कबो मातम मनावे घटल साख के
बुन्नी बरखा में पुरूआ के आँचर हवे.
एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे.

केहू चाहित त जिनगी बनित आज अस
केहू चाहित त चादर रहित जस के तस,
लोग दुनियाँ में बहुते पढ़ल आ गुनल
आदमी के कथा पर कइल ना बहस,
केहू बाँचल कबो ना, ई आखर हवे.
एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

‘गंगा-तरंगिनी’ (पुस्तक समीक्षा)

जिये-जियावे क सहूर सिखावत अमानुस के मानुस-मूल्य देबे वाली ‘गंगा-तरंगिनी’
‘गंगा-तरंगिनी’ (काव्य-कथा) अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर. मूल्य – पचास रुपये.
प्रथम संस्करण. कवि – रविकेश मिश्र

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 22वी प्रस्तुति)

– सांत्वना द्विवेदी

गंगा के दूनो पाट मनुष्य के जिये आ जियावे के सहूर सिखावेला. ओकरा भव-बोध के नया आधार नया विस्तार देला. गोमुख-गंगोत्री से निकलल गंगा उत्तराखंड से यू.पी., बिहार होत पच्छिम बंगाल गंगासागर तक का यात्रा में पहाड़, जंगल आ खेती के त जीवनी-शक्ति मिलबे करेला, पशु-पक्षी आ मानव के यति-गति आ प्राण मिलेला. रास्ता में ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग आ काशी जइसन जगह गंगा का निर्मल जल का पवित्रता के धरन कइला से, पुण्यवान तीरथ बन जाला. परलोक से लोक आ लोक से लोकोत्तर क यात्रा ह ई गंगा. ‘भारतीय मन’ – खास कर ‘लोकमन’ से शाश्वत संबंध बनावे वाली गंगा राह में जवना-जवना नदियन से मिलि के ‘संगम’ रचेली ऊ जगहिये पतितपावन हो जाला. ओइजा स्नान कइ के लोग तन-मन निर्मल करेला. गंगा का प्रति अनुरागी आस्था आ विश्वास के, ‘लोक मन’ में बढ़ियात लहर आज तक नइखे थमल – चाहे ऊ जतना बढ़ियासु भा बहावसु, इहाँ के लोगन के जिये-मुवे दूनो हालत में गंगाजी रोग-शोक-पाप नाशिनी परम फल दायिनी बाड़ी.

त एही गंगा क ‘स्मृतिबोध’ करावत, एक सौ सोलह सवैयन क संग्रह हवे – पं. रविकेश मिश्र के ‘गंगा-तरंगिनी’. लोक-भावना आ आस्था के सँजोवल, इतिहास-परंपरा आ संस्कृति के सहेजल, ‘महिमा’ आ ‘महातम’ क सकारल मानवी-विवेक के नाँव हवे ‘गंगा-तरंगिनी’. गंगा के उद्गम, अवतरण, लीला-यात्रा के अतीत आ वर्तमान से जोड़त रविकेश मिश्र गंगा के आज के विडंबनामय-जथरथ से रू-ब-रू करावत बाड़न जवन में गंगा के अस्तित्वे दाँव पर बा. जवना में ऊ जनतंत्री दोमुही-ढुलमुल-राजनीति के शिकार होत बाड़ी, जवना में मानव-मूल्यन क छीजत-भिहिलात आ अतिक्रमण क भेंट चढ़त बा. गंगा आ उनकर दूनो पाट बड़-बड़ शहरन का गंदगी, कचरा आ सड़ांध के बटोरत, समेटत गंगा से मनुष्य क दूरी दिन पर दिन बढ़वले जा रहल बा.

भोजपुरी भाषा के बेंवत आ ताकत से, ‘भोजपुरी मन’ के सरधा-विस्वास आ चिंता-फिकिर से भोजपुरी क्षेत्र का सोच-सरोकार आ भावना से जुड़ि के ‘गंगा जी’ के ई स्तुति-स्तवन, प्रार्थना-निहोरा अद्भुत बा. गंगा-तरंगिणी में 116 गो सवैया संकलित बा. कवि का अनुसार ‘लोकमन’ में बसल, ‘लोक संस्कृति’ में रचल-रमल गंगा के वर्तमान दश के व्यथा-कथा कहला का साथ-साथ ‘गंगा के बहाने देश-दुनिया के खोज-खबर लेहल’ चाहऽता. सुधी-सहृदय-संस्कारित-सुसंस्कृत कवि पं. रविकेश मिश्र, का भीतर गंगा के जवन छवि-छटा उभरल, ओके सजीवे उरेहे आ आस्थावान लेख गंगा के विमल-सुयश गावे-सुनावे में ‘गंगा-तरंगिनी’ के रचना भइल होई, एम्मे कवनो शक-शुबहा नइखे. खुशी एह बात के बा कि गंगाजी के बहाने कवि जब अपना देश आ समाज के अंदरूनी चाल-ढाल के पड़ताल करत बा, त तटस्थ नइखे रहि पावत ओकर धार आ तेवर बदल जाता. उहाँ ऊ गंगा के जरिये बिगड़ल ‘जनतंत्र’ के छिपल चेहरा देखावे के सार्थक उतजोग करत लउकत बाड़न.

‘सुमिरन’ के पहिली लाइन में गंगा जी के ‘गणेश के माई के सौति’ कहलें बाड़न, एगो पिटा-पिटाइल परिपाटी पर चलके उनकर बखान नइखन कइले, एगो देवी के रूप् में सुंदर से सुंदरतम बनावत, नख-शिख वर्णन नइखन कइले. गंगा माई कइसे भरत के गँवई संस्कृति से जुड़ल बाड़ी एकर वर्णन ‘रोटी-बेटी’ में लिखत ख रविकेश मिश्र कहत बाड़ें –
‘ओही कमाई में सबके समाई बा,
मनई से चिरई-चुरूंग के हिस्सा.’

माने सभकरा के साथ लेके चले वाला संस्कृति में परिवार के सदस्य निहर हिस्सेदारी करत गंगा माई. ई कृति लोक संस्कृति के संगे-संगे गंगा मइया के रूपक के जरिये एगो अउर खस संस्कृति के परिकल्पना करत बा, ऊ ह लोकतंत्र के संस्कृति, जहाँ ऊ कहत बाड़न कि छोट आदमी, होखे भ बड़, कौनो जाति धर्म के होखे, भले ऊ देश के पूर्व प्रधनमंत्री जवाहरलाल नेहरू होखस सभकर, राखि ओही धरा में समाविष्ट हो जाला.
लंदन लौटल नेहरू के भी जब
राखि समेटि एही में फेंकाला.

