समय आ गइल बा जब भाजपा के आपन प्राथमिकता तय करे लेबे के चाहीं.

आजुकाल्हु राष्ट्रपति के उम्मीदवार चुने में भाजपा के जवन फजीहत होखत बा ओहसे लागत बा कि ओकरा आपन प्राथमिकता तय करे के समय आ गइल बा. का चाहीं ओकरा, एन केन प्रकारेण सत्ता में चहुँपे के जोगाड़ आ कि अपना तय लक्ष्य के प्राप्ति?

राम मन्दिर आन्दोलन का बाद बनल एनडीए सरकार में भाजपा आपन सब कुछ गँवा दिहलसि. सरकार में बनल रहे खातिर हर तरह के समझौता कइलसि आ परिणाम सभका सामने बा. एनडीए के हालात आजुओ उहे बा. एह गठबन्हन में शामिल हर दल, भाजपा छोड़ के, अपना नीति पर कायम बा आ ओकनी के सटवले राखे खातिर भाजपा सगरी अंगुरियावल महटिया के बरदाश्त कइले जात बिया. कवना फायदा खातिर कवना सोच में?

राष्ट्रपति का चुनाव में लड़े के बा त आपन मजगर उम्मीदवार देव ना त मैदान छोड़ देव. एह मजगर उम्मीदवारन में या त शरद यादव के उम्मीदवार बने खातिर तइयार करावे भा खुद लालकृष्ण आडवाणी के आपन उम्मीदवार घोषित करे. शरद यादव बनीहें ना काहे कि ऊ हारल बाजी पर दाँव चढ़े ला तइयार ना होखीहें. बाकिर लालकृष्ण आडवाणी के उम्मीदवार बनवला से बहुते कुछ संदेश जनता आ अपना सहयोगियन के दे सकेले भाजपा. आडवाणी के राष्ट्रपति चुनाव लड़वा के भाजपा देखा दी कि ऊ एह लड़ाई के मजाक नइखे बने दिहल चाहत आ अपना पूरा ताकत से लड़े के इरादा राखत बिया. हो सकेला कि ओह सूरत मे एनडीए के बाकी दलो पूरा मन से उनुका पक्ष में खड़ा हो जासु. अगर ना खड़ा भइलें त मान लेबे के चाहीं भाजपा के ई संहतिया ना हउवें बलुक संगे रहि के घात करे वाला हउवें. तब अइसनका लोग से दूरी बनाइए लिहला में भलाई होखी भाजपा के.

अगर आडवाणी के एह पर आपत्ति होखे त उनुका के समुझावल जा सकेला कि देश के कवनो कानून राष्ट्रपति के चुनाव लड़े वाला के बाद में सांसद भा प्रधानमंत्री बने से ना रोके. अबहीं राष्ट्रपति के चुनाव फरियावे के बा संसद के चुनाव दू साल बाद देखल जाई.

आजु का राजनीति में देश के सबले बडका समुदाय के पक्षधर केहू नइखे. इहाँले कि ओह समुदाए में विभीषण आ जयचन्दन के भरमार हो गइल बा. आपन राज बचावे खातिर हमलावर के आपन बेटी सँउपे वाला राजा ना रहतें त का देश अतना दिन ले गुलाम रहल रहीत? जे लड़ाई से भागत रहेला ऊ बाद में लड़े लायक ना रहि जाव. भाजपा के हालत इहे हो गइल बा. हमेशा मिमिंयात आ दोसरा के बात मान लेबे वाला के सम्मान केहू कइसे करी?

