नीमिया रे करूवाइन

Photo of Dr.Janardan Rai

– डा॰ जनार्दन राय

नीनि आइल निमन ह. जेकरा आँखि से इहां का हटि जाइला ओकर खाइल-पियल, उठल-बइठल, चलल-फिरल, मउज-मस्ती, हंसी-मजाक कुल्हि बिला जाला. अइसन जनाला कि किछु हेरा गइल बा, ओके खोजे में अदीमी रात-दिन एक कइले रहेला.

निकहा दिन से हमरो नीनि उचटि गइल बा बाकिर हम केहू से कुछ कहीलां ना. सोची ला कि बूढ़ भइला पर अइसन होखल करेला. हमरा संगे कवनो अजगुत नइखे भइल. जे साठि-सत्तर से हेले लागेला ऊ कवनो अनहोनी का इन्तजार में आपन आँखि बिछवले रहेला. रहता देखत रहेला, हित-नात, संगी-साथी, निमन-बाउर सभे किछु एही सभ का माथे रहेला. एसे सोचत-विचारत रहला का वजह से, उहाँ का आपन आसन जमा ना पाइलां. कबो-कबो त अइसन होला कि जब नीनि जनमतुवा का आँखि पर अइला से असकतियाये लागेले त अजिया, महतारी, फुवा लोगन का काफी मसक्कत करे के परेला. उनुकरा मनावन में ओझइती का संगे-संगे गीत-गवनईं में जेवन लोरी दादी का मुँह से निकसेले, ओकर धुनि, रस, गंध अजबे सवदगर होला – आउ रे निनिया निनरबन से, बबुआ आवेले ननिअउरा से. आउ रे निनिया निनरबन से.

चइत महीना रहे. कटिया लागल रहे. ताल में मसुरी पाकि के झन-झना गइल रहे. टाँड़ पर पाकल रहिला के ढेढ़ी झरत रहे आ ओने दियरी में अबहीं गोहूँ चना पाकल तऽ ना रहे, बाकिर होरहा हो गइल रहे. एक ओर कटनी आ दुसरकी ओर होरहा का लालच में मन कसमसा के रहि गइल. अकसरूवा जीव दिन भर छिछिआइला से थाकि के एकदम बेबस हो गइल रहे. किछु करे के बेंवत ना रहे. लमहर सीवान में घुमते-घुमत साँझि हो गइल. एतने होला कि आपन खेत, बन बगइचा एक बेरि आँखि में उतरि आवेला. ऊहो देखेला आ अपनहूं देखि के आँखि में जुड़ाई परेला.

थाकल-खेदाइल देहि साँझि खने दुवारे डसावल बंसहट पर परि गइल. अकसरूवा होखला का नाते कबो-कबो डेरा डाँड़ि पर अइसहूं रुक जाये के परेला ए वजह से हमरा घरनी का कवनो चिन्ता-फिकिर ना रहेले. भइल अइसन कि नीनि ओह दिन अपना गिरफ्त में एह कदर लिहलसि कि किछु साँवा-सुधि ना रहि गइल. अइसन बुझाइल कि निनिया आइल बा सुनरबन से.

भइया संगे बँटवारा कवनो आजु के ना ह. ढेर दिन बीति गइल बाकिर हार आ हँसुली के लेके भउजी का संगे जवन उठा-पटक भइल ओकरा से तनी मन में गिरहि त परिये गइल. नीनि ना खुललि. देरी ले सुतल देखि के भइया का मन में किछु अइसन बुझाइल कि, ई काम त कबो के कइले ना हऽ, मेहरि का कहला में परि के बाँटि त जरुर लिहलसि, बाकिर दिल जगहे पर बा. बोलसु त नहिये बाकिर बुचिया, भउजी आ भइया तीनू जाना के फुसुर-फुसुर बोली त सुनाते रहे. चइत के मुंगरी से थुराइल देहिं कवहथ में ना रहे. दरद त रहबे कइल, बाकिर देहिं पर परल नीमि के फूल ओकर गंध, बयार का पाँखि पर चढ़ि के तन-मन के सुहुरा के जवन गुदगुदी पैदा कइलसि ओहि दिने बुझाइल कि –

नीमिया रे करूवाइन, तबो शीतल छाँह,
भइया रे बिराना, तबो दहिनु बाँह.

टेढ़की नीमि के दतुवन, ओकर खोरठी, पतई, निबावट, लवना, छाँह हमनी खातिर कतना आड़ बा, अब तनी-तनी बुझाये लागल ह. साँझि होते पतई का फुनुगी पर बइठल चिरइन के गिरोह, उन्हनी के खोता, तितिली आ कबे-कबे भुलाइल भँवरन के मटरगस्ती केतना नीक लागेले, ई कहे के बाति नइखे. ओह दिन त हम अपना घरनी का कहला में परि के नीमि का छाती पर जवन टाँगी चलवलीं कि ऊ कटा के बांचि त जरूर गइल बाकिर हमरा छाती में जवन छेद भइल कि आजु ले ना भराइल. हमरा खूबे इयादि बा जब नीमि का पुलुई पर बइठि के उरूवा बोलल – उ—उ—उ—-उ, त हमार घरनी कहली कि इहनी के बोलल नीक ना ह. बाकिर उनुकरा बाति पर बाति बइठावत बंसी साधू कहलनि – ई गियानी हवन जा. बोलला के मतलब ई होला कि सजग हो जा. किछु अइसन होई कि टोल-महाल में कवनो दुख, बिपति जरूर आई. ई आवे वाला बेरामी, बिपदा, बाढ़ि, सूखा, महामारी के बता के पोढ़ होखे के शक्ति देला.

नीमि के डाढि उरूवा के ठांव बा. गौरईया के खोंता, आ माता दाई के झुलुहा बा. त एकर पतई दवाई आ टूसा टानिक बा. एकर दतुवन मुँह बसइला से लेके पेट का हर बेरामी के अचूक दवाई बा. इहे ना, एकरा सूखल डाढ़ि पर कोर पतुकी में बनावल भोजन के खाये वाला कइसनो कोढ़ी होखो, एक बरिस में जरूर ठीक हो जाई. एही से एकरा छाँव में बइठि के गांव के गोरी जवन गीति गावेली स ओकर अजबे रस बा. एह छाँव में संवसार के संवारे वाली माता-दाई खुद बसेरा करेली. एहीसे भर नौरातन इनका गाछ से छेड़-छाड़ कइल ठीक ना मानल जाला. गाँव-गवई के माई-बहिन जब गावेली स त रोंवा भभरे लागेला –

नीनिया के डाढ़ि मईया,
लावेली झुलुहवा, हो कि, झूलि झूलि ना.
मइया मोरी, गावेली हो
गीतिया कि, झूलि झूलि ना.
झूलत-झूलत मइया के
लगली पियसिया, कि बूंद एक ना!
मालिनि पनिया पियाव, मोके बूँद एक ना.

माली-मालिनी मिलि क महामाया का किरिपा से नीमि के सींचत जवन रूप देले बा ओही तरे मातादाई एह संवसार में रसे-बसे वाला हर जीव-जंतु के जिये, संवरे, सोचे, समुझे के बल-बुद्धि देले बानी. जरूरत एह बाति के बा कि इंसान के इंसान बूझी जा. भाई के कसाई समझ के काटे के ना ह. भाई भाई ह. संबंधन का बीच में खटाई डाले के बाति ना होखे के चाहीं. घाम सहि के छाँह दिहल आ दुख काटि के सुख बाँटल असली धरम ह. सच-सच कहल जाय त आपन करमे असली धरम ह. एह राह-रहनि से जे रही, ओकरा करनी से घरनी आ धरनी दूनो के राहि रसगर हो जाई. संवसार मसान होखे से बँचि जाई. एके बंचावे बदे जे दुई कदम चली, माई के असली बेटा उहे ह –

यः प्रीणयेत् सुचरितैः पितरं स पुत्रो.


