बतकुच्चन ‍ – ७५


बेर, बेरा, बारी आ बारी. बारी दू बेर आइल एकरो कारण बा. जवन आगा चल के बताएब. बेर मतलब कि आवृति, माने कि हाली. कव हाली भा कव बेर. कतना हाली भा कतना बेर. बाकिर बेर बेरा के बिगड़ल रूपो हो सकेला. बेरा मतलब समय. सबेरा, गदबेरा, एहबेरा, ओह बेरा, अबेरा, कुबेरा वगैरह. एह सब उपयोग में बेरा के मतलब समय से बा. बाकिर ई बेरा बिगड़ के कई जगहा बेर हो जाला आ मतलब उहे रहेला. सबेर, अबेर, कुबेर, गदबेर, एह बेर, ओह बेर में मतलब आवृति से ना हो के समय से होला. कई बेर मतलब ना बदले बाकिर कबो कबो बदल जाला. जइसे कि कुबेरा के कुबेर कहला से हो सकेला कि कुछ भ्रम हो जाव. कुबेर देवता लोग के खजांची हउवें भा रहलें. एह बारे में हमार जानकारी, हर जानकारी का तरह थोड़ही बा. हम अपना के कुबेर माने कि कुबेरा में समेट के राखब. कुबेरा खातिर कई बेर अबेरा के इस्तेमाल कर दिहल जाला बाकिर ठीक से देखीं भा सोचीं त कुबेरा आ अबेरा साफ अलग अलग होला. जब कवनो बात बिना समय के, कुसमय में हो जाव त कुबेरा कहल ठीक रही. अबेरा देर खातिर इस्तेमाल होखे क चाहीं. काहे कि कवनो जरूरी नइखे कि जवन अबेरा बा तवन कुबेरो होखे. देर रात के बिना पहिले से बतवले कवनो हित पाहुन आ जाव त कहल जाला कि कुबेरा आ गइलें. बाकिर समय दिहला का बाद देरी से आवसु त कहे के चाहीं कि अबेरा अइलन, अबेर कर दिहलन. ई त भइल अबेर कुबेर के बात. चलीं थोड़ीका सबेर आ गदबेरो के बतिया लिहल जाव. काहे कि पता ना कवन कारण बा कि जब जब संसद के बइठका होखे वाला रहेला तब तब कवनो बात अइसन कुबेरा में हो जाला कि बइठकी में बवाल हो जाला आ संसद में जवन काम सेकराहे हो जाए के चाहत रहे ओकरा में अबेर होखे लागेला. सेकराहे मतलब जल्दी होला बाकिर कबो कबो कुछ लोग एकर इस्तेमाल सबेरे खातिर कर देलें. काल्हु सेकराहे चल अइह. मतलब त इहे भइल कि काल्हु जल्दी चल अइहऽ. ई ना कि सबेरे सबेरे आ के दुआर ठोके लगीहऽ. सबेरा के इस्तेमाल कई बेर अबेरा से उल्टा मान के कर दिहल जाला हालांकि होखे के ना चाहीं. अबेरा के सही विलोम सेकराहे होखे के चाहीं सबेरे ना. सबेरा के विलोम होला गदबेरा. गदबेरा खातिर कबो अबेरा भा कुबेरा के इस्तेमाल ना कइल जाव. गदबेरा त हमेशा अपना समय पर आवेला, जइसे कि सबेरा आवेला. ना त सेकराहे, ना अबेरा, ना कुबेरा. गदबेर के इस्तेमाल गोधुलि वाला समय खातिर होला. बाकिर हमरा समुझ से, अब चाहे ई समुझ कतनो कम काहे ना होखे, गोधुलि आ गदबेरा मे तनी फरक होला. गोधुलि ओह समय के कहल जात रहे जब साँझि बेरा लवटत गाय बैल के झुंड के खुर से उड़त गरदा गुबार साँझि के बढ़त अन्हार से मिल जुल के गदबेर बना देत रहुवे. गरदा जइसन समय गदबेर. वइसे अलग बाति बा कि देश के संसद में हमेशा गदबेरे जइसन माहौल बनल रहेला. काहे कि ओहिजा बेरा कुबेरा हमेशा लोग अपना खुर से गरदा उड़ावे में लागल रहेला. अब एह सब बाति में अतना बाति निकल आइल कि बारी आ बारी के फरक अगिला बारी.

