सुकुलजी..रउआँ बहुते बेजोड़ बानी जी

Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

आजु हमरा सुकुलजी के बहुते इयादि आवता. जब हमरा खूब हँसे के मन करेला त हम सुकुलजी के इयादि क लेनी. सुकुलजी के एइसन-ओइसन मति समझीं सभे. सुकुलजी त बहुते काम के चीज हईं. सुकुलजी त ओमे के हईं की उहाँ का बालू में से तेल निकालि देइबि.
सुकुलजी जब घरे रहबि त फटही बंडी अउर लुंगी पहिनी के, कांधे पर गमझा लटका के, नंगे गोरे पूरा गाँव का जवार घूमि देइबि पर उहे सुकुलजी जब कवनो रिस्तेदारी में जाए के तइयार होखबि त गवनही मेहरारू कुल की तरे सजबि, सँवरबि. 
पता ना सुकुलजी के बाबूजी उहाँकी बिआहे में कोट सिउआ के सही कइनी की गलती, इ हम ना कहि सकेनी पर बिआहे की 20-22 साल बादो आजुओ सुकुलजी के कोट ओहींगा चमकता. हँ इ अलग बाति बा की ओमे-किसिम-किसिम के बटाम लागि गइल बा. अब रउआँ सोंचति होखबि की इहाँ कोट के बखान काहें कइल जाता, त हम इ कहल चाहतानी की जब सुकुल जी कहीं पहुनाई में निकलबि त इ आपन बिहउती कोट अउर बिहउती मोजा-जूता जरूर पहिनबि.
सुकुलजी के अगर रऊआँ उनकी गाँव में देखि लेइबि त इहे कहबि के कवनो भकभेल्लर ह (भकभेल्लर हम एसे कहनी हँ की हम सुनले बानी की सुकुलजी की बिआहे में जब सुकुलजी अपनी ससुरारी में खीर खाए बइठने त ओ गाँव के जनाना बुढ़-पुरनिया एगो गीत सुरु कइल सब…ई भकभेलरा दामाद कहाँ से हमरी इहाँ आइल रे, बरओ पाकल, मोछियो पाकल, लागता इ भागलपुर के भागल… ई भकभेलरा दामाद कहाँ से हमरी इहाँ आइल रे…) चाहें हँसमतिया के भाई ह पर उहे सुकुलजी जब गवनहीं मेहरारू कुल की तरे बनि-छनि के रिस्तेदारी में जाए के निकलिहें त लागि की कवनो दुबिआहा अब पहिले-पहल अपनी ससुरारि जाता.
सुकुलजी के इयादि आवते हमरा हँसी काहें आ जाला इहो बता देतानी अउर गारंटी दे तानी की रउओं आपन हँसी रोकि ना पाइबि. खैर हम त सुकुलजी के तीन-चार गो खेला देखले बानी ओमे से रउआँ सब के अबे एक्के गो सुनाइबि, काँहे कि सगरी सुना देहलहुँ पर मजा किरकिरा हो जाई.
हम सुकुल जी के जबन घटना बखाने जा तानी उ टटका बा, कहले के मतलब इ बा की पिछलहीं गरमिए में उनकर इ खेला हम देखनी.
बिआह-सादी के दिन रहे अउर हमहुँ नोकरी पर से छुट्टी ले के गाँवे गइल रहनी. रउआँ सब के त पते बा की बिआह-सादी की दिन में केतना नेवता गिरेला. अगर घर में 3-4गो सवांग होखे लोग तबो सबके एक-आध दिन आंतर दे के कवनो तिलक, बिआह आदि में जाहीं के परेला. हमार बाबा कुछ नेवता लिआ के हमरी आगे ध देहने अउर कहने की बाबू छाँटि ल की तूँ ए में से कगो में जइबS, वइसे तोहरी ऊपर बा ना त झुनझुन-मुनमुन के भेजि देइबि चाहें हमहीं चलि जाइबि. हम नेवतन के निहारे लगनी त का देखतानी की ओ ही में सुकुलोजी के नेवता बा. सुकुलजी के नेवता देखते तS हम ओ के खोलि के लगनी पढ़ें. सुकुलजी की छोट बहिन के बिआह रहे अउर एकदिन की बादे तिलक रहे. अब हम काहे के अउर नेवतन के देखीं, हम दउरि के बाबा की लगे गइनी अउर कहि देहनी की सुकुलजी वाला तिलक अउर बिअहवो में हमहीं जाइब. बाबा कहने नया रिस्तेदार हउअन अउरी तिलके में घरभरी के चले के कहले बाने. तोहार बाबूओजी आ रहल बाने बिहने सबेरे, ओ तिलके में जाए खातिर. फेर बाबा कुछ सोंचि के कहने ठीक बा तूँ अउर तोहार बाबूजी चलि जइहS जा. हमरा त अंदर से लड्डू फूटत रहे, हम कहनीं ठीक बा.
