संत तुलसीदास जी

– इं॰ राजेश्वर सिंह

महीना के जवने तिथि के जनमि के, सवा सौ साल से अधिक जियले के बाद, ओही तिथि के आपन देहि तजि के दुनिया से सदा-सदा खातिर चलि जाये वाले विरले लोगन में से तुलसीदास जी एक हउअन. तुलसीदास जी कऽ जनम उत्तरप्रदेश में जिला बॉंदा के गॉंव राजापुर में सम्वत् 1554 के सावन अँजोरिया सतमी, माने कि शुक्ल पक्ष के सप्तमी तिथि, के भइल रहल. उनके बाउ कऽ नाम आत्माराम दूवे अउर माई कऽ नाम हुलसी रहल. कहल जाला की ऊ माई के पेटे में बारह महीना रहले के बाद दुनिया में आइल रहलन जब कि आमतौर से लइका नव-दस महीना बादे माई के पेट से बाहर दुनिया में आ जालन. सगरो लइके जनमते रोवे सुरु कइ देलन लेकिन तुलसीदास जी पइदा होते ‘राम़’ बोल पड़लन. एतने नाही उनके मुहें में बत्तीसो दॉंत रहल अउर कद काठी पॉंच बरिस के लइका नियर रहल. उनके देखते सगरो देखबइया घबरा गइलन. अचरज देखि के सव केहू बाउर भइले के अंदेसा से भरि गइल. उनकर महतारी तीन दिन बादे दसमी के दिन अपने दाई चुनिया के हाथ उनके सौंप के ओहके ससुरारी भेज दिहली अउर अगिले दिन दुनिया छोड़ के स्वर्ग कऽ राहि धइलीं. चुनिया बहुते लाड-पियार से लइका के पलली-पोसली लेकिन पॉंच बरिस कऽ उमर होत-होत उहो दुनिया छोड़ दिहली. लइका अब अनाथ हो गइल.

स्वामी नरहर्यानन्द जी कऽ नजर एह लइका पऽ पड़ल. ऊ एहकर नाम ’रामबोला’ रखि के अपने साथे अयोध्या जी लेके चलि गइलन अउर पाले-पोसे लगलन. स्वामी जी इनके पढाईओ-लिखाई कऽ व्यवस्था कइ दिहलन. तेज बुद्वि कऽ भइले के कारन जल्दिये तमाम विद्या कऽ जानकार हो गइलन. काशी में जाइके बेद-शास्त्रो कऽ भरपूर पढाइ कइ लिहलन. पढाई पूरा कइले के बाद स्वामी जी कऽ आज्ञा लेइके अपने गॉंव राजापुर लवटि पड़लन लेकिन गॉंव में घर-दुआर अउर परिवार कऽ नास हो गइल देखि के दुखी भइलन. गॉंव में अपने परिवार जन कऽ यादगार कायम रखि के रहे लगलन अउर गॉंव बासिन के ’राम-कथा’ सुनावे लगलन. सम्बत् 1583 में रत्नावली नाम के एक सुन्दर-सुशील लइकनी से बिआह हो गइल. रत्नावली बड़ी विद्वान रहली. दूनो जनी सुख से गांव में रहे लगलन. एक बार रत्नावली कऽ भाई उनके अपने साथे माइके लिया के चलि गइलन. रामबोला से वियोग सहि ना गइल. ऊ पीछे लागल ससुरारी चलि गइलन. रत्नावली के उनकर एतना लगाव नींक नाही लागल. ऊ उनके धिक्कारत कहि पड़ली –
अस्थि चर्ममय देह मम, तामे ऐसी प्रीति.
तैसी सो श्री राम मह होत न तब भव भीति..
यानी की हाड़-मास कऽ हमरे देही से जइसन लगाव आप कइले बाड़ी तइसही जे श्री राम जी के पांव से लगवतीं तऽ कल्यान हो जात. एह संसार के भय से छुटकारा मिल जात, मतलब मोक्ष हो जात.

