जमीनी हक़ीकत से बेख़बर बा भोजपुरी सिनेमा

– सुधीर सिंह उजाला

भोजपुरी फिल्म के उद्गम बिहार आ उत्तर प्रदेश के सांस्कृतिक भूमि से भइल बा. त अचरज ना होखे के चाहीं कि एकर बुनियाद बरकार राखे के जिम्मेदारीओ एही लोग का कान्ह पर टिकल बा. बाकिर पिछला दस साल से अपना कामयाबी पर इतरात भोजपुरी सिनेमा का लगे बस तीने गो नायक बाड़ें रविकिशन, मनोज तिवारी आ दिनेश लाल ‘निरहुआ’. हाल के दिन में जब मनोज तिवारी आ रवि किशन कमजोर पड़ल बाड़ें त पवन सिंह आ खेसारीओ लाल के चरचा भलहीं जोर पकड़े लागल बा बाकिर भोजपुरी सिनेमा के संगे धुरंधर कुणाल सिंह क बाद मौजूदा समय में जवन तीन नाम याद आवेला तवन रवि, मनोज अउर निरहुए के होला. रविकिशन के छोड़ दीं त लगभग सगरी नायक लोकगायक के रूप में लोकप्रियता बटोरला का बाद भोजपुरी सिनेमा के सितारन में शुमार भइलें. दोसरा ओर भोजपुरी सिनेमा में नायिका लोगन के कतार बहुते लमहर बा, रानी चटर्जी, पाखी हेगड़े से लेकर मोनालिसा अउर आइटम डांसर संभावना अउर सीमा सिंह ले. लेकिन एहमें से शायद केहु के ऊ बेंवत नइखे जे कैटरीना, करीना अउर ऐश्वर्या क तरह देखे वालन के सिनेमा घर ले खींच सके. ई लोग फिलिमन में एही ला होले कि ग्लैमर होखल जरूरी होला. ना त एह लोग के मार्केट वैल्यू इचिकिओ भर नइखे. ई बात भोजपुरी के नायको समुझेलें आ ओह लोगन पर मार्केट वैल्यू के बुखार सवार होके लागल बा तबहिए त भोजपुरी सिनेमा के बजट के आधा माने कि 50 लाख तक मांगे में एह लोग के संकोच ना होखे. पिछला दिने जब एगो नामचीन भोजपुरी अभिनेता से 50 लाख मँगला के लेके सवाल उठावल गइल त ऊ छूटते कहलन, रजनीकांत त एक फिल्म के 50 करोड़ लेबेलें, हम त ओह हिसाब से कुछऊ ना माँगीले. आखिरकार उहो त रिजनले सिनेमा से आवेलें. हम त चाहीलें कि हमनिओ के फिलिम ओह ऊँचाई ले चहुँपे.

अब के ना मर मिटी एह सीधाई पर. भोजपुरी सिनेमा के बेहतर भविष्य के चाहत सराहे लायक बा, लेकिन चाहत के बुनियाद जमीनी ना होखे त बस हँसा सकेले अउर कुछ ना कर सके. रजनीकांत के लेके इहो सवाल जेहन में चमकेला कि शुरूआतीए दौर में उनुका के 80 करोड़ परोसल गइल कि इंडस्ट्री के बुलंदी पर चहुँपवला का बाद 80 करोड़ मिलल. सवाल जतने अझूराइल बा जवाब ओतने सीधा बा, काहे कि शोहरत के सरपट में भोजपुरी के चंद नामचीन अभिनेता भूला जालें कि उनुकर इंडस्ट्री कवना लायक बा आ ओकर बेहतरी आ माकूल तरक्की ला ऊ कवन कोशिश कइले बाड़न? वास्तव में यदि भोजपुरी सिनेमा जगत के बीतल दस साल पर गौर करीं त पाएब कि पारिश्रमिक के बढ़ोतरी के अलावा इंडस्ट्री के बेहतरी ला कवनो अभिनेता निजी स्वार्थ से ऊपर उठके कवनो सार्थक पहल शायदे कइले होखे. जबकि भोजपुरी के जमीनी हकीकत से बेखबर भोजपुरी सिनेमा के चेहरा अउरी बिगाड़े के कोशिश बदस्तूर जारी बा. दावा क साथ ई कहल बेमतलब ना होई कि तीनों सितारा में से शायदे केहु अपना निर्माता, निर्देशक भा पटकथा लेखक से मिल के सार्थक दखल देबे खातिर कवनो गंभीर बइठकी भा राय विचार कइले होई. अतने ना, शायदे केहु अपना फिलिमन के तकनीकी गलतियन के सकरले होखी, भा अपना फिलिमन के सफलता भा असफलता के कारण जाने के कोशिश कइले होखी. कहल जा सकेला कि अभिनेतने से अतना उम्मीद काहें? उ एहसे कि जब फिल्म के बजट के आधा रउरे चाहीं त पूरा फिलिम के जवाबदेहीओ सकारे के पड़ी. तब शायद एगो नया अध्याय के नींव पड़ सकी बाकिर अइसन भावना के भनको से अभिनेता अपना के फरके राखे में आपन भलाई समुझेलें.

