दिल्ली में मनावल गइल भिखारी ठाकुर के पुण्य तिथि

भोजपुरी के शेक्सपीयर के नाम से मशहूर लोक कलाकार भिखारी ठाकुर अपना जमाना में जवना सामाजिक बुराईयन का खिलाफ लड़ाई लड़लन ऊ समस्या आ सामाजिक बुराई कमोवेश आजुओ समाज में मौजूद बा. भिखारी ठाकुर के नाटकन में नशाखोरी, धर्मिक पाखण्ड, संयुक्त परिवार बिखरे के त्रासदी, बेटी बेचे के कुप्रथा, नारी पर अत्याचार वगैरह का खिलाफ आवाज बुलंद कइले रहन. जरूरत बा कि आजुओ भिखारी ठाकुर के विचार अपना के देश आ समाज के सही दिशा दिहल जाव. अइसने राय रखलन आधुनिक साहित्य पत्रिका के संपादक आ विश्व हिंदी साहित्य परिषद् के अध्यक्ष आशीष कंध्वे जे दिल्ली में बिहारी खबर का कार्यालय में आयोजित भिखारी ठाकुर पुण्य स्मृति का कार्यक्रम के अध्यक्षता करत कहलन.

भिखारी ठाकुर मेमोरियल ट्रस्ट, चैतन्य भारत न्यास, अउर बिहारी हेल्प लाइन के मिलल जुलल आयोजन में ‘भिखारी ठाकुर लोक भाषा पुस्तकालय’ के विधिवत शुरूआत कइल गइल. पुस्तक संस्कृति आंदोलन के प्रणेता आ रामधारी सिंह दिनकर न्यास के अध्यक्ष नीरज कुमार पुस्तकालय के उद्घाटन करत कहलन कि देश भर में पुस्तकालय आंदोलन चलावे के मकसद ई बतावल बा कि आदमी के शराब ना किताब चाहीं. नीरज कुमार पुस्तकालय ला हर संभव मदद करे के भरोसा दिहलन.

भोजपुरी जिनगी के संपादक संतोष पटेल अपना कविता के माध्यम से भिखारी ठाकुर के श्रद्धांजलि दिहलन आ पुस्तकालय आंदोलन के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगावे पर जोर दिहलन. आर.टी.आई. कार्यकर्ता सत्येन्द्र उपाध्याय कहलन कि भिखारी ठाकुर के विचार जन-जन तक पहुंचावे के जरूरत बा. ऊ दिल्ली के कवनो सड़क के नाम भिखारी ठाकुर के नाम पर राखे के मांग कइलन.

भिखारी ठाकुर मेमोरियल ट्रस्ट के सचिव लोकगायक गजाधर ठाकुर अगिला छह महीना ले भिखारी ठाकुर लोक उत्सव के आयोजन के जानकारी दिहलन. ज्ञान गंगोत्री संस्था के अध्यक्ष भाई बी.के. सिंह गोहार लगवलन कि भिखारी ठाकुर पुस्तकालय में अधिका से अधिका पुस्तक दान दिहल जाव. बिहारी हेल्प लाईन आ बिहारी खबर के संस्थापक अश्वनी कुमार पुस्तकालय ला 51 सौ रुपये के सहयोग दिहलन आ बिहार के छपरा में भिखारी ठाकुर लोककला संग्रहालय स्थापित करे खातिर फाउंडेशन के जमीन दान देबे के एलान कइलन.

एह कार्यक्रम में बिहारी खबर के संवाददाता संतोष सिंह, नीलांजन बनर्जी, श्रीकृष्णा गिरी, उज्जवल कुमार मंडल आ बब्लु कुमार वगैरह लोग शामिल भइल. कार्यक्रम के संयोजन आ संचालन मुन्ना पाठक कइलन.


(ईमेल से मिलल खबर)

छपरा के लोग भुला दिहल भिखारी ठाकुर के

पिछला मंगल १० जुलाई का दिने जब पटना आ कुतुबपुर में भोजपुरी के शेक्सपियर कहाएवाला भिखारी ठाकुर के पुण्यतिथि मनावल गइल तवना दिने छपरा के भिखारी ठाकुर मोड़ पर मौजूद भिखारी ठाकुर आ उनुका मण्डली के मूर्ति बाट जोहत रह गइल एगो फूल माला के. ई मूर्ति स्थापित कइला का बाद ई पहिला मौका रहल जब एह जगहा पर कवनो कार्यक्रम आयोजित ना भइल. ना त कवनो राजनेता अइलें ना भोजपुरी के नाम पर आपन चेहरा आ धंधा चमकावे वाला लोग, देश विदेश में भोजपुरी के अलख जगावे वाला लोग.

गनीमत अतने रहल कि बिहार भोजपुरी अकादमी आ भिखारी ठाकुर के गाँव के कुछ नवजवान भिखारी ठाकुर के श्रद्धांजलि देबे के औपचारिकता निबाह दिहलें. कुतुबपुर में आयोजित कार्यक्रम में भिखारी ठाकुर के पोता राजेन्द्र ठाकुर, भिखारी ठाकुर के सहकर्मी रहल गोपालजीम विष्णुदेव शर्मा, चरण जी वगैरह का साथ कुछ जनकवि भिखारी ठाकुर लोक साहित्य व संस्कृति मंच के पदाधिकारी ललन राय, चुनमुन गु्पता, रवि कुलभूषण, गोपाल राय, किशुनदेव शर्मा, चंद्रशेखर बैठा, कृष्ण कुमार वैष्णवी आ कुछ स्थानीय लोग भिखारी ठाकुर के मुर्ति पर फूल माला चढ़ावल आ उनुका के श्रद्धांजलि दिहल. भिखारी ठाकुर के नाटक के प्रस्तुति भइल.

दुनिया भर में गूँजी अब भिखारी ठाकुर के वरासत

आ एह वरासत के गूंज सुनल जाई कल्पना पटवारी का आवाज में.

आसाम के लड़की भोजपुरी के लोकप्रिय गायिका कल्पना पटवारी ऊ काम कर देखवली जवना के कोशिश कबो कवनो दोसर गायक ना कइलन. कल्पना पटवारी के गावल गीत भिखारी ठाकुर के मूल गवनई के जस के तस परोसत बाड़ी सँ. जे भिखारीओ ठाकुर के सुनले बा आ कल्पना के एह नयका अलबम “दि लीगेसी आफ भिखारी ठाकुर” के सुनत बा ओकरा ई बात माने में इचिको हिचक नइखे होखत कि कल्पना भिखारी ठाकुर के गवनई से पूरा न्याय कइले बाड़ी. वइसे विशुद्धता वादी कह सकेलें कि एकाध जगहा कल्पना के उच्चारण जरूर गड़बड़ा गइल बा बाकिर एकर दोष हम कल्पना के ना देके ओकरा के देब जे एकर ट्रांसक्रिप्ट लिखले होखी.

भिखारी ठाकुर के जीवन के कहानीओ एह गीतन में मौजूद बा. उनुका जनम के कहानी, उनुका लड़िकाई के दिन, कइसे पाठशाला में मन ना लागल त भाग के बंगाल के मिदनापुर चहुँपले. फेर कइसे ओहिजा पेट पाले खातिर आपन पुश्तैनी धंधा, लोग के हजामत बनावल, शादी बियाह में नाई के जिम्मेदारी उठावल कइलें, आ एही बीच जब रामलीला आ बगाल के लोक नाटक जात्रा देखलें तब उनुका मन में एगो सपना जागल वइसने कुछ कर देखावे के. इहे सपना लिहले गाँवे लवटलें आ अपना दोस्त भगवान दास बनिया से अक्षर ज्ञान सीखलें जेहसे कि गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस पढ़ सकसु. जस जस पढ़त गइले राम में मन लागे लागल आ एक दिन जब अपना संगी साथियन के बिटोर कर के गांव मे पहिला बेर भोजपुरी में रामलीला के मंचन कइले त सगरी गाँव वाह वाह कर उठल. मंडली बनत गइल बाकिर देखते देखत नाच मंडली में बदल गइल. बाप महतारी के वर्जना रोक ना पवलसि भिखारी ठाकुर के आ ऊ चल दिहलें ओह राह पर जवना पर उनुकर सही मूल्याकन उनुका जिनिगी में त ना भइल बाकिर बाद में जरूर उनुका के भोजपुरी के शेक्सपियर के सम्मान दोसर केहू ना खुद दर्जन भर भाषा के ज्ञानी आ महान साहित्यकार पंडित राहुल सांस्कृतयायन दिहलें.

अब ओह महान भोजपुरिया लाल भिखारी ठाकुर के जीवनी आ रचना पेश करे के जीवट देखवले बाड़ी कल्पना पटवारी आ एह अलबम के गीत सुनला क बाद हम त इहे कहब कि कल्पना भिखारी ठाकुर के रचना से, उनका शैली से पूरा न्याय कइले बाड़ी. एह अलबम के संगीत आधुनिक होखला का बावजूद भिखारी ठाकुर के संगीत शैली के दोहरावत लागत बा. अलग बाति बा कि भिखारी ठाकुर के मर्दानी आवाज कल्पना पटवारी के आवाज में खोजल गलत होई. बाकिर हर भोजपुरी प्रेमी का घर मे एह अलबम के एगो कैसेट होखल जरूरी होखे के चाहीं आ ओहू लोग के जे भोजपुरी के बेंवत से सहमत नइखे. उहो लोग सुने कि भोजपुरी के मिठास कइसन होले.

एह अलबम के परिकल्पना खुद कल्पना पटवारी के बा. जे अपना आइकन भूपेन हजारिका के राह चलत भोजपुरी में वइसन आइकन खोजे निकलली त खोज आ के ठहरि गइल भिखारी ठाकुर पर. भोजपुरी में भिखारी ठाकुर ले बढ़ के कवनो लोक गायक नइखे भइल. जनता से जमीनी स्तर पर जुड़ल भिखारी ठाकुर जन भावना के, समाज के समस्या के जतना जियतार तरीका से पेश कइलन वइसन दोसर केहू ना कर पावल. एह जगहा महेन्दर मिसिर के नाम ना लिहल अन्याय हो जाई बाकिर महेन्दर मिसिर के रचना आ भिखारी ठाकुर के रचना अलगा अलगा स्तर पर बा. महेन्दर मिसिर जवन रचले तवन अपना प्रेम में ओकरा विरह में. भिखारी ठाकुर जवन रचलें तवन समाज के पीड़ा देख के, ओह पीड़ा के सहज समाधान खोजे का फेर में. एह मामिला में भिखारी ठाकुर के महत्व अतुलनीय हो जात बा.

कल्पना पटवारी के एह अलबम, “दि लीगेसी आफ भिखारी ठाकुर” के पिछला दिने लंदन में विश्व स्तरीय म्यूजिक कंपनी वर्जिन रिकार्ड्स, ईएमआई म्यूजिक का तरफ से रिलीज कइल गइल. दुनिया भर के म्यूजिक रिटेल आउटलेट, मॉल. आ प्लानेट एम के स्टोरन में बिकात एह अलबम के दाम एकसौ पंचानबे रुपिया राखल गइल बा. भोजपुरी के ई सबले महँग आडियो कैसेट अपना दाम से बेसी के वजन रखले बिया आ पूरा उमेद बा कि एह अलबम से भोजपुरी संगीत भोजपुरी के मौजूदा लोअर क्लास सर्किल से उपर उठि के मिडिल आ अपर क्लास ले आपन पहुँच बना ली.