रत्नावली कऽ ई बचन सुनते रामबोला कऽ आंखि खुलि गइल. बोली कऽ एतना असर भइल की ऊ तुरते प्रयाग चलि पड़लन अउर साधुवेष धारन कइ लिहलन. राम भक्ति में आपन पुरहर धियान लगा दिहलन. तीरथ-ब्रत, धियान अउर पूजा-पाठ में लगल रहले से काक भुशुण्डिजी अउर हनुमान जी कऽ दर्शन पवलन. हनुमान जी कऽ आदेश ’रामचरित मानस’ लिखे कऽ पवलन जवने से संत तुलसी दास के नाम से इनकर प्रसिद्धि भइल.

सम्वत् 1631 के रामनवमी के दिन से ऊ ’रामचरित मानस’ कऽ लिखाइ सुरु कइलन, 2 बरिस 7 माह 26 दिन बाद सम्वत् 1633 के माघ अँजोरिया पक्ष में रामविवाह के दिन पूरन कइलन. रामचरितमानस एक अइसन किताब हउए जवना के सगरो हिन्दू बड़े चाव से अपने घरे रखेलन अउर बॉंचेलन. तुलसीदास जी रामचरितमानस के बालकाण्ड में खुदे लिखले बाड़न –
सम्वत् सोलह सौ इकतीसा, करऊँ कथा हिरपद धरि सीसा..

तुलसीदास जी हनुमान जी कऽ दर्शन कइसे पवलन एहकर कहनी एह मतिन सुने के मिलेला –
तुलसीदास जी रोजाना शौच खातिर गंगापार जायें. लवटानी में लोटा में बचल पानी एक पेड़े के जड़ में गिरावत आगे बढि जायं. पानी पवले से पेड़ के हरिआई में कमी ना आवे. ओह पेड़ पऽ एगो प्रेत कऽ बास रहे. प्रेत पानी गिरवले के क्रिया से तुलसीदास जी से प्रसन्न होई के उनके समने प्रकट भइल अउर कहलस कि ’हम तुहसे खुश हईँ तूँ जवन वर चाहऽ तवन हमसे मांग. तुलसीदास जी कहलन की हमके रामजी कऽ दर्शन करा द. प्रेत कहलस की हम ई तऽ ना करा पाइब लेकिन एक उपाय हऽ. हनुमान जी दर्शन करा सकेलन. तुलसीदास जी कहलन की हनुमानजी कइसे मिलिहे? प्रेत बोलल – मन्दिर में रोज साँझे राम कथा होले ओहिजे हनुमान जी नियम से कोढी कऽ भेष बना के आवेलन. कथा सुरु भइले के सबसे पहिले आवेलन अउर समाप्त भइले पऽ सबसे बाद में जालन. ओहीजे जाइके उनही से प्रार्थना करऽ. उहे रामजी कऽ दर्शन करा सकेलन. तुलसीदास जी कथा वाले जगही पऽ पंहुचि के हनुमान जी के गोडे़ पऽ गिर पड़लन अउर दर्शन करावे खातिर प्रार्थना करे लगलन. हनुमान जी कहलन कि चित्रकूट जा. उहवें भगवान श्री रामजी कऽ दर्शन होई. तुलसीदास जी चित्रकूट जा पहुंचलन. जंगल में दुइगो राजकुमार के एक हिरन क पीछा करत देखलन. देखत-देखत राजकुमार आंखि से ओझल हो गइलन. ओहमें से एक सांवर रहलन अउर दूसर गोरहर. आंख से ओझल होते हनुमान जी प्रकट होइ के तुलसीदास जी के बतवलन की दूनो राजकुमारे राम-लक्ष्मण रहलन. तुलसीदास जी बहुत पछिताए लगलन. हनुमान जी धीरज धरवलन अउर कहलन कि पछिता जिन. एकबार फिर दर्शन होई. ओह समय हम इशारा कई के बता देब. सम्वत् 1607 के मौनी अमावस्या के दिन तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पऽ बइठि के चन्दन घिसत रहलन. ओही समय लइका के रुप में भगवान श्री रामचन्द्र जी अइलन अउर चन्दन मांगि के लगावे लगलन. ठीक ओही समय ब्राह्यण कऽ रुप धई के हनुमान जी आइ गइलन अउर गावे लगलन-
चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर.
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रधुबीर..