Advertisements

बतकुच्चन ‍ – ७४


भोजपुरी में मन के भाव बतावे वाला शब्द अतना आ अइसन अइसन बाड़ी सँ जवना के दोसरा भाषा में अनुवाद करे में पसीना सूख जाई. पिछला दिने कुछ अइसने शब्द दिमाग में चमके लागल जब देश के सबले बड़की बईठका में एगो नेताइन, कहे के मतलब कि महिला नेता, एगो दोसरा नेता के बात पर अइसन पनपना गइली कि लागल कि कुछ परपरा गइल होखे आ ओह पनपनाहट में ऊ अपना दल के नेता सब के उकसावत लउकली कि बवाल करऽ लोग. अब ऊ का कइली, काहे कइली एह सब से त एह बतकुच्चन के मतलब नइखे. मतलब बा त पनपनइला से, परपरइला से आ छनछनइला से.
उकसावे का बारे में फेर कबो बतिआवल जाई आजु मत उकसाईं.

पनपनाइल परपराइल आ छनछनाइल में से पनपनाइल आ छनछनाइल सामने आ जाला बाकिर परपराइल उहे महसूस करेला जेकरा परपराला. सामने वाला ना जान सके कि का परपराइल, कहवाँ परपराइल. अब चलीं जानल जाव कि परपराइल का होला. अगर घाव पर मरीचा के बुकनी पड़ जाव त जवन महसूस होखेला तवने के परपराइल कहल जाला. अगर घाव ना होखे त परपरा ना सके कतनो बुकनी बुक दीं. एही बीच बुकनी शब्द आ गइल त एकरो के समुझत चलल जाव. बुकनी संज्ञा आ क्रिया दुनु ह. एकर दुनु मतलब होला पावडर आ पावडर बनावल. बुकनी संज्ञा ह त बुकल क्रिया. बतकुचनो में हम कवनो ना कवनो बात ध के ओकरा के बुकत रहीलें बुकनी बनावे का फेर में. एहीसे मिलत जुलत एगो शब्द ह बुनिया. मैदा के घोल के गरम तेल में बुँद बुँद डाल के तइयार होखे वाला चीझु बुनिया कहल जाला. अब एह बुनिया के चीनी का पाग में डाल दीं त मिठाई बन जाई, मुट्ठी में बान्ह के लड्डू बना लीं भा अइसहीं खा लीं. दही में डाल के नून मरीचा छीट के रायता बना लीं. राउर मरजी. बुनिया के आपन कवनो जिद्द ना होला सामने वाला का मरजी से आपन सवाद बदलत रहेला.

हँ त बात होत रहुवे परपरइला के त. जब कुछ परपराए लागेला त आदमी खीसि पनपन करे लागेला. ओकरा चेहरा पर रौद्र रूप साफे लउके लागेला. मन करेला कि सामने वाला के कच्चे चबा जाईं जे हमरा घाव पर मरीचा के बुकनी डललसि. पनपनाइल आ छनछनाइल एक जइसन होइओ के अलग अलग होला. गरम तेल में पानी पड़ जाव त छन छन के आवाज आवेला आ ओहि से बनल छनछनाइल. जब केहू के अइसने गरम तेल जइसन बात कह दिहल जाई त ऊ छनछनइबे करी. छनछनाए वाला आदमी के देहि पर कवनो घाव बा कि ना एहसे कवनो अंतर ना पड़े. ओकरा हर हाल में छनछनाए के बा. बाकिर परपरइला में घाव के मौजूदगी जरूरी होले. अब इ रउरा पर बा कि रउरा का कहब ओह नेताइन के. ऊ पनपनाइल रहली कि छनछनाइल.

