मारवाड़ियन आ ममता में ठन गइल बा

– पाण्डेय हरिराम

पश्चिम बंगाल में एह घरी प्रवासी राजस्थानियन, जिनका के एहिजा मारवाड़ी कहल जाला, आ सरकार में तनाव पैदा हो गइल बा. आमरी अस्पताल कांड में गिरफ्तार निदेशकन का मामिला में फिकी के बयान पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रतिक्रिया से राज्य के मारवाड़ी बहुते नाराज लउकत बाड़े. काहे कि अस्पताल में आग लागे के दुखद घटना क बाद अस्पताल के खाली मारवाड़ीए निदेशकन के गिरफ्तार कइल गइल आ बंगाली निदेशक के कार्रवाई के दायरा से बाहर राखल गइल. हालांकि, एएमआरआई घटना से जुड़ल एह बेतरतीब तरीका से चुन चुन के भइल गिरफ्तारी तय रूप से निंदा करे जोग बा, लेकिन बंगाल में व्यापार आ राजनीति के रिश्तन के बदलती सुभाव के जानल रोचक बा.

याद करीं 60 के दशक जब नक्सलियन के पूंजीवाद विरोधी आंदोलन का दौरान कोलकाता (तब कलकत्ता) के कवनो मारवाड़ी व्यापारी पर हमला ना भइल. 80 के दशक ले खेतान, गोयनका, खेमका, चितलांगिया, कनोडिय़ा अउर कोठारी, लोढ़ा, रुइया आ तोदी बंधु तेजी से आपन व्यापारिक साम्राज्य खड़ा कइल शुरू कर दिहले. एहमें से अधिका औद्योगिक साम्राज्य ओह ब्रिटिश कंपनियन के अधिग्रहण से स्थापित भइल जवना के प्रोमोटर विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम लागू होखला का बाद भारत छोड़ गइलन. अधिनियम लागू होखला का बाद उनुका खातिर अपना भारतीय सहायक इकाईयन में आपन हिस्सेदारी घटावल जरूरी हो गइल रहे. गौर करे वाली बाति ई रहल कि लगातार हड़ताल अउर तालाबंदी का चलते राज्य में ओह समय काम के खराब होखत दिनन के गिनिती बढ़ले जात रहुवे, लेकिन मारवाड़ी समुदाय के तब कवनो परेशानी ना भइल, ना ही ओह लोग के कमाई के बेंवत घटल. जइसे कि, 70 के दशक के आखिर ले जूट उद्योग बड़हन पैमाना पर मारवाडिय़न का हाथन में चल गइल. मजदूरी विवाद में कर्मचारी हड़ताल पर जात रहले आ मिल मालिक अक्सर तालाबंदी के एलान करत गइले. नतीजा भइल कि जूट किसानन के बड़हन नुकसान उठावे पड़ल. अइसन दसियन साल पुरान मामिला पर वैचारिक रूप से सवहारा वर्ग के खैरख्वाह कहाए वाली पार्टियन के ध्यान जाइल चाहत रहे बाकिर ओहु दल के प्रतिनिधि एह मसला के कवनो परवाह ना कइलन.