दूसरा दिन हम बाबूजी की साथे दुपरिअवे में सुकुलजी की इहाँ पहुँच गइनी. साँझिखान तिलक पहुँचि गइल लइका की दुआरे पर. अरे इ का तिलक त चढ़ि गइल पर तिलक चढ़ले की बादे अचानक हल्ला सुनाए लागल. सुकुलजी के बाबूजी अउर लइका की काका में लेन-देन के ले के कुछ बतकही होत रहे. हमहँ उहाँ पहुँचनी. सुकुलजी त पहिलहीं से उहाँ बँसखटिया पर मुँह लटका के बइठल रहने. सुकुलजी के बाबूजी खूब तेज आवाज में कहने की हमार सामान वापस क दS…तहरी घरे हमरी लइकिनी के बिआह ना होई. लइको के काका जोर से कहने की घर में से इनकर सामान ले आके वापस क द सन. इ बहुत चालू बाभन बाने सन. कहतानेसन कुछ अउर तथा करतानेसन कुछ अउर. सुकुलजी के बाबूजी सुकुलजी पर घोंघिअइने, “इ सब, एही सारे मउगे के कइल-धइल हS…का तय कइले बा..का नाहीं केहू के बतवले नइखे..अउर पूछले पर कहत रहल हS की हम बानी न सब संभारी लेइबि..तूँ टेंसन मति लS.”
अरे इ का ए दादा. सुकुलजी की बाबूजी की एतना कहते सुकुलजी त लगने भोंकार पारि के खूब जोर-जोर से रोवे. एइसन लागे की कवनो मेहरारू गवने जा तिया. सब लोग एकदम सांत हो गइल पर सुकुलजी आपन रोवल चालू रखने अउर बीच-बीच में रुँआँसे बोली में बोलत जाँ, ” इ हमार बाप नइखन, कसाई बाने. हर जगहिए कुछ न कुछ नाटक क के सब काम बिगाड़ि देने. खरमतियो कि बिआहे में इ एहींगा नाटक कइले रहनें..ऊँ…ऊँ…ऊँ……..” अरे अब त सुकुलजी के बाबूजी के ठकुआ मारि देहलसि, उ एकदम से चुप हो गइने, उनकर मुँह झँउआ गइल. एकरी बाद सुकुलजी उठने अउर रोवते लइका की काका से हाथि जोड़ि के कहने, “निकलवा दीं महराज, हमार समान. हमार बापे एइसन बा. राउर कवनो दोस नइखे.ऊँ…ऊँ…ऊँ……..”
सुकुलजी के रोवाई से सब गमा गइल रहे, सोंचे पर मजबूर हो गइल रहे पर हमार हँसी रुके ना…काँहे कि हमरा पता रहे की अब सुकुलजी की दाँव से केहू बँची ना. लइका के काका केतनो हुँसीयार होखों पर उनकरा अब फँसहिंके बा.
सुकुलजी के रोवाई अब अउर तेज होत जाव….बीच-बीच में कहल करें…अब हमार बहिन कुँआरे रही…जब बापे एइसन बा…त का कइल जा सकेला. अब त सुकुलजी की अगल-बगल में कईगो रिस्तेदार जुटी के समझावे लागल रहे लोग…बाबू..चुपा जा…ओने लइका की कको के समझावे खातिर कइगो मेहरारू (लइका के बुआ, ईया) घर में बाहर आ गइल लोग. लइका के ईया लइका की काका से कहली, “जा ए मास्टर, तोहरा इजति के कवनो लाज नइके. दुआरे पर हित-नात के बोला के एतना नाटक कS देहलS. देखबS सुकुल बाबू केतना रोवताने.”
अब हमरा पूरा यकीन हो गइल रहे की सुकुलजी अपनी खेला में कामयाब हो जइहें, काहें कि लइका के फुआ, माई, ईया सबलोग एकट्ठा हो के सुकुलजी के चुप करावे लागल अउर लइका की काका के डांटे लागल. लइका के कको ठकुआ गइल रहनें. हमार हँसी अब रूकले मान के ना रहे. काहे के सामान अब घर में से बाहर आओ, जे जहें रहे उहवें गमा गइल रहे. तिलकहरू लोग आराम से खाइल-पियल. अब लइका की काका के तनको हिम्मत ना रहे की एको सब्द बोलें. घर में जा के एकदम से गमा गइने. एकरी बाद बिआहो एकदम निमने-निमने बीत गइल. बिआह बितले की बाद हम सुकुलजी से कहनी की महराज राऊर कवनो जबाब नइखे, जहाँ सुई ना घुसी उहाँ रउआँ हाथी घुसा देइबि, काम परले पर गदहवो के बाप बना लेइबि. सुकुलजी की चेहरा पर कुटिल मुस्कान तैरि गइल.
बाद में पता चलल की सुकुलजी लइका की ओर से जेतना फरमाइस भइल रहे सब मानि ले ले रहने…पर देखा देहने लइका की काका के अँगूठा.. जय हो..