अपना भूमिका में रविकेश मिश्र एह बात के स्वीकारो कइले बाड़न कि ‘जवने तरे गंगा ब्रह्मा के कमंडल में रहि के व्यक्तिगत संपत्ति रहली आऽ फेर सार्वजनिक हित खातिर धरती पर अइली, का ई एगो रूपक नइखे हो सकत – सत्ता के, समृद्धि के – व्यक्तिगत राजशाही से मुक्त होके लोकतंत्र के रूप में ढलले के.’ गंगा राजा के ना, लोक के बाड़ी.

संस्कृति और परंपरा से जुड़ल गंगा के एह रूप में देखला में आधुनिक सोच बा एगो आधुनिक दृष्टि बा जवना से एह कविता के एगो सांचा दिहल बा. एह कृति के खूबसूरती, एहकर गरिमा एही मंतव्य में छुपल बा. हमनी के आज समाज में जवन आधुनिकता ले आवे के कोशिश करऽ तानी जा. या विद्वान लोग जवन यूरोपियन आधुनिकता के नकार के भारत के आधुनिकता के देशज आधुनिकता कहत बाड़ें अउर ओकर बीज मध्ययुग के साहित्य में परंपरा से जोड़ के देखत बाड़े, ओह लोगन के तनी झांक के एक बार हमनी के क्षेत्रीय साहित्यो, लोक साहित्य में भी देख लेबे के चाहीं.

काफी समय बाद भोजपुरी में लंबी कविता देखे के मिलल, खुशी भइल कि कृतिकार एके प्रबंध काव्य नइखन बनवले. लमहर कविता लिखे के परिपाटी लगभग खतमे होता, अइसने में एह विधा के प्रयोग कइल अपने आप में बेजोड़ बा. अउर ओहू से बेजोड़ बा एह कविता में भइल प्रयोग. मिश्र जी कविता के कुछ उपशीर्षक भा मथेला में बंटले बाड़े जइसे ‘कथा-पुरान’, ‘लोक-मत’, ‘आपन-मत’, ‘रोटी-बेटी’ आदि. लेकिन ओकरा के बँटलो के बाद कविता के लय गंगाजी के धार नियर टूटल नइखे. मिश्र जी खुद भी मानेलन कि ‘कविता आ नदी के धार मनमौजी ह.’ आ भाषा त ठेठ माटी में सनाइल बिया, ओह में शिष्टता खोजल मूर्खता होई, इहे एह कृति के सफलता ह कि ई लोकजन खातिर ह अभिजन-खातिर ना. कालातीत कवि हमेशा कृति पर कम रचना-प्रक्रिया पर ढेर कहे के कोशिश करेला, मिश्र जी के ई पंक्ति हमके अज्ञेय के ‘शेखर: एक जीवनी (1)’ के भूमिका के याद दियवलस –
तीस बरस ले बीज पकल,
टकटोरत राह, न लांघत घेरा.

बिम्ब अइसन बाटे कि अगर रउवां ओह संस्कृति, परंपरा, आ माटी के रग-रग से वाकिफ नइखीं त रउवां बुझाई ना. जे सूर्य भगवान अउर संध्या के बियाह, फेरू, यम और यमुना के जन्म, संध्या के छोड़ के गइल आ बाद में अइला के मिथक जानत होई उहे एह पंक्ति के बूझ सकेला – ‘साथे बहावें कलिन्दी के ऊ, जमराज भी आवे त बार न टूटी’.

वर्तमान में गंगाजी के जवन स्थिति बा ऊ शोकजनक बा. भूपेन हजारिका के गीत याद आवत बा ‘ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों?’


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
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हम जरूर आइबि !


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 17वी प्रस्तुति)

– गदाधर सिंह

हम ओह राति में अधनिनियाँ में रहीं. अचके में हमार खटिया हिलल, खट-पट भइल आ हमार आँखि खुलि गइल. हम का देखतानी कि हमरा खाटी के ठीक लगे एगो पाँच-छव बरिस के कमनीय काया खाड़ बा. ओकरा मुँह पर अजबे किसिम के आभा रहे. हमरा बुझाइल कि हमरा कोठरी में सुकवा तरेंगन उगि आइल बा. हम भकुआ गइनीं आ लगनीं अचकचा के ओकरा के घूरि-घूरि के ताके. ऊ कवनो छाया-परछाई ना रहे आ ना सपना रहे. चेहरा चीन्हल बुझाइल. ऊ बोललि – तू चिन्हलऽ हमरा के ? हम कबसे खाड़ बानी. आं तूँ सूंतल बाड़ऽ. लगनी इयाद करे, इयाद परि गइल – ऊहे रूप, उहे कद काठी, उहे बोली, उहे आत्मीय हास्य ! ऊहे वात्सल्य-भाव.

– अरे सोमारो, हमार सोमरिया ? तोहरा के देखला ढेर दिन भइल रहे, ढेर दिन से तोहरा से भेंटे के मन करत रहे, मन ना मानल. चलि अइनीं हाँ. ऊ का-का दो अवरू कुछ कहलसि. हम चुप-चाप सुनत रहनीं – हमरा मुँह से बोली फुटबे ना कइल, ना जाने कवना भव-लोक में हम चलि गइलीं.

दरिआव के उफनत पानी लेख आँखि से झर-झर लोर बहे लागल. मुँह से बोली ना निकसल, ऊहो कुछ ना बोललि, बाकिर ओकरा आँखि से लोर के जवन पनार बहत रहे, ओह से हमार सउँसे देहि भींजि गइल. हमरा बुझाइल कि हम पाँच-छव बरिस के लइका बानीं आ हमरा भिरी बइठल बाड़ी हमार बाल-सखी- सोमारो, सोमारिया.