एकरा बाद पश्चिम बंगाल के राजनीति में बनर्जी के उभरला से बरीसन पुरान समीकरण बहुते बिगड़ल लागल काहे कि उद्योगपतियन के भरोसा वाम मोर्चा पर रहल, उहो लोग अब बंगाल से कदम पीछे खींचे लागल बाड़े. जबसे ममता बनर्जी सत्ता सम्हरली तबसे ऊ उद्योग विरोधी अपना छवि सुधारे के अनेके कोशिश कइली. जवना के सबले ताजा नमूना बंगाल लीड्स हवे. बंगाल लीड्स के परिणाम का बारे में मिलल जानकारी इहे बा कि उद्योगपतियन के एहमें बेसी दिलचस्पी नइखे. एहिजा ई बता दिहल जरूरी बा कि राज्य के वित्तमंत्री अमित मित्रा के ई पद एही से मिलल कि ऊ फिकी के सेक्रेटरी जनरल रह चुकल बाड़े. एहमें कवनो शक नइखे कि फिकी में अबहियो मारवाड़ी समुदाय के उद्योगपतियन के बहुतायत बा. मित्रा बखूबी जानत बाड़न कि ई भारतीय उद्योगपतियन के स्वदेशी मंच होखल करत रहुवे आ ओकर शुरुआत राज मल्टीनेशनल्स के संगठन एसोचेम के मुकाबले जी डी बिड़ला कइले रहले. परंपरा इहे रहल बा कि फिकी के अधिकतर सदस्यन के व्यावसायिक सम्पर्क कोलकाता से रहुवे आ बावे. ई लमहर जुड़ाव साबित करत बा कि बंगाल में बंगाली मारवाड़ी विभाजन ना रहल. इहाँ ले कि चुनाव के पहिले अमित मित्रा कहले रहन कि – ममता जी मारवाड़ी समुदाय के जरूरत, भावना अउर उम्मीदन के बढ़िया से समुझेली अउर हम जानत बानी कि राज्य में पूंजी निवेश कइसे होखी – एही चलते उमेद रहल कि एहिजा एह तरह के सामुदायिक विभेद ना होखी. इहाँ ले कि अमित मित्रा अपना चुनाव प्रचार के दौरान साफ कहले रहन कि एगो अर्थशास्त्री के तौर पर ऊ पिछला कई बरीसन से देखत बाड़न कि एहिजा से पूंजी के पलायन होखत बा आ राज्य के आर्थिक विकास हतोत्साहित होखत बा. अगर हमनी का जल्दिये एह पलायन के रवैया पलटे के कोशिश नइखीं करत त फेर बहुते देर हो जाई आ बाति बिगड़ जाई. लेकिन असलियत कुछ अउरे लउकत बा. हालांकि मारवाड़ी समुदाय का बारें में अकारथ रवैया राखे खातिर बदनाम पहिले के मार्क्सवादी सरकार के लेजेंड मुख्यमंत्री ज्योति बसु के सम्बंध मारवाड़ियन से बढ़िया रहुवे. उनुका बारे में कहात रहे कि सी पी एम के एम के अर्थ मारवाड़ी होला. बाकिर आमरी कांड का बाद ममता बनर्जी के टिप्पणियन से पूरा समुदाय दुख भरल खीस में बा.

ई नाराजगी अतना बा कि शहर के मशहूर औद्योगिक घराना के मुखिया के कहना बा कि ऊ अब एहिजा अउरी पूंजी लगावे का पक्ष में नइखन. जबकि उहे पहिले ममता बनर्जी के हर आयोजन में हाजिर रहत रहले. “बंगाल लीड्स” सम्मेलनो में उद्योगपति बहुते उत्साहित ना लउकले . कई जने बड़का उद्योगपति त लउकबे ना कइले. अनेके बड़का परिवार जे अस्पताल के धंधा में रहले, आपन कारोबार समेटल शुरू कर दिहले बाड़न. आ बहुते अस्पताल बंद होखत बा. शहर के एगो मशहूर अस्पताल श्री विशुद्धानंद अस्पताल के दरवाजा बंद होखला का बाद फेर सरकार के आश्वासन मिलला पर खुलल. लेकिन अनेके बड़का मारवाड़ी परिवार , जे आजादी का बाद से इहवाँ के अर्थव्यवस्था सुधारे में बहुते बड़ योगदान कइले, ऊ अब पूंजी समेटे का चक्कर में बाड़े आ ओहमें से कई लोग त खुल के कहत बा कि ऊ अब एहिजा से कारोबार समेट के गुजरात भा राजस्थान में पूंजी लगइहे. मारूति के प्रबंध निदेशक रहल जगदीश खट्टïर के कहना बा कि आमरी के निदेशकन का खिलाफ जवनो कार्रवाई होखत बा ऊ कानून का हिसाब से होखे के चाहीं ना त एहसे पूंजी निवेश पर असर पड़ी. मौजूदा हालात में मारवाड़ियन का खिलाफ कड़वा शब्दन के इस्तेमाल कइल जात बा. अधिकतर मारवाड़ी कारोबार बढ़ावे के योजना बनवले रहुवन, बाकिर अब उनुकर टटका निवेश थथम गइल बा. कुछ लोग त कंपनी बोर्ड छोडहु पर सोचत बाड़न जहावाँ ऊ अबही स्वतंत्र निदेशक बनल बाड़े.