ई सुनते तुलसीदास जी पहिचान लिहलन अउर भगवान कऽ चरन पकड़ि लिहलन.
नित्य भगवान श्री रामचन्द्र जी कऽ भक्ति में लगल रहले से उनके अन्दर पारलौकिक शक्ति कऽ बढोत्तरी होत रहे. अनेक किताबन कऽ रचना कइलन जवना में रामचरितमानस, कवितावली, दोहावली, गीतावली, विनय पत्रिका, कवित्त रामायण, वरवै रामायण, रामलला नहछू, रामाज्ञा, कृष्णगीतावली, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, राम सतसइ, रामनाममणि, रामशलाका, हनुमान चालिसा, हनुमान बाहुक, संकट मोचन, बैराग्य संदीपनी, कोश मन्जूषा, आदि बहुते चर्चित हउअन. एह काव्यन कऽ रचना कइ के तुलसीदास जी मनइन कऽ बहुते उपकार कइले हउअन जवना से हम सब केहू उनकर ऋणी हईं. सबकर भलाइ करत-करत ऊ एह दुनिया से 126 बरिस के उम्र में सावन अंजोरिया सप्तमी के हमेशा हमेशा खातिर विदा ले लिहलन.

संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर.
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यों शरीर..


इं॰ राजेश्वर सिंह,
मूल निवास – गोपालपुर, गोला, गोरखपुर.
हाल फिलहाल – पटना में बिहार सरकार के वरिष्ठ लोक स्वास्थ्य अभियन्त्रण सलाहकार
उत्तर प्रदेश जल निगम से अधीक्षण अभियंता के पद से साल २०१० में सेवानिवृत
हिंदी में अनेके किताब प्रकाशित, भोजपुरी में “जिनगी क दूब हरियाइल”, आ “कल्यान क जुगति” प्रकाशित. अनेके साहित्यिक आ सांस्कृतिक संस्था से सम्मानित आ संबद्ध.
संपर्क फोन – 09798083163, 09415208520

बदलाव से सहमति

– इं॰ राजेश्वर सिंह

लाली के दर्जा पांच पास कइले के बाद छह से पढ़ाई खातिर दुइ किलोमीटर दूर बनल इन्टर कालेज में जाये के पड़ल. घर से तैयार होइके नव बजे सवेरे घर से निकले के पड़े. काहे से कि पइदले जाये के रहे. कवनो सवारी क साधन ना रहे. गांव टोला-मुहल्ला क अउरो लइकन क साथ मिल गइले से बोलत बतियावत डगर जल्दी से कट जाय. थकान ना लगे, लइका अउर लइकनी सभे केहू साथ रहे. चार बजे छुटटी भइले प भी तमाम लोग एक साथ निकरें अउर अपने-अपने घर की ओर मुड़त साथ छोड़त चलल करें. एहसे लवटतिओ में अकेल ना रहे के पड़े. केहू न केहू साथ रहबे करे. साथिन में केहू कवनो दर्जा में पढ़त रहे त केहू कवनो दर्जा में. दर्जा में घटल एकाध विनोदी घटना क चर्चा केहू न केहू कइ देवे जवना से हॅसी-खुसी क माहौल बन जाइल करे अउर भूख-पियास भा थकान क एहसास ना होखे. हॅंसत-विहसत सब घरे लवटे. एह तरह क बतकही कइले में रमेश क कवनो सानी ना रहे. रमेश दर्जा नव में पढ़त रहलन. ऊ लाली से तीन दर्जा आगे रहलन. जदि अपने से रमेश कवनो चर्चा ना सुरु करें त अउर लइके उनके कुछ कहि के उकसावें कि रमेस भइया काहें चुप बाड़? आज डॉंट पड़ि गइल कि केहू मास्टर पिटाई कइ दिहल? रमेस क चुप्पी टूटे अउर कुछ न कुछ बोले चालू हों जायॅं. बस ट्रान्जिस्टर चालू कइले क देरी रहे, कुछ न कुछ सुनही के मिले. राह कटत देरी ना लगे. रमेस में एगो गुन ईहो रहे कि जदि अपने कुछ सुनवले के मूड में ना रहें त जमात के कवनों न कवनो लइका के छेड़ि के वोहके कुछ बोले खातिर मजबूर कइ दें. जदि एक क बात ओरा जाय् त दूसरे के छेड़ि दें. एह तरह से स्कूल में गइल-आइल जारी रहे अउर एक एक दर्जा पास करत लइका लोग आगे बढ़त गइलन.