-प्रभाकर पाण्डेय, हिंदी अधिकारी, सी-डैक, पुणे

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पेंचर पहुना

Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

कल्हिए रमेसर काका एगो टाली के परची दे गइल रहुअन. ऊँखी छिलवावे के रहुए ए से आजु सबेरवें ऊँखी छिलवावे खातिर पूरा गाँव की लोग के चला के हमहुँ ऊँखियारी में चलि गउँवीं.

रउआँ सभें त जानते बानी की जेकरा एक्कोगो चउवा बा आ चाहें पलानी-ओलानी छावे के बा उ जाड़ा-पल्ला थोड़े देखेला. केतनो जाड़ा पड़त रहो लोग-लइका कंबल-ओंबल ओढ़ि के चाहें गाँती-ओंती बाँधि के ऊँखी छिले खातिर भिनसहरवे ऊँखिआरी की ओर चलि देला. गाई-गोरू के खाए खातिर गेड़ त गेड़ कुछ लोग पलानी-ओलानी छावे खातिर पतइओ बाँधि ले आवे ला. अरे एतना ना आजकल त लवना के काम भी ए पतई से चलि जाला अउर ए जाड़ा-पल्ला में तापहुँ की कामे आवेला. केतना हँसी-ठिठोली होला ऊँखी छिलले में. आनंद ही आनंद रहेला. खूब ऊँखियो चीभे के मिलेला अउर सबेरहीं-सबेरहीं पूरा गाँव का अगल-बगल की गाँवन के समाचार भी इहाँ मिली जाला.

हँ त भउवे इ की ऊँखी की खेत्ते में से हम छिलल ऊँखी ढोवा के सेक्टर पर टाली पर लदवावत रहुवीं तवलेकहीं का देखतानी की ओही जाड़ा-पल्ला में पेंचर पहुना साइकिल डुगरावत चलल बाने. अरे पेंचर पहुना के देखते त रमेसर काका ऊँखी सरिआवल छोड़ि के बोलताने, “पेंचर पहुना, राम-राम; सबेरे-सबेरे कहाँ से आवतबानी? आईं-आईं घर-गाँव के समाचार सुनाईं. एक-आध गो ऊँखि चूसीं. बड़ी दिन की बाद राउर दरसन भइल बा.” रमेसर काका के बाति सुनते पेंचर पहुना साइकिल उहवें खड़िहा देहने अउर एगो सोगहग ऊँखी उठा के लगने चूसे. हमहुँ बढ़ि के पेंचर पहुना के पँवलग्गी कइनी अउर ऊँखियारी में से थोड़े पतई लिआके उहवें बारि देहनी.