हमरा अचरज के मौन तूरत ऊ पूछली – नीक से बाड़ऽ नू ? हम इयाद परींला ? सोंचले रहनीं कि ईया आ भउजी के गोड़ लागबि, बाकिर मन मसोसि के रहि गइनीं. अब दूनों जानीं नइखीं. कतना छोह करत रहीं जा ? ‘एह घरी तूँ’कहाँ रह तारू ? कहाँ से आव तारूँ ? हम पूछनीं. हमार घर देखते नइखऽ ? ऊहे कबूरवे नू हमार घर ह ! ना जाने कतना बरिस, कयामत तक ओही में रहे के बा.बड़ा तकलीफ होला ओह में, बाकी करीं का ? मन उजुबुजा जाला त एने-ओने तनी मनीं घूमि-फिरि लीहीं ला. ना रहाइल हा त चलि अइलीं तोहरा से भेंट करे. हम कहनीं कि हमरे भिरी रहऽ ना ? एने-ओने छिछियाइल चलऽ तारू ? ऊ जबाब ना देली. खिरकी के बहरी तकली – आन्ही चले लागल रहे. ऊ कहली – झट से उठऽ, आन्हीं बहे लागल, बगइचा में आम गिरत होई, देरी करबऽ त लँगड़ा आ इसमइला पहिलहीं पहुँचि के आम बटोरि लीहें स. आम बीने के नाँव सुनते, हम खाटी पर से नीचे कूदि गइनीं, झोरा उठवनीं आ दूनों आदमी दउरनीं जा बगइचा के ओर. अइसे त बगइचा हमरे रहे, बाकिर आम लूटे में लइकन के जवन मजा मिलेला ओकरा के उमिरिगर आदमी का बुझिहें ? लइकन के एगो गोल बगइचा में पहुँचि गइल रहे. हम लइकन के आम लूटे से बरिजनीं त लइका जानि के इसमइला हमरा से अझुरा गइल. इसमइला सभ लइकन में बरिआर रहे. बस, सोमरिया इसमइला के अइसन चमेटा मरलसि कि इसमाइल राम चार ढिमिलिया खा गइले आ एक जना जब सोमरिया पर छड़ी चलवले त ऊ उनकर गरदन अइसन चींपलसि कि लगलन काइँ-काइँ करे. हम कहनीं, वाह रे सोमारो, तें अतना बरिआर बाड़े, हम ना जानत रहीं. लइका लोग चलल पराइ. आन्ही थमल त मचान पर बइठि के हमनीं के आम के चेका मारे लगलीं जा. सोमारो बड़ खुश रही. हम कहलीं – सोमारो ! एकबाल के बछिया हमरा के मारि देले रहे, त तें कतना रोवति रहलसि, इयाद बा नूं ? हँ इयाद त बड़ले बा. हमरो इहो इयाद बा कि पोखरवा में नहाये के बेरिया हम डूबे लगलीं त तूं कतना चिचियात रहलऽ ? तूं त आपन गमछी फेंकलऽ बाकिर तूहूँ फेंका गइल आ लगल तूहूं डूबे. ऊ त अमीन दादा हमनीं दूनों के छानि लेलनि नाहीं त. .. काली मइया के दोआ से हमनी दूनों के जान बाँचि गइल.

हमरा इयाद बा कि सोमारो दिन भर हमरे घरे रहत रही. साथे-साथे गोटी खेलबि जा, साथे-साथे पंडित जी के इहाँ मोट बस्ता लेके जाइबि जा. ढेर रद्दी कागज भरि के बस्ता के मोट बना देबि जा. हमार माई जब हमरा के खाये के दीही त साथे-साथे सोमारो के थरिया परोसाई. जवन हम खाइबि तवने सोमारो खइहनि, बाकिर उनकर छीपा अलगे रही. मन त करे कि एके छिपा में हम आ सोमारो साथे-साथे खाईं जा बाकिर माई बरिजि दीही. हमरा बुझइबे ना करे कि हिन्दू-मुसलमान का चीज ह ! हमार बहिनियाँ जब हमरा संघे खाले त सोमारो काहे ना खइहें ? एहसे जब हम रूसि जाइबि माई दुलार से कही कि सेयान होखब त दूनों के बिआह क देबि. ई सुनि के सोमारो खूबे खुश हो जासु बाकिर जब माई हँसे खातिर कहि दे कि सोमारू तू बदमासी करतारू ! तोहार बिआह एकरा संघे ना करबि, त सोमारो मुँह फुला के खइबे ना करसु. माई जब उनका के मनाईं आ दूनों के बिआह करेके बाकित कही त खुश हो जासु. एक दिन भउजी मनचउल करे खातिर कहि देली कि तें रोज-रोज का आवेलिसि ? लरिकवा के बिगरबे का? एह पर सोमारो रोवास मुँह बनाके कहली कि इनका के काहे नइखू बरिजत ! हम कवनो दिन लकड़ी बीने चलि जाईंला, त हमरा के बोलावे खातिर हमरा घर चलि आवेले. इनकर झँवाइल मुँह देखि के हमरा मोह लागे लागेला. माई हँसि के सोमारो के पीठि थपथपा दीही आ कही – ना हो सोमारो, तू रोजे आव, तू अपने नू बेटी हऊ ! दूनों के बिआह हम जरूर करबि.

दू दिन बीत गइल. सोमारो हमरा घरे ना अइली. हम एने जाईं, ओने जाईं, मने ना लागे. माई कहली कि सोमारो के लूक लागि गइल बा. बिना खइले-पियले तेज धूप में ओकर भउजाई लकड़ी बीने खातिर भेजि दीहले रहली हा, बस लूक के चपेट में धरा गइली. माई के बात सुनते हम दउरि के उनका घरे चलि गइनीं. देहिया छुअनीं त ओकर सँउसे शरीर आगि के भउर लेखा तवत रहे. उनका सँउसे देहि में आम पका के छापल रहे. ऊ आँखि मुँदले रही. कुछु बोलली ना. हमरो रोआई आ गइल. हमरा के लोग गोदी में उठा के घरे पहुँचा दीहल. रात भर सुतलीं ना. बुझाव कि कवनों भकाऊँ हमरा के धइले बा. हम रहि-रहि के चिचिआए लागीं. माई डेरा गइल आ मिरिए के जतन बाबा के बोला के झाड़-फूँक करवलसि. पाँ बाबा बुदबुदा के कुछ मन्तर पढ़ले. माई सवा गो रोपेआ ओंइछि के जतन बाबा के दिहलसि. फजिरे उठनीं त मन ना लागे. दउरि के सोमारो के घरे चलि गइनीं. हम का देखतानीं कि धप-धप ऊज्जर कपड़ा में सोमारो के ढाँपल रहे. उनका के उठा के लोग कबूरगाह में ले गइल. हमनी लइका सभ डरे ना जात रहीं जा. लोग बतिआई कि कबूरगाह में कवन-कवन दो जिन्ना-भूत रहेले सं. बगले में इमली के बड़का फेंड़ पर कवल बाबा रहेले. उहे लइकन के जिन्ना-भूतन से बचावे ले. ना जाने हमरा में कवन शक्ति आ गइल कि हम दउर के कबूरगाह में चलि गइनीं. सोमारो के एगो लकड़ी के तख्ता पर सुतावल रहे. बगलीं गाँव के मोलबी साहेब आइल रहले. ऊ का-का दो मन्तर पढ़ले आ आखिर में हमरा सोमारो के खेदल गड़हा में सुता दीहल गइल आ ऊपर से अइसन माटी भराइल कि जइसे ऊ छत के नीचे सुतल होखसु. हम चिचिया के लगलीं रोवे आ कबुरगाह जाये के छरिआये लगलीं. लोग दउरिके हमरा के धइल. हम कई दिन ले बोखार में पड़ल रहनीं. नीमन भइनीं त लुका के कबुरगाह चलि जाईं आ सोमारो-सोमारो कहिके बोलाईं. ओने से कवनो जबाब ना मिले त खिझिआ के ढेला उठा के मारीं. लइका हल्ला क देहले स कि ई कबूरगाह में जाके सोमरिया-सोमरिया कहिके चिचियाला. तबसे हमरा पर पहरा परि गइल.