नरही, बलिया.


अगस्त २००३ में अँजोरिया के पहिलका अंक में प्रकाशित

भोजपुरी प्रकाशकन के मजबूरी

अँजोरिया के एगो साहित्यकार आ सम्मानित पाठक दिवाकर मणि जी के एगो टिप्पणी मिलल बा

हमरा खातिर “भोजपुरी सिनेमा” के मतलब होला “टोटल बकवास”। हिन्दी सिनेमा के डी ग्रेड वर्जन भी कहल जा सकेला भोजपुरी सिनेमा के । गिनल-चुनल फिलिमन के बनवला के छोड़ दीं तऽ भोजपुरी सिनेमा उद्योग “फूहड़पन” के कारखाना कहल जा सकेला । पता ना तबो काहे अधिकांश भोजपुरी के समर्पित वेबसाइट अपना सामग्री के नब्बे प्रतिशत एही घटिया फिलिमन खातिर समर्पित कईले बाड़ी सन । हो सकतऽ बा कि वेबसाइट नियंत्रक लोगन के ई कवनो मजबूरी होखे। हमरा त इहे बुझाता कि नियंत्रक लोगन के ई मजबूरी के जड़ शायद हमनीं भोजपुरिया पाठक सभे ही बानीं जा। घटिया फिलिम चरचा के अलावे हमनीं जान के बुद्धि आऊर कहीं शायद लागत ना होई…..

सामान्य टिप्पणियन के हम जस के तस छोड़ दीहिलें कि बाकिर पाठक लोग ओकर जवाब देव बाकिर दिवाकर जी के ई टिप्पणी सीधे हमरा जइसन प्रकाशक संपादकन पर बा, एहसे जवाब दिहल जरुरी बा.

दिवाकर जी रउरा ई जान के अचरज होखी शायद कि अँजोरिया पर जतना साहित्य प्रकाशित बा ओकरा के पढ़े बइठीं त महीना लाग जाई खतम ना हो पाई. बाकिर रउरो छिछिलाहे पानी में गोड़ राख के नदी के गहराई नाप दिहनी. महाराज, एक बार अंजोरिया के सगरी साहित्य त देख लीं. रउरा साहित्यकार हईँ बाकिर बहुते कम भोजपुरी साहित्यकार कंप्यूटर के इस्तेमाल जाने ले. ओह लोग के मालूमे नइखे कि नेट का माध्यम से ऊ लोग आपन रचना पुरा दुनिया ले चहुँपा सकेलन. तबो जे लोग से संपर्क हो सकल ओह लोग का माध्यम से अँजोरिया पर प्रकाशित स्तरीय भोजपुरी साहित्य के कमी ना मिली. हँ साहित्य के कोटा के भरपाई करे खातिर वइसनो साहित्य प्रकाशित करे के पड़ जाला जवना के स्तर प्रतिनिधि साहित्य कहाये लायक ना रहे. हम खुद साहित्यकार ना हईं एहसे हमार साहित्य के मापदण्ड कुछ दोसरे होला. जवन रचना दिल के छू जाव आ जवना में भोजपुरी के संस्कार बरल होखे ओकरे के हम प्रतिनिधि साहित्य मानीले. हिन्दी के अनुवादित साहित्यो भोजपुरी में छप रहल बा आ ओकरो से हम परहेज ना करीं. मिलो त पहिले.

जहाँ तक रहल बात फिल्मी बकवास के त हम अतने कहब कि आजु भोजपुरी के जवन चर्चा चल रहल बा ओकरा पीछे भोजपुरी सिनेमा के सफलता आ फूहड़ गीत संगीत के लोकप्रियते बा. कबो गाँव जवार में रह के फगुआ चइता सुनले होखब त रउरो मानब कि भोजपुरी संस्कृति के परमिसिव कहल जा सकेला जहाँ हर कुछ ढाँके तोपे के जरुरत ना पड़े. हिन्दी का संस्कार से भोजपुरी के आकलन ना हो सके. हिन्दी कृत्रिम भाषा हऽ भोजपुरी ना. आ अइसनका हर भाषा में फूहड़पन के कमी नइखे. सबसे बेसी पार्न कवना भाषा में छपेला? जवन सबसे बेसी बोलल जाले. अगर खाली साहित्ये चरचा कइल जाव त केहू एने झाँकहू ना आई. हमनी प्रकाशक हर बात के निगरानी राखेनी कि हमनी के पाठक का खोजत हमनी का लगे आवत बाड़न. जान के दुख होई बाकिर साहित्य ओह लोग का पसन्द में दसवाँ जगहा पर बा. अधिकतर लोग भोजपुरी गीत खोजत नेट पर मँड़रात रहेला आ मजबूरन साहित्यो देख पढ़ लेला.

दोसरे फिल्मी चर्चा में विजुअल सामग्री आराम से मिल जाले जवना के नयनसुख ले के लोग चटपट चल जाले. हमनी के कोशिश बस अतने रहेला कि जवन सामग्री प्रकाशित होखे तवना के पूरा परिवार पढ़ सके. हमरा सामने त बस एगो मापदण्ड रहेला. हमार बेटी पढ़ाई का चलते बाहर दोसरा शहर में रहेले आ अँजोरिया के नियमित पाठको हिय. हम बस अतने ध्यान राखिले कि अँजोरिया के उहो पढ़ सके आ हमरा कुछ छिपावे के जरुरत ना पड़े.

बढ़िया साहित्य के तुलन मेवा से कइला जा सकेला आ काजू किसमिस कतनो पौष्टिक होखे, कतनो स्वास्थ्य वर्धक होखे ओकरा से पेट ना भरे. पेट भरे खातिर चावल दाल तरकारियो चाहीं. पेट भर खा लिहला का बाद काजू किसमिस चबावे के आनन्द कुछ दोसरे रहेला.

आशा बा कि रउरा इ सगरी पाठक समुदाय के हमनी प्रकाशको के नजरिया पता लाग जाव. हमनी का लगे कवनो मजबूरी नइखे फिल्मी सामग्री प्रकाशित करे के. ऊ त बस एहले रहेला कि ओकरे बहाने कुछ साहित्यो पढ़ा दिहल जाव.

दिवाकर मणि जी से क्षमा याचना सहित,
संपादक-प्रकाशक, अँजोरिया

फ्यूचर बहुत ब्राइट बा, चाचा!!

– दिवाकर मणि

रामलुभाया चाचा, गोड़ लागिले.
खुश रहऽ ए गुणगोबर. कहऽ का हाल-चाल बा? आजुकाल्हि त ना देखाई देत बाड़ऽ ना तहरे बारे में कुछु सुनाते बा, अईसन काहे हो? अउर तहरा चेहरा प ई खुशी टपक रहल बा, एकर रज का बाटे?
बात-वात कुछो ना बा चाचा! जब से पिछलका पंचायत चुनाव हारल बानी, तबेसे खलिहर बनिके एने-ओने चकल्लस मारत बानी. ई देखिके हमार मेहरारू हमरा के दिन-रात कोसत रहली ह कि काम के ना काज के ढाई सेर अनाज के. जाईं कुछु काम करी, और दाना-पानी के जुगाड़ बइठाईं. दिन रात के घर कचकच से तंग आके हमहुं सोचनीं कि पाकिट भरे खातिर कुछु तिकड़म शुरु कईल जाव. इहे सोचत हम खेलावन भाई के लगे गईनीं. उनकरा घरे गइला प उनुकर मलिकाइन बतवली कि उहां के (यानि कि खेलावन भाई) त कवनो पार्ट-टाइम कोर्स करे खातिर गईल बाड़े. आउर ऊ दु घंटा बाद घरे अईहें. ई बात सुन के त हमरा बहुते अचरज भइल कि खेलावन भाई जइसन लिख-लोढ़ा पढ़-पत्थर आदमी कवन कोर्स कर रहल बाड़े.