भिखारी ठाकुर के रचना आ कल्पना पटवारी के आवाज के एह जुगलबंदी के सफलता खातिर अँजोरिया के हार्दिक शुभकामना बा.
– संपादक, अँजोरिया


एह अलबम का बारे में बेसी जानकारी खातिर

भिखारी ठाकुर का गाँव में उनुकर जयन्ती समारोह

गदबेरा का बाद अतवार के रात भिखारी ठाकुर के गांव जगमगा उठल जब उनुका जयंती का मौका पर उनुकर लिखल मशहूर नृत्य नाटिका “बिदेसिया” के मंचन करके उनुका के श्रद्धांजलि दिहल गइल. जनकवि भिखारी ठाकुर लोक साहित्य एवं सांस्कृतिक महोत्सव में भोजपुरी लोक गीत, नाच आ नाटक के सधल कलाकारन के प्रस्तुति का साथे भोजपुरी फिल्म जगत के कलाकारो लोग आपन कार्यक्रम पेश कइल. रात भर प्रोग्राम चलत रहल आ ओह लोग का आगा पूस के हाड़ कंपावे वाला पाला हार गइल. रात भर लोग जमल रहल.

भिखारी ठाकुर के बिदेसिया पेश करत जब उनुकर सहकर्मी रहल 84 साल के कलाकार गोपाल बिदेसिया बनके मंच पर उतरलें त उनुकर कला फेर से जवान हो उठल रहे. साथ दिहलें उनुके हमउमिरिया रामचन्द्र, जे प्यारीसुंदरी बनल रहलें. दुनु के संवाद आ सवाल जबाब के लटका सुनत लोग दंग रहुवे. भोजपुरी फिल्म जगत के कलाकारो देखले कि ओह जमाना के नृत्य नाटिका में कतना खासियत रहत रहल.

धोती पटधरिया पेन्हले, कान्हा पर चदरिया हो बबरिया झार के ना, लगनिया लगनिया लगनिया कहिया लागी सीताराम से लगनिया, इ राम नाम रस घोरी रे मन इहे अरज बा मोर., हमरा रही रही के देहिया में उठताटे देहिया में सुर वगैरह लोकगीतन के माध्यम से भिखारी ठाकुर के गांव के लोग का सोझा मलिकजी फेर जिंदा हो उठलें. एह मौका पर कलाकार वैष्णवी के प्रस्तुतियो शानदार आ सराहे जोग रहल.

समारोह के उद्घाटन विधान पार्षद लालदास राय कइलन. गीतकार आ संगीतकार से विधायक बनल विनय बिहारी खुदे पूरा कार्यक्रम के निर्देशन कइलें. एह मौका पर अनेके कलाकारन, समाजसेवियन आ कुछ पत्रकारन के भिखारी ठाकुर सम्मान से सम्मानितो कइल गइल. एह सम्मानित होखे वालन में विनय बिहारी, दिलीप जायसवाल, प्रदीप कुमार, अवधेश मिश्रा, ठाकुर संग्राम सिंह, श्रीराम तिवारी, राकेश कुमार सिंह, शिशिर कुमार सिन्हा, कवि असलम सागर, कैप्टन शिवजी सिंह, मनोज श्रीवास्तव वगैरह शामिल रहलें. समारोह के संयोजक रहलें ललन राय आ कृष्ण कुमार वैष्णवी.

स्टेशन आ पुल के नाम भिखारी ठाकुर का नाम पर

अतवार का दिने छपरा के विधि मंडल भवन-2 में भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के 124 वीं जयंती धूमधाम से मनावल गइल.एह मौका पर कवि गोष्ठी आयोजित भइल. अध्यक्षता राज किशोर गिरी कइलन. कवि गोष्ठी का बाद भोजपुरी कवि दक्ष निरंजन के शाल भेंट करके सम्मानित कइल गइल.

एह आयोजन में सरकार से माँग कइल गइल कि गोल्डेनगंज स्टेशन आ आरा छपरा पुल के नाम भिखारी ठाकुर के नाम पर राखल जाव.

भिखारी ठाकुर खातिर भारत रत्न के माँग

दिघवारा के रामजंगल सिंह कॉलेज में आयोजित समारोह में केन्द्र सरकार से लोक कवि भिखारी ठाकुर के भारत रत्‍‌न से सम्मानित करे के माँग कइल गइल. माँग कइलन भाजपा नेता अशोक सिंह.

भिखारी ठाकुर जयन्ती समारोह के नेवता

मान्यवर,

बड़ा खुशी के साथे सादर निहोरा करत बानी कि भोजपुरियन के कालजयी लोककवि आ कुशल रंगकर्मी भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर जी के १२४वीं जयन्ती के शुभ अवसर पर गंगा सरयू सोन के धवल धार के संगम तट पर अवस्थित पावन जनम भूमि भिखारी ठाकुर धाम, कुतुबपुर दियारा, छपरा, सारण बिहार में १८ आ १९ दिसम्बर के दू दिन के महोत्सव में रउरा सभे भारी संख्या में आ के कार्यक्रम के सफल बनाईं.

एह महोत्सव में फिल्मी दुनिया के ख्यात अभिनेता अभिनेत्री, गायक गायिका, गीत संगीतकार, रंगकर्मी आ विशिष्ट क्षेत्र के कर्मठ लोग के मेला लागे जा रहल बा. एहमें विधायक गीतकार आ संगीतकार विनय बिहारी, फिल्मकार अभय सिन्हा, दिलीप जायसवाल, प्रदीप कुमार, किरणकान्त वर्मा, सुजीत पुरी, रवि कश्यप, सनोज मिश्रा, दीप श्रेष्ठ, फिल्मी दुनिया के कोहीनूर कुणाल सिंह, अजीत कुमार अकेला, पवन सिंह, पवन सिंह, खेसारी लाल यादव, इन्दु सोनाली, अवधेश मिश्रा, आनन्द मोहन पाण्डेय, सुदीप पान्डेय, रुबी सिंह, छोटू छलिया, मनीष महीवाल, बादल बवाली, कुमार मोहित, डी आनन्द, कुमार उदय, महेश स्वर्णकार, संजय सिंह आ वैष्णवी समेत बहुते कलाकार शामिल होखीहें.

एह समारोह में कुछ चुनल राजनेता, साहित्यकार, पत्रकार, आ कलाकारन के भिखारी ठाकुर सम्मान से सम्मानित कइल जाई.

समारोह स्थल पर चहुँपे खातिर पटना आ आरा से कोइलवर होत बबुरा का रास्ते भिखारी ठाकुर धाम चहुँपल जा सकेला. छपरा से आवे लोग भिखारी मोड़ से गंगा पुल घाट आ के नाव से नदी पार कर के भिखारी ठाकुर धाम चहुँप सकेले.

आशा बा कि एह महोत्सव में रउरा सभे पूरा मनोयोग से शामिल होखब.

रउरा सभे के,

आयोजक मण्डल,
जनकवि भिखारी ठाकुर लोकसाहित्य एवं सांस्कृतिक महोत्सव २०११

भिखारी ठाकुर के जयन्ती

भोजपुरी के शेक्सपीयर कहाये वाला जन कवि भिखारी ठाकुर के १२४वीं जयन्ती एह साल उनुका जन्म भूमि कुतुबपुर दियरा में “जनकवि भिखारी ठाकुर लोक साहित्य एवं संस्कृति महोत्सव २०११” का रूप में मनावल जाई. १८ आ १९ दिसम्बर के आयोजित एह दू दिन के महोत्सव में अलग अलग सत्र में बहुविध कार्यक्रम में रंग बिरंगी विधा दर्शकन का सोझा परोसल जाई.

पिछला दिने आयोजन समिति के बइठक अध्यक्ष ललन राय का देखरेख में भइल. महोत्सव का दौरान एगो आकर्षक स्मारिका विमोचन करे के तय भइल. महोत्सव में भोजपुरी खातिर बढ़िया योगदान करे वाला लोग के भिखारी ठाकुर सम्मान से सम्मानित कइल जाई.

बइठक में सचिव कृष्ण कुमार वैष्णवी आ अनिवाश नागदंश, रजनीश कुमार गौरव, राजेन्द्र प्र॰ ठाकुर, बृजनन्दन सिंह, सत्येन्द्र सिंह, प्रवीण कुमार, हंसराज सिंह, बच्चन सिंह, सुरेन्द्र राय, विनय राय, विजय कुमार ठाकुर, राकेश कुमार ठाकुर, सुशील ठाकुर वगैरह लोग शामिल रहे.


(स्रोत – रजनीश कुमार गौरव, मीडिया मैनेजर)

नाक काँच ह बात साँच ह

– अमितेश कुमार

उमिर का मार से झूराइल ओह देहि में आजुवो उहे लोच बा. आंखि में चमक बढ़ि जाला जसही केहु नाच के नाम ले लेवेला. ऊ शान से रउआ के बतइहें कि मुजफ़्फ़रपुर के बाई जी के कइसे एक बेर ऊ हार मनवा दिहले रहले. लोग बाई जी के रोक के उनुकर नाच के देखे चाहल. आ केतना इनाम मिलल. वगैरह.

नागा के नाम से मशहुर नागेन्द्र हजरा आ अब नागेन्द्र पासवान के एक जमाना में एरिया में तूती बोले. नाच में भीड़ बिटोरे ला उनुकर नामे काफ़ी रहे. कई बेर तो उनका के राखे खातिर नाच पार्टियन में मार हो जाव ! आज नागा केस कटा लिहले बाँड़े. नाती पोता से भरल घर बा. खेती गृहस्थी करेलें. आ साल में बस एक दिन, छठ का दिने कुछ चुनिंदा लोग का घरे जा के कोसी लगे नाचेलें. काहे कि बरख-बरख से ऊ लोग उनका सुख दुख में साझा रहल बा. ‘बाकिर गांव में त बहूत भूप बा लोग’.

नागेन्द्र के जीवन में आज नाच नइखे लेकिन उनकर जीवन नाचे से बनल बा. अलग बाति बा कि उनका जीवन आ उनका जइसन अनेक कलाकारन के जीवन बनावे वाला नाच आजु खुदे मरनासन्न बा. नाच बिहार आ यू.पी. के कुछ इलाका के प्रसिद्ध नाट्य रूपो ह आ एक जमाना में मनोरंजन के बड़का साधन रहल. भोजपुरी के प्रसिद्ध नाटककार भिखारी ठाकुर के आपन “पार्टी” बनवला का पाछा जहाँ लीला नाटक रहे उहें दुसरका ओरि नाच. सही में देखल जाव त ऊ नाच के आपन आकार दिहलें. नाच में जवन पाठ खेलल जाव, ऊ अपना से तइयार करे लगलें आ एकरा मंचो के एगो स्थाई फ़रक दिहलें. लेकिन कइसे ? ई जाने खातिर आईं तनिका नाच के रंग रूप देख लियाव.