टटका बात बा नीतीश कुमार के बयान जेहमें ऊ कहले बाड़न कि भाजपा के चाहीं कि आपन प्रधानमंत्री के उम्मीदवार तय कर लेव जेहसे सहयोगी फैसला कर सकसु कि उनुका का करे के बा. नीतीश अपना हिसाब से बिल्कुल सही कहले बाड़न बाकिर का भाजपा में अतना बेंवत रहि गइल बा कि ऊ अपना हिसाब से सही बात कहि सको ? हम ना त भाजपा के सदस्य हईं ना कवनो अधिकारी बाकिर भाजपा के शुभचिन्तक अपना के जरूर मानीलें काहें कि देश में अकेला भाजपे बिया जे कांग्रेस के गलत नीतियन के मुकाबला कर सकेले आ देश के बड़हन जमात के हित के रक्षा कर सकेले अगर करे के चाहे. बार बार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ होखे वाला बयान बाजी के विरोध कइल ओतने जरूरी बा. साबित हो चुकल बा कि गुजरात दंगा में नरेन्द्र मोदी के कवनो हाथ ना रहे. हँ ओह दंगा के समय पर काबू कर लेबे के सम्मान उनुका के जरूर दिहल जा सकेला. बाकिर ओही नरेन्द्र मोदी के देश के सेकुलर जमात बार बार गरियावत रहेले आ भाजपा चुपचाप सुनत रहि जाले. भाजपा के ई मान लेबे के चाहीं कि देश के कल्याण सेकुलरिज्म से नइखे होखे वाला सर्व धर्म समभाव से होखे वाला बा. जहवाँ कवनो धर्म भा मजहब के ना त बेजा बढ़ावा दिहल जाव ना बे जरूरत निंदा कइल जाव.

दोसरे का दिक्कत बा भाजपा के आपन नेता चुन लेबे में? पूरा राष्ट्रीय कार्यकारिणी बइठे आ तब ले बइठावल जाव जब ले कवनो एक आदमी भा महिला के नेता चुन नइखे लिहल जात. एक बेर भाजपा तय कर लेव त जनतो के सहूलियत हो जाई आपन राय तय करे में. अगर भाजपा कांग्रेस के बी टीम बनल चाहत बिया त बनो ई ओकरा फैसला होखी बाकिर जनतो तब बी टीम के काहे समर्थन करी काहे ना सीधे ए टीम के करी? अगर भाजपा ओही राहे चली जवना पर देश के सेकूलर जमात चलत बा त का जरूरत बा ओकर?

दोसरे भाजपा के इहो तय कर लेबे के चाहीं कि के ओकर स्वाभाविक सहयोगी हो सकेला आ के कवनो फायदा का लालच में ओकरा से सटे वाला बा. अपना स्वाभाविक सहयोगियन के भलही चिंता कर लेव भाजपा बाकिर लालची सहयोगियन खातिर आपन विचारधारा तजल ठीक ना कहाई. याद करे भाजपा जब ओकरा लगे संसद में बस दू गो सीट बाँचल रहि गइल रहे? ओकरा बाद ओकर वापसी ओकरा विचारधारा का चलते भइल रहुवे जवना के अटल बिहारी बाजपेयी के भलमनसाहत में गँवा दिहलसि भाजपा आ बढ़िया सरकार चलवला का बावजूद अगिला चुनाव हार गइल रहे. अगर भाजपा आपन कोर्स करेक्शन ना करी त २०१४ का चुनाव का बाद भाजपा के हालत अउरी पातर हो जाई. समय आ गइल बा जब भाजपा छाती ठोक के आपन नेता तय कर लेव आ कह देव सहयोगियन के कि जेकरा रहे के बा से रहे जेकरा जाए क बा से जाय.

– संपादक, अँजोरिया वेबसाइट समूह

भाजपा में संघ से आइल संजय जोशी इस्तीफा दिहले

पिछला दिने नरेन्द्र मोदी का विरोध का चलते भाजपा का राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटावल प्रचारक संजय जोशी भाजपा से इस्तीफा दे दिहले बाड़न आ कहले बाड़न कि अब ऊ खाली संघ कार्य में लगीहें.