अब पेंचर पहुना पतई तापे लगने अउर कहल सुरु कइने, “दरअसल 15-20 दिन हो गइल घर से निकलले. गाँव-जवार के लोग अउर बहुत जाने रिस्तेदार गोधना कुटइले की बादे से पीछे पड़ल बा लोग कि पेंचर पहुना तनि जवार-पथार घूमि के लइका खोजि दीं..” पेंचर पहुना की एतना कहते रमेसर काका बोलि पड़ने, “पेंचर पहुना, रउआँ हरदम पूरा जवार-पथार घूमत रहेनी अउर पूरा जवार-पथार के खबरो राखेनीं. रउरा पूरा पता होला की कहाँ कवन लइका विआह करे की जोग हो गइल बा. ए वजह से लोग रउआँ के इ सुभ काम सउँपेला.” अब पेंचर पहुना फूलि के गदगद हो गइने अउर कहने, “रमेसर बाबू, तूँ एकदम ठीक कहतारS, पर जानतारS ए से हमार बहुत नुकसान बा. आपन काम-धाम छोड़ि के हम जवार-पथार घूमि के दूसरे लोगन खातिर लइका खोजतानी अउर एन्ने हमरी घर के लोग हमरी पर रिसियाके फुल हो गइल बा.”

हमरा इयादि बा पेंचर पहुना पंदरहो दिन ना बितेला की आपन दरसन दे देने. उनकर आवा-जाई एतना लागल रहेला की पूरा गाँवभर की लोग-लइका से उनकरा परिचय बा. गाँव में धुकते लोग-लइका उनकर पँवलग्गी कइल अउर हालचालि पूछल सुरू क देला. उनकरा गाँव में ए पार से ओ पार जाए में साँझि हो जाला. बीस जाने की घरे पानी पियेने अरे भाई पियेने ना लोग पियावेला. केहू मिट्ठा के रस ले के आई त केहू भूजा-भरी अउर पेंचर पहुना केहु के ना नाहीं क पइहीं अउर बड़ी परेम से पीहें-खइहें.

अब हम रउआँ के बता दीं. की हमरी गाँव में एकजाने मुसमाती रहली उनकरा एक्के जाने लइकनी रहली अउर ओ लइकनी के विआह एही पेंचर पहुना से भइल रहे. आजु न उ मुसमाती जियतारी ना पेंचर पहुना के मलिकाइन पर तब्बो पेंचर पहुना के गाँव में बहुत पूछारि बा. हँ एकबात अउर गाँवभरि के लोग-लइका-मेहरारू-ओहरारू सब केहू पेंचर पहुना के पेंचरे पहुना कहि के बोलावेला.

पेंचर पहुना के असली नाव खमेसर शुकुल रहे पर धीरे-धीरे उ गाँव-जवार में पेंचर पहुना से परसिध हो गइने. अरे भाई आजु-कल उनकरी गाँव के लोग भी उनके पेंचरे पहुना की नाव से बोलावेला.