साँच त ई बा कि भोजपुरी सिनेमा के शुरूआती दौर याद करीं त फिल्मकार नासिर हुसैन, विश्वनाथ शाहाबादी भा फेर कुंदन कुमार के नाम याद आवेला, कवनो नायक नायिका के नाम याद ना आवे. लेकिन भोजपुरी सिनेमा के मौजूदा माने कि तिसरका दौर में शायदे कवनो फिल्मकार के नाम उनुका फिलिमन के नाम का साथे याद आवे, याद पड़ी त बस नायकन के नाम. फिल्म ‘ससुरा बड़ा पइसा वाला’ संगे मनोज तिवारी, ‘निरहुआ रिक्शावाला’ संगे दिनेश लाल ‘निरहुआ’ त ‘मार देब गोली केबू ना बोली’ संगे रविकिशन. जाहिर बा कि जब भोजपुरी सिनेमा के पूरा बाज़ारे नायकन का अंगुरी पर नाचत होखो त एकरा अच्छाई-बुराईओ से एह लोगन के बरी ना कइल जा सके. हमार निजी मानना बा कि रविकिशन अउर मनोज तिवारी के भोजपुरी लोकप्रियता के माथ पर चहुँपा दिहलस जहवाँ उ ढेर दिन ले बिना कवनो प्रतिस्पर्धा के टिकलो रहलें. अतने ना भोजपुरी खातिर प्रतीको बन गइलें, जहां ई लोग भोजपुरी में एगो ‘पिपली लाइव’ भा ‘लगान’ के सपना देख सकत रहे लेकिन अइसन हो ना सकल काहे कि एह लोगन के अपना बादशाहत के पड़ल रहे, ना कि भोजपुरी इंडस्ट्री के बेहतरी के. एकरे अलावा सबले बड़ मुश्किल ई रहल कि एह विसंगतियन का चलते भोजपुरी सिनेमा के एगो क्षेत्रीय सिनेमा के तरह के जमीनो ना मिल सकल, जवना का पीछे भोजपुरी सिनेमा के दशा आ दिशा के प्रतीक बन चुकल रविकिशन आ मनोज तिवारी जइसन अभिनेता अपना अंतर्मुखी प्रयास से एकर बेड़ा गर्क करे पर आमादा रहलें. नतीजा भइल कि असमिया, मलयालम, बंगाली, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी सिनेमा का तरह भोजपुरी सिनेमा के विकास अपना जमीन पर भइबे ना कइल. ना त एकर केन्द्र दोसरा क्षेत्रीय फिलिमन का तरह उनुका राज्य भा व्यावसायिक जगहा पर खुल पावल. अघर अइसन भइल रहीत त सिनेमा भोजपुरी ला पटना आ गोरखपुर सबले खास केन्द्र होखीत. भोजपुरी सिनेमा एगो आजाद आसमान में बढ़ला का बजाय हिन्दी के हिमालय के छाँहे में अपना के सुरक्षित पवलसि. हालांकि शुरूआत तकनीशियनन से भइल, आ बाद में एहिजा के फिल्मकारो मुम्बई में आशियाना तलाश लिहलें. कलाकार त हमेशा का तरह मुम्बई के रूख करत गइलें आ बसत गइलें आ भोजपुरी सिनेमा अपना जमीन से बेदखल हो के हिन्दी सिनेमा के दहलीज पर जा पहुंचल. नतीजा भइल तथाकथित लोकप्रियता के दस बरीस गुजरला का बादो भोजपुरी सिनेमा के कवनो आपन आजाद पहचान ना बन सकल. बेसक कद त बढ़ल लेकिन एक हद ले दोसरा का दायरा में समेटा के. सिनेमा भोजपुरी के पहिलका स्वर्ण जयंती फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माण के केन्द्र पटना चुनल दूरदर्शिता साबित करत बा लेकिन तबहियों भोजपुरी के अगुआई करे वाला अभिनेता हमेशा अपना जमीनी हकीकत से मुंह चोरावे में लागल बाड़ें. अचरज नइखे कि मुम्बईए में बढ़ल मराठी सिनेमा से सिखला का बजाय भोजपुरी सिनेमा हिन्दी के भोंड़ा नकल कर के तोस पावत रहल. एतने ना हिन्दी से संपर्क भोजपुरीओ सिनेमा के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय होखे के गलत फहमी दे दिहलसि. आजु भोजपुरी सिनेमा के बात होले त लोग सीधे मॉरीशस, सूरीनाम से शुरूआत करेला. बाक्स ऑफिस के बात आवेला त हिन्दी सिनेमा का तरह इहो पंजाब, महाराष्ट्र, बंगाल, गुजरात के सर्किल के चरचा करेलें. कुल मिलाके जबो भोजपुरी सिनेमा के बाजार के चरचा होले त भरम फइलावल जाले कि एकर बाजार हिन्दी सिनेमा के बराबर भलहीं मत होखे, होखल जरूर चाहीं. भोजपुरी विश्लेषक भलहीं आपन मंशा थोपे ला बेसिरपैर वाला गलतफ़हमी के हवा देसु, निश्चित तौर पर एहसे भोजपुरी सिनेमा के हमेशा नुकसाने चहुँपवले बा. परिणाम ई भइल कि अइसन हालात में भोजपुरी सिनेमा के कनो अपना बाजार के सही आंकलन ना मिल सकल. मॉरीशस आ सूरीनाम से कमाई करके पता ना कतना फिलिम लवटली सँ, एकर समुन्दर पार बिजनेस के कवन रिकार्ड कम से कम अबहीं ले त सार्वजनिक नइखे भइल. लुधियाना, सूरत आ मुम्बईओ में भोजपुरी सिनेमा कतना कमाई कर पावेले, लोग के मालूम बा. भोजपुरी सिनेमा के कवनो तयशुदा बाजार बा त ऊ बा बिहार आ उत्तर प्रदेश के लगभग 200 से 300 बी ग्रेड सिनेमा घर. जहां टिकट के दर अबहियों 10 से 50 के बीच बा. ई सीधा गणित के मामला बा कि यदि सगरीओ शो हाउसफुल हो जाव एगो भोजपुरी सिनेमा कतना कमाई कर पाई? लेकिन भोजपुरी सिनेमा से जुड़ल लोग सीधे तौर पर हिसाब किताब भा कहीं त आंकड़ा सकारे ला कतई तइयार नइखन. जतना सिनेमाघर पूरा बिहार में ओतना त अकेले चेन्नई शहर में बा. हिन्दी फिल्म यदि मल्टीप्लेक्स में तीन दिन चल जाव त मुनाफा में आ जाले, लागत त ऊ रिलीज होखे से पहिलही ऑडियो, वीडियो, सेटेलाइट समेत अनेके तरह के राइट्स से निकाल लेले. बगैर शोध आ सर्वे के सगरी आंकड़ा भोजपुरी के पक्ष में बा तबहियों एकरा ला आपके कवन राइट्स मिलेला जे हवा में कटल पतंग के तरह उड़ावे में मशगुल होत रहीलें. ई सब कुछ भोजपुरीए सिनेमा के पाला में काहे आवेला? साउथ के फिलिम 100 करोड़ के बन सकेले त भोजपुरी के बीसो करोड़ में त बने. जबकि भोजपुरी सिनेमा के सालाना कारोबारे 100 करोड़ तक चहुँप पावेला भलही निर्माण पर सवा सौ करोड़ खर्च होखे लागल बा. यदि भोजपुरी सिनेमा के अधिकतम वापसी दूइयो करोड़ के मानल जाव त कवन फिल्मकार 8 करोड़ ले निर्माण पर खरच सकेला? यदि ऊ हिम्मत करिओ लिहलसि त दुबारा वापसी के नाम ना ली. 40 से 50 लाख भोजपुरी नायक के चाहीं त तो बाकी के तकनीकी खरचा ला भा ओह फिलिम के बेहतर बनावे ले सलाह जोखिम भरल हो जाला. अचरज ना होखे कि हिन्दी सिनेमा के धुरंधर निर्माता सुभाष घई, सरोज खान, दिलीप कुमार जइसन हस्तीओ भोजपुरी सिनेमा के बहत गंगा में हाथ धोवे अइलन त बाकिर कबो मुड़ के ना देखलें. शायद उहो भोजपुरी के आंकड़ा के मकड़ जाल में अझूरा गइलें. अभय सिन्हा, संजय सिन्हा, डा.सुनील कुमार, आलोक कुमार समेत कुछेक भोजपुरी के मंजल प्रोड्यूसर बाड़ें जे भोजपुरी के मायने मतलब आ हद से वाकिफ़ होखला से टिकल बाड़ें. भोजपुरी दर्शक एकल पसंद के आदी हो चुकल बाड़ें. बीतल बीस भा पचास बरीसन में चुने के कवनो सुविधा सिनेमा के भोजपुरी परदा पर ना मिलल. हमेशा से बस एके तरीका से, कमोबेस एके माहौल वाली, एके जइसन कथानक, विषयवस्तु के इर्द-गिर्द भोजपुरी फिलिम बनत रहेले जवना से दर्शकन का नजरिओ पर कवनो खास फरक ना पड़ल. भोजपुरी सिनेमा भोजपुरी ला बने का बजाय खाली बाजार ला बनावल जाले. नतीजा बा कि दर्शकन पर भा बड़हन पैमाना पर आपन पकड़ बनावे में नाकाम साबित होखत बिया. साउथो के फिलिम में अश्लीलता के बाढ़ बा त अदूर गोपालाकृष्णनो बाड़ें, बांग्ला में बाजार ला फिलिम बा त गौतमो घोष बाड़न. मराठी में फुहड़ हास्य के भरमार बा त श्वासो बा. भोजपुरी में अइसन काहे नइखे होखत? शायद एहले कि दोसरा क्षेत्रीय सिनेमन का तरह लगाव नइखे लउकत.