संघ के कार्यप्रणाली का तहत ओकर प्रचारक भाजपा आ बाकी आनुसांगिक संगठनन में संगठन मंत्री बनावल जालें जे ओह संगठन पर पूरा नजर राखेलें. नरेन्द्र मोदी संघ के अइसनका पहिला प्रचारक रहलें जिनका के मुख्यमंत्री बनावल गइल रहे. एक समय नरेन्द्र मोदी आ संजय जोशी दुनु जने गुजराते में संघ के प्रचारक रहलें आ जोशी मोदी से सीनियर रहलें. बाकिर समय का फेर में नरेन्द्र मोदी के प्रभाव बढ़त गइल आ आखिरकार जोशी के भाजपा से हटे के पड़ गइल.

वइसे दू बेकत के झगड़ा बीच में बोले लबरा. संघ के झमेला में आम आदमी के कूछ कहे से पहिले सई बेर सोचे के चाहीं काहे कि कई बार बहुते सारा खेल संघ के तरीका से खेलल जाला आ दुनु तरफ के लोग के अझूरवले राखे आ संघ का परिधि में बनवले राखे खातिर एह खेल के इस्तेमाल होला.

येदु, वसुंधरा अउर मोदी क बहाने

– अशोक भाटिया

आजुओ हम रोजाना आर॰एस॰एस॰ क शाखा जाइले आ जइसहीं ओहिजा चहुँपीले संघ के अधिकारी हमरा ओरि अजबे नजर तिकवेलें. ई क्रम आजु से ना पिछला पचास साल से चलल आवत बा. संघ का नजरिया से हम संघी कम भाजपाई बेसी हईं. स्वयं सेवक क नाते त आजुओ हमरा के संबोधित ना कइल जाला. हमरा बारे में उनुकर नजरिया संघ के स्वयं सेवक ना मान के भाजपा नेता क रूप में होत आइल बा. उनुका लागेला कि ई उनुके मेहनत के नतीजा ह कि हम आजु भाजपा में नेता बनल बानी, उहे हमरा क एह लायक बनवलें कि हम भाजपा नेता कहानी. जबकि आजु क राजनीति मे परिदृश्य बदल चुकल बा आ राजनेता क परिभसो. अब चाल,चेहरा अउर चरित्र होखल राजनीति क परिभाषा नइखे रहि गइल. जे जतना चतुर, चालाक ….. होखी ऊ ओतने सफल राजनेता होई. ओकरे मान आ जगहा पार्टी आ जनता में ऊँच रही. एह बाति के आजुओ संघ वाला लोग पचा नइखे पावत.

आजु का दिने भाजपा नेता एह बदलल परिदृश्य में काम कइल चाहत बाड़ें बाकिर संघ के अधिकारी आजुओ उनुका के अपना चाल, चरित्र, चेहरा वाला चाबुके से हांकल चाहत बाड़न. एही चलते आजु येदुरप्पा, वसुंधरा, मोदी के आवाज बदले लागल बा. दिल्ली में बइठ के संघ येदुरप्पा पर दबाव डाल के उनुका के बदलवा त लिहलसि बाकिर का आजुओ ओहिजा राजनीति थिरा पवले बा का? भलही आजु सी बी आइ क चलते येदु अझूराइल बाड़न बाकिर उनुकर राजनैतिक प्रभाव संघ कम नइखे कर पवले. आ अइसने चलत रहल त जवन हालत कल्याणसिंह बिना भाजपा के यूपी में भइल उहे कर्णाटक में बिना यदु के होखी. वसुंधरा साफ कह दिहले बाड़ी कि ऊ अपना किहाँ संघ क दखल अंदाजी नइखी चाहत. ओहिजा पार्टी उनुके अंदाज में चली त संघ के अपना मोहरा गुलाबचंद कटारिया के लेके पीछे हटे के पड़ल. उत्तरोखंड में संघ क दबाव में भाजपा ठीक चुनाव घरी आपन मुख्य मंत्री बदल दिहलसि, भइल का? ओहिजा सत्तो गइल आ आजु ले विरोधी दल के नेता के नाम तय नइखे हो पावल.