आजु सोमरिया के अपना लगे देखि के मन खुश हो गइल बाकिर रुसि के कहनीं कि हमरा के छोड़ि के तें काहे चलि गइले ? एहिजे आके रहु. ऊ कहली कि हम त हवा नू हो गइल बानीं. हमार कहनाम रहे कि तें हमरो के हवा बना ले आ अपना संगे ले चलु. तोरा बिनु हमार मन नइखे लागत. ऊ हमार मुँह चाँपि देलसि. कहलसि कि अइसन बोलबऽ त हम तोहरा से बोलबि ना. अरे हम त गरीब रहनीं, दवाई ना भइल त हम हवा हो गइनीं. तूँ मन लगा के पढ़ऽ लिखऽ, बड़ आदमी बनऽ. माई कहत रहली तोहरा से हमार बिआह करेके. अब हम जा तानीं. तोहार बिआह देखे हम जरूर आइबि – हम भकुअइले खुलल खिरकी से बहरा ताके लागल रहीं.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
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राघव मास्टर


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 16वी प्रस्तुति)

– गिरिजा शंकर राय ‘गिरिजेश’

गांव में प्राइमरी स्कूल खुलते चारो ओर खुशी के वातावरण छा गइल. एकरा ले पहिले सब डेढ़गांवा जात रहे. जहिया ना जायेके मन करे कोइरिया का संऊफ का खेत में घुसके सब बइठ जाय आ बीचे में गमछा बिछा के तास जमक जा. एक दिन ई खबर स्कूल पर पहुँच गइल आ खेदन मास्टर लइकन का साथे आके खेत में लुकाइल लइकन के पकड़ लिहलन. ओह दिन खूब पिटाई भइल रहे. कइगो बांस के कइन टूट गइली स. केतने जाना का पीठ पर गोहिया पड़ गइल रहे. गांवे स्कूल खुलल त सब एह बात से खुश रहे कि अब लइका पढ़ लिहें स. अब त आवत जात सब देखियो लेई. अब कहाँ सऊफ का खेत में लुकाये के मोका मिली.

राघो मास्टर पहिला मास्टर रहलन जवन स्कूल पर तबादला पर आइल रहलन. पूरा नांव राघव प्रसाद रहे बाकिर राघो मास्टर का नांव से सभ गोहरावे. ठिगना सरीर, गोल चेहरा, आंख पर मोट सीसा के चश्मा, आधा बांहि के खद्दर के कुर्त्ता, खद्दर के धोती, गांधी आश्रमी जूता, रंग सांवर, हाथ में बकुड़ी वाली छड़ी इहे उनकर पहिचान रहे. चलसु त छड़ीसे ठेघत-ठेघत चलसु. बाकिर पढ़ावे में एक नम्बर के रहले. लइका त तारीफ करबे कर सु. स्कूल के नांवो भइल रहे. उनकर गांव एहिजा से पाच-छः किलोमीटर होखी एहसे खली शनीचर के धरे जासु. अतवार के घरके काम करसु, सोमवार के फेनु स्कूल पर हाजिर हो जासु. अक्सर ऊं रुक जासु. स्कूल का बगले में बत्तक बाबू के दुआर रहे. ऊ ओहिजे रुक जासु आ हर लइका कीहें पारी बान्ह देले रहलन. साझ के त खियइबे करे सबेरहू के भार ओही पर रहे. छठवां छः मास केहू के नम्बर आवे एह से सब स्वीकार कइले रहे केहू विरोध ना कइल. घरन में भोजन करत राघो मास्टर घरऊ हो गइल रहलन. गांव में घर-घर के मेहरारू उनकर परिचित रहली स. सबकर उनकरा पर विश्वास रहे. गांव के पंचाइतो करसु. आज काल्हु त घरे-घरे विवाद बा. राघे मास्टर कीहें कवनो न कवनो मामिला आइल करे ऊ ओके सुलझा देसु. एह से गांव के लोग अउरी माने. एकरा बारे में उनकर कवनो सहयोगी डिप्टी साहब से सिकाइत क देले रहे जवना पर मास्टर साहेब के तबादला दूसरा गावें हो गइल रहे. जब ई खबर आइल त गांव के लोग के खिनिस चढ़ि गइल. ऊ लोग प्रधान का साथे जिला परिषद् का चेयरमैन कीहें धरना दे दिहलन. मजबूर होके तबादला रोके क परल. बाद में बेसिक शिक्षा अधिकारी का अधिकार में प्राइमरी स्कूल आ गइल. मास्टर साहब के लोकप्रियता देख के उनकर हिम्मत ना पड़ल कि फेनु कबों उनकर तबादला करो. केतने मास्टर अइलन गइलन बाकिर राघे मास्टर खैरा पीपर हो गइलन आ ना डोललन.

पता चलल मास्टर साहेब बेमार बाड़न. गांव भरके मरद-मेहरारू उनकर हाल-चाल लेबे खातिर गांव पर जमि गइलन. जे जाव फल फूल का साथे जाव. एतना फल आइल कि महिनवन मास्टर खइलन. गांव के नेह देखके ऊ निहाल रहलन. राघो मास्टर का तीन लइकिये रहली. तीनों क बहुत मानस. केहू लइका के बात करे त ऊ कहसु का लइका का लइकी. कुल्हि भगवाने के बनावल ह. नइखऽ सुनले कहल जाला कि लइकी जनमें ले त दू खनदान जुटे के बात होले. लइका जनमेंला त घरके देवालि दरक जाले. अंगना में डड़वार उठे के तइयारी हो जाले. मास्टर क बड़की लइकी का बियाह में सगरे गांव से नेवता गइल रहे, जवन बेटी के बियाह के भारे ना मास्टर पर पड़े दिहलस. देखते-देखत अउरी दूनो लइकिन के बियाह मास्टर क दिहलन. घर वर बड़ा अच्छा खोजले रहलन.