इहे सही समय बा. बड़हन बजट आ हवाई बाजार के भरम का भ्रम छोड़ के छोट बजट में नया प्रयोगधर्मी भोजपुरी सिनेमा के नया शुरूआत कर सकेलें. बाकिर तब बजट के बड़हन हिस्सा नायक के हवाले कइला का बदले शोध, परिकल्पना, कैमरा, संपादन आ कहानी पर करे के पड़ी. लाइट्स आ संगीत के इस्तमालो सीखे के पड़ी. तब जाके ‘पिपली लाइव’ आ ‘वेलडन अब्बा’ के परिकल्पना भोजपुरी सिनेमा के सोंच बन सकेला. भोजपुरी सिनेमा के मुम्बई में न्याय नइखे मिले वाला. ओकरा हिन्दी भा दोसरा क्षेत्रीय फिलिमन से चोरावल विषयवस्तु से नकलचीए के दर्जा हासिल हो पाई. एकरा ला मुम्बई के मोह छोड़ पटना भा गोरखपुर का ओर चले के पड़ी. तब जाके भोजपुरी के हक़ खातिर सही पहल हो पाई. संगहीसंगे नया आ सही प्रतिभा के तलाशो पूरा होखी आ कुछ गिनल चुनल भोजपुरी के सितारन का चमको पर हिन्दी सिनेमा जइसन प्रभाव लउके लागी आ तब भोजपुरी सिनेमा के सितारा सही मायने में चमक उठी.



सुधीर सिंह उजाला मैजिक टीवी के एजीएम रह चुकल बानी. ओहसे पहिले साल २००७ से २०११ का बीच फिल्म निर्माण से जुड़ल रहनी. ओहसे पहिले ईटीवी, अमर उजाला दैनिक अखबार, दैनिक जागरण वगैरह से जुड़ल रहनी. हिंदी अंगरेजी आ भोजपुरी के जानकार सुधीर सिंह वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से वनस्पतिशास्त्र में एमएससी कइले बानी.
आजुकाल्हु बनारस से प्रकाशित दैनिक अखबार फास्ट न्यूज इंडिया के चीफ एडीटर बानी.

कब सुधरी भोजपुरी फिल्मउ़द्योग ?

खास करि के नवहियन खातिर बनावल भोजुपरी फिल्म ‘राजा जी’ के बिहार आ मुंबई में बंपर ओपनिंग मिलल बा. एह फिल्म के बिहार के 55 गो आ मुंबई के 32 गो सिनेमाघर में रिलीज कइल गइल.

पिछला महीना भोजुपरी के महानायक मनोज तिवारी के फिल्म ‘भईया हमार दयावान’ बिहार में 22 गो सिनेमाघर में रिलीज कइल गइल रहे त दिनेशलाल यादव के फिल्म ‘विदेसिया’ 20 गो सिनेमाघर में. आजु के नयका स्टार खेसारी लाल यादव के जान तेरे नाम 40 गो सिनेमाघर में रिलीज भइल रहे, आ मनोज पाण्डेय के फिल्म ‘राजा जी’ 55 गो सिनेमाघर में रिलीज भइल. देखल जाव त अब दू गो पुरनका स्टारन के समय उतार पर बा आ उनुकर जगह लेबे मनोज पाण्डेय आ खेसारी लाल यादव आ गइल बाड़े. अब मनोज तिवारी आ दिनेश लाल यादव बड़का अभिनेता त हइये ह लोग बाकिर ओह लोग के फिल्म अब चलत नइखे. फेर निर्माता ओह लोग के फिलिम देत काहे बाड़ें ? हमरा मालूम नइखे. हँ अतना जरूर कहब कि फिलिम बनावे से पहिले बिहार आ मुंबई के वितरकन से जरूर पूछे के चाहीं कि केकरा के लेके फिलिम बनाईं ? बहरहाल ! रवि किशन त भोजपुरी फिलिम छोड़िये दिहले बाड़न काहे कि उनुका अब भोजपुरी फिलिम मिलते नइखे. ऊ आजु काल्हु हिन्दी फिलिमन में आपन ठौर खोजत बाड़े. आखिर काहे ना खोजसु ? भोजपुरी निर्माता-निर्देशक पूछत नइखन. आजु भोजपुरी इंडस्ट्री में अनेके नया अभिनेता आ गइल बाड़े. एह लोग के अइला से भोजपुरी सिनेमा के बाजार अउरी उपर उठी. हँ अतना जरूर कहब कि अगर भोजपुरी सिनेमा के आगे बढ़त देखे के बा त आपन दाम सोच समुझ के लगावें लोग ना त ऊ फेरु पटा जाई.

पवन सिंह, विराज भट्ट, विनय आनंद, सुदीप पाण्डेय, पंकज केसरी, शुभम तिवारी, विक्रांत सिंह, कलुआ, प्रवेश लाल, धीरज पण्डित, विजयलाल यादव, अविनाश शाही जइसन अनेके अभिनेता बाड़ें जिनकर फिलिम खरीदला से शायद भोजपुरी इंडस्ट्री आ फिल्म वितरकन के समय बदल सकी. काहे कि एह लोग के कम दाम पर ले के निकहा बिजनेस कइल जा सकेला. जानत बानी कि ई लेख पढ़ के अनेके लोग हमरा के गरियावत होई. बाकिर का करीं, हमार कलम बिकाऊ नइखे.