खैर, दु घंटा एने-ओने बिता के जब हम उनुकरा घरे फेर से पहुंचनी त उनुकरा से मुलाकात भ गइल. बिना कवनो भूमिका के हम सीधे खेलावन भाई से पूछनीं कि “भाई खेलावन, ई सूरज पछिम से कइसे निकल गइले? तहरा जइसन आदमी जे पढ़ाई के नाम से बचपने से दूर भागे, ऊ कवन कोर्स करे लागल बा हो?” तब खेलावन भाई कहले कि बुरबके बाड़ऽ का हो? आरे, ई कवनो अइसन-वइसन कोर्स ना ह. ई कोर्स त हमनिए खातिर विशेष रूप से तईयार कइल गइल बा. तु त जानते बाड़ऽ कि हमहुं पिछलका पंचाइत चुनाव में हार गईनीं, तबे हम सोच लेहनी कि अभी हम पूरा तरह से समाजसेवा करे खातिर फिट नइखीं, कुछु अऊरी टरेनिंग-वरेनिंग के जरुरत बा. इहे सब हम कुछ दिन से सोचत रहनीं तले अखबार में एक दिन एगो विज्ञापन देखनीं.

कइसन विज्ञापन देखलऽ ए खेलावन भाई? हम उनुकरा से पूछनीं त ऊ बतवले- लोकसभा अउर विधानसभा से एके साथ टॉस हारला के बाद आपन घोटालाराज भईया भालू परसाद एगो नया बिजनेस का रूप में नया टरेनिंग इस्कूल खोलले बाड़े, खास हमनी जइसन समाजसेवा के कैरियर का रूप में अपनाए वाला लोगन खातिर. ओहि इस्कूलिया के विज्ञापन हम अखबार में देखनीं त मन गदगदा गइल. खेलावन भाई आपना रौ में आगे कहे लगले कि – टरेनिंग इस्कूल के सबसे बड़ खासियत ई बा कि ई फुल्ल प्लेसमेंट के गारंटी देवे के बात करत बाऽ. अखबार में एकरा बारे में पढ़ि के हमहुं आपन एडमिशन करावे खातिर भाग-दौड़ शुरु कऽ देहनीं. ओहिजा गइला प देखनीं कि उहां दाखिला पाए खातिर त बहुते भीड़ खड़ा बा, लेकिन थोड़-बहुत तिकड़मबाजी भिड़ा के एगो सीट अपना खातिर बुक कराइए लेहनी.

ई सुनिके हम खेलावन भाई से कहनीं कि “ए खेलावन भाई, कवनो जुगाड़ लगावऽ ना कि हमरो ओहिजा एडमिशन मिल जाए.”

खेलावन भाई कहले- “गुणगोबर भाई, तनीं आऊर पहिले बतइतऽ त कुछ ना कुछ होइए गइल रहितऽ. खैर, चिन्ता जनि करऽ हम कुछ उपाय लगावत बानी. बाकि तनी अंटी ढीला करे के पड़ी.”

तब तू का कहलऽ खेलावन से, का एडमिशन लेहलऽ? आ लेहलऽ त के तरह से? – रामलुभाया चाचा पूछले.

अरे चाचा, सब बतावत बानी, तनी धीरज धरऽ. जब खेलावन भाई अंटी ढीला करेके कहले तब तनीं देर हम सोचे लगनीं, आऽ सोच के खेलावन भाई से कहनीं कि ठीक बा, तू एडमिशन करा दऽ. भले शुरु में देबे के पड़ो लेकिन आगे त मिलहिं के नू बा. तब खेलावन भईया हमके ले के भालूए जी के पारटी के एगो नामी समाजसेवक जी के इहां ले गइले. समाजसेवक जी खेलावन भाई के फुलेना मामा के गेंदा चाचा के छोटका सार के लंगोटिया ईयार हउअन. बहुते बढ़िया आदमी हउअन समाजसेवक जी. उ त पचास हजार से कम में केहू के काम ना करेले, बाकि खेलावन भाई के फुलेना मामा के गेंदा चाचा के छोटका सार के लंगोटिया ईयार हखला के चलते हमार काम आधे पईसा ले के कर दिहले.

वाह-वाह भतीजा, फाइनली तहरो एडमिशन मिलिए गइल नू?

हँ चाचा.

बहुत-बहुत बधाई.

धन्यवाद चाचा.

अच्छा ई बतावऽ कि ई कोर्स केतना दिन-महीना के बा? एकरा खातिर मिनीमम क्वालिफिकेशन का बा, आऽ ई कइला से फायदा का-का बा? – रामलुभाया चाचा पूछले.

“Pre-School Diploma In Corruption Management (PSDCM)” नाम के ई कोर्स छः महीना के बा. आऽ ई कोर्स ज्वाइन करे खातिर कवनो इस्कूलिया पढ़ाई-लिखाई आऽ डिग्री के जरुरत नइखे. हँ, ओह लोग के प्रिफरेंस जरुर मिली, जे लोग पर कम-से-कम दुई-चार ठो पुलिस केस होखे. बहुत सफाई से झूठ बोले में पारंगत होखे लोग आ साक्षात्कार का समय अपना भ्रष्टाचार के नमूना से साक्षात्कार लेवे वाला लोगन के प्रभावित कऽ सके लोग.

चाचा, ई टरेनिंग इस्कूल में पढ़ावे खातिर देश-विदेश के बड़हन-बड़हन भ्रष्टाचार में पारंगत लोगन के मोट मोट फीस दे के बुलावल गइल बा.

ई काहे खातिर रे बुरबक? का आपना देश के महान भ्रष्टाचारी मर गइल बाड़न सँ कि दोसरा देश से ओकनी के बोलावे के पड़ी? कम-से-कम एह क्षेत्र में त आपन भारत देश जरुरे आत्मनिर्भर बा. एह मामला में त हमनीं के देश के गिनती बहुते ऊपर बा. एहिजा से पूरा दुनिया में भ्रष्टाचारियन के निर्यात होलाऽ आऊर तें कहतारे कि तोर टरेनिंग इस्कूल दोसरा देश से पढ़ावे खातिर भ्रष्टाचारियन के आयात कर रहलऽ बा.

ए चाचा, खिसियाईं मतऽ. दोसरा देश के भ्रष्टाचार में दक्ष लोगन के बोलावे के पीछे मकसद इहे बा कि “विदेशियन के भी भ्रष्टाचार करे के तौर-तरीका आऽ संस्कृति” के बारे में जानकारी प्राप्त हो सके. बाकि त टरेनिंग इस्कूल के संस्थापक व मैनेजिंग डाइरेक्टर भालू प्रसाद जी त खुदे अपने-आप में “भ्रष्टाचार शिरोमणि” हउअन आ ऊ अकेलही देश-विदेश के सारा भ्रष्टाचारियन प भारी पड़ेले.

अच्छा, अच्छा. भतीजा अब तनी फायदवो बता दऽ – रामलुभाया चाचा बात के मरम समझ गइला पर कहले.

चाचा, सबसे बड़ फायदा त इहे बा कि हमनीं का भालू प्रसाद जी के डाइरेक्ट संसर्ग में बानी जा. ई देखिए के कवनो ना कवनो कंपनी भा संगठन अपना इहां भ्रष्टाचार के उत्थान खातिर बढ़िया पैकेज पर रख ली. सत्यम वाला अभिए से आवे लागल बा, बाकि आउरियो कुछ खास-खास पिराइवेट आ सरकारी कंपनी हमरा टरेनिंग इस्कूलिया में आवे लागल बाड़न सँ. सरकारीओ संस्थान हमरे इहां के टॉपरन के अपरेंटिंस करवला के बाद लेबे खातिर राजी हो गइल बाड़न स. चाचा, ढेर ना बोलब. बस एतना समुझ लऽ कि कोर्स करत करत हमहुं टॉप क्लास के भ्रष्टाचारी जरुरे बन जाएब. फ्यूचर बहुत ब्राइट बा, चाचा!!