समय पांखि लगा के उड़त रहे. एक दिन खबर आइलि का राघव मास्टर रिटायर हो गइलन. गांव भर में ई बाति फइल गइल. जे सुने ऊ मास्टर कीहें आके पूछे. बाद में एगो शनदार विदाई समारोह के आयोजन कइल गइल रहे. सभकरा घरसे भेंट आइल. केतने आदमी त समारोह में बोलत के मास्टर साहब के स्नेह क चरचा करत भोंकारि मार के रोवे लगलन. मास्टर सबके धीरज बन्हावत कहलन ”आइल गइल त संसार के नियम ह. हमनी का सभे एह नियम में बन्हाइल बा. स्कूल से विदा होत बानी रउरा मन से कहां विदा होत बानी. हमरा मनमे आ रउरा मन में हमनी का सदा बसल रहब जा. जब बोलाइब तब हम आइब. केतना दूर गांव बंटले बा. आ सांचो रिटायर भइला का बाद काज-परोज में त मास्टर अइबे करसु ओहू तरे जब मन अगुता त भागल उधरनपुर चल आवसु. लोग उनकर ओहितरे भाव करे जइसे पहिले सब करत रहे.

मास्टर गांव में आवसु जेही कीहे मन करे ओकरा कीहें भोजन के कढ़वा देसु बाकिर रहसु बत्तके बाबू के दुआर पर. चाह-पानी के बेवस्था उनकर ओहिजा परमानंद रहे. रिटायर भइला पर पेंशन मिले. ऊ दूनो बेकति खातिर बहुत रहे. मास्टराइन एतना किफायत कके खरच करसु कि ओहू में बच जा. जमीन जवन रहे तवन मास्टर तीनों लइकिन का नांवे करवा दिहलन. एहसे उनकर दयाद उनकरा पर बड़ा नराज रहलन. उन्हन खतिर राघो मास्टर ले खराब आ खनदान के दीया बुझावे वाला केहू दूसर ना रहे. बाकिर मास्टर का एकर कवनो चिन्ता ना रहे. ऊ अपना धुन में रमल रहलन. गांव में तनिको जीव घबड़ाय त उधरनपुर के रास्ता धरसु. कबों कबों मास्टराइनो आ जासु. शादी बियाह में त मास्टर साहेब परधान रहसु. का का जलपान में बनी, खाये में का का रही. भण्डार के बेवस्था कइसे रही, परोसे वाला कइसन रहिहन जवना से खाना जियान न होखे ई कुल्हि के बेवस्था में राघो मास्टर क भूमिका प्रमुख रहे. मड़वा में कवनो बात बिगरे ना एह पर उनकर विशेष ध्यान रहे. कवनो मुद्दा उठ जा त ओके हल करावे में ऊ जीव जान लड़ा देसु.

ओह दिन राघो मास्टर जिलेबा भउजी कीहें बइठल रहलन. एहर ओहर के बात होत तीरथ-बरत पर बतकही होखे लागल. भउजी कहली मास्टर साहेब ! रउरा त खुदे दूसरा के गियान देइला हमका समुझाईं. अनपढ़-गंवार हई बाकिर एतना जानीला कि ई दुनिया मोह माया ह. आपन करतब कइला का बाद एह मोह का बंधन से निकले के चाही. एह तइयारी में तीरथ एगो कड़ी हउवन स. तीरथ कइला से मन में विराग जनमेला. रउरो कुछ तीरथ क आईं. हम त इहे कहब ई कुल्हि मोह माया के बाजार छोड़ी. अब त राउर तीरथ करे के उमिरो हो गइल बा.

भउजी के बात सुनके राघो मास्टर का चेहरा पर एगो हल्लुक हंसी आइल फेनु कहे लगलन – रउरा ठीके कहत बानी हम ओकरा खिलाफ नइखी बाकिर आपके बतावत बानी कि हम ‘कन्या तीर्थ’ कइले हईं. तीन-तीन बेटिन के कन्या दान कइले हईं. शास्त्रन में लिखल ह कि –
तिस्त्र कन्या यथान्याय पालयित्वा निवेद्य च
न पिता नरके याति नारी वा स्त्री प्रसूयिनी.
अर्थात् जे तीन कन्याओं को विधिवत पाल-पोस कर उन्हें योग्य वर को ‘दान’ करता है. उसे नरक की प्राप्ति नहीं होती. मुझे गर्व है कि मैंने अपनी तीन बेटियों का दान दिया है. एतना कहला का बाद मास्टर साहेब का चेहरा पर एगो तेज चमक गइल, जवना में संतोष झलकत रहे. ऊ कहले एह तीर्थ कइला का बाद अब के तीर्थ करे. एहसे बड़हन तीर्थ कवनो नइखे. लोग कहेला कि बेटा उद्धार करेला हम एके सोच के तनिको चिन्तित नइखी. काहें कि अपना लइकिन पर हमरा गर्व बा. उन्हनी का हमार सबकुछ बाड़ी स. उन्हन बिना हम जीये के कल्पना ना क सकी.

राघव मास्टर कहलन – हमहूं रउरा से उहे कहलीं ह जवन हमरा मन में आइल ह. लइका-लइकी में हम कवनो फर्क ना करी. आ ई त भगवान के मरजी ह. ऊ ना जानत होखिहें कि बेटा ना भइला से एकर मुक्ति ना होई ? अगर एके जानत होइतन त बेवस्था करतन. ई कुल्हि आदमी के बनवल ह. भगवान के त जबरन घुसेड़ दिहल बा.

भउजी फेनु बिचहीं में टोकली, मास्टर जी, हमार ई ना विचार रहल. ओकरा पीछे एगो भावना रहलि ह. जमीन-मकान लइकिन का नावें तूं झटके में क दिहल. तोहार दयाद जनबे ना कइलन. अगर बात फूट गइल रहित त तोहके ऊ कबों ना लिखे दिहले रहतन स. एह बात के लेके बड़हन बवण्डर उठि गइल रहित. एह बात पर गांव भर उन्हन का साथे बा. गांव में कवनो दूसरा कुरी के लोग भा नवासा ना रहे दिही लोग. तूं अकेल पड़ जइब. ई सही बा कि कानूनी रूप से राउर पछ मजबूत बा बाकिर समाजो त कवनो चीज ह. ऊ नराजगी अबही आजो बा. हम चाहत रहलीं ह कि तीरथ का नाव पर कुछ दिन हटि जइतीं त मामिला ठंढा जाई. फेनु के केके पूछत बा.