अब आईं सोचल जाव कि एह पनपनइला, छनछनइला आ परपरइला के अनुवाद हिंदी भा अंगरेजी में करे के पड़ो त कइसे होखी. एह एक एक शब्द खातिर एगो लमहर वाक्य लिखे के पड़ जाई. आ अनुवाद करे वाला के चेहरा जवन पितरिआई कि देखल बनी. चलीं छोड़ीं, एह पितरिअइले के अनुवाद कर देखाईं.

बतकुच्चन ‍ – ७३


गोल के बात का निकलल पिछला बेर कि माथा गोल हो गइल. मन में तरह तरह के सोच आपन आपन गोलबन्दी करे लागल. एह में गोलियात तीन गो शब्द सामने आइल गोल, गोला आ गोली. गोल कवनो समूह के कहल जाला. ई गोल खिलाड़ियन के होखे, होरिहारन के होखे, कवनो बाबा के होखे बा राजनीतिक विचार के होखे. एह गोल आ अंगरेजी के गोल में बहुते फरक होला. अंगरेजी के गोल लक्ष्य के कहल जाला ऊ लक्ष्य फुटबाल भा हॉकी जइसन खेल के होखे भा जिनिगी के मकसद. बिना गोल के जिनिगी सफल ना होखे. बाकिर हमार गोल त बा भोजपुरी शब्दन पर बतकुच्चन करे के से ओहिजे लवटल जाव. गोल गोला गोली में गोली बन्दूक भा पिस्तौल से निकलेले. गोली अउरियो तरह के होले. लइकन के खेले वाला गोली खातिर टई शब्द बेसी प्रचलित बा, डाक्टर के दिहल गोली ला टैबलेट. अब ई मत कहीं कि टैबलेट त अंगरेजी के ह ओकरा के भोजपुरी में काहे लिहल जाव त जानत चलीं कि अंगरेजी आजु अंगरेजी एह ले बिया कि ओकरा हर भाषा के शब्द पचावे के ताकत बा. दुनिया भर के भाषा से लिहल शब्दन के उ अपना में समवले जाले. पिछला साल नाहियो त दू हजार शब्द दोसरा भाषा से अंगरेजी में आक्सफोर्ड डिक्शनरी शामिल कर लिहलसि जवना में करीब दू सौ शब्द हिन्दुस्तानी बाड़ी सँ. एहसे रेलगाड़ी के लौहपंथगामिनी कहला के ना त कवनो जरूरत बा ना कहे के चाहीं. बहुते शब्द भोजपुरी में पहिले से चलन में बाड़ी सँ आ हर दिन कुछ ना कुछ नया आवते जात बा. मोबाइल हर पाकिट में आइल त हर भाषो में घुस गइल. टेलीफोन के त दूरभाष बन गइल बाकिर मोबाइल के जेबी दूरभाष कहल बेजरूरत होखी. फेर बात एने ओने बहक गइल. लवटल जाव गोल गोला