नरेन्द्र मोदी के देश के लोग प्रधानमंत्री बनल देखल चाहत बा बाकिर संघ का इशारा पर गुजरात में आउट डेटेड नेता फेर उभरे लागल बाड़ें. जब सोनिया गाँधी क आशीर्वाद मिलला क बावजूद घर के भेदी शंकरसिंह वाघेला मोदी के कुछ ना बिगाड़ सकले त ई आउट डेटेड नेता का कर लीहें. संघ के बढ़त दकल का बारे में भाजपा के सोचे पड़ी तबहिए साल २०१४ में भाजपा के कामयाबी मिल पाई. २०१४ क भविष्य भाजपा के बा बाकिर ओकर कुछ समय खातिर संघ के बैशाखी के सहारा छोड़े के पड़ी. आजु के जमाना चाल, चेहरा, चरित्र क साथे साथ चतुर, चालाक……क बा.
(वसई रोड (मुंबई))


एह लेख में दिहल विचार एगो आम भाजपाई नेता क बा जे फल त खाइल चाहत बा बाकिर पेड़ काट के. जवना पेड़ पर ऊ फल उपजल बा ओह पेड़ के नकार के. आजुए ना शुरूए से भाजपा के समस्या अइसने नेता लोग रहल बा. संघ से अतना परहेज बा त कवन डाक्टर कहले बा कि भाजपा के ओसारा में पटाइल रहऽ! राह खुलल बा.

रहल बात येदु वसुधंरा के त संघ के राजनीतिक संगठन में बलराज मधोक, शंकर सिंह वाघेला, कल्याण सिंह जइसन नमूना मिलत रहल बाड़ें. अइसना नेता लोग के साफ समुझ लेबे के चाहीं कि भाजपा से संघ के अस्तित्व नइखे, संघ से भाजपा के अस्तित्व बा.

आम पाठक कह सकेलें कि अशोक भाटिया जी के लेख से अतने विरोध रहुवे त एकरा के प्रकाशित कइला के जरूरत का रहल? जरूरत रहल कि हर तरह के विचार के सामने ले आवल जाव. अगिला चुनाव देश के जीवन दशा तय करे वाला होखी. अबहियो जे ना चेतल से बाद में रोइयो ना पाई. समय के जरूरत बा कि संघ भाजपा के पूरा कमान अपना हाथ में ले लेव. भलही चुनाव में एक सीट ना जीत पावे भाजपा बाकिर संघ के अपना विचार धारा पर अड़े के पड़ी. भाजपा के सबले बड़का बेमारी इहे दोहरा चाल चेहरा वाला चतुर चालाक लोग ह. अइसना लोग से छुट्टी ना लिहल गइल त ई लोग भाजपा के भाजपा ना रहे दी कांग्रेस के बी टीम बना दी. आ जब कांग्रेसे के कवनो टीम चुने के बा त काहे ना एक नंबर के टीम चुनी जनता?

माफ करीं अशोक जी, आपके विचार नीक ना लागल.

– संपादक, अंजोरिया

हार के जिम्मेदारी अकेले शाही के कइसे दिहल जाई

भाजपा नेता राजनाथ सिंह बुध का दिने कहलन कि प्रदेश चुनाव में भाजपा के हार के जिम्मेदार सभे रहल आ केहू एक आदमी के एकर दोषी बनावल भा बतावल ना जा सके. कहलन कि प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही के हटवला के सजा मत समुझल जाव. एह तरह के फेर बदल हर राजनीतिक दल में समय समय पर होते रहेला.

संसद में उठल भोजपुरी के बाति

हाल में समापन भइल संसद के शीतकालीन सत्र में बियफे का दिने भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में जल्दी से शामिल करे के माँग उठवलें. आपन बाति कहत घरी शत्रुघ्न सिन्हा हालांकि एह गंभीर माँग के लालू का साथे जोड़ के मजाक के विषय बना दिहलन. कहलन कि लालू के राष्ट्रीय व्यक्तित्व घोषित कर दिहल जाव. एह बात पर सदन में ठहाका त गूंजल बाकिर भोजपुरी के बात मीडिया में ओह तरे ना आ पावल जइसे आवल चाहत रहे. मीडिया के ध्यान लालू वाला हिस्सा पर अधिका गइल आ भोजपुरी के बाति पर कम.