दिवाकर मणि
भाषा वैज्ञानिक
अनुप्रयुक्त कृत्रिम प्रज्ञान समूह
प्रगत संगणन विकास केन्द्र, पुणे.

दूरभाष – 020-25503318
ब्लॉग- http://diwakarmani.blogspot.com

जम्हुआ के छुअला के डर ना ह, परिकला के हऽ

भोजपुरी इलाका में एगो कहावत पहिले मशहूर रहे कि जम्हुआ के छुवला के डर नइखे, परिकला के बा. तब चिकित्सा सुविधा का अभाव में बहुते शिशू जनम का दू चार दिन का भितरे टिटनेस के शिकार हो जात रहलें. हँसुआ से नार कटात रहुवे आ अन्हार कूप सोइरी में जच्चा बच्चा के शुरुआती दिन गुजारे के पड़त रहुवे. जम्हुआ के डर रहे बाकिर जानकारी के अभाव कि जम्हुआ छुवत बा त काहे?

कुछ वइसने हालत भोजपुरी के वेबसाइटन के बा. कुछेक दू कौड़ी वाला वेबसाइटन, जवना में अंजोरियो शामिल बा आ ई उपाधि बक्सर के एगो बड़हन विद्वान के दिहल हवे, के छोड़ दीं त बाकि सब बड़ा धूम धाम से शुरु होली सँ. बुझाला कि आवते भोजपुरी में छा जइहें. तीन कन्नौजिया तेरह चूल्हा वाला हालात से गुजरत भोजपुरी समाज में केहू अपना के कम ना बुझे. सभे तीस मार खाँ होले. बिना सम्यक तइयारी भा समर्पण के शुरु होखेवाला वेबसाइटन के जम्हुआ से छुवइला से बचावलो ना जा सके. भोजपुरी वेबसाइट बनावल आ शुरु कइल बहुते आसान बा बाकिर भोजपुरी का प्रति पूर्ण समर्पण बिना ओकरा के ढेर दिन ले चलावल ना जा सके. काहे कि एह काम में आमदनी तनिको नइखे. कुछेक साइट अपवाद हो सकेले बाकिर अपवाद कवनो नियम के अनिवार्य शर्त जइसन होला.

अलगा अलगा वेबसाइट खोलला चलवला के मकसद अक्सर अपना के सर्वश्रेष्ठ आ लोकप्रिय देखावे जतावे के कोशिश रहेला. हम केहू दोसरा पर निर्भर ना रहल चाहीं. हमार अटकर बथुआ सब छपे के चाहीं आ साहित्यकार के सम्मानो मिले के चाही. लोग ई जाने के कोशिश ना करे नेट पर आवे वाला भोजपुरिया का चाहेले. उनका बस गाना चाही. गाना के लिंक चाहीं. दूसरा नम्बर पर फिल्मी दुनिया से जुड़ल कुछ चटपटा खबर मिल जाव आ आँख सेंके लायक फोटो. हमार अनुभव त इहे बा कि साहित्य का पन्ना का तरफ बहुते कम लोग जाला. एकरा बावजूद अगर साहित्य प्रकाशित होला त ओकर कारण बा कि हमनी का चाहेनी स कि साहित्यो के इज्जतदार जगहा मिल सके. एहिजा दोसर मुसीबत ई आ जाला कि अधिकतर भोजपुरी साहित्यकार के पते नइखे कि नेट पर आपन सामग्री कइसे छपवाईं. पूरा दुनिया में सहजता से आपन रचना पठवला से बेहतर लागेला लोग के कि अपना पाकिट से पइसा खरचा कर के पुस्तक छपवा लिहल जाव आ अपना जान पहिचान वाला लोगन आ कुछ मशहुर लोग के ओकर प्रति भेज दिहल जाव.

जे बढ़िया लिखेला से नेट पर आवे ना, परिणाम ई होला कि जे नेट प‍र आवेला ऊहे आपन रचना छपवावत रहेला. जे अपना के प्रतिष्ठित साहित्यकार माने ला ऊ फेर आपन रचना कवनो वेबसाइट के ना भेजे. या त अपना साइट पर डाली ना त ओकर व्यावसायिक उपयोग खातिर बचा के राखेला. फेर ओकरो रचना से एगो बड़हन पाठक वर्ग उपेक्षित रह जाला. अँजोरिया पहिला बेर कवनो पूरा किताब अपना साइट पर प्रकाशित कर के चहले रहुवे कि एगो दौर शुरु हो सके आ भोजपुरी के साहित्यकार आपन रचना पूरा दुनिया का सोझा राख पावे.

एह दिसाईं सगरी दोष साहित्यकारने पर डालल ठीक ना रही. कुछ.गलती हमनियो के बा जे साहित्यकारन तक चहुँप नइखन पावत. ओह लोगन से सीधा सांवाद नइखन बना पावत आ इन्तजार में बइठल रह जात बाड़न कि आम टपकी आ सीधे हमरा मुँह में गिरी. का साहित्यकारन से संपर्क बनावे में रउरा हमनी के मदद कर सकीलें? अपना जानपहिचान के साहित्यकारन के बता सकीलें कि अपना रचना के दुनिया तक चहुँपावे के आसान रास्ता बा कवनो वेबसाइट पर अपना रचना के प्रकशित करवा दिहल. बस अपना किताब के पेजमेकर फाइल हमनी का लगे भेज दीं. रउरा कुछ मिले भलही मत बाकिर लागबो ना करी. अबही अतने संतोष काफी बा.

हमरा एह लेख के केहू अपना पर व्यक्तिगत टिप्पणी मत समुझी. हमार मकसद केहू के दिल दुखावल ना बलुक एगो समस्या का तरफ लोगन के ध्यान दिआवल बा.

संपादक,
अँजोरिया

टटका खबर, बुध, २ जून

झारखण्ड में राष्ट्रपति शासन लागू

शिबू सोरेन का आन्दोलन से जनमल झारखण्ड के सबसे बड़ समस्या खुद शिबू सोरेन बन गइल बाड़े. उनका बिना कवनो सरकार बनावल चलावल संभव नइखे आ उनका साथ आवे के केहू तइयार नइखे. मजबूरन केन्द्र सरकार ओहिजा राष्ट्रपति शासन लगा दिहलसि. विधानसभा के भंग नइखे कइल गइल आ जोड़ तोड़ के सरकार बनावे के संभावना अबहियो मौजूद बा. बाकिर ओकरा खातिर झामुमो भा भाजपा भा दुनो के विधायक तूड़े के पड़ी. भाजपा भा झामुमो दोसरा के ना तूड़ सकस.

ममता कैबिनेट का बइठका में शामिल ना भइली

दिल्ली मे मौजूद रहला का बावजूद ममता बनर्जी कैबिनेट का बइठक में शामिल ना भइली काहे कि ऊ झारखण्ड में राष्ट्रपति शासन लगवला जइसन छोट मोट मामिला में हाजिर भइल जरुरी ना समुझली. ओह घरी ऊ दोसर बड़हन काम में लागल रहली. ममता के देश के चिन्ता नइखे, उनका खातिर पश्चिम बंगाले सगरी दुनिया हऽ आ ओहिजा के नगरपालिका चुनाव का बाद के रणनीति बनावे में अझुराइल बाड़ी. आजु मत के गिनती हो रहल बा आ रिजल्ट का बारे में कवनो पूर्वानुमान केहू नइखे लगावत. ओने वामपंथ इशारा कइले बा कि ऊ ममता के ठिकाने लगावे खातिर कांग्रेस के साथ दे सकेला.