हम सगरी निर्माता-निर्देशकन से निहोरा करब कि एह स्टारन के दाम पर काबू राखल जाव जेहसे निर्माता आपन अगिलो फिलिम बनावे के सोच सकसु. एह साल जतना बड़की भोजपुरी फिलिम रिलीज भइली सभकर बिजनेस टेबल पर बढ़िया ना रहला से सगरी निर्माता दुखी बाड़ें. हम त अपना बड़का निर्माता लोगन, अभय सिन्हा, दुर्गा प्रसाद, अनूप जलोटा, आलोक कुमार, रामाकांत प्रसाद, जितेश दुबे, डॉ. सुनील कुमार, दिलीप जायसवाल, राजकुमार आर पाण्डेय, हरीश गुप्ता, जे. पी. सिंह, टी. पी. अग्रवाल वगैरह सभे से पूछब कि कहे क त रउरा लोग कह दिहिलें कि फिलम सुपरहिट बा बाकिर का साचहू रउरा आपन लागत निकाल पाइलें ?


(संजय भूषण पटियाला के रपट)

भोजपुरिया शहंशाह रवि किशन के दस साल के फिल्मी सफरनामा

साल १९६२ में पटना में जब पहिलका भोजपुरी फिलिम “गंगा मईया तोहके पियरी चढ़इबो” के मुहूर्त भइल रहे तब केहू ना सोचले रहुवे कि एक दिन उ छोटहन पौधा बड़हन वट वृक्ष बन जाई जवना का छाँह में लाखों लोग आपन परिवार चलाई. साल १९६२ से २००१ ले भोजपुरी फिलिमन के बने के दौरा जारी रहल. ओह दौर में बहुते निमन निमन पारिवारिक फिलिम बनली सँ बाकिर दू हाली अइसन भइल जब फिलिमन के बने में लमहर लमहर खालीपन आ गइल. हँ, बीच बीच में जरूर कुछ इक्का दुक्का फिलिम आपन मौजूदगी दर्ज करावत रहली सँ.

साल २००२ के अप्रैल महीना में पहिलका भोजपुरी फिल्म बनावे वाला विश्वनाथ शाहाबादी के भगीना मोहनजी प्रसाद हिन्दी फिलिमन में निमन ब्रेक खोजे का जुगाड़ में बँवड़ात एगो जौनपुरिया छोरा रवि किशन के अपना फिलिम “सैयां हमार” खातिर साइन कइले आ एही फिलिम से सिनेमा भोजपुरी के तिसरका दौर के शुरुआत भइल. जवन स्वर्ण युग बन गइल सिनेमा भोजपुरी खातिर. कुछेके लाख में बनल ई फिलिम निकहा बिजनेस कइलस आ एहीजे उदय भइल एगो नया सितारा रवि किशन के आ शुरू भइल एगो नया दौर जवन आजु ले जारी बा.

मोहन जी प्रसाद अउर रवि किशन के जोड़ी लगातार चार गो हिट फिलिम देके सिनेमा भोजपुरी के दशे दिशा बदल दिहलसि. फेर त जइसे कि बाढ़ आ गइल. अनेके निर्माता निर्देशकों भोजपुरी फिल्म जगत ओरी रुख कर लिहलन. आजु अगर हर साल पचासो गो ले अधिका भोजपुरी फिलिम बनत बाड़ी सँ त एकर श्रेय जौनपुरिया छोरा रविओ किशन के जा ता.

१७ जुलाई १९७१ के जौनपुर के केराकत तहसील के एगो छोटहन गाँव विसुई के पंडित श्याम नारायण शुक्ला आ ज़डावती देवी का घरे गूजल किलकारी रहे रविन्द्र नाथ शुक्ला माने कि आजु के रवि किशन के. बचपने से कलाकारी प्रवृति के रवि किशन के मन पढाई लिखाई में कम नाचे अभिनय करे में अधिका लागत रहे. मासूम सूरत वाला रवि तब हर साल अपना गाँव में होखे वाला रामलील में शामिल होखे लगलन आ उहो सीता मईया के रोल में. महतारी के डांट आ बाबूजी के पिटाईओ रवि किशन के ई अभिनय मोह ना छोड़ा पवलसि आ आखिर में साल १९९० में उ मुंबई आ गइलन. ओह समय मुंबई के बांद्रा के बाज़ार रोड में दूध के एगो छोट दुकान होखत रहे रवि किशन के. दुकान सम्हारतो खाली समय में फिल्म स्टूडियो के चक्कर लगावल जारी रखलन रवि किशन.

संघर्ष यात्रा

आजु का दौर में कवनो गँवई कलाकार के ओतना संघर्ष ना करे पड़ेला काहे कि अब छोटको परदा हाजिर बा मौका देबे खातिर. बाकिर तब एक मात्र माध्यम सिनेमे रहल से संघर्षो मजगर करे के पड़त रहे. जुनूनी रवि किशन हिम्मत ना हरलन. एह स्टूडियो से ओह स्टूडियो के चक्कर लगावत रहसु रवि किशन. जवने निर्माता निर्देशक से मिलसु ऊ इहे कहे कि तू मिथुन दा के डुप्लीकेट लागत बाड़ऽ. आखिरकार मेहनत रंग लगवलसि आ उधार के जिनिगी में उनुका पहिला मौका मिलल जीतेंद्र का साथे. एह फिल्म में काजोल मुख्य अभिनेत्री रहली. रवि किशन के पहिला शोट जीतेंद्रे का साथ रहल. डेराइल सहमल बाकिर कुछ कर देखावे के तमन्ना रखले रवि आपन पहिला शॉट दिहलन. जीतेन्द्र उनुकर तारीफ कइलें त रविकिशन के कुछ हौसला बढ़ल. फेर रवि किशन के टुकुर टाकुर काम मिले लागल बाकिर अपना भूमिका से ऊ खुश ना रहले. दस साल ले रवि किशन बढ़िया किरदार खातिर आपन संघर्ष जारी रखलन. साल २००० में उनुका छोटका परदा पर हवाएं अउर हेल्लो इन्स्पेक्टर धारावाहिकन में काम करे क मौका मिलल. एह धारावाहिकन से उनुकर आमदनी त बढ़ गइल बाकिर बड़का परदा पर आवे क ललक कायम रहल.