शत्रुघ्न सिन्हा कहलन कि भोजपुरी दुनिया भर में लोकप्रिय भाषा हियऽ आ एकरा बोलेवालन में देश के पंहिलका राष्ट्रपति डा॰ राजेन्द्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, बाबू जगजीवन राम आ मारीशस के राष्ट्रपिता सर शिवसागर रामगुलाम शामिल रहलें.

एह बाति के जतना रेघरियावल जाव ऊ कम रही कि शत्रुघ्न सिंन्हा मुद्दा त बढ़िया उठवलन बाकिर ओकरा के लालू से जोड़ के लबारी में बदलि दिहलन. मीडियो के नजर एह छिछले बाति पर पड़ल आ असल मुद्दा के अनदेखी हो गइल. हद त तब हो गइल जब शत्रुघ्न सिन्हा कहलन कि भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता आ लालू के राष्ट्रीय व्यक्तित्व घोषित करे के काम साथे साथ कइल जाव !

हमरा बुझात नइखे कि एह काम खातिर शत्रुघ्न सिंहा के बधाई दीं कि उनुकर आलोचना करीं. रउरो सोचीं का कहल जाव ?

कहिया ले ताल ठोंके खातिर बनल रहीहें आडवाणी

– पाण्डेय हरिराम


संसद में आ कहीं त भारत में मुख्य विपक्षी राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी अबहियो राजनीतिक प्रचार के पुरनका तरीकन से सटल बिया. भाजपा के 84 साल उमिर वाला नेता लाल कृष्ण आडवाणी के रथयात्रा का एलान से त इहे लागत बा कि ऊ अबहियो नेपथ्य में रहि के संगठन के संचालन सम्हारल नइखन चाहत आ नाही इहे चाहत बाड़न कि नवका लोग मंच पर आके नेतृत्व करसु. आडवाणी फिलहाल संसदीय विपक्ष के सबले कद्दावर नेता हउवें आ भठियरपन का मुद्दा पर देश में जतना आक्रोश देखल जात बा , ओकरा के ध्यान में राखत उनुका एह कदम के नैतिक औचित्य त समुझ में आवत बा. लेकिन जहां ले मामिला एकरा राजनीतिक औचित्य के बा त ओहिजा सवाले सवाल भरल पड़ल बा. देश के आम आदमी खातिर एह प्रस्तावित यात्रा से जुड़ल सबले बड़ चिंता इहे होखी कि लगभग अपने आप उभरल भठियरपन विरोधी एह चेतना के कतहीं कवनो झटका त ना लागी.

जन लोकपाल विधेयक खातिर चलत जवन आंदोलन एह चेतना के असल आवाज बनल बा, ओकर स्वरूप अबही ले अराजनीतिक रहल बा. कवनो एक पार्टी के एकरा के भँजावे आगा आइल लोग के एकरा बारे में अनसाहट पैदा कर सकेला. उहो तब, जब संबंधित पार्टी – बीजेपी – के कई राज्य सरकारनो पर भठियरपन में सनइला के भा एकरा पर नरम रवैया अपनावे के आरोप मीडिया में छवले होखे. दोसर खतरा एह रथयात्रा के असर में भठियरपन विरोधी पूरा आन्दोलने के सांप्रदायिक रंग दे दिहल गइला के बा. अक्टूबर 1990 आ नवंबर – दिसंबर 1992 के महीना इतिहास में भलही इकईस आ उनईस साल पीछे छूट गइल होखे बाकिर लालकृष्ण आडवाणी के ख्याति आ यादगार आजुओ उनुका एही दुनु यात्रा के लेके बा. एकरा बाद ऊ चार गो अउरियो यात्रा पर निकलले, ई बाति लोगन के अब याद नइखे.