ममता बनर्जी मैनिकियन (एगो खास तरह के पुरान पंथ जहवाँ निमन आ बाउर के लड़ाई हमेशा चलत रहेला) ब्रांड के राजनीति करे ली, जवना के मतलब बा कि वामपंथ खातिर उनुकर निष्ठुर रवैया हमेशा बरकरार रही. लिहाजा वाम मोर्चे से जुड़ाव के खमियाजा मारवाड़ी समुदायो के झेलही के पड़ी. एएमआरआई त्रासदी से इहे संदेश मिलल बा आ ई देखे के बा कि कवन फरीक एहसे का सीखत बाड़े.
(31 जनवरी 2012)


पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.

देश के आबादी के बड़हन हिस्सा पर मेहरारुवन के शासन

– पाण्डेय हरिराम

देश के मौजूदा मेहरारू मुख्यमंत्रियन में सबले नयकी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पिछला शुक का दिने शपथ लिहली. एकरा साथही देश के आबादी के बड़का हिस्सा पर औरतन के शासन हो गइल. भारत का इतिहास में तेरहवीं सदी में रजिया सुल्तान के शासन का बाद के ई पहिला हालात बा. इंदिरा गाँधी जरुरे लमहर दिन ले भारत के प्रधानमंत्री रहली बाकिर कवनो प्रधानमंत्री के देश के रोजमर्रा के जिनिगी पर ओह तरह के सीधा दखल ना हो पावे जइसन कवनो मुख्यमंत्री के होला. एहसे एह दौर के पाँच गो औरतन, ममता, जयललिता, मायावती, शीला दीक्षित अउर सोनिया गांधी, के रजिया सुल्तान के वारिस कहल जा सकेला. महिला मेहरारूवन के ताकत बढ़ावे के पैरोकारन के ई सब बेशक खुश कर सकेला.

बाकिर जब हमनी का उम्मीद करीले कि बड़का पद पर बेसी औरत आवऽ सँ त एकरा पाछा हमनी के एगो कास तरह के सोच काम करत होला. हमनी का सोचीले जा कि मरदन के राज त बहुत देख लिहल गइल का पता औरतन के राज पहिले से बेहतर होखो. जब ऊ परिवार चलावेली जा त महतारी, बहिन, बेटी भा बीबी होली आ हर रूप में ऊ प्यार बरसावेली. त जब ऊ लोग पी॓एम भा सीएम बनी त अपना राज्य के निगरानी ऊ लोग ओही प्यार आ चिन्ता का साथ करी. पुरुष शासकन के तुलना कबो देवता से ना कइल जाला बाकिर औरत शासकन के देरी ना लागे देवी के छवि ओढ़ लेबे में, हमनी का ओह लोग से उदार शासन के उम्मीद करे लागीला जवना के जिक्र किताबन में होत आइल बा. सत्ता मिलला का बाद मेहरारुवन के कामयाबी के मतलब का होला ? का सियासत भा पावर का दुनिया में मेहरारुवन के अइला से मरद मेहरारू का बीच बरोबरी का अलावहु कुछ बदलेला ? का हमनी का ओह लोग से कुछ अइसने आ बेहतर काम के उम्मीद कर सकीले जवन मरद लीडरन के ना कर पाईं ?

घर परिवार में मरद आ मेहरारुवन के रोल आ बर्ताव में फरक होला काहे कि एकर इंतजाम समाज अतना दिन से करत आइल बा कि संस्कारे बदलि गइल बा. बाकिर ऑफिस में एह बात के कवनो मायने ना होला. लिहाजा सियासतो औरताना भा मरदाना ना होले. सीएम-पीएम चाहे मरद होखें भा ‌औरत, ओह लोग के एके जइसन जिम्मेदारी उठावे के पड़ेला. एहीसे हमनी का देखीला कि ममता बनर्जी, जयललिता, शीला दीक्षित, मायावती आ सोनिया गांधी में कवनो समानता नइखे. सभकर स्टाइल अलग अलग बा आ छविओ. ममता बहुते तेज-तर्रार, लेकिन सादगी पसंद हई, जबकि जयललिता के शाही लाइफ स्टाइल के किस्सा मशहूर ह. उनुका पर करप्शनो के ढेरे इल्जाम बा आ एगो सीएम का रुप में उनुकर कामकाज औसते मानल जाला. शीला स्टाइलिश आ हाई क्लास हई, लेकिन उनुका पड़ोसी मायावती का लगे समय नइखे अइसन शौक में अझुराए के. ऊ अपना बेबाक अंदाज में दलित क्रांति के मसीहा बने पर आमादा बाड़ी. आ आजुकाल्हु त ऊ सोनिया से तीख तकरार में मशगूल बाड़ी जे उनुका के कवनो ना कवनो तरह यूपी के गद्दी से उखाड़ फेंके के ख्वाब देखत बाड़ी.