उनके नाव पेंचर पहुना काहें परल एकरी पीछे एगो लंबा कहानी बा. दरअसल एकबेर का भइल की पेंचर पहुना हमरी गाँव में आइल रहने अउर ओ बेरा मुसमाती इया जिअत रहली. पेंचर पहुना 5-7 दिन हमरिए गाँवे रहि गइने. ओने उनकरी घर के लोग परेसान हो के एगो आदमी के पेंचर पहुना के बोलावे खातिर भेजल. पेंचर पहुना ओ आदमी की साथे अपनी घरे जाए के तइयार हो गइने. जब साँझि भइल त पेंचर पहुना ओ आदमी की साथे अपनी गाँवे जाए खातिर निकललने. अरे इ का ओकरी बिहान भइले फेर से गाँव के लोग देखता की पेंचर पहुना त गँवहीं में बाने. जब लोग पूछल की रउआँ त रतिएँ अपनी गाँव चलि गउँवी त एतना बिहाने-बिहाने कहाँ से उपरा गइनी हँ त ए पर पेंचर पहुना कहने की अबहिन ए गाँव से बाहरे पहुँचल रहुँवी की हमार सइकिलिए पेंचर हो गउवे अउर हमरा वापस आवे के पड़ुवे.

खैर, अब एगो दूसर घटना सुनीं. एकबेर के बाति ह कि पेंचर पहुना की मामा के लइका हमरी गाँवे आइल रहने अउर मुसमाति इया की इहाँ ठहरल रहने. गाँव के कुछ लोग उनसे पेंचर पहुना के हालि-चालि पुछि देहल अउर इहो कहल की काफी दिन हो गइल पेंचर पहुना के दरसन ना भइल. ए पर पेंचर पहुना के ममिआउत भाई कहने की पेंचर पहुना त कल्हिएँ हमरी सथही रउरी सभ की गाँवे आवे खातिर निकलने पर उनकर सइकिलिए पेंचर हो गइल अउर उ आ ना पवने.

कुछ लोग के इ कहनाम ह कि पेंचर पहुना जानि-बुझि के अपनी साइकिल के हउवे निकालि देने अउर बहाना बना के रूकि जाने. पर खएर जवन होखो, पेंचर पहुना के गाँव-जवार के लोग सनमान से देखेला. उ भले कवनो रिस्तेदारी में 15 दिन का 1 महीना भी रुकि जाँ त उनकरी ऊपर इ कहाउत चरितार्थ ना होला, “पहिल दिन पहुना, दूसर दिन ठेउना, तिसर दिन केहु ना.” उ हरदम पहुने बनल रहेने.

खैर अब देखिं न लागता कि आजुवो पेंचर पहुना के साइकिल पेंचर हो गइल बिया अउर ए बेरी भी पेंचर पहुना हमरी गाँव में सबकी घरे ऊँखिबवगा के रसिआव खइले की बाद, खिचड़ी के नहान भी पटनवापुले पर क के लाई-धोंधा खइले की बादे डोलिहें…अरे ना-ना, एइसन बाति नइखे, गाँव के लोगे अब उनके खिचड़ी की नहान की पहिले जाहीं ना दी.


-प्रभाकर पाण्डेय, हिंदी अधिकारी, सी-डैक, पुणे

हो रहल बा भारत निरमान

Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

हो रहल बा भारत निरमान,
गा रहल बा सब केहू गुनगान,
100 में हो गइने 99 बेइमान,
तब्बो आपन देस बहुत महान.

हो रहल बा भारत निरमान.

महँगाई के राज हो गइल बा,
अधिकन के त भागि खुलि गइल बा,
सूना हो गइल बा खेत-खरिहान,
रो रहल बा मजदूर-किसान.

हो रहल बा भारत निरमान.

दाल-रोटी अब सपना हो गइल,
बचपन अउर जवानी खो गइल,
इस्कूल, मंदिर अब बनल दुकान,
पिस रहल बा आम इंसान.

हो रहल बा भारत निरमान.

केतने घर में अब फाँका कटे,
रासन के समान कागज पर बँटे,
कसाब, अफजल खाँय मेवा-पकवान,
भूख से मर रहल गँवई हिंदुस्तान.

हो रहल बा भारत निरमान.

भस्टाचार न फेल होई अब,
बाबा अन्ना के जेल होई अब,
भारत सरकार तूँ बहुत महान,
ए ही तरे करS भारत कल्यान.

हो रहल बा भारत निरमान.


हिंदी अधिकारी
सीडैक