लाली गीत-गवंनई गवले में तेज रहली त रमेस चुटकुला सुनवले अउर एकांकी नाटक में चर्चित रहलन जवना से स्कूल में साल भर में मनावे वाले सगरो उत्सव चाहे पन्द्रह अगस्त रहे भा छब्बीस जनवरी, चाहे कवनो नेता क जनम दिन रहे भा स्कूल क सालगिरह सज्जो कुल्हि में ई दुनहुन जने क पूछ रहे अउर कुछ न कुछ हिस्सा लेबही के पड़े. एह कला से स्कूल के लइकन अउर मास्टर लोगन के बीच इन्हन लोगन क खूब पहचान बनल रहे.

किसोरावस्था के दलान में गोड़ रखत के समय लाली हाईस्कूल अउर रमेस इन्टर में पहुंच गइल रहलन. उमर क तकाजा रहे. चढ़ती उमरिया क आकर्षण क असर एह लोगन प होखे लागल. नतीजा ई भइल कि अब ई लोग एक दूसरे क अगोरा कई के सबेरे-साम स्कूले साथ-साथ गइले-अइले के अलावां स्कूल में भी मिलले अउर कुछ देर बतियावले क कोसिस कइल करें. साथी-संघतियन के एकाध बार टोकले से ई लोग लोक-लज्जा के मारे सबके नजर से बचले क कोसिस भी कइल करें जवना से बदनामी तक बात ना पहुंचल. रमेस इन्टर पास कइ के डिग्री कालेज में चल गइलन जवन इन्टर कालेज से तनी हट के रहे. एहसे मिलले जुलले क क्रम कुछ कम हो गइल. लेकिन अन्दर-अन्दर लगाव क कसक बढ़त गइल. चंचल-चपल भइले से रमेस डिग्री कालेज में लइकन क नेता भी हो गइलन जवना से दू-चार गो लइकन से हमेसा घिरल रहें. केहू क कवनों समस्या त केहू क कवनो समस्या. जदि केहू के समस्या क निदान ना करा पावें तब्बो समस्यबा त सुनहि के पड़े अउर कुछ न कुछ आस्वासन देबही के पड़े. समयाभाव भइले से लाली से मिलल-जुलल कम अपने आप हो गइल. जवना से सक-सुबहा क गुंजाइस कम हो गइल लेकिन अन्दरुनी लगाव कम ना भइल. मोबाइल फोन बात-चीत कराके एह लोगन क लगाव कल्ले-कल्ले बढा़वत रहें.

इन्टर कालेज में सालाना खेल-कूद क कार्यक्रम चलत रहे. रमेस भी इन्टर कालेज आइ के लाली से मिललन. दूनो जानी किनरा के थोड़ी एकान्त खोजि के बइठि के बतियावे लगलन. जदपि कि एहर-वोहर ताकि के देखल करें कि केहू देखत भा निगरानी करत त नइखे. लेकिन लाली के पड़ोस में रहे वाली दर्जा नव क पढ़वइया रानी कब एह लोगन के बतियावत देखि लिहलस ई लोग बतकही के सुर में जानि ना पवलन. रानी अपने घर लवटले प कवनो काम से लाली के घर गइल. ऊँहवा बात-बात में लाली अउर रमेस के एकान्त में बइठि के बात कइले क चर्चा उनके महतारी से कइ दिहलस. लाली के महतारी क माथा ठनकल. ऊ सोचे लगली की लइकनी सयान हो गइल बा. अब सादी-बियाह कइके बिदा कइ देवे के चाही नाहीं त कवनो बदनामीं क बात न हो जाय. कहॉं ले केहू पीछा करी अउर पहरेदारी करी. ऊमर त होइए चलल बा.