भोजपुरी का सफ़र

एगो शूटिंग में रवि किशन के भेंट चरित्र अभिनेता बृजेश त्रिपाठी से भइल. बृजेश त्रिपाठी अनेके हिंदी आ भोजपुरी फिलिमन में काम कर चुकल रहले आ भोजपुरी परिवेश के अनेके हिंदी फिल्म बना चुकल निर्देशक मोहन जी प्रसाद के बहुते करीबी रहले. मोहन जी प्रसाद तब एगो भोजपुरी फिलिम के योजना बनावत रहले आ एगो हीरो के तलाश में रहलें. एह तलाश के जिम्मा ऊ बृजेश त्रिपाठी के लगवले रहले. बृजेश जब रवि किशन से ओह फिलिम में काम करे के प्रस्ताव रखले त रविकिशन तुरते हामी भर दिहलन आ ओही रात ११ बजे दुनु जने मोहन जी प्रसाद के बांद्रा आवास पहुचले. मोहन जी रवि किशन के देखते सगुन के एगारह हजार रुपिया दिहलें. फिलिम के शूटिंग बिहार में भइल आ फिलिम हिटे ना जबरदस्त हिट भइल. एह फिल्म में मिथुनो दा मेहमान भूमिका में रहले. एह फिल्म क बाद मोहन जी प्रसाद लगातार चार गो फिलिम रवि किशन के साथे बनवले आ चारो हिट रहल. उनुकर चउथी फिलिम रहुवे “पंडित जी बताईं ना बियाह कब होई” जवना में रवि किशन के नायिका रहली नगमा. ई फिलिम सफलता के इतिहास रच दिहलसि. फेर त अनेके निर्माता-निर्देशक भोजपुरी सिनेमा का ओर देखे लगलन. मुंबई में मजदूरन के भाषा कहाए वाली भोजपुरी के सम्मान दिलावे ला रवि किशन बहुते मेहनत कइलन. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन होखसु भा शाहरुख खान, रवि किशन सगरी बड़का सितारन के कवनो ना कवनो माध्यम से भोजपुरी से जोड़लन. अमिताभ बच्चन त भोजपुरी फिलिमन में पहिलहु काम कइले रहलन जबकि शाहरुख़ खान दू बेर रवि किशन के फिल्म के कार्यक्रम में आके भोजपुरी के मीडिया में जगहा दिअवले. ओह घरी हिंदी के पत्र पत्रिको भोजपुरी से मूह फेरले रहत रहुवे. रवि किशन अखबारन का दफ्तर में जा जा के भोजपुरी के जम के वकालत कइले. . टीवी चैनलनो पर भोजपुरी के प्रमुखता मिले लालग आ आजु पब्लिसिटी का मामिला में भोजपुरी कवनो भाषाई फिलिमन से कमतर नइखे. सिनेमा भोजपुरी के इतिहास दू बेर अइसन दौर आइल रहुवे जब फिलिम बनल बंद हो गइल रहीं सँ. रवि किशन के एकर एहसास रहल एह से ऊ कवनो मौका ना चूके चाहस. रहल सहल कमी भोजपुरी के गायकन के अभिनय में उतरला से पूरा हो गइल. रवि किशन के अनेके फिलिमन के शूटिंग विदेशन में भइल. उदित नारायण के रवि किशन अभिनीत फिल्म “कब होई गवना हमार” ले राष्ट्रीय पुरस्कारो से सम्मानित कइल गइल. भोजपुरी के लोकप्रियता देखत भोजपुरी फिल्म अवार्डो के शुरुआत हो गइल. .

बडकी कंपनियन के ले आवे के श्रेय

रवि किशन अनेके बड़की कंपनियन के भोजपुरी में ले अइलें. इंडो अमेरिकन कंपनी पन फिल्म्स होखो भा भारत के महिंद्रा एंड महिंदा, भा दक्खिन भारत के अल्टुरा फिल्म्स. सबमें रविकिशन मौजूद रहले. पन फिल्म्स के पहिला फिल्म “जरा देब दुनिया तोहरा प्यार में” के त प्रतिष्ठित कांस फिल्म समारोह में इन्डियन फिल्म पवेलियन में प्रदर्शितो करे के मौका मिलल. महिंद्रा एंड महिंदा रवि किशन का साथे एगो बड़हन बजट के फिल्म “हम बाहुबली” बनवलसि. दिलीप कुमार जब फिल्म बनावल शुरू कइलन त रवि किशन क साथे फिलिम बनवले. फिलहाल तेलगु के सबसे बड़की कंपनी ए.के. इंटरटेनमेंट आ १४ रील फिल्म्स के सहयोगी कंपनी अल्टुरा फिल्म्स रवि किशन का साथे “रणवीर” बनावत बिया. रवि किशन अनेके कोर्पोरेट कंपनियन के अपना ओर खींचलन आ एह अवधारणा के जनम दिहलन कि ऊ हिंदी के कवनो बड़का स्टार से कम नइखन तबहिये त डाबर, थम्स अप, निहार तेल समेत २२ गो बड़की कंपनी उनुका के बिहार अउर उत्तर प्रदेश में आपन ब्रांड अम्बेसडर बनवले बाड़ी सँ.

अवार्ड अउर सम्मान

सिनेमा भोजपुरी में एवार्ड के बात आवे त रवि किशन का सोझा दूर दूर ले केहू ना टिके. भोजपुरी सिनेमा के अबहीं ले कुल नौ गो अवार्ड समारोह भइल बा जवना में छह बेर नंबर वन के खिताब रवि किशन का नामे रहल. एकरा अलावे ऊ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह, दिल्ली के मुख्यमंत्री शीला दीक्षित समेत अनेके सम्मानीत लोगन से पुरस्कृत भइल बाड़े.

हिंदी में भोजपुरिया चेहरा

हाल ही में हिंदी फिल्म “एजेंट विनोद” के समीक्षा में एगो बड़का समीक्षक लिखलन कि रवि किशन भलही हिंदी सिनेमा में भोजपुरिया चेहरा कहल जालें बाकिर इहो साँच बा कि आजु ऊ हिंदी के बड़की फिलिमन के जरूरी हिस्सा बन गइल बाड़न. हिंदी के दिग्गज अपना फिलिमन में रवि किशन खातिर रोल लिखवावे लागल बाड़े. श्याम बेनेगल के “वेलकम टू सज्जनपुर”, “वेल डन अब्बा” आ एगो अनाम निर्माणाधीन फिल्म में रवि किशन काम करत बाड़न. मणिरत्नम के “रा वन” अउर सोहम शाह के “लक” में रवि किशन अपना अभिनय से सभकर दिल जीतले बाड़न, आजु उनुका लगे नाहियो त एक दर्जन से अधिका हिंदी फिलिम बाड़ी सँ जवना में विक्रम भट्ट क “डेंजरस इश्क”, विनोद बच्चन क “जिला गाज़ियाबाद”, “इशक”, “जीना है तो ठोक डाल”, अउर अष्टविनायक के दू गो अनाम फिलिम शामिल बाड़ी सँ.

मौजूदा दौर

मौजूदो दौर में रवि किशन बढ़िया फिल्मकारन के पहिला पसंद होखेलें. दयाल निहलानी जइसन बड़का निर्देशक के पहिला भोजपुरी फिल्म होखो भा दक्खिन के बड़का निर्माता के पहिला भोजपुरी फिल्म “रणवीर” सबमें रविकिशन शामिल बाड़े. रवि किशन का लगे भोजपुरी फिलिमन के लमहर कतार मौजूद बा. बिना कवनो ब्रेक लगातार शूटिंग करत रहे वाला रवि किशन सिरिफ भोजपुरीए आ हिंदी ना, बलुक मराठी, बंगला आ दक्खिन भारतीय फिलिमनो में काम करत बाड़े. कवनो भोजपुरी अभिनेता ला ई बड़का उपलब्धिए मानल जाई कि एगो हिंदी फिल्म में उनुकर छोटहन रोलो देखि के आमिर खान आ शाहरुख खान जइसन अभिनेता उनुका के बधाई दिहलें. दिलीप कुमार से लिहले आज के सगरी बड़का सितारन का साथे काम कर चुकल रविकिशन जल्दिये आमिर खान के एगो होम प्रोडक्शन फिलिमो में नजर आवे वाला बाड़न.