गोली पर. गोली त अबके थोड़ देर पहिले छूटल ह से चलीं अब गोला के बात कर लिहल जाव. गोला लाल साँढ़ो के कहल जाला बाकिर सबसे बेसी चलन में ई शब्द बाजार खास कर के थोक बाजार खातिर इस्तेमाल होला. सड़क किनारे के छोटहन बाजार चट्टी कहल जाला त बड़हन बाजार गोला. अब ई गोला कइसे बनल से त हम ना जानीं बाकिर पटना के गोलघर से एकर कवनो संबंध ना होखे के चाहीं. हालांकि पटना के गोलघर गोदामे खातिर बनल रहे आ शायद अबहियों गोदामे का तरह इस्तेमाल होला. बाकिर गोला सामान के समूह कम दूकानन के समूह बेसी होला. बाजार में दूकान होखे कवनो जरूरी नइखे बाकिर गोला में दूकान होखल जरूरी होला. राहे बाजार लागल हाट के गोला ना कहल जाव. जवना जगहा कई एक दूकान हो जा सँ तहवाँ के गोला कहल जात रहे. अब बड़की शहरन में ई मॉल हो गइल से अलग बात बा. गोला बेमारियो खातिर कहल जाला जब पेट में कवनो गोल बेमारी बन जाव आ बढ़े लागे त कहल जाला कि पेट में गोला हो गइल. ई गोला तोप के गोला से कम खतरनाक ना होखऽ सँ. जब फाटी त बहुते कुछ नुकसान करा जाई. अइसने गोला कबो कबो पित्त का थैली भा किडनी में बने लागेला बाकिर ऊ छोट होला से ओकरा के पथरी, पत्थर जस, कहल जाला कि पेट में पथरी हो गइल बा. एह गोला गोला गोली के चक्कर में हो सकेला कि रउरा शहर के गोलम्बर याद आवत होखे काहे कि अधिकतर शहर में कवनो ना कवनो मशहूर गोलम्बर जरूर होला. बाकिर गोलावट भा गोलवट रउरा धेयान में ना आवत होखी. एक त ई बहुते बदनाम शब्द ह आ जे एकरा गोल में आइओ जाला उहो ना सकारे भा ना जनावल चाहे कि ऊ गोलावट का फेर में पड़ गइल बा. जब दू आदमी के बिआह एक दोसरा के बहिन से हो जाला त कहल जाला कि ई गोलावट भा गोलवटिआ बिआह ह. बाकिर सामाजिक नजरिया से गोलवट बिआह खराब मानल जाला एहसे एकर बेसी चरचा ना होखे. अब बतकुच्चन के गोल में ई घेरा के सामने आ गइल त का कइल जाव. खैर, खून, खाँसी, खुशी, बैर, प्रीत, मधुपान / रहिमन दाबे ना दबे जाने सकल जहान.