नाच माने लौंडा नाच. ई विद्या शुरु कइसे भइल ई ठीक ठीक त पता नइखे लगावल जा सकत बाकिर अनुमान लगावल जा सकऽता. एह विद्या के जन्म ओह सारा लोकनाट्य भा परम्पराशील नाटकन लेखा भइल होई जवन संस्कृत नाट्य परंपरा के बंद भइला का बाद सगरी भारत में पसरल. एह नाट्यरूपन के दु गो रूप बा. एगो ऊ विधा जेहमें धार्मिक आधार रहे, जइसे – रास लीला, राम लीला, यक्षगान, कूडियाट्टम वगैरह. अधिकतर ई रूप मंदिर आ धर्म के सरंक्षण में पलल बढ़ल. लेकिन दोसर रूप ओह नाटकन के बा जेकर धर्म से रिश्ता ओतना ना रहे आ ओकरा के आम जनता अपनवलसि. नौटंकी, तमाशा, नाचा, माचा वगैरह अइसने नाटय रूप बाड़न स. नाचो अइसने नाट्य रूप ह. नाच के उत्पति के कहानी नाचा आ नौटंकी के उत्पति के कहानी से जोड़ल जा सकऽता. नाचा, जवन छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक नाट्य रूप ह, जेकरा के हबीब तनवीर दुनिया में मशहूर करा दिहले, के उद्भव के कहानी लोग बतावेला कि नाचा के शुरुआत शादी विवाह के अवसर पर होखे वाला नाच गाना के कार्यक्रम से भइल. बारात ओरात भा कहीं कवनो समाज के जुटानी पर लोग के मनोरंजन खातिर नाच गाना होखे. जइसे जइसे हारमोनियम , ढोलक आ तबला के आगमन होत गइल, नाचा के रूप बदलत गइल. खड़ा होके बाजा बजावे वाला लोग बईठ के बजावे लागल आ रात बितावेला ई महसुस कइल गइल कि खाली नाच गाना से काम ना चली, कवनो कहानी जोड़ल जाव. एह से ‘पाठ’ खेले के परंपरा के शुरूआत भइल. कलाकार अभिनय क के कवनो कहानी के प्रदर्शन करे लगलें. नौटंकी के जन्म के कहानी राजकुमारी नौटंकी आ फूल सिंह के कथा से जुड़ल बा. एही कथा के सुनावे के परंपरा धीरे धीरे नौटंकी शैली बन गइल आ एहमें दोसरो कथा सब जुड़ल चल गइल .

नाच ओही नाचा आ नौटंकी के मिलल जुलल रूप ह. नाच के कहानी के नाचा के कहानी से जोड़ल जा सकऽता. बिहार आ उत्तर प्रदेश में नाच एगो स्वतंत्र विधा का रूप में विकसित भइल. एकर विकसित होखे के एगो अउरो कारण ई बतावल जाला कि नौटंकी कंपनी सब एह क्षेत्रन में बहुत यात्रा करऽ सँ आ ओकरा आधार पर स्थानीय लोग आपन टीम बनावल लोग. नाचे गावे के परंपरा, लीला नाटक के परंपरा सब मिला जुला के नाच शुरु भइल होखी.

नाच, सब नाट्य रूपन लखा, देव वंदना से शुरू होला. ओकरा बाद महिला बनल पुरूष कलाकार, लौंडा, लोग गीत गावेला आ नाच करेला. ई नाच कुछ देर ले चलेला. पहिले नाच में गज़ल, खेमटा, ठुमरी, चैता, कजरी वगैरह कुल होखे लेकिन धीरे धीरे फ़िलिम के गीत एह गानन के हटावत गइले सँ. बाद में गा के नृत्य करे के परंपरा में रिकार्डिंग डान्स के परंपरो जुट गइल. कुछ देर के बाद जोकर, लबार, आके झलकी देखावला. ऊ अपना हास्य व्यंग्य से दर्शकन के हंसावेला. लबार हँसीए हँसी में गंभीरो बात कहि जाले सँ. बाद में गंभीर हास्य का जगह फूहड़ चुटकुला बाजी लेत गइल. लेकिन नाच में लबार अइसन किरदार होला जेकरा पर नाच के पूरा दारोमदार होला. नाच पार्टी के ऊ सबले महँग कलाकार होला. झांकी का बाद पाठ होला जेहमें कवनो कहानी के नाटकीय प्रदर्शन होखेला.

पाठ के चुनाव देख के लागेला कि नाच नौटंकी से प्रभावित रहे. काहे कि नाचो में सुल्ताना डाकू, लैला मजनु, सत्य हरिश्चन्द्र, अमर सिंह राठौड़ वगैरह के पाठ होखे. ई सब नौटंकी के प्रसिद्ध नाटक हऊअ सँ. नाच में रहे वाला लोगो बतावेला कि किताब कानपुर से आवे. लेकिन खाली नौटंकी तक ना रह के कुछ आउरियो नाटक होखे. जेकरा के कभी खुदहु गढ़े लागल लोग. जेहमें भिखारी आपन नाटक अपने लिखलें. कबो कबो कुछ फ़िलिमो के नाटकीय पाठ होखे.

नाच के मंच बहुत खुला स्वरूप वाला होला. अधिकतर एगो शामियाना का नीचे ई होला. शामियाना के बनावट अइसन होला कि ओकरा भीतरी घेरा में अंदर चार गो बांस एह तरे लागल रहेला कि एगो वर्ग बने. इहे वर्ग नाच के मंच ह. लगभग चारु ओर से दर्शक बइठेला. एक ओरी कलाकार लोग के आवे जाए के जगहा छोड़ल रहेला. नाच के बाजा सब उहे बा जे भारत के दोसरा लोकनाटकन के. जइसे कि हरमुनिया, नाल, नगाड़ा, क्ल्येरनाट, बैंजो. बाद में ड्रम सेटो एह बाजा में जोड़ा गइल. नगाड़ा नक्कारा के कहल जाला जेकर आवाज से नाच के शुरूआत होखे के पता चल जाला.

नाच में तीन तरह के लोग होले. एगो नचनिया होला. नचनिया मरदे बनेला. आजुओ नाच में मेहरारूवन के प्रवेश नइखे भइल. नचनिया बनावे खातिर पहिले नाच के मुंशी आ मालिक लोग गांवे-गांव घुम के लईका चुने लोग. किशोर लईका. फ़ेर ओकरा के ट्रेनिंग देवे लोग. एगो दोसरा यौनिकता के धारण कइला का बादो ई लोग सामान्य पुरुष जीवन जियेला लोग. नचनिया, जवना के लौंडो कहल जाला, नाच के प्रमुख अंग होला. नचनिया लोग के नाचे आ गावे दुनु कला में माहिर होखे के पड़ेला. दोसरा तरह के कलाकार होला जेकरा के एक्टर कहल जाला. नाच में अक्सर उमिरदराज नचनिया लोग एक्टर बन जाला. कुछ लोग शुरुवे से एक्टर बनेला. एक्टरो लोग के गाए, नाचे का साथे अभिनयो के प्रशिक्षण दिहल जाला. तेसर होला ऊ लोग जिनका के समाजी कहल जाला. समाजी लोग साज बजावेला, नाच पार्टी के सामान ढोएला. एह पुरा टीम, भा पार्टी, के जिम्मा मालिक आ मुंशी के होला. मालिक लोग सालाना का अनुबंध पर समाजी, नर्तकी आ एक्टर के राखेला. टीम के कमाई के मुख्य स्रोत होला लगन आ पर्व त्योहार के महीना. बाकिर समारोह आ पारिवारिक उत्सवो का मौका पर नाच पार्टी बोलावल करेला लोग. एह मौका पर नाच पार्टी साटा बान्हेला आ तय पइसा पर आयोजक किहां जाला. एह तरह से ई पूरा व्यावसायिक रंगमंच बा काहे कि एह कलाकारन के कमाई नाच से होला. साल के कुछ महीना खासकर के बरसात के महिना अभ्यास के महीना होला. एह घरी नाच दल मिलके अभ्यास, भा रिहर्सल, करेला. एही अभ्यास का बाद साल भर प्रदर्शन होला. पहिले मुंशी लोग के काम अभ्यास करावलो रहल.

समय का साथ एह लोक रंगमंच पर बहुत बदलाव आइल बा. टेक्नोलॉजी, आर्केस्ट्रा, मनोरंजन के बदलत परिभाषा, वैश्वीकरण इत्यादि के एक साथ प्रहार से एह मंच के शामियाना उखड़े लागल बा. अपना के बचावे लेल ई नाच रूप हर तरह के समझौता कइलसि. फूहड़पन त एहमें एतना आइल बा कि आम दर्शको धीरे धीरे एकरा से दूर हो गइल बाड़न. आर्केस्ट्रा एह मंच के बहुत नुकसान चहुँपवले बा. आर्केस्ट्रा अइला का बाद पुरुष नर्तकी, लौंडा, के मुकाबला महिला नर्तकी से हो गइल आ नारी देह के तुलना में पुरूष देह के भाव कम होत गइल. नचनिया से बढ़त छेड़-छाड़, सामाजिक अस्वीकृति से एह पेशा के केहू नइखे अपनावे चाहत. मंहगाई के एह दौर में आर्थिक सुरक्षा के अभावो कलाकारन के हड़कवले ना. नाच पार्टी धीरे धीरे बंद होखल जात बाड़ी सँ. जवन चलऽता उहो जइसे तइसे. पहिले के सामंती मानसिकता के लोग आ कम आय वाला लोगो नाच पार्टी बोलावल करत रहे लेकिन अब इहो लोग नाच के नइखे बोलावत.

सरकारो के एह नाट्य रूप पर कवनो ध्यान नइखे. ओकर कारण बा समाज में एकरा प्रति लोग के भाव. एक जमाना में मनोरंजन के मुख्य स्रोत रहल नाच से आज लोग अपना के जोड़े में आपन तौहीन बुझऽता. आर्केस्ट्रा आ डीजे का जमाना में नाच के के पूछऽता ? आ जवन समाज में ई पनपल ओही समाज के लोग जब एकरा से पीछा छोड़ावऽता, त अउर केहु का करी ? एकरा के बचावे ला केहु के ध्यान नइखे. आजकल के जमाना में परंपरा के बचावल के चाहऽता?

आखिर में फ़ेर एक बेर नागा के बाति. जीवन भर नाच से नाम आ धन कमाये वाला नागा के ओकरा घरे के लोग जीवन के उत्तरार्ध में उपेक्षित कर दिहल आ ताना मारल. ई जनला का बाद कि उनकर आधार नाच बा. आज ओह लोग के लाज लागऽता इ कहाए में कि उनुकर बाबुजी नचनिया हऊवें. लईका लोग के एह भावना ला समाजे जिम्मेदार बा. जे एगो कलाकार के कलाकार के इज्जत नइखे देत. ओकर नचनियापन आ जाति ओकर पहचान बन गइल बा. ओकरा कला के कवनो मोल नइखे. भोजपुरिया समाज के जवन क्षरन भइल बा ओहमे का ई मानसिकता जिम्मेवार नइखे ?

का बात बा कि एही विधा से भोजपुरी में भिखारी ठाकुर के महान कह के गुणगान कइल जात बा लेकिन उनुका समाज के अधिकांश लोग के हंसी के पात्र मान के तिरस्कृत कइल जात बा. वइसे भिखारीओ के कम तिरस्कार ना भइल रहे. बाद में लोग उनकर मूल्य बूझल. एह कलाकारन के का होई ? नागा हमरा से पुछलें कि नाच के का होई ? हमनी के सीखल बुद्धि के का होई? हम एह सवाल पर उनका के भूलिया दिहनी काहे कि हमरा लगे जवाब नइखे..खोजे के बा !

नाच पर खोजलो से कवनो किताब ना मिली. कुछ अनुभव, कुछ देखल नाच, कलाकारन से बातचीत पर ई लेख आधारित बा. एह लेख के परिष्कार ला सुझाव जरूरी बा. नाचा के विकास जाने में अनूप रंजन पांडेय जी से बातचीत सहायक भइल. जिनकर नाचा पर शोध बा. नौटंकी ला कैथरीन हेन्सन एगो किताब लिखले बाड़ी. चौमासा पत्रिको से एक आध लेख से सहयोग मिलल. कोशीश रही कि ई लेखन शृखंला में होखे. रउरा प्रतिक्रिया के इंतज़ार बा.


अमितेश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में पी॰एचडी॰ कर रहल बाड़े.