कुल मिला के इहे कहल जा सकेला कि रवि किशन अपना अभिनय के लोहा त मनववलही बाड़न, उनुका प्रयासे से आजु भोजपुरीओ सिनेमा के दायरा बिहार यूपी के सीवान लाँघत विदेसन ले पसर गइल बा. फिल्मो ने अपना दायरा बिहार उत्तर प्रदेश की सीमा को लांघ कर देश विशेष में भी फ़ैल गया है.


(उदय भगत के रपट)

मल्टीप्लेक्स में देखावल जाव भोजपुरी फिलिम – मनोज तिवारी

भोजपुरी सिनेमा के सुपर स्टार आ गायक मनोज तिवारी बिहार, यूपी आ झारखंड सरकारन से मांग कइले बाड़न कि जइसे महाराष्ट्र के मल्टीप्लैक्सन में रोजाना मराठी फिलिमन के एक शो देखावल जरूरी होला वइसही उत्तर प्रदेश, बिहार आ झारखंड के मल्टीप्लैक्सनो में भोजपुरी फिलिमन के एक शो जरूरी बना देबे के चाहीं.

मनोज तिवारी बतवले कि भोजपुरी फिलिमन के अधिकतर निर्माता अबही गैर भोजपुरी बाड़े जवना से एह संस्कृति के वास्तविक तस्वीर नइखे परोसल जात. एह राज्यन के सरकारन के चाहीं कि भोजपुरी फिलिमन खातिर राज्य स्तर पर अलगा सेंसर बोर्ड बनावे. अपना बेबाक अंदाज में मनोज तिवारी कहलन कि देश में भोजपुरी बोले वालन के गिनिती बहुते बा बाकिर ओहमें से थोड़के लोग ई फिलिम देखे चहुँपेला. एकर एगो बड़हन कारण ई बा कि मल्टीप्लेक्सन में भोजपुरी फिलिम नइखे देखावल जात आ मध्य आ उच्च वर्ग के दर्शक एह चलते भोजपुरी सिनेमा देखे नइखन आवत.


(शशिकांत सिंह के रपट से)

दास कबीर जतन से ओढ़ी जस की तस धर दीन्हि चदरिया

समयाभाव का चलते तय कइल गइल बा कि फिल्म से जुड़ल खबर जल्दी से रउरा सभ का सोझा परोसे खातिर अनुवाद में लागे वाला समय से बाचल जाव.
एह चलते अब से फिल्म से जुड़ल खबर एह पन्ना पर दिहल जाई.

भोजपुरी फिलिमन के प्रस्तुतिकरण के खुश नइखन मनोज तिवारी

एक कहावत ह चमत्कार के नमस्कार! इहो कहल जाला कि चमत्कार रोज-रोज ना होले. अइसने एगो चमत्कार भइल रहे साल 2004 में जब ‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ बनल. ओह समय भोजपुरी में फिलिम बनत रहली सँ बाकिर ओतना ना जतना आजु बनत बा. एगो नाम रहल मनोज तिवारी ‘मृदुल’के जिनकर लोक गायक का रूप में श्रोता आ दर्शकन का बीच पहिचान रहे आ एही पहिचान के फिल्म में डाले के प्रयोग कइलन निर्माता सुधाकर पाण्डे आर निर्देशक अजय सिन्हा. प्रयोग सफल रहल आ लोकगायिकी के स्टार भोजपुरी सिनेमा के स्टार बन गइल. फेर त भोजपुरी सिनेमा में स्टार सिस्टमे शुरु हो गइल. एही चमत्कारी अभिनेता मनोज तिवारी से उनुकर हालिया फिल्म इंसाफ आ भोजपुरी सिनेमा के दशा-दिशा पर भइल खास मुलाकात के कुछ अंश एहिजा दिहल जात बा –

मनोज जी, एह साल राउर एगो बड़हन फिल्म ‘इंसाफ़’ आवेवाली बा. एकर कथावस्तु का बा आ एकरा से राउर उम्मीद का बा ?

‘इंसाफ’ कहानी ह न्याय के. न्याय से जुड़ल बहुते मुद्दा एहमें उठावल गइल बा. फिल्म में हम आ पवन सिंह पंच के बेटा बनल बानी बाकिर सगा भाई ना हईं जा. पंच का कुर्सी पर बइठला का बाद सगरी कर्तव्य अउर फर्ज के परीक्षा होत रहत बा.

आप सबले बेसी फिल्म अभय सिन्हा के कइले बानी. एगर हम गलत नइखिं त ‘इंसाफ’ उनुका साथ राउर नौवां फिल्म ह, कवनो एक निर्माता का साथ अतना फिल्म कइसे कर पवनी ?

अभय सिन्हा खातिर हमरा मन में बहुते इज्ज़त बा. उनुकर बाते हमरा ला एग्रीमेंट हो जाला. ऊ हमेशा कुछ नया कइल चाहेलें. उनुका फिल्म माध्यम के समुझ बा. पुरा इंडस्ट्री उनुका में रचल-बसल बा. फिल्म निर्माण से लेके वितरण ले सगरी बारीकियन से ऊ वाकिफ बाड़े. उनुका साथ काम करे के मतलब होला कि फिलिम बनी , बढ़िया बनी आ समय पर रिलीजो हो जाई.

आपके एह फिल्म ‘इंसाफ’ के कहीं त एगो नया निर्देशक अजय श्रीवास्तव निर्देशित कइले बाड़न. कइसन लागल उनुका निर्देशन में काम करि के?

अजय श्रीवास्तव नया जरूर बाड़े बाकिर अनाड़ी ना. उनुका सिनेमा के समझ बा. कइसे बढ़िया फिलिम बनावल जाला ई उनुका आवेला. उनुका साथ काम करि के बहुते बढ़िया लागल. ‘इंसाफ’ से पहिले उनुकर निर्देशित ‘हो गइनी तोहरे प्यार में’ अउर ‘नथुनिया पे गोली मारे’ बहुते बढ़िया बिजनेस कर चुकल बाड़ी सँ.

भोजपुरी सिनेमा के वर्तमान दौर के सुपर स्टारन के बात कइळ जाव त गायक से नायक बनल सितारन के अधिका सफनता मिलल बा. अइसन काहे ?