बतकुच्चन ‍ – ७२


रोए के रहनी तले अँखिए खोदा गइल. लिखब त उहे जवन लिखे के रहल. बाकिर बज्जर पड़ो एह ग्रिड पर जवना चलते पिछला दिने आधा हिन्दुस्तान अन्हार हो गइल रहुवे. पावर ग्रिड के कहना बा कि राज्यन का ग्रीड का चलते ग्रिड फेल कर गइल. जबकि राज्य एह अछरंग के नकारत बाड़ें. जे लोग ओह दिन के पावर कट झेलल ऊ हिन्दुस्तान के आधा आबादी के बरोबर रहलें. बहुते लोग कहत रहल कि बज्जर पड़ो एह सरकार पर बाकिर लोग के एह बजरला पर सरकारी गोल के कहनुआ के कहना रहल कि, ना, देश में कवनो बिजली संकट नइखे. हँ कुछ जगहा के बिजली गुल हो गइल बा. अब बिजली के बात से अलगा हटत बचकुच्चन का मुद्दा पर आवत बानी. पिछला बेर बरजे आ बरजला के बात भइल रहे. बाकिर बजरल के ना. बाकिर पिछला दिने जवना लोग पर बिजली के आफत बजरल, हमहु ओही में रहलीं, ऊ कवनो बज्जर गिरला से कम ना रहल. दधीचि का तरह आपन हड्ड़ी गला के देवतन ला वज्र जइसन हड्डी देबे के कोशिश करे वाला के केहु देखे सुने बतिआवे वाला नइखे मिलत. मत मिलो. सभे पर बजरत बा हमरो पर बजरी. बाकिर आजु त हमरा बतकुच्चन करे बा. पहिले सोचले रहीं कि बरजला, बजरला आ बज्जर पर बात करब. बाकिर बिजली गुल सगरी बात के दोसर संदर्भ दे दिहलसि, एह बीच एगो नया शब्द बिना कुछ सोचले बन गइल, कहनुआ. पता ना जब पहिला बेर पढ़नी सभे त एह पर धेयान पड़ल कि ना. से अब दोहरावत बानी. ऊ शब्द रहल कहनुआ आ ऊ कहनुआ कवनो अइसन वइसन ना सरकारी गोल के कहनुआ. कहनुआ भोजपुरी के ठेंठ शब्द होखी प्रवक्ता का जगहा आ पार्टी खातिर सही भोजपुरी शब्द रही गोल. ई गोल फुटबाल भा हॉकी के गोल वाला गोल ना होके दल, जत्था, समुह, गिरोह, जरोह जइसन गोल ह. गोल ओह समुह के कहल जाला जवन कवनो खास बात, चीझु भा जगहा के चारो ओर गोल बना के खड़ा होखे. राजनीतिक पार्टियन खातिर गोल शब्द सबले सही होखी, दल अनुशासित होला, जत्था एक पर एक कई गो चलेला, गिरोह चोर डाकू गिरहकटन के होला आ गोल केहु के हो सकेला. एह गोल से गिरोह वाला भनक ना मिले. हो सकेला कि अन्ना टीम के एह पर आपत्ति होखो कि देश के सगरी दल गोल कम गिरोह बेसी हो गइल बाड़ें बाकिर हमरा राजनीति त करे के नइखे एहिजा. कबीरा खड़ा बाजार में सबकी पूछे खैर, ना काहु से दोसती ना काहु से बैर. बाकिर देखीं ना बात फेरु बहक गइल. संस्कृत वर्जना से उपजल शब्द बरजल आ वज्रपात से निकलल बज्जर पड़ल. बजरल एही बज्जर से जुड़ल बा. आदमी केहु के बरजेला आ केहु पर बजरेला. बात के देवता के बात से पूजल जाला आ लात के देवता के लात से. जे बरजला से मान गइल ओकरा पर बजरे के जरूरत ना पड़े आ जे बरजला से ना माने ओकरा पर बजरल जरूरी हो जाला. बाकिर बज्जर जइसन शब्द बजरी आ बाजरा में झलकत मिल जाता. बजरी कहल जाला ओह चना के जवना के बहिन अपना भाई के खिआवेलीं सँ ओकरा के वज्र जइसन कठोर बनावे खातिर. ऊ चनवो बजर होखेला से अलगा बात बा बाकिर हर चना के बजरी ना कहल जाव. बजरी का दिने, भईयादूज का दिने, बहिन अपना भाईयन के सरापेली सँ आ फेर ओही सरपला के बाद ऊ बजरी गुड़ भा मिठाई संगे अपना भाई के खिआवेलीं सँ ओकर मन अतना वज्र हो जाव कि बहिन के छोट मोट गलती के बरदाश्त कर सके. बाजरा भोजपुरी इलाका में ना उपजे से ओकरा के छोड़ दिहल जाव. काहे कि जवन चीझु होखबे ना करे ओकरा खातिर शब्द कहाँ से आई. अगिला बेर फेर मिलहीं के बा.