भिखारी ठाकुर राष्ट्रीय प्रतिष्ठान के आयोजित संगोष्ठी पर एगो रिपोर्ट

– अमितेश कुमार

दुपहरिया में अचानके एगो कार्यक्रम में पहुँच गइनी. वइसे कार्यक्रम के सूचना रहे लेकिन जाये के इरादा ना रहे. बाकिर पहुँचनी. मौका रहे भिखारी ठाकुर राष्ट्रीय प्रतिष्ठान के तत्वाधान में आयोजित ‘भिखारी ठाकुर के सामाजिक चेतना’ विषय पर संगोष्ठी के. संगोष्ठी में बोले वाला महत्त्वपूर्ण वक्ता रहलें, संजीव (भिखारी ठाकुर के जीवनी “सूत्रधार” के लेखक), मैनेजर पांडे (हिन्दी आ भोजपुरी के प्रसिद्ध विद्वान), नित्यानंद तिवारी (हिन्दी आलोचक), महेन्द्र प्रताप सिंह (भोजपुरी रंगकर्मी), आ मनोज भावुक(कवि). एह वक्ता लोगन के हम जानत रहनी आ ई लोग पहिले से भोजपुरी ला कार करता लोग. बाकिर जवन वक्ता के हम पहिले से ना जानत रहनी ओमे रहलें रविकांत दुबे (बिहार भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष) अउर अजीत दुबे (दिल्ली में भोजपुरी के सक्रिय कार्यकर्ता). श्रद्धा कुमारी आ संतोष पटेल अपन पर्चा पढलक लोग. कार्यक्रम में लोग के उपस्थितिओ संतोषजनक रहल.

बीज वक्त्व्य संजीव देहलें जेमें ऊ विस्तार से भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व आ कृतित्व के चर्चा कइले. महेन्द्र मिसिर के आगे भिखारी के कमतर समझे वाला संजीव अंततः भिखारी नाम के पसरत बाढ के पानी में समा गइले. कहलें कि हमनी अइसन लेखक पोथी के पोथी रंग डालऽता लोग लेकिन समाज जहां बा उहें बा. आ भिखारी अनपढ़ो होके समाज के झकझोर देहलन. रंगश्री संस्था के संचालक महेन्द्र प्रताप सिंह कहलें कि कलाकार समाज के अभिभावक होला. भिखारी पर लागल आरोप के जवाब में ऊ कहलें कि भिखारी सीधा सीदा आजादी के लड़ाई पर ना लिखलें काहे कि उनका अंग्रेज के गुलामी से बड़हन उ गुलामी लागल जवन समाज के जकड़ले रहे. भिखारी ओही समाज के अंग रहले एसे ऊ बड़हन समाज के मुक्ति के बात कइले. जेमें दलित आउर स्त्री शामिल रहे.

भिखारी ठाकुर आ भोजपुरी समाज के लेके सबसे मारक बात मैनेजर पाडे जी कहनी. एगो खिस्सा सुना के बतवनी कि हमनी के भोजपुरी के ले के सारा प्रण खाली संगोष्ठी तक ना रख के घरहू ले जाये के पड़ी. ऊ कहले कि भोजपुरी समाज के नौटंकी से बाहर आके समाज के शक्तिशाली बनावे के होई. काहे कि समाज ओकरे बात सुनेला जे शक्तिशाली होला. भोजपुरी के ले के उनकर महत्त्वपूर्ण सुझाव रहे कि भोजपुरी में साप्ताहिक, मासिक पत्र-पत्रिका के साथ साथ अखबारो निकाले के चाहीं. ऊ बतवले कि भिखारी ठाकुर के मंडली में सवर्ण तबका के लोग ना रहे. ऊ प्रयत्नपूर्वक बहुजन समाज के जागरूकता लेल काम करत रहले. पांडे जी कहलन कि हमनी के भिखारी के सबसे बड़हन सम्मान तब दिहल जाई जब उनका संदेश के जीवन में उतारल जाई. आजुओ भोजपुरी समाजे में बहुजन समाज पिछड़ल बा, मेहरारू सब के दुर्दशा होता, लोग आपन देस छोड़े ला बेबस बा.

रविकांत दुबे जी अपना वक्त्व्य में भोजपुरी के ले के इंटरनेट पर सक्रिय लोग के उपदेश देहलन कि एह लोग के समझे के चाही के भोजपुरी के दुनिया खाली इंटरनेट के नइखे. बहुत लोग कम्प्युटर नइखे जानत लेकिन भोजपुरी ला आपन जीवन होम क देलक. भोजपुरी में गाना बजाना खुब हो गइल अब एहमें बौद्धिक कार्यक्रम होखे के चाहीं.

(संगोष्ठी के उद्घाटन)


अजीत दुबे भोजपुरी के आठवीं अनुसूची आउर प्रतियोगिता परिक्षा में शामिल करावे ला आंदोलन के बात कइले. भोजपुरी के तिरस्कार पर ध्यान खींचत कहले कि एह भाषा के सम्मान दिलावे खातिर मेहनत करे के होई. कवि मनोज भावुक भिखारी ठाकुर के आजु का समय में का प्रासंगिकता बा एह पर बात कइलन आ वक्ता लोग के सामने कुछ प्रश्न रखले.

आपन अध्यक्षीय भाषण में नित्यानंद तिवारी जी कहलन कि भिखारी ठाकुर के मतलब एगो विकल्पात्मक समाज के संभावना बा. स्थानीय विविधता के रक्षा पर ऊ जोर देहलन काहे कि विविधता में रचे के क्षमता होला एकरूपता मशीनी होला. संजीव के उपन्यास “सूत्रधार” के अंश पढ के सुनावत उनकर नाटक के ताकत के बारे में बतवले.

सम्मेलन में लोग निकहा संख्या में जुटल रहल. जरूरत बा सम्मेलन के आगे बढा के बौद्धिक अभ्यास के प्रोत्साहन देवे के. साथ में ओह सगरी औपचारिकतो के छोड़ला के जरुरत बा जे पुरान हो गइल बा. कार्यक्रम में बहुत समय पुष्प गुच्छ से सम्मानित करे में गंवावल गइल. ई सब कर्मकांड एगो बिमारी का रूप में बौद्धिक समाज में देखल जाला. खाली नाम लेइयो के सम्मान देखावल जा सकऽता. आ जरुरी इहो बा कि सामाजिक चेतना टाइप घिसल पिटल विषय से ऊपर उठल जाव. भिखारी ठाकुर के साथ साथ भोजपुरी जगत के दोसर कला विधा, हस्तीओ पर गंभीर विमर्श कइल जाव.

मिलाजुला के कार्यक्रम सफ़ल रहल. बौद्धिक सत्र के समाप्ति बाद गजाधर ठाकुर के गवनई भइल. कार्यक्रम राजेंद्र भवन दिल्ली में आयोजित रहल.


अमितेश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में पी॰एचडी॰ कर रहल बाड़े.
अमितेश के पुरनका लेख

भिखारी ठाकुर के सामाजिक चेतना


भिखारी ठाकुर राष्ट्रीय प्रतिष्ठान आ राजेंद्र भवन के तत्वावधान में “भोजपुरी के शेक्सपीयर”, लोक कलाकार आ रंगकर्मी पद्मश्री “भिखारी ठाकुर के सामाजिक चेतना” विषय पर एगो राष्ट्रीय सेमिनार के आयोजन अतवार २४ जुलाई का दिन उपरी बेरा तीन बजे से दिल्ली के राजेंद्र भवन (आइटीओ के पास )में होखे जा रहल बा.

कार्यक्रम के संयोजक राजीव रंजन राय बतावत बाड़े कि, ‘भिखारी ठाकुर’ भोजपुरी जनजीवन के गहिरे ले प्रभावित कइले बाड़ब. उनकर रचित “बिदेसिया” आ “बेटीबेचवा” नृत्य नाटिका एक जमाना में एगो सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन जइसन खड़ा कर दिहले रहे. पद्मश्री भिखारी ठाकुर भोजपुरिया समाज में लोक कलाकार का साथही साथ एगो सामाजिक क्रांति के अगुओ मानल जाले. ऊ अपना नाटकन का माध्यम से सामाजिक कुरीतियन पर समहर चोट कइले बाड़े. ओही पद्मश्री भिखारी ठाकुर के सामाजिक चेतना पर ई सेमिनार बोलावल गइल बा.”

कार्यक्रम के अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार आ केदारनाथ सिंह जी करीहे आ साहित्यकार नित्यानंद तिवारीजी, मैनेजर पाण्डेयजी, संजीव जी, शत्रुघ्न कुमारजी, महेन्द्र सिंहजी, भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबेजी, आ भोजपुरी कवि मनोज भावुक समेते बहुते लेखक आ विचारक आपन राय रखीहे.

एह मौका पर सांस्कृतिक मंडली भिखारी संगीत के प्रस्तुतिओ करी.

ज्यादा जानकारी खातिर राजीव रंजन राय से 09312240631 पर, गजाधर ठाकुर से 09350228676 पर, भा मुन्ना पाठक से 09891404761 पर संपर्क कइल जा सकेला.

एह नयका सदी में भोजपुरी गीत गवनई

जे केहू से नाईं हारल ते हारि गइल अपने से
अपने से केहू आपन खुद नाश कै रहल बा.

– दयानंद पांडेय


‘तोहरे बर्फी ले मीठ मोर लबाही मितवा’ जयश्री यादव के एह गीत का तरहे कहीं त भोजपुरी गीतन में मिठास के इहे परंपरा ओकरा के बाकी लोकगीतन से ना सिर्फ़ अलग करेले बलुक इहे मिठास ओकरा के अनूठो बना देले. लेकिन आजु का तारीख में भोजपुरी के मसीहा बन के बइठल गायकी के ठेकेदार एकरा के बाजारि में बेच के भोजपुरी गायकी के बदनाम आ बरबाद कर दिहले बाड़े. भोजपुरी के लोकगीत अब बाज़ार के हवाले होके अश्लीलता, फूहड़पन अउर अभद्रता के छौंक में शेखी बघार रहल बा आ बाज़ार का रथ पर सवार एह व्यभिचार में कवनो एक दू जने ना बलुक समूचा गायक-गायिकायन के संसार जुटल पड़ल बा. इक्का-दुक्का अपवाद छोड़ के.

भोजपुरी गवनई के चलन वइसे त बहुते पहिले से बा तबहियो आधारबिंदु घूम फिर के भिखारीए ठाकुर बनेले. भिखारी ठाकुर आ उनुकर बिदेसिया शैली के गूंज अब एह सदी में मद्धिमे ना विलुप्त होखे का कगार पर खड़ा बिया. भोजपुरी गाना के बात बिना भिखारी ठाकुर के नाम लिहले आजुवो ना हो पावे. ‘एगो चुम्मा दिहले जइहऽ हो करेजऊ’, भा ‘अब त चली गडासा भाला, लोगवा नज़र लडावेला’, भा फेर ‘आरा हिले, बलिया हिले छपरा हिलेला, हमरी लचके जब कमरिया सारा ज़िला हिलेला’ जइसन भोजपुरी गाना खातिर लोग आजुवो भिखारी ठाकुर के दम भरेला लेकिन भिखारी ठाकुर ‘अपने लइकवा के भेजें स्कूलवा/हमरे लइकवा से भंइसिया चरवावें’ जइसनो गाना लिखले आ गवले से कमे लोग जानेला. ठीक वइसहीं जइसे “आरा हिले, बलिया हिले” गीत के मर्म बहुते कम लोग जानेला. अधिकतर लोग एह गीत के भोजपुरी गवनई में अश्लीलता के पहिलका सीढी मान बइठेला आ मन ही मन मज़ा लेला. अइसन लोग के अपना आँखि के मोतियाबिंद उतार के आ बुद्धि के पखार के जान लेबे के चाहीं कि भिखारी ठाकुर के ई गीत “आरा हिले, बलिया हिले” कवनो मामूली गीत ना होके व्यवस्था के चुनौती देबे वाला गीत ह जहवाँ मुंशी, दारोगा, कोतवाले ना सगरी जिले हिल जाला एगो कमर भर का हिलला से. सोचीं कि एगो कमर हिलला भर से जब सगरी व्यवस्था हिल जाव त आगा का होई ? अउर अब त हमनी का सोझा घोटालन के अंबार लाग गइल बा आ लोग खामोश पड़ल बा. अन्ना हज़ारे का हिलोर का बावजूद !