लाली के सादी बदे लइका खोजे क चर्चा करे खातिर मौका ताकि के लाली क महतारी उनका पिताजी के लगे गइली. कहे लगली, एजी! सुनत हई. देखीं लाली क उमर अब सादी लायक हो चलल बा. अपना साथी-संघतिया अउर बहनोई जी से लइका खोजे क जिक्र करी न. लइका तुरते त मिल ना जाला. देखत-सुनत तय-तुआ करत-धरत समय लगि जाला. लाली क बाऊ कहलन कि कवन जल्दी बा अबहिन तनी अउर पढ़ाई कइ लेबे द. लाली क महतारी फिरो जोर दे के लइका खोजे के कहली अउर ईहो कहली की पढ़ाई त सादी के बादो हो सकेला. देर कइला क काम नइखे.

लाली के बाऊ तेज-तर्रार मर्द रहलन गॉंव में उनका दबदबा रहे. मान मर्यादा के खिलाफ न त कउनों काम करें अउर न त केहू क बर्दास्त करें. बेबाकी खातिर उनकर सब केहूं सम्मान करें. कउनों पंचायत रहे त ऊ जरुर बोलावल जायं. बोलले में मसहूर रहें. लाली के शादी खातिर लइका खोजे खातिर अब ऊ अपने साथी-संघतिया में चर्चा सुरु कइलन. दू-चार रिस्तेदारनो में कहलन. अपने-अपने जानकारी के मुताबिक लोग लइकन के बारें में सूचित करे लगलन. जइसे-जइसे जानकारी मिले ऊ घरो में चर्चा चला दें. परिणाम भइल कि लालीओ जान गइली कि शादी खातिर लइका खोजात बाऽ. लाली ई जानकारी रमेस के दिहली. एक दूसरे से दूरी बढ़ले के अंदेशा से रमेस के मन में लाली के प्रति ललक अउर लाली के मन में रमेस के प्रति लगाव तेजी से बढे लगल. एक मुलाकात में दूनो लोग जग हसाई के किनार कइ के सादी रचवले क निर्णय ले लिहलन. बिरादरी अलग भइले से मां-बाप अउर परिवारजन क सहयोंग मिलले क कउनो उम्मीद ना देखात रहल. अब सादी क अन्जाम कइसे दिहल जा एकरे बारे में सोचे लगलन. अबहिन ई लोग कवनों रास्ता ना निकालि पवलन की लाली क बाऊ एक जगही सादी तय कइके जानकारी उनके महतारी के दिहलन. लालीओ जान गइली. लाली विरोध कइली कि अबहिन सादी ना करब. लाली के विरोध के महत्व ना देइ के उनकर पिताजी सादी क तिथि-दिन तय कइके रस्म-रिवाज आगे बढवले क तैयारी सुरु कइ दिहलन. लाली के लगल कि बाऊ मनिहे नाही. त ऊ स्पष्ट रुप से सादी से मना कइ दिहलीं. यहां तक कहि दिहली की सादी से पहिले हम घर छोड़ि के भाग जाब. लाली के बाऊ सोचे लगलन की लइकनी घर से भागि जाहू त हमरे इज्जत क का होई? केतना जग हसाइ होइ? समाज में हम का मुह देखाइब? ई कुल्हि सोचि के ऊ निर्णय लिहलन की अब लाली के घर से बाहर जाये ना देब. अब सादी के बादही ऊ बाहर निकली. ई तय कइ के ऊ मकान के ऊपर बनल एक कोठरी, जवना से सौचालयो जुड़ल रहे, में लाली के बन्द कइ दिहलन अउर घरबालन के हिदायत दिहलन की केहू बोली बात ना करी. उनके केहू अड़ोसी-पड़ोसी भा बाहरी आदमी से ना मिले दिहल जाय. मोबाइलो छिना गइल, लाली क सम्पर्क बाहरी दुनिया से टूट गइल. एक तरह से नजरबन्द हो गइली. बिना जेली क जेल पिजरा में जइसे चिरइ कैद कइ के राखत जाली ऊ हाल हो गइल. बस भोजन-पानी दे दिआव अउर कुछ से मतलब नाहीं. लाली क बात केहू सुनही के तैयार नाहीं. बेचारी लाली करे त का करे. खाना देबे जे आवे, खाना जंगला से अन्दर पकडा़ के चुप-चाप लौटि जाय. दू दिन बीति गइल. तिसरे दिन खाना लेइके संयोग से मौसी क लइका जवन सात-आठ साल क रहे आइल. ओकरा जेब में मोबाइल फोन रहें. बच्चा नादान रहल. लाली बड़े प्यार से कहली की बाबू तनी मोबइलवा देबऽ. देखीं कइसन बा ? पुचकारि के रोक लिहली देखले के बहाने मोबाइल लेइके फोन मिलवली. संयोग से फोन मिल गइल अउर थोड़े में आपन दास्तान सुना के रमेस से कहली कि चाहे जइसे होखे हमके इहवां से ले चलऽ. ई कहिके रोवे लगली.