ड्रोन हमला में अल कायदा के बड़हन आतंकी ढेर

पाकिस्तान का कबाइली इलाका में अमेरिका ड्रोन हमला कर के बड़हन अलकायदा आतंकी मुस्तफा अबू अल याजिद के ओकरा परिवार संगे मार गिरवलसि. अल कायदा अपना वेबसाइट पर एह घटना के मान लिहले बा कि याजिद के ओकरा परिवार समेत मार दिहल गइल बा. याजिद का जिम्मे अलकायदा खातिर कोष जुटावे से ले के हमला के योजना बनावे तक के जिम्मेदारी रहुवे. अलकायदा खातिर ई बड़हन चोट बा.

नक्सली समस्या के निदान खातिर सेना के इस्तेमाल के संभावना बढ़ल

काल्हु रक्षा मंत्री ए के एंटोनी सेना के तीनो अंग के प्रमुखन का साथे बइठका कइलना आ जानकार लोग के अणुमान बा कि एह में नक्सलियन से निबटे खातिर सेना के उपयोग पर विचार कइल गइल. वइसे एह काम खातिर सेना के इस्तेमाल सैद्धान्तिक रुप से गलत होखी आ ओकर दीर्घकालीन दुष्प्रभाव पड़ सकेला.

सोना अनइस हजार का पार चल गइल

दुनिया भर के शेयर बाजार के खराब हालत के असर बुलियन मार्केट पर पड़ल बा आ सोना चांदी दुनु के दाम आसमान छुवे लागल बा. आजुकाल्हु लगन का सीजन में भइल एह बढ़ोतरी से सर्राफा दुकानदार चिन्तित बाड़े काहे कि ओह लोग के बिक्री कम हो गइल बा. लोग ओतने गहना खरीद रहल बा जतना जरुरी बा. दोसरे गहना पर ओतने रुपिया खरच हो रहल बा जतना होखे के रहल. एह से सोना के बिक्री में गिरावट आ गइल बा काहे कि व्यवसायियन के मुनाफा सोना के वजन पर निर्भर करेला दाम पर ना.

रोडवेज का बस से कचरा के पन्द्रह आदमी के मौत

सोमार का रात आजमगढ़ का गोमाडीह में एगो शादी के समारोह चलत रहे. बराती आ घराती बैण्ड का धुन पर सड़क पर नाचत रहले. एही बीच बनारस से आ रहल एगो रोडवेज के बस से एगो लड़की के धक्का लाग गइल आ ओकरा बाद भागे का फेर में ड्राइवर भीड़ के कचारत भाग निकलल जवना में पन्द्रह आदमी के कचरा के मौत हो गइल. ड्राइवर के गिरफ्तार कर लिहल गइल बा.

यूपी बोर्ड के मैट्रिक रिजल्ट में बलिया फेर फिसड्डी साबित भइल

नकल माफिया के बदौलत बढ़िया रिजल्ट देबे खातिर बदनाम बलिया में पूरा देश के विद्यार्थी आवत रहलन. अबकी जिला प्रशासन का सख्ती का चलते नकल माफिया अपना मकसद में कामयाब ना हो पवलें. पिछला बेर टाप थ्री में रहे वाला जिला अबकी बेर बाटम थ्री में आइल बा. शायद अब आइन्दा से विद्यार्थी नकल का फेर में ना रह के पढ़ाई पर ध्यान दीहें. उम्मीद त कमे बा बाकिर दोसर कवनो राहो नइखे.

बिहार भाजपा का बइठक में अइहें नरेन्द्र मोदी आ वरुण गाँधी

पटना में होखे जा रहल भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी का बइठक में नरेन्द्र मोदी आ वरुण गाँधी शामिल होखीहें आ १२ जून के गाँधी मैदान में होखेवाली सभा में दुनु जने भाषणो दीहें. जदयू एह बात आपत्ति प्रकट कर चुकल बा कि भाजपा एह दुनु जने के बिहार में होखेवाला चुनाव में इस्तेमाल मत करे काहे कि एहसे ओकर समर्थक मुस्लिम वोट बिदक सकेला.

शेयर बाजार फेर ढहल

यूरो में आइल जबरदस्त गिरावट का चलते भारत के शेयर बाजार ढह गइल आ सूचकांक ३७२ अंक नीचे गिर के १६५७२ पर बंद भइल. दोसर कारण इहो रहे कि चीन चेतावनी दिहले बा कि दुनिया के अबही बड़ वित्तीय संकट देखे के बा.

एशिया कप क्रिकेट में भारत ना खेली

क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड आफ इण्डिया चीन में नवम्बर में आयोजित एशियाई खेल में पहिला बेर शामिल क्रिकेट प्रतियोगिता में शामिल ना होखे के फैसला लिहले बा. बोर्ड का मुताबिक ओह घरी ओकर टीम के बहुते व्यस्ता कार्यक्रम बा, न्यूजीलैण्ड के टीम भारत आवे वाली बा आ ओकरा साथे तीन गो टेस्ट आ पाँच गो एकदिना मैच खेले के बा.

भूत बा कहाँ

– डा॰ सुभाष राय

जाड़ा जब हाड़ ठिठुरावे लागेला त सगरो गाँवन में कउड़ा के बहार आ जाले. दुवारे से थोरिक लम्मे घर भर क कूड़ा जोरि के रखि दिहल जाला अउर सूखल रहेट्ठा तोरि के ओकरे उप्पर डारि दिहल जाला. फेरू ओके बारि के पास-पड़ोस क सभै लोग कउड़ा तापे बइठि जाला. उहाँ गाँव भर क चरचा होले. थोरी-थोरी बेर में चाय बनि के आवेले अउर गरमागरम बात चलत रहेले. समझीं कि जाड़ा क चउपाल जम जाले. दिन भर गाँव में का-का भइल, सब उंहा मालूम हो जाला. मजेदार अउर लच्छेदार बातिन में लोग सब कुछ भुलाइल रहेला. गुल्लुआ के गाँव में कउड़ा के चउपाल प छोटू आ सीताराम के पूछ सबसे जियादा रहे. ऊ दूनो गाँव के खबरची के रूप में जानल जात रहें. चाहे रमेसरा की नवकी दुलहिनिया से ओकरी खटपट क बात होखे, चाहे लरिकनी छेड़ले खातिन रजिंदर क ठोंकाई, चाहे परधानजी के सपूत क चमरउटी की छोरी से इस्क होखे, चाहे रधिकवा क चोरी-छिपल रंगरेली, सगरी खबर एक्के घंटा की बइठक में मालूम पड़ि जासु. जवने दिन दूनो में से एक्को खबरची ना रहे, कउड़ा क मजा किरकिरा होई जासु आ जवने दिन दूनो आ जासु स, बइठकबाजी आधी राति ले चलत रहे. केहू उठे क नांव ना लेसु. ई बाति तब क बा जब गुल्लू दसेक साल क रहल होई. ओकरा के रोज साँझि भइले क इंतजार रहे. हाली-हाली खाना-ओना खाके ऊ कउड़ा के आस-पास मंडरात नजर आवे. कहनी सुनले में ओके बहुते मजा आवे. ऊ एतना बड़ ना भइल रहल की बिच्चे में कुछ बोले, एही से ऊ चुपचाप सुनले में मस्त रहे.