ई सही बा कि आडवाणी के ऊ दुनु राम रथयात्रा उनुका के देश में अउर खुद उनुका पार्टीओ में कमोबेश अटल बिहारी वाजपेयी के कद के नेता बना दिहलसि, लेकिन दोसरा तरफ बीजेपी के दर्जा विपक्ष के सबले सुसंगत पार्टी से घटाके गरम सांप्रदायिक नारन के सियासत करे वाली पार्टी जइसन बना दिहलो में सबले बड़हन भूमिका इनकरे रहल. ई एगो विडंबने बा कि भठियरपन का मुद्दा पर खुद के बहुते घेराइल देखत कांग्रेस आडवाणी के यात्रा-एलान के स्वागत कइले बिया. एह सियासी सरकँवासी के अहसास विपक्ष के सबले कद्दावर नेता के समय रहते हो जाये के चाहीं.

चाहे हम आडवाणी आ भाजपा के विरोधी होंखी भा समर्थक, एह कदम के सही रणनीतिक गर्जना मानही के होई. वइसहू आधुनिक राजनीतिक इतिहास में यात्रा अउर आडवाणी एक दोसरा के पर्याय हो गइल बाड़े. आडवाणी के ई पांचवीं अखिल भारतीय रथयात्रा होई. एकर परिणाम का निकली से त कहल फिलहाल कठिन बा, लेकिन जनता के बीच जाके दलीय राजनीतिक संघर्ष के ई एगो सही कदम बा. अलग बाति बा कि भाजपा में राजनीतिक संघर्ष करे के माद्दा त छोड़ीं, अइसन सोचो राखेवालन के कमी हो गइल बा. अइसनका पार्टी के राजनीतिक भविष्य का होई एकर अंदाजा आसानी से लगावल जा सकेला. आखिर आडवाणी कहिया ले ताल ठोंके खातिर बनल रहीहें ?
(12 सितम्बर 2011)


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.

केहू भाजपा से पूछे त तनी…

– पाण्डेय हरिराम

पिछला महीना भर से देश के सियासी माहौल खदक रहल बा. कबो हजारे के अनशन के पाछा हजारों नारा त कबो बाबा रामदेव के आंदोलन रोके खातिर आवभगत से लेकर बल प्रयोग तकले. संगही संगे गांधी जी का समाधि पर ठुमका आ जिला जिला में नारेबाजी. सभकर निशाना पर संप्रग सरकार, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अउर संप्रग के अध्यक्षा सोनिया गांधी बाड़ी. आ एह काम में सबले आगा बिया भारतीय जनता पार्टी. लेफ्टो वाला कहीं कहीं जोर लगावत नजर आवत बाड़े. वइसे ई सही बा कि घोटालन का चलते केंद्र सरकार के विश्वसनीयता पर ढेरे चोट लागल बा. विपक्ष जनता के ई बतावे में लागल बा कि मौजूदा सरकार एकदमे नाकारा बिया. एकरा के बदल देबे के चाहीं. ऊ सरकार में अतना खोट गिनावत बा कि यदि वश चले तो जनता अबहिये ओकरा के बदल देव. बाकिर विपक्ष के शोरशराबा में लोग ई पूछल भुला जात बा. भा एकरा के अइसे कहीं कि तेजी से उफनात आरोपन का बाढ़ में जनता के ई पूछे के मौके नइखे मिलत कि “विपक्ष के हाल का बा ? अगर ई लोग सत्ता में आ जाव त प्रधानमंत्री के होखी ?”