लाली क बात अउर रोवाई सुनिके रमेस स्तब्ध हो गइलन. थोड़ी देर में संयत होके सोचे लगलन कि का करीं. आव देखलन न ताव झट से उठलन अपने तीन-चार संघतियन के लेइके थाना पर पहुँचि गइलन अउर दरोगा जी से पूरी बात बता के कहलन की चलीं लाली के छोड़ाईं. हम ओहसे सादी करे के तैयार हईं. ऊ तैयार हउए त हमरा से सादी करायी चाहे कोर्ट में, चाहे जइसे. दरोगा के लगल की लाली के साथ अन्याय हो रहल बा. दरोगा अपने तीन-चार सहायकन के लेइ के लाली के घर पहुँचि गइलन अउर कड़ा रुख अपना के लाली के छुड़ा के पुछलन की सादी कहॉं कइल चाहत हऊ? लाली अपनी सहमति रमेस के साथ दिहली. दूनो जनी वयस्क हो गइल रहलन. लाली, अउर रमेस के कोर्ट में दरोगा जी भेज के कहलन की जा सादी रचा के अपने घर ले जा. दरोगा जी लाली के बाऊ के अपने संघे थाना ले गइलन. वहॉ उनके नरम-गरम दिनभर समझवलन कि लइके सयान हो जालन त जोर जबरदस्ती ना करेके चाही. कवनो तरह क जोर-जवरदस्ती अपराध के श्रेणी में आवेला. हिन्दू धरम में लड़की क कवनो जाति-गोत्र ना होला. ऊ जवने कुल में बिआह के जाली ओही कुल क जाति अउर गोत्र उनकर हो जाला. खुसी-खुसी बिटिया जहॉं जात हउए जाये देई. आप जाईं अउर जश्न मना के खुसी जताईं. लइकन के आशीर्वाद देई. दरोगा जी क बात लाली के पिताजी के दिमागी में बइठल और दुइ दिन बाद रमेस के घर भात-भोज क आयोजन रहल ओह में जाइके सामिल भइलन. एतने नाहीं रमेस के पिताजी से गले मिल के इक्वान हजार रुपइया भेंट के रुप में देइ के आपन खुसी जतवलन. लइकी-लइका के माथे प हाथ धइ के भरल पंच के सामने आसीष दिहलन.