अइसने एक राति सीताराम भूतन क बात उठा दिहलन. पड़ोसे में छेदी के साथ अनहोनी घट गइल रहे. ऊ सूतले में राति क सपना देखलन कि उनुकी दहिने हाथ क बीच वाली अंगुरी क दू ठो पोर उनहीं क पड़िया चबा लेले बा. जब सबेर भइल आ ऊ उठलन त का देखत बाड़न कि उनकी खटिया की निगीचे ढेर खून जम्मल परल बा आ ओहि में सनाइल उनकर अंगुरी के कटल पोरो बा. ऊ बहुत डेरा गइलन. सगरे गाँव में हल्ला हो गइल. लोग उनके देखे खातिन भहरा के उनके घर की ओर दउरि परल. केहू कहे कि खदेरन के जल्दी बोलावे के चाही, काहे से की ई कवनो भूत-परेत क काम बुझात बा. खदेरन जइसन ओझा अरियात-करियात में कहवां मिली. ऊ आ जइहें त ए ससुरा के डंडा से धूनि-धूनि के भगा दिहें भा फेरू बोतल में बान्हि के भैरो बाबा की इहां छोड़ि अइहें. केहू कहे कि जल्दी से डकटर के बोलावल जरूरी बा. दवा-दारू होखे के चाही. तरह-तरह क लोग, तरह-तरह क बाति. छेदी क घरवाले बहुते परेशान, का करल जाय, का ना. खदेरन के पता चलल त ऊ दउरल आ गइलन. अवते भीर लगवले लोगन के डपटलन त सब पाछे हटि गइल. पचरा गावे लगलन. कहल जाला कि जब कवनो ओझा पचरा गावे लागेला त आस-पड़ोस क सगरी भूत उंहवां बटुरि जालन स, फेरू जवन कसूरवार होला ओके दबोचि लिहल जाला. पचरा चलत रहल बाकिर बहुत देर हो गइल रहे. सपना क भूत छेदी के सीना प सवार हो गइल रहल. ओकर शरीर गरमाये लागल, माथा जरे लागल. छेदिया क मेहरारू अंगोछा भिजा-भिजा के ओकर देहि पोंछत रहल बाकि सब बेकार. ओकर खून बहुत बहि गइल रहे. सांझि से पहिलहीं ओकर देहि पियरा गइल. खदेरन बुझि गइलन, पचरा बन क दिहलन आ ओकरी बाद छेदी के घरे सब रोवे-पीटे लागल.

सीताराम कहलन, ‘छेदिया की साथे ई बहुत बुरा भइल. ओके हम कई बेर मना कइलीं कि राउत बाबा के गाली-गुपता देवल ठीक नइखे बाकिर ऊ मनबे ना करे. कहल करे कि भूत-परेत सब बेकार क बाति बा. कबो-कबो त ऊ ओहि बरगदवा के नीचे मूति देवे, जवने प राउत बाबा क ठीहा रहल. बाबा वइसे त कवनो बाति क बुरा ना मानेलन बाकिर उनकर चेलन-पट्ठन के छेदी क ई करतूत अच्छी ना लगत रहल. बाबा की साथे ओहि बरगदवा प सौ भूतन क डेरा रहल. ओमे दू गो बहुत बदमाश रहलन. कनवा आ रतना. सबके पता बा कि कनवा कई बेर झौहरिया की नवकी मेहरारू प चढ़ चुकल बा. जब्बे कबो ऊ भुलाइयो के बरगद की निगीचे से गुजर जाले, घरे पहुंचते अभुआये लागेले. झौहरिया का करे बेचारा, ओकर झोंटा पकरिके उठा-उठा के भुइया पटकेला, खरहरा से ओकर धुनाई करेला बाकिर कनवा जिद्दी क जिद्दी. ऊ भले केतनो पिटा जासु बाकिर एक राति से पहिले ओके ना छोड़े, त ना छोडे. जब झौहरिया राउत बाबा के बकरा अउर दारू क मनौती मानि के उनक गोड़ लागेला, तब्बे ओकरी बीवी के कनवा से मुकती मिलि पावेले.

रतना एतना बदमिजाज त ना हवे बाकिर ऊ दारू क शौकीन जरूर बा. बाप-दादन से गाँव में ई रिवाज चलत आ रहल बा कि घर में केहू दारू पी त पहिले रतना खातिन निकारि के तब पी. परसाल क बाति बा. ठकुरा न जाने कहवां से एक बोतल विदेसी ले आइल आ दू गो दोस्तन क संगे पीये बइठि गइल. ओमे से एगो कहबो कइलस कि रतना के चढ़ा दे त पीयल जाय बाकिर ऊ शहर में पढ़ि के आइल रहल से केहू क बाति ना सुने, रिवाजो ना माने. ऊ गरमा गइल, ‘कवन रतना, झांटू कहीं का, ऊ हमार का उखारि लेई?’ पुरवा भरिके गटागट गटक गइल. दारू भीतर का गइल की सीना में सूई चुभे लागल. बेचारा माथा थामि के बइठि गइल. पिताजी क अलमारी में अर्जुनारिस्ट रखल रहे. ओके लागल कि हो सकेला ओहू के पिताजी जइसन दिल क बेमारी होखे से पुर्रे कटोरी भरिके हलक से उतारि लेहलस. बाकिर ऊ त रतना रहल. ऊ छोटो-मोट गलती खातिन केहू के छोड़ेला ना. लोग हकीम के बोला के ले अइलन बाकिर ई का ओकर त अवजिये बदलि गइल. ओकरी भितरां से केहू अउर बोले लागल. फेरू ऊ कोठरी से निकरि के सरपट भागे लागल? आपन बार नोचत, दांत कटकटावत आ देवार से कपार टकरावत. केहू का बुझाय ना कि का कइल जाय. बभनउली से बड़के सइयद बाबा के बोलावल गइल. ऊ ठाकुर के पोंछिया के पकड़वा लिहलन अउर खंभा से बन्हवा दिहलन. फेरू खूब जमि के पिटववलन. जब दनादन दस लाठी पीठि प परल त ऊ आपन मुंह खोलि दिहलस, ‘का करीं, ई छोकरा हमके पूछबो ना कइलस आ गिलसिये जुठार दिहलस.’ सबके बुझा गइल कि ई रतना बा. सइयद बाबा ओके वादा कइलन कि ठकुरा एक ठो नयी बोतल ले आई आ कूल्हि तहरा के दे देई. तब जाके बबुआ क पिंड छूटल.

छोटू बहुत अबेर से चुप रहलन. उनके ओंघाई लागत रहे, उनकर मुंह बवा-बवा के बन हो जात रहे. ऊ सीताराम के टोक के बाति आगे बढ़वलन, ‘देख भइया, भूत-परेतो अदिमिये जइसन होलन स. कुछ नेक त कुछ बदमास. परेत जोनि में सबके थोरी दिन रुके के परेला. जेकर जइसन करम बा, वोही के हिसाब से ओकरा भुकती-मुकती मिलेले. अदिमी क जवन इच्छा इहां ना पूरी हो पावेले, ऊ एहि परेत जोनी में आके पूरी करेला. कुछ भूत त जानि-बुझि के उत्पात मचावेलन स कि कवनो संत-महातमा से पाला परि जाय ताकि एहि जोनी से मुकती मिले. सभै जानेला कि रामजी चाचा क परबाबा पिंगल राय सौ बरिस से परेत जोनी में परल बाड़न. कुछ बुरा काम जरूर कइले होइहें बाकिर अब त उंहा के खाली सबकी भलाई में लागल रहीले. केकर मजाल कि रामजी चाचा क कउनो काम बिगाड़ि देवे. ऊ लोटन ससुरा, पता ना का ओकर मति बउराइल कि एक राति बाबू साहब की खेत से गेहूं काटे पहुंचि गइल. काटियो लेहलस बाकिर कपार प जइसे बोझिअवलस आ चले खातिन खाड़ भइल कि रामजी चाचा पहुंचि गइलन. सपना में पिंगल बाबा अइलन आ रामजी के दूई चाटा रसीद कइलन. उनकर आंखि खुलल त देखत बाड़न कि बाबा सम्हनवें खाड़ हउवन अउर कहत बाड़न कि, ‘बेटा, जा तनी आपन खेतवा त देखि आवा. रामजी क नजर घड़ी प गइल त राति क दू बजत रहे. मुंह प पानी क छींटा मारि के ऊ खेत की ओर चल पड़लन. बाबा ना जगवतन त लोटनवा दस-बीस किलो अनाज क झटका त देई देहले रहत.’