पता ना काहे लोग कुछ गाना के तासीर आ ओकर अर्थ विन्यास लोप कर कर के दोसर अर्थ पकड़ लेले. अइसने एगो गाना “पाकीज़ा” फ़िल्म के बा, ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा.’ एह में का सिपहिया, का रंगरेजवा, सबे दुपट्टा ले लेता. दरअसल ई दुपट्टा ओकर इज़्ज़त ह जवमा ले सभे बारी-बारी तार-तार करेले. एब एहू गाना के मर्म अधिकतर लोग भुला बईठेले आ एह गाना के असल तासीर डूब जाले. अइसनका कई गो गाना बाड़ी सँ. एगो अउरी गाना सुनीं आ याद करीं. अबही हालही में मशहूर भइल रहे ‘जब से सिपाही से भइलैं हवलदार हो, नथुनिए पे गोली मारें’. इहो पद का मद के ब्यौरा बाचे वाला गाना बाकिर अश्लीलता के इनार में उतर के अजबे सनसनी फइला गइल. ई असल गाना बालेश्वर के रहल बाद में मुन्ना सिंह एकरा के थाम लिहलें आ बाजार पर सवार करा दिहले, फ़ास्ट म्यूज़िक में गूंथ के. फेर रहल सहल कसर उतार दिहल गइल एगो हिन्दी फिल्म में गोविंदा रवीना पर फ़िल्मावल गाना ‘अंखियों से गोली मारे.’ में.

भोजपुरी के कई गो निर्गुनो गाना का साथे इहे बा. लोग औकर तासीर त समुझे ना, मर्म समुझे ना आ कौव्वा कान ले गइल का तर्ज पर गाना ले उड़ेले, भोजपुरी के बदनाम, बरबाद जवम कहीं कर बइठेले. त का करब ? ‘सुधि बिसरवले बा हमार पिया निर्मोहिया बनि के’ जइसन मादक आ मीठ गीत गावे वाला मुहम्मद खलीलो जइसन गायक भइले जिनका के आजु का दौर में कमे लोग जानेला काहे कि बाजार में ओह लोग के गाना के कैसेट कतही नइखे. बा त सिर्फ आकाशवाणी का कुछ केंद्रन का आर्काइब्स में. लेकिन जवन टिंच आ मिठास अपना भोजपुरी गीतन में मुहम्मद खलील परोस गइल बाड़न, जवन रस घोर गइल बाड़न ऊ मुश्किले ना दुर्लभो बा. ‘अंगुरी में डसले बिया नगिनिया हो, हे ननदो दियना जरा द. दियना जरा द, अपना भइया के जगा द. रसे-रसे चढतिया लहरिया हो, हे ननदो भइया के जगा द’. एह गीत में जवन मादकता, जवन मनुहार, जवन प्यार ऊ अपना गायकी के रस में डुबो के छलकावेले कि मन मुदित हो जाला, लहक जाला मन जब ऊ एह गीत में एगो कंट्रास्ट बोवत गावेले, ‘ एक त मरत बानी नागिन के डसला से, दूसरे सतावतिआ सेजरिया हे, हे ननदो भइया के जगा द’. भोजपुरी गीत के ई अदभुत संरचना बा.. ‘छलकल गगरिया मोर निर्मोहिया’ मुहम्मद खलील के गावल मशहूर गीतन में से एगो ह आ साँच इहे बा कि भोजपुरी के मिसरी जइसन मिठास मुहम्मद खलील का आवाज़ में घोरात उनुका गवनई में गूंजेले. भोलानाथ गहमरी के लिखल गीत, ‘कवने खोंतवा में लुकइलू आहि हो बालम चिरई’ में खलील ‘टीन-एज़’ के विरह को जवना ललक, सुरूर अउर सुकुमारता से बोवत लउकेले, जवन औचक सौंदर्य ऊ बना डारेले, ऊ एगो नया किसिम के नशा घोर देला. ‘मन में ढूंढलीं, तन में ढूंढलीं, ढूंढलीं बीच बज़ारे/हिया-हिया में पइठ के ढूंढलीं, ढूंढली विरह के मारे/ कवने सुगना पर लोभइलू, आहिहो बालम चिरई.’ गा के ऊ गहमरी जी के गीत के बहाने आकुलता का एगो नये रस परोस देले. एह रस के उनुका गावल, ‘खेतवा में नाचे अरहरिया संवरिया मोरे हो गइलैं गूलरी के फूल’ एगो दोसर गीतो में हेरल जा सकेला. ‘बलमा बहुते गवईया मैं का करूं/ झिर-झिर बहै पुरवइया मैं का करूं’ भा फेरु, ‘गंवई में लागल बा अगहन क मेला, खेतियै भइल भगवान, हो गोरी झुकि-झुकि काटेलीं धान’ जइसन दादरो में ऊ अलगे ध्वनि बो देले. पर लय उनुकर उहे मिठास वाली बा. मुहम्मद खलील के खूबी कहल जाव कि खामी, गायकी के त ऊ खूब सधले लेकिन बाज़ार साधल त दूर ओने झँकबो ना कइले आ दुनिया से कूच कर गइले. नतीजा सामने बा. मुहम्मद खलील के गावल गीत सुने खातिर तरसे के पड़ेला. भूले भटके, कबो-कभार कवनो आकाशवाणी केंद्र उनुका के बजा देला. पर अब आकाशवाणीओ भला के सुनत बा ?

सुनीले कि बहुत पहिले नौशाद मुहम्मद खलील के मुंबई ले गइल रहले, फ़िल्मन मे गवावे खातिर. लेकिन जल्दीये ऊ लवटि गइले काहे कि ऊ फिलिमन खातिर अपना गायकी में बदलाव खातिर तइयार ना भइले. कहले कि अइसे त भोजपुरी बरबाद हो जाई आ हमार गायकीओ. हम अपने बिला जायब बाकिर भोजपुरी के बरबाद ना करब. ठीक अपना गायकी का तरह, ‘प्रीत में न धोखा धडी, प्यार में न झांसा, प्रीत करीं अइसे जइसे कटहर क लासा !’ सचमुच अब ई कटहर क लासा जइसन प्रीत करे वाला गायक भोजपुरी का लगे नइखन रहि गइल. जइसे कुछ लोग अपना महतारिओ बहिन का कीमत पर तरक्की कबूल कर लेले, ठीक वइसही हमनी के भोजपुरी गायकों लोग अपना मातृभाषा के दाँव पर लगा दिहले बा बाजार का रथ पर सवार होखे खातिर. केहु कुछुवो कहो उनुका एह सब से कवनो सरोकार नइखे. उनकर सरोकार बस आ बस पइसा से बा. आपन महतारिओ बेच के उनुका सिर्फ पइसा आ शोहरत चाहीं. एकरा खातिर जवनो कुछ करे के पड़े ऊ त तइयार बाड़े. बाकिर मुहम्मद खलील अइसन ना कइले. हँ, अपवाद का तौर पर अबही एगो अउर गायक बाड़न – भरत शर्मा. एक से एक नायाब गीत उनुकरो खाता में दर्ज बा हालांकि मुहम्मद खलील वाला तासीर उनुका गायकी में नइखे बाकिर एगो चीज जे ऊ मुहम्मद खलील से सिखले बाड़न कि बाज़ार का रथ पर चढ़े खातिर अपना गायकी में समझौता करत अबहीं ले त नाहिए लउकत बाड़न. तारकेश्वर मिश्र के लिखल गीत,’हम के साडी चाही में” उनका गायकी के गमक में डूबल बहुते आसान बा, ‘चोरी करीहऽ, पपियो चाहे/ खींचऽ ठेला गाडी/ हम के साडी चाही’ भा फेर ‘गोरिया चांद के अंजोरिया नियर गोर बाडू हो/ तोहार जोर कौनो नइखै बेजोड बाडू हो’ मे उनका गायकी के अंजोर साफ पढल जा सकेला, निहारल जा सकेला आ अगर अबहियो कवनो सन्देह होखो त सुनीं, ‘धन गइल धनबाद कमाए/ कटलीं बडा कलेश/ अंगनवा लागेला परदेस.’ बाज़ार का घटाटोप धुंधो में भरत शर्मा अपना गायकी के बाज़ारूपन से बचवले बइठल बाड़न, एकरा ला उनुका के जतना सलाम कइल जाव, कम रही.