मास्टर साहब हंसत कहलन – अरे हमार केहू कुछ ना करी. रउरा हमार हित-मीत बानी एही से हमार भलाई सोचत बानी. अबहीं बात होते रहे तबले एगो लइका आइल आ कहलस कि बत्तक बाबू बोलवले ह. मास्टर साहेब तुरते बत्तक बाबू का दुआर पर अइलन. बत्तक बाबू कहलन – हई छांगुर भई बइठल बाड़न. एह लोग में बंटवारा रउरा काहें नइखी करवा देत. कहत बाड़न कि कई दिन ले धउरत हई बाकिर मास्टर साहब के मोके नइखे लागत.

राघो मास्टर कहलन – बत्तक बाबू उधरनपुर में कवनो परिवार अलगा होला त ना जानी काहें हमार मन दुखित हो जाला. पूरा गांव एक परिवार बा एह में कवनो टूटन हमके नीक ना लागे बाकिर जब चलावं नइखे त हम बटवारा त कराइये देव. चलऽ छांगुर लट्ठा आ जरीब लेले चलिहऽ. लट्ठा-कठा होखी तवन जोड़ घटाके निकाल देब. छांगुर के लेके राघो मास्टर बंटवारा करावे चल गइलन.

ओह दिन पूरा उधरनपुर में कोहराम मच गइल रहे. सबेरे मुनेसरा खबर लियउवे कि राघो मास्टर मू गइलन. काल्हु साझ ले ठीक रहले ह. खाना खाके राति के सुतुवन त मस्टराइन से कहत रहुवन उधरनपुर गइले कई दिन हो गइल बा. काल्हु ना होखे त तूहूं चल. मास्टराइन हामी भर दिहुवी. आज सबेरे जब मास्टर साहेब ना उठलन हा त ऊ जगावे गइली ह. मास्टर साहेब पांचे बजे उठ जात रहलन ह. जब झकझोर के उठउवी त मास्टर साहेब क मूंडी एक ओर लटकि गइल रहुवे. सुतले में उनकर प्राण शरीर छोड़ दिहले रहुवे. गांव के लोग राघो मास्टर का गांवे पर उनका घरे पहुंच गइल. कई अदमी आ मेहरारू भोंकार मारि के रोवत रहुए.

राघो मास्टर के लाशि टिकठी पर कफन ओढ़ाके सुतावल रहुवे. क्रिया कर्म करे से, दाग देबे से देयाद इनकार क देले रहुवन स. दयादन के कहनाम रहुए कि लाश हमनी का श्मशान घाट पहुंचा देइब जा बाकिर मुखाग्नि हमनी का ना देइब जा. मास्टराइन रोवत सुसकत लोगन से हथजोरिया करत रहुवी बाकिर केहू तनिको ना पसिजुवे. सब सोचमें रहुवे कि का होई. एही बीच में उनकर तीनों बेटी, दमाद एगो वकील साहब का साथे चहुँपले. वकील साहब कहलन कि राघो मास्टर के अंतिम इच्छा रहल ह. हम ओके सुना देत बानी ओही का अनुसार किरिया कर्म होखी. वकील साहब पढ़े लगले – ‘हम राघवेन्द्र प्रताप पूरा होशोहवास में लिख रहल बानी कि हमरा मुअला पर हमरा मुंहे आगि हमार बेटी दमाद दीहे. खासतौर पर ई काम छोटकी बेटी आ दमाद का जिम्मा सौंपत बानी. बाकी क्रिया कर्म हमार दूनो बेटी दमाद करिहें. दयाद लोग हमार लाश मत छुई. हमरा कवनो पछतावा नइखे. बेटिन पर हमरा गर्व बा.’

वकील साहब पढ़ि के चुपा गइलन. इहे भइबो कइल. राघव मास्टर क लोक परलोक दूनो पूरा भइल. पुरान रूढ़ि तूरि के नया बिचार के स्थापना का सांथ.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
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भिच्छा


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 15वी प्रस्तुति)

– आशारानी लाल

जब ना तब हमके बइठल देख के ऊ हमरा सोझा धमक जाले. दूर से चलल-चलल आवेले एही से थाकलो लउकेले. ओकरा तनिको अहस ना होला. इहो ना सोचेले, कि बड़ लोगिन के सोझा चाहे हमा-सुमा के लगे जइसे-तइसे आ जब-तब आके खाढ़ ना होखे के चाँही.

कबो हम ओकरा ओरी ताकिलाँ तऽ कबो महटिया जाइलाँ. हम ओके अन्हेरिया, गरीब-गुरबा, चाहे बउकड़ बूझ के ना महटियाइलाँ. इहे सोचिलाँ कि ओकरा से हम का बतियाइब. न तऽ ऊ हमार बात बूझी, न हम ओकरा के बूझब. ऊ बूझो चाहे ना, अपन लटकल मुँहवा हमके देखाइए दी, ना त कबो-कबो लोरो चुआवे लागी – तब हम का करब.

अइसे देखेमें ऊ करिया रंग के दूबर-पात तनी लमहर मेहरारू लउकत रहे. ओठवा ओकर दुनु बन्दे रहत रहे, तऽ दाँत कमें लउकल करे. ओकर दूनो उज्जर-उज्जर आँख, ओकरा मुँहे पर सही सलामत लउक जाइल करे. कवनो बात पुछलो पर, ऊ जल्दी बोलत ना रहे, अपन मुड़िए हिला-हिला के आ नटई घुमा के, ऊ कुल बात के जबाब दे देत रहे. भर टोला रोजे घुमल करे, तबो ओकरा में लाज भरल रहे. कवनो मरद-मानुस के सोझा ऊ अपन साड़ी अपना माथे पर से खींच-खाँच के मुँहवा ढाँक लिहल करे – जवन ओकरा लजइला के चिन्हासी लागे. बार तऽ ओकर हरदम अँझुराइले-खँझुराइल रहत रहे, काहे कि बार झारे के मोका ओके कबो भेंटइबे ना करे. भोरहीं से अपना धन्धा में जोता जात रहे. ओकरा लगे बहुते लोगिन के अढ़वल काम पड़ल-पड़ल टुकुर- टुकुर ताकल करत रहे. कबो केहू के दुआर झारे-बहारे के रहे, तऽ कबो कहीं से गोबर उठावे आ फेंके के रहे. इहे ना कई लोगिन के घर-दुआर में गोबर-माटी डाले के आ लीपे-पोते के पड़ल रहत रहे. केहू के दुअरा चिपरियो पाथे रोज ऊ जाइल करे. ओके बेर नवे लागे सबकर कहल काम आ टहल पुरवे में. ओकरा फुरसते कब रहे कि केहू लगे बइठो चाहे बतियावे. एतना जाँगर ठेठवलो पर का जाने ओकरा भरपेट खयेका जूरत रहे कि ना ? कामे के सूर में ऊ अइसन बूड़ल रहत रहे कि तनी हँसहू बोले के मोका ओकरा ना भेंटाय. लागे कि ऊ हँसल-मुस्कराइल भुला गइल होखे. कहेला लोग कि पढ़ले-लिखल लोग काम में ढ़ेर बाझल रहेला, बाकी ओकर काम आ मेहनत देख के त हमरा आँखी के सोझा अन्हार हो जात रहे.