बतकुच्चन ‍ – ७१


सास दुखे अलगा भइनी ननद पड़ली बखरा. समय का साथे बहुत कुछ बदल जाला आ कुछ ना बदले. पहिले परिवार में संयुक्त परिवार होखत रहवे जवन टूट के एकल परिवार होत गइल आ अब हालत अतना खराब बा कि दू बेकत के परिवारो में खटपट होखत रहत बा. पहिले बड़का परिवारन में खटपट होखला पर केहु दुसे त कह दिहल जाव कि जेकरा नोहे ना रही से बखोरी का. भले मन ही मन कहल जात होखे कि आपन धियवा नीमन रहीत त बिरान पारीत गारी? बात सही बा. अगर आदमी में, परिवार में आपन दोस ना होखे त दोसर केहू कवन अछरंग लगा पाई, कवन बात ला गारी दी? संयुक्त परिवार त टूटत गइल बाकिर राजनीति में उलटा हो गइल. एक पार्टी के सरकार के जमाना बीतल त गठबन्हन के जमाना आ गइल. पहिले मरद मेहरारू में गठबन्हन होत रहुवे अब तरह तरह के पार्टियन में होखत बा. जे वर पक्ष जइसन बा से ओकरा बाद दूहे लागत बा सरकारी धन के. गाय भईंस के दूध दूहे से पहिले त पेन्हावल जरूरी होत रहे सरकार के दुहला खातिर पेन्हवलो के जरूरत ना पड़े. काहें कि सरकार त हमेशा पेन्हाइले रहेले ! बाकिर आजु त हम ओह दुख के चरचा करे चलल बानी जवन अलग बिलग भइला का बादो झेले के पड़ेला. काहें कि हालात कतनो बदल जाव हालात उहे रह जाला घुमा फिरा के. दीदी से जान बचावे खातिर दादा के हाथ थामल गइल बाकिर अब दादा अपना दादागिरी पर उतरल चाहत बाड़ें. आ एह बीच जे बीच बचाव करे में माहिर रहल ओह दादा के त धरनी पर राख दिहल गइल. ऊ दुरे से देखीहें कुछ कह ना पइहें. पता ना आपसीओ मुलाकात में कह सकेलें कि ना . काहे कि शायद ओह पद पर होखे वाला हर भेंट मुलाकात के, बातचीत के ब्योरा राखल जाला. बाकिर ना त दुख सास से रहल ना दुख ननदिआ से होखे वाला बा. असल दुख त अपना सुभाव का चलते बा जे ठीक नइखे रहि गइल. जे एह कमी के देखावल चाहत बा ओकरा के सीधे दुश्मन मान लिहल जात बा आ ओकरा के कवनो तरीका से नीचा देखावे के कोशिश में लाग जात बा लोग. मानत बानी कि अंगुरी देखावे वाला का अपने तरफ तीन गो अगुरी घुमल रहेला बस तर्जनी सामने वाला के देखावल जाला. एह तर्जनी देखवला के मकसद होला सामने वाला के बरजल, बरजे के, मना करे के जवन होखत बा से ठीक नइखे होखत बतावे के. बाकिर तर्जनी के एह तर्ज से बहुते लोग नाराज हो जालें. उनुकर शिकायत होला कि आपन फूला नइखे लउकत हमार माढ़ा देखावत बाड़! आ एह बतकुच्चन में कुछ अइसनो बरुआ बाड़ें जे बिना हवा के पीपल डोले बिना बात के बरुआ बोले वाला अंदाज में कुछ ना कूछ बोलत रहेलें भले उनुकर अपने लोग उनुका के बेर बेर बरजले होखस. कहे वाला त इहो कहेलें कि आन्हर कुकुर बतासे भूंके. जब नजर नइखे आवत त पतियो सरसरइला पर इहे लागत होखी बेचारा के केहू आवत बा आ ओकरा के धिरावल, सचेत कइल जरूरी बा. एहसे कुकुर भूंके त समुझीं कि कवनो अनचिन्हार भा बाकल आदमी आवत बा. सावधान रहला में कवनो हरजा ना होखे. बाकिर भूंके आ फेंकर में फरक होला. कुकुर के फेंकरल बहुते खराब मानल जाला काहे कि ऊ कवनो अपशकुन के अनेसा बतावेला. एह बीच बाकल के बोकला छोड़ावे के मन हो गइल. बाकल मतलब कि पागल जइसन, पागल ना. आ बोकला कवनो चीझु के छिलका के कहल जाला. एही से कूछ लोग खीसी कहियो देला कि हमरा से अझूरा जनि ना त तोहार बोकला छोड़ा देब. आ जब केहु अइसे धमकावेला त हम ओकरा से अझूराईं ना. धीरे से घसक जाई लें. काहे कि हमार मानना ह कि बुड़बक बूझावे से मरद.