लेकिन बालेश्वर का साथे अइसन ना रहे. ऊ जब जियत रहले तबो आ अबहियो उनुका कैसेट आ सीडी से बाजार पटल पड़ल बा. बालेश्वर गायकीओ सधले आ बाज़ारो. आर्केस्ट्रा के बाज़ारो. नाहियो त डेढ सौ कैसेट बावे उनकर. ऊ हमेशा बुको रहत रहले. भोजपुरी के सरहद लाँघ के गावे वाला ऊ पहिलका भोजपुरी गायक रहले. भोजपुरी गायकी के अंतर्राष्ट्रीय पहिचान आ मंच बालेश्वरे दिअवले पहिले-पहिल. भोजपुरी में गावे वाला स्टारो हो सकेला ईहो बालेश्वरे बतवले. भोजपुरी गायकी के ऊ पहिला स्टार हउवन. गानो उनुका खाता में एक से एक नायाब बा. मुहम्मद खलील दोसरा के लिखल गावत रहले बाकिर बालेश्वर अपने लिखल गावसु जबकि ऊ कुछ खास पढल-लिखल ना रहले. बालेश्वर किहाँ प्रेमो बा, समाज आ राजनीतिओ. मतलब बाज़ार में रहे के सगरी टोटका. अउर हँ, ढेरहन समझौतो. नतीज़तन बालेश्वर त बहुते लोग के पाछा छोड़ट आपन सफलता के गाड़ी दउडा ले गइले पर भोजपुरी गायकी के समझौता एक्सप्रेस में बईठाइयो गइलन. अब ओकर जवन फसल सामने आ रहल बा ऊ भोजपुरी गायकी को लजवावत बा. बहरहाल एऋ बिना पर बालेश्वर को खारिज त नाहिये कइल जा सके. बालेश्वर के गायकी आ उनुकर आवाज के जादू आजुवो माथा चढ़ि के बोलेला. बालेश्वर असल में पहिले भिखारी ठाकुर आ कबीर के राह चलले. “बिकाई ए बाबू बी. ए. पास घोडा” जइसन गीत एकरे बुनियाद में बा. “दुशमन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार ना मिले/ मूरख मिले बलेस्सर पर पढा-लिखा गद्दार ना मिले” भा फेर “नाचे न नचावे केहू पैसा नचावेला” जइसन गीत उनका एही राह के आगे बढावत रहे. हँ, बालेश्वर किहाँ जवन प्रेम बा ओहमें मुहम्मद खलील वाला गहराई भा ‘ टिंच’ नदारद बा. ऊ ‘पन’ गायब बा. बल्कि कई बेर त ऊ प्रेम ‘शृंगार’ का आड में डबल मीनिगे डगर थाम लेत बा. जइसे उनुकर एगो गाना बा,’लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला/ आलू केला खइलीं त एतना मोटइलीं/ दिनवा में खा लेहलीं दू-दू रसगुल्ला!’ भा फेर ‘ खिलल कली से तू खेललऽ त लटकल अनरवा का होई/ कटहर क कोवा तू खइलू त हई मोटका मुअड़वा का होई.’ मुहम्मद खलील का गीतन में विरह वियोगो एगो सुख के अनुभूति देला लेकिन बालेश्वर किहाँ ऊ नइखे. उनुका लगे प्रेम में अनुभूति का जगह तंज आ तकरार बेसी बा. जइसे उनुकर कुछ युगल गीत बा, ‘हम कोइलरी चलि जाइब ए ललमुनिया क माई’ भा ‘अंखिया बता रही है लूटी कहीं गई है’ भा ‘ अपने त भइल पुजारी ए राजा, हमार कजरा के निहारी ए राजा’ भा फेर “आव चलीं ए धनिया ददरी क मेला.’ एक समय ददरी के मेला ले के ‘हमार बलिया बीचे बलमा हेराइल सजनी” गा के बालेश्वर ओह औरत के व्यथा बचले रहले जवन मेला में पति से बिछड जात बा. आ ओहू में जब ऊ टेक ले-ले के गावसु, ‘धई-धई रोईं चरनियां” त गाना के भाव दुगुना हो जात रहे. आ जब जोडसु, ‘लिख के कहें बलेस्सर देख नयन भरि आइल सजनी !’ त सचमुच सभकर नयन भर जात रहे. एगो गाना ऊ अउरी गावत रहले शादी में जयमाल का मौका पर, ‘केकरे गले में डारूं हार सिया बऊरहिया बनि के.’ कई बेर त हम देखनी कि कनिया सचमुच भरम में पड़ जा सँ, असमंजस में आ जा सँ. त ई बालेश्वर के गायकी के प्रताप रहल. लेकिन ऊ जल्दीये ‘नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर क’ पर आ गइलन. आ फेर “जब से लइकी लोग साइकिल चलावे लगलीं तब से लइकन क रफ़्तार कम हो गइल’ भा ‘चुनरी में लागऽताटे हवा, बलम बेलबाटम सिया द’ जइसन गीतो उनुका खाता में दर्ज बा. ‘फगुनवा में रंग रसे-रसे बरसे’ ‘ सेज लगौला, सेजिया बिछौला हम के तकिया बिना तरसवला, बलमुआ तोंहरा से राजी ना/ बाग लगौला, बगैचा लगौला, हम के नेबुआ बिना तरसवला, बलमुआ तोंहरा से राजी ना !’ जइसन कोमल गीतो बालेश्वर गवले. लेकिन बाद में उनसे अइसन गीत बिसरे लागल आ कहरवा जइसन धुन के ऊ पंजाबी गानन का तर्ज़ पर फास्ट म्यूजिक में रंग दिहले. बाज़ार उनका पर हावी हो गइल. ‘बाबू क मुंह जैसे फ़ैज़ाबादी बंडा, दहेज में मा
गेलें हीरो होंडा’ जइसन गीत गावे वाला बालेश्वर मंडल-कमंडल के राजनीतिओ गावे लगले. ‘मोर पिया एम. पी. , एम.एल. ए. से बडका/ दिल्ली लखनऊआ में वोही क डंका/ अरे वोट में बदलि देला वोटर क बक्सा !’ जइसन गानो ऊ ललकार के गावसु. बात एहिजे ले ना रुकल, ऊ त गावे लगले, ‘ बिगडल काम बनि जाई, जोगाड चाही.’ बालेश्वर कई बेर समस्यन के उठा के ओह पर भिखारी ठाकुर का तर्ज़ पर प्रहारो कइले.

लेकिन मनोज तिवारी समस्यावन के जवन मार्मिक व्यौरा अपना गवनई में बुनेले ऊ कई बेर दिल दहलावे वाला होला. अकादमिक पढाई-लिखाई अउर शास्त्रीय रियाज़ आ मीठ आवाज़ से लैस मनोज तिवारी भोजपुरी गायकी में दरअसल खुशबू भरल झोंका ले के अइले. भोजपुरी माटी के सोन्ह महक वाला झोंका. जवन भोजपुरी समाज का बहाने पूरा का पूरा चित्रण करत आवेला. कहीं कि मनोज तिवारी गीत ना दृश्य रचे आ गावेले. तवना पर उनुका आवाज़ में मिठासो बा आ बोल में पैनोपन. ‘बी.ए. का कै लेहलीं/ समस्या भारी धै लेहलीं/ समस्या भारी धै लेहलीं/कि देहियां तुरे लगलीं हो/ अरे कलेक्टरे से शादी करिहैं उडे लगलीं हो.’ खुद के लिखल एह गीत में मनोज तिवारी कस्बा , गांवन के मध्यवर्गीय परिवारन में लड़िकी के पढ-लिख लिहला का बाद उपजे वाली शादी के समस्या अउर दोसरा तरफ लड़िकी के सपनन के एह विकलता से व्यौरा परोसले बाड़न कि मन हिल जाला. लड़िकी के शादी जाहिर ना कलक्टर से ना हो पावे. बात डाक्टर, इंजीनियर से होत मास्टर तक उतरि जाले आ तबो बाति ना बने त, ‘कइसे बीती ई उमरिया अंगुरिया पर जोडे लगलीं हो.’ पर आ जाले. एही तरह, ‘असीये से कइ के बी. ए. बचवा हमार कंपटीशन दे ता’ गीत में मनोज तिवारी बेरोजगारी के मुश्किल भरल सीवन के अइसन जोड़ले बाड़न कि ऊ मील के पत्थर वाला गाना बन जा ता. बेरोजगारी के अइसन सजीव खाका कहानियन में त मिल जाला बाकिर कवनो लोक भाषा का गाना में शायद पहिला बेर मिलल बा आ अपना पूरा कोमलता आ टटकापन का साथे. एही तरह मनोज तिवारी ‘मंगरूआ बेराम बा’ में चुटकी ले-ले के जवन दारूण गाथा परोसले बाड़न ऊ गांव से महानगर के बीच पनपत संत्रास के विलापे भर ना ह, ई एगो निरंतर दुरूह होत जा रहल समाज के महागाथो ह. ‘चलल कर ए बबुनी ओढनी संभाल/ केकर-केकर मुंह रोकबू सैंडिल उतारि के’ जइसन गीतन में मनोज छींटाकशीओ करेले आ विसंगतिओ. ई गीत उनुका पुरनका गीत, ‘हटत नइखै भसुरा, दुअरिये पर ठाड बा’ के यादो दिआवत बा. ‘का मिलबू रहरिया में/ आव ले चलीं तोंहके शहरिया में’ भा फेरु, ‘जवन बाति बा संवरको में ऊ गोर का करी/ जवन कै दिही अन्हार ऊ अंजोर का करी’ आ ‘नीमक पर मारि हो गइल’ भा “मैटर बदलि गइल’ जइसन गानो मनोज तिवारी का खाता में बा.

आरोप बालेश्वर का तरह मनोजो तिवारी पर ओही डबल मीनिंग वाला गाना गावे के बा. आ साँच इहे बा कि मनोज तिवारी के बाज़ार के रथ बालेश्वर से बड हो गइल. भोजपुरी गवनई के जतना नुकसान मनोज तिवारी अपना नयका गावल गानन से कइले बाड़न ओतना शायद केहू दोसर ना. समझौते बालेश्वरो कइले बाजार में जमे खातिर बाकिर मनोज तिवारी त जइसे गंगा में मोरी आ फ़ैक्टरी के कचरा दुनु ढकेल दिहले. बताईं कि देवी गीत गावे वाला मनोज तिवारी पैरोडीओ गावे लगलन. बाति एहिजे ले ना रुकल ऊ त, ‘बगल वाली जान मारेली’ गावत-गावत ‘केहू न केहू से लगवइबू, हमसे लगवा ल ना’ जइसन गानो गावे लगलन. के कही कि बी॰एच॰यू॰ के पढल-लिखल मनोज तिवारी राजन-साजन मिश्रो के शिष्य हउवन ? आ बाद का दिनन में त पतन के जइसे पराकाष्ठा हो गइल. खास कर के भोजपुरी सिनेमा में बतौर अभिनेता उनुकर का योगदान बा ई त उहे जानसु बाकिर हम त इहे जानीले कि उनुकर भोजपुरी फ़िलिम बड़का बोझ बाड़ी सँ भोजपुरी समाज पर आ ओहनी में उनकर गावल भोजपुरी गाना कोढ बा. लेकिन हँ, बाज़ार के त ऊ सिरमौरो बाड़न चाहे भोजपुरी के आन-शान बेचिये के सही. तवना पर उनुकर दंभ भरल आचरण उनुका के कहाँ ले जाई कहल ना जा सके. “बिग बास” में उनुकर घमंड त डाली बिंद्रा के झेललो से बेसी बरदाश्त का बाहर रहल. पता ना उनुका इर्द-गिर्द डटल सलाहकार उनुका के काहे ना बतावसु कि गायकी, खास करिके भोजपुरी गायकी, घर के ऊ लाज ह जवन सड़कन पर ना इतरात फिरे ! ना ही ऊ नेतवन, अधिकारियन के गोड़ छू के संभरे-संवरेले. ओकर दर्प, ओकर गुरूर आपन मर्यादा, आपन लाज, आपन संस्कारे त बा. आ भोजपुरिये काहे, कवनो भाषा के, इहे मिजाज होले.

एक वाकया देखीं जवन याद आ गइल. जवन कबो सपन जगमोहन सुनावसु कि ऊ लखनऊ में भातखंडे में पढत रहले. अचानक एक दिन एगो आदमी आइल, लागल गाना सीखे. करीब पंद्रहे दिन में सीख के ऊ जाये लागल आ आचार्य ओकर बहुते तारीफ कइलन. कहलन कि ऊ बहुते बढ़िया सीख लिहलसि. ऊ आदमी चल गइल त हमनी का कुछ विद्यार्थी ऐतराज़ जतइनी जा कि, ‘ वाह साहब हमनी का अतना समय से सीखत बानी सँ आ ना सीख पइनी सँ. आ ई जनाब पंद्रहे दिन में सीख गइले ?’ आचार्य संयम बनवले रखनी आ नाराज ना भइनी. सिर्फ अतने भर पूछनी कि, ‘पता बा कि ऊ के रहल ?’ सब लोग बोलल कि , ‘ना.’ आचार्य बतवनी कि, ‘कुंदन लाल सहगल रहले.’ आ जोड़नी, ‘बाबुल मोरा नइहर छूटो ही जाए” में अवधी के टच सीखे के रहल आ रियाज करे के रहल’. सभकर मुँह सिया गइल रहे कि अतना बडहन कलाकार हमनी का बीचे रहल आ पतो ना चलल ? बाकिर मनोज तिवारी? जब तक रहले बिग बास में आग मूतत रहले. जाने कइसे ऊ अपना घर में रहत होखीहन. अतना अहंकार? अहंकार तो बडहन-बडहन लोगन के लील जाला. का इहो ऊ ना जानसु ?