सबले बड़ विपक्षी दल होखला का नाते ई भाजपा के जिम्मेदारी बनत बा कि ऊ यूपीए सरकार के स्वाभाविक विकल्प परोसे. लेकिन भाजपा अबहियो अपना ला नयका पीढ़ी के नेता खोजे में अझूराइल बिया. शायद इहे कारण बा कि लालकृष्ण आडवाणी अबहियो भाजपा संसदीय दल के अध्यक्ष बनल बाड़े, जबकि साल 2009 का लोकसभा चुनाव में मिलल हार का बाद ऊ सक्रिय राजनीति से संन्यास लेबे के इशारा कइले रहले. एह नवंबर में आडवाणी 84 बरीस के हो जइहें आ आम चुनाव अबहियो तीन साल दूर बा ! केरल चुनाव में वीएस अच्युतानंद के उल्लेखनीय प्रदर्शन भलही बूढ़वा नेता लोग के आस जगा दिहले होखे, लेकिन अइसनका कामयाबी लोकसभा चुनावो में दोहरावल जा सकले ई तय नइखे. राजनीतिक वापसी खातिर आडवाणी के संजीदा प्रयासन का बावजूद अयोध्या मामिला के परछाईं उनुकर सर्वमान्यता के हमेशा चुनौती देत रही. लेकिन अगर आडवाणी ना त दोसर के ? कैडर आधारित संगठन का रूप में आरएसएस संगठित नेतृत्व के धारणा पर जोर देत रह गइल आ अपना के राजनीतिक वंशवाद आ मतवाद के परिपाटी से दूर बनवले रखलसि.

लेकिन समय का साथ संघो के बाजपेयी के लार्जर दैन लाइफ छवि सकारे खातिर मजबूर होखे के पड़ल. अब जब आडवाणी-बाजपेयी युग समाप्त हो चुकल बा त संघो अपना एह पुरान आस्था का ओर लवटि गइल बा कि संगठन व्यक्ति से ऊपर होखेला. अब नितिन गडकरी जइसन ‘लो प्रोफाइल’ आदमी के भाजपा अध्यक्ष बनावल संघ नेतृत्व का तरफ से भाजपा के ई संकेत रहे कि ओकर कवनो नयका नेता अपना बरोबरी वालन में पहिला नइखे बन पवले. सनेशा साफ रहे, नेता का रूप में केहू का नाम पर तबहिये विचार कइल जाई जब ऊ अहंकार आ गुटबाजी से ऊपर उठ जाई.

भाजपा खातिर दुखदायी ई रहल कि अतीत के दुश्मनी के घाव अबहियो नइखे भरल. सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे आ उमा भारती करिश्माई ‘वोट कैचर’ नेता हई, लेकिन संघ के पुरुष प्रधान परिवेश में ओहलोग के सकरना पर संदेह बा. हाल के उदाहरणो इहे बतावत बा कि भगवा भ्रातृत्व का दायरे में कवनो महिला नेता के कवना तरह के प्रतिरोधन के सामना करे के पड़ सकेला. अरुण जेटली भाजपा के शहरी, सुसंस्कृत नेता का रूप में हउवें लेकिन जे लोग आमतौर पर टीवी के एसएमएस पोल में वोट देला ऊ चुनाव में वोट डाले ना जाव. अब बचले नरेंद्र मोदी. बेशक ऊ पहिला पाँत के नेता हउवें बाकिर आजुकाल्हु कवनो पाटीं के अकेले शासन के समय नइखे रहल आ गठबंधन का सरकार में ऊ कतना फिट बइठीहें ई बतावे के जरूरत नइखे. त साल 2014 के आम चुनाव में विपक्ष का ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रही ? साफ बा कि विपक्ष के अइसन नेता चाही जेकर आपन जनाधार होखे, जे रणनीति बनावे में मास्टर होखे, जेकर छवि साफ होखे, आ सबले खास बाति ई कि ओकरा के एगो गठबंधन निर्माता का रूप में देखल जात होखे. का भाजपा का लगे कवनो अइसन नेता बा ? आंदोलनन के हवा देबे वाला विपक्ष से ई पूछल जरूरी बा.



पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.

एकता यात्रा के रोकल गलत भइल

– पाण्डेय हरिराम

भारतीय जनता पार्टी के एकता यात्रा के श्रीनगर चहुँपे से पहिलही रोक दिहल गइल आ नेता लोग के गिरफ्तार कर लिहल गइल, भावनात्मक पहलू से एह बाति के कई गो कोण हो सकेला. एक पहलू त ऊ जइसे सुषमा स्वराज कहली कि, “तिरंगा फहरावे वालन के गिरफ्तार कइल जात बा आ ओकरा के जरावे वालन के सुरक्षा दिहल जा रहल बा.” बाकिर एकर एगो सियासीओ पहलू बा. ऊ ई कि उमर अब्दुल्ला एह देश के एगो राज्य के मुख्यमंत्री हउवन कि खाली जम्मू काश्मीर के.