अबे कुछे दिन भइल कि हम ओह घर में बियह के आइल रहीं, आ ओह घर के बड़ पतोह बनल रहीं. देखलीं कि अतवार-मंगर छोड़के रोजे भितर-बाहर के ओसारा में गोबर पड़ल करे. ई गोबर डाले के काम उहे मेहरारू करत रहे, एही से देखे में हमार घर बड़ा चिकन-चाकन लउके. एह गोबर डाले वाली मेहरारू के हमार सास फिदनी कहि के पुकारत रही. ई फिदनी नाव सुन के त पहिले हमरा हँसी आइल बाकी धीरे-धीरे जब रोज ओकर काम-धन्धा देखलीं तब सोचे लगलीं कि – ए बाबा ! एह रूप में त ना बाकी एह नाव में बड़ा गुन बा. हमार सोच आ हँसी ओकरा गुन के सोझा हीन लागे लागल.

फिदनी अपना हाथ के हथेरिए से गोबर पानी मिला के आ ओके रगड़-रगड़ के घर-दुआर अइसन चिक्कन बना देत रहे आ चमका देबे कि उहाँ अदिमिए नाहीं, लागे कि देवतो लोग आके दू-छन बइठे खातिर मचल जाई. हम ओकर नाँव त जानिए गइल रहीं, एक दिन इहो देखलीं कि अम्माजी धीरे से अपना हाथे में दू-चार गो ले रोटी लेके ओपर गुड़ धऽ लेली, फेरू आपन हाथ अपना अँचरा में लुकवा के, बहरी के दलानी में गइली जहाँ पहिलहीं से ऊ फिदनी चउकठ धइले ठाढ़ रहे. ओह रोटिया के धीरे से ओकरा हाथे में धरा के ऊ घरे में मुड़ के आ गइलीं. फिदनियो अपन हाथ अपना लुगा में लुकवा के चल देलस. अब हम रोजे जब जब फिदनी बहरी के दुअरिया पर काम क के ठाढ़ होखे, तब अम्माजी के ओकरा मजूरी के दिहला पर अपन नजर गड़वले रहत रहीं, काहे कि ऊ कबो नून मरिचा साथे धके रोटिया ओके दिहल करँस. तबे हमरा बुझाइल कि ई दूगो रोटिये ओकर मेहनताना के मजूरी बा, जेके देत आ लेत के केहू दूसर ना देख पावेला. हम जान गइलीं कि ई अम्माँजी के बहुते चाँलाकी के बात बा. ना तऽ एह मजूरी के बारे में दूसर केहू जानी आ न कबो एह काम में मजदूरी खातिर केहू हड़ताल करी. कहल जाला कि मेहरारून के अक्किल ना होला, बाकी हमरा अम्माजी के त एह दिसाईं बहुते तेज बुद्धी चलत रहे. एगो इहो बात देखे में आइल कि फिदनी के तर-तिहुआर के चलते ढ़ेरे बोनस भेंटा जात रहे. मानतानी कि पवनी कुल खातिर घीव लगा के ना, तेले घँसके दलभरूई-पूरी आ बखीर बनत रहे, त उहे बोनस बन के फिदनिओ के मिलल करे. ई पूरी बखीर के बोनस – ओके सबका सोझा दियात रहे – चोरवा लुकवा के ना. एह मोका पर फिदनी तनी हँसे-बिहँसे आ अवरियो खयका आ लुगा के माँग अम्माँजी से करे, जेमें थेर बहुत अवरी ओकरा भेंटाइयो जात रहे.

फिदनी के मेहनत के बारे में केतनो कहल जाव ऊ कमे रहे. ओकर मेहनत आ दीन भाव देख के हम ओकरा पर तनी मोहा गइल रहीं. जब ऊ हमार घर लीपत रहे तबे ओसे हम पुछलीं कि – तोहार ‘ऊ’ कहाँ रहेलन ?

एतना सुनते फिदनी के मुड़ी नीचे गड़ गइल, ऊ लजा गइल, तब अम्माँजी बोललीं कि – अरे – ‘ऊ’ कहाँ घरे रहेला. ‘ऊ’ त परदेस में महिना महिना दिन ले भीख माँगे खतिर घुमत रहेला. ओकरा आवे-जाये के दिन के कवनो ठीक ना रहेला, अहिसे न ई फिदनी अपने जाँगर ठेठा के कमात खात रहेले, आ अपना लइकनो के पोसेले.

अम्माँजी के बाते से हम जनलीं कि ई फिदनी एगो जोगी के मेहरारू ह. एके सबलोग जोगिनिया, चाहे रहमत बो, चाहे फिदनीए कहिके गोहरावत रहेला. ई फिदनी एह गाँव में एह टोला के सब बाबू भइया लोगिन के घरे सेवा टहल में लागल रहेले, जवन ओकरा करे लायक होला. ऊ एगो जोगी के मेहरारू रहे, जेकरा न खाये के खयेका रहे न पहिरे के बस्तर.लइकवा कुल त एगो जँघिया पहिन के उघारे-निघारे खेते खरिहाने घुमत रहत रहन सन. उहो फाटले पुरान, मइल-कुचइल लुगा पहिन के एने-ओने धउरत रहत रहे. अपना तन पर अपन लाज ढाँके खतिर ऊ लुगा पहिनत रहे. जब कबो फिदनी तनी नीक लुगा पहिन लेबे तऽ लोग बाग लागे न सुगबुगाए आ कहे कि कहले न जाला कि- ‘गरीब के लुगाई, भर गाँव के भउजाई होले’.