दरअसल, गायक से नायक बनला सितारा पहिलही से स्टार होखेले. ऊ दर्शकन खातिर नया ना होलें. पहिलहीं से ऊ उनुका मन में अपना गायकी आ अलबम का जरिये बसल होले. आ जब फिल्म में आवेलें त अपना स्टार के सिनेमा के बड़ला परदा पर देखे के ललक फिल्म के सफल बना देले. हम दिनेश जी, पवन जी आ अब खेसारी लाल जी सबही एही श्रेणी में आइलाँ. फिलिमन से आवे से पहिले हमनी का अनजान ना रहीं जा. हमनी के क्रेज मौजूद रहे. हम त कहब कि फिलिमन में अइला का बाद हमनी के हैसियत कम हो जाले, स्टारडम में कमी आ जाले.

आप सबसे अधिका सहज कवना नायकन का साथ महसूस करीलें ?

देखीं, हम दिनेश जी अउर पवन जी का साथे बेसी सहज महसूस करीलें. दुनु सहज सहज अभिनेता हउवें, अपना चरित्र के बखूबी समुझेले आ कहानी के मांग अउर किरदार के विशेषता ध्यान में राखत चरित्र के जियेलें. रवि किशन जी का साथ काम करे में असहज लागेला. ऊ चरित्र के परदा पर ना जियसु, बलुक रविए किशन के जीए के कोशिश करेले आ एहसे साथी कलाकार आ निर्देशक असहज हो जालें.

भोजपुरी फिल्म बनत 50 साल हो गइल बाकिर अबही ले कवनो ऐतिहासिक फिल्म ना बनल. एकर कारण का हो सकेला ?

अभय सिन्हा ना चाहसु ! जे दिन चाह लीहें ओही दिने बनि जाई. असल में ऐतिहासिक फिल्म बनावला आसान ना होखे. इतिहास के वातावरण बनावे खातिर शोध करे पड़ेला, ओह माहौल के फिल्मावे खातिर बड़हन बजट चाहेला. आ अधिकतर निर्माता का लगे अइसन इन्फ्रास्ट्रक्चर नइखे. हम त इहे जानीला कि भोजपुरी सिनेमा में अगर केहू सक्षम निर्माता बा जे ऐतिहासिक फिल्म बना सकेला त ऊ सिर्फ अभय सिन्हा हउवें. एही से कहनी कि ऊ ना चाहसु एहसे ना बनल !

भोजपुरी फिल्मों में गीत-संगीत का बहुत महत्व होला. ‘इंसाफ’ में गीत-संगीत कइसन बा ?

एह फिल्म के गीत-संगीत पर बहुत बारीकी से ध्यान दिहल गइल बा. संगीत बहुते बढ़िया बनल बा, एहमें हमार गावल तीन गो गीत बाड़ी सँ.

आप भोजपुरी के महानायक हईं. अपना पहिला फिल्म ‘ससुरा बड़ा पईसावाला’ से इंडस्ट्री के नया जिनिगी दिहनी. का आप भोजपुरी फिलिमन के मौजूदा दशा दिशा से संतुष्ट बानी ?

ना, पूरी तरह संतुष्ट नइखीं. कथा आ प्रस्तुतिकरण से संतुष्ट नइखीं. आजु अधिकतर फिलिम सेक्स का आसपास घूमत बाड़ी सँ एहसे ओकनी के मास अपील कम हो जाता. हमनी का अपना फिलिमन से दर्शकन के बढ़िया फिलिम देखे खातिर प्रेरित ना करीं बलुक ओह लोग के यौन पिपासा शांत करे के माध्यम बन गइल बानी. अगर दोसरा क्षेत्रीय, खास कर के मराठी फिलिमन के बात करीं, त ऊ बढ़िया फिलिम बना के दर्शकन के टेस्ट बदले के काम कइले बाड़ी सँ. मराठी दर्शकन में क्लासिक फिल्म देखे के चस्का लाग गइल बा, जबकि पहिले मराठीओ में वइसने फिलिम बनत रहली सँ जइसन आझु भोजपुरी में बनत बा. तब के मशहूर मराठी फिल्मकार रहलें दादा कोंडके. सही बा कि उनुकर सगरी फिल्म सफल रहली सँ बाकिर बाद में बनल मराठी के संवेदनशील फिलिमो के दर्शक अपनवलें. हँ, एक बात जरुर बा कि हम एह खातिर संतुष्ट बानी कि अब भोजपुरी फिल्मोद्योग बंद ना होई, भोजपुरी भाषा-भाषियन के बहुते पसराव भइल बा. ओहल लोग के मौजूदगी अखिल भारतीय बन गइळ बा. आ अपना परिवार से अलगा भइल लोग में अपनन से जुड़े के माध्यम बन गइल बा भोजपुरी सिनेमा.

आप स्टार हईं. स्टार के दखल सिनेमा के हर क्षेत्र में होखेला. ऊ कंटेंटो बदलवा सकेलें. अइसना में आप कवनो कोशिश काहे ना करीं ?

ना, एहमें हमनी के बेसी ना चले. हमनी का महज अभिनेता हईं जा. हमहन के जवन किरदार दिहल जाला ओकरा के बढ़िया से निभा दिहल हमनी के कर्तव्य होला. हँ कभी-कभार कुछ सलाह ज़रूर दिहिला सँ लेकिन ओकरा के मानल आ ओकरा पर अमल कइल निर्देशकन पर निर्भर करेला. काहे कि सिनेमा निर्देशक के माध्यम होला, उहे ‘कैप्टन ऑफ दी शिप’ होला.

हाल का दिन में आपके फिलिम बढ़िया व्यवसाय ना कइली सँ. का कारण रहे ?

अइसन नइखे. पिछला साल हमार फिल्म ‘रणभूमि’ सफल रहल. एक बात अउर. हमार फिल्म बढ़िया बनल बाड़ी सँ आ कालांतर में ओकनिये के याद राखल जाई आ देखल जाई. जहां ले हिट आ फ्लॉप के गणित बा त ई इण्डस्ट्री झूठ पर टिकल बिया, सात-आठ लोग के टीम बा जे मिल के इंटरनेट पर फिलिमन के हिट भा फ्लॉप करावत रहेलें. मुंबई में बइठ के ब्रांड ना बनावल जा सके. भोजपुरी इलाकन में जाईं त पता चली कि ब्रांड वैल्यू का ह ? आप कहत बानी कि हमार फिल्म असफल रहल बाड़ी सँ. अगर अइसन रहीत त हमरा शोज ना मिलीत. हम गायक हईं, आजुओ हमरा लगे शोज के भरमार बा, हमार शोज मंहगा बिकात बा. मार्केट में हमार क्रेज बा, बड़हन-बड़हन बात कइला से इण्डस्ट्री बड़हन ना हो जाले. जे लोग अइसन करत बा ओह लोग के ज़मीनी हक़ीक़त पहिचाने के चाहीं.