इं॰ राजेश्वर सिंह,
मूल निवास – गोपालपुर, गोला, गोरखपुर.
हाल फिलहाल – पटना में बिहार सरकार के वरिष्ठ लोक स्वास्थ्य अभियन्त्रण सलाहकार
उत्तर प्रदेश जल निगम से अधीक्षण अभियंता के पद से साल २०१० में सेवानिवृत
हिंदी में अनेके किताब प्रकाशित, भोजपुरी में “जिनगी क दूब हरियाइल”, आ “कल्यान क जुगति” प्रकाशित. अनेके साहित्यिक आ सांस्कृतिक संस्था से सम्मानित आ संबद्ध.
संपर्क फोन – 09798083163, 09415208520

अभागा

– इं॰ राजेश्वर सिंह

जब केहू के कवनो मसला समझ में ना आवेला त अपने से अधिक ज्ञानी मनई से शंका समाधान करे चलि जाला अउर समस्या के बारे में पूछि-ताछि के जानकारी कइ लेला. लक्ष्मण जइसन मनइ के अभागा लोगन के पहिचान कइले में शंका भइल त ऊ बड़े भाई राम से पूछि पड़लन कि अभागा कइसन लोगन के समुझे के चाही. राम समुझावे खातिर कहलन कि – ’’कुटिल, कठोर, कुबुद्धि अभागा.’’ माने कि जवने मनई बिना बुद्धि के भइले क साथे-साथ चालाक अउर कठोर होला ऊ अपने खातिर बाउर समय के खुदही नेवता दे देला.

एक जगही ढेर क मेंढ़क झुंड में रहलन. एगो मेंढ़क अपने के जियादे चालाक समुझत रहल. ऊ सगरो झुंड़ वालन के परेशान करे खातिर एगो जुगत सोचलसि. अपने सोच के चलते एक सांप के लगे जाइके कहलस कि एक जगही ढेर मेंढ़क बाड़न, चलऽ देखाईं. सांप के ले जाके देखवलसि. सांप एक-एक कइके सगरी मेढ़कन के घोंट लिहलसि. आखिर में ऊ चालाक मेंढ़क क बारी आइल त सांप ओही के घोंटे चलल. ऊ मेंढ़कवा से कहे लागल की ए भाई हम त तुहार मदद कइलीं अउर ढेर जानी के खाये के मौका दिहलीं, हमके त छोड़ि द. संपवा कहलस की तू त हमार खयका हउअ तुहके काहें नाहीं घोटब? ई कहिके उनहूं के घोंट गइल.

एहसे ई साबित होता कि चालाक मेंढ़क अपने कुटिलता के चलते बिरादरी वालन खातिर बाउर दिन ले आइल. एही से कहल ह कि भगवान प्रारब्ध के अलावा केहू के अभागा ना बनवलन. मनई अपने पहिले क संचय कइल कर्म फल भोग के अलावा सुख-दुख जवन अउर पावेला ऊ खुदे रचले ह. रावण जइसन सुख-संपति वाला केहू नाही रहल. उ सोने के नगरी में रहत रहलन. लेकिन ज्ञानी भइलहू प अपने कठोरता अउर कुबुद्धि क चलते सगरी खानदान क नाश करा दिहलन. एही मतिन दुर्योधनो अपने कुटिलता, कुबुद्धि अउर कठोरता का चलते अपने खानदान आ सेना क नाश करवलन. सच बात ह कि अइसन मनई विवेक क प्रयोग ना करेलन. विवेकहीन हो जालन. जब मनई विवेक इस्तेमाल करेला त बिगड़े वाला खेलो सहज ढंग से बन जाला.


इं॰ राजेश्वर सिंह,
मूल निवास – गोपालपुर, गोला, गोरखपुर.
हाल फिलहाल – पटना में बिहार सरकार के वरिष्ठ लोक स्वास्थ्य अभियन्त्रण सलाहकार
उत्तर प्रदेश जल निगम से अधीक्षण अभियंता के पद से साल २०१० में सेवानिवृत
हिंदी में अनेके किताब प्रकाशित, भोजपुरी में “जिनगी क दूब हरियाइल”, आ “कल्यान क जुगति” प्रकाशित. अनेके साहित्यिक आ सांस्कृतिक संस्था से सम्मानित आ संबद्ध.
संपर्क फोन – 09798083163, 09415208520