फिदनी केहू के घरे कुछु छू ना सकत रहे.बाकी चोरा लुका के ओह गाँव के गँवई मनचला बाबू लोग ओके अपन भउजाई कहि के अपना हवस के पुरवत रहत रहे. एह बात के फिदनी पर कवनो असर ना पड़े, काहे कि ओके खाए-पहिने के भेंटा जात रहे. एगो भुखाइल दुखिया गरीब मेहरारू के अवरी का चाँहीं. ऊ केहू से इहाँले कि अपना मरदो से कबो कुछु ना माँगत रहे – ई सब तऽ ओकरा मेहनत के फल रहे, जेसे ओकर पेट भरत रहे.

अम्माँजी से हम जनलीं कि फिदनी ओह गाँव के जोगीटोला में रहेले. इन्हनी के रहे खातिर एके गो कमरा ओह घर में रहे, जेमें एकनी के मूर्गा-मुर्गी, बकरी-छेरी, बाल-बच्चा आ अपनहू कुल राती खानी सुतत रहन सन. रहे-सहे के कवनो चिन्ता फिकिर एकनी के ना होला. ई कुल वर्तमान में जीयेलन सन, यानी आज खा लीहन सन त काल्ह का होई ? ई कबो ना सोचेलन सन. ए कुल के न तऽ बाजार भाव से मतलब होला न कवनो बैंक के नाँव जाने से. भीख मांगल एह लोग के पुस्तैनी पेशा होला. फिदनी एही जोगिन के समाज के उपज रहे, जेकरा जिनगी में न त कबो अमीरी आइल, न त कबो गरिबिये ओकर साथ छोड़लस.

आज उहे फिदनी बेर-बेर हमरा सोझा घुरिया-घुमरिया के हमरा से बोलल-बतियावल चाहत रहे. ओकरा त सोचे के चाँहीं कि जब एक बेर हम ओसे बोलल बन्द कऽ दिहलीं, तऽ अब एतना दूर शहर ले आके आ हमरा इयाद के झरोख में घुस के हमार पीछा जब ना तब काहेंके करत रहतिया. हम तऽ ओही दिने चुपा गइनी जवना दिने सुनलीं कि ऊ अपना गरीबी के तरजूई पर अपना नासमझ बेटी के तउल देलस. इ सुनते हमार करेजा कसमसा के थउस गइल. ऊ बेटी अबे छवे-सात बरीस के भइल रहे. भगई आ चिरकुट लपेटले घुमत रहत रहे. ऊ कबो महुआ बीनत के, तऽ कबो नीब चुनत के लउक जाइल करे. कबो-कबो लकड़ी, चुन्नी, पतई आ करसियो उठावत रहे. ओही अबूझ बेटिया के पइसा के लालच में अपना कंगाली के तरजूई पर ऊ चढ़ा देलस.

का जाने कवना बेपारी के हाथे. फिदनी ओके कुछ पइसा गिना के दे देले रहे. ऊ बेपारी कवनो दूर दराज देस में ओह धीया के लेके चल गइलन सन. ऊ कुल ओकरा साथे का-का कइले होइहन सन् केहू जान ना पावल ? अपना अबूझ बेटी के बेंच के इ फिदनी कुल्ही महतारिन के मुँहे करिखा पोत देले रहे. जब हमरा मालुम भइल कि अइसन घिनौना काम बाप नाहीं, ऊ महतरिए कइलस ह, तब से हमरा मन के हिया में ओह फिदनी खातिर जेतना मोह के तेल भरल रहे, कुल सूख गइल आ हमार इ मन घिरना से भर गइल. इहे बात बा कि आज ओकर ईयाद जब जब हमरा आवता तब-तब ओकर कठकरेजी महतारी वाला रूप हमरा सोझा लउके लागता. एही से हमार मन अब अपना टेक पर अकड़ के घेड़ा नियर हिनहिनाता. हम भले अपना मन के बेर-बेर झटकारऽतानी आ समझावतानी कि ओकरा से हमके बोले बतियावे के चाँहीं, बाकी ऊ अड़ल, बा एही पर कि ना हम ओसे कुछु ना बोलब न बतियाइब, आ न तऽ ओकरा बारे में कुछु लिखब.

एतना कइलो पर ई फिदनी मानत नइखे. लागता कि ऊ हमरा सोझा आके – रिरिआ-गिरिआ के हमसे इहे पूछल चाहतिया कि – मोसे-रूसल बानी
का ? मोरा संगे-संगे आज ”उहो“ आइल बानऽ, आ रउवा से एगो भिच्छा माँगतान. आज अपना बोलिए के भीख हमनी के दीहीं नऽ.


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

दू गो छोटहन कहानी


(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 14वी प्रस्तुति)

– राजगुप्त

(एक) पान खइनी, गुटका-गुटकी

ट्रेन अपना रफ्तार से दउड़त रहे. गर्मी के दिन ऊपर से बहुते भीड़ि रहे. सज्जी पसिन्जर गर्मी से बेहाल रहले. एही बीचे एगो चना बेचत अदिमी भीड़ि
के चीरत आइल. पेट पर खाँची लटकवले रहल. उहो पुरहर पसेनियाइल रहे. ”चना भई चना, गरम-गरम चना, जायकेदार- मसलदार केतना चटकार बा, खा के बताईं. मजा ना आई त पइसा वापस हो जाई. सेन्हा नून मरिचा पियाज संगे खाईं. लीं तनि चीखीं. चीखि के आनो के बताईं.“ चना वाला एक सुर से सभके जनावत, चेतावत रहे.

ताश खेलत एगो लड़िका के चना वाला के बोली भारी बुझाइल त डपटि के कहलसि, काहे कान खाताडे़ रे ? आगा बढ़ि जो, एइजा तोर दाल ना गली. एइजा सभे अपना अपना मुँह में पान-खैनी, गुटका गुटकी दबवले बा.“

(दू) समय
एक दिन एगो आदमी बगइचा में आम के फेड़ा पर झटहा चलावत रहे. झटहा चलावत-चलावत ओकर पँखुरा बत्थे लागल. बाँहि पटा गइल बेचारा के. बाकिर पतई के सिवा फर हाथे ना लागल. एही बीचे एगो चतुर-चल्हाँक आदमी आपरूपी परगट हो गइल. थाकल मादल आदमी के दशा देखि के बोलल, ”हे मरदे आदमी ! एकइसवी सदी में काहे कालीदास बन ताड़ऽ ? ई सीजन ना ह. मोजर लगबे ना कइल त टिकोरा के आस जनि करऽ.“


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

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