बतकुच्चन – ७०


लस्टम पस्टम में दिहल ज्योति जी के सवाल पर कुछ कहे से पहिले एक बात साफ कर दिहल जरूरी लागत बा. हम ना त भाषा शास्त्री हईं ना भाषा वैज्ञानिक. हम त बस नाच के लबार हईं, सर्कस के जोकर हईं, रमी के पपलू हईं. शब्दन से खिलवाड़ करत बतकुच्चन करत रहीलें. गाईड फिलिम के देवानंद का तरह हमरा के ठोक पीट के स्वामी बनवला के जरूरत नइखे. भाषा के विद्वान लोग हमरा पीछे लट्ठ ले के पड़ो एहले पहिले आपन असलियत दोहरावल जरूरी लागल. सुनले बानी कि बढ़िया डाक्टर भा बढ़िया वकील किताब के सहारा लेत रहेला से हमहूं कुछ एने से कुछ ओने से पढ़त रहीलें, सवाल के जवाब खोजत रहीलें. भोजपुरी त कबो पढ़ावले ना गइल, हिन्दीओ से इंटर का बाद भेंट ना भइल. बाकिर भाषा से प्रेम ह से भाषा का सेवा में लागल रहीलें. अब लवटल जाव ओह सवाल पर कि कहावतन के छूरी तरकारी पर काहे गिरल कि अतना कहावत तरकारी वगैरह पर बन गइल. सब तरकारी के किस्मत ह ज्योति जी. छूरी तरकारी पर गिरे भा तरकारी छूरी पर, कटे के त तरकरिए के बा. गरीब के जोरू गाँव भर के भउजाई होले. बड़ जीउ बतियवले छोट जीउ लतियवले कहावत समाज के मानसिकता देखावेला. अधिकतर कहावत में कमजोरे निशान पर रहेलें आ उनके बहाने समाज के अनुभव हकीकत सामने आवत रहेला. कहावत कहे वाला निमना घरे बायन ना देव. जानेला कि भर पेट भेंटा जाई. बाकिर कमजोरका त हिंहिंया के रहि जाई. रजुआ राजू राजा सेठ. गरीबी पार्वतिओ के परबतिया बना देले. से कहावत अकसरहाँ कमजोरे के निशाना बनावत आइल बा. ई सब बतियावत में जानल जरूरी लागल कि कहावत होला का. जाने के कोशिश कइनी त पता चलल कि कहावत माने कि जवन कहात आवत बा आ एही से कहावत बनल. कहावत अपना आप में पूरा होला. कहावतन में समष्टि के अनुभव सूक्ति का मार्फत सामने आवेला. गागर में सागर का तरह. कहावतन के मकसद होला व्यंग का सहारे हकीकत के बयान. कहियो जाईं आ कहबो ना करीं. व्याकरणाचार्य लोग कहावत के लोकोक्ति का वर्ग में राखेला जहाँ कहावत, मुहावरा, बुझौवल, बाल गीत वगैरह बहुत कुछ आवेला जवन लोग कहत आइल बा. एक मुट्ठी लाई महाबीर पर छिटाई बरखा ओनिए बिलाई भा एक मुट्ठी सरसो भदर भदर बरसो जइसन लोकोक्ति के कवनो मतलब ना होखे. एहसे ई सब कहावतन में शामिल ना भइल. लोकोक्ति में त शामिल हो गइल बाकिर कहावत में ना. बूझवउल त सवाल भर होला जवना के जवाब सामने वाला के देबे के होला. उहो कहावत ना बनली सँ. बाचल मुहावरा त कई बेर गलती से लोग मुहावरो के कहावते में जोड़ देला बाकिर मुहावरा कहावत का बरोबरी में कबो ना आ सके. कहाँ राजा भोज कहाँ गंगुआ तेली. मुहावरा आधा अधूरा होला ओकरा के जबले कवनो वाक्य में इस्तेमाल ना कइल जाव तबले ओकर मतलब साफ ना हो सके बाकिर कहावत स्वतंत्र होलें. अपने से सब कुछ कह जालें. आ एह साफगोई के आधार रहेला कहावतन का पीछे समाज के लमहर अनुभव. बिना हवा के पीपर डोले बिना बोलवले बरुआ बोले ओही अनुभव के देखावेला. समाज के अनुभव जब कवनो सूक्ति वाक्य में समाहित हो जाव त ऊ कहावत बन जाले. हँ सगरी कहावत व्यंग ना होली सँ बाकिर अधिकतर कहावत में व्यंग जरूर रहेला. बाप के नाम साग पात बेटा के परोरा अइसने व्यंग देखावेला जब केहु अपना के बढ़ चढ़ के देखावे बतावे के कोशिश करेला. आ हम अपना के परोरा में शामिल ना करीं. साग पात हईं सागे पात रहे दीं ज्योति जी. पाँय लागत बानी, चले के आदेश दीं.