खैर बात भोजपुरी गायकी की होत रहुवे. माफ करीं तनी विषयान्तर हो गइल. जवनो हो भिखारी ठाकुर के गावल बहुते धुन आ उनुका गाना के इस्तेमाल फिलिमन में भइल बा. बालेश्वरो के कुछ गाना फिलिमन में चोरी-चोरी गइल. शारदो सिनहा फ़िलिमन में गवले बाड़ी, मनोजो तिवारी. लेकिन अइसन आरोप दोसरा पर ना लागल, मनोजे पर लागल. किसिम-किसिम के आरोप. एहीजे याद आ जात बा मुहम्मद खलील के. याद आवत बा उनुकर गायकी, ‘कवने अतरे में समलू आहिहो बालम चिरई !’ दरअसल किसिम-किसिम के दबाव झेलत भोजपुरी गायकी अब जाने कवना अतरा में समाइल जात बिया जहवाँ से ओकरा के गहमरी जी के नायिका का तरह खोजल मुश्किल होत जात बा. विंध्यवासिनी देवी के गावल ऊ गाना, ‘हे संवरो बहि गै पीपर तरे नदिया !’ भा ‘ चाहे भइया रहैं, चाहे जायं हो, सवनवा में ना जइबों ननदी’ जइसन टटकापन अब भोजपुरी गवनई से बिसरल जात बा.

एहिजा तक कि कबो मज़रूह सुलतानपुरी एगो भोजपुरी फ़िल्मी गाना लिखले रहले जवना के लता मंगेशकर चित्रगुप्त का संगीत निर्देशन में गवले रहली, ‘लाले-लाले ओठवा से बरसे ला ललइया हो कि रस चुवेला, जइसे अमवा के मोजरा से रस चुवेला !’ के मिठास आजुवो मन लहका देबेले. बाकिर अफ़सोस कि ई मिठासो अब भोजपुरी गाना में ना चूवे ! त एह नयकी सदी के डाटकाम युग में भोजपुरी गवनई के आगे का हाल होई ई त समय बताई. फ़िलहाल त मनोज तिवारी के गावल एगो भोजपुरी गज़ल एहिजा मौजू बाः “अपने से केहू आपन विनाश कै रहल बा, पंछी शिकारियन पर विश्वास कै रहल बा.’ सचमुच सोच के कई बेर डर लागत बा कि भोजपुरी गानो का साथ कहीं इहे त नइखे हो रहल ? बाज़ार का दबा्व का आड में. मज़रूह के शब्दन में भोजपुरी गाना के दर्द कहीं त, ‘लागे वाली बतिया न बोल मोरे राजा हो करेजा छुएला !’

‘फेंक देहलैं थरिया, बलम गइलैं झरिया, पहुंचलैं कि ना ! उठे मन में लहरिया, पहुंचलें कि ना !’ जइसन मार्मिक गानना भा फेर ‘आधी-आधी रतिया में बोले कोयलिया, चिहुंकि उठे गोरिया सेजरिया पर ठाढी.’ जइसन गानन से चरचा में आइल मदनो राय जल्दिये बाजार के हवाले हो गइलन. डबल मीनिंग का राह से त बचले बाकिर मुहम्मद खलील के मशहूर गाना “कवने खोंतवा में लुकइलू, आहिहो बालम चिरई” के गवले. एह गाना में त गायकी के ऊ रस त सुखइबे कइले जवन खलील बरसावेले, अंतिम अंतरा में गाना के बोले बदल के अर्थ के अनर्थ कर दिहले. भोलानाथ गहमरी जइसन लिखले आ खलील गवले कि, ‘सगरी उमिरिया धकनक जियरा, कबले तोंहके पाईं’ पर मदन राय गावेले,’सगरी उमिरिया धकनक जियरा कइसे तोंहके पाईं.’ त केहु का कर लीहि ? अइसही अउरियो गाना में जवना के सुर के मिठास कहल जाले ऊ ना भर पावें, जइसे कि शंकर यादव बाड़े. उनुका सुर में मिठास जइसन लहर मारेला. ‘ससुरे से आइल बा सगुनवा हो, ए भौजी गुनवा बता द’. जइसन गाना जब ऊ चहकि के गावेले त मन लहक उठेला बाकिर दिक्कत ई बा कि बालेश्वर का तरह शंकरो आरकेस्ट्रा के रंग-ढंग में सज-संवर के अपना के बिलवा देले, अपना गायकी के जइसे भ्रूण हत्या कर देले त तकलीफ होखेला. इहे हाल सुरेश कुशवाहा के बा. ऊ गावेले त कि, ‘आ जइह संवरिया/ बंसवरिया मोकाम बा.’ लेकिन उहो आर्केस्ट्रा के मारल हउवे.

हालांकि गोपाल राय एह सब से बाचेले आ अपना गवनई में सुकुमार भाव भरबो करेले, ‘चलेलू डहरिया त नदी जी क नैया हिलोर मारे, करिअहियां ए गोरिया हिलोर मारे’जइसन गीतन में ऊ बहकइबो करेले आ सहकइबो करले त आनन्द दुगुना हो जाले. जइसे कबो बालेश्वर से उनुकर स्टारडम आहिस्ता-आहिस्ता मनोज तिवारी छीन लिहले रहन, वइसही मनोजो तिवारी के स्टारडम एह घरी दिनेश लाल यादव निरहुआ लगभग छीन चलल बाड़े. लेकिन उनुकर डेग के शुरुआते भइल डबल मीनिंग गाना से, ‘दुलहिन रहै बीमार निरहुआ सटल रहै/ मंगल हो या इतवार, घर में घुसल रहै’ भा फेर “फिर मलाई खाए बुढवा” जइसन गाना से ‘शोहरत’ कमाके बाज़ार पर सवार भइल निरहुओ के बीमारी पइसे बा. भोजपुरी के हद लाँघ के तमिल- तेलुगू तक पहुंच गइल बाड़न, लेकिन स्टारडम में भलही आगा होखसु गायकी के गलाकाट लडाई में एह समय उनकरो कान काटे वाला लोग आ गइल बा. पवन सिंह गावत बाड़न, ‘तू लगावेलू जब लिपिस्टिक/ हिलेला आरा डिस्टिक/ लालीपाप लागेलू/ कमरिया करे लपालप/ज़िला टाप लागेलू’ भा फेर “नाहीं मांगे सोना चांदी/ नाहीं मांगे कंगना/ रह्त हमरे आंखि के सोझा परदेसी मोरे सजना.’ एगो खेसारी लाल यादव हउवे. उहो गावत बाड़न, ‘ सइयां अरब गइलैं ना/ देवरा चूसत ओठवा क ललिया हमार/ देवरा चूसत बा.’ गुड्डू रंगीला के त रउरा सुनते बानी, ‘गोरिया हो रसलीला करऽ/ तनी सा जींस ढीला करऽ !’ भा फेर, ‘हाय रे होठलाली, हाय रे कजरा/ जान मारे तोहरी टू पीस घघरा.’ मनोजे तिवारी का तरह दिवाकरो दुबे कबो देवी गीत गावत रहले. फेर उहो मनोज तिवारीए का तरह पैरोडी पर आ गइलन. ‘बहुत प्यार करते हैं पतोहिया से हम’ भा ‘मजा मारे बुढवा पतोहिया पटा के’ अउर कि, ‘उठा ले जाऊंगा रहरिया में/देखती रह जाएंगी अम्मा तुम्हारी.’ राधेश्याम रसिया गावत बाड़े,’ बंहियां में कसि के सईयां मारेलैं हचाहच.’ त सानिया के सुनी, ‘मुर्गा मोबाइल बोले चोली में कुकुहू कू/ दाना खइबे रे मुर्गवा कुकुहू कू’ भा फेर, ‘चुभुर-चुभुर गडेला ओड़चनवा ए भौजी.’ कलुआ के सुनीं,’ लगाई देईं/ चोलिया में हुक राजा जी/ कई दीं एक गो पीछवा से चूक राजा जी ! ‘ साथही सकेत होखता राजा जी, ‘दूसर ले आ दीं.’ विनोद राठौर त , ‘ तोहार लंहंगा उठा देब रीमोट से’ तक आ गइल बाड़न. संपत हरामी जइसन लोग के गायकी त हम एहिजा ‘कोटो’ ना कर सकीं.

गरज ई कि भोजपुरी गाना के मान-मर्यादा, मिठास अउर सांस एह तरह पतित हो गइल बा कि ऊ समय दूर नइखे जब भोजपुरी गानो में लांग-लांग एगो के शब्दावली आ जाई. लोग कही कि हँ, भोजपुरीओ एगो बाषा रहल जवना में लोग अश्लील गाना गावत रहे. सत्तर-अस्सी का दशक में जब बालेश्वर भोजपुरी के बिगुल फूंकत रहले भा मुहम्मद खलील भोजपुरी गीतन में रस भरत रहले, ओकर प्राण-प्रतिश्ठा करत रहले तबहियो अश्लील आ बेतुका गीतन के दौर रहल. लेकिन छुपछुपा के. ‘तनी धीरे-धीरे धंसाव कि दुखाला रजऊ’ भा फेर ‘मोट बाटें सइयां, पतर बाटी खटिया’ भा फेर ‘तोरे बहिनिया क दुत्तल्ला मकान मोरी भौजी’ जइसम गाना चलन में रहे. जवना चलते बालेश्वर त समझौता कइले बाकिर खलील जइसन गायक ना. आजुवो एगो गायक बाड़े रामचंद्र दुबे. आजु का तारीख में भोजपुरी गायकी के सर्वश्रेश्ठ गायक. ईश्वर उनुका के सुरो दिहले बाड़न आ गानो. आ जब ऊ ललकार के गावेल त मन मगन हो जाला. समझौता उहो ना कइलन अपना गायकी में. एक समय ई.टी.वी. पर फोक जलवा में बतौर जज जब ऊ आवसु त महफ़िल लूट ले जासु. अब महुआ पर रामायण बांचेले आ कानपुर में प्रवचन से गुजारा करेले. लेकिन देखीं बाजार के ताकत कि रामचंद्र दुबे के एको सी. डी. भा कैसेट बाज़ार में नइखे. बताईं मुहम्मसद खलील भा
रामचंद्र दुबे जइसन श्रेष्ठ गायकन के सी.डी भा कैसेट बाज़ार में नइखे बाकिर संपत हरामी आ कलुआ जइसन अइसन-वइसन गायकन के सी. डी. से बाज़ार पटाइल पड़ल बा. हर चीज़ के हद होले. भोजपुरी गायकीओ के बाज़ार अब आपन हद पार करत बा, नतीजा सामने बा. टी सीरिज़ भा वेब जइसन कंपनी जे भोजपुरी गाना के बिजनेस करेली सँ, आजु बाजार में भारी साँसत में बाड़ी सँ. अबकी का होली में अश्लील गानन के सीडीअन का पिटअइला से भारी नुकसान में आ गइल बाड़ी सँ. हालत ई बा कि कलाकारन के सी.डी. जारी करे खातिर ई कंपनियां सी.डी. आ एक लाख रूपिया माँगत बाड़ी सँ कलाकारन से ! आ बिलकुल नवही कलाकारन के तबहियो एंट्री नइखे.

अब कुछ गायिका लोगनो के ज़िक्र ज़रूरी बा. शारदा सिन्हा, कल्पना, मालिनी अवस्थी आ विजया भारती पहिला कतार में बा लोग, शारदा सिन्हा का लगे एक से एक बेजोड गाना बा. एक समय जब पाप गीतन के दौर आइल रहे त शारदा सिन्हा समझौता करे से इंकार करत कहले रही, ‘ई पाप भोजपुरी में कहां समाई? ई त पाप हो जाई !’ दुर्भाग्य से पुरूष गायक एह तथ्य के नज़रअंदाज़ कर दिहले. नतीजा सामने बा. शारदा सिन्हा अबहियो दोसर जोड़-तोड भले कइले होखसु, अपना गायकी में आपन गमक बरकार रखले बाड़ी. आपन गमक बचवले रखले बाड़ी, ‘हम त मंगलीं आजन-बाजन सिंघा काहें लवले रे/ फूंकब तोहार दाढी में बंदूक काहें लवले रे ‘ एकर सबले बड़का उदाहरण बा. खुशी के बाति बा कि मालिनी अवस्थी आ विजया भारती तमाम दबाव का बावजूदो अपना गायकी में लोच त बरकरार रखले बाड़ी बाकिर लोचा नइखी आवे दिहले. लेकिन बड़हन दिक्कत इहे बा कि सी.डी का बाज़ार में एहु दुनु लोग के धूम नइखे. विजया भारती एगो बढ़िया गायिका त हइये हई, कवियत्रीओ हई आ आपने गाना गावेली. लाख फ़र्माइश हो दोसरा के गावल गाना ना गावसु. बाकिर ले दे के उहो स्टेज शो अउर महुआ पर बिहाने-बिहाने आ भौजी नंबर एक में सिमट के रहि गइल बाड़ी.