का ई मेहरारू लोग अपना इलाका में अइसन कुछ कइले बा जवन एगो औरत होखे का चलते उहे लोग कर सकत रहे ? एकर जवाब बा – ना. ममता कइसन सीएम होखिहन ई त आगा चल के पता लागी लेकिन जयललिता भा मायावती के रेकॉर्ड कवनो यादगार नइखे रहल. शीला का जमाना में दिल्ली बहुते तरक्की कइले बा आ ऊ बार-बार इलेक्शन जीतत आवत बाड़ी. लेकिन तबहियो देश के सबसे नामी लीडर्स में उनुका के अबही ना गिनल जाला. जवन हैसियत राजशेखर रेड्डी (मरे से पहिले) आंध्र में, नरेन्द्र मोदी गुजरात में अउर नीतीश कुमार बिहार में बना लिहले, ऊ एह औरतन से बहुते आगा बा आ ई सगरी लोग मरद ह. जइसे नीमन भा बाउर होखल जेंडर से तय ना होखे वइसही नीमन भा बाउर शासक होखे खातिर मरद मेहरारू के फरक जरुरी ना होला. पावर गेम में अगर जेंडर के कवनो मायने बा त कुछ चाल चले का तरीका में होखत होई. पर्सनल स्टाइल के, लोग से बर्ताव में फरक हो सकेला, लेकिन जवनो नतीजा होखे ओह पर जेंडर का ठप्पा ना लाग पाई. लागतो होई त ऊ लउकी ना काहे कि बढ़िया भा खराब फैसला के असर ओहसे नइखे बदले वाला. मसलन मोदी के बढ़िया फैसला गुजरात के औतने भला करी जतना ममता के बढ़िया फैसला बंगाल के.

त रजिया सुल्तान का अरसा बाद मेहरारूवन के मिलल एह कामयाबी के असली मतलब का बा ? सिर्फ अतने कि हमनी का सदियन से चलल आ रहल भेदभाव आ गैरबरोबरी बहरी निकलत बानी जा. जवना मुल्क में मरद आ मेहरारुवन के बीच बरोबरी के सवाल बनल होखे, ओहिजा एतना सगरी औरत सबले ऊंचका ओहदे तक जा पहुंचली – ई बदलत अउर सुधरत भारत के मिसाल बा. साल 1236 में जब इल्तुतमिश अपना नाकारा बेटे के छोड़ के अपना बेटी रजिया के सुल्तान मुकर्रर कइले रहल त ऊ जेंडर का फरक पर काबिलियत के तरजीह दिहले रहल, ऊ अइसनका जमाना में बराबरी खातिर खड़ा होखे के मिसाल रहे जवन दुनिया में कहीं अउर ना देखल गंइल. अतना सदियन का बाद आजुवो जब कवनो औरत अपना सिर पर ताज राखेले त हमनी का बरोबरी के ओह सपना का तरफ एक कदम अउर बढ़ जाइले. बरोबरी का तरफ उठल हर कदम समाज के बेहतर बनावेला. मेहरारूवन के सत्ता में आइल करप्शन भा खराब शासन के अंत ना ह. ई ओह समाज के अंत जरुर ह जवन आखिरकार करप्शन आ खराब शासन जनमावेला.



पाण्डेय हरिराम जी कोलकाता से प्रकाशित होखे वाला लोकप्रिय हिन्दी अखबार “सन्मार्ग” के संपादक हईं आ उहाँ का अपना ब्लॉग पर हिन्दी में लिखल करेनी.