बतकुच्चन – ६९


पीर से पीर कि पीर के पीर कि पीरे पीर बना देले आ तब पीर खातिर पीर सहाउर हो जाले? अब एह पीर के रीत से पिरितिया बनल कि पिरितिया में पीर के रीत बन गइल बा? संस्कृत के प्रीत बिगड़त बिगड़त कब पिरित हो गइल आ एह पिरितिया के संबंध पीर से अस जुड़ल कि अलग कइल मुश्किल हो गइल. पिरितिया के पीर ऊ जाने जे कबो पिरित कइले होखे, पिरित में पड़ल होखे. ना त बाँझ का जनीहें प्रसवति के पीड़ा?

पीड़ा के बिगड़ल रूप पीर हवे आ पँहुचल संत महत्मो के पीर कहल जाला. जे पीर हो गइल ओकरा दुनिया के पीर से सहाउर बनही के पड़ी ना त ऊ दोसरा के पीर कइसे हर पाई. हरे वाला के निवारक भा उद्धारक कहल जा सकेला बाकिर हर चलावे वाला त हरवाहे बनि के रहि जाला. अलग बाति बा कि अब ट्रैक्टर आ कंबाइन का जमाना में हरवाही त कब के बिला गइल बा. गइल जमाना जब दुआर पर बान्हल बैलन के जोड़ी से मालिक के औकात झलकत रहे आ देखे आ देखावे के कवनो मौका छोड़ल ना जात रहे. समधी बन्हन खोलाई में बैले खोल ले जाए पर अड़ जासु. अब बैल रह स भा ना बन्हन खोलाई के परंपरा अबहियो जिन्दा बा बाकिर बकरी के माई कहिया ले खरजिउतिया भूखी? आजु ना त काल्हु बाकी परंपरन का तरह एहु परंपरा के जाहीं क बा. काहे कि ना त अब आंगन रहि गइल बा ना अंगना में छवावे वाला माड़ो.

माड़ो जे ना समुझत होखे से जान लेव कि मण्डप के एगो रूप ह माड़ो. हर मण्डप के माड़ो ना कहल जाव. माड़ो भा मड़वा ओह मण्डप के कहल जाला जवन शादी करावे खातिर घर का आंगन में छावल जात रहे आ अबहियों छवाला. अलग बाति बा कि अब अंगना का बदले घर का छत पर भा कवनो उत्सव भवन का भीतर. खैर बात कहाँ से कहाँ चलि आइल. शुरू कइले रहीं पीर आ पीर से त ओही पीर पर लवटल जाव.

पीर के पीर के जाने ला? पीर अपना हिरदा में कतना पीर समवले रहेला से के देखे जानेला? पीर पेरइलो में होखेला. ऊँख पेरइला से रस निकलेला, आदमी पेराला त आँखि से लोर निकलेला. बाकिर कुछ लोग अइसनो पेराला कि ऊ लोरो ना बहा सके आ एह पीर के सहि के पीरो ना बन पावे. अइसने पीर राजगो का लगे बा जे जदयू से मिलल पीर सहे ला मजबूर बा. बाकिर राजग कबो पीर ना बनि सके. काहे कि पीर बने खातिर जिनिगी के जिम्मेवारी से उपर उठे के पड़ेला.

पीर का लगे ना त अपना के ढोवे के जिम्मेवारी होला ना अपना परिवार के. ऊ त सब कुछ दोसरा पर छोड़ के निश्चिंत हो जाला आ खुद पीर बनि जाला. ओकर पिरित कवनो दोसरा जीव से ना लाग के सगरी जीव के जीवन देबे वाला से लाग जाला आ तबहिये ऊ पीर कहल जाला. ना त कतने राँझा कतने महिवाल पीर बन गइल रहते. बाकिर अपना पिरितिया के पीर ना झेल पवला का चलते ऊ राँझा महिवाल जस मजनूं बनि गइलें. तबहियो अतना त देखाइए दिहलन कि पीर आ पिरित के जोड़ बहुते मजगर होला.