इहे हाल मालिनी अवस्थी के बा. उहो महोत्सव अउर स्टेजे शो तक सिमटल बाड़ी. मालिनी दोसरा के गावल गाना गावे से गुरेज ना करसु बाकिर अपना गायकी में मर्यादा के एगो बडहन रेखा ज़रूरे खिंचले रहेली. हालांकि कई बेर ऊ इला अरूण का तर्ज़ पर स्टेज परफ़ार्मर बने का दीवानगी तक चल जाली आ ‘काहे को व्याही विदे्स’ के आकुलतो बोवेली लेकिन ‘सैयां मिले लरिकइयां मैं का करूं’ के मोह से आगा ना निकल पावसु. कबो राहत अली के शिष्या रहल मालिनी बाद में गिरिजा देवी के शिष्या हो गइली. राहत अली गज़ल के आदमी रहले आ गिरिजा देवी शास्त्रीय गायिका. कजरी, ठुमरी, दादरा, चैता गावे वाली. मालिनी खुद भातखंडे के पढल हई. बाकिर ई सब भूल-भुला के मालिनी अपना लोकगायकी में दुनु गुरूअन के शिक्षा के परे राखत शो वुमेन बन चलल बाड़ी का शोबाज़ीए के पहिला काम बना लिहले बाड़ी. ऊ भूल गइल बाड़ी कि एगो किशोरी अमोनकरो भइली जे सिनेमा में प्लेबैको एहसे छोड़ दिहली कि एहसे उनुका गुरु के एतरज रहल. हृदयनाथ मंगेशकर कहेले कि अगर
पिता जी जियत रहते त हमरा घर में केहु प्लेबैक ना गाईत. लतो मंगेशकर ना. ई बाति हमरा से एगो इन्टरव्यू में ऊ खुद कहले. बाकिर भातखंडे के पढल-लिखल मालिनी एह सब के भूल-भाल के बाज़ार का साथ समझौता कर बइठल बाड़ी आ लाग’ता कि स्टेज अउर पब्लीसिटी के गुलाम बन गइल बाड़ी. उनुकर गायकी अउरी निखरे ना निखरे उनुकर फ़ोटो अखबारन में छपल जरुरी बा. महोत्सवन में उनुकर चहुँपल जरुरी बा. मालिनी के ई समुझावे वाला केहु नइखे कि उनुकर पहिचान उनुका गायकी से याद कइल जाई, सिर्फ़ मंचीय सक्रियता, चैनलन पर बइठला भा शोबाज़ी से ना. खास कर तब आ जब जब रोटी-दाल के संघर्ष उनुका साथे नइखे. ऊ सब कुछ भूला के संगीत साधना कर सकेली आ कवनो बडहन गायकी के समय रच सकेली.

कल्पना बेजोड गायिका हई. ‘उतरल किरिनीया चांद से नीनिया के धीरे-धीरे हो’भा ‘नींदिया डसे रे सेजिया, कवनो करे चैना’ भा फेर ‘ जिनगी में सब कुछ करीहऽ/ प्यार केकरो से न करीहऽ.’ जइसन ना भुलाए वाला गीत कल्पना का खाता में दर्ज़ बा. सी.डी. के बाज़ारो में ऊ भारी बाड़ी. पर शारदा सिनहा, विजया भारती भा मालिनी अवस्थी का तरह ऊ गायकी की मान मर्यादा के गुमान बचा के ना राखसु, अकसर तूड़ देली, ‘ गवनवा ले जा राजा जी !’ तकेले बात रहीत त गनीमत रहे. लेकिन बात जब,’ सुन परदेसी बालम/ हम के नाहीं ढीली/ देवरा तूरी किल्ली/ आ जा घरे छोड के तू दिल्ली’ भा फेर, ‘मिसिर जी तू त बाडऽ बडा ठंडा’ आ फेर ‘जादव जी’ जइसन गीत उनुका के बाजार में भले टिका देत होखे बाकिर उनुका बेजोड़ गायकी में पैबंद बन के ओकरा के धूमिल कर देला. उनुका गायकी के जवन साधना बा, उनुकर जवन यात्रा बा, ऊ खंडिते ना कहीं कहीं त ध्वस्तो होखत लउकेले. अइसना में भलही थोड़िके देर ला सही, गायकी में आपन हाजिरी दर्ज करावे वाली ऊषा टंडन, पद्मा गिडवानी, अउर आरती पांडेय के इयादो आवल स्वाभाविक बा. खास कर उनकर गावल,’ का दे के शिव के मनाईं हो शिव मानत नाहीं’ भा फेर ‘भूसा बेंचि मोहिं लाइ देव लटकन’ भा फेर , ‘पिया मेंहदी ले आ द मोती झील से जा के साइकिल से ना !’ अउर कि, मोंहिं सैयां मिले छोटे से’ जइसन गानो के याद बरबस आ जाले. भलही एह गायिकन के सिक्का बाज़ार में ना उछलल लेकिन गायकी में समझौते ना कइळी ई गायिका लोग. एगो बातो एहिजा याद दिआवल मौजू बा कि लता मंगेशकर राज कपूर का कहला से संगम में ‘मैं का करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया ‘ गा ज़रूर दिहली लेकिन ओह गाना के मलाल उनुका आजु ले बा कि अइसन गाना ऊ काहे गा दिहली ? अइसही आशो भोसले के मलाला बा अॡना कुछ गाना के ले के, खास कर के ‘मेरी बेरी के बेर मत तोडो, नहीं कांटा चुभ जाएगा.’ बाकिर पता ना आजु के गायकन के ई अहसास कहिया होई ?

अबही हाल में महुआ पर सुर-संग्राम के दौरान देखाइल-सुनाइल कुछ कलाकारंनो के जिक्र जरुरी बा. भोजपुरी गायकी के ई पड़ावो दर्ज कइला बिना आगा के भोजपुरी गायकी के बात बेमतलब लागेला. एकर दुसरको सत्र समापन तक चहुँप चुकल बा बाकिर पहिलका सत्र में कुछ बहुते बढ़िया गायक गायिका सामने अइले जे भोजपुरी गायकी के बाचल रहि जाये के विश्वासो दिआवेला. पहिला सत्र में विजेता त मोहन राठौर आ आलोक कुमार बनले बाकिर सबले सधल स्वर आ रियाज लउकल आलोक पाण्डेय के. ओकरा के अद्भुत कह सकीले. गायकी के आकलन एस.एम.एस से होखल गायकी के पराजये बा तबहु जवन हमरा सामने बा ओहमें छाँटल-बीनल त जाइये सकेला. अनामिका सिंह आ प्रियंका सिंह जइसन गायिका का साथहु अगर समय इंसाफ कइलसि त श्रेया घोषाल का तरह आगा बढ़े से केहु रोक ना सके. अबकी का सत्र में रघुवीर शरन श्रीवासतव आ ममता राऊत त मैदान में बड़ले बावे लोग. आगा अउरी प्रतिभा सामने अइहें आ भोजपुरी गायकी के नया कीर्तिमान रचत भोजपुरी के अश्लीलता आ फूहड गाना का खोह से बाहर निकाली अइसन उम्मीद त बा. मुहम्मद खलील एगो पचरा गावत रहले, ‘विनयी ले शरदा भवानी/ सुनी ले तू हऊ बडी दानी !’ आगा ऊ जोड़सु, ‘माई मोरे गीतिया में अस रस भरि द जगवा के झूमे जवानी !’ हमरो इहे कामना बा कि भोजपुरी गीतन का लहक अउर चहक में जगवा के जवानी झूमे आ ई कि बाजार के जवन घटाटोप अन्हरिया बा ऊहो टूटे.

याद दिआवल जरुरी बा कि भले कुछुवे फिलिमन में सही, लता मंगेशकर, मुहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, मुकेश, तलत महमूद, हेमलता, अलका याज्ञनिक, आ उदित नारायण जवन भोजपुरी गाना गवले बावे लोग ओहमें कवनो तरह के खोट आजु ले केहु नइखे खोज पवले. ऊ गाना आजुवो अॡना मेलोडी में बेजोड़ बाड़े. कवनो सानी नइखे ओह गानन के. लता आ तलत का गावल “लाले-लाले ओठवा से बरसे ला ललइया हो कि रस चुएला हो” भा “हे गंगा मैया तोंहें पियरी चढइबों” हो भा मन्ना डे का गावल “हंसि-हंसि पनवा खियवले बेइमनवा” होखे भा रफ़ी के “सोनवा के पिंजरा में बन्द भइल चीरई क जीयरा उदास” भा फेर मुकेश के “हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा” होखे भा हेमलता के गावल “पहुना हो पहुना, जब तक पूरे ना हो फेरे सात” भा फेर अबही हाल के अलका याज्ञनिक आ उदित के गावल सोहर “जुग-जुग जीयसु ललनवा” होखे. अइसनका बहुते गीतन से आजुवो उनुका गायकी के टटकापन कवनो महूए का तरह टपकेला, चूवेला त चित्रगुप्त के ईयाद आ जाले, रवींन्द्र जैन के याद आ जाले. एहुसे कि आजु के भोजपुरी गानन के संगीतो एह कदर बेसुरा हो चलल बा कि मत पूछीं. शादी-बारात में पी-पा के कुछ लड़िका ओकरा हल्ला में डाँस त कर सकेले बाकिर आंख मूंद के सुने के सुख त हरगिज ना ले सकसु. आ एहिजे बालेश्वर के एगो पुराना गाना याद आ जाता, ‘ जे केहू से नाईं हारल ते हारि गइल अपने से’.

सचमुच भोजपुरी गायकी अपनने से हार गइल बिया.


लेखक परिचय
अपना कहानी आ उपन्यासन का मार्फत लगातार चरचा में रहे वाला दयानंद पांडेय के जन्म ३० जनवरी १९५८ के गोरखपुर जिला के बेदौली गाँव में भइल रहे. हिन्दी में एम॰ए॰ कइला से पहिलही ऊ पत्रकारिता में आ गइले. ३३ साल हो गइल बा उनका पत्रकारिता करत, उनकर उपन्यास आ कहानियन के करीब पंद्रह गो किताब प्रकाशित हो चुकल बा. उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” खातिर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान उनका के प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित कइले बा आ “एक जीनियस की विवादास्पद मौत” खातिर यशपाल सम्मान से.

वे जो हारे हुये, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाजे, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित), आ सुनील गावस्कर के मशहूर किताब “माई आइडल्स” के हिन्दी अनुवाद “मेरे प्रिय खिलाड़ी” नाम से प्रकाशित. बांसगांव की मुनमुन (उपन्यास) आ हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण) जल्दिये प्रकाशित होखे वाला बा. बाकिर अबही ले भोजपुरी में कवनो किताब प्रकाशित नइखे. बाकिर उनका लेखन में भोजपुरी जनमानस हमेशा मौजूद रहल बा जवना के बानगी बा उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं”.

दयानंद पांडेय जी के संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
मोबाइल नं॰ 09335233424, 09415130127

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