‘अउर गया बाबा के का भइल रहल’, गुल्लू के अनचक्के में कुछ इयाद आ गइल. रोज-रोज क भूतबतिया से ओकरा मन में थोरी दिलचस्पी जाग गइल रहल. ऊ सांझि क कबो जब राउत बाबा वाले बरगद की निगीचे से गुजरे त एक फरलांग पहिलहीं से सरपट दउरे लागे अउर बरगद से ओतने आगे पहुंचि के रुक्के. एक बेर ऊ अपने पिताजी से पूछलस, ‘काका, तू कबो भूत देखले बाड़?’ पिताजी अचकचा गइलन बाकिर जबाब दिहलन, ‘हँ हो, एक बेर अइसन भइल रहे. ओहि दिन हमके राति में मइदान जइले क मन कइलस. लोटा उठवलीं आ बगइचा की ओर निकलि गइलीं. चटक अँजोरिया उग्गलि रहल. पसेरिहवा आम के पेड़ से थोरी फरके जाके बइठि गइलीं. थोरी बेर बाद उत्तर की ओर हमार नजर गइल. हमरे नयका अमोलवा के निगीचे एक ठो मेहरारू लउकल. सफेद साड़ी पहिरले रहल. हम उठलीं त ओकरी पास से निकललीं. असमान में चांद देखि के लागल कि राति क तीसर पहर रहल होई. एतनी राति क बगइचा में एक ठो मेहरारू देखि के हमके कुछ नीक ना लागल. एक नजर ओप्पर डललीं. ओकर मुंह तनी आड़े रहल, एह से पहिचानि में ना आइल बाकिर जब हम ओकर गोड़ देखलीं त माथे प पसीना चुहचुहा गइल. ओकर गोड़ पाछे की ओर मुड़ल रहल. ऊ जरूर कवनो चुरइल रहल होई’

गुल्लू के एक बेर पिताजी गया बाबा क कहनीओ सुनवले रहलन. बहुत मजेदार रहलि. बाबा आपन जमाना क बड़का पहलवान रहलन. ऊ कुश की झुरमुट के भूत समझि के ओसे बाजि गइलन. गुल्लू क मन कइलस कि गया बाबा क कहनी सीताराम के मुंह से सुनल जासु, ‘हँ त सीता चाचा, गया बाबा क बाति बताव नु’ सीताराम शुरू हो गइलन, ‘कहनी न कहा बाबू, सौ आना सच बाति बा. गया बाबा अकसर राति-बिराति खेत देखे खातिन निकलि जात रहें. अइसने एक राति जब ऊ अपनी खेत पर पहुंचलन त उनुके लागल कि कवनो छांह जइसन चीजि उनकी ओर लपकति बा. चांदनी राति रहल. पुनवासी रहलि होई. दूर ले साफ-साफ लउकत रहे. खेते की मेंडन प कुश क झुरमुट झबराइल रहल. मीठ-मीठ पुरवाई बहति रहल. कुश लहरात रहल त ओकर छांहो लहरात रहल. गया बाबा थोरी लम्मे रहलन तबे ओके ललकारे लगलन, आवे दे निगीचे तब तोके बताइब. ऊ छांहे की ओर बढ़ि गइलन आ आव देखलन न ताव कुश के झुरमुट में घहरा के घुसि गइलन. कुश क नोंक उनके खुलल देहि में धंसे लागल त ऊ बुझलन कि केहू उनसे लड़त बा. ऊ कुश से बाजत-बाजत थाकि गइलन बाकिर कुश क झुरमुट उखारि डललन. एहि झूठ-मूठ क लड़ाई में बाबा के बहुत घाव लागि गइल. ऊ लथ-पथ उहवें पसरि गइलन. सबेर भइल त केहू उनूके लहूलुहान देखलस आ उठा-पठा के घरे ले आइल. बाबा बेमार हो गइलन आ सरग सिधारि गइलन.’

कल्ले-कल्ले गुल्लू के लागे लागल कि भूत-परेत क सगरी कहनिया मनगढ़ंत बा बाकिर ओकरी मन में बहुत गहिरे एगो डर जरूर बइठि गइल रहल. ऊ जानल चाहत रहल कि आखिर ऊ कूल्हि रहस्स का बा बाकिर कइसे जाने, कवनो रस्ता ओके सूझे ना. गुल्लू की घर-पलिवार में सबही क आपन पुरखन क रसम-रेवाज में पूरा भरोसा रहल. उहां सभै देवी-देवतन के मान-सम्मान रहल. सब लोग भगवान के माने वाला रहल. एक ठो बेमार बहिन रहल, जवने की इलाज खातिन डकटर की जगह अकसरुए खदेरन के बोलावल जासु, उनकर पचरा होसु. कबो-कबो गुल्लू क माई आपन बाल-बच्चन के जोग-छेम खातिनो ओझइती करावति रहलिन. दवा प पइसा लुटवले से अच्छा इहे समझल जासु. ओझा बाबा के का चाही. जियादा से जियादा भर पेट खाना अउर दू-चार आना दछिना. माई सालि में एक बेर देई माई की थाने जरूर जासु. गुल्लू क दिलचस्पी उहां देसी घीव में छनल पूड़ी अउर बखीर में जियादा रहे. ऊ चुपचाप भूत-परेत की खोज में लागि गइल. ओकरा के लागे की साधू-संत ऊ रहस्स क बारे में जियादा जानत होइहें. एहि तलास में ऊ रोज तपसी बाबा की कुटी क एक चक्कर जरूर लगावे. तपसी बाबा गिरहत्थ साधू रहलन. ऊ घर-बार क जिम्मेवारी छोड़ि के अबादी से थोरी दूर एगो कुटी बना के रहत रहें. सबेर की पूजा के बखत ऊ घंटा बजावें त अवाज लम्मे ले जासु. गुल्लू ओकर बाटि जोहे. घंटा बजल कि ऊ कुटी की ओर दउरि परल. बाबा भूनल चना, हलुआ अउर बतासा क परसाद देसु. कुछ दिन बीतल त गुल्लू क ई खोज खाली परसादे ले सीमित रहि गइल. तपसी बाबा हरे राम, हरे कृष्ण से जियादा कुछू जानत ना रहलन. गाँव में नागा बाबा, जोगी अउर दूसरी किसिम क साधू लोग भी आवत-जात रहे. बाकिर ओमे से कवनो मंगन से जियादा कुछ बुझाइल ना.

गुल्लू दिन प दिन बढ़त जात रहल. घर में जेतना किताबि रहलिन सन, ऊ पढ़ि डरलस. कबो-कबो ऊ बजार से तंतर-मंतर क किताबि आ पतरिका खरीद लेसु. जब राति क सब लोगन क आंखि लागि जासु त चोरी-छिपल ऊ नयी-नयी चीज पढ़ल करे. रहस्स-रोमांच क कहनिन में ऊ गोता लगा लेवे बाकिर सब बिरथा. कबो-कबो ओकरा मन होखे कि ई कहनिन क लेखकन से मिलि के सचाई जानल जा सकेले पर अबहिन ले ऊ कबो अकेले गाँव से कवनो बड़ शहर की ओर निकलल ना रहे, से ऊ कवनो फइसला ना क पावे. जब ओके कवनो रस्ता ना लउकल त ओकरा मन में प्रतिक्रिया होखे लागल. कबो-कबो ऊ सोचे कि ई सब बकबास बा, झूठ बा. ओहि बखत गाँव में काली माई की थान प एगो मेला लागल. घर-घर से माई के धारि चढ़ल. धारि से भरल घइली सजा-सजा के माई की चउरा प रखल गइल. गुल्लू खातिन भूत, परेत, देवी, देवता, केहू प बिस्सास कइल कठिन हो गइल रहे. केहू सच बतावे आ देखावे आला ना मिलत रहल. ऊ कबो-कबो त बहुत बेचइन हो जाय. एहि मनोदसा में एक दिन ऊ चउरा के पास खाड़ पेड़े प चढ़ि गइल आ माई की कपार प कूदि परल. ऊ ई काम कई बेर कइलस. ई सोचि के कि अगर माई होई त चउरा से कबो त निकली. चाहे भले गुसियाईये के निकले बाकिर निकले त. माई ह, त पियारे नू करी. पियार एह खातिन कि बच्चा बा, जानत नइखे बाकिर जानल चाहत बा. कवनो माई आपन बच्चा से कहां गुसियाले, आ अगर गुसियाले भी त पियारे खातिन नू. जब कपार प गोड़ रखले के बादो माई ना निकललि त ऊ ओकरे कपार प डंडा बरसा दिहलस अउर उंहा सजाइ के रखल कूल्हि घइली फोरि डरलस.