एकता यात्रा के कवनो हश्र होखो बाकिर उमर अब्दुल्ला एगो मुख्यमंत्री का रुप में नाकारा साबित हो गइले. उमर अब्दुल्ला के राजनीतिक आ प्रशासनिक कदम भाजपा के ऊ करे के मौका आ विचार दे दिहलसि जवन ओकरा लउकतो ना रहे. एह तरह के आचरण उमर अब्दुल्ला के नुकसान चहुँपा रहल बा. बाकिर एहमें एगो अंतर्सबंधो बा. घाटी बड़हन फसाद झेल रहल बा एहसे इल्जाम लगा दिहल आसान हो सकेला कि ऊ आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेस आ इस्लामी चरमपंथियन का कब्जा में बा आ ओकरा के नियंत्रित करे वाला हाथ सरहद के सीमा के ओह पार बइठल बा. साथ ही ओह लोग पर दिल्ली में बइठल बुद्धिजीवियनो के असर बा. साँच त ई बा कि घाटी के आन्दोलन ओहिजा के मुख्यमंत्री के बदले खातिर हो रहल बा.

आजु ले घाटी के लोग, जे उमर के चुनले नइखे, उमर के आपन ना मानसु. भाजपा के एकता यात्रा एगो आबादी के विचार के प्रतिनिधित्व करत बा बाकिर अइसन नइखे कहल जा सकत कि इहे राष्ट्रीय विचारधारा हऽ. ओह मायने में एह यात्रा का प्रति राष्ट्रीय भावना साल १९९२ में मुरली मनोहर जोशी के एकता यात्रा से बिल्कुले अलग बा. ओह घरी ओहिजा राष्ट्रपति शासन रहुवे आ कुछ लोग के हवाई मार्ग से ले जा के सांकेतिक रुप से तिरंगा फहरावल गइल रहे. उमरो अइसन कर सकत रहले. चहतन त बड़हन पहरा में एह यात्रा के अनुमति दे सकत रहन जवन बहुते कठिन ना रहे. उनुका ओह काश्मीरियनो के सहानुभुति मिल जाइत जिनका हिंसा से कुछ लेबे देबे के नइखे आ तब सारा ठीकरा केन्द्र सरकार का मूड़ी पर फोड़ सकत रहले. साथ ही ऊ ओह बवालियनो के संदेश दे सकत रहले कि ओकनी के कवनो कोशिश के जोरदार मुकाबिला होई.

अबले उमर राष्ट्र से आ जनता से कहत आवत रहले कि ऊ काश्मीर में कुछ करल चाहत बाड़न. एह खातिर उनुका अमनपसन्द काश्मीरियन के सहानुभूतियो मिलल रहे. अब उमर अपना तरफ से बातचीत के दरवाजा बन्द कर दिहले बाड़न. श्रीनगर में बइठल मुख्यमंत्री खाली सुनत ना रह सके बलुक ओकरा एगो सेतुओ के भूमिका निबाहे के पड़ी. अब घाटी में भाजपा के आवे के अनुमति ना दे के उमर अब्दुल्ला फेरु से घाटी केन्द्रि नजरिया थाम लिहले बाड़न. उमर के मालूम होखे के चाहत रहे कि भाजपा के घाटी में कवनो पकड़ नइखे आ एह यात्रा से घाटी में कुछ अशुभ ना होखित. का कारण बा कि ओहिजा एगो सभा ना हो सकत रहे.


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ ई लेख उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखले बानी. अँजोरिया के नीति हमेशा से रहल बा कि दोसरा भाषा में लिखल सामग्री के भोजपुरी अनुवाद समय समय पर पाठकन के परोसल जाव आ ओहि नीति का तहत इहो लेख दिहल जा रहल बा.अनुवाद के अशुद्धि खातिर अँजोरिये जिम्मेवार होखी.