आपके आवेवाली फिल्मन कवन-कवन बाड़ी सँ ?

कई गो फिल्म बाड़ीं सँ. सबसे पहिले त ‘इंसाफ’ आई. ‘अंधा कानून’ लगभग पूरा होखेवाली बा. ‘ऐलान बा’, ‘यादव पान भंडार’ अउर ‘भईया हमार दयावान’ बा. दोसरो फिलिमन पर काम शुरु हो चुकल बा. एगो हिन्दीओ फिलिम साइन कइले बानी. एकरा बारे में बाद में बताएब. एह साल आप सभ के हमरा अभिनय से सजल बढ़िया-बढ़िया फिल्म देखे के मिली.


(स्रोत : शशिकांत सिंह)

डॉ.अब्दुल कलाम कइलन "भोजपुरी सिनेमा के पचास साल" के विमोचन

कुलदीप श्रीवास्तव के लिखल हिन्दी किताब ‘भोजपुरी सिनेमा के पचास साल : २५ चर्चित फिल्में’ के विमोचन पिछला दिने दिल्ली के हिंदी भवन का सभागार में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का हाथे भइल. एह किताब में भोजपुरी सिनेमा के पचास साल के सफ़रनामा पर चर्चा कइल गइल बा. एह में १९३१-३२ में कुछ हिंदी फिल्मन में भोजपुरी गानन के शुरुआत, १९४८ में दिलीप कुमार के फिल्म ‘नदिया के पार’ में ८ गो गाना आ जे सभ भोजपुरी में रहे ओकरो जिकिर कइल गइल बा. एकरा अलावे १९६१ में जब पहिला भोजपुरी फिलिम ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’, आ ओकरा बाद लागी नाही छूटे राम, धरती मईया, बिदेसिया, बलम परदेसिया, दगाबाज़ बलमा सहित कुल २५ चर्चित फिल्मन के विस्तार से वर्णन बा, जे भोजपुरी सिनेमा के ५० साल के इतिहास में आपन अमिट छाप छोड़ले बा.

कुलदीप श्रीवास्तव के लिखल एह किताब में भोजपुरी सिनेमा के असली रूप समेटल गइल बा आ एह धारणा के कि भोजपुरी फिल्मन में खाली फूहड़पन होला, झूठ ठहरावल गइल बा. लेखक एह किताब का जरिये कहले बाड़न कि भोजपुरी फिलिम अपना शुरुआते से समाज में बढ़िया सनेश देत आइल बा.

भोजपुरी सिनेमा के मिलल कमाई के नया रास्ता

भोजपुरी सिनेमा के कमाई के अब एगो नया रास्ता मिल गइल आ ई रास्ता बनवलसि ए॰सी॰सी॰ डिजिटल प्रा॰लि॰ जे अपना फिलिम “रंगबाज” के प्रोमोशनल वीडियो एयरटेल के थ्रीजी मोबाइल सेवा पर डलले बा आ एह वीडियो में “लच लच लचके कमरिया जोबना मारे उफान” समेत एह फिल्म के सगरी गाना शामिल बा. एह प्रोमो में असली “रंगबाज” हैदर काजमी आ रानी चटर्जी के जलवा यूपी बिहार के लोग के बहुते पसन्द आ रहल बा.
“रंगबाज” के एह प्रोमोशनल वीडियो से ओह निर्माता लोग के आँख खुल गइल बा जे एह तरह के प्रोमो वीडियो आ रिंगटोन से होखे वाली मोट कमाई संगित कंमनियन के फोकट में दे देत रहलें. एसीसी डिजिटल मोबाइल रिंग टोन का क्षेत्र में नंबर वन कंपनी मानल जाले एहसे अपना फिल्म “रंगबाज” के जरिये भोजपुरी मोबाइल रिंग टोन का क्षेत्र में शानदार प्रवेश लिहले बिया.
“रंगबाज” के निर्देशक शिवराम यादव के निर्देशित हिन्दी फिल्म “पथ” एगो सुपर डुपर फिल्म रह चुकल बा.


(स्रोत – शशिकान्त सिंह)

उत्तर प्रदेश में धाक जमावत बाड़े संजय पाण्डेय

आजुकाल्हु भोजपुरी सिनेमा के नामी खलनायक आ आजमगढ़िया संजय पाण्डेय अपना माटी आ अपना भाषा भोजपुरिया के परमसुख लेबे में लागल बाड़न. उनका पाँच गो फिल्मन के शूटिंग एह घरी यूपी में चल रहल बा. आजमगढ़ में असलम शेख निर्देशित आ निरहुआ इंटरटेनमेंट के फिल्म “औलाद” के शूटिंग, जौनपुर में नंद किशोर महतो निर्देशित आ निर्माता जे पी सिंह के फिल्म “बजरंग” के शूटिंग, प्रतापगढ़ में “राजा के रानी से प्यार हो गइल” के शूटिंग, गोरखपुर में “कहीं दिया जले कहीं दिल” के शूटिंग आ लखनऊ में “हार न पाई प्यार हमार” के शूटिंग हो रहल बा. संजय पाण्डेय चाहत बाड़न कि असहीं कबो उनुका दर्जन भर फिल्मन के शूटिंग बिहार में होखे कि ऊ एक साल ले बिहारे में रहसु. देखल जाव संजय पाण्डेय के ई तमन्ना कहिया पूरा होत बा.


(स्रोत – शशिकांत सिंह)

अपना दर्शकन के लुभावेली रीतु पांडे


भोजपुरी सिनेमा के हास्य अभिनेत्री रीतू पांडे बहुते कड़ा संघर्ष का बाद एह मंजिल पर चहुँपल बाड़ी. अब उनकर जगहा सुरक्षित हो चुकल बा आ उनुकर कई गो फिल्म सामने आ चुकल बाड़ी सँ. आजमगढ़ के फूलपूर के रहेवाली रीतू पांडे म्यूजिक अलबम से आपन अभिनय के उड़ान शुरु कइली आ गँवे गँवे आगा बढ़त सिनेमा तक आ चहुँपली. कई गो फिल्मन में रीतू पांडे के दमदार किरदार दर्शकन के देखे के मिलल बा. रीतू पांडे भोजपुरी सिनेमा का साथ साथ टीवी सीरियल, जइसे कि “सी आई डी” आ “शक्तिमान”, आ मराठी सिनेमो में सफलता पा चुकल बाड़ी. सिनेमा में दर्शकन के हँसावल आसान ना होला बाकिर रीतू पांडे अपना हास्य अभिनय से दर्शकन के हँसावत हँसावत पेट दर्द करा देली. हालही में रिलीज फिल्म “दिल” में एगो कालेजिया लड़िकी के खूबसूरत किरदार कर के दर्शकन का दिलो दिमाग पर आपन छाप छोड़ दिहले बाड़ी.


(स्रोत – दिनेश चन्दर)