अब कल्ले-कल्ले ओकर डर कम होखे लागल. ऊ हर घरी देवी-देवतन क बेइज्जती करे खातिन तइयार रहे. गाँव में डीह बाबा की थान से माटी क हाथी घरे उठा ले आवे. जब कई ठो हो जासु त लठिया के फोरि देसु. खेते प सइयद बाबा क समाधि रहल. मजार ढहि गइल रहे. खाली एक ठो देवार खाड़ रहल. जब ऊ पिताजी के संगे खेत प जासु, बाबा की देवार से एगो ईंटा उखारल ना भुलासु. ओकर खोज खतम ना भइल रहल बाकिर ऊ एतना मेहनत के बाद ई माने लागल रहल कि ई सब खाली गढ़ल-गढ़ाइलि बाति बा. एहि उधेड़-बुन में ओकर गाँव की इस्कूल क पढ़ाई पूरा हो गइल. शहर में दाखिला हो गइल. पढ़ाई क बोझा बढ़ि गइल. भूत-परेत में ओकर दिलचस्पी खतम ना भइल रहे बाकिर ओकरे पास अब बखत कम पड़े लागल. नवका इस्कूल में हिंदी क माट साब बहुत नीक से पढ़ावत रहलन. एक दिन ऊ सब बच्चन क इम्तहान लेवे के सोचलन. सबसे पूछलन कि भूत क माने केहू बताई? सब नया-नया इस्कूल में आइल रहल, केहू हाथ ना उठवलस. फेरू ऊ खुदे बोललन, ‘अरे बेटे, भूत ऊ बा जवन न वर्तमाने में बा, न भविस्से में होई. जवन बीति गइल बा, जवन बटले नइखे.’ गुल्लू चिहा-चिहा के माट-साब क मुंह ताके लागल. ऊ मिडिल क्लास में काल पढ़ले रहल. मुंसीजी खूब समझा के बतवले रहलन, ‘काल तीन ठो होला, भूत, वर्तमान आ भविस्स.’ तब ओके भूतकाल क पूरा बोध ना भइल रहल. ऊ नवका माट-साब की तऊर-तरीका से बहुत परभावित हो गइल रहे. ऊ जब भूत क अरथ बतवलन त ओकरे दिमाग में बिजुरी कउंधि गइल. ओकर खोज एके झटका में पूरी हो गइल. ओकरे मन में ई सवाल उठल, ‘हम बिरथे में एतना दिन से भूत खोजत रहलिन. ऊ बा कहां?’


ए-158, एमआईजी, शास्त्रीपुरम, आगरा
फोन-09927500541

चिट्ठी

Dr.Ashok Dvivedi

– डा॰अशोक द्विवेदी

हम तोहके कइसे लिखीं?
कइसे लिखीं कि
बहुते खुश बानी इहाँ हम
होके बिलग तोहन लोग से…

हर घड़ी छेदत-बीन्हत रहेला
इहवों हमके गाँव
इयाद परावत रहेला हर घड़ी
ओइजा के बेबस छछनत जिन्दगी.
कल कहाँ बा बेकल मन के एहूजा?
हम ई सब लिखि के नइखीं चाहत मन दुखावल तोहार.

रुपया आ रौनक का एह शहर में
देखले बानी हमहुँ
एगो सुबिधा, न जिनिगी जिये के सपना.
सपना त पतई पर टँगाइल
ओस के बूने नु हऽ
घाम लागल ना कि उड़ि गइल.
फेरु शहर त शहर हऽ
इहवाँ अंत ले ना हो पावेला आदमी के
इतमीनान.

साँच मानऽ हमार परतीत करऽ
भुलाइल नइखीं हम कुछऊ
ना त, होत फजीरे तहरा पातर होठन पर
थिरके वाली किरिनिन के लाली
ना घर ना दुआर
ना खेत ना बधार
हमके इयाद बा आजो ऊ कटहरी चंपा के
बरबस खींचे वाली गंध
जवन पछिला साल हुलसि के खिल गइल रहे
आ तनिकी बर बोल दिहल पर मिलल रहे
अधरसा अमरुद अस न्यौतत
तहार मीठ झिड़की
ऊ बनावटी खीसि में आँख तरेरल तोहार
भला कइसे भोर परी?
बाकिर का करीं?
जवना खातिर घर छूटल
ऊ गरीबी, ऊ बेबसी
ऊ तहरा पुरान खाँखर होत साड़ी से झाँकत
मसकल कुर्ती
हमके भर नीन सूते ना देलस
आजु ले!

मन मार के केहूँ तरे जीयल
भला कवनो जीयल ह?
कूल्ही उछाहे मरि जाव जब जब जियला के
हँसी गायब हो जाय धीरे धीरे ओठन से
ना ना,
हम माई आ बाबूजी लेखा
नइखीं जीयल चाहत, मार के मन,
एही से
झोंकि दिहनी हम अपना के
अनजान शहर का एह दहकत भरसाईं में.

अब कम से कम एगो भरोसा आ
एगो सपना त बा
ढंग से जिनिगी जीये के
हम लड़त त बानी ओकरा खातिर इहां.

घबड़इहऽ जिन तू तनिको
इहाँ ठहर ठेकाना हो गइल बा
आ बहुत कुछ नीक जबून के ज्ञान
आज सिरिफ कुछ रुपिया भेजि के मनिआर्डर
ना होई सुब्बुर हमके
कपड़ो लत्ता से ना,
हम त देखल चाहत बानी
तोहन लोग के एतना खुशहाल
जेमे ना होखे अइसन कुछ के कमी
कि मन मार के जिये के परे…
एही इन्तजाम में बानी.

मत होइहऽ तनिको उदास तूँ
मन के थिर रखिहऽ
माई बाबू के दीहऽ ढाढस आ विश्वास,
हम जल्दिये लौटब गाँव
हो सकी त एही फगुआ ले!


डा॰ अशोक द्विवेदी के अउरी रचना

पापी हो गइल मनवा

– अभय कृष्ण त्रिपाठी

पापी हो गइल मनवा कइसे करीं राम भजनवा,

प्रभुजी मोरे कइसे करीं राम भजनवा..

आइल बानी द्वार तिहारे,

मन ही मन में रजनी पुकारे,

पुलकित होवे ला मदनवा,

प्रभुजी मोरे कइसे करीं राम भजनवा..

दाता के भंडार भरल बा,

जियरा देखीं सगरे गरल बा,

प्राणी दे ता परनवा,

प्रभुजी मोरे कइसे करीं राम भजनवा..

माई हो गइल रानी दुलारी,

बिटिया लागे लागल प्यारी,

बहिना हो गइल जियावन,

प्रभुजी मोरे कइसे करीं राम भजनवा..

कलयुग के आगाज इहे बा त का होई अंजाम,

कुछ तऽ बो लऽ प्रभु हमारे कइसे लड़ी संग्राम,

पाप घड़ा के छोटा कर दीं ना तऽ मची कोहराम,

हो जाई जब सबहीं रावण केहु ना पुकारी राम,

केहु ना पुकारी राम…राम…राम… हे राम…,

रह जाई बस सिवनवा,

प्रभुजी मोरे कइसे करीं राम भजनवा..

पापी हो गइल मनवा कइसे करीं राम भजनवा,

प्रभुजी मोरे कइसे करीं राम भजनवा..